॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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जीवन उपयोगी , अध्यात्म की कुछ गुप्त रहस्यमयी बातें // 01/08/2024 - Shri Hit Premanand Ji Maharaj

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदा वनेश्वर तैव पदारविंदम प्रेमा मृतक मकरंद रसो पूर्णम हदर पितम मधुपति स्मर ताप मु ग्रम निर्वा पय परम शीतल मा शयाम परम शीतल मा शया हरि हरि जनम बीत जाए हरि हरि जनम बीत जाए योग यज्ञ जप साधन संयम सब ही कठिन दिखाए हरि हरी जनम बीत जाए भक्ति न भाव न नेम भजन को भक्ति ना भाव न नेम भजन को चित न छिन ठहरा विषय मत निज दशा निहारत हो पुनि पुनि पछताय हो पुनि पुनि पछताय हरि हरि जनम बीत जाए हे हरि हे हरि मेरा जन्म व्यर्थ में बीता जा रहा है योग का शास्त्रों में वर्णन है अष्टांग योग बड़ा कठिन दिखाई देता है यम नियम प्राणायाम प्रत्याहार आसन ध्यान धारणा समाधि ये सब मेरे बस की नहीं रही यज्ञ की बात इतनी सामग्री नहीं ऐसी व्यवस्था नहीं कि मैं यज्ञों के द्वारा आपको रिझा सकूं इतनी संपत्ति नहीं और जो मंत्रा अनुष्ठान साधनाएं हैं वह बड़े संयमी पुरुषों द्वारा होती जो जितेंद्रीय पवित्र अंतःकरण वाले हम विषय जीव कैसे अनुष्ठान करें सब कठिन दिखा रहा है हे हरि हे हरि मेरा जन्म

व्यर्थ बीता जा रहा है मेरे हृदय में जब देखा तो भक्ति का भाव भी नहीं है ना कोई साधना का नेम है भजन का नेम है ना कहीं मेरा चित्त एक जगह ठहरा है बड़ा चंचल है भागता रहता है मन यह गजराज की तरह मत मन जब जैसा चाह वैसा कर लेता है कोई अंकुश नहीं मानता मैं बहुत बार-बार पछता रहा हूं हे हरि हे हरि मेरा जीवन व्यर्थ बीता जा रहा है बहु विधि अतम हेरी हो हार कछु नहीं बनत दिखात बस एक बात समझ में आ गई भय व्याकुल हुए नाम तिहारो टेरी टेरी अकुला एक बात समझ में आ गई आपकी कृपा से कि यज्ञ योग नियम संयम साधन अनुष्ठान यह सब मेरे से नहीं होने वाले एक जगह चि नहीं ठहरता बड़ा चंचल स्वभाव अजित द्र विषय कैसे मेरा जन्म तो व्यर्थ बीता जा रहा है एक बात समझ में आ गई यह बहुत बड़ी बात है जब मैं भयभीत होकर पूरा प्रयास किया मेरा मन किसी साधन में सफलता प्राप्त नहीं की तो आपकी कृपा से एक बात याद आ गई कि भगवान का नाम सर्व मंगल करने वाला चाहे भाव से जपो कु भाव से जपो अपवित्र जपो पवित्र कैसे भी कैसे भी कैसे हो नाम लेत खेलत हसत

अजान कैसे भी ता को उत्तम गति देते हैं भगवान कैसे भी नाम ले और कहीं सादर सुमिरन जे नर करही अगर सादर आदर पूर्वक नाम ज बिना प्रयास के भो समुद्र से पार हो जाए और कहीं आर्त भाव से व्याकुल होकर के नाम पुकारे तो नाम लेत भव सिंधु सुखाई करहु विचार सुजन मन माही नाम लेते ही भव समुद्र सूख गया पार होने की जरूरत ही नहीं रह गई अगर निरंतर नाम चल रहा है सादर सुमिर ज नर करहे बिनु प्रयास भव सागर तर बिना प्रयास के भव समुद्र से तर जाना या व्याकुल होकर आर्त भाव से नाम

जपना तो भव समुद्र ही सूख जाना अगर किसी की श्रद्धा नहीं बनती भाव नहीं बनता विवस होकर नाम जप करता है तो उसके लिए भी गाय के खुर के गड्ढे के समान य भ समुद्र हो जाता है विवस जाकर नाम सुमर गोपद भवसागर तरह पर सबसे श्रेष्ठ बात है व्याकुल होकर प्रभु को पुकारना राधा राधा हरि हरि कृष्ण कृष्ण भय व्याकुल हुए नाम तिहारो टेरी टेरी अकुला भोरी को अलबेली स्वामिनी सुनि सुनि मृदु मुस्काए हरि हरि जन्म बीत जाए एक बात संतों के संग से समझ में आ गई कि यदि प्रभु का नाम पुकारा जाए तो सब बात बन जा स्वामिनी जी ने जब देखा कि केवल मेरे नाम का आश्रय ले लिया राधा राधा राधा भोरी सखी जी कहती मेरी अलबली महा महिमा मय महारानी मुझे देख देख देख के मुस्कुराने लगी कि सही बात पकड़ ली तूने सब साधनों का सार नाम पर नाम शर्त है अगर ऐसे नाम पुकारा जाए तो बहुत लाभ मिल जाए अनन्य भाव से दैन्य भाव से आर्त भाव से एक बार जिन नाम लि हित सो हुए अति दी ता को संग न छाण ही ध्रुव अपनो करि लीन निश्चित प्रभु से अपना परम पद प्रदान कर देते हैं कभी

उसका संग नहीं छोड़ते जो अनन्य प्रीति से प्रभु का नाम दैन्य होकर पुकारता है ये दैन्य और अनन्य यह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है जिसके जीवन में दैन्य आ गया नन्य आ गई सब बात बन गई यही दरबार दीन को आदर रीति सदा चले आई मेरे जैसा धम कहां है आप जैसा अधम उदाहरण कहा है मेरे जैसा पतित और कोई नहीं आप जैसा पतित पावन को बढ़िया संबंध है प्रभु हम पर कृपा कर दो वह एकांत में दैन्य आर्त भाव से रोता हुआ प्रभु को पुकारता है इससे बड़ा भजन कोई नहीं हजारों माला चलाना एक तरफ और कुछ मिनट बैठ कर के रोते हुए प्रभु को पुकारना एक तरफ बहुत बड़ी बात हो गई हृदय से आर्त भाव से हम कह रहे हैं अगर हृदय से आर्त भाव से रोना नहीं आता तो बनावटी ही रोवे झूठा केले साचा होए अगर हम बनावटी रोएंगे तो कभी न कभी हम पर भी कृपा हो जाएगी भगवान या भगवान का कोई भक्त हम पर कृपा कर देगा बनावटी रोए तो भी श्री गदाधर भट्ट जी महाराज जब श्री भगवान की कथा कहते तो ऐसा भाव का प्रवाह आता कि भावुक जन रोने लगते तो एक भगत जी सामने ही बैठे उनको कभी रोना

नहीं आता बड़ा उनको दुख हुआ इस बात का कि सब रो रहे हैं हमारी आंखों में आंसू नहीं क्या लोग समझेंगे कि हम कैसे भगत हैं तो लाल मिर्च एक कपड़े में लेकर गए और जब रोने का प्रसंग आया तो लाल मिर्च आंखों में से अब तो छर छरा आंसू फिर और लाल मिर्च आंखों में लगा लेते यह बात बड़ी सूक्ष्मता से आगे ही थे तो गदाधर भट्ट जी देखते पूछा उनसे इस पोटरी में क्या है तो उनका लाल मिर्च है क्यों बोले इन दुष्ट आंखों को दंड देते हैं क्योंकि संसार के लिए तो इनको रोना बहुत आता है प्रभु के लिए रोना नहीं आता प्रभु के प्यार में प्रभु के नाम में प्रभु की महिमा में यह कभी आंसू नहीं बहाते इसलिए इसको नका तुम भगवान के अत्यंत लाड़ले हो तुम रोना चाहते हो उतर और जही गले से लगाया हृदय की वस्तु उनके हृदय में गई रोना गया असली में रोना गया मुझ अधम को जिसके अंदर किन चिन मात्र भक्ति ने ऐसा महा भागवत जीही हृदय से लगाया बस दैन्य आया और प्रेम का प्रादुर्भाव इस मार्ग में झूठा खेले साचा होए झूठे से भी यदि भगवान के लिए आंसू बवे तो साचा मान

