मन को वश में करने का अचूक उपाय। यमुना तट सत्संग (07-07-26)
श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।
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जय जय श्री हरिवंश इसका मृत्यु लोक नाम इसीलिए रखा गया है कि यहां वस्तु व्यक्ति स्थान पद प्रतिष्ठा सब कुछ नष्ट होगा। जरा थोड़ी देर विचार करो आप जिसमें जिंदगी पूरी लगा दिए आपको अकेला जाना पड़ेगा। आपके साथ कोई वस्तु नहीं जाएगी पर कर्म जाएंगे। वर्णन करते हैं कि कर्म का फल इतना अधिक मिलता है जैसे यहां एक मन गेहूं खेत में फेंका जाए तो 40 मन गेहूं होता है। ऐसे यह खेत है कर्म भूमि। यदि आप पाप कर्म करेंगे थोड़ा तो आपको बहुत मिलेगा। यदि आप पुण्य कर्म करेंगे तो वह भी आपको बहुत करके मिलेगा।
पाप कर्म का फल दुख, रोग, नर्क और अन्य योनियों में जन्म लेना है। पुण्य कर्म का फल सुख, स्वर्ग और अच्छे कुलों में जन्म लेना है। इन दोनों कर्मों से अलग हटकर के है भगवत भजन जो पाप और पुण्य दोनों से अलग है। यह सीधे भगवत प्राप्ति कराता है। मोक्ष प्राप्त कराता है। अखंड सुख प्राप्त कराता है। जहां किंचिन मात्र दुख नहीं मरना जन्मना रोग किसी भी तरह का कोई दुख नहीं। अब समस्या पड़ती है कि पाप और पुण्य कर्म करने में तो मन लग सकता है। हमारा पुण्य कर्मों में भी लग सकता है।
दान है, भंडारा कराना है, तीर्थ स्नान करना है। ये सब भजन में मन लगना जो पाप और पुण्य दोनों से अलग है और वह केवल मनुष्य जन्म में हो सकता है। किसी और योनियों में नहीं। अगर यह चूक हो गई कि आप भजन नहीं किए तो बड़ा पछताना पड़ेगा। मन पछताई है अवसर भी। अब बात घूम के आई मन पे। यह है क्या मन? ये मन है क्या? मन ना तो आप इसे चैतन्य ही कह सकते हैं क्योंकि आत्मा नहीं है और ना आप इसे जड़ कह सकते हैं। यह उभय रूप है। इंद्रियाणा मनुष्यास्म वैसे भगवत स्वरूप है। पर यह जड़ भी है और चैतन्य भी है।
जो भगवान ने अपनी माया प्रकृति का वर्णन किया अष्टधा प्रकृति का उसमें मन का भी वर्णन किया है। यह प्रकृति से युक्त है और शास्त्रों में इसे आत्म स्वरूप भी बताया है। यह भगवत स्वरूप भी है। तो कह रहे हैं अगर मन आपका वश में हो गया तो मोक्ष और मन अधीन नहीं हुआ भजन में नहीं लगा तो यही दुर्गति दुर्गति और सद्गति आपके मन के अधीन है। तो कहते हैं क्यों मन को वश में करें? जो आता है मन में वही करें। आनंद ले जैसा लोग कहते हैं। तो कहते हैं इससे तुम दुखों में फंस जाओगे।
जितनी जेल भरी है वहां सबसे पूछो तो मन ने ही जेल पहुंचाया है। जितनी गलत बात बेइज्जती अपमान होता है मन ने ही मन को छूट नहीं देना। अगर हमने मन को छूट देकर मनमानी आचरण किए तो दुर्गति पक्की। तो बोले इसका मतलब हुआ मन को वश में करना पड़ेगा ही। बोले जी तो इस मन को वश में करने का उपाय क्या है? क्या उपाय है मन को वश में करने का? यही बात अर्जुन जी ने भगवान से पूछा था। भगवान ने कहा अभ्यास और वैराग्य अभ्यासेन और