॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

भागवत कथा (भाग-24) / ध्रुव जी को नारद जी का उपदेश / ध्रुव जी का कठोर तप एवं भगवद् दर्शन

▶ YouTube

पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदा वनेश्वर तव व पदारविंदम प्रेमा मृत मकरंद रसो पूर्णम हृद्य पितम मधुपति स्मृता मु ग्रम निर्वा पय परम शीतल मा शयाम परम शीतल मा आश्रया परम सच्चिदानंद घन प्रेम स्वरूप श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले युगल सरकार श्री श्यामा श्याम समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी यमुना रस रानी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिकर सबकी अपार कृपा हम पर है बस हमें जरूरत है इस कृपा का सदुपयोग करने की कृपा का अनादर करने से

हमारी दुर्गति होती चली जा रही है हमारा अंतःकरण चतुष्टय बुद्धि मन चित्त अकार पांच ज्ञान इंद्रिया पांच कर्मेंद्रियां इस सृष्टि के पांच भोगों में ही अपने संपूर्ण जीवन को नष्ट कर देते हैं शब्द स्पर्श रूप रस गंध यही विषय विविध रूप धारण करके हमारी इंद्रियों को हमारे अंतः को आकर्षित करके हमें अपने परमात्मा स्वरूप का विस्मरण कराकर यह दुर्गति की तरफ ले जा रहे हैं अशांति घोर अशांति चिंता शोक भय मृत्यु य महान दुख इसी दुख समस्या से छूटने के लिए भगवान ने हमें

मनुष्य देह दिया व अत्यंत दुर्लभ समागम दिया संत समागम के समान कोई लाभ नहीं है यदि हम उनकी आज्ञा का पालन करें तो इससे बड़ा कोई तप नहीं है इससे बड़ा कोई पावन करने वाला तीर्थ नहीं है मुद मंगल में संत समाज जो जग जंगम तीर्थ राजु चलते फिरते तीर्थराज य संत महापुरुष जन है यदि हम उनका अवगाहन करें अर्थात जैसे हम तीर्थराज प्रयाग में संगम में स्नान करते हैं तो हमारी भावना हमारी श्रद्धा कहती कि हम निष्पाप हो रहे हैं ऐसे ही संत समागम के वचन रूपी संगम में जो ज्ञान भक्ति वैराग्य इससे भरपूर है इनका जहां संगम है वही संत समागम है नहीं तो पाखंड बिन विवेक वैराग्य और भक्ति बिन सत्य न को मानो भगवत विमुख कपट चतुराई सो पाखंड जानो जहां कपट है हम चर्चा तो प्रभु की कर रहे हैं लेकिन आकांक्षा धन की कर रहे हैं भोग विलास की कर रहे मान प्रतिष्ठा की कर रहे वो मुद मंगलमय संत समाज जो जग जंगम तीर्थ राजू वो नहीं है जहां दंब है पाखंड है वो संगम नहीं है संगम है जहां विवेक अर्थात ज्ञान वैराग्य अर्थात समस्त भोगों का त्याग और

भक्ति अर्थात परमात्मा तत्व से प्रेम यह हुआ संगम भगवत कृपा से भगवत प्रेमी महात्माओं का संग मानो ज्ञान वैराग्य भक्ति के संगम में हम गोता लगा रहे हैं संगम में तीर्थराज प्रयाग में स्नान करने पर पाप नष्ट होता है पाप प्रवृत्ति नहीं जो पाप की जड़ है वह है पाप प्रवृत्ति उस संत समागम उस साधु समागम से पाप भी नष्ट हो जाते हैं और पाप प्रवृत्ति भी जड़ से नष्ट हो जाती है और भगवत प्रीति की वृत्ति जागृत होती है इसलिए हमारा यह जन्म व्यर्थ नहीं जाना चाहिए मानते हैं भगवान की माया बड़ी दुरंत है पर कृपा माया से बलवती है हम कृपा पात्र हैं अब हमको माया बहुत दिन तक परास्त नहीं कर सकती क्योंकि धीरे धीरे हमें इसके वव पेच पता हो रहे हैं और गुरु कृपा से युक्तियां मिल रही कि हम कैसे इस माया को परास्त करें पर यदि आप उन युक्तियों को स्वीकार ना करके मनन ना करके मनमाने आचरण करेंगे तो फिर आप नहीं बच सकते फिर तो ढोंग होता रहेगा चाहे साधु भेष धारण करो चाहे जो भेष अंदर से सब पाखंड कूड़ा करकट बाहर से सुंदर वेस वो कोई काम

लायक नहीं दर्शन भक्त अनूप रूपन शोभित प्रीति बनु भरम भक्ट कत भूप श्री हरिवंश कृपा बिना दर्शन में बड़े सुंदर भक्त लगते हो लेकिन हृदय से वही पाखंड वही दम वही माया वही नाना प्रकार के नाटक तो इससे संसार भूल सकते हैं तुम भगवान को नहीं रिझा सकते तुम भगवत प्रेमी महात्माओं को नहीं फसा सकते ये दम पाखंड अपना ही नाश करता है इसलिए मनमानी आचरण छोड़कर शास्त्र सम्मत आचरण करो जो गुरुदेव के वचन है गुरु वाणी उसके अनुसार चलो तो तुम्हारा जीवन प्रकाशित हो जाएगा अभी अंधकार में है अभी तुम कुछ का कुछ समझ रहे हो परमात्मा तत्व में ही भाषित होने वाले नाना को भोगों को सत्य मानकर शास्त्र गुरु देव की आज्ञा का उल्लंघन करके मन माने आचरण कर रहे हैं यह अंधकार और प्रकाश का स्वरूप है सत्य वस्तु का बोध हो जाना एक मात्र परमात्मा ही सर्वत्र विराजमान है जब यह बात आ जाएगी तो भोगा आकांक्षा ही नहीं रह जाएगी सब घण जैसे वमन वमन को कोई खाना नहीं चाहेगा जो खाकर उलट दिया जाता है ऐसे ही वमन के समान भोग लगते हैं उसको जो भगवान के

चरणारविंद की भक्ति करता है आखिरकार देखो ना इस जन्म में सब कुछ देख लिया एक बार प्रभु को पाक देखो एक बार परमात्मा से चित् लगा तो देखो पर ऐसा आकर्षण माया का है कि प्रभु दिखाई नहीं दे रहे माया दिखाई दे रही तो लगता इसे भोग लेते हैं बस यही हमारी फिसलन की वृत्ति हमें आध्यात्म की ऊंचाई पर नहीं चढ़ने दे रही आप किसी भी पावन चरित्र को महापुरुष के सुनिए उसमें उनका प्राण समर्पण बलिदान और पूरा जीवन भारी कष्ट में सह करके तब व जयति जयति जग उच्चर संपूर्ण संसार उनकी जय बोलता है किसी भी मार्ग में देखि कल आपने सत्संग सुना भगवती अंबा पार्वती जी भगवान शिव के लिए कितना कठिन तप किया परीक्षा हुई कि तुम्हें वैकुंठनाथ भगवान श्री हरि को पति रूप में वरण करा देंगे छोड़ो तपस्या नहीं कोटि जन्म लग रगर हमारी बर संभ नत राहो कुवारी करोड़ बार जन्म लूंगी हर बार देवाधि देव महादेव शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए ऐसे ही कठोर तप करूंगी यह बात बिना तप किए बिना कष्ट सहे बिना इंद्रियों की विलासिता का त्याग किए कोई सत्य

सच्चिदानंद के ज्ञान को या प्रेम को प्राप्त कर पाया है क्या प्रत्येक चरित्र हमें उपदेश देते हैं भोग विलासिता का त्याग त्यागा शांति अंतरम त्याग से तत्काल शांति प्राप्त होती है और शांति ही सुख में निमग्न करती है अशांत कुता सुखम जो अशांत पुरुष है वह सुखी कैसे हो सकता है और शांति त्याग में और हमको सिखाया जाता है मन बुद्धि यह सिखा रहे हैं भोग में शांति यह भोग लो शांति मिल जाएगी यह भोग इकट्ठा कर लो शांति मिल जाएगी और जिन्होंने भोगों की रचना की वह भगवान कह रहे त्यागा शांतरम इनका त्याग कर दो अंदर से इनकी भोग वृत्ति का तो तत्काल शांति मिल जाएगी और शांत पुरुष ही संपूर्ण दुखों की निवृत्ति रूपी महान अखंड आनंद को प्राप्त होता है इसलिए मन को संभालिए बुद्धि को संभालिए और इस जन्म में एक एक सेकंड अपने प्रभु के चिंतन में लगाते हुए अपने कर्तव्य कर्म का पालन कीजिए कर्तव्य कर्म त्याग कहीं नहीं लिखा अ अपने कर्तव्य कर्म का पालन करते हुए प्रतिक्षण भगवान का सुमिरन करने वाला दुख सुख को समान भाव से सहने वाला ऐसे

