॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

श्रीकृष्ण का छठी पूजन एवं पूतना वध / बाल कृष्ण के दर्शन को को आए महादेवजी ! // 22/09/26

▶ YouTube

पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

नीलमणि ने सकला वयवाना कुरविंद नेव बिंबा धरस कमल रागेने पाण पादस्य शिखर मणने नखर निकस निर्माण कदा चिन मणमयोवा इंदवरे सकला वयवस्य बंधु केनेव बिंबा धरोष् जपा कुसुमेव पाण पादस्य मल्ली कोर केने नखर निकसती कदाचित कुसुमयो वाके ना निर्माय कृष्णााय वासुदेवाय हरे परमात्मने प्रणत क्लेश नासाय गोविंदाय नमो नमः कृष्णाय [चीखने की आवाज़] वासुदेवाय देवकी नंदनाय च नंद [गाना गाने की आवाज़] गोप कुमारय गोविंदाय नमो नमः नंद बाबा के यहां जन्माष्टमी से लेकर पांच दिन हो गए।

रात दिन ब्रजवासियों की धूम मची हुई है। क्योंकि 84 को ब्रजवासी बाल वृद्ध युवती वृद्धा सब बाबा के लाला के दर्शन के लिए व्याकुल है। पर व्यवस्था की गई है। पहले वयो वृद्धा गोपी फिर नव युवती गोपी फिर वयो वृद्ध गोप फिर नवयुवक गोप तो अभी गोपों का नंबर ही नहीं आया बड़े व्याकुल है गोप जन कोई सुन ही नहीं रहा किसी की सबके हृदय में एक ही बात है नीलमण ने सकलायाम कुरविंद बिंबास कब मैं इंद्र नीलमणि श्री लाल जी के मुखारविंद का दर्शन करूं तो जो गोपी दर्शन करके आती है उससे पूछती है तुमने देखा नंद का लाला कैसा है तो कहती है अंकुर नव नीलम मण्द्रस पल्लव तमालस कंदम नवास कस्तूरिका तिलकम त्रोक्य लक्ष्मणा सिद्ध सौभाग्य संपदा अहो कैसे तुम्हें बताएं शिशु के अंग इतने निर्मल स्वच्छ नौ नील कांत मनो नवीन मेघ जलधर अभी अभी अभी नवीन जल लेकर आए हैं।

[गला साफ़ करने की आवाज़] ऐसे इंद्र नीलमणि का कैसे बताऊं मानो नवीन तमाल तरु का पल्लव हो इतना सुंदर नव जलधर के नवांकुर हो इतने सुरभित मानो त्रैलोक्य की शोभा एक जगह एकत्रित हो गई हो सुचकरण कपोल विशाल नेत्र कैसी कमान जैसी भें और नेत्र तो जन्म से ही सिद्धांजन लगाए हुई है। जिस पर पड़ जाते हैं वह लुभायमान हो जाता है। गोप व्याकुल हो जाते हैं। अब वहां नंद बाबा के आंगन में तो रात दिन पांच दिन से बधाइयां बज रहे हैं। अंदर झांक के देखते हैं नृत्य हो रहा है। बधाई गाई जा रही है।

समस्त ब्रजवासी जनों के लिए बाबा ने विशेष व्यवस्था करी। जो उत्सव हो रहा है प्रांगण में उससे एक साइड से गली जैसी हुई सबको हटाया और जो श्रीमद् गोपण नूतन तनु जातस कृते प्राज्ञा निमंत्रिता ब्रज जना सर्वे तत यहा भोजना कर सुसुम वात प्रकाश प्रथा व्या कि पद गणा नाकारत्म जिन जिन प्रधान प्रधान ब्रजवासियों को निमंत्रण दिया गया था वो सब बड़े बूढ़े आगे आगे करके बस लाला के दूर से प्रसुतिका ग्रह से दर्शन करा दिए जाते हैं। भत नाम प्राण कंदस श्रीमन नंदस जगदंद साखल नंदन संभवा कौन प्रकट हुआ बोले जगत का आनंद मूर्तिमान नंद नंदन के रूप में जो देखता है सुप्रवाह करता हुआ पुलकित हटने की इच्छा नहीं होती फिर प्रेम विवश ब्रजवासी जन उनको हटाते हैं।

क्रमश पूरा दिन पांचवा और पूरी रात पांचवी व्यतीत हुई। बड़े-बड़े संगीतकार, नृत्य करने वाले, गायन करने वाले सबको बाबा न्योछावर देते हैं, तृप्त करते हैं। आज छठवां दिन है षष्ठी पूजन जिसे छठी पूजन कहा जाता है। रात भर उत्सव होता रहा। बृजेंद्र नंदन के जन्म का उत्सव अभी संपन्न नहीं हुआ। ये छठी उत्सव आ गया। इतना लंबा उत्सव रात दिन ना बाबा सोए ना ब्रजवासी सोए। ब्रजवासिनी गोपी जन सब गोपों को आंगन से बाहर करें। छठी पूजन होगा। सुंदर चौक पूरी गई। बीच में गाय के गोबर से छठी देवी की रचना हुई।

सब देवी देवता जिनके अंश से प्रकाशित है उनका मंगल करने के लिए छठी पूजन हो रहा है। ब्राह्मण लोग बुलाए गए वो षष्ठी पूजन में सबसे पहले गणेश जी का पूजन कराते हैं। हरि ओम गण गणपति हवा मह प्रिया [चीखने की आवाज़] प्रिय हवा मह [गाना गाने की आवाज़] निधि निधि हवा [गाना गाने की आवाज़] महसो मजा गधा तजा [गाना गाने की आवाज़] गम गायत्री [गाना गाने की आवाज़] जगत बहोत [गाना गाने की आवाज़] त्रिपदा चतुर पदा त्रिपदा जादा [गाना गाने की आवाज़] विक्षा जा सुवा [गाना गाने की आवाज़] सहता [गाना गाने की आवाज़] सह्या पूर्व मनोधरा [गाना गाने की आवाज़] अनरे [गाना गाने की आवाज़] जजा दूसरे [गाना गाने की आवाज़] [गाना गाने की आवाज़]

[गाना गाने की आवाज़] धन में मन शिव संकल्प स्तु कर [गाना गाने की आवाज़] पते [गाना गाने की आवाज़] ज पूर्व जक्ष प्रजा त मन शिव संकल्पस्तुत प्रज्ञ [गाना गाने की आवाज़] [गाना गाने की आवाज़] प्रजास यस नते किते त [गाना गाने की आवाज़] मन शिव संकल्पस्तु जेम [गाना गाने की आवाज़] भूतम भवनम भव परमते [गाना गाने की आवाज़] सर्वम सप्त हो त मन शिव संकल्पस्तु जसजन प्रतिष्ठिता प्रथमे सर्व प्रजा धन्य [गाना गाने की आवाज़] मना शिव संकल्पस्तु [गाना गाने की आवाज़] मनुष्यते [गाना गाने की आवाज़] जी त [गाना गाने की आवाज़] मन शिव संकल्प सष्टि देवी का बड़ा सुंदर पूजन कर रहे हैं।

शस उपचार से षष्ठी देवी का पूजन हुआ। कुल प्रथा के अनुसार सष्टि देवी को भोग लगाया गया। आरती हुई। गोद लिए गोपाल जसोदा पूजत छठी मुदित मन प्यारी बड़े बाल स्नेह चुचाते चूमत मुख दे दे पुचकारी लाला को बार-बार पुचकार करके हृदय से लगाती मुख चुंबन करती यशोदा मैया और छठी पूजन कराती पूजत छठी जुकान कुंवर की थापे पीत लगाई कंचन थार लिए ब्रज बनिता रोचना देत सुहाई आति आंख जो सबह सुसिन मांगत नैन भराए सूरदास प्रभु तुम चिर जी हो घर घर मंगल गाए सूरदास प्रभु तुम चिर जीवो घर घर मंगल गाए ब्रज रानी छठी पूजन करके हीरे मोती रत्नों को लुटा रही है।

