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जो ये सेवा करता है, उसे अलग से भजन नहीं करना पड़ता!

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पूज्य महाराज जी का एक संक्षिप्त वचन — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

संतों की कृपा कई तरह से होती है। एक होती है समीप जाकर कृपा और एक सुनकर कृपा होती है। अच्छा उनका स्वास्थ्य बहुत खराब है। शरीर पूरा होने वाला है। शांत हुए एकदम भगवान के चिंतन में डूब गए और प्रार्थना की तो उसके हृदय में स्मरण स्वरूप पहुंच करके संकल्प के द्वारा दृष्टि के द्वारा वाणी के द्वारा छू करके किसी भी तरह से संत जन कल्याण कर देते हैं। आपका संत स्मरण ना बने लेकिन संत का स्मरण आपके प्रति हो गया तो आपके हृदय में भगवान का स्मरण होने लगेगा। ये महिमा है अंतिम समय या तो खूब साधु संग साधु सेवा हो और या फिर डट के भजन हो।

साधु सेवी को अलग से भजन नहीं करना पड़ता। उसका कल्याण उसी से हो जाता है। अब जैसे जो सेवा में लगे हैं वो इतनी एकाग्रता है कि नाम जप नहीं हो पा रहा है तो उनका ठेका है। वो ठेके में है। ये नहीं कि तुम भाई हथौड़ा चला रहे थे, फावड़ा चला रहे थे तो तुम्हारा वो ठेके में है। वो कृपा के ठेके में है। निश्चित उनका कल्याण होगा। माला वाले का तो चूक हो सकता है। उसका चूक नहीं हो सकता। क्योंकि वो आज्ञा में जीवन को अर्पित किए हुए हैं।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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