॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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वृंदावन में ऐसा अपराध भूलकर भी ना करें / नारायण कवच का वर्णन / वृत्रासुर का जन्म / वज्र निर्माण

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श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदावन शवरी तैव पदारविंदम प्रेमा मृतक मकरंद रस पूर्णम हदर पितम मधुपति स्मर मु ग्रम निर्वा पय परम शीतल मा शया परम शीतल मा शया परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नव निवृत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले युगल सरकार प्राणा आराध्य श्री प्रिया प्रीतम जू समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी लता रज रानी यमुना रस रानी समस्त ब्रजवासी परिकर श्री प्रिया प्रीतम जू का यदि आश्रय और स्मरण अर्थात प्रभु का आश्रय और स्मरण नहीं है तो पुण्य प्रताप से आप लौकिक उन्नति लौकिक सुख प्राप्त करके भी अशांत चिंता ग्रस्त भयभीत बने रहेंगे परम शांति निश्चिंत और निर्भयता तभी जीव को आती है जब वह केवल केवल केवल भगवान की शरण में होता है रुपया भोग सामग्री बड़े से बड़ा पद बड़े से बड़ी सुविधा ये आपको निर्भय निश्चिंत निशोक नहीं कर सकती इसलिए बुद्धिमान मनुष्य शरीर धारी वही है जो अपने चित्त को प्रभु में लगा दे पुण्य प्रताप से बड़े-बड़े पदों में जाकर

भ्रष्ट होते देखा जाता है क्योंकि पुण के बल से पदों पर तो पहुंच गए सुख सामग्री यस कीर्ति मिली पर वासना उपासना के बिना नष्ट नहीं होती तो वासना ने ऐसे आचरण करा दिए कि जेल पहुंच गए ऐसे आचरण करा दिए कि नरक पहुंच गए ना पद काम आया ना वावा ही काम आई ना रुपया काम आया जीवन व्यर्थ हो गया अगर चित्त प्रभु में लगा हुआ है तो आपसे सच्ची बात कहते हैं अगर चूक भी हो जाए तो प्र क्षमा करके उसे आगे बढ़ाते हैं उसका पतन नहीं होता इसलिए संपूर्ण शरीर धारियों को सुख के लिए

शांति के लिए निर्भयता के लिए निश्चिंता के लिए परमानंद के लिए एक मात्र उपाय है भगवान की शरण हो जाना प्रभु का आश्रय ले लेना बड़े भाग्यशाली है जिनको य बात पकड़ में आ जाए नहीं आ जाएगी तो जीवन के अंतिम क्षण तक य पता चल जाएगा तुम्हें कि हमने बहुत गलत किया और अब हम खाली हाथ जा रहे हैं हमारे पास वह कुछ नहीं है जो हमें दुख से शोक से चिंता से भय से मृत्यु से बचा पाए अगर कहीं सत्संग की बात पकड़ ली है तो हृदय में फूलन होगी कि पांच नाम सही लेकिन हमारे पास है राधा नाम पांच नाम है तो पांच नाम ही हिसाब में भारी पड़ जाएंगे हमारा मंगल कर देंगे हमें विपत्ति से बचा लेंगे हमने आश्रय लिया है प्रभु का वह संभाल लेंगे यह बात समझ लो अगर प्रभु से संबंध स्वीकृत आपने नहीं किया और नाम जप नहीं किया तो मन पछत है अवसर भीते समय व्यतीत होने जाने पर पछताने से फिर क्या स्टेशन थोड़ा विलंब गए देखा वो गाड़ी छूट गई जिससे जाना था अब क्या अब पछताना ही है ऐसे ही यह जीवन की गाड़ी छूट ना जाए हम अपनी मंजिल तय कर ले वह है भगवत भजन

इकट्ठा करना खूब नाम रूपी धन इकट्ठा करना और प्रभु के भरोसे दृढ़ हो जाना हमें कोई भी अन्य आश्रय नहीं बचा सकता इस माया प्रपंच से एक मात्र प्रभु इस संसार में छली कपटी मित्र काल के अधीन यह हमारा क्या सहयोग करेंगे सहायोग तो कालातीत अनंत महिमा शली प्रियालाल करेंगे इसलिए बात समझ लो प्रिया लाल के सिवा आपका कोई हितकारी यहां नहीं है जो है वह सब स्वार्थ का नाटक है सुत बनिता जान स्वारथ रत ना करु नेह सभी ते अंत त ही त जेंगे पामर तू न तजे बही ते मन पछत है र भीते य सब स्वार्थ का व्यापार अंतिम समय कोई साथ नहीं देता भगवन नाम भगवत आश्रय साथ देता है श्रीपाद प्रभु धान जी महाराज कह रहे शस्त्राणि मा करण पथम प्रया सद्य क्ति का सद्गुरु नमो नवाह वृंदावन प्रेम रसो मदांध कि मुद ग्रह ग्राह्यता हास विद्वान जनों विद्वत जनों अब मुझे तुम्हारी बातों को कानों में प्रवेश भी नहीं करवाना है चाहे जितनी सत युक्तियों के द्वारा आप हमें समझाने की चेष्टा करें तुम ार बातें हम नहीं समझेंगे हे जगत गुरु जनों जो हमारे विश्व के बड़े

पूज्य जन महात जन है नमो वह नमस्कार करते हैं लेकिन अब आपकी बात नहीं मानेंगे क्या कहना चाहते हैं श्रीपाद कह रहे वृंदावन प्रेम रसो मदान धम मैं वृंदावन के प्रे रस के मध में अंधा हो मुझे वृंदावन की बात सुनाओ प्रिया प्रीतम की बात सुनाओ प्रिया प्रीतम की दासता की बात सुनाओ तो सुनेंगे अन्यथा आप समस्त शास्त्रों की विद्वता और सद युक्तियां और कल्याण की बातें अब हमको नहीं सुनना क्योंकि मैं वृंदावन के प्रेम में मदान हूं मदान वृंदावन प्रेम रसो मदांध किम ग्रह ग्राह हो सकता है कि आप लोग हमारा उपहास करें लेकिन मुझे उपहास से कोई मतलब नहीं मैंने वृंदावन की शरण ले ली अब मुझे कोई परवाह नहीं अस्तु बा मास्वाद यद वयं मृगया महे वृंद नतम स्वयम अस्तम ब्रज हो बहुत जोर की निष्ठा जिस परम तत्व को मुनि जन खोजते रहते हैं वस्तु यद वयं मृगया महे जिस भगवत तत्व की खोज बड़े-बड़े महात्मा करते रहते हैं मुझे उसकी भी परवाह नहीं वह तत्व ज्ञान मिले या ना मिले तो आप पा क्या गए हम श्री धाम वृंदावन में अपने शरीर को रख रहे हैं ब्रज

और इसी में मिला देंगे अर्थात वृंदा नष्ट में स्वयम अस्तम बजप अपने जीवन को वृंदावन के हाथ में बेच दिया मिला क्या बोले वृंदावन प्रेम रसो मदांध वृंदावन के प्रेम रस के मदमे में अब और कुछ नहीं दिखाई देता प्रेम ही प्रेम मुझे तत्व ज्ञान नहीं चाहिए बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि जि का अनुसंधान करते रहते हैं वह साधन साध्य मुझे नहीं चाहिए मुझे वृंदावन मिल गया और वृंदावन को अपना जीवन दे दिया अर्थात अखंड वास अब मुझे कोई चिंता नहीं परम विमुक्ति साक्षात क्यों चिंता नहीं क्योंकि यहां साक्षात मुक्ति घूम रही है वर्ण करने के लिए जिसका शरीर छूटा मोक्ष कहती मुझे स्वीकार कर लो पर प्रियाज के धाम में शरीर छूटने वाले मोक्ष स्वीकार नहीं करते वो प्रियालाल का प्रेम स्वीकार करते हैं इसलिए वो बेचारी खड़ी रहती है मुक्ति को कोई पूछता नहीं घर घर भटकत मुक्ति बावरी कमल को बतरा वे जोप वृंदावन रस भावे यदि वृंदावन रूपी रस हृदय में स्फुरद हो गया तो मोक्ष को भी स्वीकार नहीं कर विभ क वलता मोक्ष तो भयभीत है करने वाला है प्रेमी जनों को

नहीं प्रियालाल से छुटा कर के और वह उसी में लीन कर दे ऐसा नहीं हम तो प्रियालाल की सेवा सुख में निमग्न रहने वाले हैं इसलिए विभ क वलता परम विमुक्ति साक्षात जिनको लगता है कि हम साधन के द्वारा मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकते तो वृंदावन वास करो मोक्ष चाहोगे तो परम वि मुक्ति परम मोक्ष प्रदान कर देगा वृंदावन लेकिन यहां के प्रेमी जन इसका कोई आदर नहीं करते भूरी रस सर्वस्वम ववा साक्षात यहां बहुत प्रचुर रस है बड़ा रस है शि प्रिया प्रीतम अभी दिमाग अपरण नहीं हुआ आपका इसलिए इस बात को नहीं समझ पाओगे जब तुम्हारी बुद्धि का अपरण हो जाएगा तब समझ में आएगा किय देश आए कैसा प्रतिपल नवीन आनंद उठते बैठते चलते फिरते प्रतिपल नवीन आनंद जब अंतःकरण का अपहरण हो जाता है भगवदाज़्जुकाम में कितने मनुष्य मनुष्यों में कितने भगवत भाव वाले उन भगवत भाव वालों में कितने ऐसे जो धाम वासी है उन धाम वासियों में कितने ऐसे जो प्रिया प्रीतम के अनुरागी है सब थोड़ी अनुरागी है श्रीपाद कह रहे हैं भूरी रस सर्वस्व मे ववा साक्षात प्रचुर रस सबसे

