॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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ताज़ा

इन्द्रियों पर कैसे विजय प्राप्त करें ? काम , क्रोध , लोभ , मोह आदि कैसें फँसाते हैं और बचता कौन है ?

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

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राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदा पा वनेश्वर तव पदारविंदम प्रेमा मृतक मकरंद रसो पूर्णम हद मधुपति स्मर ताप मुगम निर्वा पय परम शीतल मा शयाम निर्वा पय परम शीतल मा श्रय हो प्यारी यह मांगे जूद जय हो लाड़ली यह मांगे दी जय नित पद लगयो रहे अनुरागे ऐ सो मो मन की जय ऐ सो मोमन की जय हो लाड़ली यह मांगे जू दीजे मैं जो चहत तोही भेट चढ़ाव सो बर बस अब लीजे हो हरत निज तन मन जीवन जीत आ अपनी की जय हो हरत निज तन मन जीवन जीति आपनी की जय हो प्यारी हो

लाड़ली यह मांगे जू दी जय हे प्रिया जू हे लाडली जू आपसे एक बार एक बार इस बात को पूर्ण कराना चाहती हू यह बात मेरी पूर्ण कर दो यह मांग मेरी पूर्ण कर दो क्या रात दिन विकल होकर के मेरा मन आपके अनुराग में स्मृति में सेवा में चिंतन में डूबा रहे मैं बहुत हार गया हूं बार-बार प्रयास करता हूं पर यह मन आपके चरणों में ना लग करके विषय भोगों में जा रहा है संसार में जा रहा है सुख दुख में जा रहा है हे मानिनी मान जाओ हे लाड़ली कृपा कर दो यह मेरा तन मन जीवन आप जबरदस्ती स्वीकार कर लो क्योंकि मैं तैयार करना चाहता हूं आपकी भेट चढ़ाना चाहता हूं मैं जो चहत तोही भेट चढ़ाव पर आपके योग्य ना तन है ना मन है ना हमारा जीवन है सब अपवित्र है पतित है ऐसा होने पर भी आप स्वीकार करने के लिए राजी है पर देने के लिए मेरा मन राजी नहीं अपना आधिपत्य बनाए रख रहा है शरीर पर अपने पर यह मन अपना संकल्प विकल्प नहीं छोड़ रहा आपकी अधीनता नहीं स्वीकार कर रहा तो बरबस लीज अब आप अपनी सामर्थ्य से मेरे मन को मेरे प्राणों को मेरे जीवन को

मेरे तन को आप अपने शरणागति में स्वीकार कर लीजिए हे किशोरी जू हो हरत निज तन मन जीवन जीत आपने की आप विजय को प्राप्त हो और मेरा तन मन सर्वस्व आपके चरणों में समर्पित हो भोरी हित पद कंज छटा की आशा धरी धरी जी जय पद कंज छटा की आशा धरी धरी जी जय हो ला यह मांगे जू दी जय भुरी सखी कहते उपासक रात दिन प्यारी ू की कृपा की बाट जो हो और उनके चरणों का आश्रय लेकर नाम जप करते हुए जीवन तीत करो इसी आशा में किसी न किसी दिन किशोरी ज अपने नाम की पुकार सुन कर के हमारे समस्त दुख दंद को मिटा कर अपने श्री चरणों की समीप प्रदान करेंगी इस संसार में और कोई नहीं है कि हमको सुख प्रदान कर सके अगर कोई हमसे प्यार करता है प्रेम का स्वांग रचता है तो कुछ हमारे पास है जो उसे दिखाई दे रहा है उसके लेने के लिए व प्यार का स्वांग रच रहा है वस्तुत अतु की प्यार तो केवल भगवान और भगवान के स्वरूप संत जन करते हैं प्रेमी जन करते इसलिए हे लाडली आप मुझे यह मांगे दीजिए कि मेरा मन अनुरागी होकर रात दिन केवल आपके चरणों का चिंतन करें श्रीपाद

प्रबोधा अंद सरस्वती जी महाराज कृपा करके कह रहे हैं नित्य शृंखल कारु वृंदा अधम पहम किम विनम निव्या वे चर समम हरे हे हरि आपकी असीम कृपा से मुझे वृंदावन आने को मिला वृंदावन में कुछ समय रहने को मिलाय बड़ी दुर्लभ बात है अहो भाग्य है जिनका वृंदावन में वृंदावन शवरी के लिए वास कर रहे हैं अन्य भावनाओं से अन्य लाभों के लिए कर रहे वो तो धन्यवाद है ही क्योंकि धाम में किसी भी प्रकार से वास करें धाम अपने प्रभाव से उनको सुख प्रदान करता है कल्पतरु है जो चाहोगे मिलेगा लेकिन धन्या धन्य वो है धन्य धन्य धन्य तेई ज इनके उपास है जो वृंदावन धाम में वृंदावन वृंदावना देश्वर श्री लाली लाल के लिए जीवन अर्पित करके वास कर रहे हैं धन्य है उनका जीवन श्रीपाद कह रहे हैं आपकी हे हरि असीम कृपा से मुझे धाम आने को मिला धाम वास मिला पर नित्य श्रृंखल यह मेरी इंद्रिया मन बड़ा विघ्न पहुंचा रहे धाम वास में यह बड़ा उ श्रृंखल है हमारा अंतःकरण हमारी इंद्रियां य एक क्षण में न जाने कहां से कहां छलांग लगाती रहती है अभी वृंदा वन में

थोड़ी देर भारत में थोड़ी देर विदेश कहां कहा मन घूमता रहता है प्रभु बड़ा विघ्न कारी है अंतःकरण बड़ा विघ्न धारण करने की क्षमता रखती है इंद्रिया लाख समझाओ पर वो विघ्न में ही ऐसा नहीं विघ्न का त्याग करके शांत हो जाए बड़ी क्षमता है इनमें रोज प्रायश्चित रोज पश्चाताप रोज जलन फिर भी उसी गलत मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं हे हरि कारु मैं बहुत दिन हो गया हूं इन उ श्रृंखल इंद्रियों की भोग विलास से उब गया बहुत गंदी है इंद्रिया बहुत गंदी इनकी विलासिता अगर छूट दे दो फिर देखो य कितनी गंदी है वही मल मूत्र के भांड शरीर में राख करके बस कैसे वर्णन करें बहुत गंदे हैं चराचर जगत इसी इंद्रियों की विलास में फंसा हुआ है जिसे देख कर के बमन हो जाए ऐसे पदार्थों को खाना जो बड़े अपवित्र स्थान ऐसे स्थानों में आसक्ति कर लेना य उत् शृंखल इंद्रियों की विलासिता बड़े विद्वान बड़े बुद्धिमान हम बनते हैं लेकिन हमारी इंद्रिया हमारा मन उसी गंदे स्थान पर वही घृणित पदार्थों में वही त्याज भोगों में में हे हरि बड़ा अधम हू बड़ा असमर्थ

हो गया हूं नित्य शृंखल कारण वृंदा अधम उपहम अहम अधम मैं बड़ा अधम हूं किम विघ्न निवम क्या मेरे य परमार्थ के विघ्न कभी हट पाएंगे वेद स्यामी च रसम हरे मैं हरि रस में ूब जाऊ मेरी इंद्रिया शांत हो गई मन शांत हो गया ऐसा कभी मेरे जीवन में होगा पाच मिनट कभी अगर यह स्वाद मिलेगा तो सच्ची मानो जैसा नारायण स्वामी ने कहा है ब्रह्मादेवी आ गए और सामने रूप झलक रहा शांत इंद्री मन यह स्वाद आपको फिर जिंदगी में नहीं भटकने देगा सात सा तरसा लोकांता लेकिन एक बार भावनात्मक झांकी भी प्रभु की आ गई और मन चित्त शांत हो गया तो यह स्वाद जिंदगी में नहीं भटकने देगा जैसे देवर्षि नारद जी एक उत्तम कुल के यहां उनकी मां दा सत्व का काम करती थी थी उनके ये पुत्र थे तो चार महीने के लिए जैसे अब चतुर्मास चल रहा है इस चातुर्य मास में बहुत से संत जन उसके यहां चातुर्मास करने के लिए टिके हुए थे तो बालक थे सेवा में लगा दिया चलो संतो क्योंकि मां दासी थी घर का कार्य तो बालक को आदेश कर दिया सेवा में लगाओ चार महीने संतों की सेवा

संतों के मुख से भगवत चर्चा होती उसे सुनना संतों के पात्र मार्जन की सेवा मिली थी तो धोते हुए जो जूठन निकलती वो पहले सब पात्रों से धोकर जूठन एकत्रित कर लेते और बाद में उस जूठन को पान करते संत उच्छिष्ट मृत संत सेवा संत वचनामृत इतना प्रभाव पड़ा कि चार महीने में संसार बिल्कुल असत दिखाई देने लगा जो असत है उमा काहो में अनुभव ना सत हरि भजन जगत सब सपना स्वप्न की तरह सत संसार जो भास रहा था जिसकी सत्ता ही नहीं बाल्यावस्था में संत सेवा का प्रताप उदय हुआ जूठन