लेते हैं भगवान उसे सच्चा प्रेमी बना देते हैं इसलिए यह कलिकाल मला यतन मन कर देखि विचार श्री रघुनाथ नाम बिन नान आन आधार ये कलयुग है बड़ा मलिन ता फैलाने वाला है ना इसमें योग हो सकता है ना यज्ञ हो सकता है ज्ञान की बातें कह ले लेकिन चित्त भोगों में ही रमण करता है इसलिए आर्त भाव से पुकारे राधा रमण राधा रमण राधा वल्लभ राधा वल्लभ राधा राधा राधा एक यही साधन है कलयुग केवल नाम धारा सुमिर सुमिर नरत पारा एकमात्र भगवान का नाम भगवान का भजन यही जीवन का सार है श्रीपाद प्रब उधान जी महाराज करुणा करके कह रहे हैं यो वृंदावन माधुरी सक्र दप स्वाते समा स्वाद राधा माधव शुद्ध मन मथ रसोल लास चमत्कार शास्त्री यान लौकिका नप जह चेष्टा कला पान सा नाना प्रेम विकार मोहन तनु रुण मत्व दृश्य जिसने श्री वृंदावन धाम का आश्रय ले लिया वास स्वीकार कर लिया उसे रसिंग मिलता है के संग से वह शास्त्रीय नप शास्त्री पद्धतियों का और लौकिका नप लौकिक रीति का भी त्याग कर देता है क्योंकि अनन्य के लिए जो इष्ट का वर्ण हुआ उसी का नाम उसी का

रूप उसी की सेवा उसी को संपूर्ण विश्व में देखना उसके सिवा अन्य कुछ स ही नहीं है ऐसा मानना य अनन्य होता है तो रसिक अनन्य के संग से जब अनन्य जागृत होती है तो वेदा प सस्ती व शास्त्र और वेदों के सिद्धांतों को भी प्रणाम करके त्याग देता है जब वेद रीति का त्याग कर दिया तो लोक रीति की बात क्या है लौकिका नप अी जहा चेष्टा कला पान सा जितनी सब धर्म की चेष्टा आए हैं उन सबको पूर्णता पूर्वक नमस्कार करके त्याग देता है तो करता क्या है श्री राधा माधव शुद्ध मनमत रसो

लास चमत्कार श्री राधा माधव का महा प्रेम रस जो चमत्कारिक है उसमें चित्त को जोड़ता है ज्ञान धर्म व्रत कर्म जिते सब काह में नहीं मोहि प्रतीति बस रसिक अनन्य निशान बजायो एक श्याम श्यामा पद प्रीति और सब शास्त्रों का फल है संसार से चित्त हट कर के प्रभु में चित्त का निरंतर के लिए समाहित हो जाना निरंतर के लिए समर्पित हो जाना तो यह कोई निषेधात्मक बात नहीं हुई य विधि की बात हुई खूब शास्त्र पढ़ रहे हो खूब लोक रीति कुल रीति का पालन कर रहे हो लेकिन भगवान से प्रीति नहीं सो सब धर्म कर्म जरि जाओ जहा न राम पद पंकज भाव किस काम का व धर्म कर्म आग लगे ऐसे धर्म में ऐसे कर्म में जो भगवान से विमुख जीवन व्यतीत कराए इसीलिए श्रीपाद कह रहे वृंदावन का आश्रय वृंदावन का वास तो रसिक का संग रसियो के संग से लोक रीति और शास्त्र रीति का पूर्णता पूर्वक त्याग करके एकमात्र राधा माधव के प्रेम में अनन्य हो जाता है जो तो उसके जी जीवन में ऐसी स्थिति प्राप्त होती कि स्थावर जंगम जहां दृष्टि जाती है भावनात्मक थोड़ी भी अगर झांकी आने

लगे प्रिया प्रीतम की तो दशा बदल जाएगी पूर्ण रूप से तो सचर भाव में ही प्रकट होते हैं जो सैचर भाव को प्राप्त हो चुका है सिद्ध पुरुष वही देख सकता है बिहारी बिहारी जी को दूसरे की तो सामर्थ नहीं है प्यारो ढम क्म ने अच्छी सु काद नाम अध्यान गम जिनके नख कांति का तेज सस्त्र कोटि सूर्य संप्रभ श्री लाल जू महाराज के हरि जू के चरणों की नख कांति का जब वर्णन आता है तो बोले हजारों करोड़ों सूर्य के समान तेज एक सूर्य से आंख मिलाकर देखो करोड़ों सूर्य जिनकी नख कांति

वो महान तेजो स्वरूप भगवान श्री हरि और उनके प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप श्री राधा किशोरी इन पार्थिव ने पार्थिव दिल यह झेल पाएगा तभी जब आचार्य प्रदत्त मंत्र और उपासना और गुरु कृपा तब जाकर क्रमसा धीरे-धीरे सहत सहत बाढ़ भगत ग्र तन गुरु हित गार प्रेम को सहते सहते इतना मजबूत हृदय होने लगता है कि प्रिया प्रीतम के दर्शन से उसकी प्रेम आनंद की ऐसी वृद्धि विकल होता फिर भी वह धैर्य धारण किए हुए ये छोटी मोटी क्षमता नहीं भगवान शंकर के ध्यान में जब गोविंद के चरणारविंद प्रकट होते तो उन्मत हो जाते हैं वह गोविंद जिनके चरणों में कैसे ये वृंदावन और निवत निकुंज इसीलिए कहा कि रसियो के संग से व श्यामा श्याम का अनन्य हो जाता है साधन विविध सकाम मति सब स्वार्थ सकल सब जो अनीति इस प्रेम मार्ग में साधन विविध सकाम मति विविध सकाम मति के द्वारा किए जा ने वाले साधन तो अनीति है यहां उनको तो स्वीकार ही नहीं किया गया साधन विविध सकाम मति सब स्वारथ सकल सब जो अनीति और ज्ञान ध्यान व्रत कर्म जिते सब काहो में नहीं मोहि प्रतीति

ये मुझे श्यामा श्याम की प्राप्ति कराने में समर्थ नहीं तो क्या किया बोले अब बस श्यामा श्याम ही मिल सकते हैं वही हमारे साधन है वही हमारे साध्य है हम श्यामा श्याम के अनन्य होकर उनको पुकारते हैं उनकी सेवा करते हैं उनकी जूठन पाते हैं उन्हीं की चरण में रहते हैं उनके सिवा हमारा कोई आ यही साधन है और यही साध्य है यो राधा मुरली धरा कमल प्रेम कमात्री अति मात्री अत परा नाम स्थिर चरम सत्वम सुपुत्री यति गोत्री यत त जनाद सु महा मित्री अति द्वे शिशु श्री वृंदावन

वास मेत सकल य स्वांग गायति हे उपासक यदि आप राधा मुरलीधर के प्रेम में उन्मत होना चाहते हो तो तुम्हारे जीवन में परस्पर कामा आकर्षण का संयोग प्राप्त होगा श्रीपाद कह रहे यह बहुत सावधानी की बात है और जीवन में सबके जीवन में एक बार यह प्रश्न खड़ा होगा इसे सौभाग्य मत मान लेना इसे प्रारब्ध मत मान लेना प्रारब्ध से भोग का सानिध्य मिलता है भोग क्रिया नहीं होती भोग क्रिया अज्ञान से होती है प्रारब्ध से सामग्री एकत्रित हो जाएगी भोग का संयोग का वह सब प्रारब्ध रचना कर देगा लेकिन क्रिया अज्ञान से होती है क्रिया कामना से होती है इसलिए कह रहे हैं यदि राधा माधव के प्रेम रस में डूबने के मार्ग में उपासक चला तो उसके जीवन में एक बार ही सही पर ऐसा अवसर आएगा कि वो रस पर विपरीत शरीर का भोग करने का प्रश्न माया खड़ा करेगी आपको कह रहे हैं कि अगर नव युति है तो अपनी पुत्री जैसे होती ऐसे देखो सुपुत्री यति अपनी पुत्री कितनी भी सुंदर जवान ऐसा आता ही नहीं भाव में की स्त्री आता ही नहीं है जिनके आता है वह राक्षस ही हैं

