॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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अनन्यता से ही होगा सब कुछ प्राप्त ! // 26/09/26

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

हम लोग भगवान के शरणागत जन है। प्रिया लाल के शरणागत जन है। लेकिन शरणागति का रहस्य ना जानने के कारण बहुत वर्षों तक या जन्म पूरा व्यतीत होने तक हमारा जो भागवतिक आनंद है वो स्पुरित नहीं होता। हमारा भागवत आनंद क्योंकि भगवान हमारे हैं। वो आनंद हमारी निज संपत्ति है। कोई पराई नहीं। उसका कारण क्या है? अनन्यता की हानि। ये बड़े-बड़े अच्छे साधकों में दोष पाया गया। हम कामी हैं। हम क्रोधी हैं। हम दोषी हैं। लेकिन श्री जी के हैं। ये बात पक्की है। हम किसी और के आगे हाथ नहीं फैला सकते।

और से आशा नहीं कर सकते। अगर और की आशा है तो केवल नाटक है बाबागिरी का कुछ नहीं है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन पर विजय पाने के लिए हमें मार्ग में चले हैं। हो सकता है लड़ते लड़ते कहीं गिर जाए। लेकिन श्री जी के होकर गिरेंगे। अन्य के होके नहीं। ये अन्य के जो आगे सेवक जी महाराज बोले हैं देख में जोरत हाथ लटकत विषय इन के आगे देखे में जोरत हाथ लटकत केतिक आयु केतिक जीवन काहे विनाशत का झटकत अगर वास्तविक भगवत मार्ग का आनंद लेना है हम ये नहीं कह रहे कि आप निर्दोष होकर आइए आप दोष सहित आइए।

दोष रहित तो हमारे इष्ट करेंगे। दोष रहित हमारे इष्ट करेंगे। दोष और अनन्यता ये दो अलग-अलग चीज है। हम में ये दोष है लेकिन श्री जी के है। तो लाज उनको आवे और वो हमारा सुधार करें। लेकिन हम और के नहीं। हमारे गुरु जी के द्वारा लिखाया हुआ है। वह जो बोलते थे तो कभी कभी बाहर निकल कर डायरी से लिखते थे। इष्ट ही के रंग राचे इष्ट ही की कृपा जाचे। इष्ट बिना और नहीं। जाकी ही यह वासना। इष्ट ही को गावे जस इष्ट ही को भावे रस इष्ट बिना काहु की जो राखे मन आसना इष्ट ही ते पावे मान इष्ट बल बलवान इष्ट बिना चाहे मन काू को निवासना रस रूपी इष्ट धाम ताह में अटल वास याह कुसुमति कहे सुदृढ़ उपासना सुदृढ़ उपासना का स्वरूप क्या है बोले इष्ट ही के रंग राचे बाहर और भीतर राधावल भी है ये देख के आप पहचान सकते हो क्यों इष्ट ही के रंग रंग नाचे हम पूरा इष्ट का श्रृंगार किए हुए हैं [गाना गाने की आवाज़] इष्ट के दासत्व का तो अंदर भी राधा वल्लभी होना चाहिए बहुवल्लभी नहीं अंदर भी राधा वल्लभी होना चाहिए हम में दोष है।

हम इस बात की सफाई नहीं देते कि हम निर्दोष हैं। लेकिन हम श्री जी के इसमें पक्का इसमें कोई आप लंच नहीं निकाल सकते। इसमें लंच नहीं निकाल सकते। इष्ट ही की कृपा जाचे और हम पर कृपा करने आए तो हमें किसी और की कृपा की जरूरत नहीं है। किसी की कृपा की जरूरत नहीं है। हमारे गुरु और हमारे इष्ट समर्थ है। वो हमको चाहे तो महात्मा बना दे, चाहे दुरात्मा बना के छोड़े। वह दृष्टि ना दे तो हम दुरात्मा तो है ही हैं। वह दृष्टि दे दे तो हम आत्मा बन जाएंगे। इष्ट ही की कृपा जाते हैं।