का प्रताप उदय हुआ सत्संग श्रवण का प्रताप उदय हुआ कि पूरा संसार झूठा लगने लगा अब मां भी बंधन काक लगने लगी कि यह मोह जाल में फंसी हुई मां मुझे छोड़ेगी नहीं और मुझे भगवत दर्शन करना है कुछ ही समय में संयोग बना कि किसी कार्य हेतु जा रही थी और उसकी सर्प ने डस लिया मां को मां पधार गई बड़े खुश हुए भगवान का विधान बड़ा मंगलकारी होता है चल पड़े बहुत एकांत जंगल में सुंदर सरोवर देखा पीपल का बड़ा वृक्ष देखा मीठा जल पान किया स्नान किया और बैठ गए और जैसे संतों के मुख से भगवान की रूप माधुरी सुनी थी ध्यान करने लगे अचानक ध्यान लग गया कुछ क्षण भगवान की रूप माधुरी में ध्यान स्थ अब तो अशुभ प्रवाह आनंद में डूब ही रहे थे कि भगवान अंतर ध्यान हो गए ये ध्यान का विषय जो हमने कहा पाच मिनट भी यदि कभी भावनात्मक झांकी में आप का इंद्रिय मन शांत होकर लग जाए तो जिंदगी में नहीं छोड़ सकते आप कभी भगवान का स्मरण जि में चाहे भी तो नहीं छोड़ पाएंगे अब जोही ध्यान टूटा विकल हो गए देवर्ष नारद जी अपनी पूर्व जन्म की कथा भगवान श्री

कृष्ण दन वेदव्यास जी को सुना रहे अब हा हरि हा हरि अब तो जैसे प्यासा व्याकुल घूमे ऐसे विकल हो गए तब आकाशवाणी हुई बालक अध कचरे योगी को मेरा साक्षात दर्शन नहीं होता अध कचरे योगी को मेरा साक्षात दर्शन नहीं होता अब तुम यह जो अभी झांकी देखे थे यह मैंने इसलिए दिखाया कि तुम्हारा मन आकृष्ट हो जाए अब तुम इसी का चिंतन करो और नाम जप करते हुए मेरे पूर्ण प्राप्ति के लिए शरीर का निर्वाह करो और जब शरीर छूटेगा तो तुम साक्षात मेरा दर्शन पाओगे और फिर इसके बाद जब तुम चाहोगे तब मेरा दर्शन पाओगे शरीर छूटने की बात जोने लगे नाम जप करते हुए शरीर छूटा भगवत देवर श नारद जी के रूप में वही अवतरित हुए जब नारायण को पुकारते तो सामने भगवान नारायण अरे मानसिक भगवान की झांकी एक बार आ जाएगी तो नेत्र घूर्ण हो जाएंगे चित्तवृत्ति सदा सदा के लिए चित चोर के चरणों में अर्पित हो जाएगी चाह करर भी नहीं चर्चा छोड़ सकते स्मरण छोड़ सकते सेवा छोड़ नहीं चाहकर भी नहीं छोड़ सकते आप चाहो भी तो नहीं गोपी जन क अच्छा भ रे तू लौटकर फिर मेरे

चरणों में पड़ रहा है कुछ कहना चाहता है हां क्या कहना चाहता नहीं रहने दे तू जैसे तू चाटुकारिता करता है ऐसे तेरे स्वामी करते हैं तू ऐसा ही है चलो उनको जब मेरे बिना समय कट जाता है तो आज से मैं भी उनकी चर्चा नहीं करूंगी याद नहीं और विकल होकर रोने लगी नहीं नहीं नहीं मैं ऐसे जी नहीं सकती उनकी चर्चा के बिना जी नहीं सकती उनके चिंतन के बिना नहीं जी सकती भरे वो तो मेरा जीवन है उनका चिंतन उनका स्मरण चाह कर भी नहीं छोड़ सकती एक बार मनोभाव से युक्त भगवान की झांकी का एक बार बस यही रोज पहले पद में जो भोरी सखी का रोना है इसी बात का प्यारी जो आप अपनी तरफ से मेरे मन बुद्धि को ले लीजिए एक झाकी श्रीपाद कह रहे नित्य श्रृंखल यह उ श्रृंखल इंद्रिया यह चंचल मन यह हमारी दैन्य भोगों के लिए कि हमें यह भोग मिल ये भागवत दनता नहीं यह कारु भागवत नहीं है यह विषय है अधम प्यम मैं ऐसा अधम हं जानता हूं हे प्रभु कैसे मैं हरि रस में डूबू कि विघ्न निव स्याम वेद स्याम च रसम हरे हे हरि मेरे य विघ्न कैसे नष्ट हो कि मेरी सारी

इंद्रियां शांत हो जाएं मन अचं चल हो जाए और हम भगवत रस में डूब जाएं श्रीपाद प्रबोधनंद जी महाराज खुद उत्तर दे रहे हैं पहले तो प्रश्न किया कि उ श्रृंखल इंद्रिया विषयों के लिए दैन्य मैं अधम हूं कैसे हरिरस में डूबू फिर वही उत्तर दे रहे मानो हरि उन्हीं के श्री मुख से उत्तर दिला रहे हैं बिना स्वात्मा रामेश्वर हरि मुग्ध त्रिभुवन युवत्यादि व बहुत ध्यान देने होगी बना स्वात्मा रामेश्वर हरि मुग्ध त्रि भवन युवत्यादि स्थित तस्मा तस चकित चक तो दूर तर तः सदा बंधारण निवसरकर इंद्रिया य भोगों के लिए घघ आना भिखारी पना बड़े बड़े भिखारी हैं सच्ची बात मानना सबसे बड़ा बात भगवान का दास जिसके अंदर कोई चाह नहीं जाहि न चाही कबहु कछ इससे बड़ी कोई स्थिति नहीं उसी को संस्कृत में भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी बोल रहे हैं ब्रह्म भूता प्रसन्ना आत्मा न सोचती न कांति समा सर्वेश भूते सु मद भक्ति लभते पराम परम लाभ ना कोई चाह ना कोई चिंता ना कोई फिकर चाह मिटी चिंता मिटी मनुआ बेपरवाह सुन लिया गा लेकिन चाह मिटा देना चिंता मिटा

देना मनुवा भगवत चरणारविंद के आधार पर बेपरवाह हो गया आधार उसका श्री भगवान है अभी मन का आधार भोग है जगत है फ श्री भगवान हो जाए बिना स्वात्मा रामेश्वर हरिम बिना हरि की कृपा के हरि की शरण के हरि के भजन के ये नित्य उ श्रृंखल इंद्रिया शांत नहीं हो सकती सीधा उत्तर है कुछ भी कर लो कुछ भी हरि बहुत करुणामय जब कोई साधक परमार्थ में चलता है तो हरि की कृपा से ही चलता है उसकी यात्रा जो पूरी होती है वो हरि की कृपा से होती है फिर उसको विघ्न क्यों मिलते हैं क्योंकि वो अहंकारी ये समझ नहीं पा रहा कि हरि की कृपा से चल रहा हूं हरि की कृपा से चला हूं हरि की कृपा से चल रहा हूं वह समझ नहीं पाता उसके अंदर एक अहम रहता है मैं साधना कर रहा हूं मैं बहुत साध फिर उसका प्रश्न हो जाता है और उस प्रश्न में वो हार जाता है जब तक सिद्धावना ना आ जाए विषयों पर विजय प्राप्त ना हो जाए तब तक साधक को व्यवहार स्वीकार नहीं करना चाहिए अभी दो-तीन दिन के ही सत्संग में पीछे देखिए चर्चा हुई थी कि ये चार बातें हो तो दूसरों का कल्याण

कर सकता है उपदेश देने का अधिकार है पहले शास्त्री सिद्धांतों का पूर्ण ज्ञान दूसरा शास्त्री सिद्धांतों का पूर्ण चल कर के अनुभव जो तुम बोल रहे हो उस पर तुम तीसरा सिद्धावत लोभ मोह मद मत्सर इनका किसी भी तरह तुम्हारे ऊपर अधिकार ना हो चुका हो और चौथा सम में भगवान का भाव अब निकलो जगत मंगल के लिए कहीं कुछ बाधा ही नहीं जब बहुत प्रियता जन समुदाय से स्वीकार कर ली जाती तो उनमें कुछ खास जन हो जाते हैं और विवेकी वही है कि पूरा जीवन निकल जाए ना कोई खास ना खवास सब खास कोई खास नहीं हमारी केवल एक वृत्ति भगवता का हमारे प्रभु दूसरा कोई यह पर्सनल है वहीं से पतन शुरू हो जाता है श्री ठाकुर जी के सिवा लाडली जी के सिवा हमारा कोई नहीं मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो ना कोई और पूरे संसार से व्यवहार करे क नहीं फस और जहां दूसरो कोई मेरा खास वही मार देगा वही गिरा देगा पूरे जीवन का संतो का अनुभव होता है पूज्य पाद श्री उड़िया बाबा जी महाराज के वचन ब्रहस्पति के समान ज्ञानी और धर्मात्मा और उच्च पद में विराजमान हो तो भी विरक्त

को एक जगह से कई दिन भोजन नहीं लेना चाहिए ब्रास पथ के समान पांच घरों से या अचानक कोई भाई एक दिन दे दिया वो भी निषेध है पर आप ले एक दिन चला पा लिया ठीक है दोबारा दो चार महीने बाद कभी ऐसा निमंत्रण सिद्ध पुरुष पर कोई अंकुश नहीं है य साधक की बात है क्योंकि पूज्य स्वामी श्री ओंकारानंद सरस्वती जी महाराज जब वयोवृद्ध हो गए तो एक गृहस्थ अपने घर ले गए और पिता की तरह उनका दुलार आजीवन जो भी दो चार छ वर्ष शरीर रहा जो परिपक्व महा अवस्था को प्राप्त है कोई सेवा करे कोई कुछ करे कोई 95 वर्ष की अवस्था और ब्रह्मा का वृत्ति धन्य है वो गृहस्थ जो उनकी से गंगा किनारे रहते थे आखरी में उठा ले कह रहे विना स्वात्मा रामेश्वरम हरि मुग्ध त्रिभुवन चैलेंज है त्रिभुवन त्रिभुवन में कोई ऐसा नहीं जिसको यह माया विघ्न ना डाल दे एकमात्र भगवान श्री हरि की शरण में भगवान के चरणारविंद का आश्रय लेकर नाम जप कर विना स्वात्मा रामेश्वर हरि मुग्ध त्रिभुवन युवत्यादि श्रेष्ठ हो मुनिवर युव भाव भगवान की मोहिनी माया जब मोहित करने के ठान ले