बड़ा रस यहां साक्षात विराजमान है प्रिया प्रीतम प्रेम रस प्रेम के खिलौना दो खेलत है प्रेम खेल मूर्तिमान प्रेम स्वरूप प्रिया प्रीतम यहां विराजमान है याय मुक्ति की कौन चाह करे साक्षात विश्व भाग्य जियाद विश्व में सबसे बड़ा भाग्यशाली वही जिसने वृंदावन को अपना मान लिया मेरो वृंदावन प्राण वृंदावन सर्वस्व वृंदावन जीवन वृंदावन ब दुर्भाग्य उदय हो रहा है वृंदावन ब्रज क्षेत्र की लताओं का हनन हो रहा है कल एक आए थे ब्रजवासी जन बड़े दुखी थे उन्होंने कहा कितने सैकड़ों वृक्ष काट दिए गए रात की रात में जेसी भीय लगाए उखाड़ के फेंक दिए ऊपर से काट करके आजकल तो सब बिजली की मशीने है सर से काटा और काट काट करके लद लद करके बाहर चले यह वृक्ष 50 50 100 100 वर्ष में तैयार होते हैं यह वृंदावन धाम है वैसे हमें तो लगता है कहीं के वृक्ष नहीं काटने चाहिए पर धाम के ब्रज चौ कोष के वृक्ष सब महात्मा है घोर अपराध हम नहीं कह रहे हमारी वाणी जी कह रहे हरि राम व्यास जी कह रहे हैं वृंदावन की लता की एक शाखा काटने पर करोड़ों ब्रह्म

हत्या का पाप लगता है करोड़ों गौ हत्या का पाप लगता है बड़े-बड़े वृक्ष इतने बड़ा पीपल का वृक्ष बरगद का वृक्ष नीम का वृक्ष सब उ जो परिक्रमा लगाने पर सुख मिलता था लौट जाओ तो थकान मिट जाए आज ऐसे कंकड़ है कि परिक्रमा लगाना चाहे ना तो पैर चलनी हो जाए दंडवत लगाना चाहे तो साधक लगाए तो गांठों के सब खाले हट गई हाथ के सब घायल हो गए यहां की रज का महत्व रोड का महत्व नहीं कौन सुने आधुनिकता बढ़ती चली जा रही है धाम का जो अस्तित्व है वो तो है ही रहे मिटा थोड़ी सकते हो ये तो चिदानंद है ढक सकते हो ढक सकते हो और ढक रहा है आधुनिकता बढ़ रही है भागवत कता के भाव जहां हमारे प्रकट होते हैं वो सब लुप्त और गुप्त होते चले जा रहे हैं बहुत दुख है इस बात का जो वृंदावन की लताएं कटती ना तो हृदय व्यथित होता है बस तड़प सकते हैं कुछ कह सकते नहीं कहीं भी लता हो दर्शन मात्र से भगवत भजन की वृद्धि करने वाली गले लगा लो तो समझते हो पूरे तीर्थ स्नान कर लो ऐसे पवित्र नहीं होंगे जैसे वृंदावन की लता को गले लगाने तमाल कदम एक ऐसे

पावन वृक्ष है अरे यहां का नीम बूल भी परम पवित्र करोड़ कल्प तरु को हे करने वाला है वृंदावन की लता सम कोटि कल्प तरुणाई ये आधुनिकता से बचावे भगवान धामों को यह ब्रज भूमि को बचावे जो आधुनिकता है यह भजन हीन करने वाली है जो हमारी पूर्व की लता रज रानी यह सब भजन बढ़ाने वाली है एक लता को रोज ऐसे देख देख देखकर नेत्रों से पोषित करके उसकी सेवा तब जा के 25 वर्ष में वो अपना रूप धारण कर और 100 100 50 50 वर्ष की लताएं ऐसे काट के निर्दय लोगों ने फेंक दिया और पैसे के लोभ से बस पैसा चाहिए हा पचास लाख रुपया तुम कमा सकते हो लेकिन ऐसी परिस्थिति इनके अपराध से आएगी कि सब बिटिया मेट हो जाओगे वृंदावन की ब्रज की लताओं को मत छेड़ो वृंदावन के पशु पक्षी लता रज रानी यही हमारी सिद्धि है और इसी का ढकना इसी का नाश करना शुरू हो चुका है जिधर देखो लता कोई जगह खरीदेगा पहले लता का काटना होगा लता का नाश किया जाए प्रिया प्रीतम के इस धाम की महिमा लताओं से है लता भवन सुख शीतल हां श्री हरिवंश रहित नित जहां तहां नवै भगवान जहां देखो

जहां ऐसे पवित्र पवित्र जगहों की लताएं रात रात में काटकर बाहर कर ये सब आंखों से देखा ये वृंदावन धाम है कैसे कैसे आज तो 500 वर्ष पहले हरिराम व्यास जी लिख गए कैसे छाती की पीड़ा बताऊं मथुरा खोद रहा है वृंदावन कट रहा है हरिराम व्यास जी पद में लिख गए मथुरा खुद रहा है और वृंदावन कट रहा है यह भगवत धामों की किसी तरह रक्षा होनी चाहिए रज रानी की रक्षा होनी चाहिए यहां की लताओं की रक्षा होनी चाहिए यह खग म पशु पंछियों का दे बहुत विचित्र आती चली जा रही बहुत विचित्र भजन की लिए जो चाहिए वो सब धीरे-धीरे ढकता चला जा रहा है और जहां कहीं लताएं हैं भी तो ये दुश्मन लोग लताओं को नहीं रहने दे ये दुश्मन है वृंदावन धाम के ब्रज धाम के दुश्मन है ये लोग जो लताएं कटाते हैं ऐसे सुंदर बिल्व वृक्ष ऐसे सुंदर तमाल ऐसे सब पता लगाओ कि भाई तो पता चला कि यहां ये भवन बनेगा यहां यह भवन बने भवन तो बना सकते हो लता लगाकर उसको पालन पोषण करने के लिए जो मेहनत चाहिए 50 वर्ष में एक लता ऐसी तैयार होती है जिसके नीचे 10 20 लोग बैठ जाए

और जहां 100 लोग बैठकर कीर्तन कर सकते हैं ऐसी लताओं को काट काट करके सब फेंक दिए गए बड़ा दुख होता और य यही नहीं पूरे ब्रज मंडल में और पूरे विश्व में जहां देखो वहां वृक्षों का आनंद और वृक्ष जीवन है प्रकृति से हमारा पोषण होता है प्रकृति को शुद्ध रखना और प्रकृति को अनुकूल बनाना ये वृक्षों का है फिर यहां तो भजन के अनुकूल लता ही है बैठ रहो कुंजन के कोने श्याम राधिका गाऊं किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊ बड़ा विचित्र बड़ा दुखद हृदय हो जाता है जब ये पता चला कि सैकड़ों वृक्ष रात के रात के ये छठी करामा काट के फेंक दिए गए ले जाए गए जिधर बहुत विशाल वृक्ष का नीम का प्रेम पेण होगा अगर हम दो लोग ऐसे करें तो उसकी जड़ रात रात में ढा के काट एक वट वृक्ष नौ किशोर वट वृक्ष काट के फ य पीपल का वृक्ष काट के फेंक दे अरे पीपल भगवान वासुदेव का स्वरूप वो भी वृंदावन धाम में वृंदावन धाम कैसे इनके कुल परंपरा की रक्षा होगी कैसे इनके परिवार सुखी होंगे जो लताओं का हनन करते हैं वृंदावन की और बड़ी चतुराई से तो काल भी बड़ा चतुर है

कोई नहीं कहता काल ने मार दिया ऐसे चेगा कि तुम नष्ट हो जाओगे ज का बदना दारुण दुख दीन वही के मति पहले हरि लीन बुद्धि भ्रष्ट होती पहले नष्ट होने के लिए रुपया थोड़ी सच्चिदानंद सुख देगा रुपया थोड़ी महान महिमा शली मृत्यु और काल से बचा सकता है इसलिए वृंदावन की लताओं का यहां के पशु पक्षियों का यहां की रज रानी का यहां के महात्मा ये महात्माओं का देश है ये ब्रज चौ कोष कोई साधक भूमि या भोग भूमि नहीं है यह तप भूमि नहीं है यह प्रेम भूमि है य प्रेम में बावरे सर्वस्व छोड़े हुए राधा कृष्ण के प्रेम में मतवाले जनों का ये स्थान है अब जहां देखो वही सब भगवत भजन विमुख वार्ता भगवत भजन से विमुख करने वाले दृश्य भगवत विमुख करने वाली सब चेष्टा एं धाम में आकर के बढ़िया भागवत जीवन व्यतीत करते हुए भजन करके प्रियालाल की प्राप्ति करें इसलिए बड़ा विचित्र है यहां साक्षात प्रिया प्रीतम खेल रहे साक्षात प्रिया प्रीत और जिसकी देखो जहां जहां लताएं बची थी वहां वहां बुद्धि ऐसी भ्रष्ट होती जा रही यह वृंदावन धाम है कृपा हो जाए

तो बात समझ में आ जाए कुछ साधना ना करो पड़े रहो अपराध ना करो तो प्रिया प्रीतम मिल जाएंगे परम विमुक्ति साक्षात भूरी रस सर्वस्व मेव वासा यहां परम मोक्ष परम मुक्ति वर्ण करती है जो यहां आश्रय लेता है वास करता है लताओं को काटोगे साधु महात्माओं की निंदा करोगे द्रोह करोगे बृजवासन चाओ ग उनको गालियां दोगे अपमान करोगे कहां से भगवत प्राप्ति होगी पूज चंद्रशेखर बाबा जी महाराज कहते थे ब्रजर ब्रज लता ब्रजवासी पर श्रद्धा ना रहे तो हम कहते रेगिस्तान में रहोगे तो प्राप्ति हो जाएगी वृंदावन में नहीं डायरी में आकर लिखा था 25 वर्ष पहले यह वचन बाबा के निकले थे क्यों यहां सिद्धि है ब्रज रज ब्रजवासी ब्रज लता यहां की सिद्धि है जो ब्रजवासी हों के चरणों में झुकता है ब्रज रच का लेपन करता है और ब्रज लताओ के नीचे प्रियालाल के रस भरे गीत गाता है यही यहां की सिद्धि है उसी को प्रेम की प्राप्ति होती है साक्षात विश्व भाग्यम जियाद विश्व में सबसे बड़ा भाग्यशाली जीव कौन है बोले जो वृंदावन का आश्रय लिए है जो वृंदावन का वास