हम किसी और साधक संत महात्मा पंथ संप्रदाय आचार्य सब हमारे भगवत स्वरूप सबको प्रणाम है। पर हमें कृपा अपनी लाडली और गुरुदेव की चाहिए। अपने गुरुदेव के सिवा किसी और की कृपा हमें नहीं चाहिए। बने तो रघुवर ते बने बिगड़े तो भरपूर तुलसी और ते बने ता दूर हमारा हृदय श्री जी के लिए है हम घर से किस लिए निकले पहले हमें इस बात का हमें प्रश्न का उत्तर मिले कि हम घर से किस लिए निकले हैं क्या सुन के निकले हैं क्या पाने के लिए निकले भोजन रुपया बिल्डिंग प्रणाम नमस्कार यश कीर्ति नहीं उस समय तो केवल लक्ष्य था श्री भगवान फिर बीच में क्यों फिर बीच में क्यों अन्य आश्रय इष्ट ही की कृपा किसी से किसी भी तरह हमें नहीं चाहिए भागवतिक भी हमें कृपा नहीं चाहिए

सांसारिक तो सांसारिक हमें भागवतिक भी कृपा कृपा नहीं चाहिए जो कृपा हो हमारे गुरुदेव करें हमारी लाडली जो करे तो करें ना करे तो हम पढ़े बिगड़े तो भरपूर बिगड़े तो भरपूर हमारी बातें पक्की मान लेना नहीं पछताओगे पूरा जीवन व्यर्थ चला जाएगा ये करोड़ ये अरब मरोगे तो लाद के ले जाओगे और ये आचरण ये स्वभाव तुम्हारी पक्की दुर्गति कर देगा पक्की दुर्गति कर देगा कहे हरिदास ते जीव विमुख भजे दूसरी करदारी दूसरी करारी दूसरी करदारी नहीं हमारे इष्ट से जो हमारा काम बनेगा

हमारा काम क्या है हमारा काम है रोरो कर भजन करना और प्रभु का काम है हमारे जीवन का पोषण करना हमारा केवल काम है रोरो के भजन करना प्रभु [गला साफ़ करने की आवाज़] के लिए रो और उनका रात दिन भजन करूं बोले इसीलिए तो आए हो ना कि प्रभु के लिए तड़पू प्रभु के लिए रोऊं प्रभु के लिए फिर ये बीच में क्यों बीच में क्यों है अन्य आस्त्र क्यों यहां कह रहे हैं इष्ट बिना और नहीं जाके ही वासना चार आश्रम बन जाए ये वासना नहीं है श्री जी का भजन हो जाए मिल जाए हम ये नहीं कहते श्री जी का भजन बन जाए रात दिन हमें श्री जी से मिलने की परवाह नहीं क्यों क्योंकि सिद्धांत कहता है नाम वाणी जहां श्याम श्यामा तहां नाम वाणी सुनत श्याम श्यामा सुबस नाम वाणी निकट श्याम श्यामा प्रकट तो वो तो हमारे को छोड़ेंगे ही नहीं नाम वाणी हम पकड़े हैं ना वो हमें नहीं छोड़ेंगे और छोड़ के दिखाओ तुम में बल हो तो छोड़ के दिखाओ सब बलवान भगवान है लेकिन निज जनों को छोड़ने वाले बल नहीं भगवान का श्री विट्ठलनाथ जी से गोस्वामी जी से श्रीनाथ जी की वार्ता

हुई कृष्ण दास जी ने जलेबी का भोग लगाया बाजार में ठाकुर जी पा रहे थे देखो ऐसी भावना इतने सिद्ध महापुरुष विट्ठल दास जी ने पर्दा खुला देखा जलेबी खाय जलेबी का तो भोग लगाया नहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] आप कैसे पा रहे हो उन्होंने कहा कृष्ण दास ने भोग लगाया है बाजार की जलेबी का तो बोले कृष्ण दास का तो हमने त्याग कर दिया है बोले आप आचार्य हो आप गुरु आप त्याग कर सकते हो हम नहीं त्याग कर सकते हमें सामर्थ्य नहीं कि हम शरणागत का त्याग कर सकते भगवान एक जगह कमजोर हो भगवान की कमजोरी है अनन्यता अगर आप अनन्य हो तो भगवान को कमजोर बना दोगे।

कैसे हो? यह प्रश्न नहीं उठता। अनन्य हो यह बात बनती है। हमारी बात समझ लो। हम ये प्रश्न नहीं कर रहे तुम कैसे हो? हम ये प्रश्न कर रहे तुम किनके हो? अपने इष्ट से नीचे नहीं उतरना। हमें बिकना नहीं है। हमारा जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा। घोर वैश्यागामी जब इष्ट के अनन्य हो गए तो महात्मा हो गए बिल्कुल मंगल इष्ट की अनन्यता हमें पकड़नी है हमारे में जो कमी है वो इष्ट दूर करेगा और ना दूर करो तो वैसे ही स्वीकार करना पड़ेगा जैसे हमें कोटि विप्र बदला जाहु आए शरण तजो ने ता जो नर होए चराचर द्रोही आवे सब शरण तक मोहरी तज छल कपट मोह मध माना करो स तेह साधु ये उनकी ड्यूटी है यार साधु वो बनाते हैं हम तो साधु के मार्ग में चलने के लिए कदम उठाते हैं उनकी प्रेरणा से और उन्हीं के बल से साधु बनते हैं हमारे जीवन में साधुता भगवान की कृपा से आती है इष्ट ही के गावे जस और इष्ट ही को भावे रस अपने इष्ट का यशोगान करें।