भगवत प्राप्त हो जाता है जैसे पिता की प्रॉपर्टी पर पुत्र का सरकारी रूप से अधिकार हो जाता है ऐसे अधिकारी परम पद का हो जाता है जो हर क्षण नाम जप करता है और प्रभु के द्वारा दिए गए विधान चाहे वो विपत्ति हो या पति सुख हो या दुख आनंद पूर्वक सह जाता है मेरे स्वामी के द्वारा किया हुआ विधान मेरे लिए परम मंगलमय है जोई जोई प्यारो करे सोई मोही भावे पर यह स्थिति तभी आएगी जोई जोई प्यारो करे सोई मोही भावे तेरा किया मीठा लागे ज ज राख हो त्य त्य रहितो हो हरि यह तभी स्थिति जब निरंतर नाम चल रहा है यदि नाम नहीं चल रहा तो बातें बनाने से आप माया की इस विपत्ति संपत्ति रूपी जाल से दुख सुख रूपी जाल से आप नहीं बच सकते आपको गिरना पड़ेगा आपको दुखी सुखी होना पड़ेगा भजन स्थिति प्रदान करता है सुख दुख के समय कृत्वा लाभा लाभ जया जय कैसी मीठी स्थिति है सुख दुख में समान लाभ हान में समान जय पराजय में समान यह स्थिति भजन प्रदान करता है इसलिए निरंतर नाम जप और अपने कर्तव्य का पालन गोस्वामी श्री तुलसीदास जी महाराज संपूर्ण

ज्ञान वैराग्य और भक्ति के रहस्य के ज्ञाता है कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जो गोस्वामी तुलसीदास जी की सूक्ष्म दृष्टि से बचा हो चाहे वह शुद्ध ब्रह्म बोध हो या घोर वैराग्य हो या लोक धर्म हो या भागवत धर्म हो या प्रेम धर्म हो वह कह रहे हैं इस कलिकाल में दिव्य सिद्धि केवल भगवन नाम जप से मिलेगी हमारे शास्त्र भी कहते हैं कृति युगे ध्या ताया यजत मुख द्वापर परिचर्या याम कलत धरी कीर्तना सतयुग में ध्यान प्रधान भगवत प्राप्ति त्रेता में यज्ञ प्रधान भगवत प्राप्ति द्वापर में पूजा प्रधान भगवत प्राप्ति कलयुग में नाम प्रधान और वैसे तो च जुग च शति नाम प्रभाव चारों युगों में चारों वेदों में चारों वर्णों में कोई भी हो चारों आश्रमों में चाहे ब्रह्मचर्य आश्रम हो वानप्रस्थ आश्रम हो गृहस्थ आश्रम सन्यास आश्रम सब में नाम यदि नाम जप नहीं है तो सब खोखला है हृदय खोखला रहेगा और हृदय खाली रहेगा तो काम आदि विकार उसको परास्त करते रहेंगे गोस्वामी जी कह रहे हैं कलिना काम तरु राम को भगवान का नाम एक कल्प तर है जो चाहोगे प्राप्त

हो जाएगा हरिवंश महाप्रभु कहते हैं मेरी सो क्यों कसम क्यों दिला रहे हैं क्योंकि आजकल विश्वास की बहुत कमी है असत कार्यों में प्रश्न नहीं होगा गंदे आ चरणों में प्रश्न की झड़ी नहीं लगेगी लेकिन सत चरण में भगवत मार्ग में भगवान में प्रश्न के ऊपर प्रश्न इसीलिए कह ही परलो सकल सुख पावत मेरी सो कृष्ण गुण संच मेरी सो भैया कृष्ण गुण संच तुम्हें मेरी शपथ है कृष्ण के गुणों का गान करो खूब नाम और गुण यही संचय करो यही धन है अगर आपके जीवन में नाम नहीं है भगवन नाम रूपी धन एकत्रित नहीं किया तो तुम्हारे साथ वही पाप जाएगा और तुम्हारे शुभ कर्म जाएंगे बारबार जन्म मरण के चक्र में फसो ग चाहे जितने यहां बड़े धनी हो तुम दरिद्र हो यदि तुम्हारे पास नाम रूपी धन नहीं कबीरा सब जग निर्धना धनवंता नहीं कोई वंता सई जानिए जाके राम नाम धन हो भगवन नाम रूपी धन जिसके पास वही धनवान नाम जप कर रहे हैं मानो हम कल्पतरु प्राप्त कर ले कल्पतरु जो चाहो व प्राप्त करा देगा अब हम बाजार में गए बड़ी कीमती वस्तु पसंद की लेकिन पैसा नहीं मांगने

से दे देगा क्या नहीं मिलेगा ऐसे संसार य बाजार है अगर इसमें तुम्हें कोई वस्तु चाहिए तो तुम्हारे पास सुकृत चाहिए पुण्य चाहिए कहां है चाह कर रहे हो बड़ी ऊंची आचरण कर रहे हो नीचे और तुम्हारे पास ना नाम रूपी धन है ना पुण्य रूपी धन है तो मांगने से चाहे मंदिर में मांगो जाके चाहे जा ऐसे नहीं पूर्ण होता है नहीं सबके पूर्ण हो जाते कामनाए तुम्हारे पास भजन चाहिए तप चाहिए सुकृत चाहिए कबीरा सब जग निर्धना अगर धन है तो त्रिभुवन में जो चाहोगे वो प्राप्त हो जाएगा वो धन है परम धन राधा नाम धार श्री राधा श्री राधा श्री राम श्री हरि श्री कृष्ण जो नाम प्रिय हो जो गुरु मुख से नाम मिला हो यही परम धन है दल निहार दारिद्रय घोर घन घाम को कलि नाम काम तरु राम को य नाम जो जितना नाम जपता है दरिद्रता नष्ट हो जाती है दरिद्रता देखो वैसे ही तो अपने को बहुत धनी समझेंगे बड़े आदमी मानेंगे लेकिन इतने नीच दरिद्र है जिधर दृष्टि जाती ब भोग दृष्टि भोग वासना माता बहन की तरफ दृष्टि जाए तो गंदी दृष्टि जिधर देखो गंदगी ही गंदगी भरी चली

जा रही वासना इतनी बड़ी शराब पीना मांस खाना व्य विचार करना यह नाना प्रकार की गंदगी दरिद्र इन्ह बड़ा कहोगे यह बड़े हैं नहीं बड़े वह हैं जो अपने प्राणों तक का न्योछावर धर्म के लिए किया भगवान के लिए किया समाज के लिए किया वो बड़े हैं बड़ा तो है जिसका मन परमात्मा में स्थित होकर शांत हो ग और जगत के लिए अपने प्राणों तक को देने की क्षमता वो बड़े कहे गए दल निहार दारिद्रय दरिद्रता नष्ट हो जाएगी यदि नाम जप करोगे उदारता आ जाएगी दरिद्रता क्या है प्रकृति के भोग

से सुख लेने की इच्छा का नाम दरिद्रता है और सुख की चाह एकमात्र परमात्मा में और सबको सुख देने का भाव यह उदारता है यह धनी पना है दरिद्रता का मतलब यह नहीं कि रुपया नहीं है उसके पास मकान नहीं है खाने को नहीं तो दरिद्र है नहीं अगर वह नाम जापक है भगवान में चित्त जोड़े तो उससे बड़ा देवराज इद्र भी नहीं है वह देखने को आपको गरीब लग रहा है लेकिन वह बहुत बड़ा धनी है जो वासनाओं के गुलाम है इंद्रियों के गुलाम है मन के गुलाम है वह दरिद्र है भोगों में जिनकी तिया भटक रही है ये कैसे मिटेगा दल निहार दारिद्र्य हृदय की बात कहता हूं सब संतों की बात कहता हूं सब सद ग्रंथों की बात कहता हूं जिसके जीवन में नाम है वही महान बनता चला जाएगा और कुछ नहीं आप दान पुण्य जीवन भर कर ले एक अपराध वैष्णव अपराध बन जाए क्षण में सब नष्ट कर देगा किय सुकृत बहु जन्म के छिन में डायरेक्ट खए नाम अविनाशी है अपराध हो जाएगा तो नाम रुक जाएगा नष्ट नहीं होगा और जब शुरू होगा तो जहां से जिस संख्या से रुका है वहीं से शुरू होगा नाम दुकाल दुख

दुर्भिक्ष कभी भी कहीं भी किसी को भी यह दुर्भिक्ष नहीं बकता क्या असंतोष यह बहुत बड़ी दुर्भिक्ष होता है बिन संतोष न काम न साही और अछत काम सुख सपन नाही जब तक संतोष रूपी धन नहीं आता तब तक कामनाओं का नाश नहीं होता और जब तक कामनाएं नष्ट नहीं होती तब तक विश्राम नहीं मिलता सुख स्वप्न में भी नहीं मिलेगा जिसकी कामना पर कामना बढ़ती चली जा रही तो दुर्भिक्ष क्या है भोगों में असंतोष यह कैसे मिटता है बोले यह भी नाम जप से ही मिटता है दल निहार दारिद्र्य ना मिलना सुविधा ना मिलना बहुत तरह की परेशानियां यह कोई दुकाल नहीं सबसे बड़ा दुकाल है असंतोष असंतोष हमारे हृदय में है तो त्रिभुवन पति इंद्र बन जाए देख लो ना त्रिभुवन पति इंद्र अप्सराओं का स्वामी होकर के भी गौतम ऋषि आश्रम जाता है और वहां गंदा शरण करने की रचना रचता है है ना दुर्भिक्ष देवराज इंद्र के अंदर भी दुर्भिक्ष है अप्सराओं का ऐसी अप्सराएं जो भूतल में उतर जाए तो ऋषि मुनियों के मन में छोभ पैदा कर दे उनका स्वामी होकर एक महात्मा की कुटी में जाता है और वहां