स्वीकार किए है और जिया वृंदावनम शत मृगम स्वयं वेद जिस तत्व को नेति नेति कहते हैं वह तत्व य मूर्तिमान होकर खेल रहा है उनके हम घर में रह रहे हैं मोक्ष कल्याण य तो सब धूल धूस यहां इनकी कोई परवाह नहीं हमें जो लाभ मिला धाम आना धाम का दर्शन धाम का आश्रय धाम का वास इसीलिए कह रहे अस्तु आ मास्वाद यद वयम मृगया महे जो बड़े-बड़े तत्व ज्ञानी मुनीश्वर जिसको खोज करते रहते हैं वो मुझे मिले या ना मिले इसकी कोई परवाह नहीं वृंदा नस्तम स्वयम अस्तम बजप मैंने अपने जीवन को वृंदावन के हाथ में बेच दिया वृंदावन को समर्पित कर दिया हरि भक्ति सुरस सिंधु मंथा द सारम उतम किम आश्रय परमो दारम सकला सारम विहाय राधिका रामम यह हरि भक्ति सुरस का समुद्र है वृंदावन हरि भक्त की सुंदर रस वृत्ति प्रकट करने वाला यह वृंदावन समुद्र है अनिर्वचनीय रूप अनिर्वचनीय लीला अनिर्वचनीय रस श्रीधाम वृंदावन में प्रकट है परम उदार वृंदावन का जो वास और आश्रय लेता है वह ऐसी सुरस भक्ति को प्राप्त होता है देवोप पन्ना कृता म वृति ही श्री कृष्ण

चंद्रे रसा वृति ही वृंदावन कार् पित चित्तवृत्ति किम श्याम हम तक्त परम प्रवृति शी धाम वृंदावन में प्रियालाल के विधान के अनुसार जैसा आपको वास मिला जैसा आपको भोजन मिला जैसी व्यवस्था है उसकी चिंता मत करो जैसा प्रभु ने उचित समझा वैसा आपको वास दिया है जैसा प्रभु उचित समझ रहे वैसा आपको आहार आदि की व्यवस्था की है दैव प पन्न कृता आत्म वृति अपने शरीर निर्वाह के लिए अपने आराध्य देव के आश जैसे प्रभु वास दिए जैसे रख रहे हम राजी है उसी में जोई जोई प्यारो करे सोई मही भावे आकांक्षा करो श्री कृष्ण चंदे रसा वृति श्री प्रियाज और कृष्ण चंद जू के प्रेम रस में डूबने की आकांक्षा करो ये आकांक्षा खानपान विश्राम अपनी शरीर व्यवस्था की चिंता मत करो वो तो दैव पन्न कता आत्म वृति जो शरीर निर्वाह की वृत्ति है वोह तो इष्टदेव के द्वारा पूरी होगी आप आकांक्षा करो श्री प्रिया और श्री लाल जू के प्रेम रस में आविष होने की वृंदावन का अर्पित चित्त वृत्ति किम श्याम हम तक्त परम प्रवती मैं समस्त प्रवृत्तियों का त्याग करके समस्त

व्यवहार का त्याग करके एकमात्र वृंदावन वास करता हूं और जैसी व्यवस्था हमारे लाडली लाल की है उसमें मैं राजी हूं आकांक्षा करता हूं तो केवल प्रिया लाल के प्रेम में आवि होने की हमारी कामना हो तो केवल श्यामा श्याम के प्रेम में डूबने की और हमारी शरीर वृत्ति इसका वास करना इसका भोजन इसका वस्त्र इसकी औषधि यह इष्टदेव के ऊपर है वो योगक्षेम भाम में हम वो स्वयं वाहन करते तुम इसकी चिंता ना करो तुम तो प्रियालाल के प्रेम में डूबने की चिंता करो चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण प्रसंग चल रहा है देवराज इंद्र ने अपने गुरुदेव भगवान ब्रहस्पति जी का अपमान कर दिया सभा में अप्सराओं का नृत्य हो रहा है गंधर्व गण गान कर रहे हैं बड़े-बड़े ऋषि मुनि स्तुति कर रहे हैं समस्त देवता लोक सब बैठे हुए हैं देवराज इद्र की सभा लगी गुरु ब्रास पति देव जी पधारे गुरुदेव के आने पर समस्त लोकपाल सहित देवता खड़े हो गए पर देव राजेंद्र इंद्राणी के साथ वैसे ही बैठे रहे ना कोई हाथ जोड़ना ना कोई नमस्कार मुद्रा बस घमंड ये हो जाता है अगर अगर

भगवत विमुख वृत्ति हो जाए तो घमंड बहुत जल्दी चढ़ जाता है और घमंड हो जाए तो बड़े से बड़ा अपराध हो जाता है देवगुरु राजपति जी ने देखा कि देवराज इद्र को त्रिभुवन पति होने का बड़ा घमंड है इसीलिए खड़ा नहीं हुआ आदर नहीं किया वापस लौट गए जब वो वापस लौट गए तब बुद्धि होश में आई और अपनी बड़ी निंदा की सभाव कि मैंने अपने गुरुदेव का अपमान कर दिया हाय यह त्रिभुवन पति पद कितना मदांध करने वाला है कि परम ज्ञानी परम कृपालु भगवान ब्रस पति जी जो हमारे गुरुदेव है उनका हमने अपमान कर अब क्या दौड़े ब्रस पति जी त्रिका लग गया उन्होंने देखा कि वह आ रहा है तो अंतर्धान हो गए और ऐसी जगह एकांत में हो गए कि इंद्र ध्यान करने पर भी नहीं ढूंढ पाए अब घबरा गए उनको घबराहट इस बात की हुई कि गुरुदेव नाराज हो गए यह बात दैत्यों को पता चलेगी तो आक्रमण कर देंगे व ऐसा ही हुआ दैत्य जन भगवान शुक्राचार्य जी को गुरु मानते बड़े पवित्र भाव से आराधना करके उनको अनुकूल कर लिया था जही पता चला कि इनके गुरु से बिगड़ गए बस फिर आक्रमण करके खूब मार

काट मचाई देवताओं को भगा दिया देवलोक से देवताओं को भगा दिया देव राजेंद्र कुछ मुख्य देवताओं के साथ ब्रह्मा जी के पास गए ब्रह्मा जी से विनय की ब्रह्मा जी ने कहा तुम्हारा गुरु अपराध बन गया अब तुम किसी को गुरु बनाओ और वह तुम्हारी रक्षा का भार ले समर्थ हो तो तुम विजय प्राप्त कर सकते हो तो ब्रह्मा जी से प्रार्थना की कि हमारा गुरु बनने योग्य कौन है त्रिभुवन में तो कहा त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप जी विश्वरूप जी बड़े ही जितेंद्रीय धर्म निष्ठ वेदज और तपस्या के धनी हैं वह यदि आपके गुरु बनने का पद स्वीकार कर ले तो वह विजय दिला सकते हैं पर उनमें एक बात है कि उनकी माता दैत्य वंश के है तो यह भांजे हुए दैत्य के तो ये तुम्हारे गुरु तो बनेंगे पर इनका प्रेम दैत्यों के प्रति है अगर उसको क्षमा कर सको तो ये तुम्हें विजय दिला देंगे त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप जी के पास देवराज इंद्र बड़े-बड़े लोक पाल गए विनय की और कहा हम आज्ञा भी करते हैं क्योंकि हम श्रेष्ठ देवता हैं आप हमारे गुरु पद पर विराजमान हो हमारी प्रार्थना

भी है हमारी आज्ञा भी है विश्वरूप जी ने कहा यद्यपि ये निंदनीय है यह बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है पर जब आप हमारे यहां अतिथि रूप से आए और आप ऐसी आज्ञा भी कर रहे हैं प्रार्थना भी कर रहे हैं तो मैं आपके गुरु पद को स्वीकार करता हूं और दिव्य वैष्णवी विद्या का प्रयोग किया समस्त देवताओं के जो अंग भंग हो गए थे सब पुष्ट हो गए और वैष्णवी विद्या के बल से पुनः देवराज इंद्र को स्वर्ग पर स्थापित किया और कहा मैं एक कवच का गायन करता हूं जैसा कहूं वैसे आचमन अंगन यास

करंग न्यास करके फिर तुम्हें कोई भी भेद नहीं सकता कोई पराजित नहीं कर सकता और उस कवच का नाम नारायण कवच है त्रिलोकी का राज्य जब देवराज इंद्र को प्राप्त हुआ विश्वरूप जी ने कहा शांत होकर एक सब देवता लोग कवच सुन उसे कोई कभी भी परास्त नहीं कर सकता उसका नाम है नारायण कवच चाहे जितना आक्रमणकारी कोई शत्रु हो भूत हो प्रेत हो कुछ भी मारण मोहन वशीकरण उच्चाटन के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता श्री सुखदेव जी कहते परीक्षित देवराज इंद्र और समस्त देवताओं को नारायण कवच का उपदेश विश्वरूप जी ने किया देवराज इंद्र किसी को कभी भी कहीं कोई भय का अवसर हो तो उसके कभी कोई भी आक्रमण किसी भी तरह की हानि नहीं कर सकते मंत्र का आक्रमण अस्त्र का आक्रमण कोई भी स्नान करके पवित्र होकर पवित्र वस्त्र धारण करके आचमन करके हाथ में कुछ की पवित्री धारण करके उत्तर मुह की ओ उत्तर की तरफ मुह करके बैठ जाए और जब तक पूरा कवच का पाठ ना हो जाए तब तक बीच में टोके बोले नहीं कोई अन्य बात ना बोले वही कवच का पाठ करें समग्र श्वर धर्म यस लक्ष्मी

ज्ञान वैराग्य परिपूर्ण भगवान नारायण भगवान श्री हरि बड़ी महिमा है इस नारायण कवच की ध्यान करे भगवान श्री हरि गरुण जी की पीठ पर अपने चरण कमल रखे हुए हैं अमाद आठो सिद्धियां हाथ जोड़े भगवान के सामने खड़े है आठ हाथों में शंख चक्र ढाल तलवार गदा बाण धनुष पास धारण की हु है ओम काल स्वरूप प्रभु ऐसे सामने ध्यान करके फिर शुरू करें ओम हरि विद ध्यान मम सर्व रक्षम तांग पदमा पत गेंद्र पृ दरा चरमा सद सु चाप पान दनो गुणो बाहु सब र से मेरी भगवान नारायण रक्षा करें मत्स मूर्ति भगवान जल के भीतर जल जंतुओ से और वरुण के से मेरी रक्षा करें माया से ब्रह्मचारी रूप धारण करने वाले वामन भगवान व और स्थल पर विश्वरूप त्रिविक्रम भगवान आकाश में मेरी रक्षा करे जिनके घोर अट्टहास से दिशाए गूंज उठी गर्भवती दैत्य पत्नियों के गर्भ गिर गए वे दैत्य युत पतियों के शत्रु भगवान नरसिंह हमारी जंगल में किले में रणभूमि में विकट स्थानों में मेरी रक्षा करें अपनी दाढ़ पर पृथ्वी को धारण करने वाले यज्ञ मूर्ति वारा भगवान मार्ग में रक्षा करें

