राधाष्टमी 2024 - श्री राधा जू की जन्म लीला // 11/09/2024
पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
राधा राधा राधा राधा धा राधा राधा राधा तस्य रस सार विलास मूर्ते रानंद कंद परमाद भुत सोम लक्ष्म ब्रह्मदर्शन कैक्य मेव मम जनमनी जन्म नि कैक्य में मम जनमनी जनमनी श्या प्रेम कभी मोक्ष नहीं चाहता अपने आराध्य देव के समीप हृदय से निरंतर उनके सानिध्य का अनुभव चाहे बार-बार मुझे जन्म मिले शास्त्रों बार जन्म मिले करोड़ों बार जन्म मिले लेकिन हर जन्म में मेरी लाड़ली मेरी स्वामिनी हो प्रत्येक शवास उनके चरणों में अर्पित हो प्रत्येक चेष्टा एं न्ही की सेवा के लिए हो बस हमें और कोई चाह नहीं तस अपार रस सार विलास मूर्ते रानंद कंद परमाद भुत सौम्य लक्ष्म ब्रह्मादेवी बार-बार जन्म हो हर जन्म में हमारी स्वामिनी हो श्री लाडली जू और हमारा हृदय उनकी दासता से युक्त हो कौन है यह लाडली जू बोले तस्य अपार रस सार विलास मूर्ते जो अपार प्रेम रस है वो तो है लाल जो प्रीति रस सिंधु सार संपद विमला मूर्ति मती श्री लाडली ज रस सिंधु श्री लाल जू के प्रेम का सार रूप है प्रीति मूर्ति मति तो प्रीति रस सिंधु मूर्ति मती रस समुद्र श्री
लाल जू का जो सार प्रेम अल्लाद है वही जब रूप धार किया तो श्री लाडली जू तस्य अपार रस यह ऐसा अपार रस है वृंदावन नित्य विहार ब्रह्मादेवी हैं ब्रह्मा जी भी इस रस से प्रीतम का नित्य विहार एकांतिक रस है वहां न देवैर न ब्रह्मादेवी नान्य भगवान के जो दास आदि भक्त भाव शरद भाव सख्य भाव वाले इनका भी प्रवेश नहीं श्री प्रिया प्रीतम की रस महिमा का पार तो क्या ब्रह्मा जी तो लाल जू के बाल गोविंद रूप की ही महिमा का पार नहीं पा पाए और सखा और बछड़ों का जब अपहण किया तो कंपा कायमान होकर तीन परिक्रमा करके स्तुति करके ब्रह्म लोक को पधारे धैर्य नहीं था हृदय में कंपा कायमान हो रहे थे फिर महा माधुर्य रस प्रेम रस की सार रूपा श्री ला ली इनकी महिमा का पार कौन पा सकता है तस्य अपार रस सार विलास मूर्ते जिसे वेद कहता है रसो वैसा रसम हरिवा लवा आनंदी भवतु वह रस समुद्र परमात्मा जब सार रूप प्रेम रूप धारण किया तो लाडली जू के नाम से पुकारा गया कोई और नहीं है वही परम तत्व है श्री रानी जू के रूप में तस्य अपार रस सार अपार रस के
सार की जो मूर्ति श्री लाडली जो है यह प्रेम विलास मय है प्रतिपल इनकी रूप माधुरी लीला माधुरी श्री चरण से जो कांति प्रकट होती है नख कांति ये सब प्रेममय प्रेम की अद्भुत मूर्ति हमारी श्री लाडली जू महारानी जू आनंद कंद आनंद का मूल श्री लाल जू महाराज और आनंद का सार श्री लाडली ज महाराज आनंद कंद परमाद भुत सोम लक्ष्मि जो आनंद के मूल है उस श्री लाल जू महाराज और आनंद की परम एक महामई कोई अनिर्वचनीय स्थिति वो कौन है प्रदान करने वाली जो अनिर्वचनीय प्रेम की एक स्थिति है उदासी भाव है श्री जी का सखी भाव है किनकरी भाव है बहुत ही सौम्य गंभीर स्वरूप महान यह कौन बात जो अबही और अबही और अही और है कोई उदाहरण त्रिभुवन में नहीं जिससे हम अपनी महारानी जी का उदाहरण दे सके इसलिए कहते कोई अनिर्वचनीय ऐसी हमारी श्री लाडली जो हम पर कृपा करें हमारा बार-बार जन्म हो पर लाडली जू के चरणों में अनुराग होकर हो उन्हीं का नाम गाए उन्हीं का जस गाए उन्हीं की दास दस की ठसक हमारे हृदय में बनी रहे पूर्णा अनुराग रसम मूर्ति तलता भाम
ज्योति परम भगवतो रति मद्र हसम यत प्रा दुरस्त कृपया बसवान शत किनकरी भवितव्य जो पूर्ण अनुराग रस की मूर्ति है प्रेम ही प्रेम हमारी श्री जी प्रेम ही प्रेम यह केवल हरिवंश प्रताप सखियों के प्रताप से ही रूप का परिचय मिलता है नहीं तो प्यारो डुम छम तेन अच्छी सुका दी नाम की अध्यान गम अनुराग रस की मूर्ति ऐसा रूप है कि केवल बस रोते रहो आनंद में पुलकित तन रो मावली आनंद नैन सुधार कुछ नहीं एक बार रूप प्रकाशित हो जाए महारानी ज का तो ना काहो सो बोल ना कोई व्यवहार
