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तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और भगवत्-प्राप्ति हो जाएगी। यमुना तट सत्संग (03-07-26)

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श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

जय जय श्री हरिवंश मन मनस का मत प्राणा भगवान ने कहा उद्धव जी से कि मैं गोपियों के लिए इसलिए विरह युक्त रहता हूं कि वो मन मनस का मत प्राणा मद तक्त दहिका कहा भगवान में मन लगाना साधना है लेकिन कृष्णमय मन हो जाना मन मनस का कृष्णमय प्राण हो जाना प्राण कृष्ण का चिंतन करते हुए जब मन निरंतर हर शस में तो मत प्राणा हो जाता है। कृष्ण प्राणा हो जाता है। गोपिका जी कहती हैं कान भय प्राण में और प्राण भय कान में ही में ना जान पर कान है कि प्राण है। प्राण ही कृष्ण हो गए या कृष्ण ही प्राण हो गए।

मन मन का मत प्राणा मदत देह का मेरे लिए समस्त देह के आचरण समर्पित करना। यह है भगवत प्राप्ति। भगवत प्राप्ति का स्वरूप क्या है? भगवन में मन हो जाना। भगवन में प्राण हो जाना और देह के समस्त आचरण समस्त विलास केवल भगवान के लिए। अब बोले इसका साधन क्या है? तो बोले संत बिना संतों के यह बात नहीं हो सकती। अगर संत संग नहीं मिला तो मन मनस का मत प्राणा मद दे का यह स्थिति नहीं आ सकती। इसीलिए कहा है तुलयाम लवेना पिना स्वर्गम ना अप पुनर्भवम भगवत संग संगस म नाम किमताश तुलना नहीं की जा सकती संत संग से मोक्ष सुख की भी स्वर्ग सुख की भी और मृत्यु लोक के सुख की भी अगर अगर ये तीनों सुख मिला दिए जाए तो भी संत सुख के बराबर नहीं।

जो भगवत प्रेमी महात्माओं का संग है उसके बराबर नहीं। तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरी तुला एक अंग तूल नता सकल मिल जो सुख लव सत्संग लव मात्र क्षण मात्र के सत्संग से जो हमें लाभ मिलता है वो कहीं किसी से नहीं मिल सकता। संत का स्वभाव होता है सबका मंगल करना। जो पैसा चाहना, मान प्रतिष्ठा चाहना, भोग चाहना, यश कीर्ति चाहना जाही ना चाह कब कछु चाह जिसके अंदर मिट गई है वही संत है चाह मिटी चिंता मिटी मनवा बेपरवाह भगवत चिंतन परायण महापुरुष फिकारी भारी फकनी करे ताको नाम फकीर जिस फिकन माने होती है चिंता चिंता को ही मिट्टी में मिला दिया कोई चिंता नहीं कोई चाह नहीं बोले संत सबका मंगल करते हैं।

अगर वो गुस्सा हो जाए सांप दे दे तो भी तुम्हारा मंगल होगा। मंगल नहीं हो सकता। जैसे देवर्षि नारद जी गुस्सा हो गए। नलकूबर मणिग्रीव के ऊपर नंगे नहा रहे थे। गंगा जी में शराब भी पिए थे और अप्सराओं के साथ केली कर रहे थे। देवर्षि नारद जी ने देखावताओं में सर्वश्रेष्ठ कुबेर के पुत्र होकर मदिरा पान करके भगवती गंगा में ऐसे निर्वस्त्र स्नान करना। इनको दंड की जरूरत है। बहुत बड़े हैं। इनको कोई दंड दे नहीं सकता। कुबेर के पुत्र है। त्रिभुवन का खजाना कुबेर के पास है।

धनाध्यक्ष कुबेर अप्सराएं तो डरकर वस्त्र धारण करके चरणों में गिर पड़ी। पर वो नशे में उन्मक्त गर्भ में खड़े रहे। प्रणाम कर लेते तुरंत तो शायद बच जाते। देवर्षि नारद जी ने कहा तुम जड़वत वृक्ष की तरह दोनों खड़े रहे और ऐसी अपवित्र दशा में मदिरा पिए निर्वस्त्र तुम्हें अहंकार है ना तुम्हारे पिताजी कुबेर है तुम्हें श्राप देते हैं जाओ दोनों वृक्ष बन जाओ यमलालार्जुन यमल माने तो जुड़वा यमलार्जुन के नाम से दोनों वृक्ष रूप में नरकुबर मणिग्रीव नंद बाबा के घर के सामने बने।