बड़ी भीड़ लगी है बूढ़ी ब्रज गोपियों की। हम भी छठी पूजन लाला के लिए करेंगे। फिर ग्वाल गोप सब पूजत अरु पूजत ब्रज नारी श्री विट्ठल गिरधर चिर जीवो मांगत ओली पसारी सब ब्रजवासी जन विधाता से एक ही बात मांग रहे लाला चिरंजीवी भव लाला चिरंजीवी भव सब ब्रजवासियों का आशीर्वाद जगत को आशीर्वाद देने वाले प्रभु के ऊपर लग रहा सब बूढ़े बड़े जो छठी पूजन में आया है सब लाला को आशीर्वाद हम भी हृदय से लाला को आशीर्वाद देते हैं लाला के नाम के बल से लाला के नाम के बल से ही लाला को आशीर्वाद देते हैं और सही पूछो तो लाला जिनके अधीन है उन लाली के बल से लाला को भी आशीर्वाद देते हैं और लाली को भी चिरजीवो भूतल यह जोरी चिरंजीवी भ मेरे लाडली लाल मेरे प्राण प्रीतम मेरे प्राणाधार चिरंजीवी भव रात्रि जागरण हुआ है इसलिए पांच छ दिन से सब ब्रजवासी जन शिथिल है प्रेमानंद में भगवान के महामोद में संपूर्ण ब्रज मंडल डूबा हुआ है।

धीरे-धीरे संध्या काल का समय आ रहा है। यह बड़ा निशाचरों के लिए बलवान बनाने वाला होता है। इतने में शास्त्री संगीत वाले आनंद उत्सव मना रहे हैं। विविध वाद्य बज रहे हैं। कोई मृदंग बजा रहा है। कोई उपंग बजा रहा है। कोई वी बजा रहा है। कोई वेणु बजा रहा है। ताल मृदंग उपंगी वेणु की ध्वनि [गला साफ़ करने की आवाज़] छाई हुई है। संपूर्ण ब्रजवासी जिसको देखो नंदालय की तरफ पूतना को कंस बहुत जानता था कि बड़े-बड़े देवताओं को भी चुटकी में मीस देने की सामर्थ रखने वाली पूतना है।

जब उसको पता चला कि मेरे मारने वाला पैदा हो चुका है। उसको पूरा विश्वास हो गया। देवर्षि नारद जी ने कहा था ब्रज के नंद गोपादी यह सब साधारण मनुष्य नहीं। यह सब भगवत पार्षद है। इसका मतलब अगर कहीं भी अवतार हुआ होगा मेरे मारने वाले का तो ब्रज में ही हुआ होगा। क्योंकि बाबा साधारण पुरुष नहीं है। जाओ पूतना को कहा ब्रज मंडल के समस्त बालकों को मार दो जो 10 दिन के अंदर प्रकट हुए हैं। आश्लेषा नक्षत्र लगा। संध्या का समय यह विष घटिका का नक्षत्र है। इसमें राक्षसों का बल बढ़ता है।

मृत्यु योग इसमें उपस्थित होता है। आश्लेषा नक्षत्र विषघटिका की वेला संध्या समय निशाचरी पूतना विशाल शरीर भुजाओं में फड़कन होने लगी। मानो गिर श्रंगों को मसल देने की ताकत उसमें आ गई। उसमें आकाश में उड़ने की सामर्थ्य, विविध रूप धारण करने की सामर्थ, पहाड़ को भी चखनाचूर कर देने की सामर्थ पूतना में है। कंस के आदेश से आदेश तो उसी दिन हो गया था जिस दिन देवी जी ने आकाश में जाकर कहा था तेरा मारने वाला कहीं पैदा हो चुका है। पर ब्रज में प्रवेश करने की इसकी बुद्धि ही काम नहीं की कि हमें ब्रज का ठेका मिला है।

यह मथुरा में शुरू कर दिया बालकों को मारना और मथुरा में वो बालक पैदा हुए थे जो सब राक्षस थे। उस समय जो पैदा हुए थे वो सब राक्षस हजारों बालकों को मार डाला। फिर उसे एकदम ध्यान आया कि मुझे यहां मारने के लिए नहीं कहा। तो ये किसने बुद्धि बदली थी? लाल जी ने कि थोड़ा छ दिन तो हो जाने दो। छठी हो जाने दो। काहे को प्रथम दिन से हमें शुरुआत करनी पड़ेगी तेरी मृत्यु की। इसलिए छ दिन तो ब्रजवासियों को आनंद लेने एकदम दिमाग आया उसका कि मुझे तो ब्रज मंडल में मारना है और ब्रज मंडल में जितने प्रकट हुए हैं सब भगवान के नित्य सखा प्रकट हुए हैं।

पूतना या किसी भी राक्षस राक्षसी का वही बल चलता है। जहां भगवान का नाम कीर्तन ना होता। भगवान की कथा ना होती हो। कभी भगवान के भक्तों के चरणोदक के छींटे जिस घर में नहीं पड़े वही भूत प्रेत तो बाहरी चक्कर ही रहता है। लोग कहते हैं ना बाहरी चक्कर तुम्हारा भीतरी चक्कर ठीक नहीं इसलिए बाहरी चक्कर आक्रमण करता है। अब पूतना थर गई क्योंकि नाम कीर्तन और कथा की तो बात जाने तो जिनका नाम कीर्तन कथा हो रहा वही साक्षात है। भगवान ने सबसे पहले बुद्धि उसकी बदली। किसी भी ब्रजवासी के घर जाने की हिम्मत उसके अंदर ना रह जाए।

थरा गई। इतने में देखा भीड़ जा रही है। कोलाहल मच रहा है। नंद के लाला हुआ। उसके मन में आया कि शुरुआत यहीं से करते हैं। जय हो। बचा लिया ब्रजवासी बालकों को। नहीं नित्य सखाओं का ये वध करने की कोशिश करती। भगवान के परिकर को कष्ट देने की कोशिश करती। इसीलिए भगवान ने सीधे खींचा ब्रज मंडल में स्वागत है तुम्हारा आओ छठी का दिन है लाल जो महाराज ने खींचा और उसने विचार किया इस भयंकर रूप से तो मुझे जाने नहीं दिया जाएगा क्योंकि बड़े-बड़े धनुषों पर प्रत्यंचा चढ़ी हुई और सावधान होकर बड़े-बड़े गोप नंद भवन के आसपास लगे हुए राजा है नंद बाबा ब्रज गोप शिरोमणि है सहस्त्रों धनुरधारी और सब विद्या में पारंगत तो उसने कहा कि इनके तीक्ष बाणों को मैं तोड़ूं या परेशानी करूं ऐसा रूप क्यों धारण करूं उस मायाविनी ने

अपना चिंतन किया स्वरूप का और संकल्प किया अंबुष उर्वशी रंभा घताची मेनका प्रम लोचा चित्रलेखा तिलोत्तमा इन सब अप्सराओं का सौंदर्य अपने ऊपर धारण किया और इतना सुंदर रूप धारण किया 16 वर्ष की अवस्था इन सब श्रेष्ठ अप्सराओं के अंग लिए मायावी है किसी के नेत्र किसी की भुजा किसी के वह रूप धारण किया कि त्रिभुवन में कोई सुंदरी नहीं अप्सराएं मोहित हो जाए ऐसा उर्वशी अलंबुष रंभा घृताची मेनका प्रम लोचा चित्रलेखा त्रिलोत्तमा इन अप्सराओं के अंगों को लिया मायावी नहीं

