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मोह रहित हो जाएंगे तो बच्चों का पालन-पोषण कैसे करेंगे?

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श्री हित राधा केलि कुंज, वृन्दावन में पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के साथ एकांतिक वार्तालाप। साधक अपने जीवन और साधना के प्रश्न रखते हैं और महाराज जी उनका समाधान करते हैं।

पूरा प्रवचन

सुरेंद्र जी गुरुग्राम से राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मोह को त्याग कर भगवत प्राप्ति कैसे होगी महाराज जी बिना मोह के बच्चों का पालना कैसे करें उनकी परवरिश कैसे करें महाराज जी मोह त्यागने का कोई सरल उपाय है क्या देखो कठिन लग रहा है जो तुम्हें लग रहा है कि बिना मोह के हम अपने बच्चों का पालन नहीं कर सकते ये तुम्हारा भ्रम है मोह श्रेष्ठ या प्रेम श्रेष्ठ विचार करो मोह मलिन होता है। प्रेम निर्मल होता है। यदि हम अपने बच्चे से प्रेम करें कि मेरे भगवान मेरे बच्चे के रूप में आए हैं।

क्या इससे बढ़कर के कोई भाव हो सकता है? हम अपने बच्चे को इससे बढ़कर क्या प्यार कर सकते हैं कि हम उसे अपना भगवान मानते हैं। हम अपनी पत्नी को इससे बढ़कर प्यार क्या कर सकते हैं? हम उसे अपना भगवान मानते हैं। हम माता-पिता को इससे बढ़कर क्या प्यार दे सकते हैं? हम उन्हें भगवान मानते हैं। मातृ देव भव, पितृ देव भव तो हम यदि भगवान की भावना करें तो मोह का नाश हो जाए और भगवत प्रेम हो जाए। सब में भगवान विराजमान है। तो मेरे बेटे के रूप में कौन आया है? भगवान ही तो आए हैं।

भगवान अगर चले जाए उनके शरीर से तो उस शरीर को हम जला देते हैं। शरीर को गाड़ देते हैं। शरीर का कोई महत्व नहीं रखते। तो आज भी आप अनजाने में भगवान का ही महत्व रख रहे हैं। तो उनहीं भगवान से प्यार करो ना। अपने बेटे के शरीर रूपी मंदिर में भगवान को देखो। मेरा परमात्मा इस रूप में आया है। और प्यार करो। आपकी भक्ति बढ़ेगी और भगवान की प्राप्ति होगी और बेटे का प्यार भी सुरक्षित रहेगा। मोह से बढ़कर के प्रेम है। मोह में तो अज्ञानता है। प्रेम में ज्ञान है। इसलिए भाई ऐसा ना सोचो कि मोह के बिना परिवार का पोषण कैसे हो सकता है।

बहुत अच्छे से हो सकता है। यदि हम भगवत भाव करें तो। पर भगवत भाव करने के लिए नाम जप जरूरी है। बिना नाम जप के भावना नहीं जागृत होती। भजन से ही भाव की प्राप्ति होती है। खूब नाम जप करो। महाराज जी आपके अनुगत यहां चार 500 संत रह रहे हैं तो आप पालन पोषण कर रहे हैं। क्या आपको मोह है? हमें जितना एक गृहस्थ अपने परिवार से प्यार करता होगा उससे करोड़ गुना प्यार है। करोड़ गुना। हर बच्चा हमको हमारे हृदय से हमारी आत्मा है। हर बच्चा बच्ची हमारी आत्मा है। लेकिन हम कभी पास नहीं बैठते।