उनकी जय जयकार करें और इष्ट के रस में ही अपने मन को लगावे और भागवत का रस है गोकुल नाथ महाज वैभव लीला अनेक न चित खटाई सेवक हमारा मन हमारा मन तो बस बंसी वादन हुआ और गोपियां सर्वस्व छोड़कर जिस रस में निमग्न हुई उसी बंसी की शरण में एक रीति प्रतीति बंध मन मोह सब हरिवंश बजा हरिवंशों ने हरिवंश बंसी हरि ने बंसी बजाकर सबको मोहित किया इष्ट बिना काू की जो राखे मन आसना तो यही हम समझाना चाहते हैं इस पंक्ति को इष्ट बिना काहू की जो राखे मन आसना [गला साफ़ करने की आवाज़] इष्ट बिना किसी हम श्री जी के बल बल है।

हम किसी व्यक्ति के बल से चलते हैं। हम किसी आज तक कोई भी हमें बता दे कि किसी धनी के आगे ऐसे हाथ पता रहा हो। इष्ट का भरोसा श्री स्वामिनी जी के भरोसे ये सब चला है। किसी व्यक्ति के भरोसे नहीं चला। और जो व्यक्ति कपट करेगा छल करेगा परिणाम भुगतेगा। कागज में लिख लो। कोई भी हो तुम हो हम हो कोई हो। मोह कपट छल छिद्र ना भावा इष्ट का आश्रय छूटा तो कौन बचा सकता है माया रक के फेंक देगी इष्ट का आश्रय इष्ट का आश्रय नहीं छोड़ना है ये बिल्कुल बात अच्छे से समझ लो अगर हमारे पास बिना मांगे एक फूल आ गया तो हम ठाकुर जी को अर्पित कर देंगे कि भाई जय हो अगर हमारी कल भोजन की व्यवस्था नहीं होती तो सब मंजीरा बजाकर राधा राधा गाकर चरणामृत पीकर रहेंगे लेकिन हम किसी से यह नहीं कहेंगे आज भूखे रहे।

अगर भगवत मार्ग में चलना है तो इस बात को पक्का हृदय में बैठा लो। अगर महापुरुषों की और गुरुजनों की बात नहीं मानी जाएगी तो परिणाम इष्ट बिना काू की जो राखे मन आसना यह व्यक्ति हमारा काम बना देगा। इसको दुपट्टा पहना। हमसे पूछा गया आप दुपट्टा क्यों पहनाते हो बड़े अधिकारियों को? वह जज है। अगर वह श्रद्धा करेगा, हमारी बात मानेगा तो हजारों निर्दोषों को बखश देगा। क्या बात? अगर उसकी बुद्धि भ्रष्ट हुई तो हजारों निर्दोषों को फांसी पर चढ़ा देगा। वो वकील है। अगर उसकी बुद्धि शुद्ध हुई तो सही वकालत करके गरीब को भी बचा लेगा।

अगर हम किसी अधिकारी को, किसी पदाधिकारी को तो उसके पद का सम्मान करते हुए उसको पहनाते हैं कि तुम अपने पद पर स्थित रहकर धर्म पूर्वक चलो। हमारा उद्देश्य दूसरा है। हम गलत है। हमारा सिद्धांत गलत नहीं होगा। सिद्धांत अभी हम कहा है कि हम पर श्रद्धा करो या ना करो हमारी बात पर श्रद्धा कर लो। इष्ट ही ते पावे मान। और इष्ट बल बलवान। इष्ट के बल का अभी आपको अनुमान नहीं है। निरतन भकुटी बदन अंबुज मृदु सरस हास मधु बोलत तो अतिहासक लाल अलिम बस अखिल कोटि ब्रह्मांड जिनकी भकुट रतन मात्र से मुस्कान मात्र से अधीन हो गए वह हमारे इष्ट है राधेष्टम राधेष्टम हमारी इष्ट कौन है राधा जिनकी भकुट संचालन मात्र से अखिल ब्रह्मांडों का स्वामी अधीन हो जाता है और वो कैसा मान दिलाती हैं गरीब बाबा जी जिसके पास एक खाने के लिए टुकड़ा नहीं बीमार शरीर तो औषधि के लिए पैसा नहीं बीमार पड़े तो देने वाला कोई पानी नहीं यह ज्यादा दूरी की बात नहीं 15 साल पहले की बात है।

