गुरु अधीनता से क्या होता है ? // 28/09/2026
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
भगवान श्रीवर्ष यमान सिद्धो भवत अमृतो भवत रो भव जो जन्मजनम से भटकते हुए विषय वासनाओं में आनंद की खोज कर रहे थे वो जब गुरुदेव की कृपा से प्रिया प्रीतम की शरण में हुए अमृतस मृत वासना मृत्यु लोक की भोगों की वासना वो हमको बार-बार मृत्यु रूपी दंड दे रहे अब अमृतों को गुरुदेव ने राधा नाम सुधा रसम सुधा माने अमृत गुरुदेव ने अमृत रस पिला दिया अब मृत्यु से भय नहीं रहा य लमान सिद्धो भवती वो सिद्ध हो जाता है। सिद्ध माने परिपक्व। परिपक्व माने नाना प्रकार की वासनाओं का प्रवाह आने पर भी नाना प्रकार की भोगों की भूमि पर भी उसका मन चलायमान नहीं होगा।
तृप्तो भवत वो तृप्त हो जाता है। भगवान का निरंतर सुमिरन करते करते भगवान जब हृदय में प्रकट होते हैं। एक अद्भुत आनंद वो ऐसा आनंद जो हम चाह रहे हैं। जैसे हमारा मन चाह रहा है भगवत आनंद पक्का। तभी वह हर विषय के बाद असंतुष्ट हो जाता है। चाहे वह खानपान हो, देखना सुनना हो, भोगना हो। हर भोग के बाद वह अतृप्त रहता है। उसको लगता है कि वो सुख नहीं मिला। पर वो खोजता फिर वही है। संसार में, भोजन में, स्त्री में, पुरुष में, धन में, मान में, नाम हो जाए प्रतिष्ठा में।
इसमें सुख होता फिर असंतुष्ट और जलन और अशांति उसके हृदय से जाती है। तृप्तो भवती जब भगवान का डट के भजन किया गया संसार की आसक्ति का त्याग करके तब जो एक आनंद हृदय में उत्पन्न होता है उससे जो तृप्ति होती है जो शांति होती है वही न सोचति न का ना कोई सोच रह जाती है ना कोई चाह रह जाती है और वो स्वयं भगवत स्वरूप हो जाता है क्योंकि मूल में हम सब भगवत स्वरूप है एकोम बहुमा वेद कहता है कि एक ब्रह्म ही जब संकल्प किया कि मैं बहुत रूपों में हो जाऊं तो समस्त संसार के रूप में हो गया।
अब इस संसार में अपने को भूल गया आकर के। अब उसी भूल को मिटाने के लिए स्वयं गुरुदेव रूप से, संत रूप से, शास्त्र रूप से उपदेश करते हैं। यदि हम शास्त्र सम्मत आचरण करें गुरुदेव की अधीनता स्वीकार करके उनके द्वारा बताया हुआ साधन करें जो साधन बता दे तो निश्चित हमारा हृदय आनंद से भर जाएगा वो आनंद शरीर विशेष पीड़ा से युक्त हो या मृत्यु का अवसर आ रहा हो या बड़ा-बड़ा कष्ट हो तो भी उसको शोक या भय नहीं होगा उसे आनंद कहते हैं। शरीर संबंध से वो बिल्कुल ऊपर उठा हुआ महापुरुष होता है।
इससे भगवत आनंद की प्राप्ति होती है। इसलिए सबको चाहिए कि वन को मारना सीखा जाए। हमारा मन ही हमको भगवान के दरवाजे तक आकर के भी विमुख कर देता है। अब जैसे हम लोग सब भगवान के दरवाजे आ चुके हैं। वृंदावन धाम में यह प्रथम सीढ़ी है प्रकट वृंदावन यही से प्रवेश है दिव्य वृंदावन चिदानंद वृंदावन में जहां नित्य निरंतर प्रिया प्रीतम रस की वर्षा कर रहे हैं पर सत जुगल किशोर वो इसी वृंदावन से प्रवेश होगा ये वृंदावन जो आप देख रहे हैं। यह वृंदावन में जब आसक्ति हो जाती है, दृढ़ संकल्प बन जाता है कि अब वृंदावन को नहीं छोडूंगा।