मनुष्य तो है नहीं नहीं तो घर में रहा जाता है बड़ी बहन परिवार के सदस्य कहीं ऐसा आता है कि जवान बहन है तो जवान लड़की ऐसा थोड़ी आता है हंसते खेलते गले लगाते कोई कहीं भाव ही नहीं रहता काम का चाहे जवान पुत्री हो चाहे जवान बहन हो कभी ऐसा घर में भाव जिनके भाव आता वो राक्षस हृदय के हैं मनुष्य हृदय के नहीं वो राक्षस हृदय वाले आसु स्वभाव वाले हैं नहीं अपनी पुत्री अपनी बहन के समीप रहने पर कहीं ऐसे भाव थोड़ी आते खूब खेलना कूदना हसना बातचीत करना यह सब घर में होता रहता है पर यह भाव थोड़ी आता है कि ये स्त्री है नहीं मेरी बहन वहां कोई गुंजाइश ही नहीं काम भाव की तो बोले सगी पुत्री की तरह सब पुत्रियां दिखाई दे अपने से बड़ी है तो बिल्कुल मेरी जैसे जननी वैसे मात यत पंगना जैसे अपनी अम्मा के पास मां के पास बैठे तो क्या भाव बिगड़ेगा कुछ नहीं बिगड़ेगा कैसा भी जवान लड़ का मां अपने ऐसे हृदय से लगाकर दुलार करती है समझाती है बुझाती है डांटते है वहां काम भाव आता है क्या मां के गले लगने पर बहन के गले लगने पर काम भाव

आता है क्या बेटी को हृदय से लगाने पर काम जब साधारण सांसारिक पवित्र भाव में काम नहीं आता तो तुम तो परम पवित्र भगवान के भाव वाले हो तुम्हारे अंदर कैसे काम परास्त कर सकता है मातृय पराना यह आएगा प्रश्न जीवन में पुरुष है तो स्त्री के प्रति स्त्री तो पुरुष के प्रति साधक बहुत सावधान रहे माया प्रश्न करेगी घूमते रहते हैं माया के पार्षद घूमती रहती है माया की पार्षद बहुत सावधान जाके संग कुमति मति उपजे करत भजन में भंग तजो रे मन हरि विमुख को संग बहुत कीमती जीवन है सिद्ध बात समझ लो संकोच की बात नहीं हरि को रिझाओ तो बैकुंठ का द्वार वृंदावन के दिव्य धाम का द्वार साकेत द्वार कैलाश धाम का द्वार खुलेगा और जगत के शरीर धारी को रिझाओ तो आखिरी द्वार वही है मल मूत्र का और कुछ नहीं हमारी बात मान लो संकोच करने की बात नहीं है हम वहीं से पैदा हुए हैं वहीं की आसक्ति से फिर दुर्गति को प्राप्त होंगे खुली बात है देख लो दो ही आकर्षण है बढ़िया से बढ़िया खाने को मिले भोगने को मिले शिनो दर परायण शास्त्र कहता है शिष्ण और

उदर उदर रसेंद्र से संबंधित है शिष्ण जने द्र से संबंधित है बस जनदरी और रसेंद्र के भोगों में पूरा दिव्य मानव जीवन बर्बाद श्रीपाद कह रहे यद राधा मुरली धर के प्रेम में मगन होना है बहुत सावधान यह मत समझो कि माया कब किस रूप में प्रश्न करती है वह जननी है वह अपने बेटे को पुष्ट करने के लिए कोई भी प्रश्न कर सकती है लेकिन अपनी दृष्टि महाप्रभु चैतन्य देव रुदन कर रहे हैं हा गोविंद हा कृष्ण दो व्या पहुंचती एक कहती कितना य रुदन कर रहे हैं बोले मेरी जैसी नहीं मिली होगी इसीलिए ना अभी देखो इनका रुदन बंद करते वो क्या जाने कि जो हरि के आशिक है उनको हरि माया आकर्षित नहीं कर सकती भगवान का एक विशुद्ध प्रताप बल भक्तों की रक्षा करता रहता है व जाकर के विनोदा स्पद बातें करने लगी महाप्रभु चैतन्य देव ने कहा मां बस करुणा कर दो श्री कृष्ण मिल वह शब्द उनके हृदय में ऐसा चोट किया कि मैं इतनी नीच ऐसे महा पावन से ऐसी भावना चरणों में गिर गई मुझे क्षमा करो क्या मेरा भी उद्धार हो सक कृष्ण कृष्ण कृष्ण ऐसा नहीं कि किसी के

जीवन में प्र प्रश् नहीं आता प्रश्न आता है पर जो इस भगवत कृपा से सावधान रहता है कि प्रश्न है मुझे उत्तर देना है इसका ऐसा नहीं कि प्रश्न के लपेटे में आकर के फिसल जाना है प्रश्न है उत्तर देना है बहुत संभाल के उत्तर देना है अपमान भी नहीं करना क्योंकि यह वही आए हुए हैं जिनकी हम आराधना करते हैं वह कुछ भी रूप मोहिनी रूप भी तो धारण किए ना वो कुछ भी रूप धारण कर सकते मेरे प्रीतम है तो बस उस प्रभु आप ही मेरी रक्षा करो आप ही मुझे बचाओ मात्री यत पंग नाम त्रुटि हो सकती हमसे हमसे गलती हो सकती कभी बलवान ना बने कभी पहलवान ना बने इस विषय में दैन्य और चरण छूना यही दो बातों से बच सकते हो चरण छू के हे जगत जननी हे अंबा कभी आपके प्रति मेरा जिन उर्वशी जी ने बड़े बड़ों की बुद्धि को मोहित कर लिया अन जी की बुद्धि को क्यों नहीं मोहित किया क्योंकि जाते ही सीधे प्रणाम किया अर्जुन जी ने जही उर्वशी का प्रवेश हुआ देखा स पंचांग प्रणाम किया और कहा माता स्वागत है आप पधारी आग लग गई मैं किस लिए आए और तुम मुझे क्या कह

रहे हो आज के बाद कभी माता शब्द उच्चारण मत करना उन्होंने कहा पुनः कहता हूं कुंती माता से भी अधिक पूज्य में तुम्हें देखता हूं कुछ नहीं बिगाड़ पाए उर्वशी जी यहां तक कि साप तक दे दिया पहली दृष्टि पढ़ते ही या तो नव किशोरी जगदंबा लाडली ज की सहचर या मां अपना पवित्र भाव तुरंत आरोपित कीजिए और स्त्री शरीर को लिखा है भ्राता पिता पुत्र निज जैसे मध्यम परपति देख कैसे भ्राता पिता पुत्र निज जैसे बराबर का है तो सगा भाई क्या सगा भाई को देखकर काम जागृत होता है क्या