परशुराम भगवान पर्वतों के शिखरों पर लक्ष्मण जी के सहित भरत के बड़े भाई भगवान श्री रामचंद्र जी प्रवास के समय मेरी रक्षा करें भगवान नारायण मारण मोहन भयंकर अ विचारों से सब प्रकार के प्रमाद से मेरी रक्षा करें ऋषि श्रेष्ठ भगवान नर गर्व से अहंकार से मेरी रक्षा करे योगेश्वर भगवान दत्ता तेजी योग के विघ्नों से त्रिगुणा पति भगवान कपिल देव कर्म बंधनों से मेरी रक्षा करें परम ऋषि सनत कुमार कामदेव से रक्षा करें हयग्रीव भगवान मार्ग में चलते समय मेरी रक्षा करें देव मूर्तियों को देखकर जो नमस्कार नहीं करता है उसको अपराध लगता है उस अपराध से देव ऋषि नारद जी और 32 सेवा अपराधों से भगवान नारद और कच्छप जी हमारी रक्षा करें कल जहां विश्राम हुआ था वो था 32 सेवा अपराधों से भगवान नारद जी हमारी रक्षा करें और जो हमसे पाप कर्म बन गए हैं हमें नरक ले जाने वाले हैं उनसे कछप भगवान हमारी रक्षा करें धनवंतरि भगवान पाव पथ द्वंदवा भया दृष भो निर्ज आत्मा यज्ञ लोका दव जनात बलो गणा क्रोध वसाद हिंद्र द्वै पायनो भगवान प्रबोधा बुद्ध

पाखंड गणात प्रमादा कलक कले काल मलात प्रपात धर्मा बनायो रु कृता अवतार माम केशव ग दया प्रात रव्या गोविंद आंग मात वेणु नारा उदा शक्ति मने विष्णु रंद्र पाण भगवान धनवंतरी कुपथ से रक्षा करें जितेंद्रीय भगवान ऋषभ देव सुख दुख आदि द्वंद से भय दायक द्वंद से भगवान ऋषभ देव जी रक्षा करें यज्ञ भगवान लोका पवाद से रक्षा करे भगवान बल राम जी मनुष्य कृत कष्टों से रक्षा करें भगवान अनंत शेष जी क्रोध वस नामक सर्पों के गणों से मेरी रक्षा करें भगवान श्री कृष्ण दैपायन व्यास देव जी अज्ञान से हमारी रक्षा करें बुद्ध देव भगवान पाखियो से और प्रमाद से हमारी रक्षा करें धर्म रक्षा के लिए महान अवतार धारण करने वाले भगवान कल की पाप बहुल कलिकाल के दोषों से हमारी रक्षा करें प्रातः काल भगवान केशव अपनी गदा लेकर हमारी रक्षा करें दिन चढ़ाने पर भगवान गोविंद अपनी बांसुरी अधर पर विराजमान करके हमारी रक्षा करें दोपहर के पहले भगवान नारायण तीक्षण शक्ति लेकर और दोपहर को भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र के द्वारा हमारी रक्षा करें तीसरे पहर

में भगवान मधुसूदन अपना प्रचंड धनुष लेकर मेरी रक्षा करें सायंकाल भगवान ब्रह्मा जी त्रिमूर्ति धारी माधव सूर्यास्त के बाद हृसिकेश भगवान रक्षा करें अर्ध रात्रि के पूर्व और अर्ध रात्रि के समय भगवान पद ना हमारी रक्षा करें रात्रि के पहले प्रहर में श्री वत्सला भगवान हरि जू रक्षा करें उषा काल में खडक धारी भगवान जनार्दन रक्षा करें सूर्योदय से पूर्व श्री दामोदर भगवान और संध्या हों में काल मूर्ति भगवान विश्वेश्वर हमारी रक्षा करें हे सुदर्शन चक्र आपका आकार चक्र की तर जैसे रथ का पहिया आपके किनारे का भाग प्रलय कालीन अग्नि के समान अत्यंत तीव्र है आप भगवान की प्रेरणा से ही भक्त रक्षा के लिए जाते हैं और सदैव आप घूमते रहते हैं जैसे आग वायु की सहायता से सूखे घास फूस को जला डालती है ऐसे ही आप जो भगवान की शरण में है उनके विघ्नों को कष्टों को पाप को और दुष्ट जनों को शीघ्र से शीघ्र जला दीजिए जला दीजिए हे भगवान की कोमोद की गदा आपसे छूटने वाली चिंगारियां का स्पर्श वज्र के समान अय है हे भगवान अजीत की प्रिय गदा

मैं भगवान का सेवक हूं इसलिए आप कुष्मांड विनायक यक्ष राक्षस भूत प्रेत ग्रहों को कुचल डालिए कुचल डालिए और मेरे शत्रुओं को चूर चूर कर दीजिए हे भगवान का पांच जन शंख आप श्री कृष्ण चंद जू के फूंकने से जो शब्द करते हैं शत्रुओं का दिल दहला देने वाले यात धान प्रम प्रेत मातृका पिशाच ब्रह्म राक्षस इन सबसे आप हमारी रक्षा कीजिए हे भगवान की प्यारी तलवार आपकी धार बहुत तीक्षण है आप श्री भगवान की प्रेरणा से भक्तों की रक्षा के लिए उनके शत्रुओं को छिन्न भिन्न कर दीजिए हे भगवान की प्यारी ढाल आप में सैकड़ों चंद्राकार मंडल हैं आप बड़ी तेजोमय है जो पाप दृष्टि पापा आत्मा शत्रु जो भक्तों को कष्ट देने वाले हैं उनको सदा सदा के लिए उनकी आंखें बंद कर दीजिए सूर्य आदि ग्रह पुच्छल तारे केतु दुष्ट मनुष्य सरपा आद रंगने वाले जंतु दाढ़ वाले हिंसक पशु भूत प्रेत आदि पापी प्राणी यह जो हमें भय दे जो हमारा मंगल विनाश करने वाले हैं हे भगवान के नाम हे भगवान के आयुध भगवन नाम कीर्तन के प्रभाव से तत्काल समस्त अमंगल नष्ट हो जाए

बृहद रथ सामवेद स्त्रों द्वारा जिन श्री भगवान की स्तुति की जाती है वेद मूर्ति भगवान गरुण देव जी विश्वक सेन जी भगवान के नामों का उच्चारण नामों का कीर्तन करने से समस्त विपत्तियों का नाश कर देते हैं हे हरि के नाम आप महान महिमा में हो हे हरि के वाहन आप महिमा में हो हे आयुध हे भगवत पार्षद आप हमारी बुद्धि इंद्रिय मन और प्राणों की समस्त विपत्ति आपत्तियों से रक्षा कीजिए जितना भी यह कार्य कारण जगत है सब वास्तव में भगवान ही बने हुए हैं इस सत्य के प्रभाव से हमारे सारे अमंगल नष्ट हो जाएं सारे उपद्रव नष्ट हो जाए जो लोग ब्रह्म और आत्मा की एकता का अनुभव कर चुके हैं उनकी दृष्टि में भगवान का स्वरूप समस्त विकल्पों और भयो से भेदों से रहित है फिर भी माया शक्ति के द्वारा भूषण आयुध और विविध प्रकार की शक्तियों को भगवान धारण करते हैं यह बात निश्चित सत्य है और यह धारण करते हैं हम भक्तों की रक्षा के लिए इसलिए विश्वरूप भगवान हमारी रक्षा करें जो अपने भयंकर अहा से लो के लोग भयभीत कर देते हैं जो अपने तेज से सबका तेज

ग्रस लेते हैं ऐसे भगवान नरसिंह देव दसों दिशाओं में हमारी रक्षा करें ऊपर नीचे दाएं बाएं बाहर भीतर जो हमारे शत्रु हैं उनसे हमारी रक्षा करें विश्वरूप जी ने देवराज इंद्र से कहाय मैंने तुम्हें नारायण कवच सुना दिया इस कवच को अपने में स्थापित करो तुम सुरक्षित हो गए हो अब अनायास तुम दैत्य उत्पत्ति हों को जीत लोगे जो नारायण कवच तुम्हें हमने सुनाया इसे जो सुनेगा उसके सारे पाप नष्ट हो जाएंगे तो कोई भी शत्रु उसे परास्त नहीं कर सकता व नेत्रों से देख ले या पैर

से छूले तो तत्काल समस्त भयो से मुक्त हो जाएगा ये वैष्णवी विद्या है प्रेत पिशाच आदि नहीं कभी आएंगे बाघ आदि सर्पा आदि यह जीव कभी नहीं काटेंगे अकाल मृत्यु नहीं होगी बड़ा दिव्य है य नारायण कवच प्राचीन काल की बात है कि कौशिक गोत्री ब्राह्मण इस नारायण कवच को धारण करके उसका शरीर मरुभूमि में छूट गया था तो जहां उस ब्राह्मण का शरीर पड़ा था हड्डियां पड़ी थी जो नारायण कवच बांध कर के प्राण छूट गए तो उसके ऊपर से एक दिन गंधर्व राज चित्र अपनी स्त्रियों के साथ विमान पर बैठकर जा रहा था जही उन हड्डियों के ऊपर से निकला तेही विमान खोपड़ी के बल उल्टा होकर के गिर पड़ा इस घटना से बड़ा आश्चर्य हुआ उसको फिर उसने वाल फिल्ली ऋषियों से प्रार्थना की इस भूमि में ऐसा क्या है कि मेरा विमान आगे नहीं जा पाया और उल्टा होकर गिर पड़ा तब उन्होंने कहा कि नारायण कवच बांधे हुए यहां जिसका शरीर छूटा है जिसकी हड्डियां पड़ी है वह नारायण कवच से युक्त है इसलिए तुम ऊपर विमान से नहीं जा पाए और नीचे गिर पड़े तब उसने उन हड्डियों को ले

