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जब अपना कोई नहीं रहा, तब भगवान ही सहारा बने

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पूज्य महाराज जी का एक संक्षिप्त वचन — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

भागवत में एकादश स्कंध में तितक्ष ब्राह्मण का गृहस्थी में रहते थे। लड़के बच्चे थे। खूब धन कमाया और बड़े ही कंजूस स्वभाव के थे। ना परिवार को भोगने देते थे ना स्वयं भोगते थे। अब कुछ ऐसी विपरीत परिस्थिति आई। सब दिन होत ना एक समान। राजदंड उन पर लागू हुआ तो काफी अर्थ तो टैक्स में चला गया। फिर परिवार के जनों ने देखा कि यह तो कंजूस है। एक रुपया भी नहीं देगा। वो लोग इधर उधर से आंख मार के फिर आग लग गई। अब परिवार वालों ने उसका त्याग कर दिया केवल अकेला। कोई उसे प्यार नहीं करता।

अर्थ उसके हाथ से चला गया। सब अब विचार किया कि मेरा पूरा जीवन निकल गया। उत्तम वर्ण में जन्म हुआ था। वृद्धावस्था आ गई। अब क्या होगा? क्या होगा? जिनको मैंने पाला पोशा जो बड़ी मेहनत से धन कमाया वो तो सब नष्ट हो गया। परिवार वाले कोई देखते ही नहीं। जानते हो उसका निश्चय। देवता इस बात के साक्षी है कि आज से मैं अपने जीवन को श्री भगवान के चरणों में समर्पित करता हूं। सब कुछ सहूंगा और निरंतर भगवान का भजन करूंगा। वो इतना बड़ा महापुरुष उसी निश्चय से हो गया कि भगवान उद्धव जी को उसकी कथा सुना रहे हैं।

कोई साधना नहीं हुई थी। परिस्थिति ने ऐसा निश्चय करवा

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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