तो चाहे सरवर देवताओं में श्रेष्ठ हो या मुनिवर मुनियों में श्रेष्ठ हो व मोहित कर लेगी ही बचाना है तो हरि ही बचा पाएंगे दूसरा कोई नहीं बचा सकता स्थित तस्मा तस चकित चक तो दूरत रत बड़ा आश्चर्य का विषय है कि जब पता है कि यह हमारे मार्ग में विघ्न है हमें भगवान से विमुख फिर चकित चकित आश्चर्य है आ आश्चर्य जानता हुआ भी वह विघ्न को ही अमृत स्वीकार कर रहा है जा सो सु भट समर्थ पायरन रार ना मंडई जाय सो जति कहाय विषय वासना न छंडे जाए धनुक बिनु दान जाय निर्धन बिनु धर्म जाए सो पंडित प पुराण जो रतन सके सुक मही सुत जाए मात पितु भक्ति बिनु ति सो जाए ज पति नहित सब जाय दास तुलसी कहे जो न राम पद नेह नित सब जाए दास तुलसी कहे जोन राम पद नेनी समर्थ वीर कौन है जब वीर से योद्धा से अवसर पड़े और फिर वहां बात नहीं अपनी वीरता दिखावे उसे वीर कहते हैं वही बात करे कि जाए सो जति कहाय विषय वासना न छंडे प्रवचन बहुत बढ़िया दे लेते हो बहुत बढ़िया ज्ञान है लेकिन जब काम क्रोध लोभ मोह मद शूरवीर ने ताल ठोकी तो मुह भरा गिर गए तो

कहा के तुम योद्धा काहे के जति काहे के बैरागी काहे कि तुम साधक का है कि साधु सन्यासी विरक्त वैष्णव भगवत मार्ग का पथिक कहला कर के वासना पर विजय नहीं प्राप्त की काम क्रोध पर विजय नहीं प्राप्त की तो तुम्हारा व्यर्थ है वैराग्य धारण करना जैसे शूरवीर बड़ी-बड़ी डींगे हागता नहीं है वह वीरता करके दिखाता है और कायर घर में बैठ के डिंग हागता है जब वीरता की बात आती है तो भाग पड़ता है तो बैराग्य की केवल बात कर लेना प्रवचन कर लेना या प्रवचन सुन लेना यह कोई विरक्त नहीं है विरक्त है जब काम क्रोध का आक्रमण हो उस समय शांत भाव से इसी दिन के लिए तो यह पढ़ा था इसी दिन के लिए तो सुना था इसी दिन के लिए तो हम सत्संग एकत्रित किए हैं कि हमको कौन सा बाण क्या मार करके कौन से विषय विकार को नष्ट करना है क्रोध आया शांत मेरे भजन को करने के लिए सामने माया रचना रच रही है नहीं ऐसा नहीं तो फिर मेरे भगवान मेरे सामने है दूसरा कोई नहीं मुझे सहन ही करना कितने बाण सामने हैं बारबार व विचार के द्वारा उसको शांत कर देता है एक

सूत्र नहीं दूसरा सूत्र दूसरा सूत्र नहीं तीसरा सूत्र मेरा प्रारब्ध क्षय हो रहा है कई बातें एक साथ विचार में लाकर क्रोध को शांत कर लिया काम को शांत कर इसीलिए तो ज्ञान है ज्ञान दूस को सुनाने के लिए नहीं गोस्वामी जी कह रहे वो विरक्त भगवत मार्ग का पथिक वो वैष्णव भगत भगत नहीं जो ज्ञान दूसरों को बारता है जब अवसर आया अपने पर विजय प्राप्त करने के लिए तो फैल गिरा किस बात का शूरवीर किस बात का वह योद्धा जिसके पास खूब धन है और वह दान नहीं करता दूसरों को सुख नहीं पहुंचाता व धर्मा चरण श व व्यर्थ हो जाता नष्ट हो जाता है जो बहुत शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कि बहुत पंडित है पुराण पढ़े हुए हैं लेकिन वह धर्म के विरुद्ध आचरण करता नष्ट हो जाता है जो माता-पिता वयोवृद्ध हो गए कुछ करने लायक नहीं रह गए उनकी समर्थ पुत्र सेवा नहीं करता वोह नष्ट हो जाता है जो अपने पति को भगवान का साक्षात स्वरूप मान कर के आराधना नहीं करती व पत्नी नष्ट हो जाती है जो अपनी पत्नी पर अर्धांग की भावना ना करके इधर उधर वृति ले जाता वह पति

नष्ट हो जाता है गोस्वामी जी कहते हैं जो उसने भगवान का भजन नहीं किया वह कोई भी हो सब प्रकार से नष्ट हो जाएगा सब प्रकार से अंत तो गत्वा वो नष्ट ही हो जाएगा कोन क्रोध निर्द काम बस केही नहीं कीन कोन लोभ दृढ फंद बांध त्रासन करी दनो कौन हृदय नहीं लाग कठिन अति नारी नयन सर लोचन जुत नहीं अं भयो श्री पाई कौन नर सुर नाग लोक महि मंडल हो को जो मोह कीन हो जयना क तुलसीदास सो बरे ही राख राम राजीव नयन कमल नेत्र भगवान श्री कृष्ण श्री हरि श्री राम जिसको रख लिए वही बच पाया कोन क्रोध निर्द किसको क्रोध नहीं जला देगा एक छोड़कर जिसको भगवान का दृढ़ भरोसा और भजन में दृढ़ स्थिति है क्रोध खाली कर देता है बहुत भजन का आनंद उमगया हो किसी पर क्रोध कर लो फिर देखो आप कितने घंटे खाली रहते हो भजन करने पर भी शुष्क कोई आनंद नहीं कोई सुख नहीं मिलेगा क्रोध तत्काल तप भजन के जो फल है उनको क्षीण कर देता है क्रोध बहुत हानिकारक है क्रोध नहीं करना चाहिए क्रोध आता क्यों है द्वेष पर द्वेष होता क्यों है राग से किसी वस्तु व्यक्ति स्थान

में जब राग होता है और वो हमें प्रतिकूलता देता है तो हम अंदर हमारे द्वेष आत्मक क्रोध आ जाता है क्रोध की उत्पत्ति राग से होती है राग रजोगुण से होता है रजोगुण में ही कामवास करता है कामा सं जायते क्रोधा कामना की अपूर्ति में क्रोध का तो कामना रजोगुण से रजोगुण से राग और राग से ही द्वेष का प्रादुर्भाव होता है जब हम जिस पर राग करते हैं उससे प्रतिकूल हुआ कामना हमारी पूर्ति नहीं होती तो हमें क्रोध आ जाता है इसमें हमारी त्रुटि है कई तरह से जैसे हम चाहते हैं

कि हमें गाली ना दे पर गाली दे हम क्यों चाहे कि हमें गाली ना दे नहीं हमारे प्रभु की इच्छा है कि गाली दे तो हम मौज से गाली दे तुम दो हम सुनेंगे हम सुनेंगे क्योंकि मेरा कोई प्रारब्ध है या मेरे प्रभु ही मेरे हृदय को मजबूत कर रहे हैं कई बार यह प्रश्न साधकों के हृदय में उठता है कि भगवान ऐसा क्यों करते हैं भगवान ऐसा क्यों करते हैं भैया एक कंकड़ उठाओ और शीशे पर ऐसे मारो पूरा ढेर हो जाएगा और गोली मारने पर भी ढेर नहीं होता वही शीशा है जिसको गर्म ठंडा गर्म ठंडा करते करते बुलेट प्रूफ बना दिया नहीं बना दिया गोली मारो तो नहीं लगता शीसा ही तो होता है तो भगवान अपने भक्तो को बुलेट प्रूफ बनाते हैं ये काम क्रोध लोभ मोह मद मस कुछ ना बिगाड़ पावे अरे बोले भगवान का दास है देखो ना कितनी निंदा कितना अपमान कितनी प्रतिकूल लेकिन विचलित नहीं हुआ ये अपने मार्ग में दृढ़ रहा तभी तो हम उनके चरित्र पढ़ते और जय जयकार उनकी करते हैं ये भगवान बनाते हैं अभी हम बहुत कमजोर शीशे की तरह हमारा दिल है चुप रहो समर्पित हो गए हो अब