चाहे प्राण निकल जाए और निरंतर जुगल सरकार की सेवा और भजन होता है। उसके फिर हृदय में वृंदावन मारे उ वृंदावन और माया काल जहां नहीं व्यापत माया का एक त्रिगुण स्वरूप जो है यह नहीं है विनाशी नहीं है वो अविनाशी एक शत रसमय वृंदावन है उसी वृंदावन में हम आ गए मानो द्वार पर आ गए अब हम अपनी इंद्रियों को अपने मन को गुरु आज्ञा में चलावे मनमानी आचरण ना करें मनमानी आचरण करने से भगवत विमुक्ति हो जाता है जब हम गुरु आज्ञा में चलते तो गुरु आज्ञा का मतलब होता है सीधा रोड मनमानी आचरण का मतलब होता है भूल भुलैया में फंस जाना।
तो भूल भुलैया रूपी माया के मार्गों से बचकर पहला गुरु के सिवा हम किसी के भी उपदेश को अपने जीवन में ना उतारे। जो गुरु ने हमें उपदेश किया उससे अगर मिलता है तो हम मान लेते हैं नहीं तो नहीं मानते। इसीलिए रस में संगोष्ठी कहास ने कहा इसीलिए कहा इष्ट मिले और मन मिले मिले भजन रस रीति कहा निशंक हो मिलिए तासो कीजिए प्रीत हमारी जो गुरु प्रणाली है जो गुरु भजन प्रणाली है उस प्रणाली को पहले समझना चाहिए कि हमारी गुरु भजन प्रणाली क्या है फिर समझ लो हमारी गुरु भजन प्रणाली लिए सबसे पहली बात गुरु आसक्त प्रथम सेवई गुरु के चरण जिन धर्म कहो सब करन नाम प्रताप बताइयो अब दूसरा पहला गुरु आसक और दूसरा गुरु प्रदत्त नाम मंत्र वाणी सेवा ये चार है चार सोपान है हमारे नाम मंत्र मंत्र अपवित्र दशा में नहीं जपा जाता।
जब पवित्र है हम तो हर समय मंत्र जप रहे नहीं अगर जिस समय लग रहा पवित्र उस समय नाम और वाणी गायन हमारा जीवन है। हम जब वाणी गायन करते हैं तो हमारे प्रिया प्रीतम वही पास में छुप के सुनते हैं। जैसे हम चतुरासी जी गा रहे हैं तो प्रिया प्रीतम एक पर्दा डाल के माया का छुप कर सुनते हैं। नाम वाणी जहां श्याम श्यामा तहां नाम वाणी सुनत श्याम श्यामा सुबस नाम वाणी निकट श्याम श्यामा प्रकट नाम मंत्र वाणी और सेवा जिसके जीवन में ये चार है वो हरिवंश धर्म की प्रणाली को समझ जाएगा।
अगर इन चारों में से एक हटा दिया जाए जैसे तखत या चार पाई के एक पावे को काट दिया जाए तो बैठने लायक नहीं रहेगी वो गिर जाएगा चारों होना चाहिए नाम मंत्र वाणी और सेवा ये चार चीजें हमारे जीवन में निरंतर चलनी चाहिए कभी नाम कभी गुरु मंत्र कभी वाणी और सेवा सेवा में ही नाम वाणी गुरु मंत्र है। यह भी समझना है। हमारे यहां यह नहीं है कि आप एकांत कमरे में बैठ गए और माला चला रहे। हमारे यहां हाथ में झाड़ू है। और मुख में नाम है या मंत्र है या वाणी है। पानी गुनगुना रहे या नाम जप कर रहे या मंत्र जप कर रहे।
रोटी बना रहे, पोछा लगा रहे, चंदन घिस रहे। हम जो भी श्री जी की सेवा है चाहे खड़े होने से लेकर के वहां श्री जी के चंदन लगाने तक ये सब सेवा है। अगर हम सेवा में नाम मंत्र और वाणी तीही का प्रयोग नहीं करते तो सेवा अधूरी है। सेवा पूरी तभी मानी जाएगी जब नाम जपते हुए या मंत्र जप करते हुए या वाणी गायन करते हुए की जाए। सेवा बाह्य होती है और यह आंतरिक होता है। केवल बाह्य करते करते आप ऊब जाओगे वो आपको लगेगा हम भजन के लिए आए थे और हमको काम में लगा दिया। अगर नाम वाणी और मंत्र चल रहा है तो आपका उत्साह सेवा में बढ़ता रहेगा।
