अपने पापों के कारण वृंदावन से भागने की इच्छा होती है, बचा लो
श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
पवन कुमार जी राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में कोटि कोटि प्रणाम गुरुदेव गुरुदेव की कृपा होने पर मैं वृंदावन में रहकर सेवा भजन करने के लिए आया हूं पर ना जाने पूर्व जन्म कृत पाप कर्म एवं वर्तमान समय में अपराध बनने के कारण सेवा भजन बनना दूर की बात भागने की इच्छा प्रबल रूप में बन रही है कृपया वृंदावन में रहकर सेवा भजन करने की प्रबल शक्ति प्रदान करें यह पूर्व कृत पाप जो है ना वो ठीक नहीं देते ये स्थिति लाते हैं पर सह जाओ मरना है मुझे इससे ज्यादा कोई कष्ट नहीं होगा जो मन व्यथा पैदा करता है ना भागने के लिए उसको इसमें डालो मरना है मुझे वृंदावन की धूल में मरना है जय श्री भट्ट धूल धूसर तन यह आशाव ऐ मन त अब चाहे जितना जला चाहे जितना परेशान कर मैं श्रीधाम वृंदावन से जाने वाला नहीं चाहे जितना कष्ट दे मैं तन और मन दोनों के कष्टों को सहगा और भगवान के धाम को और भगवान के चिंतन को नहीं छोड़ूंगा और इसको समय मत दीजिए चिंतन करने का अन्य चिंतन करने का समय मत दीजिए आप नाम जप नहीं कर पा रहे हैं इसलिए यह दशा है
नहीं अभी ठीक हो जाएगी नाम जब पाप भी नष्ट करेगा मन को आनंद देगा जहां मन को आनंद मिलेगा तो य अच्छा लगने लगेगा और अभी प्रारंभ में एकांत बैठकर भजन की चेष्टा मत करो अधिक से अधिक दर्शन सत्संग यह सुनना कहीं भक्त माल हो रही कहीं भागवत हो रहा है कहीं सत्संग इसे इसे जवाइन करो अधिक से अधिक सत्संग सुनो और एक नियमावली बनाओ राधा रमण जी के दर्शन निधिवन के दर्शन बाके बिहारी के दर्शन राधा वल्लभ जी के दर्शन घंटा दो घंटा दर्शन में चले गए दो-तीन घंटा सत्संग में चले गए शेष समय एकांत में शास्त्र का स्वाध्याय कर रहे हैं नाम जप कर रहे हैं एक घंटा नाम कीर्तन कर रहे हैं मन की सुनो मत अपनी सुनाओ धीरे-धीरे वो अभ्यास योग युक्त चेत सा नान्य गामिन वो फिर अन्यत्र नहीं जाएगा ये पाप है जो भगाना चाहते हैं इनको भस्म करो भगवन नाम कीर्तन से भगवन नाम जप से नाम संकीर्तन यस्य सर्व पाप प्रणाश सारे पापों का नाश भगवन नाम कीर्तन से हो जाता है भगवत कथा यहां से भाग के कहां जाओगे नरक ही ले जाने वाली बातें हैं पाय रतन चीनो नहीं दिन
करते डार यह माया श्री कृष्ण की मोह सब संसार बड़े आपकी बात सुनकर बड़ी भयावह बात लगती है इतना बड़ा बढ़िया अवसर बन गया देखो कैसे जीव को मन परास्त करता है भागना नहीं क्यों इसलिए आपके शरण में आया नहीं भागना नहीं मर चाए जाए भागना नहीं कृपा बनी रहे मेरे ऊ परर भागना नहीं बस एक नियम ले लो प्रबल शक्ति दीजिए मेरे शक्ति है आप केवल स्वीकार करो भागना नहीं मरना ठीक है भागना नहीं ठीक है नहीं तो फिर संसार के सब रिश्ते दाते संबंध इतने प्राण प्यारे लगने लगते हैं कि
वृंदावन काटने को दौड़ेगा लगे भाग चलो संसार में ऐसा लगता है ना भागना नहीं ये मन है यही बहुत जन्मों से भगवान से दूर रखा है आज अवसर मिल गया भगवत धाम भगवत जनों के बीच में रहने का धाम में वास का मतलब अपने आप एक भजन है धाम वास भी अपने आप में समर्थ भजन है शरीर छूटने पर कल्याण हो जाता है मंगल हो जाता है भगवत प्राप्ति हो जाती है तो इसलिए य रेण पर मर्बो मंगल है कुछ नियम बनाओ नाम जप का नियम लिए हो नाम जप का नियम जाप हां नियम से जाप नियम से रामायण का पाठ लंबा नियम बनाओ भगवन नाम लेखन भी कर रहा हूं भगवन नाम लेखन भी कर रहा हूं हां लेखन नाम जाप भी कर रहा हूं माल पाठ भी कर रहा हूं बस रखल खींच दो नहीं जाना लक्ष्मण रेखा खींच दो नहीं जाना ठीक है और आश्रम में भी जो है सो हमें बहुत दिक्कत हो रहा है रहने में तो जीवन भर गृहस्थ में रहे हो क्या जी मराज जी दिसंबर से पहले कह रहे हैं दिसंबर तक पिछले छ सात महीने पहले तक हां तो इसीलिए आश्रम में तुम विघ्न लग रहा है अरे भैया फुटपाथ भी विघ्न नहीं लगता जब भगवान से