अपने छोटे बेटे को देखकर काम जागृत होता है क्या पिता को देखकर काम जागृत होता है भ्राता पिता पुत्र निज जैसे आवश्यकता पर बात करें नहीं एकांत सेवन करें बलवान इंद्री ग्रामो विद्वान प कती शास्त्र आदेश करता है पर उपासक को यह पक्का विश्वास कर लेना चाहिए कि मेरे जीवन में यह प्रश्न आएगा आता है आता रहेगा अगर इससे निकल गए आगे तो यो राधा मुरली धरांगुट्टी है इनसे जो पास पास भी भगवान ही करवाएंगे यह सत्संग सुनने को भगवान ही तो संयोग बना रहे हैं यह भगवान ही तो प्रित करके आपको सुनवा रहे हैं इसलिए सावधान यह प्रश्न है आपके पास एक करोड़ रुपया जमा किया और आपका मन हुआ कि अरे मैं फस गया क्या तो एक करोड़ यमुना जी में फेंक दो मुक्त हो गए लेकिन एक बार जीवन में फिसल गए तो उसकी पूर्ति नहीं होने वाली हम मैंने अरबों रुपया एकत्रित हु मन में आया सब छोड़ के भाग गए राधा राधा राधा राधा जो जहा वही छोड़ दिया कुछ नहीं फसे लेकिन एक बार फिसल गए काम में तो उसकी पूर्ति कैसे होगी वो तो नहीं होगा वो तो चित्त पर संस्कार बन गया और

आपका संयम भ्रष्ट हो गया एक बार बालू का बांध टूट जाए तो दोबारा बांध बांधना बहुत कठिन बात है एक बार योगी भ्रष्ट हो जाए दोबारा योगी अपने योग पे आना हो भगवान के बल की बात दूसरी बात नहीं जैसे बालू का बांध फूट जाए तो बांधना बड़ा कठिन है ऐसे ये ब्रह्मचर्य सत मार्ग ये इंद्रिय निग्रह ये बालू का बांध है बहुत होश से मात्री अत पंग नाम स्थिर चरम सत्वम सुपुत्री यति बड़ा पवित्र भाव और यह भाव जब अचानक संयोग हो जाए तब संयोग से बचने की पूरी वृत्ति रखे उपासक जब तक कोई बहुत ऐसा संयोग की बात बन जाए कि बात करना ही है तो उसके चरणों में दृष्टि रखते हुए मुख की तरफ दृष्टि रखते हुए साधक कभी बात नहीं करते नहीं चरणों पर ऐसे दृष्टि रखते जी प्रति उत्तर कम शब्दों में और ब भाग ले अपने को सूर्यवीर मत समझे ये भगवान की प्रचंड मोहिनी माया का आकर्षण हमारे चित में बलात हमारी निष्ठा को परिवर्तित कर देगा यदि हम अधिक समय साथ रहे अधिक समय बात करें अधिक समय हंसी मजाक करें तो हम फिसल जाएंगे यही खाया है जिनसे हम भगवान को नहीं

प्राप्त कर पाते इनमें हम फिसल जाते हैं बहुत ही सावधानी की जरूरत है हमारी एक एक वृत्ति भगवान अंदर बैठे हुए देख रहे हो उस जो जल रही वृत्ति काम क्रोध आदि को ना भोगने से वह भगवान हिसाब आपको इतना आनंद प्रदान करेंगे कि रोते रहोगे पर कुछ समय के लिए आपको अपने मार्ग में बहुत संभाल संभाल कर पग रखना है अगर अपना कल्याण चाहते हो सुंदर बुद्धि चाहते हो भगवत मार्ग में अग्रसर होना चाहते हो तो गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाई याद रखना जो चाहे आपन कल्याणा सुजस सुमति शुभ गति शुभ नाना सो पर नारी लिलार गोसाई तज चौथ के चंद की नाई जैसे चौथ के चंद्रमा को देखने से कलंक लग ही जाता है ऐसे ही जो पराई माता बहनों की तरफ ऐसी गंदी दृष्टि या बार-बार मुख की तरफ देखना तो हाव भाव के द्वारा चित्त का आकर्षण होकर मलिन हो जाना स्वाभाविक है जैसे चौथ के चंद्रमा को देखने से कलंक लगता है ऐसे जो साधक अपना कल्याण चाहता है सुमति चाहता है शुभ गति चाहता है उसे चाहिए कि चरणों की तरफ देखकर बात करें ये जगत जननी जगदंबा है इनकी कृपा से हम

परमार्थ पर विजय प्राप्त कर लेंगे इनके प्रति हमें भोग्य बुद्धि दोष बुद्धि निकृष्ट बुद्धि का त्याग करना ही होगा तब हम आगे बढ़ पाएंगे गोत्री अत अति तजना दिशु महा मित्री अति द्वे शिशु यदि हम भगवत मार्ग में चल रहे कोई हमारी निंदा करता है तर्ज करता है तो जैसे अपना भाई अपना घर का अपने गोत्र का परिवार का कोई लड़ाई झगड़ा करे तो ऐसा अरे घर का आदमी कोई बात नहीं ऐसे टाल देते हैं ऐसे भाव रख लेते हैं या हम भाव रख लेते हैं भगवान के द्वारा विधान किया हुआ भेजा गया है कोई हमारे प्रारब्ध का क्षय हो रहा है और जो हमसे विद्वेष उसे हम महा मित्रवत भाव रखें नहीं हम में और संसारी पुरुष में क्या अंतर करत जे अन सहन निंदक तीनों पर अनुग्रह करो अपने शरीर को जैसे हम प्यार करते हैं और दूसरे शरीर से हम उदासीन रहते हैं ये संसारी पुरुष का लक्षण है और भक्त अपने शरीर से उदासीन रहता है और दूसरे शरीरों के दुख को अपने शरीर जैसा मानता है यह भाव होता है अपने शरीर में कष्ट है कोई बात नहीं लेकिन दूसरे के शरीर का थोड़ा भी कष्ट

उसके हृदय में पीड़ा पहुंचा देगा पूज्य श्री भाई जी हनुमान प्रसाद पदार जी महाराज साधकों के लिए बहुत अमृतम वचन लिखे हैं भगवान को प्राप्त करना है तो तीव्र अभिलाषा जागृत करो नाम जप से सत्संग से सदाचरण से दूसरों की सेवा से पवित्र शरीर पवित्र मन पवित्र विचार पवित्र वाणी तो परम पवित्र सच्चिदानंद भगवान की प्राप्ति की अभिलाषा साधु संग से निश्चित जागृत हो जाएगी अन्य कामना जब उत्पन्न हो जाती है तब भगवान की प्राप्ति की अभिलाषा नहीं हो सकती भगवान ने कहा स्वयं कि जिसका चित्त भोगों ने अपरत कर लिया है जो भोगों में लगा हुआ है जो भोग सामग्री संग्रह करता है ऐसा व्यक्ति कभी निश्चय ही नहीं कर सकता कि मुझे भगवत प्राप्ति करनी है भोगेश्वर प्रसताव साय आत्मिका बुद्धि समाध न विधियर भगवान की प्राप्ति की इच्छा ही नहीं कर सकता है इच्छा ही नहीं होगी ऐसी बात नहीं अगर साधु संग हो तो भोग आदि का त्याग करके भगवत प्रति की इच्छा जागृत कर सकता है पर जब तक भोगों में लगा रहेगा तब तक भगवत प्राप्ति की इच्छा ही नहीं होगी अन्य कामना

वाला भगवत प्राप्ति की इच्छा नहीं रखता अनन्य कामना जिसकी है श्री भगवान से उसके हृदय में इच्छा जागृत होती है अब मुझे भगवत प्राप्ति करना है जब भगवत प्राप्ति की इच्छा जागृत होती है तब भगवान के अनुकूल आचरण और प्रतिकूल आचरण का त्याग यह नियम लेना होता है श्री कृष्ण अनुकूलन प्रतिकूल स्य वर्जन विसर्जन आज के बाद कभी शास्त्र विरुद्ध धर्म विरुद्ध आचरण नहीं करूंगा तभी आपके अंदर भगवत प्राप्ति की अभिलाषा जागृत होगी इधर तो माला चला रहे हैं पाठ कर रहे हैं धर्म के

कार्य कर रहे हैं और पीछे फिर अधर्मा चरण हो रहा है तो अंधा बटे पड़ा चबाए तुम्हारे हाथ में कुछ नहीं लगेगा हमको संयम से रोकना पड़ेगा जो धर्म जो नाम जप जो साधन कर रहे हैं वो हमारा कहीं किसी पापा चरण में बह ना जाए कहीं किसी छिद्र से बह ना जाए हम अपने इंद्रियों को मन को हम विचार के द्वारा पवित्र विचारों के द्वारा उनको घेरे रहते हैं इसी का तो इनाम मिलता है परम पद इसी का इनाम मिलता है अद्भुत आनंद की उगन ना भय जन्म का ना मृत्यु का ना रोग का ना शोक का किसी