लाल जी को जब उखल में बांधा गया तो उखल सहित घसीट कर दोनों वृक्षों में फंसा दिया और मारा झटका। दोनों वृक्ष उखड़ गए। भगवान गोविंद का साक्षात्कार नल कुबर मण को हुआ। ऐसे हम वरदान कहे कि साफ कहे मुनिन कर क्रोध मुक्ति दातार अगर कोई साधु महात्मा गुस्सा होकर के कुछ कह भी दे तो परिणाम उसका मंगल होगा। क्रिया मंगल होगी। अब अमंगल किया कहां कुबेर के पुत्र पेड़ बने खड़े लेकिन परिणाम मंगल होगा भगवान की उनको प्राप्ति हुई तो संत का संग सबका मंगल करता है केवल इतनी ही बात नहीं संतों में भगवान के भजन से ऐसी शक्ति आ जाती है कि उनका संस्पर्श जिसको को हो गया उसको मालूम भी नहीं चलेगा और उसको भगवत प्राप्ति हो जाएगी।

इतनी बड़ी महिमा है। संस्पर्श दो प्रकार से होता है। एक होता है वाणी से। हमारी वाणी गई और आपके हृदय को छू गई। और एक होता है दृष्टि संकल्प। हमारी दृष्टि गई और संकल्प बना तो दोनों संस्पर्श से निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाती है। संत का मिलना बड़ा दुर्लभ है। महा संगस्तु दुर्लभ हो। देवर्ष श्रीनाथ जी ने कहा महापुरुषों का संग मिलना बड़ा दुर्लभ है। संत को ना पहचान करके यदि हम उनकी सेवा उनकी आज्ञा का पालन करें तो कल्याण हो जाएगा। अगर पहचान कर करें तो बहुत जल्दी भगवत प्रेम की प्राप्ति हो जाएगी।

बस संत की अवज्ञा ना करें। अवज्ञा माने उनका अनादर ना करें। भले तुम्हारी पहचान में नहीं आ रहे। किसी बात को देखकर, गुण दोष को देखकर उनका अनादर ना करें। वह भगवान के पार्षद हैं। जिस समय कृपा उनकी उदय होगी तब आप पहचान पाओगे ये क्या है। नहीं तो बाहरी लक्षणों से पहचानना बड़ा कठिन हो सकता है। जब हम संत संग करते हैं तो हमारे सामने माया एक रचना रचती है। भोगों का प्रलोभन सामने रखती है और भक्ति भगवान को सामने रखती है। दोनों भगवान की प्रिया है। भक्ति प्रिय माधवा मायापति म मायातया भगवान मायापति भी है और भक्ति पति भी है।

भक्ति भगवान को सामने रखती है और माया भोगों को सामने रखती है। जब बड़े भाग्य से हमें संत संग मिलता है तो पता चलता है कि हमारे जीवन का लक्ष्य भगवान है। भोग नहीं पर अनेक जन्मों से इतना आकर्षण भोगों का है कि भगवान अच्छे नहीं लगते और भोग अच्छे लगते हैं। आप [गला साफ़ करने की आवाज़] देख लीजिए भोग तुरंत सुख देता है। ऐसा लगता है भगवान तो कालांतर में सुख देते हैं। ऐसा लगता है। और भगवान में सुख है भी कि नहीं पता नहीं। गुलाब जामुन में तो तुरंत सुख है। मुंह में डालो और मीठा लगा।

है नहीं। इतना भुलावा माया का है कि हम भक्ति मार्ग में चलने की कोशिश करते भी हैं तो हम भोगों को लेके भोगों के त्याग के बिना आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती। हमारी भूल यह होती कि भगवान भी मिल जाए और चकाचक भोग भी भोगने को मिले। ऐसा नहीं हो सकता। प्रेम गली सा करी ता में दो ना समाए तो संत दर्शन से संत कृपा से हमें पहले ये विश्वास हो जाना चाहिए कि मैं भगवान का कृपा पात्र बन चुका हूं। अब भा भरोस हनुमंता बिन हरि कृपा मिले नहीं संत मिल गए मतलब मोहर लग गई कि हरि जो की हमारे ऊपर कृपा है।

अब संत और भगवंत में अभेद दर्शन करना जिसको आ गया तस्मित तजने भेदा भावत कि संत भगवान का स्वरूप है बड़ा कठिन है मानना भगवान जब शबरी जी को उपदेश कर रहे हैं नवधा भक्ति का तो उसमें कह रहे हैं सात सम मोह ही मैं जग देखा मोते अधिक संत कर लेखा सातवीं भक्ति है कि सब में समान भाव से भगवान को देखे लेकिन भगवान कह रहे मेरे से भी अधिक बढ़कर के जो संतों को देखे वो सातवीं भक्ति को प्राप्त होता है। जो सप्तमी आध्यात्मिक उन्नति है वह यह कि सब में भगवान को देखे लेकिन संतों को भगवान से भी अधिक देखे हम कह रहे हैं चलो इतना ना सही भगवान के बराबर भगवान से अधिक ना देखे तो भगवान के बराबर कि भगवान है चलो इतना भी ना सही तो ये भगवान के हैं।