प्यार होता है ना तो पूरी जिंदगी ऐसे ही गई है पूरी जिंदगी ऐसे काशी के घाटों में गंगा के किनारे या टूटे हुए मंदिर में या वृक्ष के नीचे कई-कई दिन भोजन नहीं मिला लेकिन कभी ये थोड़ी है कि चलो घर चलते हैं बचपन से लेकर अभी तक भगवान के मार्ग अभी भगवान से अपनापन नहीं हुआ इसलिए आश्रम में भी विक्षेप लगता है मना ही है सब विक्षेप का कारण इसी को मारो कहीं भागने की जरूरत नहीं है सब संतों को पवाओ उनके बाद जूठन पाओ उनके पत्तल फेंको उनके चरण जहां पड़े हो उसको ऐसे लेकर चरणा में अभी बुद्धि शुद्ध हो जाए ज्यादा मन के चक्कर में मत पो उहे भगा देगा बहुत परेशान करता है ठीक है मस्त रहो एकदम हा आज से मस्त रहो एकदम ये स्वीकार कर लो कि आज वो तो बहुत कृपालु है भगवान उमा राम स्वभाव जेही जाना ताही भजन तजी भावना ना जन अवगुण प्रभु मान न का दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ करुणा कर दी अपने जनों के अवगुण नहीं देखते प्रभु बहुत कृपाल मस्त एकदम बेपरवाह शरणागति के बल पर जो मिले जूठन पाओ प्रभु के गुण गाओ परे रहो मस्त कहां जाना है वाक्य
भाग प्रभु के धाम में प्रभु के हा प्रभु की शरण में मस्त रहो प्रतिकूलता है तुम्हा किसको प्रतिकूलता अनुकूलता मन को आती है कोई प्रतिकूलता नहीं कोई अनुकूलता नहीं ये अनुकूलता प्रतिकूलता दोनों खेल मन के हैं और मन से हमें कोई संबंध नहीं रखना तो वो हमारे अधीन हो जाएगा और मन से हम ममता रखेंगे तो हमको अधीन कर लेगा यम हीन व्थ पुरुषम पुरुष सव सम दुखा सुखा धरम सोम तत्वा कल्प ये मन व्यथा ही तो पैदा करता है जो उस व्यथा से व्यथित नहीं होता गंभीर शांत रहता है वही अमृत पद का अधिकारी हो जाता है खूब नाम जप करो अनुकूलता प्रतिकूलता एक स्वप्न है यह सत्य नहीं है ना सतो विद्यते भाव ना भाव विद्यते सता य असत की सत्ता नहीं सत का अभाव नहीं काय का अनुकूलता प्रतिकूलता ऐसे झाड़ू मारी विवेक की एक मिनट में वि विवेक सब साफ कर दिया अनुकूलता प्रतिकूलता राम राम राम सियाराम सियाराम जपो मस्त रहो अरे कितना मस्त मार्ग है भगवान के भरोसे बैठ जाओ तो सारी जिम्मेवारी वो ले लेते हैं अभी परेशान हो मन के कारण परेशान हो आनंदित मस्त रहो
एकम हरि गुरु का प्रबल आश्रय लेकर पड़े रहो ब मन को जो कष्ट दे रहा है व्यथा दे रहा है सह जाओ देखो यह बेईमान मन अनंत जन्मों से भगवान से विमुख रखा अब विमुख ताय ना लाने पावे बस ऐसा रखो मस्त रहो भंडारा खाते हो क्या जा जा करके सब जगह नहीं जाता हां ना जाना हां क्योंकि सब जगह का भोजन पवित्र नहीं होता है कहीं कहीं भगवत भाव से संतों को पवाया जाता है प्राया सकाम या किसी अनर्थ निवृत्ति के लिए पवाया जाता वो बहुत बुद्धि खराब कर देता है तो बस संतों के पाने के बाद जूठन पाना जब संत पा जाए तब जूठन पाना और खूब उनकी सेवा करो नाम जप करो बढिया आनंदित रहोगे मस्त रहो ठीक है संतों के संभाषण से मन का शांत होना निश्चित है ये बात समझ लेना इसलिए मेरे मन में प्रेरणा जगी जो कि आपके शरण में आने की आप आप से शरण में तो आप है हो हम लोग दोस्त की तरह बात करते हैं मित्र की तरह बात करते हैं गुरुदेव की कृपा भी बरकरार रहे हम कह रहे संतो की जो ठन पाओगे संतों की सेवा करोगे गुरु प्रसन्न साधु सेवा से गुरुदेव और इष्ट दोनों प्रसन्न
होते हैं हा गुरु सोई जो साधु से वावे साधु सोई जो विषय छुड़ाए विषयों का त्याग करवा दे भाई साधु और जो संतों से प्रेम करवा दे भाई गुरु और इन दोनों का फल है भगवान से प्रेम साधु सेवा विषय त्याग इसका फल भगवत प्रेम खूब आनंदित मस्त रया काहे को मन की चिंता में फसे हो मस्त एकदम रघुनाथ जी के सहारे एकदम हो जाओ जबान से नाम जप करो हृदय से भगवान का भरोसा पड़े हैं एकदम निश्चिंत
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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