किसी वस्तु , व्यक्ति , स्थान के प्रति ममता , आसक्ति को कैसे दूर करें ?
पूज्य महाराज जी का एक संक्षिप्त वचन — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
जो वस्तु व्यक्ति स्थान के प्रति ममता है आसक्ति है लगाव है ये तिरस्कार अपमान और निंदा के द्वारा दूर होता है जब निंदा हुई तिरस्कार हुआ अपमान हुआ जैसे बिल मंगल जी का तिरस्कार कर दिया कट वचन बोले चिंतामणि ने तो भगवान की तरफ कदम बढ़े नहीं जीव का जो मन है वो चिपकू स्वभाव का है वो आसक्ति वो ममता वो राग कर लेता है जरा सा बोल दे जरा सा अनुकूल हो जाए तो वो उसी में राजी हो जाता है कि ये मेरा है प्रभु होने नहीं देते बड़े कृपालु हैं अपने जन को फसने नहीं देते इसलिए वहां से प्रतिकूलता दिलाते हैं तिरस्कार दिलाते हैं कटु वचन दिलाते तब वो फिर चैतन्य होता है अरे नहीं इस जगत में कोई नहीं हरि के सिवा मेरा कोई फिर हरि की तरफ भागता है तो कह रहे हैं कि ऐसी भगवान की अतु की कृपा है कि जब जीव को भगवान अपनाते हैं तो तिरस्कार अपमान निंदा देते हैं घबराओ मत उतना ही देंगे जितने में तुम परिपक्व हो जाओगे तुम्हारा पति
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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