क्या भगवान गृहस्थ भक्तों को ज़्यादा महत्व देते हैं? क्यों?
पूज्य महाराज जी का एक संक्षिप्त वचन — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
एक बार भगवान देवर्षि नारद जी से वार्ता कर रहे थे तो विनोद में कहा कि जो गृहस्ती में मेरा भजन करता है उसे मैं विशेष महत्व देता हूं। देवर्षि नारद जी ने कहा प्रभु विरक्त पूरे जीवन जलता रहता है। कोई मनोरंजन नहीं कोई मन से संसार के भोगों का त्याग करके भगवान में लगाना कोई मन को भोगों में नहीं। बड़ा कष्टमय जीवन है। ये बड़ा कष्टमय जीवन तपस्वी का ईमानदारी से अगर चला जाए। बेईमानी से चला जाए तो बात अलग है कि अपना मनमानी करो लेकिन अगर ईमानदारी से चला जाए तो बड़ा कष्टम में जीवन है।
केवल भगवनंद संसार के आनंद का त्याग करते हुए चलना होता है। तो देवर्षि नारद जी ने कहा गृहस्थ भक्त को आप प्राथमिकता क्यों देते हैं? तो उन्होंने कहा देवर्षि नारद जी से एक काम करोगे। भगवान ने एकदम बात घुमा दी। एक कटोरे में घी भर के दिया और कहा मेरे आसन की परिक्रमा लगाओ एक सुदर्शन चक्र हमारा पीछे चले गए। एक बूंद भी नहीं गिरना चाहिए। भगवत आज्ञा बोले कितनी बार नारायण नारायण कहा बोले नारायण नारायण पूरी चित्तवृत्ति इस कटोरे में लगी थी की एक बूंद की गिरा तो सुदर्शन चक्र पीछे बोले एक कटोरे के गीले तुम्हारी भगवत स्मृति अपहरण कर ली और उनके लड़का बच्चा रिश्तेदार नातेदार न जाने कितने कार्य और वो सब कार्य करते हुए यदि मेरा भजन करता है तो वो मेरा सर्वश्रेष्ठ भक्त है।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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