देखो हम पढ़ाई की बात नहीं करते। हमें बेचैनी होती है जब हम बिस्तर में लेटते हैं। यार बिस्तर में लेटने से क्या होगा? समय बर्बाद होगा। अगर नाम जप नहीं होगा और मंत्र जप नहीं होगा और वाणी पाठ नहीं होगा तो तुम असंतुष्ट रहोगे। लिख लो क्योंकि ये बाह्य क्रिया हो रही है। अंदर से आप तो विषय चिंतन कर रहे हो तो आपको आनंद कैसे प्राप्त होगा? आनंद तो चिंतन से प्राप्त होता है। तो हम सेवा करते हुए अभ्यास करें कि नाम चल रहा है, मंत्र चल रहा है, वाणी कुछ नहीं तो जोई जोई प्यार थोड़ा गुनगुना गुनगुना के पद गा रहे हड़ा चला रहे अपने कार्य कर रहे हैं।
अच्छा अगर हम भगवत चिंतन नहीं करेंगे तो विषय चिंतन होगा और विषय चिंतन होगा तो विषय क्रिया होगी। विषय क्रिया होगी तो सत क्रिया का जो प्रभाव है वो नहीं पड़ेगा। जो आपकी भागवतिक सत क्रिया है उसका प्रभाव जैसे दूध है और खटाई उसमें डाल दो। ये असत क्रिया खटाई की तरह है। जो भजन मार्ग है वह दुग्ध की तरह है। कभी उदाहरण में दिया है तू बालक नहीं भयो सयान काहे कृष्ण भजत नहीं नीके अति सुमिष्ट तज सुरभिन पै मन बंध तंदुर जल कामधेनु के दूध का त्याग करके चावल की धवन पीना चाहता है तू बालक नहीं है बड़ा सयाना है होश में होकर भजन कर हरिवंश तो जब हम सेवा सेवा में रत रहते हैं और ना नाम जप है ना वाणी गायन है ना मंत्र जप है तो मन विश्राम भोगों में ही करेगा तब आप मोबाइल में कुछ गलत देखोगे गलत चिंतन बनेगा गलत क्रिया होगी तब आपको लगेगा कि आए थे भजन के लिए हो क्या रहा है क्योंकि आप प्रणाली पे नहीं चल रहे जो गुरु प्रणाली है उस पर नहीं चल रहे सेवक शरण सदा रहे अनत नहीं विश्राम कह वाणी हरिवंश की और कह हरिवंश नाम हमारा विश्राम स्थल क्या है नाम वाणी नाम में ही मंत्र आ जाता है नाम मंत्र वाणी और सेवा ये चार हमारे पूरे 24 घंटे का चक्र है।
इसी में हमें घूमना है। अगर इससे अलग हुए तो फिर माया मार देगी राई के सब चलत होत और की और फिर हृदय आनंद से युक्त नहीं होगा और नहीं तो कितना आनंद मिलता है सेवा में ये हम कहा तुम्हें कैसे बताएं जब कल ये दो अमरूद पखे निकाले चटनी बनाना राधा पीठ ले जाओ खुदा की टूटा चटनी बनाना राधा पी एक-एक एक एक चीज श्री जी के लिए हमारा जीवन श्री जी के लिए है। तो आप सब उसी के लिए आए हो। तुम्हें श्री जी ने स्वयं घसीटा है। इसलिए सावधान होकर के गुरु प्रणाली पर चलो। सदैव संतों ने गुरु प्रणाली पर जोर दिया है कि आपकी गुरु की जो प्रणाली है उसी में चलो।
हम नाम जप करते हुए, मंत्र जप करते हुए, वाणी गायन करते हुए सेवा करें। हमारी उन्नति हो रही है कि नहीं हो रही है हमको इससे कोई मतलब क्योंकि अनेक जन्मों के पापों का नाश हो रहा है। हो सकता है साल दो साल हो जाए चाहे 10 साल हो जाए आपको समझने में ना आवे कुछ तो सेवा से हमारे धर्म की पूर्ति होती है। सेवा से हमारे प्रिया प्रीतम प्रसन्न होते हैं। और सबसे कठिन सेवक धर्म है। अगर कठिन बात कही जाए तो सबसे सेवक धर्म कठोरा क्यों सेवक अपने सुख के लिए नहीं रहता सेवक स्वामी के सुख के लिए रहता है सेवक सुख चाहे मान भिखारी व्यसनी धन शुभगत गति में बिचारी नहीं होगी पूरी जिंदगी भजन करके यह कर रहे हैं क्योंकि यही सर्वोपरि बात है श्री जी की चाकरी भाई जी इतने बड़े महापुरुष उन्होंने एक पद में लिखा है राधा मुंह पे आग डरो उसमें नीचे कहा है मुझे झाड़ूदार बरो मुझे झाड़ू लगाने वाला अपनी कुंज की बना ले तो ये वृंदावन क्या है श्री जी की कुंज नहीं है क्या निकुंज भाटी वृंदावन ये वृंदावन यहां जो भी कर रहे हो सब श्री जी के लिए श्री जी ने आपको चयन किया संसार से हटा के अपनी सेवा के लिए तो अब जीवन सेवा में दे दो।