अनुकूलता प्रतिकूलता अनुकूलता प्रतिकूलता विपत्ति तिरस्कार मान सम्मान सब देते रहेंगे कभी ठंडा कभी गर्म कभी ठंडा इतना मजबूत कर दिया कि आप द्वंद वि मुक्ता सुख दुख संग गई किसी भी द्वंद का कोई प्रभाव नहीं द्वंद वि मुक्त निर् दंद स्थिति निर् दव स्थिति कोई प्रभाव नहीं दुख सुख का मान अपमान का लाभन अभी देखो क्या स्थिति है हमारे भगवान कृपा ना करे तो द्वंद विमुक्ताए कैसे उस महानंद को स होगे जब थोड़ा सा अपमान नहीं से सकते थोड़ी गाली नहीं से सकते कोन क्रोध निर्दय कौन ऐसा है जो काम से जिस क्रोध से जिसका हृदय जला ना हो वही जहां नाम जब चल रहा है जो भगवान के आशित है एक बार नहा के आ रहे हो थूक दे तो कैसा लगेगा चलो एक बार सह लेंगे दो बार 100 बार एकनाथ जी के ऊपर थूका गोदावरी स्नान कर बारबार थूक रहे ऊपर से एक बार देखा भी नहीं 100 बार ना आके आए एक बार भी क्रोध नहीं आ है वो उतर के आया साष्टांग प्रणाम किया क्षमा करो मुझसे गलती नहीं भैया बड़ी कृपा हुई आपसे गलती कहां हुई एक दिन स्नान एक बार करने आता हूं आपने एक

दिन में 100 बार स्नान करवाया ये आपकी कृपा से हु ये भक्त हृदय जो भगवान से चित्त जुड़ा है व वहां लाभ देख रहा है कृपा देख रहा है वहां दोष दर्शन नहीं कर रहा कि मैं स्नान करके आ रहा हूं ये ऊपर से खड़ा बालकनी से बार-बार थूक रहा है हमारे ऊपर यह विचार आ जाए कि मेरे भगवान मेरे पर कितनी कृपा कर रहे हैं कि हर बार मुझे एक रोज में एक बार यहां एक रोज में 100 बार गंगा स्नान विचार बहुत बड़ी सिद्धि है विचार ही बहुत बड़ी उपलब्धि है विचार ही हमारे जीवन को उज्जवल बनाते हैं विचार ही नीच गिरा देते विचार ही जीवन मृत्यु तुल्य कर देते हैं भजन से क्या मिलता है उत्तम विचार उत्तम विचार एक सेकंड में हर विकार को मिटाकर भगवत स्वरूप में स्थित काम वस केही नहीं कीनो कौन ऐसा है जिसको कामने अधीन कर लिया जिसने अपने अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया उसको काम अधीन नहीं कर सकता थोड़ा भी अहंकार है तो काम वहां बैठा हुआ है क्योंकि अहंकार में ही कामना है स्वरूप में कभी कामना जागृत हो ही नहीं सकती जो हमारा स्वरूप है

उसमें कभी कोई नहीं उसमें कोई कामना शरीर में अभाव ही अभाव है जब तक हम अपने को स्त्री पुरुष मानेंगे तब तक कामनाओं का यह सिलसिला चलता रहेगा इसे हम नहीं रोक पाएंगे जब स्वरूप बोध होगा तभी कामनाएं रुक गी या जब अहम भगवान के चरणों में समर्पित होगा तो रुकेंगे तो काम का प्रभाव कहां होता है जहां अहम समर्पित नहीं हुआ जहां निरंतर नाम जप नहीं होता ठाकुर हरिदास जी के पास वैस आ गई तीन दिन बराबर श्रृंगार करके लेकिन ना नाम जप में रुकना है और ना दासत में कोई कमी है

तो तीन दिन में वह खुद दासी बन गई हरि नाम जपने लगी और गई थी हरिदास जी को भ्रष्ट करने और वह स्वयं भ्रष्ट चरणों से मुक्त होकर भगवत स्वरूप मार्ग का अनुसरण कर यह है प्रताप जो भगवान में अहंकार समर्पित करके नाम जप कर कोन लोभ दृढ़ फंद बांध त्रासन कर दिन हो किसके इतना विवेक बल जागृत हो जाता है कि लोभ ना ब बांध पावे वही जिसको नाम का लोभ है लोभ फांसी में उसी का गला नहीं बंधता जिसके गले में गोविंद का नाम चलता रहता है पक्का समझ लो लोभ पास जई गल न बंधाया सोनर तुम समान रघुराज ये लोभ उसी की फांसी की तरह गले को बांध लेते जहां नाम जप नहीं चलता लोभ में लोग क्या-क्या पापा आचरण कर रहे हैं खुला जान रहे हैं कि ये दीन है यह गरीब है यह निर्दोष है रुपया मिल रहा है पद बढ़ रहा है हमारा लाभ हो रहा है उसका नाश हो रहा है तो तुम्हारा लाभ कैसे हो जाएगा तुम्हारा नाश तो हो ही जाएगा अपने सुख के लिए लोभ से युक्त होकर के दूसरों को दुख देने वाला त्रिभुवन में कोई हो कभी भी कहीं भी वह सुख का अनुभव नहीं कर सकता पक्का समझ लो चाहे

वो शास्त्र बाहु अर्जुन जैसा महाबली क्यों ना हो जिसे भगवान तेजी का आशीर्वाद प्राप्त था सिद्धियां चरणों में लौटती थी काट के फेंक दिया भगवान ने ही अवतार लेकर परशुराम रूप में जो दूसरों को दुख देता है अपने लोभ के लिए दूसरों को कष्ट देता है दंड देता है वह कहीं भी बैठा हो ऐसा बुरा नाश होगा उसका कि कहीं संभलने का कोई भी चांस नहीं मिलेगा जिसके गले में नाम चल रहा है गोविंद गोविंद राधा राधा राधा राम हरि कृष्ण जो भी उसको लोभ पास ज गलन बंधा यह लोभ रूपी फांसी उसके गले में नहीं पड़ेगी विचार बता रहे भजन से क्या होता है इस भजन सारथी सुजाना बुद्धि रूपी सारथी बड़ा सुजान हो जाता सत मार्ग रूपी पथ पर इंद्रिय रूपी घोड़ों को ले जाता मन रूपी लगाम खींच करके य बुद्धि भ्रष्ट है क्योंकि नाम जप नहीं हो रहा भगवत आश्रय नहीं तो कोन लोभ दृढ़ फंद त्रासन कर द बड़ा दुख भोगना पड़ता है लोभी आदमी को बड़ा दुख वर्तमान में तो जलता ही रहता चाहे जितना करोड़ों रुपया आ जाए परिणाम में भविष्य उसका बड़ा मंगल होगा क्योंकि लोभ के कारण

उसने कितने बड़े-बड़े पाप किए हैं बहुत बहुत लोभ य नष्ट कर देता और देखा भी है लोभ से नष्ट होते हुए भी देखा है बहुत सूक्ष्म बुद्धि से जब विचरण करते थे कहीं कहीं साल साल भर गंगा किनारे एकांत स्थल मिले तो रुके तो सब लोग मिलते ही थे सब पता चलता है यह लोभ जो है बुद्धि को इतना अधीन कर लेता है वैसे सिद्धांत कहता है धन गया तो कुछ नहीं गया स्वास्थ गया तो कुछ गया और चरित्र गया सब कुछ गया ऐसा कहा जाता है सिद्धांत जो है वय कहा गया है अब अंग्रेजी तो याद नहीं इसको अंग्रेजी में कहा गया मनी इज लॉस नथिंग इज लॉस हेल्थ इज लॉस्ट समथिंग इज लॉस्ट और करेक्टर इज लॉस्ट एवरीथिंग इज लॉस्ट सब नष्ट हो गया अगर चरित्र चला गया तो सब चला गया आज क्या है कौन हृदय नहीं लाग कठिन अति नारी नयन सर आगे कह रहे कौन ऐसा हृदय में जिसको नारी के नेत्र रूपी बाण ने घायल न कर दिया हो वही हृदय है जो हरि को अर्पित है जिसके हृदय में भगवान का स्मरण चल रहा है उसके हृदय में नहीं अगर देखने योग्य है भगवान भजन करने वाले देखने योग्य है और कुछ

देखने योग्य नहीं संसार में कुछ देखने योग्य नहीं हे ये सब मल की सुंदरता है मल की यह सुंदरता नहीं है यह मल की सुंदरता है एक काम करने राजमहल में जाती थी तो राज महल में काम करने वाली साधारण घर में काम करने वाली थोड़ी होती है उसका एक पदवी होती है रानी की दासी पूरा उसका जो लड़का था एक दिन व महल तक गया किसी कार्य के लिए ऊपर राजकुमारी थी राजकुमारी को देखा तो एकदम हृदय में व्याकुलता इतना सुंदर रूप है तो मुझे कहां मिल मैं तो काम करने वाली इस महल में जो मेरी मां है मैं उनका पुत्र हूं तो भला मुझे कैसे मिल सकती है अब इतना उसको राग तत्काल हो गया उसने निच कर लिया अगर राजकुमारी नहीं मिलेंगी तो प्राण छोड़ दूंगा घर आया खाना पना छोड़ दिया एक दो दिन मां ने पूछा क्या बात है उसने कहा स्वास्थ्य ठीक नहीं दो चार दिन हो गए पूछा क्या बात है स्वास्थ्य ठीक नहीं तो राजा से प्रार्थना की राज वैद्य आया उसने नाड़ी पकड़ के देखा बोले कोई शरीर में दोष नहीं कोई रोग नहीं इसमें इसका मानसिक कोई रोग हो तो हम नहीं कह सकते शरीर