है और मचलती हुई ऐसे चल रही है जो ब्रज गोप देखता है वो कहता है तो साक्षात लक्ष्मी जी पधारी है सब ऐसे झुक जाते हैं किसी को काम नहीं आ रहा। श्याम के दीवानों को काम नहीं आता और काम के दीवानों की नजर में श्याम नहीं आता। ये सब श्याम के दीवाने हैं। तो किसी को ऐसा नहीं लगा बड़ी सुंदर है और काम आ जाए। नहीं सबको लग रहा है देवी लक्ष्मी जी पधार रही। त्रिभुवन पति भगवान नंद बाबा के ऊपर प्रसन्न है। तो नंदलाला के दर्शन करने लक्ष्मी कोई नहीं पूछता। सब रास्ता दे रहे हैं।

मैया छठी पूजन लाला का करके आनंदित हो रही है और वहां ये मारने के लिए रूप रख के पधार रही है और आंगन में ढाणी का नृत्य हो रहा है। मेरे मन आनंद भयो मैं गोवर्धन ते आई तुम्हरे पुत्र भयो है सुन के अति आतुर उठ धाई मैं डाणिनी हूं नाच रहे और मैं गिरिराज जी से आई हूं सुना है आपके पुत्र हुआ है जो जो हमें बंदी जन भिक्षुक मिला वो सब निहाल होके गया है बंदी जन और भिक्षुक सुन सुनी दूरी दूर ते आए सबकी आशा पूर्ण करी एक पहले ही आशा लागी बहुत दिनन ते छाए ते पहरे कंचन मणि भूषण नाना बसन अनूप मोहि मिले मार्ग में मानो जात कहूं के भूप आज यहां से जो वापस गया बंदी जन सूत मागत सब ऐसे जा रहे थे जैसे कोई चक्रवर्ती सम्राट जा रहा हो इतने उनके पास सब ऐश्वर्य संपन्न बड़े-बड़े बड़े मोटे मोटे हार कंचन के मण आभूषण बस सब तुम तो परम उदार नंद जु मांगो सो दीनो [गाना गाने की आवाज़] एसो और कौन त्रिभुवन में तुम सरिसा को कीनो आज जिसने जो मांगा आपने बाबा सब कुछ दिया मैं गिरिराज जी से आई हुई ढाणी ढाणी हूं कोटि देहु तो रुचि नहीं मानो यह मुझे नहीं चाहिए जो सबको दिया है।

बिन देखे नहीं ज हो लाला को एक बार गोद में दे दो बस और फिर ले लो। इतना हमें चाहिए सब यही मांगते थे। हिस्सा भी यही देखा नंद राय सुन विनती मेरी तबह विदा भल हो नंदराज जी मैं तभी जाऊंगी इशारा किया अपने परिकर को संगीत वाद्य मृदंग [गला साफ़ करने की आवाज़] ताल पखावत और नाचना शुरू जब तक लाला गोद में नहीं देंगे तब तक हमारा नृत्य चलता रहेगा नंदरा सुनी विनती मेरी मेरी तबह विदा भल हो जब तक लाला को गोद में नहीं बाबा ने मैया से कहा गोद में लिया जब ढणी ने तो कहा अब तो जाएंगे नहीं हम तो गिरिराज जी दीज मोहि कृपा कर सोई जो हो आयो मांगन जसुमति सुत अपने पायन चल खेलत आवे आंगन तब तक हम रहेंगे यहां जब तक ये अपने चरणों से चलकर आंगन में खेलेंगे नहीं जब हंस के मोहन मोह से कछु बोले तो तेरी वाणी तह सुन के फिर घर जाऊं हो तो तेरे घर की ढाड़ीन सूरदास मोहि नाऊ सूरदास जी कह रहे मैं आपके घर की बिकी हुई हूं लाला तो दिखा दिया पर ऐसा लाला देखा कि अब हमारी जाने की इच्छा नहीं अब घर नहीं जाऊंगी।

अब जब ये अपने चरणों से चलने लगेंगे तोतरी वाणी में हमसे बोलेगी उसी दिन हम चली जाएंगी। यहां तो आनंद मच रहा है। डाणि आनंद मचा रही है और आनंद को भंग करने के लिए पूतना पधार रहे। भीड़ को चीरती हुई जब ऐसे कहती तो किसी की ताकत नहीं खड़ा रहे। सब हट जाती क्योंकि एक तो महा मायावनी इतना सुंदर रूप कि सब हट जाते हैं। चित्र ले से ब्रजवासी शांत नंद भवन की ओर चल रही है। किमयम मूर्त ब्रजपुर देवता। ब्रजवासी कहते हैं तो हमें लगता है कि कोई देवता है। कोई देवी शक्ति है किमियम त्रैलोक्य लक्ष्मी कोई कोई कहते हैं नहीं यह तो त्रिभुवन की लक्ष्मी मूर्तिमान आ रही किम मन धरा तन मंजरी ऐसा लगता है बिजली ने रूप धारण कर लिया है किमियम निष्कम बांधवा को देती ऐसा लगता है कि कोटि चंद्रमाओं ने एक रूप धारण कर लिया है जो रमणी बनकर नंद नंदन के दर्शन करने जा रही है नंद भवन की ओर सशंकित दृष्टि से गोपनाओं जो गो की पत्नियां थी उन्होंने देखा तो उनकी दृष्टि में कुछ ठीक नहीं लग रहा है तो सुंदरी पर इसका भाव ठीक नहीं लग रहा पर बोलने की हिम्मत किसी की नहीं मल्लिका पुष्पों की बेणी धारण किए हुई ऐसे थोड़ा भारी नितंब पतली कटी विशाल वक्षा स्थल लहराता हुआ वस्त्र कर्ण कुंडल हिल रहे मानो बिजली चमक रही हो दमकती हुई उसकी सुंदर अलकावली ओठों पर मंद मुस्कान और नेत्रों पर रोष क्योंकि मारने जा रही तो नेत्र देखकर गोपियों को लगता है इसका मतलब ठीक नहीं है इरादा ठीक नहीं पर कोई बोल नहीं पा रही हाथ में कमल का पुष्प लिए घुमाती जा रही।

ब्रजवासी ब्रज गोपियों की तरफ तीक्षण दृष्टि से देखती है। ऐसा लग रहा है मानो लक्ष्मी जी अपने पति को ढूंढ रही हो। गोपी गोप सब उसे रास्ता दे देते हैं। वो वहां पहुंचती है जहां नंद नंदन बैठी होती यशोदा मंदिर दुलरावती सुत श्याम कन्हाई प्रगट भई त आई पूतना प्रेरित काल अवध नराई अभी तो गोद से एक बार भी पालने में नहीं गए लालन। लालन आंख मूंदने लगे। मैया ने देखा छ दिन से कोलाहल मच रहा है। मेरे लाला को नींद नहीं आई। अब हमको लग रहा है कि लाला को सुला देना चाहिए।

कंचन रतन मण पालनो गयो काम सुतहार विविध खिलौना भाति के गज मुक्ता चधार मणियों का सुंदर पहले से पालना और सुंदर बाल गोपाल के खेलने लायक खिलौने उस पालने में रखे हुए मैया ने पालने पे लाला नींद आ रही पालने गोपाल झुलावे सुर मुनि देव कोटि 33 कौतुक अंबर छावे 33 करोड़ देवता आश्चर्यचकित होकर देख रहे हैं कि जो बड़े-बड़े मुनियों के ध्यान में आने वाला तत्व नहीं है उसे यशोदा मैया पालने में जला रही सो जा लाला ऐसे दुलार कर जाको अंत न ब्रह्मा जाने शिव सन का दिन पावे सो अब देखो नंद जोशोदा हरसी हरसी हलवे उलसत हसत करत किलकारी मन अभिलास बढ़ावे सुर श्याम भक्तन हितकार कारण नाना भष बनावे मैया उन पर ब्रह्म परमात्मा को झूला में झूला रही शिव ब्रह्मा आदि जिनकी आराधना करते हैं यशोदा मैया लाल झुलावे आे बारे को हुलरावे फिर उठा लेती पाले से कन्हैया कन्हैया अया यो कह लाड ल आ जाओ आ जाओ आ जाओ फिर लाल जी को लाल जी ने देखा कि राक्षसी आ रही हो या प्यार पर प्यार किए जा रहे कहीं वो अपना रूप ना दिखा दे इसलिए प्रभु आंख मैया ने