तुमने जीवन अर्पण किया कि श्री जी इतने कृपालु है कि श्री हरिवंश शरण जे आए। श्री हरिवंश शरण जे आए। श्री वृषभान कुंवर नंद नंदन निज कर अपनी चिट्ठी चढ़ाए। विश्वास करो एक सिद्ध महापुरुष लिख रहे नागरीदास कि जो हरिवंश महाप्रभु की शरण में हुए तो प्रिया प्रीतम ने निकुंज के रजिस्टर में उसका निज कर अपनी तिथि चढ़ाए। सबको नाम मिला हुआ है। श्री जी ने दिया है। बोले क्या बोले? कृष्ण मोहिनी शरण वहां लिख गया। वहां लिख गया रजिस्टर में कृष्ण मोहिनी शरण अमुक शरण वृंदावनेश्वरी शरण ये सब उनका नाम है।
वृंदावनेश्वरी वो है उनकी शरण वहां रजिस्टर में लिखा है। गुरु प्रदत्त नाम वहां रजिस्टर में लिख गया। अब वहां जब तुम यहां चार का पालन करोगे नाम, मंत्र, वाणी, सेवा तब वहां से नाम आएगा। क्या बात? यह शरीर का नाम है। वहां से नाम आएगा स्वरूप का। यह मनगढ़ंत थोड़ी होता है। वहां से पोस्ट होता है। और हृदय में स्वरूप और वही नाम जागृत हो जाता है। रजिस्टर में तो नाम लिख गया है। लेकिन कठ ना पावे इतना ध्यान अगर गुरु अपराध गुरु अवज्ञा बन गई तो लाल स्याही फिर जाएगी क्योंकि लिखा पढ़ी श्री जी के हाथ नहीं है लाल टू के हाथ है श्री जी तो इतनी कृपाल है कि कभी लाल स्याही फेर ही नहीं सकती अनुख्या अनंतता आ लिखना पढ़ना ठाकुर जी के हाथ है वो तो श्री जी केवल मुस्कुरा कर स्वीकृति देते हैं हां ठीक है अगर आप गुरु द्रोह करो कबीरा हरि के रूठ उठते गुरु की शरण जाए और का कबीर गुरु रूठते हरि नहीं हो हरि उसी समय लाल चाय फेंक देते कि हरिवंश चरण
हुए लेकिन तेन वचन मानत गुरु द्रोही निश दिन करत आपनो भयो तो इत परमार्थ है बहुत कुछ नहीं सब नष्ट इसलिए गुरु परंपरा के अनुसार चलो गुरु की अधीनता स्वीकार करो तो बड़े-बड़े सिद्धों के पास भी वो सफल नहीं हो सकते जो मनमानी आचरण करने वाले जो मनमुखी है इसलिए गुरुमुखी आप लोग हो जब जीवन अर्पित किया है तो इसका निर्वाह हर समय हम आपके पास नहीं है लेकिन हमारा मंत्र हमारा नाम वाणी ठाकुर सेवा हर समय आपके पास है वही गुरु का स्वरूप है तो सत्संग का सार बात है हमें किसी की सुनना नहीं हमें कहीं जाना नहीं।
अपने गुरु की बात माननी है और अपने गुरु की प्रणाली से चलते हुए हमें जीवन व्यतीत करना है। बस हो गया इसी से हुआ। बस बने रहो। चुपचाप बने रहो। कष्ट सहो तुम्हें क्या कष्ट है? केवल मन की भी बात है। मन मुखी बात है। अगर मन मुखी ना चलो तो कोई कष्ट नहीं। आप बताओ क्या कमी है? देखो हम भजन की प्रणाली बता रहे हैं। गुरु जी की सेवा में रहते 10 वर्ष से तो सेवा हुई है। अपनी कुटिया आते 11:00 बजे श्री जी की मंगला करते। आप तो देखा है झाड़ू पोछ करते दो मिनट में नहा करके और इत्र लगा दिया रोटी मांगने गए खा लिया।