में कोई रोग नहीं तब एक दिन कहा बेटा तू मेरा अकेला बेटा है बता ना बोली मां तुम्हारी सामर्थ्य के बाहर की बात है जो मेरे मन में बात बैठ गई वह मृत्यु ही होगी और दूसरा कोई उपाय नहीं बोले एक बार तो बता के देख अगर कोई उपाय हो तो मैं कर सकती हूं बोले क्या कर सकती हो जिस घर में काम करती हो महाराज की राजकुमारी को मैंने देखा मेरा चित्त आ गया मैं जी नहीं सकता उसके बिना क्या ब्याह करा सकती हो अब यह बोलने की भी सामर्थ्य नहीं तुरंत मृत्यु दंड दे दिया जाएगा एक काम करने वाली राजा की पुत्री से ब्याह की बात अपने पुत्र के लिए कर सके इतनी हिम्मत की बात कहा सीधे राजकुमारी के पास गए चरण पकड़ के बैठी बोली आप बेटी जानती हो जीवन हो गया तुम्हारे घर में पूछा लगाते मैं कुछ मांग नहीं रही हूं तुमसे उपाय पूछ र हूं तुम्हारी सुंदरता को देखकर हमारे पुत्र के हृदय में ऐसी बात आ गई यह मैं जानती हूं कभी संभव नहीं हो सकता तुम्हारे योग्य भी नहीं हो मैं चाहूंगी भी नहीं कि ऐसा तुम करो कहां तुम राजकुमारी कहां मैं काम करने वाली

तुम्हारे घर में कोई उपाय है उनका बहुत पक्का उपाय वह सत्संगी थी उसने कहा चार दिन बाद लिवा लाना हमसे बात करना चार दिन का समय और वैद्य सेसे जमाल गोटा टाइप लिए जो खूब दयो सोच चार दिन और सोने के कलस राजकुमारी थ भरवा दिया और चार दिन सोच बराबर तो चेहरा पीला और और कहा कोई यहां सेवा नहीं करेगा दुर्गंध मखिया सब अब वो चेहरे की कांति जो चमक रही थी बुला बुलाया वहीं जो कमरा वहीं से ऐसे करने लगा बोले नहीं य इस राजकुमारी है और घड़े खुले एकदम रखे दुर्गंध उने कहा कैसे में राजकुमारी रहती अंदर गए तो उठाया उसको चार दिन से बराबर सोच हो रही थी चेहरा एकदम पीला एकदम ऐसा तो उनका वो राजकुमारी कौन है जिनको छत में देखा बोले हम ही को दे देख बोले सुंदरता का बोले घड़े में भरी ये घड़े में वही सुंदरता भरी छी हमें ब्याह नहीं करना कहा तुम्हारा लड़का बच गया हृदय में यह जो सांसारिक आकर्षण है व आप यह समझ लो मल का आकर्षण है निर्मल आकर्षण तो भगवान के भजन का या श्री भगवान का आकर्षण होता है निर्मलता यह मलिन है यह मल है अगर आपको

भजन मार्ग में चलना है तो इसीलिए है कि सैसा किसी के मुख की तरफ मत देखो नीचे देखो भगवान की मुस्कुराहट से ही माया का प्रादुर्भाव हुआ है इंद्रिया बहुत बलवान बलवान इंद्री गमो विद्वान कसती भगवान व्यास देव जी ने इसी श्लोक के ऊपर अर्धाले में लिखा कि अकेले में माता के पास बहन के पास बेटी के पास भी एकांत में बहुत देर नहीं रहना चाहिए तो जयमिनी जी खड़े हो गए उन्होंने कहा प्रभु यह बात तो समझ में नहीं आई कि विद्वान है शास्त्र ज्ञानी है फिर भी वह अपनी माता बहन के पास बहुत देर एकांत ना रहने तो बलवान इंद्रम विद्वान मप विद्वान को कैसे खीच सकती है अब जयमिनी जी बहुत बड़े विद्वान है वेद के और शिष्य तो शिष्य भगवान श्री कृष्ण दे पान के व्यास देव जी ने कहा कुछ दिन के लिए हमें बद्री नारायण जाना है आप इस आश्रम को संभालिए आप श्रेष्ठ है और फिर आकर मैं उत्तर दूंगा वो समझ नहीं पाए साम के गंगा स्नान करके सब संध्या वंदन करके लौट रहे थे हल्की सी बदरिया छाई रिमझिम पानी होने लगा और नौ किशोर अवस्था और पैरों में नूपुर बंधे

हुए छमछम करते हुए सामने आ गए चरणों को देखा इतने सुंदर श्याम वर्ण चरण श्री कृष्ण दो पन भगवान व्यास देव जी भी श्याम वर्ण के ही है आवाज मेरी रक्षा करो मैं जंगल में अकेली फंस गई हूं अगर आज रात्रि आपके यहां रुक गई तो सुबह में अपने नियत स्थान को पहुंच जाऊंगी नहीं तो आप समझते हैं स्त्री शरीर है कोई बाधा हो सकती है नहीं नहीं गुरु जी है नहीं और सब ब्रह्मचारिणी कौन होगा उ कहा हां ये बात है शरणागत की रक्षा तो तो हम एक कुटिया दे सकते हैं और रात्रि में तुम्हें कुटिया नहीं खोलनी मेरा नाम जयमिनी है मैं भी आदेश करूं तो भी नहीं यहां का मैं प्रभारी हूं यहां की मुने पूरी सुरक्षा दी गई है कि हर ब्रह्मचारी की सुरक्षा करते हुए मेरे गुरुदेव भगवान श्री कृष्ण दन व्यास देव जी का आदेश है इसलिए मैं भी आकर रात्रि में कहूं तो तुम कुटिया मत खोलना जैसे आज्ञा महाराज बस हमें तो शरण मिल जाए रात्रि भर की और छम छमा के आगे चरणों को ही देखा था कौन सी कुटिया है महाराज जी अब उस कुटिया में जब अंदर से बंद कर ली तब आप आए हो

संध्या बंदन के बाद जब गुरु जी का ध्यान करके भगवत ध्यान में लगे तो वही नूपुर वही छम छमा हट बार-बार आवाज काटना चाहे पर वह आवाज कटे ही ना बोले बाद में ध्यान करेंगे पहले पूछते हैं कि तुम आई कहां से हो रात्रि में अभी तक तो पूछा ही नहीं हो नाम क्या है तुम्हारा और तुम यहां फस के से गई जंगल में अब जो है वो दूसरी बात हो गई गए और उ कहा कि दरवाजा खोलिए उ कहा नहीं दरवाजा नहीं खुलेगा जमिनी ऋषि का आदेश है बोले मैं जमिनी बोल रहा हूं बोले नहीं नहीं उन्होंने कहा था मैं भी कहूं तो मत खोलना तोब वहां कोई लिंटर तो पड़ा नहीं था बहुत बहुत फूस की झोपड़िया खपरे ला होते थे मिट्टी की दीवाल बांस की फंटी उसके ऊपर खपरे खपरेल हटाया बांस की फंटी हटाई नीचे कूद ग जोव रूप देखा ऐसा श्याम का कोटि कोटि कंदर्प को भी मर्दन करने वाला व रूप नौ किशोर अवस्था विशाल नेत्र कपोल चमक रहे नील कमल के समान ऐसे लंबी सांस ली हक से हो गया वैसा रूप भगवान है श्री कृष्ण देपन भगवान के अवतार है कैसे आगमन ढेर हो महाराज कैसे आगमन हुआ ेर का मतलब सब

इंद्रिया मन बुद्धि सब आसक्त हो गई उसी हम बहुत ज्यादा तो प्रश्न नहीं करेंगे बस एक ही प्रश्न करेंगे अब सब भूल गए क्या तुम मुझे वर्ण कर सकती हो आप जैसा ऋषि बोले तो प्राण अर्पित है महाराज पर हमारे पूर्वजों में एक प्रथा चली आ रही कि आप जहा स्नान करने जाते हैं ना वहा एक कालिका का मंदिर तो जो दूल्हा बनता है पूरा मुंह काला करके दुलहन को पीठ में बैठा के मंदिर तक ले जाता तो य आसपास तो मंदिर है नहीं व कालिका जी का मंदिर है आप अगर रात्रि में मुझे अपना मुंह काला करके और वहां तक बैठल के पीठ में ले जाए पक्का ब्याह सोचा रात्रि का समय सब ब्रह्मचारी कोई ध्यान स्थ है कोई भजन पराण कोई शयन में है मुह काला करने में क्या लगता है कोयला लिया अपना मुह काला कि बैठो जल्दी पीठ रफ्तार घुटनों के बल काफी समय तो लगा ही बीच-बीच में दो चार चपत जन् सोचा चपत जमा लो कोई बात नहीं मंदिर के पास ग खींच के दो तीन थप्पड़ मारे यह कौन सी परीक्षा है और जब देखा तो दाढ़ी और अरे गुरुदेव बोले बलवान इंद्री ग्रम विद्वान बोले हा गुरुदेव

विद्वान पिक सती विद्वान को भी खींच सकती है नारी नयन सर जाला कौन ऐसा है कौन ऐसा है जो भगवान मानता है वह ऐसा है यह भगवान है बस इतना जैसे भगवान ने मोहिनी रूप धारण किया देवता और असुर जब समुद्र मंथन किए तो जब समुद्र मंथन से अमृत आखिरी में निकला तो असुर लेकर भाग गए तो देवताओं के ओठ सूख गए कि प्रभु इनके हाथ से हमें नहीं मिलने वाला बोले नहीं बिना झगड़े के बिना परिश्रम के अपने आप अमृत दे देंगे बोले प्रभु ऐसे कैसे दे सकते हैं आप सारंग धनुष धारण करें तो भी भैसे नहीं देंगे ऐसे ऐसे हिम्मती दैत्य सारंग से नहीं देंगे नहीं यह हमारे नेत्र बाण से बिंक अपने आप अमृत कलस देंगे एक सेकंड लगा वह मोहिनी रूप छमछम करते हुए भगवान देवता मुस्कुरा दे किसी को भी देवता को मोहित नहीं किए मोहिनी भगवान क्यों क्योंकि उनको पता है हरि है यह हरि है समझ रहे हो ना एक भी देवता लुभ मान नहीं हुआ क्योंकि पता है हरि है और दैत्य की तरफ जे ही गए इतनी सुंदर तो आज तक देखा ही नहीं था किसी को कोई है ही नहीं सुंदर ब्रह्मा ऐसे बना ही नहीं

