मन पर विजय पाने के सूत्र
कल्पना कीजिए उस साधक की, जिसने वर्षों तक सत्संग सुना, गुरुदेव की वाणी को आत्मसात करने का दावा किया, लेकिन जब वासना की एक लहर उठी, तो सारा ज्ञान धरा का धरा रह गया। साधक आत्म-ग्लानि (guilt) से भरा जाता है, और अपने गुरु के सामने नजरें उठाने के योग्य भी स्वयं को नहीं पाता। ऐसा क्यों होता है?
आध्यात्मिक बल का अर्जन
घी और दूध के गुणों पर ग्रंथ लिख देने से भुजाओं में बल नहीं आता। आप घंटों बैठकर घी की शुद्धता पर प्रवचन दे सकते हैं, लेकिन शक्ति तभी मिलेगी जब आप उसे पिएंगे और डटकर ‘दंड-बैठक’ मारेंगे। शास्त्रों का अध्ययन ‘घी की चर्चा’ है, जबकि भजन करना ‘घी पीकर पसीना बहाना’ है। आध्यात्मिक शक्ति कोई उपहार नहीं है, इसे सुमिरन के श्रम से कमाना पड़ता है। यदि आप प्रतिदिन नाम-जप का अभ्यास नहीं कर रहे हैं, तो आप उस पहलवान की तरह हैं जो केवल भोजन की सूची पढ़कर अखाड़े में उतर गया है। याद रखिए, बिना भजन के केवल ज्ञान की बातें आपको माया के थपेड़ों से नहीं बचा सकतीं।
माया से निपटने की शक्ति
प्रवचन सुनने और शास्त्रों को कंठस्थ करने से आपके भीतर केवल ‘उत्तर देने की क्षमता’ आती है। आप तर्क कर सकते हैं, श्लोकों का उच्चारण सकते हैं और लोगों को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन जीवन की रणभूमि में माया से ‘निपटने की क्षमता’ केवल ‘भजन बल’ से आती है। बिना भजन बल के प्रवचन करना और सुनना, माया पर विजय प्राप्त नहीं करा सकते। प्रवचन सहायक है, नवीन उत्साह देता है, लेकिन भजन अनिवार्य है। बिना भजन के आपका ‘विश्राम स्थल’ सदैव ‘भोग’ होगा, ‘योग’ नहीं। जब तक आप अखंड सुमिरन से नहीं जुड़ते, सत्संग से निकलते ही माया आपको फिर से अपने जाल में फंसा लेगी।
जब दिग्गज भी फिसल गए
माया कोई साधारण अवरोध नहीं, यह ‘अतिशय प्रबल’ है। इस सत्य को समझने के लिए अक्रूर जी महाराज का उदाहरण एक चेतावनी की तरह है। अक्रूर जी, जिन्होंने भगवान के साक्षात दर्शन किए, जो उनके चरण-चिन्हों को देखकर प्रेमाश्रुओं में डूब जाते थे, वे भी ‘स्यमंतक मणि’ के आकर्षण में ऐसे फंसे कि प्रभु की समीपता छोड़कर मणि को कपड़े में छिपाकर भाग गए। सोचिए, जिस हृदय में साक्षात प्रभु के दर्शन की स्मृति हो, वहाँ एक पत्थर का टुकड़ा (मणि) स्थान बना लेता है। यह प्रसंग हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि सावधान करने के लिए है। यदि अक्रूर जी जैसे महाभागवत का मन क्षण भर के लिए भगवद् विस्मरण होने पर विचलित हो सकता है, तो हम और आप किस भ्रम में हैं? ‘सतत स्मरण’ के बिना फिसलन निश्चित है।
उद्देश्य परिवर्तन
अक्सर लोग अपनी बेचैनी दूर करने के लिए ‘देश’ (स्थान) बदलते हैं या ‘भेष’ (वस्त्र) बदलते हैं। लेकिन महाराज जी कहते हैं कि जब तक ‘उदेश्य परिवर्तन’ नहीं होता, तब तक शांति असंभव है। मन को केवल उपदेशों से नहीं रोका जा सकता; इसे रुकने के लिए ‘सुख’ चाहिए। जब भजन के अभ्यास से ‘निज सुख’ (आंतरिक आनंद) मिलने लगता है, तो मन विषयों से ऐसे दूर भागता है जैसे कोई ‘वमन’ (उल्टी) की ओर दोबारा नहीं देखता। जिस प्रकार खीर में जहर होने की सूचना मिलते ही आप उसे छूते भी नहीं, वैसे ही भजन का रस चखने के बाद संसार के सारे भोग ‘विष’ के समान घृणास्पद लगने लगते हैं।
मन रूपी पहलवान की गर्दन पर भजन का घुटना
मन एक ‘बलवान दुश्मन’ की तरह है। एक कुशल पहलवान अपने शत्रु को चित करने के बाद तब तक उसकी गर्दन पर अपना घुटना टिकाए रखता है, जब तक वह पूरी तरह हार न मान ले। हमारा ‘नाम-जप’ वही घुटना है। जैसे ही आपने सुमिरन का ‘घुटना’ हटाया, यह मन फिर से उछलकर आपके ऊपर चढ़ बैठेगा। यह मन भरी सभा में बैठे-बैठे भी गलत दृश्य दिखा देगा, गलत संकल्प करवा देगा। इसे काबू में रखने का एकमात्र तरीका है—’स्वाँस-स्वाँस’ पर नाम को रटना। इसे चिंतन का अवसर ही मत दीजिए।
नेत्रों का ‘सीसीटीवी’ और एकांत की रील
साधक के लिए नेत्रों का संयम सबसे अनिवार्य है। हमारी आँखें एक ऐसे ‘सीसीटीवी कैमरे’ की तरह हैं जो हर दृश्य को कैद कर लेती हैं। समस्या तब नहीं होती जब आप दुनिया के बीच होते हैं; समस्या तब होती है जब आप ‘एकांत’ में बैठते हैं। जो कुछ आपने असंयम से देखा है, एकांत में मन उसकी ‘रील’ चला देता है। वही दृश्य आपके चिंतन में बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं। इसलिए, जब तक हर कण में भगवद् दर्शन न होने लगे, अपनी दृष्टि को बहुत संभालकर रखें।
निष्कर्ष
माया पर विजय पाने का एकमात्र अचूक शस्त्र ‘नाम जप’ है। महाराज जी कहते हैं कि नाम का सुमिरन उस ‘बाज पक्षी’ की तरह है, जिसके मैदान में उतरते ही वासनाओं और विकारों के बाकी सारे छोटे पक्षी डरकर भाग जाते हैं। चारों वेद और अठारह पुराण कंठस्थ होने पर भी यदि ‘अखंड सुमिरन’ नहीं है, तो आप वहीं खड़े मिलेंगे जहाँ आपको नहीं होना चाहिए। आध्यात्मिक यात्रा में हार आपकी तभी होगी जब आप ‘भगवद् विस्मरण’ में होंगे। इसलिए, निराश न हों। यदि हजार बार भी गिरें, तो फिर से खड़े हों और नाम का आश्रय लें।
मूल लेख: bhajanmarg.com
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