जाकर सरस्वती नदी में प्रवाहित किया और फिर स्नान करो गया ऐसा प्रवाह प्रभाव नारायण कवच का है भगवान सुखदेव जी कहते परीक्षित इस नारायण कवच को जो समय पर सुनता कोई भी इस वैष्णवी विद्या पर प्रहार नहीं काम कर सकता तंत्र मंत्र मारण वशीकरण उच्चाटन भूत प्रेत कोई भी य पक्की बात विश्व रूप से यह वैष्णवी विद्या सब देवताओं को मिली और रणभूमि में असुरों को पराजित कर दिया पर कपटी को कभी अपना मित्र नहीं बनाना चाहिए और स्वार्थी को कभी शिष्य नहीं बनाना चाहिए अगर कपटी को मित्र बनाओगे तो धोखा मिलेगा और स्वार्थी को शिष्य बनाओगे तो हानि हो जाएगी व अपने गुरु पर ही प्रहार कर देगा स्वार्थी नहीं देखता कि अपराध क्या है या लाभ क्या है वह स्वार्थ में अंधा हो जाता है बहुत से ऐसे उदाहरण तो इंद्र देवता बड़े स्वार्थी है जब जरूरत पड़ी थी तो गुरुदेव प्रणाम और नमस्कार जब नारायण कवच पहनाकर विश्व विजय बनाकर त्रिभुवन पति पर पद पर बैठा दिया तब देखो क्या व्यवहार करते हैं स्वार्थी का व्यवहार कैसा होता है तीन रूप सिर थे विश्वरूप जी

के तीन जैसे ब्रह्मा जी के चार मुख तो विश्वरूप जी के तीन मुख थे एक मुंह से वह सोम रस पान करते थे दूसरे से सुरा पीते थे तीसरे से अन्न खाते थे पिता इनके त्वष्टा थे ये देवताओं में श्रेष्ट है इसलिए यह जब यज्ञ करते तो ऊंचे स्वर से देवताओं की वृद्धि हो ऐसा आहुति देते और धीमे से दैत्यों की वृद्धि ऐसा आहुति देते क्योंकि दैत्य कुल की माता थी यह दैत्यों के भांजे हुए और त्वष्टा देवता थे उनके पुत्र थे तो जब गुरु पद पर बैठे तो उच्च स्वर से आवती देते देवताओं की

बल वृद्धि हो और धीमे स्वर से आवती देते कि दैत्यों की भी क्योंकि व मामा है माता उसी कुल की थी देवराज जब त्रिभुवन पति पद पर बैठ गए नारायण कवच धारण कर लिया विश्वरूप जी ने उनको जिता भी दिया भले वह धीमे स्वर से आवती पर गुरु पद में थे तुम्हें जिता दिया तुम्हें जो चाहिए वह मिल गया देवराज इद्र को सूचना मिली कि यह धीमे स्वर से आहुति देते हैं दैत्यों की बल वृद्धि की इंद्र भयभीत हो गए उन्होंने जाकर के बड़ी फुर्ती से तीनों खोपड़ी काट ली गुरुदेव विश्वरूप जी की बड़ा स्वार्थी यह अम्य अपराध बस केवल एक बात से कि व धीमे स्वर में आती अपने मामा की पक्ष में देते उच स्वर से आवती देवताओं की देते क्योंकि देवता त्वष्टा उनके पिता थे और माता दैत्य वंश की थी काट ली देवराज इंद्र ने तीनों गर्दन काट ली अब वो तो दिव्य महापुरुष तो जिससे सोम रस पीते थे वह सर पपीहा और जिसे सुरा पान करते थे वह सर गौरैया और जिससे अन्न खाते थे उससे तीतर ये तीन पक्षी बन गए पपीहा गौरैया और तीतर अब गुरु हत्या लग गई पीछे देवराज इंद्र के ब्रह्म

ऋषि और गुरु पद पर पर यही कपटी को कभी मित्र ना बनावे स्वार्थी को कभी शिष्य ना बनावे स्वार्थी को स्वार्थ पूर्ति के लिए गुरु मानेगा भगवान मानेगा जहां उसका स्वार्थ पूर हुआ फिर विश्वर ूप के जही गर्दन काट तो तीन पपीहा गौरैया और तीतर और ब्रह्म हत्या गुरु हत्या देवराज इद्र के पीछे अब हटा सकते नहीं थे इतनी सामर्थ्य नहीं थी ब्रह्म हत्या ऊपर सवार हो गई हाथ जोड़ कर के कांपने लगे बहुत उपाय किया एक वर्ष तक भयंकर पीड़ा भयंकर कष्ट कहीं ठोर नहीं सिंहासन में बैठ नहीं सकते जाके अब यह बड़े-बड़े ऋषियों से पूछते हैं अपनी शुद्धि का उपाय तब सब ऋषियों ने मिलकर के देवराज की जो गुरु हत्या करने पर ब्रह्म हत्या हुई उसके चार विभाग किए एक पृथ्वी को हिस्सा दिया दूसरा जल को हिस्सा दिया तीसरा वृक्ष को हिस्सा दिया और चौथा स्त्रियों को हिस्सा दिया ब्रह्म हत्या के चार हिस्से कर दिए पृथ्वी में यह वरदान दिया पृथ्वी की जो ब्रह्म हत्या का स्वरूप है वह उर भूमि है और जल में जो ब्रह्म हत्या का स्वरूप है फेन बुदबुदा है उसे हटा के

ही गोता मारा जाता है जब कभी जन् में तो फिर ऐसे गोता मारा जाता है उसर भूमि में कोई अनुष्ठान नहीं किया जाता वह अपवित्र भूमि मानी जाती है और वृक्ष में जो गोंद निकलती है और माताओं बहनों में जो मासिक धर्म होता है इसे ब्रह्म हत्या कहा जाता है तीन दिन तक किसी भी तरह माता बहनों को रसोई स्पर्श करना या पवित्र कार्य करना निषेध किया गया है तीन दिन तक एकांत सेवन करते हुए अंदर भ भन नाम जप करते हुए व्यतीत करें ये उस समय ब्रह्म हत्या का आवेश जो तीन दिन तक मासिक धर्म होता है हमारी शास्त्री पद्धति ऐसा है तो पृथ्वी में उर भूमि और उनको वरदान दिया कि कहीं भी कितना भी बड़ा गड्ढा हो बिना भरे अपने आप पूर्ण हो जाएगा समय आने पर और चतुर्थांश पृथ्वी को ब्रह्म हत्या का स्वीकार करना वही ब्रह्म हत्या पृथ्वी में कहीं कहीं उसर के भूमि के रूप में दिखाई देती है दूसरा ब्रह्म हत्या का जो भाग मिला वृक्षों को यह गों ब्रह्म हत्या का स्वरूप है इसे कोई भी शास्त्री पद्धति जानने वाला नहीं खाता ये जो गोंद वृक्षों की है इसका प्रयोग

उसे बहुत बलिष्ठ है इसको बलवर्धक पदार्थों में प्रयोग करते हैं पर इसको जो शास्त्रीय पद्धति जानने वाला है वह गोंद का भक्षण नहीं करता उनको वर्ण मिला कि कोई भी हिसा कट जाने पर फिर तुम पुनः जम जाओगे और गोंद के रूप में ब्रह्म हत्या दिखाई पड़ती स्त्रियों में मासिक धर्म के रूप में ब्रह्म हत्या ब्रह्म हत्या का जो मही में रज के रूप में दिखाई पड़ती है उस समय किसी का स्पर्श करना रसोई आदि का स्पर्श करना भगवत विग्रह की सेवा कर यह सब निषेध किया गया है जल ने जो चतुर्थांश स्वीकार किया वह फेन बुदबुदा काए और उनको वर मिला कि कितना भी खर्चा किया जाए तुम घटो ग नहीं बढ़ते जाओगे तुम्हारी बढ़ती इस तरह जो ब्रह्म हत्या थी व चार भागों में ऋषियों ने मिलकर के विभाजित किया पृथ्वी जल वृक्ष और स्त्रियां उसर भूमि फेन बुदबुदा काई गों और मासिक धर अब विश्वरूप की मृत्यु के बाद उनके पिता त्वष्टा बहुत दुखी हुए कि बड़े छलिया देवता है जरूरत पड़ी तो आए गुरु के पद में वर्ण किया और जब काम हो गया तो गर्दन उड़ा द बहुत विचित्र है तो

उन्होंने एक यज्ञ अनुष्ठान किया कि हम अपने पुत्र का बदला लेंगे हत पुत्र तत त्वष्टा जहा वेंद्र सतवे इंद्र शत्रु विवर्धना चरम जहि विद विश्वरूप की मृत्यु के बाद त्वष्टा ने एक यज्ञ किया हे इंद्र सत्रु तुम्हारी अभिवृद्धि हो और शीघ्र से शीघ्र तुम अपने शत्रु को मार डालो इस मंत्र से इंद्र का शत्रु उत्पन्न करने के लिए यज्ञ किया यज्ञ समाप्त होने पर अनुहार पचन नामक अग्नि दक्षिणा अग्नि से जोही यज्ञ पूर्ण हुई तो एक बड़ा भया बना दैत्य प्रकट हुआ ऐसा विकराल आकाश तक बढ़ा हुआ मानो साक्षात काल ही हो अब यह लोकों का मानो प्रलय कर देगा ऐसा त्वष्टा के पुत्र विश्व रूप जी की जब देवताओं ने देवराज इंद्र ने वध कर दिया तो त्वष्टा को बड़ी नाराजगी हुई उन्होंने यज्ञ किया और ऐसा भयानक दैत्य प्रकट किया परीक्षित पहाड़ के समान काला बड़ा डील डोल और संध्या कालीन बादन के समान कांति सिर के बाल दाढ़ी मछ तपे हुए तांबे के समान लाल रंग के नेत्र ऐसे लगते जैसे दोपहर के प्रचंड दो सूर्य चमकता हुआ तीन लोको वाला त्रिशूल और जे भी पग