भी तरह का कोई भी द्वंद प्रभाव उपासक के अंदर नहीं रह जाता अनुकूल स्य अपने इष्ट देव गुरुदेव के अनुकूल और प्रतिकूल स्य विसर्जन प्रत्येक प्रतिकूल आचरण का त्याग जब साधक ऐसा आचरण बहुत समय तक करता है तो उसके प्राणों में रुदन करने की इच्छा जागृत होती है और वह क्रंदन करने लगता है रोते रोते उस के हृदय में विराग जलाती है और उसी रागनि को शीतल करने फिर भगवान को आना होता है फिर उसे भगवत प्राप्ति हो जाती है दूसरी बात साधक जब इस मार्ग पर चलता है तो उसका स्वभाव होता है इधर उधर ताक झाक करना यह कैसे चलता है य यह बहुत बुरी आदत है यह बिल्कुल नहीं रखनी चाहिए पर दोष दर्शन से सबसे बड़ा घाटा होता है कि कि हम जो दोष दूसरे में देखते हैं देखने की चेष्टा करते हैं वह दोष हम में जागृत हो जाता है इसलिए साधक को इधर-उधर ताक झाक करने वाला स्वभाव नहीं रखना चाहिए छोटी-छोटी बातें होती हैं जिनमें हम फिसल जाते हैं हर साधक इस बात को समझ ले परमार्थ में चलने पर इधर-उधर ताक झाक पड़ोसी बगल वाला साधक क्या करता है अगर यह दोष दर्शन

की वृत्ति रही तो ऐसे नीचे खड़े रहोगे परमार्थ की ऊंचाई पर नहीं चढ़ पाओगे इधर उधर ताक वाला साधक लक्ष्य तक कभी पहुंच ही नहीं सकता सिद्ध महापुरुषों के वचन है साधक को चाहिए कि अपनी दृष्टि केवल अपने लक्ष्य पर रखते हुए लक्ष्य हमारा क्या है सरवान वस्तु तया निरीक्षण सुवारा बुद्धि मेरे भगवान ही सब रूपों में बस सारा नाटक वही कर रहे हैं हम कोय नहीं देखना ये कमी इसमें साधक में है या कमी उस साधक यह गुरु देखे या भगवान देखें सुधार करें हमारा ठेका नहीं है हमारा ठेका है अपनी कमी देखना और भगवान को प्राप्त करना सत्संग अपने लिए होता दूसरों के ऊपर थोपने के लिए नहीं होता दूसरों के दोष दर्शन के लिए नहीं होता वह अपने मन को शासन में लाने के लिए सत्संग होता है साधक जब इस दोष से आगे बढ़ता है यह बहुत जोर का दोष होता है जब इस से आगे साधक बढ़ता है तो उसके जीवन में प्रलोभन आता है जब प्रलोभन से बचता है तो फिर भय आता है बड़े-बड़े भय आते हैं भक्तों के जीवन में फांसी की सजा निश्चित हो गई आग में जलाने निश्चित हो गया जहर

पिला दिया गया क्या क्या जब प्रलोभन और भय से भी आगे निकलता है तब दिव्य सिद्धियां आकाश में उड़ जाओ जहां जिस लोक में जब इनसे भी आगे निकल जाए जीवित मर जाए उलट आप में समाय है दिलगिरी एकदम खाक तब भगवान की प्राप्ति होती है वह संसार चक्र का भेदन करके सच्चिदानंद स्वरूप को प्राप्त कर लेता है वैराग्य दो प्रकार का होता है एक समल वैराग्य और एक विमल वैराग्य संसार प्रतिकूलता को जो घर त्यागा जाता है उसे समल वैराग्य कहते हैं यह समल मल का प्रयोग नहीं होना चाहिए यह

मल है वासना कामना रुपया पैसा हां हमारा भरण पोषण ईश्वर के द्वारा सारे विश्व का करते तो हम जितने बैरागी जन विश्व में है भगवान विश्वंभर सबका भरण पोषण कर रहे लेकिन बहुत सावधानी से मुनिम गिरी करनी है मालिक है भगवान मुनिम है हम तो मुनिम का लेना देना बहुत हिसाब में होना चाहिए हिसाब से चूक हुई तो चूक हो जाएगी बड़ी चूक हो जाएगी तो एक होते हैं वैराग्य लेते हैं यह देख कर के कि हम नौकरी नहीं मिल रही विवाह भी नहीं हुआ खानपान की व्यवस्था बाबा जी बन जाते जिंदगी

नरक हो जाएगी तुम्हारी और दूसरों की बेइज्जती करवाओ कभी ऐसे बाबा जी नहीं बना जाता बाबा जी बना जाता है सब व्यवस्थाएं हैं लेकिन अब मन नहीं लग रहा ऐसा लग रहा है मुझे भगवान चाहिए त इसे विमल वैराग्य कहते हैं अगर समल यह जो समल वैराग्य है इस समल वैराग्य को यदि विमल वैरागी मिल जाए तो वासना हट जाए और निर्मल मार्ग में चल पड़ेगा ऐसा नहीं कि उसका कल्याण नहीं होगा पर है बहुत गड़बड़ वैराग्य के दो रूप है एक समल वैराग्य एक विमल वैराग्य समल वैराग्य होता है कि हर किसी न किसी विषय की अभाव स्थिति में बाबाज बन जाना वैरागी बन बहुत खतरनाक बहुत घटिया जीवन व्यतीत होता बहुत घटिया हम शब्द में कह रहे हैं लाख प्रकार से समझाओ उसको समझ में नहीं आता वह केवल केवल वासना की पूर्ति ऐसे लोगों के द्वारा बहुत अहित होता है संत समाज का क्योंकि उनके अंदर कोई लक्ष्य भगवत प्राप्ति नहीं कोई साधु होता नहीं और वेश साधु होता का वो बहुत तरह से हानि करते हैं और कहे तो संत ही जाएंगे क्योंकि वेष है इसलिए बड़ा अपमान संतो का होता है उनका

लक्ष्य नहीं होता भगवत प्राप्ति उनका लक्ष्य नहीं होता सत मार्ग वो केवल वासनाओं की पूर्ति के बहुत विचित्र होता है यह भी सब देखा है भ्रमण के समय भगवान बड़ी कृपा किए तो सब भ्रमण में साधु पक्का हो जाता है भूख प्यास गर्मी सर्दी मान गाली मार पीट सब कुछ सहना पड़ता है सब सहना पड़ता है उससे परिपक्व हो जाता है तो जो किसी प्रतिकूलता को लेकर वैराग्य होता है व समल वैराग्य होता है यह ज्यादा दिन नहीं यह फसे फसाए य फसी बिल्कुल फस जाते हैं मन जो है यह जब भगवान के लिए व्याकुल हो तब घर छोड़ना चाहिए नहीं तो हम कह रहे कि भले आप लेबरी करके जियो लेकिन बाबा जी मत बनना बाबा जी बनने के लिए एक केवल बात है अब मुझे भगवान चाहिए अब आपको कोई प्राप्त नहीं कर सकता त्रिभुवन में यह बस बात तुम्हारे अंदर बैठ जाए आप समझो केवल दो वर्ष गुरुदेव भगवान 13 14 15 और इसके बाद पधार गए अब पूरा जीवन अनाथ हो गया अब हम किसके सारे चले कैसे चले अब एक भारी भारी विपत्ति भारी अव्यवस्था कि हम पुत्र की तरह जिनकी गोद में बैठकर चल रहे थे वो तो