बस अपनी कुवर किशोरी को जियत निहार निहार बस जीवन श्री जी हो जाते है उन्हीं को देख देख देख के जीना पूर्णा अनुराग रस मूर्ति पूर्ण अनुराग रस की मूर्ति प्यारी जो तलता भाम ऐसी कांति प्रिया जू से प्रकट हो रही आभा पीता रुण छ मनत तलता भाम पीत और अरुणिमा लिए हुए अनंत बिजली की जैसी कांति पूर्ण प्रेम रस की मूर्ति जिनके श्री अंग की आभा अनंत बिजलियां की कांति जैसी और जति परम भगवतो रद दस्य भगवत तत्व की कोई रहस्यमय जती रहस्य सबके परिचय में ना आने वाली य लाडली बाहर के आन द्वार के मोहिन जानत जो सखियों की शरण में नहीं है जो वृंदावन की रज का सेवन नहीं किए जो रसिंग नहीं किए रसमय वाणि का अध्ययन नहीं किया बिल्कुल नहीं जान सकते लाडली जु क्या है महाप्रभु हरिवंश चंद्र जू कह रहे हैं भगवत तत्व की कोई रहस्यमय ज्योति ज्योति परम भगवतो रति म रहस्यम श्री जी के श्री चरणों की ऐसी तेजम कांति प्रकट होती है इसी कांति में इसी तेज में जो लय हो गए उनका मोक्ष माना जाता है ब्रह्म तेज को ज्योति जहां योगेश्वर धरे ध्यान ताही को
आवरण यहां नहीं पावे को जान कोई जान नहीं पा रहा है तेज कहां बोले लाडली ज के चरण कांति का तेज है नक से प्रकट हुए तेज में ही ब्रह्म योगी जन लीन हो जाते उसे मोक्ष कहते हैं इस तेज आवरण को पार कराने की सामर्थ्य सखियों की है तब उनके नेत्र तेजो रूप निकुंज कलन नेत्रा आदि पिंड स्थित तब उनके नेत्र तपत मानत नैन कुंज रव लोकन यह सुख कात बने न यह जो कृपा हरिवंश की रहस्यमय ज्योति भगवत तत्व की श्री प्यारी जो है राधा तत्व का ज्ञान केवल वृंदावन की रज रसिक और सखियों
की कृपा से होता है कोई कितना भी बड़ा और सब शास्त्रों का स्वाध्याय करने वाला राधा तत्व के विषय में राधा तत्व रहस्यमय विषय है जो परम तत्व सब तत्त्वों के तत्व श्री कृष्ण और श्री कृष्ण का जो अल्लाद है आनंद है प्रेम है वो परम त श्री लाडली इसलिए कह रहे ज्योति परम भगवतो रति मद रहस्यम भगवत तत्व की रहस्यमय प्रेममय कोई ज्योती जो अब कोई नहीं रह गई अब प्रकट हो र यत प्रदु स्त कृपया ष भानु जो कृपया कृपा करके बरसा में वृषभानु जी के महल में प्रकट हुई यत प्रदु कृपया वृषभानु गेहे स्यात किं कररी भवितव्य कि मैं उन्हीं की दासी बनू जन्म जन्म लाडली जू महाराज की दास्ता मिले वृषभानु गहे महाराज श्री वृषभानु जी यह पूर्व में बहुत साधना की भजन किया तप किया तब हमारे ब्रजधाम में वृषभानु के रूप में प्रकट हुए कलावती और सुच ने पूर्व जन्म में ऐसा भजन किया जो अवर्णनीय है वाणी के द्वारा वर्णन किया नहीं जा सकता महाभाग्य पुत्र भगवत अंश स्वरूप सुचंद्र जी थे ये परम सुंदर चक्रवर्ती सम्राट और भगवान का विशेष अंसन में प्रकाशित
हुआ अयमा पितरों की तीन मानसी कन्या उत्पन्न हुई थी तीनों परम सुंदरी और महान सामर्थ्य से युक्त कलावती रत्नमाला मैना पितर ने स्वेच्छा से कलावती जी का श्री हरि के अंश भूत महान सौंदर्य और वैभव से युक्त चक्रवर्ती सम्राट सुचंद्र के हाथ में दिया और मैना रत्न माला को विदेह राज जनक के हाथ में और मेनका को हिमालय के हाथ में अर्पित किया रत्न माला जो जनक जी की भार आती उनसे श्री सीता जी मेनका से पार्वती जी कलावती और सुचंद्र ये दोनों तपस्या के लिए नवे सारण में गोमती नदी में स्नान करना जल में खड़े होकर मंत्र जपना और एकांत नम सारण वन में भगवान की विशुद्ध आराधना भगवान प्रसन्न हुए ब्रह्मा जी को आदेश किया जाओ इनकी कामना की पूर्ति के लिए इनको वरदान दो देवताओं के 12 हज वर्षों तक तप किया ब्रह्मा जी आए और उनका श्री भगवान ने आदेश किया है तुम्हारी जो इच्छा हो वर मांगो पर इनके शरीर में दीमक चढ़ चुकी थी शरीर ही नहीं रह गया था दीमक का पिंड मात्र था दोनों के इतना भारी तप किया सुचंद्र और कलावती जी ने ब्रह्मा जी ने
दिव्य कमंडल का जल डाला तो दिव्य तनु दारी दोनों उस दीमक से बाहर निकले ब्रह्मा जी को प्रणाम किया ब्रह्मा जी ने कहा तुम्हें जो इच्छा हो सो मांगो सुचंद्र जी ने कहा मुझे संसार की कोई इच्छा नहीं रह गई बस मुझे ब्रह्म बोध हो जाए मोक्ष प्राप्त हो जाए जही राधा की बात सुनी सुचंद्र की तो साधवी कलावती जी के मन में बड़ा दुख हुआ उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा पितामह मेरे अंदर इच्छा थी कि मैं सर्वश्रेष्ठ एक सुंदर कन्या प्राप्त करूं जो भगवन प्रदान करने वाली हो मुझे मोक्ष नहीं चाहिए मेरे पति ने मोक्ष मांगा मैं सहधर्मिणी हूं जहां पति वही मेरी स्थिति मैं मुक्त नहीं होना चाहती यदि मेरे पति देव को आप मोक्ष देते हैं मेरी गति मोक्ष की होती तो मैं अभी आपको साप दे दूंगी आप इस बात को समझ लीजिए और मेरा साप कभी व्यर्थ नहीं जाता कलावती जी ने कहा पति नारम दैवत परमम स्मृत यदि मया तदा में का गति भवे एवं बिना न जीवाम यदि मोक्षम प्रदास तो तुम शपम प्रदास पति विक्षेप वहला मैं आपको साफ अगर हमारे पति को मोक्ष पदवी दी ब्रह्मा जी