बढ़ाया तो पृथ्वी डगमगाने लगी जैसे नौका पर कोई बलवान गजरात चढ़ रहा हो त्रिशूल को अंतरिक्ष पर उठाकर जमाई ली तो मुंह ऐसा खुला मानो भारी कोई कंदरा हो ऐसा लग रहा था आकाश को पी जाएगा जीप से नक्षत्रों को चाट जाएगा ल विकराल दाढ़ वाले मुंह से तीनों लों को निगल जाएगा अब तो बड़े-बड़े देवता राकर भागने लगे त्वष्टा की यज्र से प्रकट हुए इस विशाल दैत्य को देखकर परीक्षित यह त्वष्टा के तमोगुण पुत्र ने सारे लोगों को भयभीत कर दिया इसी से अत्यंत क्रूर दर्शन में थे तो

नाम पड़ा वृता असुर वृता असुर संपूर्ण लोक भयभीत ये कोई और नहीं है यह महा भागवत है चित्र केत जी जो संकर्षण भगवान की कृपा से इनको एक विमान मिला था ये विमान पर बैठ कर के भगवान शंकर के समीप विमान पर चढ़े चढ़े अब उस समय वह तो देवाधिदेव महादेव महा योगिंद्र मुनींद्र के गुरु तो भगवती अंबा बा मांग में विराजमान थी त्रिपुर सुंदरी और सनका आद बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषियों को उपदेश कर रहे थे तो यह गए सभा में आप अपनी पत्नी को वा मांग में विराजमान कि भगवान शिव तो कुछ बोले माता जी ने कहा दुष्ट जगतगुरु को समझाने आया तो इनकी महिमा को समझता है हम दो हैं तेरी दृष्टि द्वैत से युक्त हम दो छोड़ी हम तो शिव ही है शिव शिवा केवल कहने को है तू क्या इनको जगतगुरु को उपदेश कर रहा है असुर बुद्धि जा दैत्य भाव को प्राप्त हो वही वृता सुर के रूप में य भगवान संकर्षण के महान भक्त श्री हरि के बड़े-बड़े देवता थरा उठे अब देवराज इंद्र ने देवताओं से कहा आक्रमण करो पहले ही मार दो नहीं तो मार देगा यज्ञ से प्रकट हुआ है सब देवता अपने दिव्य

अस्त्र शस्त्र लेकर के परंतु वृता सुर जैसे कोई दांत खोदने की सींक ना हो ऐसे सब दिव्या स्त्रों को पकड़ पकड़ के सेसे दांत से काट काट के फेंक दिए जितने उनके आस्त्र शस्त्र सब ऐसे चबा चबा के थूक दिए जैसे कोई पान चबा के बड़े-बड़े दिव्या स्त्रों को ऐसे देवताओं के आश्चर्य की सीमा नर भागे देवराज इंद्र से कहा कुछ चला जितने दिव्यास्त्र सब ऐसे चवा र लंग लाची की तरह अब सब उदास हो गए और भागे सब स्वर्ग छोड़ के पहुंचे वैकुंठनाथ भगवान नारायण को स्तवन किया अब एक ही

उपाय है न किया हे प्रभु हे करुणा सागर वायु आकाश अग्नि जल पृथ्वी य पांच भूत आप ही प्रकट किए हो प्रभु आप ही काल रूप हो सब आपसे ही भयभीत रहते हैं भगवान हम भयभीत है वृता सुर से रक्षा करो हमारी प्रभु अगर कोई आपका सहारा ना लेकर इस भय से बचने के लिए किसी और का सहारा ले तो ऐसे जैसे कुत्ते की पूछ के कोई समुद्र पार जाना चाहता हो वैवस्वत मन पिछले कल्प के अंत में जब भयभीत हुए तो आपका सहारा लिया तो प्रलय के जल के समय आप मत्स अवतार धारण करके उनकी रक्षा की प्रभु ऐसे ही हम भयभीत है हम आपकी शरण में है वृता सुर से हमारी रक्षा करो प्रभु आप अवश्य बचाओगे हमें विश्वास है पहले कह रहे अवश्य बचाओगे हमें विश्वास है प्रभु आप ही हम सबकी उत्पत्ति का कारण हो ये बड़े स्वार्थी ऐसा गजा के विश्वरूप जी से प्रार्थना की थी स्वार्थी से कभी भरोसा ना करें जब सत्य भामा जी की इच्छा के लिए पारिजात लेने भगवान गए थे ना तो युद्ध किया था एक देवताओ ने जरूरत पड़ी तो घुटने टेक दिए और जब समझा कि अब जरूरत नहीं है तो युद्ध शुरू कर दिया

भगवान से स्वार्थी से कभी विश्वास इसीलिए एक मात्र हेतु की कृपाल भगवान श्री हरि है प्रभु आपकी कृपा से हम विपत्ति से बच सकते हैं हमें संकट से पार करो उदार शिरोमणि हम देवता लोग आपके ही जि आए जी रहे आपके ही कल्याण करने से निर्भर बड़ी विनय की प्रभु आप ही आप श्री सुखदेव जी कहते महाराज देवताओं ने इस प्रकार भगवान की स्तुति की तो भगवान प्रकट हो गए और भगवान के सरत कालीन कमल के समान खिले हुए ने 16 पार्षद भगवान की सेवा में बड़े ही सुंदर भगवान का सौंदर्य वक्षा

पल श्रीवत्स का चिन्ह गले में में कौस्तुव बनी सब देवता साष्टांग धरती पर लौट गए दृष्ट तम बन सर्व लाद विकल बाहा दंडवत पतित राजन नेयतु भगवान को सा साष्टांग दंड के समान लेट गए धीरे धीरे उठे हाथ जोड़ कर के फिर भगवान से हे भगवान आप ही यज्ञ में स्वर्गादपि वाले हो आप ही यज्ञ में विघ्न डालने वाले दैत्यों का नाश करने वाले हो इसलिए प्रभु हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं आपके अनंत नाम है आपके नामों की सीमा नहीं है प्रभु सतोगुण रजोगुण तमोगुण इन तीनों गुणों के अनुसार उत्तम मध्यम निकृष्ट गतियां वो सब आप देते हो आप ही गतियां देने वाले हो प्रभु इस कार्य कारण जगत रूप के स्वामी आप ही हो हे भगवान आपकी अगणित महिमा है आपकी लीला का रहस्य जानना बड़ा कठिन है हे भगवान हम ठीक ठीक सृष्टि के कार्य को समझ नहीं पाते कब क्या कैसा और यह सब आप करने वाले हो प्रभु आप अंतर्यामी हो आप अंतरात्मा हो नाथ श्रुति आपका केवल नेति नेति कहक वर्णन करती है हे मधुसूदन आपकी महिमा रस का अनंत समुद्र है उन्हें नन्हे से सीकर एक बार थोड़ा सा

कोई आनंद चख ले तो परमानंद में डूब जाता है प्रभु जो थोड़ा सा नाम का स्वाद चख ले थोड़ा सा आपकी महिमा प्रेम रस की चख ले तो उसको लोक परलोक के सारे विषय विष के समान लगने लगते वह सब भुला देता है और आपके प्रेम में उन्मत हो जाता है जानते हैं देवता य बात लेकिन वह प्रेम में मगन नहीं हो सकते इतना विषय विलासिता है हे मधुसूदन आपके प्यारे भक्त जन आपके चरण कमलों की सेवा में मगन रहते हैं और जो आपकी चरण सेवा में मगन रहते हैं जन्म मृत्यु रूप संसार चक्र कभी उनको छू

नहीं सकता कल्याण का कल्याण हो गया प्रभु आपकी महिमा त्रिलोकी में कोई गा सके ऐसा आप हमारे पिता है पितामह सब कुछ है आप हमारी रक्षा कीजिए हे प्रभु इस वृता सुर से हमारी आप रक्षा कीजिए आप अचिंत श्वर संपन्न जगत के परम गुरु है सर्वशक्तिमान श्री कृष्ण हम नहीं जानते कि कितना बल है वृता असुर का पर इतना जानते हैं कि वह स्वर्ग को निगल सकता है हमारे अस्त शस्त्र सब चबा गया अगर आप उपाय नहीं बताओगे तो स्वर्ग को निकल जाएगा व तीनों लोकों को ग्रस जाएगा प्रभु आप मार डालो प्रभु आपकी कीर्ति होगी आप मार डालो आपकी बड़ी प्रशंसा होगी अब जब हे प्रभु हम आपको नमस्कार करते हैं जब देवताओं ने भगवान की स्तुति इस तरह की तो भगवान ने कहा ठीक है हम आप पर प्रसन्न है देव शिरोमणि हों जब हमारा कोई आश्रय ले लेता है तो हर संकट से हम उसे बचाते हैं अब कोई ऐसा संकट नहीं है जो दुर्लभ हो और हटाया ना जा सके जो पुरुष मेरी शरण में आ जाता है मैं उसकी इच्छा की पूर्ति कर देता हूं मुक्ति चाहता है तो मुक्ति भोग चाहता है तो भोग जो चाहता है संकट

निवृत्ति चाहता है तो संकट निवृत्ति पर जो मेरी आराधना करते हैं वह जब मेरे से विषय मांगते हैं ध्यान से सुन लेना जो मेरी आराधना करते मेरे भक्त और जब वह मेरे से विषय मांगते हैं तो जैसे रोगी से कोई कुपथ मांगे तो नहीं देता ऐसे मैं उसे नहीं देता हमारे भगवान कितने कृपालु है रोगी से जैसे कुपथ मांगे म तो नहीं देता ऐसे जब मेरे भक्त मेरे से विषय मांगते तो मैं उसे नहीं देता मैं वृता सुर को तो नहीं मारूंगा लेकिन मारने का उपाय बता दू क्यों भगवान का भक्त है तासुर जी भगवान के भक्त है बड़े अनन्य भक्त है देर मत करो जाओ दधीच ऋषि के पास जाओ उनका शरीर परम पवित्र हो चुका है उपासना व्रत तपस्या भजन से रोम रोम नस नाड़ी हड्डी सब पवित्र हो गई उनसे उनका शरीर मांग लो दधीच ऋषि ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष है जोव ही शरीर मांगोगे वो दे देंगे ब्रह्म बुध संपन्न महापुरुषों को शरीर से तरिक वि प्रियता नहीं होती अश्विनी कुमारों को घोड़े के सिर से उपदेश करने के कारण उनका एक नाम अश्व शिरा भी है उनकी उपदेश की हुई अध्यात्म