गंदा आचरण का षड्यंत्र रचता है यह दुर्भिक्ष बिना भजन के नहीं मिटता वो महान है जो नाम जप करता है उसका हृदय इतना संतोष रूपी धन से भला रहता है कि कुछ चाही नहीं रहती सकल कामना हीन ज राम भगति रस लीन जो कामनाओं का त्यागी भगवान के भजन में मगन है धन्या धन्य है उसका जीवन मम भक्ति युक्त भूवनम पुना वो पूरे त्रिभुवन को पावन करने की सामर्थ्य रखता है साति साति सालोका तारती और दुख जितने भी शारीरिक दुख हैं ये कोई दुख नहीं है दुख होता है मानसिक जब हमारा मन दुखी होता है मन विक्षिप्त होता है मन अशांत होता है तो बाहरी चाहे जितनी सुख सुविधा हो चैन नहीं मिलती और शरीर में रोग है शरीर कष्टप्रद है भारी विपत्ति बाहर है खानपान की भी सुविधा नहीं लेकिन मन प्रसन्न है मन स्वस्थ है विचार स्वस्थ है इससे बड़ा कोई आनंद नहीं तो बोले दुख मिटाने का कारण बोले मन का प्रसन्न हो जाना मन प्रसन्न कब होगा साव मन कृष्ण पदार विंद जब आनंद समुद्र भगवान के नाम का जप करते हुए मन भगवान के चरणों में है तब समस्त दुख मिट गए गोस्वामी

तुलसीदास जी महाराज कह रहे बहुत जन्म बहुत कर्म बहुत सब हुआ साधन लेकिन आज जो मुझे विश्राम मिला जैसे काग भुंड जी कह रहे बड़े बड़े महापुरुष कह रहे पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाही जा की कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसी दास हो पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाही जरा परम विश्राम शबद पर अब पहुंच ही नहीं है शब्द में तो कैसे समझोगे परम विश्राम जन्म जन्म की दौड़ भाग मिट गई जीव परमात्मा प्राप्त हो गया यह परम विश्राम अब कोई चाह कोई कामना कोई यह अद्भुत स्थिति इसी जन्म में प्राप्त होगी सुअर कुत्ता बनक नहीं होगी मनुष्य जन्म में होगी इसलिए समस्त दुखों को मिटाने के लिए एक मात्र भगवान का नाम और दोष काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर ये छह विकार ऐसे हैं कि भगवान और भगवान के ईश्वर कोटि के जो महापुरुष है उनको छोड़कर सृष्टि में कोई भी जीव ऐसा नहीं जो इनका गुलाम ना हो काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर और भगवान का साक्षात्कार जब होता है तो सट विकार जित अनघ अकामा जो इन छह विकारों को जीत लेते हैं जो निष्पाप है जो निष्काम है उनको

भगवत साक्षात्कार होता है भगवान उसके हृदय में प्रकाशित हो जाते हैं काम क्रोध मद मान न मोहा लोभ न छोभ राग नहीं द्रोह जिनके कपट दंभ नहीं माया तिनके हृदय बसह रघुराया जो काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर से जिनका हृदय रहित हो गया है ना राग है ना द्वेष है ना छोभ है ना हर्ष है ना उदगता है भगवान उनके हृदय में प्रकाशित हो जाते हैं यह स्थिति कैसे आएगी बोले नाम जप से सम दोषों का नाश खूब नाम जप करो निरंतर अंतर ना पड़ने पावे नष्ट हो जाएंगे और घोर घन घाम को यह अज्ञान

की जो तपन है जलन है य घोर अशांति में जीव भ्रमण कर रहा है बाहर से देखने में लगेगा क्या बढ़िया गाड़ी से उतर रहा क्या बढ़िया कपड़ा और जब एकांत में बात करो तो आंसुओ से बात होती व आंसू भगवत प्रेम के नहीं होते वह अज्ञान जनित अशांति के होते हैं यह अज्ञान जनित अशांति उस उसी के हृदय से नष्ट होती जिसके हृदय में मधुर मधुर नाम चलता है नाम नाम लेत दाहिन होत मन बाम विधाता बाम को कल नाम काम तरु राम को बहुत बढ़िया बात है जो विधान हमारे भाग्य में लिख गया है बाम माने प्रतिकूल उसको भी अनुकूल बना देगा यदि नाम जप करोगे विधाता का मन अनुकूल कर देगा तुम्हारा मन अनुकूल कर देगा भाग्य की रेखा को अनुकूल कर देगा यदि नाम जप करोगे यही तो करना है लेकिन भगवान के नाम में विश्वास नहीं लोगों को लोगों को जंतुर में विश्वास है क्योंकि नाम जप करोगे तो मन जलाए ना पाप नष्ट होंगे ना तो लोग सोचते हैं पैसे के दम से हम अपनी भाग्य रेखा अपने प्रारब्ध मिटा देंगे त्रिभुवन में कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ नहीं हुआ कहा मुनीष हिमवंत सुन जो कुछ

लिखा लिलार देव नुज नर नाग मुनि को न मेटन हार कैसे कैसे यह महापुरुष ऐसे लिख दिए वाणी जी में देव नुज नर नाग मुनि को न मेटन हार एक मेट सकता है भगवान का नाम भगवान का नाम मेट सकता है कह रे नाम लेत दाहिन होत मन बाम विधा बाम को जो निरंतर नाम जपने का अभ्यास करते हैं तो प्रतिकूल विधान करने वाले विधाता अनुकूल हो जाते हैं सबकी शिकायत रहती मेरा मन ऐसा मेरा मन वैसा अरे विधाता के मन को पलट दे तुम्हारे मन की क्या बात नाम जप के देखो बोले नाम जप करते हैं मन नहीं लगता बड़ी गंदगी मन में आती है तो वही गंदगी तो मन से निकल रही आ नहीं रही और मन लगे ना लगे तुम्हारे को आग छुआ दिया जाए भूल से जबरदस्ती से क्या आप जलो नहीं मन लगे ना लगे आग तो दहि का शक्ति वो जला देगी तुम भोजन पा रहे हो मन लगे ना लगे पेट भर जाएगा ना ऐसे ही मन लगे ना लगे भजन करो तुम्हें भगवान की प्राप्ति हो जाएगी मन लग जाएगा देखो कह रहे नाम लेत दाहिन हो मन बाम विधाता बाम को कलि नाम काम तरु राम को जो नाम जप करता है उसकी भाग्य रेखा भी मिट जाती कल एक

उपासक ने प्रश्न किया था बाहर से पधारे हुए कि हमने सुना है कि कच्चे पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन पप के पाप जो होते हैं वो भोगने पड़ते हैं क्योंकि बड़े बड़े पुरुषों के भी शरीर में रोग देखा जाता है भोगना पड़ता है यह अज्ञानी जीवों को नाम जापक और भगवता में स्थित को नहीं कैसे देखा तो गया उनके शरीरों में तो शरीर का मतलब है कपड़ा कपड़े में दाग लग जाए या कपड़ा फट जाए तो हमको क्या परेशानी य ज्ञानी जीव को भोगना पड़ता है ज्ञानी को नहीं वह बहुत ऊंचाई पर रहता है

जहां शरीर के दुख सुखों का स्पर्श भी नहीं है दुख सुख का स्पर्श ही नहीं है बहुत समझने का विषय है जब तक शरीर राग है तब तक भोगना है और जब शरीर राग खत्म तो भोगना कहा आप देखो एक औषधि का प्रभाव कि किसी अंग में उस औषधि का प्रभाव किया जाए तो उस अंग को काटा जाए तो आंख खुली होने पर चेतना होने पर भी हमें कष्ट नहीं होता तो क्या भगवान के नाम के द्वारा मन को भगवता अंद में डुबो देने पर क्या शरीर का कोई कष्ट उसे पीड़ा पहुंचा सकता है नहीं पहुंचा सकता पर आपका मन शरीर राग में है इसलिए ये अनुभव ही नहीं हो सकता ऐसा लगेगा ऐसे कैसे होगा क्योंकि आपने अभ्यास नहीं किया शरीर से हटने का जो कुछ भी किया वो शरीर बन करके किया इसलिए शरीर में जो भी सुख और दुख आएगा उसे भोगना पड़ेगा यह चमत्कार भगवान के नाम में है आपने महामहिम परम पूज्य श्री गुरु अर्जुन देव जी का जब चरित्र सुना था तपते हुए बिल्कुल आग में लोहे के तवे प बैठे हैं बैठा ला विधर्मी उं ने ऊपर से तप्त बालू डाल रहे हैं और मुख से क्या निकल रहा उ वाहेगुरु वाहेगुरु

वाहेगुरु तेरा किया मीठा लागे ये कहा स्थिति है जरा एक चिनगारी छुआ के देखो फिर क्या याद आता है प्रभु याद आते हैं यह शरीर याद आता है फफोले पड़ रहे हैं यहां तक कि खोलते हुए तेल में डाल दिया क्या अपराध किया था केवल प्रभु के नाम में अपने धर्म में अडिग है बस यही तो बात है ना क्या अपराध था वो धर्म विरुद्ध आचरण करने वाले उनको जबरदस्ती धर्म विरुद्ध चलाना चाहते थे अपने प्राणों की बलि दे दी लेकिन आह नहीं बोला वही मुस्कुराहट वही जिव्या से वाहेगुरु वाहेगुरु किसी भी धर्म में आप देख लीजिए ठाकुर हरिदास जी को 22 बाजारों में मार कोड़े खाल खींच ली गई लेकिन हरि बोल हरि बोल दूसरा शब्द नहीं निकला प्रहलाद जी को कितना भयानक कष्ट दिया गया एक भी शब्द आ नहीं निकला यह क्या है अगर शरीर में होते तो उनको प होती उस शरीर में नहीं वह अपने स्वरूप में है जहां यह साधारण अग्नि की क्या दिव्यास्त्र भी प्रवेश नहीं कर सकते अग्नियास्त्र वायु आस्त वरुणा स्त यह प्रवेश ही नहीं कर सकते वह हमारा स्वरूप है हम अपने स्वरूप को भूलकर इस

