क्या आप सच में मन की बात जानना चाहते हैं? ये नियम अपनाइए
पूज्य महाराज जी का एक संक्षिप्त वचन — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
जैसे आप शौचालय गए उतने ही वस्त्र पहन करके जाइए जितने धो सकते हो। नहीं तो आजकल तो बंद व्यवस्था है आप सोच पे स्नान किए अंगूछे से पोछा और फिर अपने कपड़े धारण कर लिए। अगर आप सोच वाले कपड़े पहने हैं तो आप अपवित्र हैं। पवित्रता का जितना निर्वाह करोगे उतना बढ़िया चिंतन चलता है। लघु शंका गए आप खड़े-खड़े लघु शंका कर रहे हैं। आपके पैरों में छिट्टी पड़ रही है। फिर आपने मूत्र इंद्री को प्रक्षालन नहीं किया। धोया नहीं। फिर हाथ नहीं धोए आचमन नहीं किया आप अपवित्र हैं।
कुछ भोजन पाया आचमन नहीं किया अच्छे से कुल्ला नहीं किया आपका मुख अपवित्र है। आपका मन गंदे विचार कर रहा है तो अपवित्र है। पवित्रता का निर्वाह जितना करोगे उतना ही अनुभव होता चला जाएगा। अब जैसे हमें भोजन प दिया गया तो हम पता चल जाएगा कि बनाने वाला क्या सोच रहा था? कैसे बना रहा था। परम वस्त्र पवित्र सब पूरी पवित्रता का निर्वाह तो तुरंत पता चल जाएगा। तो ऐसे हम पवित्र रहे तो हम अपने मन को जान सकते हैं। अपनी बुद्धि को जान सकते हैं। मन बुद्धि को भगवान में लगा सकते हैं।
अब हमारा मन कहां गया? इसलिए पवित्रता का निर्वाह करना अत्यंत आवश्यक
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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