कहा लाला सो गया चुपचाप हट रहे हटी की रूप मोहिनी धर ब्रज आई अद्भुत साद श्रृंगार मनोहर असुर कं दे पान पठाई कुछ विष बाटी लगाई कपट कर बाल घातनी परम सुहाई बैठी होती यशोदा मंदिर ऐसे देखा यशोदा मैया की मैया ने मैया मंत्र मुग्ध सी है इतनी सुंदर देवी आई है हमारे घर दर्शन करने इशारा कर लाला लाला ने कस के आंख बंद की। लाला इसलिए आंख बंद कर रहे कि अभी अभी तो हमारी आनंद की शुरुआत हुई है और यह राक्षसी से हमें निपटना पड़ेगा। भगवान ने अपनी आंखें बंद कर ली। यह पूतना साक्षात अविद्या है।

पाप कराने वाली। भगवान ने सोचा इस पापिनी का अगर मुख देखेंगे प्रारंभ में ही तो अनिष्ट हो जाएगा। इसका मुंह नहीं देखना। आंख बंद कर ली। यह मेरे सखाओं को मारने की नियत से आई है। जघन्य अपराधिनी है। इसका मुख नहीं देखना। और इस जन्म में इसने कोई साधन नहीं किया। पूर्व जन्म में इसने कोई भजन नहीं किया। पर माता का भाव लेकर मेरे सामने आ रही है। अर्थात स्तनपान कराएगी। अगर मैंने मुख देख लिया तो दया ना आ जाए। इसलिए भगवान ने आंख बंद कर ली। भगवान ने अपने मन में विचार किया कि आखिरकार ये दूध ही तो पिलाएगी।

जहर भी है तो क्या दुग्ध तो पान कराएगी। यह मेरी मां का पहला काम कर रही है। इसलिए देखा तो दया आ जाएगी। और भगवान के उदर में असंख्य ब्रह्मांड वास करते हैं। और यह हलाहल विष लगा के आई है। इसलिए भगवान ने नेत्र बंद करके भगवान शंकर से कहा कि पी हम संभालो तुम। क्योंकि हमारे उदर में अनंत ब्रह्मांड वास करते हैं। एक बार विश्व के चराचर प्राणियों की रक्षा के लिए समुद्र मंथन का लाल विष पिया था। तो देखो महाराज विष पीने का अभ्यास आपको है और दूध पीने का माखन खाने का हमारा वो तो हम काम करेंगे।

शेष काम आप करो। इसलिए भगवान शंकर का ध्यान करने लगे। भगवान श्री कृष्ण ने विचार किया कि यह ब्रजवासी जन माखन मिश्री खवाते हैं और छठी के दिन जहर पिलाने आई है। यह बहुत दुष्ट है। अरे छठी का दिन था उत्सव मना लेने हलाल जय और मैं स्वतंत्र ईश्वर हूं। लेकिन इसको बहुत अच्छी गति दूंगा। जो चंद्र मार्ग और सूर्य मार्ग दोनों से नहीं प्राप्त होती। उत्तरायण और दक्षिणायन से इसलिए भगवान ने दोनों नेत्र बंद कर लिए क्योंकि भगवान के नेत्रों में सूर्य चंद्र का कि तुम्हारे मार्गों से नहीं जाएगी सीधे परम पद जाएगी।

भगवान ने सोचा कि पूतना के जो नेत्र हैं तो हमारे ही तो दिए हुए हैं। कहीं नेत्रों में नेत्र मिल गए तो ये भूल जाएगी जहर पिलाना। पक्का भूल जाती लालजू के नेत्रों में नेत्र मिलते तो आकर्षण करके वही लौट जाती प्रेम में भगवान ने कहा को प्रेम नहीं परम पद तो दे सकते हैं प्रेम नहीं दे सकते इसलिए भगवान ने अपने नेत्रों को बंद कर लिया श्री कृष्ण नेत्रों में धर्म विराजमान है और धर्म का मूर्तिमान स्वरूप महाराज निमि विराजमान है सबके नेत्रों में भगवान ने कहा इन धर्म नेत्रों से इसको देखना उचित नहीं इसलिए नेत्र बंद कर लिए।

इसका एक और नाम है बकी। पूतना का नाम बकी है। तो भगवान ने कहा मेरे नेत्र तो राजहंस हैं। बगुली क्यों देखे? इसलिए नेत्र बंद कर लिए। भगवान मेरे नेत्रों का प्रभाव है। नेत्र पड़ते ही दृष्टि पड़ते ही जीवत्व को भूल करके अपने स्वरूप में आ जाता है। और ये जो काम करने आए इसका काम नहीं हो पाएगा। इसलिए भगवान ने नेत्र बंद कर लिए। जैसे रामावतार में ताड़का कृष्णा अवतार में पूतना यह अविद्या है अविद्या माया श्री कृष्ण के मन में बात आई कि यदि करुणा दृष्टि मेरी हो गई तो उग्र दृष्टि होगी नहीं अगर उग्र दृष्टि हो गई तो ये भस्म हो जाएगी नजदीक आ ही नहीं पाएगी इसलिए दोनों दृष्टि नहीं देनी बंद कर लिया भगवान ने सोचा कि मेरे नेत्रों में अपार सामर्थ्य है क्योंकि यह महा योग दृश्य संपन्न है।

कुछ भी हो सकता है। मेरे नेत्रों में कुछ भी हो सकता है। इसलिए नेत्रों को बंद कर लिया। पूतना निश्चय करके आई थी कि ब्रज के सारे बालकों को मार डालूंगी। और भगवान का व्रत है कि भक्त का बाल बांका भी नहीं होने देते। इसलिए लीला शक्ति ने सीधे नंद आलय में प्रवेश करवाया। भगवान को बहुत गुस्सा आ रहा है। मेरे भक्तों का नाश करने आई थी। इसका मुंह नहीं देखूंगी जो मेरे प्रिय भक्तों का अनिष्ट करना चाहती। इसलिए भगवान ने रूप नहीं देखा। पूतना ने भीषण रूप छुपाकर माया रूप धारण किया तो भगवान की दृष्टि पड़ने पर माया रूप खत्म हो जाता।

भीषण रूप प्रकट हो जाता। इसलिए भगवान ने अपनी दृष्टि बंद कर ली। पूतना हिंसा पूर्ण हृदय से आई है। भगवान उसी भाव की पूर्ति करके हिंसा से ही उसको परम पद देंगे। सद्गुणों के भंडार भगवान ने करुणावश अपने नेत्र बंद कर लिए। यशोदा मैया ने इशारा किया लाला विराजमान है ताम त्रिक्षित मतिवा चेष्टिता विरा को परदा शिव वर त प्रभया धते निरीक्षमाण जननी हषताम जैसे मखमली मान में छिपी हुई धार दाल तलवार हो ऐसे ऐसे सुंदर रूप में क्रूर कर्मा पूतना छुपी हुई है। पर देखने से एक बहुत सुंदर रमणी महिला सी भद्र महिला सी सौंदर्य से हतप्रभ होकर के रोहिणी जी उसे रोक न सकी।

यशोदा जी ने इशारा कर दिया। भयानक राक्षसी भगवान श्री कृष्ण को देखती है। ऐसे जैसे कोई शिकारी शिकार की तरफ देखता है। भगवान आंख मूंदे शांत पड़े हुए हैं। वो भगवान को गोद में उठाती है। और जल्दी से अपने स्तनों को खोलती है। भगवान के मुख में डालती है। बड़ा भयंकर भाव है। लेकिन परम पवित्रता भगवान से जुड़ गई। अपने वक्षा स्थल के दुग्ध को भगवान के श्री मुख में दिया। हलाहल विष लगा हुआ है। भगवान ने जय महादेव। पियो विष हम तो दूध पी रहे हैं। जहां हरि वहीं शिव जहां शिव वहीं हरि शिव कल्याण मोक्ष परमपद भगवान ने कहा गुस्सा करो शंकर जी से क्योंकि क्रोध तुम्हारा विनाशकारी स्वरूप है।