कोई पूछना नहीं यहां से राधा वल्लभ जी राधा वल्लभ जी से अपनी कुटिया कोई राधेश्याम नहीं कहते इष्ट हते पावे मान अब आंख खोल के आप देख लो इष्ट हितते पावे जिस व्यक्ति से कोई राधेश्याम नहीं बोलता था जैसे अकबर बादशाह ने जब ताज उतार के रखा तो तुलसीदास जी के आंसू आ गए बाद में अर्जनों ने पूछा कि सम्राट आया। इस आनंद में जब तुलसी राम का नहीं था तब कोई टुकड़े नहीं देता था। आज तुलसी राम का है तो बादशाह ताज उतार के रखता है। इष्ट ही से पावे मान। इष्ट बल बलवान। हम गरजते हैं तो इष्ट के बल से हमारे में जो बल है वो इष्ट का बल है।

हमारे को जो ये सब ये इष्ट से है। हमारे से नहीं है। ये हमारी श्री जी का चमत्कार है। ये राधा नाम का चमत्कार है। कोई प्रेमानंद को नहीं जानता। कोई प्रेमानंद को नहीं मानता। राधा नाम श्री जी का जल और हम श्री जी के हैं इसलिए ये है यह भष श्री जी का है इसी भष का सम्मान हो रहा है क्योंकि श्री जी का है श्री जी के बल बलवान श्री जी से पावे मान और एक पद में नंददास जी ने लिखा है कि हे सखी मान देने आप जैसा मान देने वाली दूसरी कोई नहीं है। कोई नहीं श्री जी जैसा आप बताओ इष्ट ही ते पावेमान इष्ट बल बलवान और इष्ट बिना चाहे मन काू को निवासना अभी मन में देखो यदि आप किसी से ₹1 लाख लेते हैं तो उसके प्रति आदर बुद्धि होती है कि नहीं महत्व बुद्धि होती है कि नहीं और जीवन में नहीं रखा धनी पुरुषों का जीवन में नहीं रखा एकांतिक में एक ने प्रश्न प्रश्न किया था कि आप धनियों से बैर क्यों मांगते हैं?

एकांतिक में प्रश्न किया था। हमारे आचार्य महापुरुष जन कहते हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] जो चारों युग के भक्त हैं। उनकी चरण वंदना करते हैं। उनसे हमारी मित्रता है। अभिमान तेरे भूत भविष्य लोक 14 में भय होए हरि प्यारे तिन सो व्यवहार हमारो अभिमान अभिमानियों का आदर नहीं अभिमानी का आदर संत जन नहीं करते। संसार में जिनका आदर होता है, संतों के दरबार में उनका आदर नहीं होता। संसार में जिनका अनादर होता है संतों के दरबार में उनका आदर होता है। दीन प्यारे वेद पुकारे द्रव सुश्री भगवान जिसको दैन्यता प्रिय है झुके हुए आ रहे हैं आंखों में आंसू साष्टांग लौट गए और अब कोई बात नहीं ये जो मतलब शास्त्री सिद्धांत है इस पर कमजोर नहीं होना हम कमजोर हैं पर इस पर कमजोर नहीं होना सिद्धांत पर कमजोर नहीं होना इष्ट बिना चाहे मन का वो निवास मन में अगर आपने किसी से भी राग किया किसी से भी कुछ लिया किसी चाह करके चाह के तो आपको उसका चिंतन होगा उसका मनन होगा उससे राग होगा और वही तुम्हारी दुर्गति का कारण बनेगा रस रूपी इष्ट धाम ताही में अटल वास की यह हमारे वृंदावन प्रिया प्रीतम का रस स्वरूप है प्रिया प्रीतम का रस स्वरूप धाम है।