सकते ब्रह्मा नहीं बना एक से एक सुंदर है ब्रह्मा की बनाई हुई ब्रह्म लोक में ऐसी अप्सरा कि तिल भर देख ले तो मुनि जन मूर्छित हो जा तिलोत्तमा आदि और स्वर्ग में तो भीड़ लगी ई अप्सराओं की भगवान को देख कर के अमृत कलश हाथ में भूल गए तब कहा देखो भाइयों आपस में लड़ने की जरूरत नहीं अमृत कलश सुंदरी को दे देते हैं और यह जिनको जिनको पिलाएंगे हम राजी भगवान ने कहा तो हमको क्या समझते हो अरे हम छलिया है हम किसी की नहीं होती अरे बोले तुम कुछ भी इतना कह के ना कि हम छलिया है किसी की नहीं होती ऐसा मुस्कुरा दिया तिरछी कटाक्ष मारी मानो ये ले अमृत कलश बूंद नहीं पिलाया दैत्य को सब देवताओं को पिला लेकिन एक भी देवता मोहिनी भगवान से मोहित हुआ हो तो हमें बताना क्यों क्योंकि मेरे भगवान है जो हर स्त्री में भगवत भाव करता है पवित्र भाव मेरे गोविंद इन रूपों में है उसके हृदय को कभी भी कोई भी सुंदरता नहीं बेध सकती क्योंकि सुंदरता के समुद्र भगवान सुंदरता की सीमा हमारी प्यारी जो श्रीपाद प्रबोधा जी ने वृंदावन महिमामंडित राधा

दासी उपासक के हृदय को मोहित नहीं कर सकते ऐसा सौंदर्य त्रिभुवन में तो है ही नहीं जिनकी दासिया की सुंदरता को देखकर सुंदरता की समुद्र लक्ष्मी जी आश्चर्य चकित हो जाए वह श्री किशोरी जो है लक्ष्मी कोटि लक्ष लक्षण लसल लीला किशोरी सतई राराम ब्रज मंडले मधुरम राधा विधानम परम तो बोले कौन हृदय नहीं लाग कठिन अति नानी नयन सर लोचन जुत नहीं अंध भयो श्री पाई कोन कौन ऐसा पृथ्वी में है जिसके रुपया बढ़ गया हो और अंधा ना हो गया हो नेत्र होते हुए भी अंधा जिसके खूब रुपया बढ़ गया हो कुछ नहीं दिखाई देता मनमानी खानपान आचरण व विचार जुआ मदिरा न जाने कितने दोष बढ़ जाते हैं कौन है ऐसा जिसके धन बढ़ा हो और नेत्र काम कर रहे हो बोले भगवान का दास चक्रवर्ती सम्राट तक का वैभव प्राप्त हुआ भगवान के भक्तों को जैसे अमरीश जी महाराज ऐसे कितने राजे महाराजे भगवान के भक्त एक भी कोई सांसारिक अपराध और दोष नहीं निर्मल महा भक्त जिनके आगे दुर्वासा जैसे महा तपस्वी भी भाग पड़े उनके भजन के आगे टिक नहीं पाए लोचन जुत नहीं अंद भयो श्री पाई

कनर धन धन मदांध कर देता है देखो भगवान के पुत्र है भगवान पदवी है कुबेर जी की धना दक्ष भगवान कुबेर नल कुवर मण ग्रीव कहा देवगंगा अलक नंदा में दिगंबर है कोई वस्त्र नहीं पहने नदियों में निर्वस्त्र होकर स्नान करने का निषेध है फिर पवित्र गंगा जी यमुना जी तो तो कभी भूल नहीं करना चाहिए अरे गंगा गान कर ने गए हो कि को नदी नाला में हो मार अंगूरी पूरी ाल अरे सब बाथरूम से करके आते अपने घर से वही गंगा जी में मार खखार ख देखते हैं किसी किसी को जैसे यमुना जी गए मार साबुन लगा पूरी सुंदरता हुए पैदा करनी है अरे कपड़ा लत्ता साबुन ये सब अपने घर में गंगा जी गए दूर से साष्टांग दंडवत किए क ऐसे लगा पांच डुबकी लगाई बाहर निकल के चले आए कपड़े से शरीर पूछा और वो कपड़ा अपनी पॉलीथिन में डाला अपने घर में धोया ऐसे नहीं गंगा यमुना उ गहन किया जाता है ऐसे दलित दुरा जैसा और वो उस यहां तक कि वो होश में भी नहीं थे ऐसा व्यसन किए हुए थे और दिगंबर कपड़ा भी नहीं पहने थे और देवांगना भी ऐसे ही थी देखो श्री मदन कितना अंधा कुबेर के

पुत्र है ना मन मान देवर्ष नारद जी पहुंचे तो देवांगना तो भयभीत होकर वस्त्र धारण करके प्रणाम मुद्रा में लेकिन ये फिर भी वैसे ही खड़े कहा श्रीमद से तुम अंधे हो गए हो तुम्हें नहीं दिखाई दे रहा जाओ वृक्ष की तरह खड़े हो तुम जड़ वृक्ष योनि को प्राप्त हो अब चरणों में गिर पड़े महाराज विनय करने लगे अब संत का हृदय तो परम कोमल होता है तो वृक्ष तो बनोगे पर नंद बाबा के घर के वृक्ष दरवाजे के बनोगे जब भगवान श्री कृष्ण का अवतार होगा बाल गोविंद को मैया जब खल में बांधे गी तो वो उखल तुम दोनों का स्पर्श कर तब तुम्हारा उद्धार हो जाएगा और तुम्हें भगवत साक्षात्कार होगा भगवत संभाषण भगवत दर्शन मुनिक क्रोध मुक्ति दातार तो कह रहे लोचन जुत नहीं अंध भयो श्री पाई कोनर संपत्ति मिले और व अंधा ना हो जाए नेत्र है पर उसे दिखाई दे बड़ा पापा आचरण बड़े-बड़े पाप अपराध उनसे होते हैं जो श्रीमद से अंधे हो जाते हैं बड़ी दुर्गति होती है इसीलिए जो श्रीपति का आराधन कर रहे हैं तो उनके पास जब श्री जी आते है ना श्री लक्ष्मी को भी कहते

हैं जब लक्ष्मी जी अपने पति के साथ आती है तो उनके पति का वाहन क्या है गरुण सामवेद का उच्चारण हो रहा है वैदिक सिद्धांत धर्मशास्त्र के अनुसार चलने वाला उसका जीवन होगा चाहे जितनी संपत्ति बढ़ जाए जो श्रीपति की आराधना करते हुए लक्ष्मी जी को प्राप्त करता है और जब नारायण की आराधना नहीं होती सीधे लक्ष्मी जी आती है तो उनके लिए भी पर्सनल उनका वाहन है लक्ष्मी जी का कौन सा वाहन आपको पता है उल्लू उल्लू को क्या दोष है उसको दिन में नहीं दिखाई देता उसको रात में दिखाई देता है अर्थात अज्ञान अंधकार में बुद्धि चलती है पाप में ज्ञान में बुद्धि नहीं चलती जिनके भगवत आराधना नहीं है केवल लक्ष्मी जी की खूब बढ़ोत्तरी है उनकी ज्ञान में प्रवेश नहीं है अज्ञान अंधकार संसार का पद प्रतिष्ठा राग इसमें बड़ा बड़ा सुर नाग लोक महि मंडल को जो मोह कीन हो जना आहा देवलोक पृथ्वी लोक नाग लोक पाताल लोक ऐसा कौन है जिसको मोह ने परास्त ना कर दिया हो मोह मूल बहु सूल पद त्याग हो तम अभिमान भजो राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान मोह गए बिन राम

पद होई न दृढ अनुराग मोह मोह महा महिष विशाल महान सबको फसाए हुए मोह बहुत विचित्र है मोह में क्या क्या नहीं होता पूरा जीवन मोह में नष्ट हो रहा है बड़ा मोह अंधकार फैलाए हुए है देखो छोटे-छोटे बच्चे दूध पीते हैं एक दूध वाला ऐसे गंदे केमिकल ऐसे गंदे पदार्थ मिला रहा है और बड़े-बड़े डिब्बों में दूध तैयार कर रहा है उससे कहो तुम अपने आंगन में खेलने वाले बच्चे को दूध पिलावे 250 ग्राम उसे पीटो भी तो नहीं पिलाए वो और वही दूध वो घर-घर जाकर के देता है और छोटे-छोटे बच्चे या किसी की भी आते हो बड़ी कोमल होती क्यों क्योंकि वो मोह से अपने परिवार का पोषण करने के लिए अधिक धनवान बनने के लिए थोड़ा दूध मिलाकर और गंदे गंदे पदार्थ ये जब आतो में जाएंगी तो ये जहर कैंसर नहीं बनाएगा यह उनकी आंतों को नहीं काटेगा यह कोई रोग नहीं पैदा करेगा पर वो मोह मूल में ऐसा फस गया कि वह धन चाहता है अपने परिवार का पोषण चाहता है यह नहीं चाहता कि ऐसे ही अन्य परिवार के बच्चे प्रिय है अपने परिवार को उनका जो रोग आदि क्लेश आदि उनको