विनाश की सेवा उन्हीं की है। सृजन सेवा ब्रह्मा जी की पालन हरि की और विनाश सेवा भगवान शंकर का स्मरण किया। भयंकर क्रोध धारण किया भगवान श्री बाल कृष्ण चंद्र जी ने। दोनों हाथ से उसका स्तन पकड़ा और छाती में चरण लगाए। ये कितना सौभाग्य कितना सौभाग्य मुनि मन ध्यान धरत पावत। दोनों चरण कमल छाती पर ऐसे एक [नाक से की जाने वाली आवाज़] स्तन पकड़ा एक यहां चरण कमल यहां चरण कमल कस के पकड़ा पीने लगे। भगवान तो दूध पीने लगे, शिव जी जहर पीने लगे और क्रोध प्राण पीने लगा।

क्योंकि क्रोध को साथी बनाया। भगवान करुणा की मूर्ति। बड़े करुणा की मूर्ति। देखो इसको नरक मिलना चाहिए था। क्योंकि भगवान को मारने आई है तो इसको तो बहुत कष्ट मिलना चाहिए था। अब पूतना ने देखा कि घबराहट पैदा हो गई और भगवान के जे ही चरण पड़े तो सुंदर रूप गायब भागी हो और छह कोस का छह कोस 18 किलोमीटर भयंकर रूप पूतना का छोड़ दे छोड़ दे पूरा ब्रज कांप रहा है ऐसी आवाज छोड़ दे छोड़ दे बाल बिखरे हुए भयंकर रूप गोपियां गोप सब थर गए भगवान प्राणों का आकर्षण कर रहे बार-बार हाथ पैर पटक करके रो रहे नेत्र उलट गए पसीना से लथपथ हो गई भारी चिल्लाहट भयंकर छोड़ दे छोड़ दे पृथ्वी अंतरिक्ष डगमगा उठा ऐसा लगा वज्रपात हो गया ऐसे चीख रही थी पूतना बड़ी पीड़ा निशाचरी पूतना के स्तरों में हुई।

वह अपने को छिपा ना सकी। राक्षसी रूप एक क्षण में भगवान ने प्राणाकर्षण कर लिए। बाल बिखर गए। हाथ पांव फैल गए। जैसे इंद्र के वज्र से घायल वृतसुर गिर पड़ा हो वैसे ही वो गोष्ठ में गिर पड़ी। छह कोस के सारे वृक्ष नष्ट कर दिए। खुद मरी और उजाड़ मचा दिया। वृक्ष जो ब्रज के परम पवित्र छह कोस के क्योंकि छह कोस का शरीर बड़ा भयंकर स्वरूप उसका पहले तो इतना सुंदर मुंह के जो दांत थे ऐसे हल जैसे बड़े-बड़े नोक नथूने ऐसे पहाड़ की गुफा जैसे स्तन जैसे कोई पहाड़ की चोटी हो।

लाल लाल बिखरे हुए बाल आंखें अंध कूप के समान भयंकर भूरी मोटी मोटी जांघें जैसे नदी के पुल हो बड़े-बड़े ऐसा भड़ा पेट और छोटे से बाल गोपाल इस गोपी गोप सब डर गए सबके कान फट गए क्या हुआ भागे सब जो प्राण प्रिय लाला को मानने साहब भागे क्षय कोश भागना पड़ेगा ना छाती कहां होगी जहां भगवान होंगे तो सब भागे ब्रजवासी जन जैसे तैसे सब भाग कर वहां पहुंचे दौड़ के श्री कृष्ण को उस राक्षसी के वक्षा स्थल से उठाया पूतना को वो गति मिली जो यशोदा मैया को कितने हमारे कृपाल भगवान जब वैर से अपना दुग्ध पान कराया तो जो गति यशोदा मैया को मिलनी वही गति पूतना को हमारे लाल जी ने दी।

यदि प्यार से बढ़िया मिश्री डालकर के दूध पिलाओगे तो कौन सी गति दुर्लभ रह जाएगी? हे इसीलिए कहते हैं घर में सेवा विराजमान करो सब लोग। छोटे से ठाकुर जी ठाकुर विराजमान है। एक गिलास में 200 ग्राम दूध थोड़ी मिश्री या चीनी डाल ऐसे प्यार से पिलाओ। कभी भोग लगा रहे हो ना अपने हाथ से पवाओ दाल रोटी पूरी कचौड़ी जो बनाओ ऐसे अपने हाथ से पवाओ कवल ऐसे और पालो जैसे अपने बच्चे को मूर्ति मत समझना आपसे सच्ची कह रहे हैं जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूर्ति देखी तिन तैसी जैसी भावना करोगे बस प्रेम प्रेम सोचो हमारे प्रभु कैसे जो जहर पिलाने जा रहे उसे परम पद दे रहे यार तुम भोग लगाओगे तुम उनको दूध पिलाओगे तुम उन्हें गले से लगाओगे तुम उन्हें शयन कराओगे तुम्हें परम पद नहीं मिलेगा कौन सी साधना सेवा से बढ़कर हो

सकती है जब ऐसे लेकर के उनको गले लगाओ ना तो ऐसा लगता है कि इससे बड़ा कोई परम पद नहीं होगा प्रभु कि आप हमारे गले से लग प्रभु है कैसे तुम्हें बताएं ये अर्चा विग्रह मूर्ति मत मानना मूर्ति मानोगे तो मूर्ति ही रहेंगे और अर्चा विग्रह मानोगे तुम कि साक्षात प्रभु विराजमान है तो तुम्हारी खोपड़ी में बैठ के बात करेंगे तुम्हारे अंदर हे ऐसा करो हे ऐसा करो हे ऐसा करो इस प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि मेरे भगवान कितने करुणामय है पत्रम पुष्पम फलम तय ये भक्त प्रक्षति ये भक्ति से नहीं ये तुम मारने की नियत से पवा रहे हो भगवान परम पद दे रहे हैं यशोदा मैया दौड़ के लाला कितना अनिष्ट हो गया।

ये दुष्ट राक्षसी हमारे लाला को उठा लिया। राधा राधा राधा रोहिणी जी ने गोद में लिया। यशोदा मैया गाय की पूंछ से झार रहे। सब अनिष्ट दूर हो जाए। मेरे लाला का मंगल हो जाए। बालक श्री कृष्ण के अंगों की रक्षा सम्यक गोप भ्रमणा आदि भी यशोदा रोहिणी भ्याता समम बालस सर्वता रक्षा विधीरे सम्यक गोप भ्रमणा पक्की बात है तस्मात शास्त्रम प्रमाणम यशोदा रोहिणी भ्याता समम बालस सर्वता रक्षाम विद धीरे सम्यक गोप पुच्छ भ्रमणा गाय की पूछ को ऐसे ऐसे करने से कोई भी टोना जादू नजर ये सब बालक को नहीं लगती इसी पद्धति से यशोदा मैया रोहिणी मैया ने गाय के समीप ले जाकर और फिर क्या किया और फिर भगवान के नामों से भगवान की रक्षा करते हैं।

ये बड़ा मंगलमय प्रसंग है। भगवान के नाम भगवान की रक्षा करते हैं। गोप्या संस्पष्ट सलीला अंगु करयो प्रथक नस्यात्मनथ बालस बीज्या सम कुरत अभ्या यज्ञ कटम जठरम हयास हत केशवना कठम विष्णु भुजम मुख मुर्रम ईश्वरम चक्रता सहगद हरिस पश्चात तत्पार धनसी मधनस को सुखगा उपरेंद्र तक्षित हलध पुरुष समता इंद्रिय प्राण [चीखने की आवाज़] नारायणो वत श्वेत दीपितम मनो योगेश्वरो प्रभुते बुद्धि महात्म भगवान पर कडम पात गोविंद सयाम पात माधव बजंत वैकुंठ आसीनम तम श्री पति भान यज्ञ भात सर्वग भयंकर अजन्मा भगवान मेरे लाला के पैरों की रक्षा करे मणिमान भगवान घुटनों की रक्षा करें।