मलिन देह में आसक्त हो गए इस अज्ञान रूपी जलन की शांति नाम जप से होगी बहुत बहुत समझने का विषय है अगर नाम जप नहीं तो सब शून्य है आप इतना समझ लो तुम्हारा तप तुम्हारा तीर्थ स्नान तुम्हारा दान पुण्य सब शून्य है और नाम है तो एक अंक लिख गया एक अब एक के बाद शून्य तो हर शून्य का महत्व हो गया और 10 गुना बढ़ता चला जाएगा कहत मुनीष महेश महातम उलटे सधे नाम को कल नाम काम तरु राम को गोस्वामी जी कह रहे हैं जिनको सीधे राम राम उच्चारण करना नहीं आता था मरा मरा रट करके वह ब्रह्म ऋषि पदवी को प्राप्त हो गए भगवान शिव इसका महत्व जानते हैं नाम का नाम के प्रताप से काशी में मरने वाले हर जीव को मोक्ष पदवी भगवत प्राप्ति कराते हैं नाम के बल से गले में समुद्र मंथन से निकला हुआ हलाहल विष आज भी भगवान शिव रोके हुए हैं एक घूंट पानी रोक लो अरे एक घूंट क्या जरा सा चला जाता है खो करने लगते हैं यहां जो पूरा हलाहल विष नील कंठ भगवान नाम पड़ा शिव जी का किससे बोले नाम से नाम के बल से हलाहल विष को इसलिए भलो लोक परलोक तासु जाके बल

ललित ललाम को तुलसी जग जा नियत नाम ते सोच ना कूच मुकाम को कलि नाम काम तरु राम को भलो लोक परलोक तास जा के बल ललित ललाम को जिसने एक बात पकड़ ली सत्संग में कि अब हमारे जीवन का उद्देश्य है नाम जप करना उठते बैठते चलते फिरते और साधन बने बने नाम नहीं छूटेगा बोले भलो लोक इस लोक में तुम्हें कभी दरिद्रता नहीं छू सकती तुम्हें कभी दुख नहीं छू सकता तुम एक आनंद की स्थिति में आ जाओगे पर अभी दो चार माला जपने की बात हम नहीं कहते कि दो चार माला से स्थिति सात दीर्घ काल निरंतर सत्कार सेवित दृढ़ भूमि दीर्घ काल तक लंबे समय तक निरंतर आदर सहित नाम जप करो तो स्थिति आ जाएगी दृढ़ भूमि अध्यात्म की व स्थिति आ जाएगी जहां दुख सुख का प्रवेश नहीं हर समय अखंड प्रसन्नता रहती है इस परम सुंदर भगवन नाम का बल यह है कि लोक में भी सुखी और परलोक में भी सुखी तो आप कहोगे बड़े-बड़े संतों को तुम्हें दिखाई देता कष्ट है बिल्कुल कष्ट नहीं है आपको दिखाई देता है जैसे अपने लोग उदाहरण में कहते हैं कि श्री राम कृष्ण परमहंसी जी के गले में

कैंसर था उनके ये सब बाहरी बातें हैं वह जिस आनंद में मगन तुम्हारी दृष्टि ही नहीं गई ये सब शरीर के ऊपर है और शरीर जड़ है अगर चलाने वाला अपने स्वरूप में है और प्रसन्न है तो कीड़ा भी पूरे शरीर में पड़े हो तो भी मुस्कुराहट में अंतर नहीं अगर मन भगवान से विमुख है तो बहुत देव गंधर्व रूप भी हो तो किस काम का मरोगे तो है ही है नष्ट तो होगा शरीर फिर क्या फिर समझ लो भलो लोक परलोक तास जा के बल ललित ललाम को ललित ललाम भगवान के नाम का जिसके पास बल है वह इस लोक में भी सुखी और शरीर छूटने के बाद निश्चिंत होकर पहले से बुक है व्यवस्था ये घबरा कौन रहे ने से य मरने से इसलिए घबरा रहे कि व्यवस्था की है यहां सब अब शरीर यहां का सब छूट जाएगा जहां जाना वहां कोई व्यवस्था नहीं घबरा रहे हैं यदि तुम्हारे पास भजन बल है नाम बल है तो मुकाम पर पहुंचने के लिए सोच नहीं होगा तुलसी जग जानियन नाम ते सोच न कूच मुकाम को जैसे आपको किसी प्रदेश में जाना है किसी भी देश में बढ़िया आपके पास वहां पहले से गाड़ी बंगला सब व्यवस्था फिट है

आपके पास गाइड है पास है हर खानपान की व्यवस्था है रास्ते के लिए और बढ़िया विमान पर बैठ के जाना वहां गाड़ी बंगला है अब बोलो जाने में कोई परेशानी होगी हर व्यवस्था वहां नाम ते सोच ना कूछ मुकाम को अब आपके पास नाम रूपी धम है तो ज्ञान विज्ञान रूपी गाइड है आपके पास और जब शरीर छूटेगा तो भगवान के धाम में भगवान की दिव्य लीला में दिव्या पहले से बुख हो चुका पहले से पता चल जाता है हमारा काम हो गया य किसी को प्रमाणित नहीं करने की जरूरत होती अपनी छाती जानती है जैसे हमारा पेट भर जाता ें पता लगता है हम छक गए ऐसे ही अपने को पता चलता है हमारा जन्म मरण मिट गया अब हमारा अगला जन्म नहीं होगा अब हमारा काम हो गया ये हदय देखो स्वामी जी कह रहे ना पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाही कहू पा गया विश्राम अब कृत कृत्य भय में निकल रहा है हदय से अब कृत कृत्य भय में अंदर से आ जाता है इस लोक में तो परमानंद रहेगा ही आप नाम जप के देखो परमानंद भोगों का मिलना नहीं है परमानंद सांसारिक मान प्रतिष्ठा नहीं है परमानंद इससे बिलग है

और वह जब होगा तो इन सब वस्तुओं का महत्व नहीं रहेगा मारी घूमेगी और एक रहस्य की बात समझ लो जब तक तुम माया को पकड़ना चाहोगे कभी नहीं पकड़ पाओगे आजतक किसी की पकड़ में नहीं आई और भगवान को पकड़ना चाहो तो माया तुम्हारे पीछे पड़ जाएगी माया विघ्न रूप में पीछे पड़ जाएगी जिसे आराधना करके माया पकड़ने के लिए लोग भाग रहे हैं वह कभी पकड़ में नहीं आएगी और जो भगवान की तरफ चले तो माया पीछे विघ्न बन कर के लग जाती कि मुझे स्वीकार कर लो भलो लोक परलोक तास जा के बल ललित ललाम को लोग मारे रहे बड़ा तरस लगता है नाम जप नहीं करेंगे घर में बैठ के अच्छे आचरण का विचार नहीं करेंगे वह सोचते हैं पैसे के बल से हम कहीं जाकर दे देंगे किसी झाड़ फूक किसी महात्मा किसी साधु को और वह हमें आशीर्वाद दे देगा हम भोगे विषय और वह हमें आशीर्वाद दे देगा हम सुखी हो जाएंगे त्रिभुवन में नहीं त्रिभुवन में नहीं सब नौटंकी नाटक हम आपको कह रहे हैं सब हमारे शास्त्र के अनुसार हम कह रहे ऐसे ऐसे बड़े सिद्ध महापुरुष हुए कि ऐसे जो चाहे पूरी सृष्टि

से मिटा दे रोग लेकिन उन्हीं के शरीर में उन्होंने नहीं मिटाया उसको भोगा भगवान का भजन करने वाले जानते हैं कि ब्रह्मास्त्र का प्रयोग मच्छर मारने के लिए ले होता है यह भगवन नाम भगवत प्राप्ति के लिए होता है यह भ्रम तो छोड़ दो कि तुम भजन किए बिना सुखी हो जाओगे बारी मथे ग्रत होए बरु सिकता ते बरु तेल बिनु हरि भजन न भ तरिया सिद्धांत पेल गाठ बांध लो किसी के आशीर्वाद की जरूरत नहीं यदि नाम जप करोगे तो सब आशीर्वाद आपके ऊपर बर्षा की तरह आ जाएंगे और नाम जप नहीं करोगे तो चाहे तुम जितने अरबों रुपए लगा दो तुम्हें दुर्गति भोगनी पड़ेगी कष्ट भोगना पड़ेगा तुम सत्य तो सत्य आशीर्वाद तुम्हारे पीछे हर समय सत्य की खोज करनी नहीं है है उसे स्वीकार करना है और सत्य की खोज कर रहे हैं और झूठे को स्वीकार कर रहे हैं उल्टा झूठे को स्वीकार कर रहे सत्य की खोज कर रहे हैं और सत्य को स्वीकार करना झूठे को छोड़ देना है कैसे प्राप्त होगा और आज तक जिसे भगवत प्राप्ति हुई दैन्य को हुई है भगवत भजन करने से हुई है इसलिए इस लोक और परलोक