ने कहा देवी मैं भयभीत हो चुका हूं तुम जो चाहते हो वही मैं देने आया हूं जैसे आपका साप कभी विफल नहीं होता ऐसे मेरा वरदान भी विफल नहीं होगा इसलिए तुम अभी दिव्य लोकों के सुख भोगो और कालांतर में पृथ्वी पर श्री यमुना जी के पावन समीप में ब्रज चौरासी कोष बरसाने में आपके पति का जन्म होगा जो वृषभानु कह जाएंगे और आप कीर्ति नाम से प्रसिद्ध हो और आप जो मन में चाहे वैसी ही कन्या आपको प्राप्त होगी तुम दोनों के यहां परिपूर्ण तम भगवान सच्चिदानंद श्री कृष्ण की साक्षात हृदय स्वरूपा अल्लाद स्वरूपा प्रेम स्वरूपा उनकी प्रिया प्रकट होंगी जिनका नाम श्री राधा होगा और जब तुम राधा जू की दर्शन सेवा सुख फिर तुम्हारे अंदर मोक्ष अभिलाष भी नहीं रह जाएगी वृष भानु जी के रूप में जब तुम जन्मो राधा किशोरी मोक्ष अभिला भी नहीं रह जाएगी ब्रह्मा जी दिव्य मोघ व देकर के अंतरध्यान हो गए कलावती जी ही कीर्ति द के रूप में और सुचंद्र जी ही वृष भानु के रूप में कलावती जी गर्ग संहिता के अनुसार राजा भल के यज्ञ कुंड में प्रकट हुई कन्नौज
में कानक देश कन्नौज उस दिव्य कन्या को संपूर्ण पूर्वजन्म की बात आथ इधर बभनपुर में बरसाने में सुर भानु के घर सुंद का जन्म हुआ जिन्हे श्री वृषभानु जी के नाम से जाना गया इनको भी पूर्व जन्म की स्मृति थी गोप में सर्वश्रेष्ठ कामदेव जी के समान सुंदर वृष भानु जी परम बुद्धिमान महामहिम श्री नंद राय जी ने बिचौलिया बन कर के श्री वृषभानु जी का और कीर्ति जी का ब्याह रचा श्री वृषभानु जी और कीर्ति जी बरसाने में बड़े सुख पूर्वक रह रहे बहुत ही दिव्य महल क्योंकि जहां प्रियाज प्रकट हो रहे वहा कौन सी सिद्धि कौन सी रिद्धि कौन सी निधि सब रिद्धि सिद्धियां निधियां छाई हुई प्रकार परखा युक्त चतुर द्वार समन्वित कर्र कजला कारे द्वारी द्वारी मनोहर जो वृषभानु भवन है खाई और पर कोटों से युक्त बहुत विशाल महल जिसके प्रधान चार दरवाजे और चारों पर मानो काजल का पहाड़ हो ऐसे गजराज खड़े हुए हैं दोदो गजराज चारों द्वार पर राज भवन की मनोहर का क्या वर्णन करें वायुर वेग मनोर वेग चित्रवर्ण तुरंग मई हार चामर संयुक्तम पुलसन मंडपा दरम
मानो मन के वेग से चलने वाले घोड़े वायु के वेग से चलने वाले शास्त्र घोड़ों में सैनिक तैनात चारों द्वार पर बड़े बड़े गजराज और वायुवेग और मोवेग से चलने वाले घोड़े सुंदर सुंदर हार आभूषण धारण किए हुए सेवक जन विचित्र वर्ण वाले अश्व की शोभा और बछड़ों के साथ लाखों करोड़ों गओ के झुंड के झुंड और धुरंधर बड़े-बड़े बलवान बैल जो बड़ी शोभा पा रहे हैं हजारों की संख्या में उनकी रक्षा करने वाले गोपाल जन कोई वंशी कोई वेद धारण किए हुए गीत गा रहे बरसाने की बड़ी अद्भुत शुभा वृषभानु व के भवन का निर्माण विश्वकर्मा ने स्वयं पूरी चतुराई लगा कर की क्योंकि इसी भवन में श्याम सुंदर की प्राण प्रिया श्री लाडली जो प्रकट होंगे भवन में ऐसे परकोटे हैं ऐसा लगता है हजारों सूर्य एक साथ प्रकाशित हुए इतना तेजों में परकोटे वृषभानु महल के है और लाखों की संख्या में दास दासिया हैं हर समय कहीं वीणा ताल मृदंग आदि बाजे बज रहे कई मनोहर गोप सुंदरियां गान कर रही अंत की दिव्य विशाल छटा उस भवन में ही सुंदर उपवन भी है महल के अंदर ही
उपवन है बगीचे हैं अलग-अलग कुंजे हैं कहीं अनार कंद मंदार नींबू कि ऊंचे ऊंचे बड़े वृक्ष लहरा रहे तो कहीं केत की मालती माधवी मोगरा ये सुंदर लताएं खिली हुई है महल के अंदर ही सुंदर निकुंज है जो कल्प वृक्ष के पुष्पों की गंध को भी मात करते ऐसे सुगंधित उस निकुंज में भरे पराग पान करके गुंजारी मंद सुगंध वायु चल रहे और बहुत सुंदर कुंड भी है जिसमें हजारों दल वाले कमल है कोई अष्ट दल कोई हजार दल वाले विविध रंग के महल के शिखरों में कोकिला मोर सुख सारिका य अद्भुत जस गान कर रहे हैं फूलों की जगह जगह शस्त्रों लगी हुई है और बहुत ही सुंदर सुंदर सुगंधित जल वाले कई सरोवर है कहीं सैकड़ों फुहारे छूट रहे हैं कई सुंदर कुंडल करधनी हार धारण किए हुए सैकड़ों सुंदरियां सेवारत है राज मंदिर केसरिया रंग के सूक्ष्म वस्त्रों से सजाया गया है पर्वतीय पुष्प जल पुष्प स्थल पुष्प इन सबसे श्रंगार किया गया है पूरा महल मालती की मकरंद की बूंदे वहां झर रही हैं पर यह सब सुख होने पर भी वृषभानु जी को विशेष अल्लाद नहीं हो रहा है उनके