यज्ञ पुरुष भगवान जांघों की रक्षा करें। अचुत भगवान कमर की, हयव प्रेत की, केशव भगवान हृदय की, ई भगवान वक्षा स्थल की, सूर्य भगवान कंठ की, विष्णु भगवान बाहों की, उक्रम भगवान मुख की, ईश्वर श्री की रक्षा करें। चक्रधर भगवान मेरे बालक की रक्षा करें। आगे रहकर, गदाधारी भगवान श्री हरि पीछे रहकर। धनुष और खड धारण करने वाले भगवान मधुसूदन अजन दोनों बगल में शंख धारी उगाय चारों कोनों में उपेंद्र वामन भगवान ऊपर हलधर पृथ्वी पर भगवान परम पुरुष सब ओर से तेरी रक्षा करें ऋषिकेश भगवान इंद्रियों की नारायण भगवान प्राणों की श्वेत दीप भगवान अधिपति चित्त की योगेश्वर मन की तेरी रक्षा करें प्रश्नी गर्भ तेरी बुद्धि की परमात्मा भगवान तेरे अहंकार की खेलते समय गोविंद भगवान रक्षा करें सोते समय माधव भगवान रक्षा करें चलते चलते समय वैुंठनाथ बैठते समय श्रीपति भोजन के समय ग्रहों को भयभीत करने वाले यज्ञ भोक्ता भगवान तेरी रक्षा करें ये जो गोपियों ने कवच बांधा लाल जी के बस इतने श्लोक है जिसको श्लोक ना आवे हिंदी से तो कह रहे हैं डाकिन यातस कुमांडाग्रा भूत प्रेत पिशाच यक्ष राक्षो विनायका चाहे डाकिन भूतो प्रेतो यात दानो कुषमांडा हो, ग्रह हो, नक्षत्र हो, पिशाच हो, यक्ष हो, राक्षस हो, विनायक हो, कोई भी विघ्न उसके जीवन में जो रोज ये कवच धारण करता है।

ये मात्र पांच छह श्लोक हैं। कोई भी भूत, प्रेत, पिशा, यक्ष, राक्षस, डाकिन, कोई भी मारण, मोहन, वशीकरण, उाटन उसके ऊपर छह श्लोक है मात्र। डाकिनी राक्षसी कुषमांडा बाल ग्रह भूत प्रेत पिशाच यक्ष राक्षस विनायक कोटरा रेवती जेष्ठा पूतना मात्रिका शरीर प्राण और इंद्रियों का नाश करने वाला पागलपन और दुस्वप्न गंदे स्वप्न और मिर्गी अपस्मार भयानक रोग उत्पात वृद्ध ग्रह बाल ग्रह ये कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा जो यशोदा मैया और रोहिणी जी लालू के ऊपर कवच धारण करवा रहे। भगवान के नामों से भगवान की रक्षा कर रहे।

गोपियों ने प्रेम पास में बनकर भगवान श्री कृष्ण के नाम से ही भगवान श्री कृष्ण की रक्षा की। फिर माता ने लाला को अपने स्तनों का पान कराया। इसी समय नंद बाबा और सभी गो मथुरा से गोकुल पहुंचे। बड़ा भयंकर दृश्य देखा। कहने लगे आश्चर्य की बात है। वसुदेव जी ने कहा था जल्दी जाओ कोई ना कोई घटना घटने वाली है। हमें लगता है वासुदेव जी के रूप में किसी महषि ने जन्म लिया है अथवा वसुदेव जी कोई योगेश्वर है क्योंकि उनको कैसे पता चल गया कि जल्दी जाओ नहीं महावन में कोई उत्पात होने वाला है।

तब तक ब्रजवासियों ने पूतना की कुल्हाड़ी से टुकड़े-टुकड़े करके और एक खाली मैदान में जाकर पहाड़ जैसा जमा करके आग लगा दी। आश्चर्य की बात कि पूतना के शरीर में आग लगने से उसका जो धुआ निकला वो अगर की सुगंध से बड़ा पवित्र करने वाला क्योंकि भगवान ने उनका दुग्ध पान किया। पूतना निष्पाप हो गई थी। देखो भाई पूतना लोक बालगनी राक्षसी रुधरासना हरे दत्त सदगति कहां पूतना राक्षसी खून पीने वाली और कहां परम पद भगवान ने उसको वो परम गति दी जो संत महापुरुषों को बड़ी दुर्लभता से मिलती है।

किम पुनः श्रद्धया भक्त कृष्णााय परमात्मने यच्छन प्रीतम किमनु रक्त मात्र यथा फिर कोई यदि हमारे भगवान श्री कृष्ण को श्रद्धा भक्ति से वात्सल्य रख के दुलार रखकर अनुराग पूर्वक अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु पवाता है उसको परम पद मिलना अरे परम पद क्या है पदभ्याम भक्त हभ्याम वंदाभ्याम लोक वंदित अंगम यश्या समा भगवान पव स्थलम जिन चरणों को ब्रह्मा शंकर आदि ध्यान के द्वारा वंदना करते उनहीं चरणों को लगाकर भगवान ने उसके वक्षा स्थल को पिया इसलिए पूतना को परम पद की प्राप्ति हुई।

माना कि वह राक्षसी थी। परंतु उसे वह उत्तम गति मिली जो माता को मिलती है। फिर सोचो इन ब्रजवासी गओं को जिनका दूध भगवान ने पिया। इन ब्रजवासियों के जिनके प्यार में दुलार में भगवान ने माखन छीन छीन कर पाए। छुप छुप कर उनको सुख देने के लिए लीला की। परीक्षित देवकी नंदन भगवान कैवल्य आदि सब प्रकार की मुक्ति और सब कुछ देने वाले हैं। उन्होंने ब्रज की गोपियों और गौओं का वह दूध जो भगवान के प्रति पुत्र भाव होने से वात्सल्य स्नेह की अधिकता के कारण स्वयं झरता रहता था।

भरपेट पान किया। गौए गोपियां जो नित्य निरंतर भगवान श्री कृष्ण को अपने पुत्र के रूप में देखती थी। सब के सब परम पद को प्राप्त हुए। सब के सब जब नंद बाबा और ब्रजवासियों के नाक में वो धुआ पहुंचा पूतना का जला हुआ तो उन्होंने कहा ऐसी सुगंध तो आज तक हमें नहीं मिली और सब जब घर आए तो पूतना का पूरा वृतांत सुना लाला को हृदय से लगाया कि सकुशल बच गया हमारे भगवान की बड़ी कृपा पर सबके हृदय में एक शोक सा था। इस घटना से सबके हृदय में एक शोक सा था कि कहां इतना आनंद मच रहा था।

कहां ये दुष्ट पूतना किसके द्वारा भेजी गई? कैसे आई? ये सब विचार ही कर रहे थे कि इतने में देवाधिदेव महादेव दरवाजे पर खड़े हो गए। पुनः आनंद मंगल मचाने के लिए। एक गोपी भाग के गई बोली हे दैया अभी तो पूतना आई थी यह कौन आ गया मतवाला जोगी द्वारे तेरे आया हे दैया दैया इसलिए सांप पुष्कार चिता भस्मा ले पोरल मसनम दिगपट धरो जटाधारी कठे भुजग पतिहारी पशुपति कपाली भूते सो ऐसे भगवान मैया हाय दैया ऐसा भयानक बाबा जी दरवाजे पे है उसे है बहुत सुंदर कर्पूर गौरम पर कभी-कभी लीला में ऐसा भयानक रूप धारण करते तो आनंद लेना था इसलिए सबकाित बदलना था ये पूतना की घटना विस्मरण करानी थी जटाजट सिर गंग विराजत त्रिलोचन मन भाया ब्रश