में परम सुख की प्राप्ति सच्ची तुमसे कहते हैं मान लो हमारी प्रार्थना मान लो हम कहते 25 पैसे मत खर्चा करो बस जिव्या से राम राम हरे हरे कृष्ण कृष्ण राधा राधा राधा एक पैसा मत खर्चा करो क्या होगा राग खत्म हो जाएगा संसार से राग आप आनंद स्वरूप है प्यारे मृत्यु के भय से बचने के लिए एक मात्र उपाय भगवान का आश्रय आ रही मृत्यु आ रही रोज हमारी शाम सुबह रोज हमारी आयु नष्ट होती चली जा रही है आप क्या समझते हो आप बड़े हो रहे हो आप बड़े नहीं हो रहे हो आप घट रहे हो

जन्म से लेकर बोले कितने साल बोले 40 साल 40 गए और 40 मिनट है कि नहीं पता नहीं प्यारे और इस 40 मिनट में हम अगर नाम जप कर ले तो हमारा काम बन जाएगा जन्म जन्म की बिगरी बन जाएगी तुलसी जग जानियन मते सोच न कूच मुकाम को जिसने इस परम सुंदर महा महिम नाम का आश्रय ले लिया वो लोक परलोक दोनों में सुखी हो गए और जब संसार से जाने की बात आती है तो हृदय में आनंद होता है एक आए थे बड़े धनी मानी पदाधिकारी उन्होंने अपना परिचय दिया कि अगर हम आपको अपना कमरा दिखाएं तो इतनी

व जो इनाम मिलते हैं भारतीय सरकार से हा टॉप मेडल जो भी कहते हैं वो सब टंगे आपको दिखाई देंगे और दुनिया के हर सुख सामग्री हमारे पास है खूब सम्मान प्राप्त हुआ है पर अब मैं भयभीत हूं तुम कहा किस बात से बोले मरना पड़ेगा इस बात से मेरी वृद्धावस्था अब लगता है मरूंगा मरूंगा तो सब छूट जाएगा इससे कैसे बचू हम कहा इसी से बचने के लिए तो अध्यात्म है भगवान का नाम है देखो कह रहे तुलसी जग जानियन ते सोच ना कूछ मुकाम को जब यहां से चलने की बात आती है तो हृदय आनंदित होता है क्यों होता है क्योंकि अपना कोई है नहीं अपना कुछ है नहीं जो अपने हैं उनके पास हम जा रहे हैं जहा हमारा सब कुछ वहां हम जा रहे जैसे परदेश से घर लौटना हो तो आपको बुरा लगेगा क्या मन उत्साहित होगा अपने घर जा रहा हूं आपने परदेश को घर मान लिया और घर को परदेश मान लिया यह बड़ी गलती हो गई प्रभु को पराया मान लिया और माया को अपना मान लिया इसलिए यहां से जाने की बात सुन के अच्छे-अच्छे के होश खराब हो जाते हैं मरने की बात सुनकर अच्छे अच्छे के होश खराब हो

जाते हैं भजन करने वाला भजन करने वाले को जब मृत्यु का समय आता है तो बहुत आनंद पूर्वक शरीर छूटता है जैसे हाथी के गले से माला टूटे ऐसे भक्त का शरीर परिवर्तन होता है पार्थिव शरीर छूटा भाव देह मिला और भगवान के समीप पहुंच गया इसलिए जिसके हृदय में विश्वास एक राम नाम को भगवान के नाम का विश्वास मानत नहीं प्रतीति अनत ऐ सोई स्वभाव मन बाम को विश्वास एक राम नाम को मेरे जीवन का तो एक ही विश्वास भगवन नाम बस नाम से सब हो जाएगा गु स्वामी जी क कई बार सत्संग में कहा है कि ऐसा कोई ना समझे कि और साधनों का ज्ञान नहीं और साधन जानते नहीं तो वही नाम नाम हर प्रश्न का उत्तर नाम होगा अंततोगत्वा उत्तर नाम ही होगा तो आप सान समझे नेटिक ब्रह्मचर्य गायत्री अनुष्ठान गुरु प्रताप से संन्यास मार्ग के महावाक्य संन्यास योग मार्ग प्रधान संन्यास होता है ब्रह्मा भूति वेदांत के मार्ग का लक्ष्य होता है उस तो सब उसमें मिला होता है हर शास्त्र ज्ञान जब बैठ कर के अंततोगत्वा विश्राम मिला तो नाम यह सबका सार आया नाम नकाद ब्रह्म ज्ञान

संपन्न महापुरुष है अंततोगत्वा हरि शरणम हरि शरणम हरि शरणम जितने भी बड़े महापुरुष हैं सबका अंत तो गत्वा विश्राम नाम है यह बात आप समझ लो अगर नाम जीवन में नहीं है तो खोखला जीवन मिलेगा आप देख लेना खोखला जीवन क्या होता है परमार्थ में खोखला जीवन क्या होता है कैसे हम समझे कि हमारा जीवन खोखला हो रहा है अंदर का चिंतन खत्म भगवत चिंतन आंतरिक चिंतन रहित अगर आंतरिक चिंतन सहित है तो कोई निषेध नहीं अगर आंतरिक चिंतन गया और बाह चिंतन बस फसा लिया माया ने अंतिम बात कीर्ति में फसा के गिरा लिया बोले मानत नहीं प्रतीति अनत सोई स्वभाव मन बाम को यह मेरा कुटिल मन कुछ ऐसा स्वभाव है इसका कि ये कहीं भी विश्वास नहीं करता चाहे जितना अच्छे से समझाओ हम आपको सही कहते हैं बहुत नाटकी मन है इसको नाटक पर विश्वास है प्रहलाद जी इस बात के प्रमाण है बड़े-बड़े संत इस बात के प्रमाण हैं कि भगवान नाम के जप के प्रभाव से सदा सदा के लिए दुखों को परास्त कर दिया पर जीव मान नहीं रहा गोस्वामी जी के विश्वास नहीं हो रहा मानत नहीं प्रतीति अनत

ऐसो ही स्वभाव मन बाम को जो चाहिए आपको एक बालक पाच वर्ष की अवस्था है श्रीमद् भागवत महापुराण महाराज मनु सतरूपा का आपने महिमा सुनी उनके दो पुत्र थे उत्तानपाद प्रियव्रत उत्तानपाद छोटे प्रियव्रत बड़े उत्तानपाद महाराज के दो पत्नियां थी सुनीति और सुरुचि छुटी वाली पत्नी बहुत सुंदर तो राजा की बहुत प्री थी उत्तानपाद राजा की बड़ी प्रिय रानी थी सुरुची और सुनीत थी व बड़ी रानी थी और बहुत धर्मजीवन नाम का पूरा प्रभाव स्वभाव पर पड़ गया अपनी रुचि के अनुसार हो तो ठीक रुचि के प्रतिकूल हो तो बर्दाश्त नहीं ऐसी छोटी रानी और सुनीति वो रुचि के अनुसार नहीं वो नीति के अनुसार चलती थी हमारी रुचि क्या है अभी अच्छी रुचि है फिर गलत रुचि हो सकती है लेकिन शास्त्र क्या कहते गुरुवाणी क्या कहती है हमको उसके अनुसार सुनीति गुरु के वचन के अनुसार नीति के अनुसार चलना तो जो सुनीति से चलता है उसके ध्रुव प्रकट होते हैं वैसे सुनीति से चलने वाले अरबों में कोई एक होंगे और रुचि से चलने वाले सुरुचि से चलने वाले सब है राजा को रुचि प्रीथ

सुरुचि उत्तान हम सब हैं पैदा ऐसे हुए हैं दो हैं अंदर आओ सुमति कुमति सबके उर राही सुमति सुनीति और जब रुचि के अनुसार चला जाता है तो कुमति बढ़ जाती है और कुमति अमंगल कार होती है और सुमति संपत्ति और सुख प्रदान करने वाली होती है सुमति सुनीति कुमति सुरुचि अपनी रुचि के अनुसार चलना अपनी रुचि के अनुसार थोड़ी चला जाता है शास्त्र और गुरु की वाणी के अनुसार चला जाता है यद्यपि राजा को सुनीत जैसी महामहिम रानी प्राप्त थी पर वह प्यार करते थे सुरुचि को राजा कौन है

ये जीव य जीव रुचि के अनुकूल चलता है जैसे मन बुद्धि रुचि दे रहे उसी की सलाह में भटकता चला जाता है और जो सुनीति बुद्धि होती है वह भटकने नहीं देती नहीं यह गलत है नहीं होगा यह शास्त्र विरुद्ध है य धर्म विरुद्ध है राजा को सुरुचि अधिक प्रीति सुनीत जी के पुत्र हुए ध्रुव जी पर सुनीति को राजा प्यार वैसा नहीं करते थे एक दिन राजा उत्तानपाद सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोद में बैठाकर प्यार कर रहे थे अगर उत्तम ना माने तो रुचि रही नहीं जाएगी अपनी रुचि को श्रेष्ठ मानने के कारण ही मान्यता देने के कारण ही दुर्गति होती है वोह उत्तम को दुलार कर रहे थे तो ध्रुव जी राजा के समीप गए महाराज उत्तानपाद के और ऐसे पाच वर्ष के बालक ऐसे हाथ उठाया कि पिता श्री हमको भी गोद में ले ले अब य सुरुचि के खिलाफ हुई ना कि जहां मेरा पुत्र वहां सौत का पुत्र कैसे घमंड में भरी हुई सुरुचि ने देखा कि प्रयत्न कर रहा है पिता की गोद में बैठने के लिए डाह भरे शब्दों से हाथ पकड़ा टिक दे तू इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है हां माना तुम महाराज