अंतरध्यान हो गए अब हमको कौन संभाले उस समय श्री भगवान का जो तेज हमारे साथ था हर आपको बताया जब हमारी समस्या आती थी तो संत और आकाश य दो का सानिध्य हो जाता था एकम एक दिन : बजे सुबह तड़ के नहा के से आकाश की तरफ कहा गुरुदेव भगवान अभी तक तो हम निश्चिंत थे आपके बल पर अब तो मुझे मार्ग भी पता नहीं कैसे चलना है पूरा जीवन है कोई साथी नहीं किसी पर भरोसा नहीं हमारा शुरू से किसी पर भरोसा नहीं था भगवत प्रेरणा से भगवत कृपा से एक हमारे दिमाग में बैठ गया था कि भगवान के सिवा गुरुदेव के सिवा इस संसार में कोई सत मार्ग में नहीं चला सकता और गिराने वाला हो सकता है इसलिए कभी हम किसी की सलाह नहीं मानी कभी हम किसी से प्रश्न नहीं किया कभी हम किसी की बात सुनने की चेष्टा नहीं की जो बात गुरु जी ने कही थी उसी को घुमा घुमा करके बार-बार उसी पर चलने की चेष्टा की प्रेरणा आए उतर जाओ गंगा के तीर पर और कभी किसी एक आश्रम में मत रुकना बस भ्रमण करो बस तुरंत मन में आया बस सफीपुर घाट से कूद पड़े गंगा किनारे गीता पूरा फिर और

यहां तक वही सच्चिदानंद परम तत्व घुमा अगर थोड़ा भी कुछ राग लेकर घर से निकलोगे तो फस जाओगे आश्रम व्यवस्था कई जगह भ्रमण में ऐसे प्रलोभन आएगी यहां के महंत बन जाओ ऐसे य जब तक भगवत प्राप्ति नहीं तो राम काज की नहीं बिनु मोही कहा विश्राम समल वैराग्य इस प्राय देखना चाहिए साधक को कि कोई वासना लेकर आए तो फटाफट उसका ऑपरेशन कर डालो गुरुजनों के सानिध्य में सत्संग में नहीं तो यह वासना कहीं न कहीं फसाकर चौपट कर देगी किसी सांसारिक प्रतिकूलता को देख कर के अनुकूलता

पाने के लिए तो बाबा जी नहीं बन गया कोई या अनुकूलता पाने के लिए वैरा का नाटक तो नहीं कर रहा यह बहुत हानिकारक है परमार्थ में आगे नहीं बढ़ने देगा विमल वैराग्य जिसमें विषय शक्ति है पर वह विष शक्ति को मिटाना चाहता है वह तृष्णा रहित होना चाहता व भगवत प्राप्ति करना चाहता व कहीं भी श्राव नहीं मानना चाहता केवल भगवान की प्राप्ति शूरवीर य महान योद्धा सात सा तर सा लोका पार कर देगा जीवन पार कर देगा कोई नहीं परास्त कर सकता दुख दोष यह मिटाने के लिए हम भगवत मार्ग में आते हैं देखिए दुख दोष मिटाने के लिए हम भगवत मार्ग में आते हैं जो उपासक भोगों का रागी होगा सुख सुविधाएं हर्षित ठाकुर को देखकर हर्षित होने का कब तुम्हारा भाव आएगा मन अति हरस जलावन देही आज देखी हो परम अरे विश्व की हर संपत्ति चरणों में फेंक दी जाए तो भी ऐसे उधर देखने की इच्छा न सुरपति नरपति लोकपति जिनके भावे घास रहे परमानंद में तज सब गए सच्चिदानंद का आशिक और छोटी मोटी वस्तुओं में हर्षित हो जाए ऐसा बुरा लगना चाहिए संसार के पद प्रतिष्ठा भोग

सामग्री जैसे तुम्हें कई अरब रुपया का संकल्प बनाया तुम्हें पांच का नोट दिया जाए ये ले पांच कं तो कैसा लगेगा मानो थप्पड़ मारा ऐसे अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक चाहिए तो लोक परलोक के भोग तुम्हें विश्वत लगने चाहिए ब्रह्मा दि के भोग सब विषम लागत ताई नारायण ब्रज चंद की लगन लगी कहीं राजी हो जाए हे साधक सावधान कहीं राजी नहीं अपने को हर समय कसौटी में कसते रहो कोई जान ना पावे सब सुविधा होने पर आप अपने को कसौटी में कसो तुम शरीर नहीं हो तुम मन नहीं हो तुम इंद्री नहीं हो कभी-कभी पूरा दिन भूखे रह गए कोई जान ना पाया और दिनचर्या में फर्क नहीं पड़ना चाहिए दिनचर्या में फर्क पड़े तो तुम साधु नहीं दिनचर्या में फर्क ना पड़े और अपने आप को कभी ऐसे कभी ऐसे और खूब भजन परायण और जब एक समाहित चित्त हो गया भजन से चित्त नहीं हटता तो यह सब खत्म हो जाता है फिर तो जो जैसे प्रभु रखे जोई जोई प्यारो करे सोई मोई भावे पहले कसौटी में कसना चाहिए अपने आप को साधक के लिए सर्वप्रथम अपने नाम और अपने शरीर को भगवान के अर्पित कर देना चाहिए

नहीं नाम रोशन होने की भी एक वासना जागृत हो जाती आगे चलके य जब गर्भ में थे तो कौन सा नाम था तुम्हारा गर्भ में थे तो यह नाम मिला हुआ है जगत से बाहर जो गुरु जी से मिला हुआ वह प्रभु का है नाम जैसे श्यामा सरण श्यामा जू की शरण है यह हमें हर समय याद दिलाता रहता है गुरु जी की कृपा से माधव शरण हर समय हमें याद दिलाता रहता है कि हम प्रभु की शरण में है नाम रोशन हो जाए अरे नाम अपने हृदय में रोशन करो भगवान का नाम का प्रकाश हृदय में करो अपने नाम का नहीं तो कह रहे सर्वप्रथम इस मार्ग में चलने पर यह वासना को पहले ही समर्पित कर दो हमारा नाम संसार मिट गया और गुरु ने रख दिया भागवती अब हमको हर समय ध्यान देना है अगर नाम की जय बोली जाती तो गुरु जी ने दिया है अगर कोई नाम का कीर्तन करता है नाम की पूजा कर गुरु जी ने दिया है हमारा नाम तो गुरु जी के चरणों में समर्पित हो गया था यह तो गुरु प्रदत्त नाम है अगर गुरु प्रदत नाम की भावना को आप देखो तो शुद्ध भगवान का स्वरूप है वोह हरि प्रिया शरण हरि और प्रिया की हम शरण में

है कहां अहंकार की जगह रह गई है बोले जय हरिप्रिया की तो हरिप्रिया की जय बोलिए जय हो हरिप्रिया शरण की तो जय तो उसी की होगी जो हरिप्रिया की शरण में है कहीं भी मलिन और अहंकार का नाम इसीलिए गुरु प्रदत्त नाम होता है उपासना के रंग में डूबने के लिए गुरु जी नाम देते हैं उपासक अपने नाम का पहले समर्पण कर दे अपने नाम रोशन की बात ना रहे और अपने शरीर को समर्पित कर दे जैसे भगवान बहुत आनंद ये भोगी पुरुष क्या जाने बै में क्या आनंद है वैराग्य का आनंद तो कोई वैरागी

जानता है भोगी पुरुष नहीं जानता वो तो उठा ही नहीं है अभी तो कैसे जाने उसी नरक जनित क्लेश में फंसा हुआ है ये नरक जनित क्लेश है तुम इन्ह सब सुख समझते हो अरे सुख जब मिलेगा तो तुम भी उधर से ऐसे घृणित भाव में आ जाओगे जैसे वमन को कोई दोबारा खाना नहीं चाहेगा रमा बिलास राम अनुरागी तजत बमन जिम जन बड़भागी बड़भागी जनों को जो भगवान के भजन में मस्त हुए उनको दिखाई दिया ये सारे भोग वमन के समान विष के समान विषावृक्षम किसानी हो व्यापार हो नौकरी हो चाहे साधना हो सब