वैराग्य ये दो बात कही थी अभ्यास तो राधा राधा राधा राधा राधा राधा और वैराग्य गलत आचरणों से अपने आप को संपूर्ण रूप से बचाने की चेष्टा करना ना बच पाने पर रोना और दुखी होना प्रभु से प्रार्थना करना जब नहीं बच पा रहे तो प्रभु से प्रार्थना करें रोए वही रोक सकते हैं कोशिश हमारी पूरी रहे हमारी मनमानी आचरण ना हो मन को अगर वश में करना है तो किसी भी भोग को भोगते समय नाम ना छोड़िए मन वश में हो जाएगा पर नाम चलेगा नहीं गुलाब गुलाब जामुन पाना है, समोसा चटनी पाना है, अच्छे-अच्छे पदार्थ उस समय चले राधा राधा तो गुलाब जामुन का स्वाद आपको फंसा नहीं पाएगा।
इसी तरह संपूर्ण भोग जितने भी भोग संसार के हैं गृहस्थ में या वैराग्य में जो भी सेवन किए जाते हैं यदि बहुत काम की बात है ये यदि भोग भोगते समय अभ्यास नाम का चल रहा है तो आपको भोग का जो स्वाद है वो फंसा नहीं पाएगा और दूसरा वैराग्य जो शास्त्र निषेध करता है संत जन निषेध करते हैं वह हमें नहीं करना नहीं फस जाओगे पक्का चाहे जितने चतुर हो फस जाओगे शास्त्र जो कहता है उसकी आज्ञा का अक्षरसा पालन करोगे तो आपको माया फसाएगी नहीं अगर आज्ञा उल्लंघन शास्त्र की हुई तो आप फंसे फसाए हो चिंता शोक दुख संकट यह जरूर आपको घेर लेंगे।
अभ्यास हर कार्य करते हुए नाम जप करना। हर भोग भोगते हुए जो शास्त्र युक्त है नाम जप करना। और वैराग्य जिसे शास्त्र निषेध करता है। संत जन निषेध करते हैं वह हम ना करें। फिर मन को हर समय देखते रहना। कहां जा रहा है? गलत जा रहा है। तुरंत धिक्कार करके उसे हटाओ। यह जन्म भगवान के लिए मिला। तू गलत चिंतन करा रहा है। अगर सही जगह जा रहा है तो सपोर्ट कर दो उसको। धन्यवाद। बड़ी कृपा आपकी। आप भजन में लग रहे हैं। मन की चेष्टा को देखते रहना। मन को वश में करने के उपाय।
पहला अभ्यास, दूसरा वैराग्य। तीसरा मन का निरीक्षण करते रहना। हर समय मन को देखते रहना। ऐसा नहीं हो पाता है। मन जो दिखाता है वो हम देखते हैं। हम मन को नहीं देख पाते। मन जो कराता है वो हम करते हैं। मन के ऊपर शासन नहीं कर पाते। यही साधक और असाधक में अंतर है। साधक हर समय मन को देखता रहता है। अगर वो गलत चेष्टा करता है, गलत संकल्प करता है तो उसकी वो काट करता है, वो धिक्कारता है, वो परेशान अंदर से होता है। नहीं नहीं यह नहीं होना चाहिए। तो फिर मन सफल नहीं हो पाता है क्योंकि वह साधक है।
भगवान का भजन करता है। चौथा गलत आचरण के लिए मन जब कहे तो हमें चलना ही नहीं है। गलत आचरण में चाहे वो जितना कहे वो इतना कहेगा कि आप व्यथित होकर वही कर बैठेंगे। मन की चाल पहले वह धीरे से फंसाता है और फिर हावी हो जाता है। ऐसे ही अरे ऐसा थोड़ी करेंगे बस वहां तक टहल आते हैं। वो धीरे से वहां ले जाएगा। वो ले जाकर अपने बस में कर लेगा। तो मन के कथना अनुसार हमको नहीं चलना है। तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित कार्य और अकार्य करना क्या है? क्या नहीं करना?