यह रस रूप धाम है। बोले इसमें अटल वास करें। श्री जी का उपासक अखंड वास करे। वृंदावन को छोड़े नहीं। चाहे खंड खंड होए जाए तन अंग अंग सत टूक। वृंदावन नहीं छाड़ी हो छाड़ी वो है बड़ी चूक। हम वृंदावन नहीं छोड़ेंगे। याही को सुमति कहे सुदृढ़ उपासना। इसी को सुमति कहते हैं। इसी को सुदृढ़ उपासना कहते हैं। हरिराम व्यास जी ने एक पद में कहा जाकी है उपासना ताही की वासना और ताही को नाम रूप लीला गुण गाइए। वासना आशा अपने इष्ट से जाकी है उपासना ताही की वास यार मतलब इतना नहीं समझ में आया अभी तक कि आप शरणागत किसके हो एक मुख्यमंत्री अगर कहीं हाथ मिला ले और बैठ जाओ तो जीवन भर नहीं भूलोगे वो बात और भगवान ने तुम्हें शरणागति दी श्री जी ने तुम्हें शरणागति दी तुम भूल गए दूसरे को महान मानने लगे।

दूसरा तुम्हारा भरण पोषण करेगा। वो कह रहे हैं योगक्षम वाम्य में तुम्हें विश्वास नहीं है। ये सबसे बड़ी बात है। हमें जो भगवत विश्वास नहीं है वही हमारी दुर्गति का कारण है। चाहे संत बनो चाहे महंत बनो चाहे कुछ भी बनो। अगर भगवत आश्रय दृढ़ नहीं तो बोले वेश धारी हरि के उर साले साले माने पीड़ा देते हैं भगवान का दास कहा करके और कहावे मोर दासा करे तुच्छ नरन के आसा तो कहो कहां रहा विश्वासा कहां विश्वास रहा तो यह है अनन्य परम धर्म परिपाटी कि वृंदावन बस अनत न जाइए अनन्य धर्म जो हमारा वृंदावन उपासना है।

अब निज धर्म अपनो कहे तहा नित वृंदावन रहे तो वही तुम्हें भी रहना है। वृंदावन नहीं छोड़ना है। छोड़बो है बड़ी चूक। बोले सोई बेचारी आन कहे आन करे आन कहे आन करे वही बेचारी भक्त नहीं है। यहां व्यभचारी किसको साबित किया हरि राव व्यास जी ने आन कहे और आन करे औरों की बात कह रहा है कह कुछ रहा है कर पूछ रहा है औरों की बात कह रहा है और आचरण कर रहा है क्या अनन्यता पड़े रहो अपने अनन्य धर्म में ताको मुख देखे दारुण दुख पाए ऐसों का संग नहीं करना चाहिए बोले ऐसों का मुख देखने से दारुण दुख मिलता है हरि राम व्यास कह रहे व्यास होई उपहास त्रास किए आस अछत भारी दुख मिलेगा त्रास जो आस तुम्हारी बनी रही दूसरों से विषयों के आगे इसीलिए हरिवंश महाप्रभु ने पिंगला का स्मरण किया चतुरासी जी जैसे रस ग्रंथ में क्योंकि उसने कहा आशा ही परम दुखम नराश्यम परम सुखम आशा ही परम दुख है।

निराशा ही परम सुख है। तो कित दास कह आस अछत कित दास कहिए अगर औरों से आशा है तो कैसे तुम प्रिया [गला साफ़ करने की आवाज़] प्रीतम के दास हो कैसे प्रिया प्रीतम की शरण में हमें अपने इष्ट का भरोसा इष्ट से पालन वो कह रहे हैं योगक्षम भाव में हमारा केवल कर्तव्य अनन्य चिंतन कि वो कौन सा सुख चाहिए क्या? पर जैसे अपने मन से हम परास्त होते हैं। अपनी इंद्रियों से परास्त होते हैं। अपने बेटे से परास्त होते हैं। अपने निज जनों से परास्त होते हैं। जैसे हमारा निज मन जो कहा वही कर दिया।

इंद्रियां जो कहा वही कर दिया। शिष्य जो कहा वही कर दिया। बस यह परास्त होने का यह साथ मन इंद्रिय और भी जो संबंध है वह सब इष्ट के अनुकूल चले श्री कृष्ण अनुकूलस प्रतिकूलस विसर्जनम प्रतिकूल बात छोड़ दी जाए तो यह सबसे प्रार्थना है कि इष्ट का भरोसा रखो यार अनंत ब्रह्मांडों का स्वामी इष्ट है। श्री जी अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी की स्वामिनी है। हम किससे आस करें? किससे आस करें? आशा एक राम जी से दूरी आशा छोड़ दे। नाता एक राम जी से दूजा नाता तोड़ दे। चलो गृहस्थ नहीं छोड़ पा रहे हैं तो आप तो विरक्त हो।

