मीठी बातों के पीछे छिपा असली चेहरा
पूज्य महाराज जी का एक संक्षिप्त वचन — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
बाहरी मृदु भाषण करना तो चालबाजी भी हो सकती है कि वह मृदु भाषण बोलता है लेकिन हृदय छुर धाराम हृदय छुरे की धार की तरह तीखी है। किसी के साथ बेईमानी किसी के साथ कपट छल और बड़ा मृदु ऐसे देखे गए हैं। मृदु बोलना ही कोई दन्यता नहीं है। या अपने को ऐसे करना ही कोई दन्यता हो सकता है कुछ नहीं करें। लेकिन अहम शून्य जीवन ही दन्य है। दीन का मतलब होता है अहंकार शून्य। वो चक्रवर्ती सम्राट महाराज अंबरीश भी हो सकते हैं जो दैन्य है और अगर अहम है तो छोटी-छोटी बात को लेकर है और भगवान को अहम प्रिय नहीं है भगवान को अहंकार प्रिय नहीं दैन्य प्रिय है तो अहम शून्य जीवन ही को दन्य कहते हैं ना कि मृदु भाषण या नम्रता दिखाना यह तो नाटक भी हो सकता है जैसे हम कह रहे हैं बहुत नीच अधम है और जब दूसरा सभा में खड़ा होकर कहे पाखंडी नीच अधम और मुझे लगे कि हां ठीक बात कहा मैं ऐसा ही हूं।
वह है दैन्यता जब किसी भी तरह की प्रक्रिया से अहम जागृत ना हो। दैन्य दैन्य की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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