यह शास्त्र के अनुसार चलना है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] मन को बार-बार भगवान की बातें सुनाना इससे बस में होने लगेगा। अगर आपको ऐसा अवसर नहीं मिलता बात वैसे तो अवसर है ही मोबाइल भगवान है। आप संतों की वाणी भगवान के पावन प्रवचन पावन सत्संग आप थोड़ी थोड़ी देर में आप सत्संग सुनते रहिए। आपका मन वश में होने लगेगा। और नाम को देखना जैसे हम राधा जप रहे हैं तो राधा नाम देख के राधा इससे मन बहुत जल्दी वश में होता है पर लगता नहीं अगर लग जाए तो बेड़ा पार हो जाए मन को शस पे एकाग्र करना जैसे अब हम नाम जप कर रहे हैं तो पांच नाम जप किए ये गिनवाए मन से कि पांच नाम जप किए अब शस छोड़ी तो पांच नाम जप किए ये मन को गिनवाओ और वो जब इसमें लगेगा तो वश में हो जाएगा ये सब उपाय मन के वश में करने के बता रहे हैं और जब बिल्कुल कोई उपाय काम ना करे तो हाथ उठाकर ऐसे भगवान से कहो हे शरणागत प्रतिपाल हे करुणा सिंधु अब मन से हमको बचा लो नहीं ये मन हमें मार डाल इतना व्यथित करता है वो करना ही पड़ता है।
करना ही पड़ता है। इतना व्यथित करता है। करना ही आप लोग सब देख लो ना। तो उस समय भगवान की शरण में होकर भगवान को पुकारे। प्रेम पूर्वक भगवान का नाम कीर्तन करें। उनसे प्रार्थना करें तो मन वश में हो जाएगा। मन को वश में करने के लिए नियम पालन आवश्यक है। एक दिन सत्संग में यही कहा था यमुना के किनारे कि आप 10,000 नाम का रोज जप का नियम लीजिए आगे भगवान देखो तुम्हारा कैसे मंगल करते हैं हाथ हमने कहा था हाथ उठाइए लगभग लगभग सबने उठाया था लेकिन कितने लोग 10,000 नाम जप उनमें से करते होंगे नियम नियम में ही इतनी इतनी सामर्थ्य है कि मन को वश में कर लेता है।
जो नियम वो नियम मरना जीना दुख सुख हानि लाभ इसकी कोई परवाह नहीं। नियम से मन वश में होता है। उठने का नियम, खाने का नियम, जप का नियम, जो नियमावली होती है, दिनचर्या होती है, वह प्राय गृहस्ती में बहुत कम लोग कर पाते हैं। विरक्ति में तो नियम से ही चलना ही होता है और जो विरक्ति से नियम से नहीं चलता वो साधक नहीं है। पर गृहस्ती में भी यदि नियम से चले तो मन वश में हो जाए। मन को वश में करने के लिए नियम लेना आवश्यक है। मैं यह नियम लेता हूं। अब बार-बार खाना बार-बार ऐसे करना इससे मन तुम्हारा चंचल रहे।
नियम ले लो। एक बार 11 से 12 के बीच में भोजन करना है। एक बार सात से आठ के बीच में भोजन करना है। बस बीच में पानी के अलावा और कुछ नहीं। कुछ नियम लो। एक बार दिन में भोजन करके अगर आपको ज्यादा मेहनत नहीं पड़ती तो काम चलाया जा सकता है। एक बार नाश्ता कर लीजिए। एक बार भोजन कर लीजिए। छोड़ दीजिए और नाम जप कीजिए। देखिए शाम के थोड़ा दूध ले लीजिए। कुछ नियम रखिए। मन वश में होगा। सात्विक भोजन नियमित भोजन नियमित दिनचर्या। मन को वश में करने के लिए जब हम चेष्टा करते हैं तब बलवान और हमको परास्त करता है।
इसलिए सावधान रहें। जैसे किसी पहलवान को आप पटकना चाहे मन पहलवान है। फिर वह सारे दांव पेच मारेगा कि आप छाचित गिरे तोिया पछाड़ मारेगा एकदम। तो जिस समय आप मन को वश में करने के लिए चले उस समय गुरुदेव की कृपा मनाए। हे गुरुदेव भगवान आपकी ही आज्ञा से मैं आपके भजन मार्ग में इस मन को लगाना चाहता हूं। आप कृपा गुरु कृपा ही केवलम तो गुरु कृपा से आपको बल मिलेगा जिससे आप मन को अपने वश में कर पाएंगे। घबराने की जरूरत नहीं, उबने की जरूरत नहीं, निराश होने की जरूरत नहीं और हारने की जरूरत नहीं।