आप सब तो मारो बाजी ना। इसलिए ये मिल जाए। [गला साफ़ करने की आवाज़] बिल्कुल नहीं। ये ना धन साथ जाएगा, ना मकान साथ जाएगा, ना बेटी साथ जाएगी, ना बेटा साथ जाएगा, ना पत्नी साथ जाएगी। जब जब हंसा उड़ा तो अकेला उड़ा। दुनिया में लाखों का मेला जुड़ा। हंसा जब जब उड़ा तो हमारी बात थोड़ी कड़ी भी लग सकती है। लेकिन इसको मान लेना। हम हजार बार कहा है हमको मत मानना। हमारी बात मान लेना। अगर हमारी बात मान लोगे तो निहाल हो जाओगे। भगवान ने सब कुछ दिया है। सब कुछ दिया है।

क्या नहीं है? बस अनन्यता नहीं है। यही बात अनन्यता नहीं है तो कल भूखों मरोगे। देख लेना ऐसा चक्र छाएगा माया का कि परेशान हो जाओगे। वो अनन्यता है ऊसर में बैठ जाओ तो भूखो नहीं मरोगे। ऊंची ऊंची बातों से किसी का पेट भरता नहीं। राम का भरोसा कभी भूखा मरता नहीं। भगवान का भरोसा हो, इष्ट का भरोसा हो। तो आज का सत्संग हमारी बात को समझ लो। इष्ट के भरोसे रहो। इष्ट की आशा करो। इष्ट का चिंतन करो। इष्ट के भरोसे पड़े रहो। सब ठीक हो जाएगा। सब कुछ ठीक हो जाएगा। तुम्हारे आचरण ठीक हो जाएंगे।

तुम्हारी बुद्धि ठीक हो जाएगी। तुम्हारा जीवन ठीक हो जाएगा। और इष्ट के सिवा अन्य का आश्रय लिया। फिर कहे हरिदास ते जीव विमुख जे दूसरी करारी दूसरे अभी कल ही थे। साधक वो साधना में लगे रहते हैं। तो उन्होंने रोकर का कहा कि हम आपकी आज्ञा के अनुसार ही चल रहे हैं। पर हमें ऐसा लगता है कि हम कहीं त्रुटि कर रहे हैं। हम कहा क्या? बोले आपके सानिध्य से दूर जा रहे हैं तो हमें लग रहा है हम ठीक नहीं है। और रोका कि हमें बस यही चाहिए कि आप मुस्कुरा दीजिए। आप प्रसन्न रहिए।

मुझे और कोई श्री जी और कोई भगवान और कोई मुझे ना पता है ना मैं किसी को जानना चाहता हूं आप मुस्कुरा दीजिए आप ऐसा हम आप निश्चिंत रहिए आप साधन में जो लगे हैं वो हमारी ही आज्ञा है आप लगे रहिए बस इष्ट और गुरु इसी से बेड़ा पार हो जाएगा इसी से मंगल हो जाएगा यहां का निर्माण करने हम बाबा जी बन के निकले यहां का निर्माण हृदय रूपी मंदिर निर्विकार होकर भगवान को प्रकट कर ले इसलिए बाबा तो तो पूरा जीवन हुआ जा रहा है। वो तो करने को ये निर्माण ना रहे हैं ना रहेगा। कभी कहीं महल हुआ करते थे।

आज वहां खंडहर हैं। कभी जहां जय जयकार हुआ करते थे वहां कबूतर हग रहे हैं। ये भगवान की माया नगरी इसलिए इष्ट के बल रहो। जितनी स्वासे हैं इष्ट को समर्पित करो। इष्ट हमारी बात को राग द्वेष से ना लिया जाए। हमारी बात को सिद्धांत से लिया जाए। जब हम सिद्धांत में बोलेंगे तो हो सकता है कि आपको ऐसा लगे कि कहीं पक्ष हां कहीं पक्षपात ये सार्वजनिक बात है और सबके लिए है। सब साधकों के लिए है। सब संप्रदाय के साधकों के लिए है। कोई अपने लिए ही ये बात नहीं है। क्योंकि आचार्य और गुरुजन और महापुरुषों की बात सार्वजनिक होती है।

किसी एक के लिए नहीं होती। इसलिए इष्ट के भरोसे रहो। इष्ट की आशा रखो इष्ट का चिंतन श्री राधा की जय

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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