इतना तो हम मान ही सकते हैं यार कि यह भगवान के जन है। तो जैसे हम भगवान की हर वस्तु का आदर करते हैं। प्रसाद है, प्रसादी वस्त्र है, फूल है, माला है, तुलसी है, चरणामृत है। भगवान का ऐसे हम संत का यदि आदर करें, उनका अनादर ना करें तो हमारा लोक परलोक दोनों बन जाए। दोनों मंगल हो जाए। भगवान में, भक्ति में, भक्त में बिल्कुल अंतर नहीं है। जो गुरु और इष्ट में अंतर रखता है, वह कभी भगवान को प्राप्त नहीं हो सकता है। डर है कुसंग का कि अगर सत्संग अपना इतना प्रभाव डालता है तो कुसंग भी अपना प्रभाव डालता है।

हम लोग सत्संग तो 30 मिनट 40 मिनट किए लेकिन जो कुसंग है वह हमारा बहुत ज्यादा है। आजकल तो मोबाइल का बहुत बड़ा कुसंग है और बहुत बड़ा सत्संग है। दोनों बात है। अगर आप अच्छे-अच्छे संत महापुरुषों की वाणी सर्च करके सुनना चाहे तो मोबाइल देवता सुना देंगे और आप गलत गलत बातें देखना चाहे तो गलत दिखा देंगे। हमारा मन ज्यादा गलत देखना, गलत सुनना पसंद करता है क्योंकि बहुत जन्मों से माया में लगा रहा है। व्यक्ति का कुसंग, मोबाइल का कुसंग अगर हम अंदर से समझ करके अपने को बचा ले जाए तो संत संग का लाभ प्राप्त हो।

संत संग किया और लाभ नहीं मिला या तो वह संत नहीं है। जिनका संग किया और या फिर आपके जीवन में कुसंग है बाहरी कुसंग आंतरिक कुसंग दोनों कुसंगों का यदि त्याग कर दे तो संत संग से लौकिक पारलौकिक दोनों सिद्धियां प्राप्त हो जाती है। लौकिक भी और पारलौकिक भी प्राप्त हो जाती है। संतों को कल्पतरु कहा गया है। देखो जब दशरथ जी को लगा कि वृद्धावस्था आ गई। कोई संतान नहीं हुई। तब उन्होंने वशिष्ठ जी के चरणों में निवेदन किया। वशिष्ठ जी ने एक महान तपस्वी श्रृंगी ऋषि का स्मरण किया और श्रृंगी ऋषि आए और दशरथ जी की कामना पूर्ण हुई।

भगवान राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न जी का चारों का प्रादुर्भाव हुआ। पुत्रष्ट आज तक इतिहास साक्षी है। लौकिक और पारलौकिक दोनों मंगल कामनाएं किसी की भी पूर्ण हुई है तो संतों से पूर्ण हुई है। संतों की एक अद्भुत महिमा है कि उनमें ऐसे परमाणु होते हैं कि आपको नाम जपना अच्छा लगने लगेगा। आपको भगवान की कथा अच्छी लगने लगेगी। आपको बुरे आचरण चुभने लगेंगे। जैसे आप बैठे हो तो आपको अपनी स्मृति में आएगा। आज से हम यह नशा नहीं करेंगे। आज से हम ये गलत काम अपने आप आने लगेगा।

सत्संग का प्रभाव है कि अपने आप आपके गलत आचरण आपको चुभने लगेंगे और अच्छे आचरण करने की आपके अंदर इच्छा होने लगेगी कि आज से मैं नाम जप करूंगा। आज से मैं सत्संग सुनूंगा। आज से मैं भगवान की कथा सुनूंगा। संतों का अवगाहन करना सब तीर्थों से भी बढ़कर तीर्थी कुरवती तीर्थानी संत जन तीर्थों को भी तीर्थत्व प्रदान करते हैं क्योंकि नाम जप चलता रहता है एक बार भगीरथ जी ने जब गंगा जी को प्रसन्न किया तो गंगा जी मृत्यु लोक में आने के लिए तैयार हुई ब्रह्मलोक से भागीरथ से कहा कि जब मैं ब्रह्मलोक से गिरूंगी तो सीधे रसातल पहुंच जाऊंगी।