ये संसारी पुरुष क्या जाने? हारना क्या जाने। जो गिरा हुआ है वह गिरना क्या जाने। एक साधु थे वह 100 बार भ्रष्ट हो चुके थे। उन्होंने सोचा कर ले। अब हम नहीं भजन कर पाएंगे। एक पेड़ के नीचे बैठे थे। सोचते थे इसी की डाल में कर लेंगे। तो देखा एक चींटा चढ़ रहा है। फिर गिरा फिर देखा वो फिर चढ़ रहा है। फिर गिरा कई बार चढ़ने पर गिरा। एक बार चढ़ गया। तो उन्होंने कहा यार हमको भी प्रयास करना चाहिए। बस फिर साधना में लगे और भगवत प्राप्त हो गए। उबना नहीं, घबराना नहीं, निराश नहीं होना और हारना नहीं।
अपनी साधना में चलते रहना। यदि भ्रष्ट हो जाओ तो भी यदि गिर जाओ तो भी नियम टूट जाए तो भी अगर गलत मार्ग में कदम चला गया तो भी हम प्रयास नहीं छोड़ेंगे तो हम जीत जाएंगे। प्रयास छोड़ दिया तब तो फिर सब बेकार हो जाएगा। नाम जप करना बार-बार भोगों से मन को हटा के भगवान में लगाना। यदि हम हार भी जाते हैं तो भी हमको नहीं रुकना। हमें प्रयास करते रहना है। मन को प्रभु में लगाने के लिए प्रपंची लोगों से बचने की आवश्यकता है। वह आपको ऐसे दुलार प्यार फुसलाकर गलत मार्गों में या गलत वार्ता या गलत हर चीज कोई भी बात मन जो सुनता है वो सीसी कैमरे की तरह मैं दृश्य सहित उस बात को कवर कर लेता है और जब आप भजन में बैठते हो तब वो पेश करता है और अगर भजन सही करते रहो तो वो डिलीट हो जाएगा।
इसीलिए तो हम लोग परेशान हो जाते हैं कि ऐसे तो कोई परेशानी नहीं लेकिन जब भजन में बैठो तो दुनिया का प्रपंच जो हिसाब नहीं लग रहा होगा वो हिसाब लग जाएगा उस समय जब भजन में बैठोगे जो काम आपका छूट रहा होगा वो याद आ जाएगा मतलब सारी समस्याओं का समाधान भजन अगर आपको करना है समस्याओं का समाधान भजन में बैठिए आप मन वो सब करने लगेगा जबकि उस समय हमें केवल भजन में ही मन को लगाना है उस समय मन प्रपंच करने लगता है। तो मन को वश में करने के लिए प्रपंची लोगों से बचने की बहुत आवश्यकता है।
और प्रपंच कई तरह का होता है। जैसे लोगों के साथ प्रपंच, टीवी के साथ प्रपंच, मोबाइल के साथ प्रपंच। ये भजन में हमें बड़ा बाधा देता है। कृपा और विश्वास। ये शब्द परमार्थ में अध्यात्म में बड़ा महत्व रखते हैं। भगवान की कृपा और भगवान पर विश्वास। जिसको भगवान की कृपा और भगवान पर विश्वास है और अभ्यास पुरुषार्थ प्रयत्नशील है वो मन को वश में कर लेता है। मन को वश कर रहो नित राग द्वेष विहीन। विषयों में बिचरो उचित हो कभी न लीन यू भगवत सेवा करो पाओ महाप्रसाद सब दुखों का अंत हो मिटे सभी अपवाद यदि भगवान के आश्रित होकर भगवान को अर्पित किया हुआ भोजन पाते हुए नाम जप करते हुए कोई प्रपंच नहीं कोई राग द्वेष नहीं तो आपका मन आपके वश में हो जाएगा।
अब जब आप मन को वश में करने चलेंगे तो आप में पावर एकत्रित होगा। बड़ी सावधानी की बात है। अगर आपने संकल्प करना शुरू किया और वो संकल्प पूरा होने लगे तो किया कराया मन वश में फिर फिसल जाएगा। जैसे ऐसा हो जाए तो ठीक है और वो चट्ट से हो गया। ऐसा हो जाए तो क्योंकि आपने पावर एकत्रित किया ना मन को एकाग्र करके। अब वह पावर आपने संकल्प में खर्चित कर दिया। तो कह रहे हैं जो भजन करने वाले लोग हैं उनको किसी विषय का जल्दी संकल्प नहीं करना चाहिए। मन संकल्प क्योंकि पावर मन को एकाग्र करने से होता है तो जो संकल्प किया अगर वो सिद्ध होने लगा वो चीज आने लगी तो आपका पावर जाने लगा।
मन आपका फिर कमजोर हो जाएगा। इसलिए कहते हैं कि अगर मन में कोई इच्छा उत्पन्न हो तो उसे इच्छा को भगवान को दे दो। प्रभु मेरे मन में इच्छा आई। अब आप देखो पूर्ण करना हो तो ठीक और नहीं पूर्ण तो अगर पूर्ण होती है तो हम अपने मन की ताकत ना माने संकल्प ना माने। हमने हरि कृपा से पूर्ण हुई है तो हमारा मन फिर भगवान के मार्ग में अगर कामनाओं की पूर्ति कराते रहे तो भगवान के मार्ग में आगे नहीं बढ़ पाएंगे। होंगे।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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