फिर गुरु जी की सेवा में पहुंच गए। हमें ये नहीं रहा कि हमारी श्री जी गुरु जी है। आ हा जय जय। हमारी श्री जी गुरु जी है। उनकी आज्ञा में हमें कुछ मान लो आप 10 घंटे किए अपनी कुटिया में गए तो ठाकुर जी को प्रणाम करके सो जाओ। तो आप गुरुदेव को मनुष्य समझ रहे हैं तो पता नहीं होगा अगर सर्वज्ञ स्वामी समझ रहे तो एक एक घड़ी की बात देख रहे एक एक सेकंड की बात देख रहे तुम्हें संभाल कौन रहा है? फिर अगर गुरुदेव नहीं जानते तो तुम्हें संभाल कौन रहा है? गुरुदेव तुम्हें नहीं जानते और तुम शरणागत हो।
ऐसा कैसे हो सकता है? अब जानने का मतलब ऐसे थोड़ी है कि सामने बैठकर के प्यार करे। यहां आंतरिक प्यार होता रहता है। सबका मंगल सबका और सब उत्साह संपन्न है। 150 साधक यहां रह रहे हैं। 150 सब उत्साह संपन्न सेवा में सब मतलब हम तो प्रणाम करते हैं यहां के साधकों को। चाहे जो संप्रदाय हो गुरु आज्ञा पर टिका हुआ है। अगर गुरु आज्ञा पर नहीं तो फिर तो ये सारी की सारी सेवा गुरु की हो रही है। अच्छा गुरु कौन है? लाडली जो लाडली जो गुरु है। गुरु जी लाडली है। अगर हमारी ये भावना पुष्ट हो गई तो फिर उद्धार होने में देर नहीं लगेगी।
गुरु को मनुष्य मानकर कि वो तो हमको देखे भी नहीं। हमसे बात भी नहीं की हमको क्या जाने नहीं वो उसी समय से जान रहे हैं जब से तुम घर से निकल कर के आए थे वही निकाल के लाए हैं तुम थोड़ी निकल के आए हो तुम्हें वही निकाल के लाए वही तुम्हारा पोषण कर रहे हैं गुरु तत्व है हमसे पूछो खड़े होके कि अच्छा अगर हमें जानते हो तो हमारा नाम क्या है तो हमें नहीं दिया लेकिन हमें पता नहीं लेकिन गुरु तत्व जान रहा है वो सब कुछ देख रहा है वो अखंड मंडलाकारम व्याप्तम गुरु तत्व है उस तत्व की आराधना करनी है तो जहां सेवा कर
रहे हो तत्व नहीं देख रहा है कि तुम क्या सेवा कर तो ये बात गलत है जो ऐसा साधक तो आप जिनको जानते हैं और आप एक है जो दूर से सेवाएं कर रहे हैं 810 घंटे वो भी कर रहे हैं तो क्या फल की प्राप्ति दोनों को उसको ज्यादा होगी जो दूर है जो नजदीक वाला हमारा चिंतन नहीं करता दूर वाला हमारा चिंतन नहीं करता जब हम गुरु जी के दर्शन करने पीछे गए थे तो गुरु जी ने यही कहा था लोग थे कि दर्शन से ज्यादा चिंतन है वो हमारा चिंतन करो 15 दिन महीना में कभी आ जाओ हमारा चिंतन करो वो यही आज्ञा पाल 15 दिन में बोले हमारा चिंतन करो कितनी कृपा है कि वो ये बात कह रहे हैं ये नहीं कहा श्री जी का चिंतन करो जय जय हो ध्यान देना जय हो गुरु जी ने कृपा करके कहा कि हमारा चिंतन करो ध्यान मूलम कितनी करुणा उनकी कि वो स्पष्ट ये नहीं कहा कि राधा वल्लभ लाल का चिंतन करो तब दर्शन उनहीं के दर्शन से पूर्ण हो जाएगा ऐसा नहीं कहा उनका चिंतन करो ये बात समझो कि हम चिंतन कर रहे हैं और दूर है तो हम नजदीक है हम नजदीक है चिंतन नहीं कर रहे तो हम दूर है
चिंतन की नजदीक ता मानी गई है। हजार कोस दूर से भी अगर गुरु का चिंतन करे तो गुरु संभाल लेगा क्योंकि वो वही व्याप्त है। जैसे आकाश है ना ऐसे गुरु है। गगन सदसम ब्रह्मंदम परम सुखदम केवलम ज्ञान मूर्तिम द्वंदातीतम गगन सदसम ततस लक्षम एकम नित्यम विमल अचलम सर्वध साक्षी भूतम भावातीतम त्रिगुणितम सद्गुरु तम नमाम ये सद्गुरु का स्वरूप इसलिए खूब आनंद पूर्वक भजन करो और इधर उधर भटको मत श्री राधा की जय
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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