ऊपर असवार होए के श्री गोकुल में आया हे दैया मतवाला जोगी द्वारे मेरे आया दैया माने तो द हे विधाता ये कौन सा बाबा जी हमारे दरवाजे आ गया बैल पर सवार है सिर पर गंगा जी विराजमान है तीन नेत्र है बागंबर पाटंबर सोहे अंग छार लपटाया अंग में तो भभूति रमी हुई है बागंबर वस्त्र के रूप में है कर त्रिशूल डमरू ले खप्पर सिंगी नाद बजाया हाथ में खप्पर एक हाथ में त्रिशूल और सिंगी नाद बजा रहे हैं अरुण नयन नेत्र जो है चढ़े हुए लाल एकदम कैसे लग रहे बोले विजय जो चढ़ाए प्रेमियों की घूर्णित नेत्र होते हैं जब वो रूप का तो उनके लाल नेत्र हो जाते हैं और एक नशे में जैसे आपको दिखाई देंगे घूर्णित नेत्रा मदा घूर्णम नेत्रम वो प्रेम मद से घूर्णित हो जाते हैं जो भगवान के प्रेमी जन उनके नेत्रों को पहचानना भगवान शिव वैष्णवा नाम यथासंभ और लोचन ललचा रहे हैं प्रभु की रूप माधुरी के लिए तो कह रहे अरुण नैन विजयाद चढ़ावे आ धतूरा खाया ऐसा लग रहा है धतूरा खाए है कि अकड़ा चबाए है भांग खाए है नेत्र लाल लाल घूम रहे हैं ब्रजवासी जलधर और

तिलक चंद्रमा भ्रकुटी ऊपर जोगी जुगत बनाया द्वितीया का चंद्रमा मुकुट की भांति भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान करुणा अवतारम साक्षात करुणामूर्त जितना इनका भयंकर रूप है उतना ही एक रूप बहुत करुणामय आशुतोष और ढरदानी देने में सोचते नहीं महान कृपा केशव इतने सुंदर हैं कि त्रिपुर सुंदरी भगवती अंबा लुभायमान है इतने सुंदर है और इतने भयंकर हैं शंकर कि अगर अपने रूप में आ जाए तो भगवान ही केवल देख सकते हैं दूसरे की सामर्थ नहीं कि देख सके ऐसे भयंकर शंकर है और ऐसे तो कर्पूर गौरव करुणा अवतार है कपूर की तरह गोरे एकदम बहुत शांत स्वरूप तो तिलक चंद्रमा भकुटी ऊपर जोगी जुगत बनाया और रुद्र मालगर बीच विराजत शेष नाग लपटाया रुद्राक्ष की भी माला है और भगवान शेषनाग भी गले पर विराजमान है।

क्या चाहिए उस जोगी से पूछो किस लिए आया है? गोपियां जाकर कहती हैं कहां से आए हो? यहां क्यों आए हो? हम आए हैं काशी से अब यह वृषभ किए असवारी कहे जदा सुनरी सखियों इनको भीतर मत लाना बहुत भयंकर रूप में काशी से आए हैं कौन है क्या चाहते हैं जो मांगे सो दीजो इनको क्या चाहिए सोना चांदी हीरा जवाहरात नहीं ये सब नहीं हम तो योगी हैं। हमें यह सब नहीं चाहिए। क्या चाहिए? एक बार लाला को हमारी गोद में दे दो। हम अपनी जटा छुआ दे तो सदा सदा के लिए कोई नजर नहीं लगेगी। जटा पुसका है सांप।

और ये पता नहीं यशोदा मैया कि लाला सांप ही पे सोता है। शेषनाग की सैया पर सहल करने वाला। इसको क्या डर है? जो मांगे सो दीजो इनको बालक मति दिखाओ। तुम कह रहे हो नजर नहीं लगेगी। हम कह रहे तुम्हारी नजर लग जाएगी। जिंदगी भर रोना नहीं मिटेगा। ऐसा तो तुम्हारा स्वरूप है। भगवान शिव ने कहा नहीं मानोगे। हम जाएंगे नहीं। और लगाया पद्मासन वहीं बैठ गए। अंतर्यामी सदा शिव जानो ऐसे नहीं मानेंगे तो राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा [चीखने की आवाज़] राधा राधा राधा राधा राधा अब तो सदा शिव के राधा नाम स्मरण से उधर रोना शुरू लाल जी का श्री चरण चलाना रोना शुरू अब तो सब परेशान किए जोगी का चमत्कार है कि लाला मैया ने विचार किया कि दूर से दिखा देती है।

लाला को हाथ में लिया और सामने गए। भगवान शिव ने इशारा किया गोद में आना है तो और जोर से रोने लगे। भगवान शिव ने कहा मैया अब भी मान जाओ। अगर हमारी गोद में दे दो लाला चुप ना हो जाए तो आप कह और चुप नहीं किलकारी मार देगा। तो गोपियों की तरफ देखा। बोले दे ना। यशोदा मैया ने कहा जो सांप पहले हमारी तरफ पीछे करो इसे। तो भगवान ने शेष जी से कहा पीछे पड़ कर लो पीछे और लाला को तो कोई भय नहीं। वो तो उनकी सैया है। मैया को भय है। नजदीक जा देख बोले गोद में देना पड़ेगा।

आहा जो ही दिया तो एक हाथ से बारी फेरी लाला के ऊपर हाथ शीश पे दीनो सिर पर ऐसे दुलार कर रहे हो कह रहे चरणों का सहारा है ये तो हम बाहरी लीला कर रहे प्रभु चरण उठाओ हमारे शीश पर रखो खेलते खेलते लाल झूले भगवान शिव ऐसे निहाल हो गए बिथा भई सब दूर बदन की किलक उठे नंदलाल किलकारी बोले देखो मैया रोना बंद हो गया मैया ने कहा समस्या का समाधान मिल गया ए बाबा तुम काशी ना जाओ और यही नंद गांव में बने रहो जब लाला रोएगा तब तुम्हारे पास ले आएंगे तुम हाथ फिर बोले मैया पक्का आज भी नंदालय में ही नीचे बैठे आप देख लो जाके जहां लाला का स्नान होता है वही नीचे नंदालय मैया रोज मैं यही स्नान का जल धारण करूंगा और जब आपका लाला रोए तब हर्षित भई नंद की रानी दीनी मोतियन माला लाल जी की पहनी हुई रह रे जोगी नंद भवन को यही यही यही मत जाओ पहले तो मैया ने कहा भाग जाओ यहां से रुको जब एक उपाय पाया कि लाला जब रोए हाथ फेर दे बाबा तो किलकारी मार दे तो कहा तुम मत जाओ जब रोएगा तो हम तुम्हारी गोद में ले आएंगे तुम हाथ फेर देना रहू रे जोगी

नंद भवन को ब्रज में बासो कीजो मेरो जब जब लाला रोवे तब तब दर्शन दीजो तुम तो जोगी परम सयाने तुमको वेद बखाने बूढ़ो जोगी नाम हमारो सुर श्याम मोहि जाने सुर श्याम मोहि जाने तब हाथ जोड़ शिवस्तुति कीनी लाला नेत्र उघारो सूरदास स्वामी के ऊपर शंकर सर्वसो चलते चलते नेत्रों में नेत्र मिलाया कहा प्रभु यही यही है रोज एक बार रो देना रोज एक बार रो दोगे तो मुझे रोज बुलाया जाएगा और रोज मैं आपका स्पर्श प्राप्त भगवान शिव आज भी नंदालय में विराजमान है भगवान भगवान शिव के अभी अभी अभी पधारे इतने में एक ब्राह्मण देवता हरि ओम मां हरि ओम अकेले कंस ने भेजा था कंस ने श्रीधर ब्राह्मण को भेजा श्रीधर ब्राह्मण करम कसाई कहो कंस सो वचन सुनाई कंस को जब सूचना मिली पूतना मार डाली चली गई पूतना शास्त्रों देवताओं की एक साथ सामर्थ ने पूतना को परास्त कर इसका मतलब है मेरे मारने वाला पूर्व जन्म का जब मैं काल नेम था तो श्री हरि ने मारा तो वही है वही अब तो पक्का हो गया इतने में आ गए श्रीधर पंडित महाराज की जय क्यों चिंतित हो प्रभु मैं