हृदय में एक असंतोष सा है समस्त ब्रजमंडल के महान विद्वान ब्रह्म ऋषियों को बुलाया और कहा बहुत समय व्यतीत हो गया मुझे पूर्व की स्मृति है कि मुझे वरदान प्राप्त है कि भगवान श्री हरि की हृदय राध राधा मेरे यहां प्रकट होंगी पर अब तो जीवन का बहुत समय व्यतीत हो गया जिनका नाम राधा है कृष्णन आराध्य इति राधा श्री कृष्ण स्वयं जिनकी आराधना करते हैं वो राधा सा ए वायम पुरुषः स्वयमेव समाराम तत्प भूतो तस्मा स्वयमेव सराध मकत अतो लोके वेद श्री राधा गीते लोक में और शास्त्रों में इसीलिए उनको श्री राधा कहते हैं क्योंकि स्वयं परम पुरुष परमात्मा भगवान श्री कृष्ण उनकी आराधना करते हैं और वैसे ही वह श्री कृष्ण की आराधना करती है अनादि रय पुरुष एक वास्ती वह परम पुरुष अनादि परमात्मा एक है पर उसके हृदय में जब अपनी ही आराधना करने की इच्छा हुई अनादि रय पुरुष एक वास्ती तदेव रूपम द्विधा विध समाराम तत्प भूत तस्मा ताम राधाम रसिका नंदा वेद विदो वदंति ऐसा शास्त्र कहते हैं कि वही परब्रह्म परमात्मा भगवान श्री कृष्ण अपनी आराधना
के लिए जब विकल हुए तो उन्हीं के हृदय का प्रेम मूर्तिमान होकर राधा रूप में हुआ राधाम रसिका नंदम वेद विदो वदंति श्री वृषभानु जी समस्त ब्रह्म ऋषियों से प्रार्थना करते हैं कि हमें अब वो साधना बताओ आराधना बताओ उपासना बताओ जिससे हमारे मन में जो युग युगांतर से इच्छा चली आ रही है कि भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी की प्रिया हमारी पुत्री बने वह कब समय आएगा मंगल ह मांगती जहां निज मंगल की भीख ऐसो उत्सव जन्म को अनत कहू नहीं दख जहां मंगल भी मंगल की भिक्षा मांगता है
आज उनका परम उत्सव है श्री लाडली जुगा मथुरा निकट जमुन तट पावन राजति रावल नगर सुहावन कीरति भानु बसही नप दंपति गेह लक्ष दस जिन गो संपति माथुर मंडल में परम पावन वृषभान पुर बरसाना इसमें श्री वृषभानु जी विराजते हैं कुछ दूर पर यमुना जी के पावन तट पर एक महल है जहां स्नान आदि के बाद वस्त्र परिवर्तन करना बराजना फिर वहां से बरसाने आना श्री कीर्ति जी और वृषभानु जी का निज महल बरसाना ही है 10 लाख गओ की सेवा होती है 10 लाख गओ की सेवा जहां श्री जी अवतरित हो वहां
वित्त की अर्थात धन की वैभव की क्या महिमा कोई वर्णन कर सकता है पर इतना सब कुछ होने पर भी वृष भानु जी बहुत विनय वान और किंचन मात्र वैभव का अहम नहीं धर्म वित गुण शील निधा विनय वान निज नगर प्रधाना मह बाग उपवन बन स्वामी भार्या कीरति मन अनुगामी अद्भुत ईश्वर है अद्भुत धर्म का पालन करने वाले हैं बड़ी विनय है बड़े शीलवान है महल बन बाग उपवन सबके स्वामी है और कीरत जी मन के अनुसार चलती वृषभानु जी के मन के अनुसार चलती है तवान सब गोप समाजा अस धर्मजीवन प्रजा कोई भी वहां गरीब नहीं सबके यहां अद्भुत ईश्वर सब विनय संपन्न जस राजा तस प्रजा सरल चित माने गौ देवा बनि गोपाल करत नित सेवा यद्यपि शास्त्रों की संख्या में गौ पालक फिर भी अपने हाथ से वो स्वयं गौ सेवा करते हैं बहुत काल यही भात बतायो गो सेवा फल अवसर आयो ऋषि मुनि पंडित विप्र पुजारी तो सति सब कीर्ति सतका बड़े बड़े ऋषि मुनि ब्रह्म ऋषि जन ब्राह्मण जन भगवत पूजक जन इन सबको रोज निमंत्रण होता है और भवन में बुला सबका आदर सबका चरण धोना अर्घ पाद आदि अर्पित करना
भोजन पवा दक्षिणा देना यह बहुत स्वभाव है कीर्ति रानी का ऋषियों की प्रेरणा से एक व्रत ठाना नित्य प्रति यमुना जी जाना स्नान करना यमुना में खड़े होकर के भगवत मंत्र जपना और आकांक्षा करना श्री हरि की प्रिया का हमारे यहां प्रादुर्भाव हो व्रत व्रष भानु एक दृढ़ ठाना नित प्रति करत जमुन अनाना रोज नियम वर्षों य नियम चला नियम का प्रभाव बहुत बड़ा जोर का होता कोई नियम ले दीर्घ काल तक करे तो सफलता निश्चित हाथ लगती है प्यारी ज के प्रकट होने के लिए आराधना यमुना रस
रानी की यमुना जी में नियम पूर्वक स्नान करना और यमुना जी में ही खड़े होकर के भगवत मंत्र जपना धीरे-धीरे कीर्ति रानी जी को ऐसा अनुभव होने लगा कि मेरे गर्भ रहा अब तो और प्रसन्नता हुई जब तक जा सकती थी वृषभानु जी के साथ रोज यमुना जी जाती जब जाने में असमर्थ हो गई तो वृषभानु जी अपने नियम की पूर्ति और बहुत प्रसन्न की जरूर मेरे मनोभाव में जो युग युगांतर से श्री हरि जी की प्रिया प्रकट होंगी हमें लगता है कि वही अवसर आ गया क्योंकि पुत्र तो हो चुका था श्री दामा नाम का पुत्र पहले से ही विराजमान था ऐसा नहीं था कि संतान पर बहुत समय से स्मृति पूर्व युगों की भी कि जो कलावती के रूप में सुचंद्र के रूप में भावना बनी थी कि भगवान सच्चिदानंद प्रभु की प्रिया हमारे यहां जन्म ले उनके लिए अनुष्ठान था भाद्रपद की शुक्ला अष्टमी भाद्र भादव का महीना शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि और दिन सोमवार समय प्रातः कालीन मेला शास्त्रों में जब मध्यान वेल का आता है हमारे रसिक जन नहीं करते क्योंकि ऐसा सुकुमार तत्व मध्यान में तपती हुई धूप