मृत्यु लोक में बीच में रोकेगा कौन? पहली समस्या और दूसरी समस्या है। मृत्यु लोक के पापी लोग हमारे में स्नान करेंगे तो सारे पाप हम में हो जाएंगे। तो हम निष्पाप कैसे होंगे? तो भागीरथ जी ने तपस्या करके भूत भवन भगवान शंकर को प्रसन्न किया और कहा गंगा जी को आप रोकिए कहा रोक लेंगे ब्रह्मलोक से गंगा जी आएंगे उनको रोक लेंगे फिर उपाय पूछा भगवान से कि गंगा जी निष्पाप कैसे होंगी तो उनका जो साधु निरपेक्ष है किसी से आशा नहीं रखते और निरंतर भजन परायण है एकमात्र भगवान के आश्रित है।

वह संत जब तुम में स्नान करेंगे तो गंगा निष्पाप हो जाएंगी। जब गंगा जी ब्रह्मलोक से नीचे की तरफ उतरी तो अपनी जटाएं खोल दी भगवान शंकर ने। आओ हरि का चरणामृत है ना निगाह से भी रोक सकते थे। नेत्र से भी ऐसे भी रोक सकते थे। लेकिन जटा जटा कटा संभ्रम भ्रमण नीलंप निर्जरी विलोलवी छवरी विराजमान मोरधनी बांध दिया भागीरथ जी ने कहा खोलो तो वहां से लाए ब्रह्मलोक से और तो आप अपनी जटाओं में ही रोक लिया तब तीन धाराएं प्रकट हुई जो देवता लोग जिसमें स्नान करते हैं देव गंगा जिसे कहते हैं अलकनंदा मनुष्य जिसमें स्नान करते हैं भागीरथी और नीचे के लोक के जिसमें स्नान करते हैं मंदाकिनी अलकनंदा भागीरथी और मंदाकिनी के रूप में गंगा जी प्रकाशित हुई।

तो जो संत भगवान के निरंतर भजन में लगे हैं वो जब गंगा जी को स्पर्श करते हैं तो निष्पाप हो जाती। जब गंगा निष्पाप हो जाती तो हम पापी जन क्यों नहीं निष्पाप हो जाएंगे? संतों के संग से संतों के हृदय में भगवान प्रगट निवास करते हैं। भगवान तो सबके हृदय में निवास करते हैं पर माया का पर्दा लगा के निवास करते हैं। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण। तो इन तीन पर्दों एक पर्दा लगा हो तो नहीं दिखाई दे। अभी तीन पर्दा लगा हो सफेद, लाल और काला श्वेत वस्त्र की तरह सतोगुण अरुण वस्त्र की तरह रजोगुण और काले कपड़े की तरह तमोगुण तीन पर्दा लगे हैं और भगवान हृदय में बैठे हैं और जब भजन किया जाता है तो त्रिगुणातीत तीनों पर्दे हट जाते हैं और भगवान हृदय में प्रकाशित हो जाते हैं।

वो आंख खोले चाहे आंख बंद करे वो प्रिया प्रीतम का ही दर्शन करता रहता है। ऐसे संतों के दर्शन से अकथनीय लाभ प्राप्त होता है। अकथनी माने जो वर्णन नहीं किया जा सकता। बस तन से, मन से, धन से सब प्रकार से हम ऐसे संतों की सेवा करें। उनका सेवन करें। उनकी आज्ञा का पालन करें। संतों की वाणी का यदि हम अनुसरण करें तो हमारा परम कल्याण निश्चित है। पर सुनकर के उसका मनन करें। श्रोता सोई परम सुजान सुनत चित रति करे श्रोता वही श्रेष्ठ है जो बात सुन के और हृदय में धारण करके चल पड़े ऐसे सत्संग ना सुने जैसे एक सेठ जी धनी मानी उनकी बहुत बड़ी दुकान सब ऐश्वर्य चल रहा था उनको था सत्संग रोज सुनना चाहिए तो रोज सत्संग सुनते थे जाके दों वर्ष से सत्संग सुन रहे थे एक दिन उनको किसी रिश्ते नातेदारी में जाना हुआ तो अपने लड़के से कहा सत्संग सुन आना हमारा नियम ना टूटना पाए वो सत्संग सुनने गया तो उस दिन गौ माता की महिमा का वर्णन हो रहा था कि यदि गाय तुम्हारे खेत में भी चल रही है अगर आपको नहीं सहन होता तो प्यार से आप हटा दीजिए मारिएगा नहीं वैसे चाहिए तो कि हटाइएगा नहीं पर अगर धैर्य नहीं है तो आप डंडा लाठी मत मारिए।