तुम्हारी आज्ञाकारी नंद सुवन को आओ मारी प्रभु आप आज्ञा करो तो अभी सातवा दिन है पक्का हम तेरा ही की तैयारी करके आ जाएंगे उनकी मार डालेंगे पक्का हम में इतना मंत्र बल है इतनी कला है कि आप निश्चिंत रहो मैं मार डालूंगा कंस कहो तुम ते होई तुरंत जाहु करो विलंब न कोई सच्ची ऐसा कर सकते हो जितनी मुंह मांगी दक्षिणा वो सब देंगे जाओ मार के आओ अब ये सोच रहे थे अपने मारण मोहन वशीकरण के बल से हम नंद नंदन को पधरा देंगे लेकिन यह पता नहीं था कि साक्षात काल के भी महाकाल प्रभु है इसका कलेवर केवल ब्राह्मण का है।

हृदय तो राक्षस का है। कंस का भेजा हुआ आया। यशोदा नंदन का प्राण हरण करना है। ऐसा संकल्प किए हैं। जे भी आया तो पहले तो मंत्र उच्चारण करेगा ना ब्राह्मण है यशोदा मैया आओ आओ पंडित जी आओ आओ रोहिणी जी यशोदा जी दौड़ पड़ी जाकर के चरण प्रक्षालन किया। बहुत से ऐसे ऋषि ब्राह्मण सब आते रहते हैं। नंद रानी जी ने उसके चरणों की तरफ देखा चेहरे की तरफ देखा कि है तो ब्राह्मण पर कुछ अच्छा नहीं लग रहा इसको देखने से। श्री रोहिणी जी आदर सत्कार करके बैठाल रही हैं। श्रीधर नंद भवन चली आयो यशोदा उठ के माथ नवायो महाराज अब आप 11:00 बजे के लगभग आए हो तो रसोई तैयार होने जा रही राजभोग की पा रहे हो हां हां जरूर यशोदा जी रसोई तैयार कर रही उसने अपने मन में सोचा ये बढ़िया अवसर है लाला के पधराने का उन अपने मन मारन ठानो हरिजूता को तब ही जानो भगवान के मारने का उपाय सोचने लगा भगवान देखे अरे बामन हो पूतना तो राक्षसी थी मार दी बामन मारे नहीं भलाई अंगया को मैं दे न साई जब ही बामन हरि डिग आयो हाथ पकड़ हरि ताह गिरायो श्रीधर

ब्राह्मण मार को हिम्मत करके कि अंगूठे से जाके गला दबा देंगे छोटे से बाल गोपाल साथ दबा देंगे जो ही ऐसे किए सो भगवान पकड़ लिए भगवान ने उनका जो हाथ अंगूठा गले तक आया ऐसे दबाने के लिए उसी को पकड़ के उठा वो तो गिर गए पासे में भगवान ने देखा कुछ देख तो नहीं रहा है क्योंकि कहेंगे लाला इतनी जोर का तो गुदी चाले जीव मरोरी द ढरकायो भाजन फोरी भगवान तुरंत उठे सातव दिन छाती में लात धरी पकड़ी जबान ऐठ दी [गला साफ़ करने की आवाज़] मतलब बोलने लायक नहीं रखा जबान ही खत्म और पास की मटकी फोड़ के माखन फैला दिया और थोड़ा माखन ला के उसके मुंह पे लगा दिया राख कछुती मुख लपटाई आप रहे पलना में ज आप जाकर पलना में लेट गए रोवन लगे कृष्ण विनानी जसुमति आई गई ले पानी जसुमति जी ने सोचा कि भोग तो बन ही रहा है पंडित जी को थोड़ा मीठा पानी पवा दे तो लौट के आई तो देखा बालक रो रहा है और मार रही है मुंह में माखन वाखन लपटाया सब फैला है माखन रोवत देख कहो अकुलाई कहा करो ते विप्र अन्याय ब्राह्मण देवता क्या कर दिया बालक तो हमारा सो रहा

था तू अब रो रहा है कुछ कर दिया क्या अब तो जवान भगवान खत्म कर दे वाणी के अधीश्वर भगवान बैठ के जने खत्म बामन के मुख बात ना आवे और जीव होए तो कह समझावे बामन को अब भगवान ने उनकी दशा जो बदली अब वो जबान से कुछ कहे हम तो इतनी भूख लगी थी तो बता देते हम आपको माखन पहले ही दे देते आपने मटकी क्यों फोड़ डाली लाला रुला दिया मटकी फोड़ डाली और ऊपर इतनी जल्दी भूख लगी थी तो आप हमसे बता देते आप ब्राह्मण देवता है भगवान के प्रति अनर्थ र्थ की भावना लेकर के उसने बृजेंद्र नंदन भगवान को पहचाना नहीं।

भगवान जिस पर कृपा करते हैं उसको तन्मयता प्रदान करते हैं। ये जो मुनिगण याचना करते हैं स्थिति की जब भगवान ने इसकी जबान थी ना तो इसके हृदय में भगवान की स्मृति जागृत हो गई। क्योंकि भगवान छाती पर बैठे बाल गोविंद और जबान है ठीक तो इसके हृदय में भगवान की स्मृति जागृत हो गई। असुर चल रहे हैं। यशोदा मैया इनकी दशा देख रही है। बामन के मुख बात ना आवे। बात तो नहीं कह रहे। पर बार-बार नंद नंदन की तरफ देख रहे अशुभ प्रवाह कर रहे हैं। उसके नेत्रों में श्याम सुंदर और हृदय में श्याम सुंदर का ऐश्वर्य प्रकाशित हुआ।

ना कोई ब्रजवासी जान पा रहा है ना ब्रज रानी जान पा रही है। मैया तो लाला को लाड लड़ाने में मगन है। और उसके अब आंसू चलने लगे। फिर कुछ कह तो नहीं पा रहा। जोर जोर रोने लगा। यशोदा मैया ने पूछा रो क्यों रहे हो तुम? और वो बोलने लायक तो है नहीं। उस दिन से उसका ऐसा हृदय पलटा कि वो कंस के पास नहीं गया। वो ब्रज मंडल में ही रहकर कृष्ण की आराधना करके कृष्ण प्रेमी बनकर भगवत प्राप्त हुआ। धन्य है भगवान का अवतार। कोई कैसे भी भगवान से जुड़ता है सबको परम पद देते हैं और धन्य है भगवान की वह लीला और नाम भगवान ने तो गिने चुने श्रीधर को सुधारा गिनी चुने राक्षस राक्षसियों को मारा लेकिन भगवान के नाम और लीला ने अनंत राक्षस राक्षसी स्वभाव वालों को भगवत प्राप्त करा दिया।

भगवान का नाम भगवान से बढ़कर भगवान की लीला भगवान में आसक्त करने में सर्व समर्थ है। इसलिए खूब भगवान का नाम जप करो। भगवान की लीला गायन लीला श्रवण करो। इस पावन मनुष्य देह को अन्य जो दुष्कर्म आदि हैं, पाप कर्म आदि है, अनर्थ देने वाले उनसे बचाकर भगवान की शरण में लगाओ। शेष चर्चा आ गई। श्री राधा वल्लभ लाल

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

संबंधित