में नहीं प्रातः कालीन बला प्रसंग भी है भाद्र शुक्ल अष्टमी प्रभाता लखो प्रवाह जात जल जाता भाद का महीना शुक्ल पक्ष अष्टमी अचानक मंत्र जप कर रहे थे स्नान की हुई यमुना जी में के देखा एक बड़ा अद्भुत तेजो में कमल एक अद्भुत आकर्षण खींचे हुए से बाबा उस कमल के पास पहुंचे वृष भान जी जैसे आविष चित्त आविष चित्त माने कोई विचार काम नहीं कर रहा खींचे हुए से गए और कमल को गोद में उठा लिया एक अद्भुत तेज मात्र दिखाई कुछ अभी नहीं दिखाई कमल और तेज तो प्रविश धार गही कंज प्रसूना लौटे भानु मोद हिय दूना अभी तक तो आनंद था भावना थी कि जो हमारे युग युगांतर से भावना थी कि ऐसी प्रियाज का जन्म होगा आज ऐसा लग रहा है मानो मुझे प्रियाज मिल गई अपार आनंद आष्ट चित्त है कोई विचार काम नहीं कर रहा उस कमल को गोद में लिए हुए और इधर महल में वयो वृद्धा गोपिका एं कीर्ति रानी जी को घेरे हुए हैं पूरे नगर में सूचना है कि प्रसव पीड़ा हो रही है संतान प्रकट होने वाली है अद्भुत ज्योतिर्मय प्रसूति का ग्रह हो रहा है पहले से ही तेजों में
कीर्तिदा रानी को ऐसा महसूस हो रहा है कि बस अभी संतान प्रकट होने वाली है गोपिका वयोवृद्ध आसपास बैठी हुई हैं इतने में दिव्य पुष्प लिए हुए श्री वृषु भानु जी महल में पधार हैं दिव्य पुष्प जगमग द्वित कारी मोहे भत छटा निहारी ऐसा दिव्य पुष्प है प्रेम विवस होकर शिथिल होकर के कंज प्रसन गहे कर माही चले हरसी ग्रह कीरति पाही अति सुगंद तिरंग दत लीने भानु समो आनि धरयो सन्मान करी कीरत जी की गोद उधर प्रसव पीड़ा हो रही थी इधर दिव्य सुमन लेकर के कमल लेकर के समीप पहुंचे और कहा देखो आज यमुना जी में बड़ा दिव्य कमल जेही कमल गोद में दिया उसी समय उनको अनुभव हुआ कि मेरी संतान हुई गोप सुंदरियों ने देखा अद्भुत बिजली की श्रीकांत गौर वण छोटी सी नन्नी सी लाडली मानो करोड़ करोड़ चंद्रमा की कांति ली हुए साब ने देखा जो गोद में पुष्प दिया उनको अनुभव हुआ संतान हुई देखा तो श्री लाडली जू नृप भानु दुलारी कीर्ति कुमारी प्रगट भई वृष भानु लली लाड़ली हमारी जग उजियारी जनु बिक स मृदु कंज कली नृप भानु दुलारी कीर्ति कुमारी प्रगट भई
ब्रस भानु लली लाड़ली हमारी जग उजियारी जन बिक स मृदु कंज कली रसराज बिहारी की निज प्यारी लाद प्रेम स्वरूपा हो अति ही सुकुमारी रावल वारी प्रगट प्रेम रस रूपा हो निकुंज निवासिनी हरि ही अ वासिनी राधे कृष्ण आनंदमई विभु आज अनंत व्यापक दिगंत सो मूल प्रेम ब्रज प्रगट भई प्रेम स्वरूपा रस आधारा हे भक्त जनन हितकारी हो कलि कल मस हारिणी भव तारण गिरधर प्राण प्यारी हो नप भानु दुलारी कीर्ति कु मारी प्रगट भई वृष भानु लली अहि पति श्रुति शारद गावत नारद शिव सुख ध्यान अगम हो अहि पति श्रुति शारद गावत नारद शिव सुख ध्यान अगम हो छवि छैल छवि अति अल बेली गौर सुवर्ण सुर्या हो लावण्य अनूपा कृष्ण स्वरूपा रसिक जीवनी श्री राधा शिश रूप रंगीली सुघड़ सजीली सुमिरत विनसत सब बाधा यह नैन धन्य यह बैन धन्य जिन देखा जिनने गुण गाया ये ब्रज अनन्य ये ब्रज रज अनन्य जहां प्रगट जिसको अपनाया श्री लाडली जो प्रकट हुई कीर्तिदा रानी को सुंदर कन्या हुई है पूरे महल में बरसाने में एक क्षण में सूचना पहुंच गई वहां पहले से ही जैसे भ्रमर गंध पाकर
के पुष्पों के समीप आ जाते हैं ऐसे ही कर भाजन संगी जु गर्ग मुनि ये बड़े-बड़े महात्मा कर् भाजन जी संगी जी गर्ग जी दुर्वासा जी बड़े-बड़े विश्व के जितने ईश्वर कोटि के महात्मा है ये पहले ही बरसाने आ गए थे जे भी सूचना मिली लाडली जू प्रकट हुई वृषभानु को आनंद में निमग्न देख कर के सब महल में अपने आप बुलाने की जरूरत नहीं पड़ी आकर के भय अचरज ग्रह देखि परस्पर कहत सबन प्रति बोध री कर भाजन संगी ज गर्ग मुनि लगन नछत्र बल सदरी बहुत आनंद में आनंद सब ऋषि पधारे लगन विचार रहे कह रहे हैं बड़ा आश्चर्य है इसके ग्रह नक्षत्र देखकर सुधि भाद शुभ मास अष्टमी अनुराधा के शोधी प्रीति जाग बालो करने लगन धनुष बर बोदरी बालिका का नाम होगा राधा विद्युत लहरी स अंग आभ होने के कारण यह गौरांग राधा नाम से जगत में विख्यात होगी समस्त ऋषि अपने नेत्र सार्थक कर रहे हैं लाडली जू के दर्शन करके वृषभान जी से कह रहे कि कुछ समय पहले जो नंद भवन में आनंद उम का था उसका दुगुना आनंद तुम्हारे भवन में उमक रहा है समस्त ऋषि सम्मान प्राप्त करते हैं