साधन है भगवत प्राप्ति का यदि हम भगवत प्राप्ति के लिए भगवत भाव से भगवत समर्पित करते हुए भगवत स्मरण परायण होते हुए करें तो आगे जो सिर्फ भगवान का स्वयं दास है और किसी का दास नहीं बनता और जो ना किसी को अपना दास बनाता है वो इस मार्ग में बहुत जल्दी परिपक्व हो जाता है इसका रहस्य हम सिर्फ भगवान के दास हैं किसी व्यक्ति वस्तु भोग विलासिता पद प्रतिष्ठा इन सबके दास नहीं सिर्फ भगवत दास इसीलिए गुरु जी ने नाम दिया अपनी ठसक रखना चाहिए हम किसी को दास बना नहीं सकते क्योंकि दास को फिर दास बनाने का अधिकार नहीं रहता वो खुद दास है सेवक सुख चा मान भिखारी व्यसनी धन शुभ गति व्यभिचारी हम सेवक है सबसे सेवक धर्म कठोरा हम प्रियालाल के सेवक है तो फिर और जो अनुगामी है व सब श्री जी की सेवा में है श्री जी की सहचर है हम इनके दास हैं जो हमारे को प्रेरणा होगी इनको बोलेंगे ऐसे श्री जी की सेवा करो हमारे दास नहीं हम तो दास प्रिया प्रीतम के ना किसी को दास बनाता है ना किसी का दास बनता है सिर्फ अपने आराध्य देव की दासता में

मगन रहता है वह बहुत जल्दी सिद्ध भगवत दास हो जाता है भगवान का दास किसी अन्य को अपना दास मान ही नहीं सकता यह प्रभु के जन है हमारा कोई संबंध नहीं हमारा प्रभु से संबंध है एक मात्र मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरो ना कोई साधन वह है जो जगत प्रपंच से हटाकर भगवान में लगा दे धन वह है जो भगवान से हटा जगत प्रपंच में लगा दे बड़ा सक्षम रूप से साधना की परिभाषा आप समझ लीजिए यह करना है वह करना हैदा दीजिए यह दीजिए व प्रपंच वो प्रपंच भगवान का भजन छूटा भजन से बढ़ कोई धर्म कार्य बड़ा नहीं है भजन बढ़कर कोई पवित्र तीर्थ नहीं है भजन से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है हर समय मधुर मधुर भगवन नाम चल रहा तुम्हें कोई धर्मा अनुष्ठान की अलग से जरूरत नहीं करो तो बढ़िया है लेकिन जरूरत नहीं है किसी के सहयोग की मांगने की जरूरत नहीं है राधा राधा राधा इसमें हमें किसी सहयोग की और इससे बढ़कर कोई यज्ञ नहीं कोई धर्म नहीं कोई तप नहीं कोई ज्ञान नहीं कोई दान नहीं कई बार सुन चुके हैं साधना जगत प्रपंच से हटाकर जो भगवान में लगावे असा साधना

भगवान से हटाकर जो जगत प्रपंच में लगावे मन में जहां जगत के प्रति थोड़ी भी सत्य बुद्धि है वहां भगवान का प्रकट होना संभव है भी मन जहां जगत में सत्य भाव से लगा है तो असत में सत की भावना कर ली असत में तो सत में सत की भावना कहां रह पाएगी ब्रह्म सत्यम जगन मिथ्या इसमें सत्य है तो केवल भगवान सत्य है नहीं तो य सब नाम रूप जितने आप देख रहे हैं यह पहले नहीं था बाद में नहीं रहेगा बीच में भास रहा है मान लो तो मान लो नहीं तो आखिरी में समझ में आ जाएगा मन पछत है अवसर बीते सुत बनिता द जान स्वार्थ रतना करने सीते अंत तोही त जेंगे पामर त न तज हीते मन पछत है अवसर बीते भक्त का जीवन जीने का उद्देश्य भगवान का भजन भगवान की प्राप्ति संसार पुरुष का जीवन जीने का उद्देश्य भोगों का संग्रह खूब भोगना मर जाना देख लो तुम कौन हो भक्त हो या संसारी हो भगवान के समर्पित जीवन होने पर मन बुद्धि इंद्रिया शरीर त्रिविध भाव त्रिविध गुण सारे द्वंद सब के सब शांत हो जाते हैं मन शांत बुद्धि शांत इंद्रिया शांत शरीर शांत अद्भुत आनंद मान

लो नहीं बुद्धि खराब हो जाएगी भजन नहीं करोगे तो बुद्धि खराब हो जाएगी भेजा गया है भजन के लिए भजन नहीं करोगे तो बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी बहुत दुर्गति बहुत दुर्ग भगवान को समर्पित जीवन निरंतर भजन में जीवन मन शांत बुद्धि शांत इंद्रिया शांत शरीर पवित्र त्रिविध भाव त्रिविध गुण सारे द्वंद शांत भगवान शांताकारम शांत स्वरूप है भक्त भगवान का शांत स्वरूप भजन यही है फाड़ है आत गृहस्थी के अन्न के बड़े-बड़े दान भजन ना करोगे तो फाड़ डालेंगे हाथ बहुत होश में खिलवाड़ ना समझो भगवत मार्ग भगवान अपने भजन करने वालों को समस्त दंद से मुक्त कर देते हैं साधक देखता है केवल केवल निर्मल संबंध भगवान से जितने जितने हृदय में हमारा भगवान का महत्व भरता जाएगा उतने उतने विषय वासना संसार का महत्व खत्म होता जाएगा भजन करो भजन खूब नाम जप अपने हृदय को भजन से भरो राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा राधा तो जब भजन भरोगे तो अंदर गंदगी भरी हुई वह निकलेगी तो घबराना मत कि अरे मन बड़ा चंचल हो रहा बड़ी गंदी बातें आ रही भजन करते समय व सब

गंदगी निकल रही भजन भर रहा है आप ठोस होते जा रहे हो घनी भूत भक्ति आपकी होती चली जा रही है जितने जितने भगवान और भजन हमारे हृदय में भरते जाएंगे उतना उतना संसार और विषय विकार हटता जाएगा अते निरंतर भगवान को जीवन में ऐसा भरो कि अब दूसरे के लिए जगह ना रह जाए भरी सराय रहीम लखि आप पथिक फिर जाए जब हृदय रूपी जो धर्मशाला था उसमें भगवान आकर बैठ गए तोब काम क्रोध लोभ आने की गुंजाइश ही नहीं रह गई भक्त चाह करता है पर भगवान के मिलन की भक्त का दैन्य स्वरूप होता है केवल भगवान से यह धनी मानी नाना प्रकार की भोग सामग्रियों के सामने नहीं दैन्य भूत भविष्य लोक 14 में भए होए हरि प्यारे तीनती स व्यवहार हमारो अभिमान न्यारे जो भोगा शक्त धना अभिमानी पदा भिमानी हमारा कोई संबंध नहीं अभिमान इते न्यारे जहां दैन्य है वहां भगवान है जहां भगवान है हमारा वही दैन्य है अभिमान में नहीं यह तीन चीजें उपासक में बहुत जोर की होती है चाह केवल भगवान की दैन्य केवल भगवान और भगवान के भक्तों से और भरोसा सिर्फ भगवान का तीन बातें यह जहां हो