होगा वो तुम्हारे परिवार को सुखी कैसे रहने देगा ये मोही पुरुष नहीं टैकर का टैंकर दूध और उसमें बिल्कुल केमिकल ऐसे बन रहे ऐसे गंदे पदार्थों का प्रयोग किया जा रहा खाद्य पदार्थों में अभी एक आटा की फैक्ट्री कई ऐसे पदार्थ जो बहुत हानिकारक और श्वेत है खड़िया आटे में मिलाकर के मतलब गजब है कि आदमी रोटी दाल तो खा सकता है लेकिन वो भी शुद्ध रहे मो ने अंधा कर दिया रुपया आना चाहिए कैसे आना चाहिए यह नहीं विचार है कि अगर यही आटा यही घी यही दूध यही पदार्थ हम अपने परिवार को क्या पवाएं तो कैसा लगेगा और यह कोई न कोई तो पाएगा उसके शरीर में दोष दुख रोग यह पैदा करेगा ऐसे जो लोग गंदे विचार वाले हैं इनको चोट पहुंचने चाहिए इनको पार मार्थी आध्यात्मिक लौकिक सब दंड मिलना चाहिए क्योंकि ये हमारे समाज के ऐसे कैंसर है लोग जो पूरे समाज को नष्ट कर देते हैं मान लो सबके फ्लेट आदि की व्यवस्था तो गाय तो नहीं रख सकते सब तो किसी दूध वाले से लेंगे अब दूध वाले को विचार करना चाहिए घी बनाने वाले को विचार करना चाहिए वस्तु बनाने वाले

को विचार करना चाहिए उसके उदर में जाएगा कष्ट दे महंगा दे दो सब 50 का देते हैं तुम 60 का दे दो लेकिन उसमें जहर मिलाकर देने की जरूरत क्या है लेकिन मोह अज्ञान अंधकार ऐसा छाया हुआ है हर वस्तु दूषित हर वस्तु दूषित अब ऐसा है कि पानी भी शुद्ध नहीं मिलना पहले हम गांव में सुनते थे कि देखना रे समय आएगा कि दूध बिकेगा गांव में दूध नहीं बेचा जाता था धर्मात्मा पुरुष के घर से दूध नप लगे तो पड़ोसी करने लगते देखो कितना बुरा समय आया दूध बेचने लगे आप समझ रहे हो दूध व्यवहार में दिया जाता था कोई रिश्ते नातेदार आ गए पड़ोसी पास गए 5 लीटर दूध भरवा ला 10 पा लीटर मठा से फ्री हमारे ब्रजमंडल में तो फ्री बाबा पा पा लीटर मठा ले आए सुबह पिए शाम पिए सब ऐसे दूध बेचना ये फिर वो कहते थे देखना समय आएगा पानी बिकेगा कुआ थे कुआ सूख गए कुआ बावड़ी अगर छक के प्यास लगी है तो 10 प रप तुम्हारी जेब में होना चाहिए पानी डेढ़ दो रुपया लीटर दूध गाय का तीन रुपया लीटर दूध भैंस का यह हम अपने सामने 35 40 रुपया किलो गांव की 40 45 वर्ष की बात

बहुत समय खराब आ गया बोले सुर नाग लोक महि मंडल को जो मोह कीन हो जयना सबको परास्त कर रहा है मोह मोह मूल बहु सूल बड़ा कष्ट देने वाला य अज्ञान मोह मोह कोई नाग लोक सुरलोक देवलोक कोई ऐसा नहीं जिसको जीत ना ले तो कौन बचा बोले जो भगवान के चरणों का आश्रय लिए उसे मोह पराजित नहीं कर सकता नहीं पराजित कर सकता क्योंकि भगवान के चरणारविंद का चिंतन होने से हृदय में अपने जैसा सबके प्रति भाव होने लगता है वह सोचेगा वह विचार करेगा मैं ऐसा नहीं कर सकता जिससे दूसरों को कष्ट हो भजन करने वाला तो कभी ऐसा कर ही नहीं सकता कभी नहीं ऐसा कर सकता ये परम पवित्र देव सामग्रियों को दूषित कर रहे हैं लोग कहा तुलसीदास सो उबरे ही राख रामराज जीव नयन कमल नयन भगवान श्री हरि जो उनकी शरण में गया उनका भजन किया वही बच सकता है अन्यथा भोह क मान संधान सुठा ज नारी लोकन बानते बाचे कोप कृषण गुमान अवा घट जो जिनके मन आव नाचे लोभ सब नट के बस हो कप जो जग में बहु नाच न नाचे नीके है साधु सब तुलसी पते श्री रघुवीर के सेवक साचे भगवान के जो सच्चे

सेवक हैं हृदय से भगवान की शरणागति ले ली है भृकुटि रूपी कमान पर बाण रूपी कटाक्ष मारते हुए सबको मोहित कर सकती माया लेकिन भगवान श्री हरि के दास को नहीं नाम चल रहा है भगवान का भरोसा है सच्चे मानो बड़ी मस्ती काला सर्प काट लेगा तो मंत्र से जहर उतर जाएगा अस्पताल चले जाओ वहां लगवा लो बच जाओगे लेकिन भोग वासना का जहर चढ़ गया यह नहीं उतरने वाला जन्म जन्म केवल भगवान ही बचा सकते हैं जो लोग भगवान का भजन नहीं करते बड़ी विचित्र दशा है जहां पवित्रता की मेड़ थी वहां पवित्रता की मेड़ों को ढा दिया इस कलयुग की बाढ़ ने अभी तो बा भ्रष्टाचार आचरण भ्रष्ट कर देगा सब संसार नहीं माने को अनुजा आगे समय देखना ऐसा समय आ रहा है कि जो धर्म की मर्यादा थी जहां पवित्रता सुरक्षित थी वो मेण कलिकाल तोड़ रहा है भगवान का आश्रय ही मात्र एक पवित्र रक्ष सकता दूसरा कोई आश्रय नहीं भगवान के सहारे होकर नाम जप कर रहे इन किन प्रकार लड़खड़ाते लड़खड़ाते पार हो जा पक्का जिसने भगवान का सहारा नहीं लिया जो भह का मान संधान सुठा ज नारी बिलोक

बानते बाचे कौन तेई रघुवीर के सेवक साचे जो भगवान के साचे दास है वही वही बच सकते वही यह ध्यान रखो हरि प्रसन्न होंगे तो बैकुंठ का द्वार त का द्वार खोल देंगे संसार प्रसन्न होगा तो नरक का द्वार त्रिविम नरक से दम द्वार नासन मामना कामा क्रोधा तथा लोभा ले नरक भोग नरक नरक का द्वार कोप कृषण गुमान अवा घट जो जिन के मन आवन आचे अभिमान रूपी हवा में क्रोध रूपी अग्नि की ज्वाला भड़क रही है कौन ऐसा है जो अपने हृदय से इसको शांत कर दे बोले वही तेही रघुवीर के सेवक साचे क्रोध आता है प्रतिकूलता में क्रोध आता है नए साधक को पर उ शांत रूप से सहता है भगवान के द्वारा यह विधान मेरे मंगल के लिए किया गया है मैं क्रोध नहीं करूंगा क्योंकि मेरे तप को क्षीण करेगा मेरे भजन का नाश करेगा मुझे भगवत प्राप्ति करनी अब नहीं शांत चुप एक बार जीत गए ना तो अगली बार और जल्दी आप परास्त कर देंगे धीरे-धीरे आप क्रोध का समन कर देंगे पर अगर अंदर प्रेरणा आए कि अबकी दब ना तो अगली बार और उल्टा प्रेरणा देता क्रोध तभी गुस्सा आती है कमजोर को

क्रोध आता है गंभीर को क्रोध नहीं आता बलवान को क्रोध जो हरि भजन से बलवान उनको क्रोध नहीं आता कमजोर को क्रोध आता या कभी-कभी भगवान की लीला होती है ऐसी जो दिव्य महापुरुषों में भी क्रोध देखा गया जैसे सनकादिक हृदय में आ गया और भगवान के पार्षदों को ये भगवान की लीला भूमिका बनने का उसमें वहां ये जागतिक काम क्रोध आदि का वहां आवेश नहीं होता वो भागवत होता है लोभ सब नट के बस है कप जयो जग में बहु नाच न नाचे जैसे नटवा बहुत प्रकार से नाटक करके लोगों को रिझा करके

धन एकत्रित करता है बोले ऐसे बहुत तरह से भक्ति का ज्ञान का वैराग्य का नाना प्रकार के जागतिक नाटक टक करके लोभ की पूर्ति रुपए की पूर्ति धन की पूर्ति लोभ सबे नटके बस है कप जयो जग में बहु नाच ना नाचे नीके है साधु सबे तुलसी पै तेई रघुवीर के सेवक साचे वही बच पाया मोह से क्रोध से काम से नौटंकी नाटक से जो सच्चाई से भगवान के चरणों का आश्रय लेकर भजन किया बेश बनाई सुच वचन कहे चुबाई नाटक सत्य महापुरुषों के वचन और उनके चले हुए मार्ग पर चलोगे तभी सत्य को पाओगे नहीं तो नहीं पाओगे बेस सु बनाई सुच वचन कहे चुबाई वचन कैसे अमृत तमक रहा है विद्वान है वाणी ऐसे संतो महंतो पर जब तराजू बगल में लगा होता है उस परे तोला गया काटा व बताता है बेस सु बनाई सुच बचन कहे चुबाई जाई तो ना जरनी धरन धन धाम की कोटि को उपाय करि लाली पालि अत देह मुख कहि अत गति राम ही के नाम की प्रगट उपासना दुरावे दुर्वासना ही मानस निवास भूमि लोभ मोह काम की राग रोष ईर्ष कपट कुटि लाई भरे तुलसी से भगत भगत चाहे राम की बहुत जोर की बात कहे जो लोग उत्तम