वृष भानु जी से यत किंचित वर्णन करके पियाजू का महामहिम स्वरूप और दर्शन करते हैं फिर चरणों की वंदना करके वृष भानपुर बरसाने में अलग अलग लताओं के नीचे बैठकर प्यारी ज की महिमा का चिंतन करते हैं इधर वीणा की झनकार पर हरि गुणगान करते हुए देव नारद जी जब से बृजेश्वर नंद के यहां नंद नंदन श्री कृष्ण का प्रादुर्भाव देखा तब से वह खोज रहे थे पूरे ब्रज में कि इनकी प्रियाज का कहां अवतार हुआ कहीं न कहीं अचिंत गति देवर्ष नारद जी को खींच रही थी प्रत्येक ब्रजवासी हों
के दरवाजे पर जाते कुछ देर खड़े होते ध्यान स्थ होते वहां की रज लगाते फिर दूसरे घर ऐसे पूरे ब्रज चौ कोष में देवर्ष नारद खोज रहे थे प्रिया जू का कहां प्रादुर्भाव हुआ श्री किशोरी जी को ढूंढते हुए देवसी ब्रज के प्रत्येक ग्रह के सामने ठहर ठहर करके ध्यान स्थ होते रज लगाते माथे पे बजवास की चरण धूली देवसी का सर्वज्ञ ज्ञान इस समय काम नहीं कर रहा था प्रेम विकल थे देवर्ष श्री किशोरी ज का अनुसंधान कर रहे थे पर पता नहीं पा रहे थे राधा किशोरी के दर्शन की प्रबल इच्छा मानो देवर्ष नारद ये साधन बता रहे हैं कि ब्रज की थियो में भ्रमण करना ब्रज वासियों की चरण धूली माथे पर लगाना तभी इस ब्रजधाम की महारज रानी की कृपा से महारानी का परिचय मिल सकता है नहीं अन्यथा नहीं बिना वृंदावन बजर का सेवन किए नहीं व्याकुल होकर ब्रज की गलियों में लौटते देवर श नारद अचानक सूचना मिली वृषभानु जी के यहां कन्या प्रकट हुई है वृषभान भवन के सामने खड़े हुए देवर श नारद के हृदय में एकदम आकर्षण हुआ और हृदय में हुआ प्रवेश करो देवर्ष नारद जी
वृषभानु भवन के दरवाजे पर जाकर खड़े हुए उनकी एक अद्भुत दशा हो गई एक दासी सखी जाती है और वृषु भानु जी से कहती है दशा उज्जवल अनुरागी बीना कांधे धरे गावे दृगन जल ढारे बाबा एक संत आए हुए हैं दशा उज अनुरागी उज्जवल अनुरागी प्रेम में वीणा कांधे धरे गावे द्रगण जल ढारे क्या गावे राधा राधा नाम बदन कहे अति अनुरागी आयो इक ब्रह्मचारी बिना कां धरे अति चकत सो चहु दिस निरख मुदित होत मन भारी वो कबहु आनंदित कबहु निरत ये दशा सखी वृष वानु बाबा से बता रहे माला कंठी तिलक तन छापे मेरे अजिर आयो नाचत अंग होत रोमांचित मगन भयो अप बप जो बुलायो बेशुद्ध स्थिति है राधा राधा ग रहे कांधे पे वीणा धारण किए हुए हैं बाबा कोई ऐसे संत पधारे हैं वृषु बानु जी समझ गए देवर्षि नारद जी है दौड़कर बाहर आए देखा देवर्ष नारद जी चरणों में लौट गए विधिवत पाद दरगद से पूजा की देवर्षि नारद जी ने पूछा कोई संत हुई है हां अपने सुंदर पुत्र श्री दामा को लाकर चरणों में प्रणाम करते हैं बालाक को देखते ही स्पर्श करते ही नेत्रों में प्रेमास भर रहे हैं
नारद जी अपने ऊपर उतरी वस्त्र से आंखें पूछी और कहा यह तो नंद नंदन का प्राण प्रिय सखा है हम पूछ रहे हैं कोई कन्या हुई आपके यहां देवसी नारद जी आभास तो मुझे यही हुआ है कि हरि प्रिया का यही अवतार हुआ है राश शवरी श्री राधा यही प्रकट हुई पर ये तो बालक को लाए वृष मान जी ने कहा हां भगवन वो तो अभी अभी प्रकट हुई है इसलिए नजदीक नहीं लाए आपको वहां चलना पड़ेगा आश्चर्य की बात देवर्ष नारद जी को एक अद्भुत आकर्षण हृदय में हो रहा है कानों में एक अमृत जैसा शब्द कि हां हां एक कन्या प्रकट हुई वह समझ गए इतना प्रेम माद इतना आकर्षण ये तो हरि प्रियाज प्रकट हुई है मुझे शीघ्र एक बार एक बार दृष्टि उस कन्या पर डालने दीजिए कहां है शीघ्र ले चलो मैं दर्शन करना चाहता हूं आश्चर्य भरे नारद जी पीछे पीछे वृष भानु जी आगे आगे और जब वहां पहुंचे तो एक छोटे से पालने में लाडली जी को जीही दृष्टि पड़ी पालने पर श्री ला नारद जी का धैर्य टूट गया और वे दौड़े साष्टांग दंडवत की एकदम भावना हुई परमानंद सिंधु में डूब रहे हैं देवर्ष नारद जी