ऐसा अब वो नया लड़का सुबह जाकर के आटा की बोरियां खोल के जैसे रखते हैं मैदे की बेसन की सब और सुबह-सुबह ही गाय आ गई। बेसन में मुंह मारी खाने लगी। वो हाथ जोड़ के खड़ा सत्संग सुनाता हाथ नहीं सेठ आ चुके थे सेठ सुबह आए तुझे दिखाई नहीं दे रही गाय तो उन्होंने कहा सत्संग में भेजा था सत्संग में संत भगवान ने कहा गौ यदि खा रही हो तो उसे डंडा नहीं मारना चाहिए उसे हटाना नहीं चाहिए अरे बोले 20 साल से सत्संग सुन रहा हूं एक भी बात में मेरे फर्क नहीं पड़ा तेरे में एक दिन में फर्क पड़ गया बातें मानी नहीं जाती सुनी जाती है, निकाल दी जाती है।

ऐसा सत्संग ना सुने। यदि संतों की वाणी का हम अनुसरण करें तो सत्संग से हमें जो लाभ प्राप्त होगा वो मोक्ष, स्वर्ग और मृत्यु लोक के सुखों से भी सर्वश्रेष्ठ है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक मनुष्य है जो संतों के पास रहता है पर उन पर श्रद्धा नहीं करता। उनकी आज्ञा का पालन नहीं करता। ऐसा मनुष्य विशेष लाभ नहीं ले पाएगा। जैसे पास है। श्रद्धा में फर्क है। आज्ञा पालन नहीं तो विशेष लाभ नहीं। और एक है बहुत दूर रहता है। पर वो मानता है मेरे भगवान है। मेरे भगवान है।

और उनकी हर बात मानता है वो विशेष लाभ ले जाएगा। जो दूर वाला है वह विशेष लाभ ले जाएगा। मनुष्य को अपनी बुराइयों से विजय प्राप्त करके और अच्छाइयों पर कदम रखकर के चलने का जो बल मिलता है वो संत से मिलता है। मति कीरति गति भूति भलाई जब जे जतन जहां जे पाई सो जानो सत्संग प्रभाव लोकहु वेद ना आन पाऊ गति मति कीर्ति आज तक किसी को भी प्राप्त बस समस्या ये है कि हम संत का अनादर कर देते हैं बारासुर भगवान शंकर को प्रसन्न किया हजार भुजाएं दे दी अब हजार दो तो दो भुजाओं में जब बल होता है तो लोग संभाले नहीं संभलते।

फिर 1000 भुजाएं हो 500 इधर 500 इधर पर्वतों में जाकर जगन मारता तो पर्वत चूर हो जाते। कोई लड़ने वाला नहीं। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो भगवान शंकर के पास गए। बोले गुरु अब हमसे युद्ध करो। हमारी भुजाओं में खुजली हो रही। भगवान शंकर हंस दिए। हमारे द्वारा दिए हुए बल से मुझे ही ललकार रहा है। जा तेरी भुजाओं की खुजली मिटाने वाला आ गया है। तो भगवान श्री कृष्ण ने जब बाणासुर की पुत्री उषा को अनिरुद्ध जी से तो फिर काटा सब भुजाएं काटी चार भुजाएं क्यों शास्त्रा अर्जुन संत भगवान अवधूत शिरोमणि दत्तात्रेय जी की आराधना की संग किया उसको ऐसा आशीर्वाद दिया 80 हजार वर्ष तक जवान रहकर विषयों का भोग भोगा मदान हो गया संत से मिली शक्ति के द्वारा संत का ही अपमान किया जमदग्न ऋषि के आश्रम से जबरदस्ती कामधेनु गाय हटा दी और जब रोका तो उपद्रोह मचाया यहां तक कि जमदन जी का गला काट लिया संत अनादर भगवान परशुराम ने काट कर फेंक दिया।

पूरे परिवार को है वंश को मिटा दिया। 21 बार पूरे भूमंडल में ऐसे अत्याचारियों को घूम घूम कर काटा भगवान परशुराम जी ने। संत से ही उन्नति होती है और संत का अनादर कर देने पर अवनति हो जाती है। यदि हम संत का अनादर ना करें और संत का सदैव आदर करें तो इतने मात्र से भगवत प्राप्ति हो जाएगी। संत संग जो है अपवर्ग कर कामी भव कर पंथ संत का संग सीधे मोक्ष प्राप्ति कराता है बड़े भाग पाय सत्संगा विनय प्रयास हो भंगा हां।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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