भेष धारण करते हैं अमृत जैसे वचन बोलते हैं किंतु हृदय रूपया तृष्णा भोग सम्मान करोड़ों प्रकार की वासनाओं से भरा हुआ शरीर का लालन पालन इतना दुलार शरीर का मुख से बोलेंगे कि मुझे तो भगवान का भरोसा है और सिर्फ नाम देखो गोस्वामी जी के मुख कहित गति ही के नाम मुख से भगवान की चर्चा हृदय से भगवान के चरणों में अनुराग तो मिलन में सुख होता है मिलत एक दुख दारुण देही बिछड़ते एक प्राण हर ले भगवान के प्रेमी जनों का जब बिछड़ना होता है तो ऐसा लगता है जान जा रही है और पाच मिनट बैठे और एक ऐसे छली कपटी जिनके दर्शन मात्र से भगवत भाव तो है नहीं बस सु बनाई सुच वचन कहे चुबाई देखो अगर महापुरुषों के हम वचन नहीं सुनेंगे तो हमारे हृदय य कड़वी दवा है हमारे हृदय को जाकर सुधारे गी उत्तम भेष बनाए बचन जैसे अमृत चू रहा हो और क्या लच्छेदार आपको होश उड़ जाएंगे इतनी विद्वता किंतु हृदय गोस्वामी जी कह रहे जाई तो ना जर धर धन धाम की तो कोट को उपाय करि लाली पालि अत देह बस सारा का सारा उपाय करोड़ों प्रकार से शरीर लालन पालन का है हे

चाहे जितना सजा लो मरोगे चाहे जितना इसमें सुगंधित द्रव्य लगा लोगे यह जलेगी शरीर यह गड़गा यह कीड़ा पड़ेंगे ज्यादा इससे दुलार नहीं मतलब भरका ठाकुर सेवा करना है इसलिए नहा लिया ठाकुर सेवा करना है उनके दासत चरण चिन्ह चंदन प्रसादी इनके लिए नहीं सन्यास में जिंदगी में कभी ऐसे दर्पण नहीं गंगा की र त्रिपुंड से बस खत्म खेल खत्म कभी य दर्पण अब यह है कि भाई बस उतने के लिए शरीर का पोषण नहीं शरीर का दुलार नहीं कोट को उपाय करि लाली पालि अत देह बहुत संभल जा तो न जर धरन धन धाम की कोटिक उपाय करी करोड़ों प्रकार के साधन केवल यही बात के लिए मुख कहित गति राम ही के नाम की प्रभु हृदय की देखते हैं मुख की नहीं नारद जी काम विजय का अभिमान लेकर भगवान के पास गए और कहा प्रभु आपकी कृपा से हमने काम पर विजय प्राप्त का आपका जो स्मरण कर ले वो काम विजय हो जाए कृपा तो वहां भी बोले थे नारद जी लेकिन भगवान मुख की बात नहीं हृदय की बात देखी अच्छा अभिमान आ गया है चूर कर दिया कोटिक उपाय धन धरम धाम य सब नोटंकी नाटक केवल इसके लिए और

मुख कहित गति राम ही के नाम की मुख से बात कह रहे कि व भगवान के प्रगट उपासना दुरावे दुर्वासना कभी अपनी दुर्वासना की बात नहीं बताई कि आप ऐसे थे उपासना की इतने घंटे ये पाठ इतने घंटे ये इतने वहां ये करा दिया वहां य करा दिया जिससे पुण्यं का वर्णन करके उसका भी नाश हो गया प्रगट उपासना दुरावे दुर्वासना मानस निवास भूमि लोभ मोह काम की मानस निवास भूमि मन में बैठता है लोभ और मोह और काम और बातें जब करते हैं तो मीठे अमृत चु छुआते हैं भेष देखो तो लुभ मान हो जाओ सेवक जी में महाराज भट भू भरम भटकत भू ऐसा कि बड़े बड़े राजे महाराजे देख कर के भ्रमित हो जाए दर्शन भक्त अनूप पर रूपन शोभित प्रीति बिनु भरम भटकत भूप श्री हरिवंश कृपा बिना राग रोस ईर्ष्या कपट कुटिला भरे तुलसी से भगत भगत चाहे राम की जो पुरुष ऐसे कुटिल आचरण करता है व उपहास का पात्र बन जाता है एक दिन संसार के तुलसीदास जी कहते हैं भोगों में आसक्ति क्रोध ईर्ष्या कपट कुटिलता भरे हुए और भक्त का बाना बनाकर दुनिया को ठगने की भावना रखते हुए तो जब तक चल रहा तब

तक चल रहा जिस दिन पोल खुली तो बोले ऐसे लोग कुटिल आचरण करने वाले संसार के उपहास का पात्र बनते हैं वो कभी भगवान की भक्ति या भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते इसलिए हमें बहुत बढ़िया अवसर मिला है संसार क्या दे देगा कितना दे देगा और जब संसार को बनाने वाला रीज जाएगा तो क्या बाकी रह जाएगा हमको प्राप्त करना तो हमको मालिक को रिझाना है संसार को नहीं निरंतर नाम जप करते हुए अपनी इंद्रियों को अपने मन को अपने शरीर को प्रभु के चरणों में समर्पण करने की तैयारी करनी है हमें कहीं कोई पापा चरण ना बन जाए बन जाए तो अपने को को धिक्कार दे प्रभु से प्रार्थना करें नाथ मुझे बचाओ मेरे में सामर्थ्य नहीं है इसी जन्म में भगवान की कृपा से शुद्ध भक्ति प्राप्त हो और हम भगवान का इन्हीं नेत्रों से दर्शन कर पावे हृदय से हमें तत्व बोध हो जाए यही जीवन का परम लाभ है संसार में कुछ नहीं सच्चाई से समझ लो यह आकर्षण झूठा है रोज का रोज हमारा समय नष्ट हो रहा है एक च भेटा लगे गिर जाओ पता नहीं कौन अंग कब काम करना बंद कर इसलिए राधा राधा

राधा राधा बड़ा संकट पूर्ण संसार है आपको नहीं दिखाई दे रहा नाम जब कर लो एक नाम जप कर लिया तो यह काम आ जाएगा एक बार राधा बोल लिया ना तो यह काम आ जाएगा पक्का काम आ जाएगा पूरे रजिस्टर में लिखा मिलेगा कि एक बार राधा नाम बोला तो उसका हिसाब आपके लिए बहुत मंगलमय बन जाएगा अगर आप हर शवास नाम जप करते हैं तो फिर कौन सा मंगल रुक जाएगा आपका एक बार जिन नाम ली हित होए अति दिन एक बार की बड़ी महिमा है आप बार-बार नाम जप करें आपका मंग कभी भी कुछ य बड़े कनेक्शन है ये

खोपड़ी में इतने तार है पता नहीं कौन सा तार खसक जाए कि ना चिंतन हो ना बोलना ना उठना ना खड़े होना अरे मजबूत नहीं है यह सिस्टम बहुत खराब है पता नहीं कहां से कौन सा स्क्रू ढीला हो जाए अब दिमाग का ही काम नहीं कर रहा है तो बताओ क्या अभी दिमाग काम कर रहा है भगवान की कृपा से राम राम राधा राधा हरि हरि कृष्ण कृष्ण खूब नाम जप कर लो दूसरों का हित कर लो दूसरों का मंगल कर लो यहां कोई किसी से प्यार नहीं करता झूठा प्यार है मान लो तो तुम भी झूठा स्वांग खेलो पति पत्नी पुत्र परिवार ये सब भगवान का है भगवान का मान के खेलो हम पति नहीं है हम सेवक है तुम पत्नी रूप में आए हो तो जो मेरा कर्तव्य मैं पालन करूं तुम पुत्र रूप में आए वैसा कर्तव्य तुम समाज के रूप में वैसा कर्तव्य लेकिन मैं भगवान का मेरे भगवान सब रूपों में है सत्य की प्राप्ति हो जाएगी बहुत बहुत जल्दी अपने आप को भगवान के हवाले कर दो नहीं कब माया कौन सा खेल खिलाकर हमको भगवान से विमुख कर दे फिर बहता चला जा रहा है प्रवाह में कोई ठोर ठिकाना नहीं कोई ठोर

ठिका कितना संसार कैसा है हमें तो बहुत संसार बहुत धोखे का राधा राधा राधा राधा खूब नाम जप करो एक भी क्षण व्यर्थ ना जाए बस हमारी सबसे यही प्रार्थना है अध्या आत्म का संपूर्ण ज्ञान भगवान के नाम में छुपा हुआ है हम सब माया ग्रसित जीव हैं हमें भगवान का नाम भगवान का बल भगवान की लीला कथा भगवान के भक्त प्रेमी संत जनों के प्रताप से इस जन्म में निश्चित भगवत प्राप्ति होगी बस हम कमर कस ले हमारी सब कचा इयां भगवान दूर कर देंगे हम सच्चे भक्त कहलाएंगे हम सच्चे भगवान के भक्त हो जाएंगे शे चर्चा आग श्री राधा वल्लभ लाल की

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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