कभी हम ये नहीं कहते दुलार नहीं करते। लेकिन हृदय से हमारा चिंतन जैसे कछुआ अपने अंडे को जल में रहकर के चिंतन के द्वारा उसे परिपक्व कर देता है। ऐसे हम चिंतन के द्वारा अपने शिष्य या अपना परिकर या जो जहां भी रह रहा है वो चिंतनीय शक्ति के द्वारा हम अपनी आत्मा मानते हैं। हम इनको बहुत प्यार करते हैं। पर हम प्रगट में प्यार नहीं करते। महाराज जी ये तो बहुत बड़ा उदाहरण है कि बिना मोह के इतने जनों का पालन पोषण हो और हर बच्चा अगर वो ईमानदारी से सत्य मार्ग में लगा है तो उसको अनुभव होगा कि मुझसे बहुत प्यार करते हैं।

सबको अनुभव होगा जितने हैं कि हमको बहुत प्यार करते हैं। ये अनुभव होगा जबकि हम कभी किसी से नहीं कहते हम तुम्हें प्यार करते हैं। कभी नहीं कहते। कभी पास बैठकर दुलार नहीं करते और जब पास मिलेंगे तो बस एक दृष्टि से देख लिया बस इतना ही बहुत हो गया। लेकिन प्रेम के द्वारा सबका पोषण होता है। मोह के द्वारा अच्छा आप इतने लोग बैठे हो क्या हमारे प्यारे नहीं हो? क्या आप हमें प्यार नहीं कर रहे हैं? क्या मोह का संबंध है हमारा आपका? नहीं है। लेकिन इतना प्यार है कि हम तुम्हें कैसे बताएं?

शुद्ध प्रेम चिंतन के द्वारा होता है। भगवत चिंतन करते हुए भाव में भर के जिसका चिंतन कर लिया उसका कल्याण हो गया। उसका मंगल हो गया। कल्याण होना, मंगल होना, दुखों का नाश हो जाना यही बात है। ऐसे लाखों लोग हैं जो देश विदेश में रह रहे हैं। हो सकता है मैं उनको बाहरी ना पहचानता हूं लेकिन वो भाव कर रहे हैं और उनका परिवर्तन हो रहा है क्योंकि आंतरिक चिंतन से परिवर्तन हो रहा है। उसे प्रेम कहते हैं। जी वास्तविक प्रेम तो गुरु ही कर सकते हैं। भगवान भगवान और गुरु अभेद है।

इसलिए हम गुरु जी से भी मानते हैं कि भगवान और गुरु वो सर्वज्ञ है। अखंड मंडल में व्याप्त है। जैसे भगवान ऐसे गुरुदेव तो वास्तविक प्रेम तो भगवान और गुरुदेव ही करते हैं। और तो सब माया का खेल है। भगवान की आसक्ति का खेल है। सब एक दूसरे की आसक्ति में बंधे हुए पशु पक्षी तक अपने बच्चे से प्रेम करते हैं। लेकिन सबको अपना बच्चा मानकर सबको अपनी आत्मा मानकर ये तो कोई महात्मा ही प्रेम कर सकता है। सबको बराबर प्रेम देना। इनमें से कोई ऐसा नहीं जो अपरिचित हो हमारे लिए।

हमारी आत्मा की तरह उसका प्यार, सबको प्यार, सबको अपनापन। ऐसा नहीं कि इनमें से कोई हमारे लिए नफरत करने योग्य हो। पिता से पूछो जिसके चार पुत्र हैं, एक महात्मा है, एक गृहस्थ है, एक पागल है और एक दुराचारी है। उस पिता से पूछो तुम्हारी चारों के प्रति दृष्टि कैसी है? तो वात्सल्य भाव युक्त होगी। वो दुराचारी को भी प्यार करता है। वो पागल को भी प्यार करता है। वो महात्मा को भी प्यार करता है। वो विद्वान को भी प्यार करता है। ऐसे ही हमारे दरबार में, हमारी श्री जी के दरबार में, हमारे लाल जी के दरबार में, प्रभु के दरबार में घोर पापी का भी स्वागत है।

अब वो क्या है? तुम जानो। हमारी दृष्टि में मेरा प्रिय आत्मा, मेरा प्रिय प्राण भगवान पधारा है इस रूप में। इसके अलावा और हम परिचय नहीं जानते।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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