का बेटा है तो क्या हुआ लेकिन मेरी कोक से तो नहीं पैदा हुआ ना सौत की कोक से पैदा हुआ है तो अभी नादान है तुझे पता नहीं कि सिंहासन पर बैठने के लिए मेरी कोख से पैदा हुए पुत्र का ही अधिकार होगा यह दुर्लभ इच्छा तेरी पूर्ति होने वाली कभी नहीं और टिक दिया ध्रुव को एक बात सुरुचि के मुख से बहुत अच्छी निकल गई तपसा आराध्य पुरुषम तवा अनुग्रह में गर्भे त्वम साध आत्मानम यद नि पासनम भगवान जब कृपा करते हैं तो प्रतिकूलता मिलती है और प्रतिकूलता भगवान की तरफ बढ़ती विपत्ति दुख अपमान प्रतिकूलता यह भाग्यवान को जब मिलती है तो भगवान की तरफ बढ़ते हैं और भागी को जब मिलती तो इसी में डूब जाता है ऐसे अपमानित करना छोटे बालक तू पिता की गोद में बैठने का अधिकारी नहीं क्योंकि तू दूसरी माता के गर्भ से माना तू राजा का पुत्र है लेकिन मेरी कोख से जन्मे तब तू अधिकार प्राप्त करेगा तप साध्यम पुरुषम तस वा अनुग्रह में जा परम पुरुष भगवान की आराधना कर और उनकी कृपा मना और फिर मेरे गर्भ से जन्म ले तब इस सिंहासन पर गोद पर बैठने का

अधिकारी होगा ध्रुव जी को बहुत बुरा लगा मां का व्यवहार अंदर अब बालक है कुछ कह नहीं सकते रो दिया और बहुत ही हृदय में कष्ट हुआ कि ऐसा कैसे मेरे भी पिता हैं मेरी भी मां तो इनकी रानी है ऐसा कट वचन महाराज भी सुन रहे कुछ बोल नहीं रहे और सुरुचि तो कड़वा बोलकर झटक ही दिया महाराज की मुख की तरफ देखा ध्रु जी ने एक शब्द नहीं तो रोते हुए अपनी माता के पास गए यह देखो सुनी थी शिशक शिशक कर रोकर मां से लिपट गए मां मां ने उठा क्या हुआ बेटा तो ज दासी थी व बोली कि ऐसी

ऐसी घटना घटी सुरुचि जी ने ऐसा ऐसा बर्ताव किया महाराज कुछ बोले नहीं बहुत धीर टूट गया सुनीत जी का देखो विपत्ति भगवान की प्राप्ति कराने वाले है वह बहुत से सुख में क्योंकि महाराज बात भी नहीं करते थे और कम से कम बेटे को दला कर लेते बेटे का अपमान तो रुदन को बहुत रोका कि अगर हम रुदन करने लगी तो मेरा बेटा तो धैर ही टूट जाएगा आंसुओं को अंदर ही रोक कर के कहा बेटा पहली बात तो यह है कि जो तुम्हारा अमंगल करें उनका कभी अमंगल नहीं सोचना चाहिए यह सुनीति यह नीति है जो तुम्हारा अमंगल करें उनके लिए भी अमंगल नहीं सोच धन्य है मां जो ऐसा उपदेश कर रही बेटा जो दूसरों को दुख देता है उसको अंततोगत्वा दुख भोगना पड़ता है यह सुनीति तुम उसके दुख की कामना मत करो वह खुद भोग लेगा उमा छमा साप होते भारी अपने कर्म जा अपकारी अपकार अवहेलना दुख प्रतिकूलता निंदा अपमान करने के लिए तुम कुछ मत सोचो उसका कर्म ही उसको नष्ट कर देगा तुम क्षमा कर दो और जो तुम्हारी माता सुरुची ने कहा ना बहुत सुंदर लगा मुझे उन्होंने कहा ना कि ठीक है तुम

राजा के पुत्र हुए तो क्या हुए तो बेटा महाराज मुझे पत्नी के दासी भी स्वीकार करने में अब लज्जा आती है उनको क्योंकि नवीन रानी मिल गई है तो मुझे दासी भी नहीं मानते पत्नी की क्या बा पर बेटा एक बात तुम्हें बहुत अच्छी मां ने कही कि तुम भगवान नारायण की आराधना करो तो यह बात हमें बहुत अच्छी लगी क्या बेटा तुम उन माता की बात मानोगे और मेरी भी सहमति है कि तुम भगवान की आराधना करो और देखो भगवान की आराधना करने से तुम्हारे परदादा ब्रह्मा जी को परमेष्ठी पद प्राप्त

हुआ तो मुझे लगता है कि तुम चाहो तो ऐसा पद प्राप्त हो सकता है जिसे ब्रह्मा भी नमस्कार करें ऐसा पद इसीलिए माता और पिता सबसे बड़े गुरु माने गए हैं अगर गलत सलाह दे दे तो जीवन बर्बाद हो जाए बच्चे का और अच्छी सलाह दे दे तो जगत बंदनी पुत्र हो जाए गांव में एक सुल्ताना डाकू की नौटंकी देखी थी जब स्कूल में पढ़ते थे तो उसमें जब उसको पकड़ कर के आखिरी में फांसी की सजा दी गई तो उससे पूछा गया कि तुम्हारी अंतिम कोई इच्छा है तो उन्होंने कहा मेरी मां को मुझे मिला दो तो अंतिम इच्छा पूर्ति करने के लिए मां को मिलाया गया तो मानो गले लग रहा हो ऐसा दिखाई दिया और नाक काट ली अपने दांत से अपनी मां की तो अपसर ने पूछा ऐसा क्यों तुमने किया तुम्हारी मां है बोले पहली बार जब कलम चुरा के स्कूल से लाया था तो इस मां ने कहा था शाबास बेटा लिखने के काम में आएगी मैंने समझा अच्छा कार्य है और आज मैं इतना भारी चोर बना कि मुझे फांसी की सजा मिल रही अगर पहले दिन मां थप्पड़ मार देती तो आज फांसी का फंदा मेरे गले में ना लगता यह वोह मां

है मुझे डकैत बनाने वाली मां प्रथम गुरु है इसीलिए बहुत संभलकर आचरण करना चाहिए बच्चों के सामने बहुत संभलकर जबान खोलनी चाहिए ऐसा व्यवहार ऐसा बर्ताव जिससे उनके संस्कार गलत ना होने पावे सुनीत जी ने कहा तुम्हारी मां ने बहुत ठीक कहा कि भगवान श्री हरि की आराधना करके तो आराधना शब्द पर ध्यान दो बेटा तुम देखो तुम्हारे दादा स्वयंभू मनु स्वयं बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञों से भगवान की आराधना करते रहते हैं और अलौकिक पदवी को प्राप्त हुए अलौकिक सुख को प्राप्त हुए

बेटा मेरी भी य इच्छा है ओहो धन्य है मा सुनीति को मेरी भी यही इच्छा है कि तू भक्त वत्सल भगवान की आराधना कर और जन्म मृत्यु चक्र से छुड़ाने वाले जनार्दन भगवान श्री हरि का साक्षात दर्शन प्राप्त कर उन्हीं के मार्ग का अनुसरण कर बेटा जब तू पवित्र हृदय से भगवान का भजन करके पुकारेगा तो बहुत जल्दी भगवान तुझे दर्शन दे देंगे और भगवान का मिलना परम मंगल बेटा कमल धल लोचन भगवान श्री हरि को छोड़कर कोई तुझे दुख रहित कर सके ऐसा मुझे नहीं दिखाई देता इसीलिए बड़े-बड़े

ऋषि मुनि महात्मा जन ब्रह्मादेवी जी दीपक की भाति कमल लेकर जिनकी खोज करती रहती उन्हीं भगवान को तोत रिझा ले मेरी भी यह इच्छा है माता के जब वचन सुने तो रोना बंद कर दिया और विचार किया कि जब मां की भी यही अनुमति है तो मुझे बुरा नहीं मानना चाहिए भी माता के वचन को और अब मैं भगवान की आराधना करूंगा साष्टांग दंडवत हुए मां के चरणों में कहा मां अब मैं तभी आपके सामने आऊंगा जब भगवान का दर्शन पा लूंगा प्रणाम किया पाच वर्ष के बालक धज है और भगवान की प्राप्ति के लिए राज्य से निकल पड़े जब कोई भगवान की प्राप्ति के लिए चलता है तो गुरु की अत्यंत आवश्यकता होती है बिना गुरु के भगवत प्राप्ति असंभव असंभव चाहे शिव बरच सम होई गुरु बिन भव निधि तरे न कोई बिना गुरु के परम गुरु देवर्ष नारद जी उसी समय आ गए नारद तद उपा करण जवा तस्य चिकर सितम स् पटवा मुर्धन्य पाण ना प्रा विस्मित ध्रु जीी को ऐसे दुलार करले कहा जा रहे हो राजकुमार कहा जा रहे हो देवर स नार ध्रुव जीी एकदम सावधान नार जी देख रहे कैसा स्वभाव इस बालक का दृढ़ है