विद्या के प्रभाव से अश्वनी कुमार जीवन मुक्त हो गए हैं जाओ अथर्व वेदी दधीच ऋषि से यह जो नारायण कवच तुमने सुना यह दध ऋषि ने त्वष्टा को सुनाया त्वष्टा ने विश्वरूप को विश्वरूप ने तुम्हें उसी से तुम विजय को प्राप्त हुए और उन्हीं विश्वरूप को मारा इसीलिए तुष्टा ने बदले के लिए इनको प्रकट किया है जाओ तुम मांगो जाकर शरीर दधि ऋषि से और अश्वनी कुमार को साथ ले जाना वो अवश्य दे देंगे फिर उनके शरीर से उनकी हड्डियां निकालना और उन हड्डियों को विश्वकर्मा के द्वारा

एक आयुध अस्त्र तैयार करना उस अस्त्र में इतनी सामर्थ होगी कि वृता असुर का सर काट लेंगे अन्यथा कोई अभी तक अस्त्र ही नहीं है दिव्यास्त्र को तो लौंग लाची की तरह वृता सुर जी चवा रहे थे वृता सुर के मर जाने पर तुम लोगों को फिर से तेज अस्त्र शस्त्र और संपत्तियां प्राप्त होंगी जाओ तुम्हारा कल्याण हो संभवी जो मेरी शरण में आ जाता है उसके सारे संकटों की निवृत्ति हो जाती है श्री सुखदेव जी कहते परीक्षित विश्व के जीवन दाता श्री हरि इंद्र और देवताओं को ऐसा आदेश देकर अंतर्धान हो गए अब देवता लोग अथर्ववेद दधीच ऋषि के पास जाकर के साष्टांग दंडवत की और दद ती ऋषी से कहा कि भगवान ने आदेश किया है कि आप अपना शरीर हमें दे दो देवताओं की यह बात सुनकर दद जी बहुत हंसे आनंद में और देवताओं से कहा देवताओ क्या तुम्हें बात पता नहीं कि सबको अपना शरीर कितना प्रिय है और मरते समय कितना भयानक कष्ट होता है जब तक चेत रहता है तब तक अस पीड़ा होती प्राणों के त्यागने में और जब मूर्छित हो जाता है तो बात अलग है जीव को जगत में जीवित

रहने की बड़ी इच्छा होती है यह शरीर बड़ा अनमोल प्रिय वस्तु है और तुम मांग रहे हो कि शरीर दे दो कौन होगा जो शरीर देने का साहस करेगा ऐसी स्थिति में स्वयं भगवान आकर मांगे तो भी देने के लिए तैयार कोई नहीं होगा बड़ा शरीर प्रिय है कहने की बात अलग है धर्म के लिए कह तो रहे हैं प्राणों का मोह त्याग करके काम विजय बनो क्रोध विजय बनो लोभ विजय और कैसे कहा जाए शास्त्र कह रहे गुरु कह रहे हैं भगवान कह रहे मान लो ना यह बात परीक्षा के लिए कही थी कि अब देवता क्या बोलेंगे नहीं दध ऋषि ब्रह्म ऋषि है इनको बिल्कुल शरीर से कोई लगाव नहीं देवताओं ने कहा ब्रह्मण आप ऐसा कैसे कह सकते हैं आप तो बड़े उदार है आप घबरा गए कि एकही उपाय है इनकी हड्डियों से बने और वो कह रहे हमें शरीर बड़ा प्रिय है शरीर कैसे छोड़ा जाए छोड़ने में तो बहुत कष्ट है आप जैसे दयावान महापुरुष ऐसा कैसे कह सकते हैं अरे भगवान ने आपकी प्रशंसा की है और आपका लोक में बड़ा यश होगा बड़ी प्रशंसा होगी और देखो जो बड़े महापुरुष होते हैं वो दूसरों के हित के लिए

सब कुछ निछावर कर देते बड़े बड़े बुद्धिमान देवता है अपना काम बनाने में भगवान इसमें संदेह नहीं कि हम लोग स्वार्थी हैं कह रहे हैं यह तो पक्की बात कह रहे भगवान इसमें संदेह नन स्वार्थ परो लोको नवेद पर ईश्वरा भगवान यद्यपि हम लोग स्वार्थी हैं आपका शरीर मांगने आए पर आप विचार करो अगर हमारे ऊपर संकट ना आया होता तो हम आपका शरीर ना मांगते अब प्रभु हमारी जितनी समझ है हम बार-बार आपसे घबरा रहे कि ना ना कह दे प्रभु हमारी समझ नहीं काम कर रही देने वाले को कितना विपत्ति और कष्ट सहना पड़ता है ये हमारी समझ में हमें तो बस एक ही दिखाई दे रहा हां बोलो हम आपकी हड्डी निकाले और अस्त्र बनावे पर प्रभु मांगने वाले की भी विपत्ति पर ध्यान देना चाहिए आप हमारी विपत्ति समझकर हमारी याचना पूर्ण कीजिए द दती ऋषि ने कहा हम तो ये विनोद में केवल बात कर रहे थे तुम लोगों के मुंह से सुनना चाहते थे कि तुम स्वार्थी हो सुनना चाहते थे इसीलिए हमने ये विनोद में बात कही लो जिस शरीर को सबसे प्रिय समझा जाता मैं अभी अभी छोड़ देता हूं यह

महापुरुषों का देव शिरो मणियों इस शरीर से दूसरों के लिए जो काम आ जाए शरीर वही सबसे बड़ी बात होती नहीं तो क्या पेड़ पौधे और शरीर में क्या फर्क अगर यह शरीर दूसरों के काम में ना आए जिंदगी का परम रहस्य ही कि जन्म से लेकर मरण तक कोई एक ऐसा तो कार्य कर लो जो दूसरे की रक्षा की हो दूसरे के काम में आया हो बड़े-बड़े महात्माओं ने इससे बड़ा कोई धर्म नहीं बताया परहित सरिस धर्म नहीं भाई मनुष्य शरीर का सबसे बड़ा धर्म है किसी दुखी के दुख को दूर कर दो किसी असहाय की सहायता करो किसी बूढ़े के दो चार साल कपड़े धो दो उसका मल धो दो उसकी सेवा कर दो यही मनुष्य का शरीर का जो लाभ है अब ये नौजवान आजकल के अपने बूढ़े माता-पिता को जो अवसर मिला है परम धर्म का उनकी सेवा ना करके उनको डांट लगाते हैं पीटते हैं अलना करते हैं सब नरक गामी होते हैं क्या कहा दधीच जी ने मनुष्य का शरीर धारण करने वाले का परम धर्म है कि जीवन में परोपकार बन जाए परहित बन जाए दूसरे का एक बार महाराज जी ने कहा कि अगर किसी की सोच धोने को मिल जाए सेवा

करने को मिल जाए लंगोटी धोने को मिल जाए कफ आदि फेंकने को मिल जाए तोय अहंकार नष्ट हो जाए उका खोजो कभी सेवा मिल सकती है गुरु प्रसाद से श्रीधर बाबा की सेवा मिल सच्ची कहते हैं जो दूसरों की सेवा से हृदय का अहम गलित होता है वो किसी और उपाय से नहीं होता सेवा मिल जाए बस कोई करा रहा है उसके बढ़िया सब कपड़े अपवित्र कपड़ों को धो कर के सुखाकर उनको पहनाना उनको भोजन पवाला भगवान की तरह उसकी एक किसी शरीर की सेवा मिल जाए दो चार साल पूरे जिंदगी के मल का सफाया हो जाएगा बहुत बड़ा कार्य है पर सेवा करना जगत का यह शरीर यह धन यह जन यह बल यह वैभव यह सब क्षण भंगुर है यदि ये किसी के काम में आ गया यही सार्थक है किसी के काम आ जाए कितने दुख की बात है मरण धर्मा शरीर से दूसरों का उपकार ना करके दूसरों का शोषण करते हुए जो मरते हैं बड़ी हानि कर ली बड़ी हानि कर ली दधीच ऋषि ने समस्त देवताओं के सामने आंख मंदी और ओम प्रणों का उच्चारण किया शरीर छोड़ दिया यह है समर्थ महापुरुषों की महिमा परब्रह्म परमात्मा तत्व में स्थूल शरीर को

छोड़ करर के विलीन हो गए वह इंद्रिय विजेता थे प्राण विजेता मन विजेता बुद्धि विजेता तत्व मय दृष्टि और उनको पता भी नहीं चला कि हमारा शरीर कब छूट गया ऐसे स्वरूप में स्थित महापुरुष लिखा है जब वह शरीर छोड़ रहे थे तो उनको पता भी नहीं चल रहा था जैसे के चुल छोड़ने में साप को कोई कष्ट नहीं होता अपने पुराने कपड़े छोड़ने में कोई कष्ट नहीं होता ऐसी स्थिति यता सु मनो बुद्धि तत्व दस्त बंधन अस्थि परमम योगम न देहम बधे गतम कब छूट गया शरीर पता ही नहीं चला ऐसी ब्रम स्थिति अब तो विश्वकर्मा के द्वारा महर्षि दधीच की हड्डियों से अस्त्र बनाया गया जिसका नाम हुआ वज्र वज्र अब दधीच ऋषि की अस्थियों से बना हुआ वज्र हाथ में लेकर समुद्र मंथन से निकले हुए रावत हाथी पर विराजमान है रावत हाथ समुद्र मंथन से निकला सब देवता लोग सेना उनके साथ त्रिलोकी को हर्षित करते हुए वृता सुर वध के लिए धावा बोल दिया देवराज इंद्र ने ठीक वैसे ही जैसे भगवान रुद्र कोदित होकर स्वयं काल पर आक्रमण कर रहे हो सेनापतियों के मन में बड़ा उत्साह था कि