अद्भुत प्रेम क्योंकि प्रेम में ली का पहला दर्शन दिव नारद जी को अपने आप को संभाल नहीं पाए दो घड़ी तक 48 मिनट तक तो ध्यानत मुद्रा मनो मूर्छित हो गए हो ऐसी दशा दो घड़ी के लिए तो उनकी दशा हो गई मानो शिलाखंड मूर्ति हो गए हो जब बाय ज्ञान हुआ तो अप्रतिम सौंदर्य निहार कर विस्मय की सीमा ना रही वह सोचने लगे कि ऐसा सौंदर्य तो त्रिभुवन में मैंने कहीं नहीं देखा मेरी अबाध गति है मैं ब्रह्म लोक रुद्र लोक इंद्र लोक कहीं भी जा सकता हूं कहीं भी जाता हूं त्रिभुवन में कहीं ऐसा सौंदर्य नहीं देखा भगवान श्री हरि महादेव यह सब महामहिम भगवान श्री हरि ने जो मोहिनी रूप धारण किया तो महादेव जी देख कर के मोहित हो गए लेकिन मैं इस रूप को जो देख रहा हूं मेरे हृदय में जो भगवान श्री कृष्ण के प्रति अपार प्रेम उमड़ रहा है आज तक कभी नहीं बस यही यही भगवान की प्रिया है यही रासे स्वरी है अंतर हृदय से विकल हो गए और अशुभ प्रवाह देव श नारद के प्रेम व्यवस्था बढ़ी तो वृषभानु जी से कहा कि कुछ क्षण के लिए तुम मुझे एकांत कर दो मैं इस
बालिका से एकांत में कुछ क्षण दर्शन करना चाहता हूं उन्होंने सोचा कोई अनुष्ठान मंगल विधान हमारी लाड़ली के लिए जो आज्ञा कह के वृषु भानु जी देवर्ष नारद को प्रणाम करके एकांत हो गए देवर्ष नारद जी एकांत पाकर श्री जी से प्रार्थना करने लगे हे निकुंज देवी हे महायोग मय हे महा प्रभा मई मेरे महान सौभाग्य उदय हुआ जीवन भर हरि नाम की कीर्तन किया हरि भक्ति की उसका फल मिला कि आपके दर्शन हो गए तुम मेरे दृष्टि पथ में आई रासे शवरी हे देवी य तुम्हारे दिव्यंग अत्यंत मोहन है इनसे प्रेम का माधुर्य निर्झर झर रहा है रसा अनंद का सृजन हो रहा मेरे हृदय में मैं अनंत काल तक भगवता आनंद में डूबा रहने पर भी जो रस नहीं मिला व आज आपके दर्शन से प्राप्त हो रहा है हे निकुंज देवी तुम नेत्र मदे हुए हो फिर भी सुख की वर्षा कर रही हो तत्वम विशुद्ध सतवास शक्ति विद्या आत्मिका परा परमानंद संदोहा दद वैष्णव परम कलया आश्चर्य वि भवे ब्रह्म रुद्रा दि दुर्गम योगींद्रनाम ध्यान पथम नवम स्परस कर चित इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति क्रिया शक्ति स्वे
सतु तवां समात्र मित्व मनीष में प्रवर्तते आनंद रूपिणी शक्ति श्वरी न संशय त्वया च क्रीतेश नम वृंदावन वने कमारे व रूपेण त् विश्वस्य च मोहिनी तारुण्य वैसा पटम की दते रूप मद भूतम हे देवी तुम ब्रह्म हो तुम सच्चिदानंद ब्रह्म के सत अंश स्थित चंदनी शक्ति की चरम प्रणति करने वाली विशुद्ध सत्व मय तुम संबित शक्ति संवित की चरम परिणति विद्याम का पराशक्ति ज्ञान शक्ति आनंद अंश की लाद शक्ति लाद की चरम परिणति महा भाव स्वरूपा आश्चर्य वैभव मय यह सब तुम्हारी एक कला का
तुम्हारे संपूर्णता का ज्ञान तो भगवान रुद्र को भी योगेंद्र गणों को भी मुनींद्र गणों को भी तुम्हें ध्यान पथ में नहीं ला सकते मेरी बुद्धि यह कह रही कि सब तुम्हारे अंश मात्र जितनी शक्तियां है श्री कृष्ण चंद्र को अधीन करने वाली उनकी प्राणेश वरी श्री राधा तुम ही हो अब मुझे कोई संशय नहीं रहा ओ क्या ऐसा हो सकता है हे श्री जी मैं आपके उस विश्व मोहन किशोर अवस्था के रूप को देखना चाहता हूं जिसे देखकर श्री कृष्ण अधीन हो जाते हैं नारद जी का कंठ भराया और रुदन करने लगे है श्री जी ऐसी केवल आनंद में रोते रहो प्रबल इच्छा प्रार्थना करने लगे कि मैं आपके उस किशोरी रूप के दर्शन करना चाहता हूं श्री जी के किशोरी रूप देखने की प्रबल उत्कंठा बढ़ती गई अब बारंबार प्रणाम करना शुरू किया देवर्ष नारद जीने और प्रार्थना किया नारद के अंतर हृदय में मानो श्री किशोरी जी के दर्शन के लिए इतनी विराग प्रकट हुई प्रबल इतने में ही दृष्टि पड़ी तो देखा श्री ललिता जू विशाखा जू चंपक लता जू चित्रा जू तुंग विद्या ज इंद्र लेखा ज रंग देवी ज
सुदेवी जू अष्ट स चरिया प्रकट हो गई और वो नौ किशोरी रूप सहचर जेही सखियों को देखा देवर शद जी ने एक दिव्य ज्योति मध्य में देव स नार अभी देख भी नहीं पाए कि मूर्छित हो गए श्री जी का चरणामृत देव नारद जी के मुख में डाला जानते हो न किशोरी के दर्शन का अधिकार कैसे प्राप्त हुआ ब्रज रज का सेवन लाल जू के उत्सव में सम्मिलित होना ब्रजवासी के दरवाजे पर जाना लौटना रज लगाना उससे वृषभान भवन का दर्शन और वहां अष्ट सहचर के दर्शन और श्री जी के चरणामृत से श्री जी की देखने की सामर्थ्य नारद जी को आई सखियों ने कहा शीघ्र ही उठो देवर्ष नारद अपने नेत्रों का परम लाभ लो जो तुम किशोरी ज के इस तरुण अवस्था की प्रथम झाकी का दर्शन करना चाहते तारुण्य प्रथम प्रवेश समय यस महा माधुरी आप दर्शन करो नहीं एक क्षण में अंतरध्यान हो जाएंगे फिर बाल रूप हो जाएंगे नारद जी ने जो श्री जी का रूप देखा बार-बार चरणों में लट रहे हैं जय कृष्ण मनोहर जय वृंदावन प्रिय जय भ्रू भंग ललित जय वेणु रवा कुल जय व कृतु तंस जय गोपी विमोह जय कुमकुम लिप्त