मब एक नेत्रों से तेज प्रकट हो रहा है ध्रुव के तुम नन्हे से बच्चे हो सौतेली मां के कटु वचन से तुम्हारा हृदय दुखी हुआ बेटा तू तो अभी बच्चा है तपस्या क्या जाने भजन क्या जाने खेलकूद में मस्त र यह बात तेरे बस की नहीं अच्छा रही मान अपमान की बात तो पाच वर्ष के बालक तेरे को क्या मान अपमान बच्चे को क्या मान अपमान फ कोई और थोड़ी था तेरे माता-पिता ही तो थे देखो तुम्हारा य अज्ञान है जो तुम बुरा मान रहे हो लौट जाओ अपने घर जाओ खेलो कूदो तुम्हारी तपस्या या भजन करने की अवस्था नहीं जीव को अपने कर्मानुसार भोगना पड़ता है सुख दुख मान अपमान लाभ हानि संतुष्ट रहो ऐसा मत विचार करो कि कोई अपमान किया अच्छा तू माता के उपदेश से योग साधना के द्वारा भगवान की प्राप्ति करने चला है अरे तुम्हारे जैसे बालकों के लिए बहुत यह बहुत कठिन है यह तो बड़े बड़ों के लिए कठिन तुम तो अभी बालक हो बड़े-बड़े योगी जन अनेक जन्म जन्मांतर करते रहते हैं बड़ी बड़ी कठोर तपस्या करते रहते हैं पर भगवान के मार्ग का पता नहीं पाते भगवान की प्राप्ति

तो जाने दो इसलिए हर छोड़ो घर वापस जाओ जब बड़े हो जाना तो फिर साधना के लिए प्रयत्न करना देखो जब कोई भगवत मार्ग में सही मार्ग में चलता है तो उसकी परीक्षा होती है प्रलोभन और भय यह दो परीक्षाएं होती है दिखाया जा रहा है देवर्ष नारद जी दुखी नहीं होना चाहिए वापस लौटो जाओ खेलो कूदो आनंद लो ध्रु जी ने कहा पहले तो हमारा प्रणाम स्वीकार करें और दूसरी बात यह है कि आपको पता होना चाहिए कि मैं कौन हूं मैं क्षत्रिय स्वभाव का राजकुमार हूं मेरे में विनय का भाव है एक बार जो ठान लिया उसे कोई तोड़ नहीं सकता यह बात पकड़ो उपासक की जिद्द ऐसी होनी चाहिए कि अब बगर भगवान के मार्ग में चल दिए तो गर्दन कटा सकते हैं प्राण हमारे चले जाए लेकिन कुमार्ग में नहीं चल सकते मनोरंजन नहीं कर सकते देखो देवसी नारद जी समझाए उत्तर क्या दे रहे ध्रु जी सुरुचि माता ने कट वचन रूपी बाणों से मेरे हृदय को विदीर्ण कर लिया हे देव ऋषि आपके उपदेश वहां तक नहीं पहुंच पा रहे ब्रह्मण मैं आपके सामने नियम लेता हूं मैं उस पद पर अधिकार करूंगा जो मेरे

बाप बाबा को भी नहीं प्राप्त हुआ बाप उत्तानपाद बाबा स्वयंभू मनु परमेष्ठी पद भी जिसे नमस्कार करता है वो ध्रुव पद है आज भी विराजमान है मैं त्रिलोकी में सर्वश्रेष्ठ पद पर क्या निष्ठा है क्या लि है पदम त्रिभुवन कृष्म जिगी शो साध वर्त में मैं वो त्रिभुवन में सबसे बड़ा पद प्राप्त करना चाहता हूं जिसे बाप बाबा पर बाबा को भी नहीं मिला है पितृ भीर ब्रह्मण नन्य रप जिन्हें अन्य किसी को प्राप्त नहीं हुआ चाहे हमारे बाबा हो चाहे हमारे पर बाबा हो अगर आप कृपा करना

चाहते तो मुझे उपाय बता दीजिए बस वापस जाने की तो बात आप बंद कर दीजिए आप सर्वज्ञ है मुझे वह उपाय बताइए जिससे व पद प्राप्त होगा ध्रुव जी की बात सुनकर नारद जी बहुत मुस्कुराए देखा चेला पक्का है नारद जी ने कहा बेटा तेरी माता सुनीति ने जो तुझे बताया वो तेरे लिए परम कल्याण का मार्ग है बहुत सुंदर बहुत सुंदर भगवान श्री कृष्ण ही भगवान श्री हरि ही वो उपाय है जिससे परम पद प्राप्त होता है तू चित्त लगाकर उन्हीं का नाम जप कर भजन कर जिस पुरुष को धर्म अर्थ काम मोक्ष कुछ भी चाहिए उसे एकमात्र भगवान के नाम जब ध्यान दो भगवान का विश्वास नहीं लोगों को हो रहा है यह माया का नाम पकड़ लो सब प्राप्त हो जाएगा बेटा तेरा कल्याण हो अब तू यमुना जी के तटवर्ती परम पवित्र मधुवन मथुरा परी को जा आदेश किया यहां देखो मधुवन से भी श्रेष्ठ वृंदावन माथुर परुथु मंडल में सबसे श्रेष्ठ ब्रज चौरासी कोष उसमें भी गोषट वृंदावन गोपी वृंदावन फिर नौ नित निकुंज वृंदावन श्री हरि का नित्य निवास मथुरा में है इसलिए तू मधुवन को जा मथुरा नित्य

कृष्ण को बास निस दिन श्याम न छात पास ता सकल लीला कही वहां श्री हरि नित्य विराजमान रहते हैं पुण्यम मधुवनम यत्र सानिध्य नित्य द हरे बड़ा पूर्णम क्षेत्र है मथुरा पुरी यहां नित्य भगवान श्याम सुंदर विराजमान रहते हैं और परम पावन श्री यमुना जी कालिंदी जी उनमें तीनों समय स्नान करना स्ना वानु सनम तस्म कालिया सले शिवे कतो चितानी निवसरकर तीन टाइम यमुना जी का स्नान करना और स्थिर होकर बिना हिले डुले शरीर को ऐसे ऐसे रेचक किया जाता ऐसे पूरक किया जाता ऐसे कुंभक किया जाता प्राणायाम सिखाया प्राणों को वश में करना भूक प्यास पर विजय प्राणों को वश में करने से हो जाती है और निरंतर प्रसन्न रहते हुए भगवान का नाम जप करते हुए उनका ध्यान करना बेटा परम गुरु श्री भगवान का ऐसे ध्यान करना कि भगवान के बड़े-बड़े सुंदर कमल जैसे नेत्र बड़ा सुंदर प्रसन्न मुद्रा में मुख और ऐसा दे देखो कि वह बस प्रसन्न होकर तुमको वरदान देना ही चाहते भगवान की बड़ी सुंदर नासिका बड़े सुंदर भव बड़े सुंदर कपोल वह देवताओं को भी मोहित करने वाले तरुण

अवस्था किशोर अवस्था अंग बड़े सुडोल लाल लाल ओट रत्ना रे ने प्रत जनों का आश्रय देने वाली सुंदर भुजाएं वक्षा स्थल में श्री कस्त मणि श्रीवत्स का चिन्ह सजल जल धर के समान श्याम वर्ण गले में सुंदर वनमाला भगवान मुस्कुरा कर के वरदान देना ही चाहते ऐसे सुंदर रूप में जिस समय तुम्हारा मन भगवान के स्वरूप में लग जाए तो मैं तुम्हें मंत्र बता रहा हूं इस मंत्र का जिस नियम से मैं बता रहा हूं जब करोगे तो सात दिन में सिद्धों के दर्शन हो जाएंगे सात दिन में जपस परमो गुहा शयता में निपात मज यम सप्त रात्र प्रप पमान पश्यति खे चरा जो आकाश में सिद्ध विचरण करते हैं सात दिन इस मंत्र के जप से जैसी मैं पद्धति बता रहा हूं सिद्धों के द हो जाएंगे सिद्धों के दर्शन होने का मतलब है भगवान की दर्शन की सामर्थ्य आना पहले सिद्ध संतों के दर्शन होते हैं भगवान के दर्शन के पहले सिद्ध संतों के भगवत प्राप्त संतों के दर्शन होते हैं यह जो मंत्र है इसका गुप्त रूप से गुरुजन प्रदान करते हैं शास्त्रों के मंत्रों का कभी कीर्तन या उच्चारण

नहीं करना चाहिए यह अंदर ही अंदर उपांशु या मानसिक जपे जाते हैं जो ऐसा शास्त्र मर्यादा विरुद्ध कीर्तन आदि करते हैं उनके सुकृत नष्ट हो जाते हैं शास्त्री विधान है देवर्ष नारद जी ने द्वादसाक्षरी नारद जी ने बताया और कहा मौन का आश्रय लेना और आहार पर संयम करना यह दो बातें साधु के लिए या भगवत प्राप्त करने वाले वैष्णव के लिए बहुत आवश्यक है बहुत आवश्यक है वाणी में शासन रखो मौन का आश्रय लो कम बोलो भगवत शब्द बोलो हितकर बोलो सत्य बोलो नहीं तो मौन रहो और आहार पर संयम कर लो आहार पर यह बहुत बढ़िया बात है यह दो चीजें जीवन में सदैव रही है क्योंकि गंगा किनारे किसी से बात करना नहीं और भोजन की व्यवस्था नहीं जब कभी-कभी थोड़ा गुड़ मिल जाता कभी जैसे गंगा किनारे रहे वो खेती जो करते हैं बारी लगाते हैं वो कभी एक परे दो परे दे दिए गंगाजल के साथ बहुत आनंद में यह साधक को दो चीजों पर ध्यान देना चाहिए वाणी मौन आहार थोड़ा देखो अभ्यास है जैसा कर लो कर लो एक एक कवल कम करते जाओ कम होता जाएगा और एक-एक कवल बढ़ाते जाओ तो पेट