भगवान ने कहा है इस अस्त्र से मारा ही जाएगा नर्मदा के तट पर दैत्यों ने आवाहन किया ललकारा देवता वहां देवराज इद्र हाथ में वज्र लिए रुद्र बसु आदित्य दोनों अश्विनी कुमार पितृ गण अग्नि मरुद गण रिभु गण साद गण विश् देवता ये सब और वृता आगे अकेले पूरी पृथ्वी को डगमगा हुआ और पीछे दैत्य सेनापति उसकी नमु संबर अनर्वा दमुदा ऋषभ अंबर हयग्रीव शंक शिरा विप्र चित्री अयोमुखी हेती उत्कल सुमाली माली हजारों दैत्य पीछे और दैत्य तो वैसे ही घमंडी स्वभाव के होते हैं सिंगनाथ कर रहे थे देव सेना पर प्रहार करने लगे गधा परिक बाण प्रास मुद्गर तोमल सूल फरसा तलवार तोप भूसुंडी इन सब से देवताओं को ढक दिया कोई भी देवता ऐसे दिखाई दे रहा था जैसे बादल से सूर्य भगवान ढक जाए परीक्षित लेकिन ऐसा प्रभाव वज्र का एक वज्र के प्रहार हर अस्त्र के हजारों टुकड़े हो गए क्योंकि ब्रह्म ऋषि दधीच की हड्डियों से बना हुआ हजार हजार टुकड़े एक एक अस्त्र के कर दिए इतना दिव्यास्त्र वज्र और प्रभाव यह कि दिव्यास्त्र वज्र के प्रभाव से किसी के पास

कोई अस्त्र नहीं रह गया दैत्यों के पास अस्त्र नहीं रहे सब नष्ट हो गए अंतरध्यान हो गए इतना दिव्य प्रभाव वज्र का क्योंकि तपस्वी भजनानंद भगवत प्राप्त महात्मा दधीच की हड्डियों का अस्त्र तब वह देव सेना पर पर्वत उखाड़ उखाड़ के बरसाने लगे बड़े बड़े पर्वत तो जैसे अस्त्रों को काट दिया था बद्र ने ऐसे पर्वतों को धूल बनाक उड़ा दिया बद्र ने जब तासुर ने देखा कि हमारे अनुयाई तो हर तरह से हार रहे हैं तो एक भी देवता सकुशल ना बचे इसलिए दुर्मिल हुआ आगे बढ़ा जैसे भगवत विमुख पुरुष का भगवत भक्त के ऊपर किया हुआ मारण मोहन वशीकरण उच्चाटन सब व्यर्थ हो जाता है ऐसे ही दैत्यों का घमंड तो नष्ट हो गया वज्र के प्रभाव से वृता सुर को ही अकेले छोड़कर सब भाग पड़े दे कोई टिका नहीं सबके अस्त्र गायब हो गए नष्ट हो गए वृता सुर धीरे-धीरे महान मध से युक्त आगे बढ़ा देवता देखकर भयभीत होकर भाग गए देवताओं की सेला थी जब देखा कि वृता सुर आ रहे हैं तो अस्त्र नहीं चलाए ही के वापस हो गए क इतना भयानक स्वरूप इतना बलवान तुम लोग मृत्यु से

क्यों भयभीत हो रहे हो युद्ध भूमि से क्यों भाग रहे हो ललकारा वृता सुने कोई बात नहीं सुन रहा इस समय म पहाड़ का पहाड़ आकाश को घेरे हुए वृता सुर वृता असुर देवताओं से क्रोत से तिल मिलाता हुआ ठ को चबा आता हुआ और जो देव सेना डटी हुई थी पैरों से ऐसे जैसे कोई घास फस रधे ऐसे देवताओं को रता हुआ आगे बढ़ा अ डाटा छुद्र देवताओ कायरो रणभूमि में पीठ दिखा के में तुम्ह शर्म नहीं आती तुम शूरवीर मानते हो अपने को रप को तुमको जहां प्रशंसा मिलती वही गरजते हो स्वर्ग में देवता बने पूजते हो आओ हमारे सामने तुम्हारे मन में अगर किसी के भी युद्ध का उत्साह हो तो सामने आओ क्षण भर कोई नहीं टिका वृता सुर इतना बड़ा भलवान डील डोल का था कि देवता सब छोटे छोटे लग रहे थे और क्रोध में जब सिंह अनाद किया तो अचेत हो गई देव सेना वृता सुरज ने गर्जना जब की तो मूर्छित हो गए देवता देवता मूर्छित है ऐसा लग रहा है जैसे बिजली गिर गई व सबके ऊपर और उनको पैरों से रते हुए आगे बढ़ रहा है मदो मत गजराज जैसे कोई नरकट का बन रो डाले ऐसे मूर्छित

देवताओं को बाकरा वृता सुर हाथ में त्रिशूल लिए और नेत्र बंद के भयभीत देव सेना को कुचल रहे थे पैरों से वज्र पाणी देवराज इंद्र यह करतूत सह ना सके और उन्होंने एक भयंकर गदा चलाई तासुर पर तासुर ने देखा देवराज इद्र ने गदा चलाई है बाए हाथ से ऐसे पकड़ लिया उसे मिस के फेंक दिया और जब उसको बीस के फेंका तो देव राज इंद्र के वाहन रावत के माथे पर लगी घुटने टेक दिए रावत ने इंद्र ने प्रशंसा की वाह वर वाह रावत को कोई घुटने टिका सके ऐसा वीर नहीं खून उगलता हुआ देवराज इंद्र का रावत हाथी घुटने के बल हो गया होश आया तो 28 हाथ पीछे गिरा जाके चक्कर ऐ 28 हाथ पीछे देवराज इंद्र ने अपने रावत पर दाहिने हाथ अमृत सावी हाथ है जोसे किया पूर्ण स्वस्थ युद्ध धर्म के मर्मज्ञ वृत्ता सुर ने कोई प्रहार नहीं किया शांत अमृत सावी हाथ से ज रावत की मिट गई फिर स्वस्थ हुआ रणभूमि में आ गया वृता सुर ने देखा अपने गुरु विश्वरूप का बध करने वाला यह देवराज इंद्र है और दधीच की हड्डियों से बना हुआ वज्र लेकर हमारे सामने आ गया है तब कहा

क्रूर पाप कर्मा वैसे तू लड़ने लायक भी नहीं है क्योंकि तू ऐसा अपराध करता है पर मेरा आज बड़ा सौभाग्य का दिन है पहला सौभाग्य कि विश्वरूप जैसे ब्रह्म ऋषि गुरु के हत्यारे को आज मैं मारूंगा दूसरा सौभाग्य मैं तुम्हारे हाथ में देख रहा हूं अगर नहीं मार पाया तो तू मुझे मारेगा क्योंकि यह दधीच ऋषि ब्रह्म ऋषि की हड्डियों से बना हुआ वज्र है यह निष्फल नहीं जाएगा मेरा तो सौभाग्य ही है अगर तुझे मार पाया तो मैं भाई के ऋण से उर्ण हो जाऊंगा क्योंकि तुष्टा के वह पुत्र थे तुष्टा जी ने इनको भी प्रकट किया था अगर तेरे द्वारा मारा गया तो अहो भाग्य क्योंकि ब्रह्म ऋषि की हड्डियों के द्वारा बले हुए इस वज्र से मैं मारा जाऊंगा तू कितना पापी है वृता सुर जी कह तू यज्ञ में दीक्षित होकर जिनको गुरु पद में उन्हीं को विश्वास दिलाकर के तलवार से उनके तीनों सिर काट लिए निंदनीय मनुष्य जैसे अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए यज्ञ पशु की हत्या कर दे ऐसे तू देवता होकर देवराज होकर अपने गुरु की हत्या कर दी तेरी लज्जा कहां चली गई कहां

चली गई थी तेरी कीर्ति और तेरी बुद्धि नीच कर्म करने वाला तो मरा हुआ होता है तू तो राक्षसों से भी गया बीता है ले अब मेरे त्रिशूल का बर्ष है और देख इस त्रिशूल से तेरी कैसे मृत्यु होती है पापी आग जैसे जलाती ऐसे तुझे मेरा त्रिशूल जलाए और नरक में जाएगा क्योंकि गुरु अपराधी है वहां नार की जीव तुझे नोच नोच कर खाएंगे देवता होकर तेरे जैसा नीच कर्म करने वाला मैंने नहीं देखा मैं अपने तीखे त्रिशूल से तेरी गर्दन काटू और तेरे खून से अपने भाई को पि तर्पण करूंगा शांत हुआ घबरा गया पहले शांत हुआ फिर देवराजन से कहा घबरा गया अरे तू घबरा मत तेरे हाथ में बज्र है और यह बज्र ब्रह्म ऋषि के अस्थियों से भला हुआ है जब मैं त्रिशूल चलाऊ तो तू करना प्रहार इसका प्रहार निष्फल नहीं जाएगा मैं मारा जाऊंगा घबरा मत महा भागवत है महा भागवत भगवान के परम प्रिय भक्त है य तो लीला है इनकी पार्वती जी की साप से देख जब वज्र से मारा जाऊंगा तो मैं महापुरुषों की चरण रज का आश्रय लेने वाले महापुरुषों को जो गति होती है वह मेरी गति होगी तू

घबरा मत देवराज मैं तेरे सामने खड़ा हूं तू मेरा शत्रु है और तेरे हाथ में जो है दिव्यास्त्र है अमोग है यह व्यर्थ कभी नहीं होता कभी व्यर्थ नहीं देवराज इंद्र का वज्र कभी व्यर्थ यह दध ऋषि का प्रताप तू संदेह मत कर कि जैसे तेरी गदा निष्फल हो गई तेरा वज्र भी निष्फल हो जाएगा नहीं यह अमोग है इसमें हरि विराजमान है और दधीच ऋषि का तेज विराजमान क्योंकि हरि जी ने बताया था ना मैं देख रहा हूं इसमें हरि विराजमान है और दधि ऋषि का तेज विराजमान है मेरे हरि ने मेरे मारने का उपाय तुझे बताया है और आज्ञा भी दी है इसलिए यह वज्र कभी निष्फल नहीं होगा डर मत और एक बात सुन जिस पक्ष में मेरे हरि होते हैं विजय उधर ही होती है तेरी ही विजय होगी डर मत तेरी ही विजय होगी विजय लक्ष्मी सारे गुण वही निवास करते जहां श्री हरि देवराज थोड़ा समय दे मैं अपने चित्त को अपने भगवान में लीन करूं और जब इशारा करूं तब बद्र से प्यार कर देना क्योंकि मैं जहां बड़े-बड़े मुनि जन ध्यान करके पहुंचते हैं मैं उन प्रभु का वर्ण करूंगा उन प्रभु को

प्राप्त करूंगा उन प्रभु के समीप जाऊंगा इसलिए जब वज्र का प्रहार करना जब मैं इशारा कर दूं क्योंकि मुझे थोड़ा समय दे मैं इस समय अपने भगवान का ध्यान करूं समय दे देते हैं थोड़ी देर भगवान का ध्यान करते शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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