जय रत्न विभूषण इसी समय दृश्य बदला और नारद जी ने फिर देखा पालने पे लाड़ली कुछ क्षण के लिए जो कुछ क्षण के लिए देवसी नारद जी के सामने प्रकट हुई लाडली उनकी आठों पैर सेवा का सौभाग्य सोचो जो यहां पीछे वर्णन कि आपका जो स्वरूप है न बड़े बड़े के ध्यान में आने वाला नहीं है कलचर वि भवे ब्रह्म रुद्रा दुर्गम योगिंद्र नाम ध्यान पथम नतम इस प्रस कर चित योगिंद्र नाम ध्यान पथम नतम वो किशोरी रूप एक क्षण के लिए देवर्ष नारद जी के सामने प्रकट हुआ सब सखि अंतर ध्यान किशोरी ज का व रूप अंतर ध्यान और छोटी सी लाडली श्री राधा जू का ज वो रूप अंतर ध्यान हो गया पालने वाली लाडली जू के दर्शन आवाज दी वृषभानु जी को वृषभानु जी आए द्वार पर खड़े वृषभान जी प्रतीक्षा कर रहे थे नारद जी ने जब आवाज दिया तो अव पूरत कंठ से देवर्ष नारद जी को देखा वृषभानु जी ने पूछा कि आपकी बोले इस बालिका का प्रभाव और स्वभाव ही ऐसा है ये जो मेरी दशा है इस बालिका का स्वभाव और प्रभाव है तुम्हारे भाग्य की सीमा नहीं वृषभानु जी जहां इनके चरण अंकित है
वहां लक्ष्मी सहित भगवान नारायण सदैव विराजमान रहते हैं नारद जी ने नारद जी विकल है वीणा में बार-बार राधा राधा राधा आश्चर्य कि श्री जी ने अभी तक नेत्र नहीं खोले थे जब देवर्ष नारद जी ने उच्चारण किया जय कृष्ण मनो हारिणी जय वृंदावन प्रिय जय भ्रू भंग ललित जय वेणु रवा कुलो जय व कृतु तंस जय गोपी विमोह जय कुमकुमा लिता जय रत्न विभूषण श्री श्री कृष्ण नाम सुनते ही लाडली जो ने आख खोल लाडली जो ने आख खोला प्रीतम का जस सुन कर के लाडली जू का प्राण प्रिय है उसी का य सुन कर वृष मान जी को लगा किय अनुष्ठान एकांत में कर रहे थे तभी मेरी लाडली जी ने नेत्र खोला नारद जी श्री लाडली जी के चरणों में प्रणाम किया और बार-बार जय कृष्ण मनो हारिणी तो लाडली जू मुस्कुरा देते नेत्र खोल दिए मुस्कुरा दिए अब तो बस पूरे वृष भानपुर में जो भी लाडली जी के पास आता तो जय कृष्ण मनो हारिणी बस वृषभान नंदिनी मुस्कुरा देती किलकारी मार द जो भी आता अब ब्रश भान जी के हर्ष का पार नहीं श्री लाडली जी ने आख खुल दी मुस्कुरा रही जो भी लाडली ज के
समीप आता तो बस जय कृष्ण मनोहर जय कृष्ण मनो हारिणी देवर्ष नारद जी गए ब्रज के समस्त ब्राह्मणों को बुला कर के पुरुष सूक्त का गान श्री वृषभान जी करा रहे अपने लोग भी पुरुष सुक्त का गान करते हैं हरि ओम मा सहस्त्र शर पुरखा सहस्रा सहस्र पात भव सर्व सवात सांगल पुरु खय वेदम सर्वं जद भूत ज भाम उता मतत्व से सानो जद ना रोहती तावास हि मातो जया पुरु पाद विवा भूता त्रिपा दस्या मृत देवी त्रिपा दू उद पुरु पादो सेहा भवत पुन विवम म नने अभ ततो बराड जायत विराजो अधि पुरु सजा तो अत्य पश्चात भूमि मथ पुरा तस्मा जज सर्व होत समदम प्रम पशुता चक्र य्या नारण ग्रम तस्मा सर्वत चहा सामा जरे छरे तस्मा तमा दायत तस्मा दसवा अयंत केच भया दत गावो हजत गरे तस्मा तस्मा जाता अजाया तं जनम प्रक्ष पुरु जात मकत तेन देवा अयंत साध्या ना मुखं की मस्या कि बाहु की मरु पादा उच ब्राह्मणो मुख माश बाहु राजन कत रुस पद शद अजत चंद मा मनसो जात चो सूरज अजत श्रोता दवाय प्राण मुखा निरत नादत श सवर्त पदम भूम सत लोका जत पु हवि देवा जतन बसंतो स द सरद
सपता सन परि स समधा कता देवा जनत वाना अवनम पसु जजन जजन मय जंत देवा स्तानी धर्मा प्रथमा स तेह ना कम महि मान स चत जत्र पूर्वे साध्या संक देवा हरि ओ ह ओम ब्रजवासी ब्राह्मण जन आकर वेद पाठ कर रहे हैं अब समस्त ब्रजवासी जन भेंट ले लेकर के बाबा के यहां पधार रहे प्रिया जू पधारे और फिर सब उत्सव मनाते हैं बधाइयां गाते हैं श्री जी के लाडली जू के प्रादुर्भाव के महा महोत्सव की और इसका फल होगा कि हम सबको लाडली जू के नाम में और लाडली जू के चरणों में आसक्ति हो जाए
जिव्या पे राधा राधा नाम हो और हृदय में गोरे चरणारविंद की ठसक हो तो अभी हम अपनी पहले महारानी जी को पधारा आते हैं और फिर उत्सव मनाते जन्म उत्सव मनाते हैं प्यारी जी का श्री राधा वल्लभ लाल
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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