बढ़ता जाएगा चर्बी बढ़ती जाएगी भजन वजन तो ना नहीं भोजन नीरस भजन सरस और भोजन सरस तो भजन नीरस नारद जी ने उपदेश किया कि भगवान की सबसे बड़ी पूजा क्या है मौन रहना और आहार को बहुत लघु रूप में करना और निरंतर भगवान के इस मंत्र को और इसी मंत्र से भाव के द्वारा पूजन करना इस प्रकार जब हरि का मन वाणी शरीर से पूजन होगा तो तुम्हारा हृदय पवित्र हो जाएगा निश्छल भाव से जब भगवान का द्वादशा साक्षर मंत्र जप करोगे तो भगवान बड़ी जल्दी आकर आपको दर्शन देंगे गुरुदेव ने मंत्र दिया साधन बताया भगवान का रूप श्री ध्रुव जी ने नारद जी की चार परिक्रमा की गुरुदेव की धन्य है देखो भगवत मार्ग में चले तो गुरु मिल गए साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और उनके चरण चिन्ह से रज माथे पर लगाई ध्रु जी के ऐसे गुरुदेव दुलार कर रहे जाओ बेटा निश्चित भगवान श्री हरि मिलेंगे नारद जी को उपदेश पाकर ध्रुव जी ने प्रणाम करके रज लेकर के उनका आशीर्वाद लेकर मथुरा पुरी की यात्रा की मधुवन की नारद जी महाराज पाद के महल में पहुंचे उन्होंने बड़ी पूजा की आराम

से नारद जी ने कहा तुम्हारा मुख सूख रहा है किस विचार में पड़े हो क्या कमी आ गई जो तुम्हारा मुख सूख रहा है महाराज उत्तानपाद राजा ने कहा महाराज मुझे बड़ा पश्चाताप रहा मैं निर्दय हूं हाय पाच वर्ष का नन्हा सा मेरा बच्चा मेरी गोद में बैठना चाह रहा था मैंने कुछ नहीं बोला और इसने बहुत कटु वचन बोलकर निकाल दिया हाय हाय कहीं ऐसा ना हो कि जंगल में कोई भेड़िया खा जाए कोई राक्षस ऐसा बालक मेरी गोद में प्रेम वश चढ़ना चाहता था मैंने बिल्कुल आदर नहीं किया महाराज मैं बहुत दुखी हूं नारद जी ने कहा तुम उसके लिए चिंता मत करो कोई साधारण बालक नहीं है उसके रक्षक स्वयं भगवान श्री हरि हैं कोई भेड़िया और राक्षस उसे देख भी नहीं सकता तुम उस बालक के प्रभाव को नहीं जान जानते हो उस बालक का प्रभाव त्रिभुवन में फैलने वाला है वह बालक बड़ा समर्थ है जिसे बड़े-बड़े लोक पाल नहीं कर सकते उस काम को बालक पूरा करके शीघ्र तुम्हारे पास आएगा और तुम्हारा यश बढ़ेगा क्योंकि तुम उसके पिता हो देवर्ष नारद की बात सुनकर कुछ तो संतोष हुआ

उत्तान पाद को पर ध्रुव की चिंता में वो ध्रुव जी मधुवन मथुरा पुरी आए और जैसा गुरु जी ने कहा था त्रिकाल स्नान यमुना जी का और उसी रात से उपवास शुरू कर दिया एकाग्र चित होकर बस वही द दशा क् मंत्र जो गुरुदेव ने दिया तीन-तीन रात्रि के अंतर में शरीर निर्वाह के लिए एक कैथ कैथा का एक पेड़ होता है इतना बड़ा फल होता ऊपर बड़ा कठोर होता है और खट मिठा सा अंदर इतना गुदा होता है बस एक गुदा एक फल का गुदा तीन दिन तीन रात व्यतीत होने पर फिर इसके बाद तीन दिन तीन रात व्यतीत होने पर एक बेर एक बेर बेर इतना बड़ा फल वो ऊपर से उसमें कुछ होता है अंदर केवल गुठली होती है गुठली हटी थोड़ा सा इतना होता है इसके बाद एक महीना व्यतीत किया ऐसे तीन दिन में एक कथा तीन दिन में एक बेर ऐसे दूसरे महीने में बेर और कैथा भी छोड़ दिया छह छह दिन में सूखे पत्ते जो पेड़ के नीचे गिरते उनको चबा लेते और रात दिन द्वादशा अक्षर मंत्र का जब तीसरे महीने पर नन दिन पर केवल एक अंजुली जल पी लेते पत्ते भी खाना छोड़ दिया चौथे महीने में जल पीना भी छोड़

दिया केवल शवास बस वायु चल रही है और वायु भी 12 12 दिन तक रोकने लगे 12 दिन वायु ही नहीं लिया पर बहुत विचित्र पांचवे महीने में स्वास को जीतकर एक पैर केवल खंभे केवल खड़े होकर के जैसे खंबा एक पैर केवल दोनों हाथ परर उठाए शवास को रोक लिया मन को खींच कर परमात्मा में पूर्ण स्थित शवास बांध गजब की साधना गजब की ही परब्रह्म की धारणा करके श्वास बंद करके हाथ उठाए 12 ब दिन तक शवास ले त्रिभुवन काप उठा जैसे ध्रुव जी ने पास रोक करके समाधि भाव से तो पृथ्वी कांपने लगी त्रिभुवन में हाहाकार मच गया बड़े-बड़े देवता लोकपाल ब्रह्मा भयभीत हो गए स्वास सबकी रुक गई सबकी ध्रुव जी ने अपनी रोकी तो सबकी रुक गई अन्य जीवों का सब शवास प्र स्वास रुक गया लोकपाल घबराकर ब्रह्मा जी सहित सब हरि की शरण में भगवान सृष्टि का नाश हो जाएगा सबकी प्राणवायु रुक गई अभी अभी एक क्षण में सब मर जाएंगे आप दुख से छुड़ाए भगवान ने कहा डरो मत ये कोई अनिष्ट कारी बात नहीं उतान पाद के पुत्र धूने मुझ विश्वात्मा में चित्त को लगाकर अपनी शवास रोक ली तो

सब विश्व की शवास रोक गई क्योंकि भगवान विश्वात्मा है मैं अभी निवृत करता हूं इस तप से सब देवता लोग अपने अपने लोग को भगवान तत्काल गरुण पर चढ़े और मधुरापुरी आ गए गरुण की जो गति है वह मन से भी बढ़कर है जैसे मन आप बंबई गए तो एक सेकंड के भी कम हिस्से में बंबई पहुंच जाएगा इससे भी ज्यादा तीव्र गति गरुण भगवान की है वहां पहुंच गए देखा बिजली की तरह कांति है ध्रुव की चमकते हुए अब परम पवित्र देदीप्यमान इधर ध्रुव जी जो ध्यान कर रहे थे भगवान का अंतर ध्यान हो गया

घबरा गए ज नेत्र खोला तो जो अंदर ध्यान कर रहे थे बाहर भगवान विराजमान व सामने खड़ा प्रभु को देखकर प्रेम अधीर हो गए छठ महीने में भगवत साक्षात्कार जब भगवत मिलन की चाह लगती है तो नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वसन सुहावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मगन आरा हाय हाय मच जाता है और फिर ऐसा अनुभव होने लगता है आज भगवत साक्षात्कार होगा आज आज विश्वनाथ आज मन अति हरस जलावन तेही आज देखि हो परम सनेही भगवान निहाल कर देते हैं ध्रु जी ने सामने देखा जो अपने ध्यान का विषय प्रभु ते सामने गरुण ध्वज भगवान गरुण पर विराजमान है साष्टांग दंडवत भगवान के सामने ध्रुव जी प्रेम अधीर होकर लौट गए भगवान कूद पड़े गरुण जी से जैसे मां अपने बालक का ऐसे धजी को उठाकर भुजाओं से कस ले मानो मां बरस रही जैसे मुख से चूमना नेत्रों से करुणा बरसाना हदय ऐसा थोड़ी होता है कि भगवान कोई ध्यान में मिल गए तो हम होते भगवत साक्षात भगवान ऐसे मिलते जैसे आप बैठे हो बस लगन तीव्र ता चाह कहो स कहां जहा प्रभु ना यही बैठे देख रहे हैं बहुत

देर तक ध्रुव जी प्रेम मगन भगवान भी प्रेम मगन अब ध्रु जी कुछ बोलना चाहते भगवान की स्तुति करना चाहते पर बालक है पाच वर्ष के हाथ जोड़ते कुछ बोलने की पर क्या भगवान के सामने बोले हिम्मत भी नहीं पड़ रही और कुछ आता भी नहीं कि भगवान की कैसे स्तुति करें भगवान ने ध्रुव जी की यह स्थिति देखकर पांच जन शंख को कपोल पर छुआ दिया ध्रु जी के जही छु आया तो तत्काल ब्रह्म बोध हो गया इसमें लिखा है तत्काल अपने स्वरूप का बोध ध्रु जी को हो गया ब्रह्म बोध हो गया छुआते ही यह बड़ी महिमा की बात है दवी परिजात परमात्मा निर्णय आत्म बोध हो गया मम दर्शन फल परम अनूपा जीव पाव निज सहज ब्रह्म के स्वरूप का बोध हो गया और दिव्य वेद ध्रुव जी के मुख से निकलने लगे ध्रुव जी ने भगवान की बड़ी दिव्य स्तुति की सो आगे आनंद लेते हैं शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

संबंधित