वहा भगवत प्रेम और भगवान अपने आप प्रकाशित हो जाते हैं मन जगत के भोगों में रहे और सोचो कि तुम भगवान का भजन और भगवान का दर्शन और कोई ऐसी कृपा हो जाए नहीं तुम चिंतन करो भोगों का तुम करो पापा चरण कोई संत महात्मा तुम्हें आशीर्वाद दे दे कि सुखी भव जाओ आशीर्वाद सदैव सुखी रहोगे तो जैसे तुम साधना वाले हो वो आशीर्वाद भी है पक्का समझो सत्य जीवन तुम्हारा तो सच्चिदानंद के लिए आशीर्वाद नहीं मांगना है अपने आप आ जाएगा व सर्वज्ञ है वह सब जा पर कृपा राम की होई ता पर कृपा करे सब कोई राम की कृपा राम की आज्ञा का पालन करना रात दिन भजन में लगे हो संत की दृष्टि पर पड़ी हो गया काम वो आंतरिक दृष्टि होती है उसमें हाथ पैर नहीं ऐसे करने से अगर होना तो हुआ किसी का मन बदला ऐसे तेज थोड़ी साधु का आता है रात दिन भजन कर रहे हो उनकी आज्ञा पर चल रहे हो अब वो श्री जी के चिंतन में तुम्हारा चिंतन आ गया अब गया ये ना कोई कैमरा पकड़ पाएगा ना तुम्हारी दृष्टि पकड़ पाएगी तुम्हारा हृदय पकड़ पाएगा कि ऐसा कैसे हो गया कहां मैं विषय जीव

और कहां ये ऐसा भागवत जीवन यह तो गुरु प्रताप हुआ ये तो संत प्रताप हुआ भगवान जगत के भोगों में रत रहने वाली बुद्धि में मन में नहीं आते मव मन आद म बुद्धि निवेश तो नि मव अर्धम संया मन बुद्धि भगवान में लगाना मैं और मेरे को लेकर जगत में बंधन है अत इस मैं और मेरे को भगवान में जोड़ दो मैं भगवान का दास भगवान मेरे बड़ा आनंद का विषय है यह बिल्कुल अमृतम शब्द है अगर भाई सत्संग के पकड़ ले तो एकदम शुद्ध मार्ग है जो सीधे भगवान से मिलाता है भगवान का प्रेमी भक्त भगवान से एक क्षण भी पृथक नहीं रह सकता वह भगवान के सुमिर में मगन रहता है अगर भगवान कह दे कि भजन छोड़ दो हम दर्शन देने आ रहे तो वह कह देगा कि हमें जरूरत नहीं आपके दर्शन की हम भजन नहीं छोड़ सकते ऐसा भजन से प्रेम होना चाहिए जब कोई अशुभ भोगों का संपर्क मन इंद्रियों से करता है तो भगवान फीके लगने लगते हैं भोग अच्छे लगने लगते हैं और जब कोई भजन में मन और इंद्रियों को सब तो भोग फीके लगते हैं भगवान अच्छे लगने तुमय पसंद करो भगवान को अच्छा पसंद करना चाहते हो

या भोगों को अच्छा तो जैसे कल चर्चा की थी कि उद्देश्य तो बनाते हैं भगवत प्राप्ति का लेकिन रुचि रखते हैं भोगों की जब रुचि और उद्देश्य दोनों एक हो जाएंगे तब हमारी साधना परिपक्व हो जाएगी चित्त का प्रवाह जहां जाता है वही आराधना मानी जाती है माला चल रहा है भगवान के लिए और चित्त जा रहा है भोगों के लिए तो जहां चित्त है उसी की आराधना तो तुम किसकी आराधना करते हो भोगों की चित्त का प्रवाह जहां जा रहा है वही आराधना मानी जाती है जहां मन जा रहा है वही आराधना मानी जाती है भवान की ओर चित्त का प्रवाह तो भगवान की भक्ति और विषय की और चित्त का प्रवाह तो विषय की भक्ति विषयात की प्राप्ति तो काय का हरि भगत बिन यह पूरा संसार भक्ति कर रहा है कोई हरि की भक्ति कर रहा है कोई हरि जो विषय बले हुए विषयात की भक्ति कर रहा है विषयात का परिणाम है दुर्गति हरि की भक्ति का परिणाम है सद्गति भगवान को प्राप्त करने की साधना में चित्त को भगवतम बना देना पड़ता है केवल भगवान का चिंतन मुरारी पादा अर्पित चित्तवृत्ति कैसी मस्त स्थिति

है गोपी जनों की चित्त की दही बेचने जा रहे हैं इतना गाढ़ चिंतन प्रभु का है कि स्मृति में तो यह बात है कि मैं दही बेचने जा रही हूं लेकिन स्मृति गोविंद आकार है भगवद का है तो कहले कोई गोविंद ले ले कोई दामोदर ले ले कोई माधव ले ले तो ब्रजवासी जगा बलिहार देखो कैसी बावरी हो रही गोविंद के प्रेम में कहना चाहती कोई दही ले ले दही तो निकलता है कोई गोविंद ले ले कोई दामोदर ले ले कोई माधव विक्रे तु कामा खिल गोप कन्या मुरारी पादर प चित्तवृत्ति द्या दकम मोह वसाद चद गोविंद दामोदर माधवेति साधना में चित्त को ऐसा बना दिया जाए कि चित्त चोर प्रभु के सिवा चित्त में कुछ रह ना जाए जगत का चिंतन ही ना रह जाए वास्तव में जगत का चिंतन छोड़ना नहीं होता भगवान का चिंतन पकड़ना होता कि जगत अपने आप छूट जाता है इसकी सत्ता ही नहीं नासतो विद्यते भाव ना भाव विद्यते सता इस सत की सत्ता नहीं अपने आप खत्म हो जाती है जैसे अंधेरे में मकान में अंधेरा हटाना है तो अंधेरा हटाने का प्रयास नहीं किया जाता दीपक जलाने का प्रयास किया जाता है

दीपक जला दो अंधेरा अपने आप हट गया तो भजन करने का प्रयास करो संसार अपने आप छूट जाएगा संसार का चिंतन छूट जाएगा जो जगत का चिंतन करता है उसके चित्त में जगत रहता है तो भगवता आनंद का स्पर्श नहीं होता तो भोगानंदीश्वरा कुछ हाथ नहीं लगता बहुत ध्यान देने का विषय पूरा जीवन निकल जाता है और अपने को साधन मार्ग में कहते हैं हमें इतने वर्ष हो गए कोई लाभ नहीं हुआ लाभ क्यों नहीं हुआ क्योंकि बाहरी वेशभूषा तो साधन मार्ग की और चित्त का प्रवाह भोगों में कैसे आपको लाभ मिले जगत किसका नाम है द्वंद का नाम दुनिया द्वंद मान अपमान लाभ हान सुख दुख जय परा जन्म मृत्यु इसी का नाम जगत परस्पर विरोधी वस्तु भाव परिस्थिति इसी का नाम जगत है जैसे मान अपमान निंदा स्तुति सुभ असु मित्र वैरी अनुकूलता प्रतिकूलता जय पराजय ये इसी का नाम जगत है और जो जगत विजय होता है उस पर ना मान का प्रभाव ना अपमान का ना निंदा का ना स्तुति का ना जय का ना पराजय का ना मित्र का ना शत्रु का ना जन्म का ना मृत्यु का यह भजन से स्थिति प्राप्त होती है जब तक

द्वंद पर हमारे ऊपर प्रभाव पड़ रहा है द्वंद का तब तक अभी भजनानंद का अनुभव नहीं हुआ भगवता अंद का अनुभव नहीं हुआ बाहर से कुछ भी बने रहो अंदर से खोखला है जन्म मृत्यु की परंपरा को बंद करने का समय आ गया है उठो जैसे भगवान अर्जुन से कहते उष्ट परंताप में प्रत्यंचा चढ़ा और अपने धर्म का पालन कर मार इनको ऐसे खड़े हो जाओ अब बहुत समय हो गया मोह निद्रा में सोते हुए और सामने शत्रु विराजमान काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर ईर्ष्या द्वेत मार इनको ज्ञान का प्रचंड धनुष लेकर विवेक का बाण संधान कर और मार इनको यह परमार्थ पथ का पथिक शूरवीर योद्धा है जन्म मृत्यु की परंपरा को बंद करने का उपाय एक मात्र भगवत चिंतन संसार का चिंतन दो हर समय राधा राधा राधा हरि हरि कृष्ण कृष्ण हर समय नाम जप य बड़ा आनंद कुछ समय बाद देखना कैसा आनंद उठता है पर आनंद आने नहीं पाता भोगा आनंद में इतना फिसल करके साब क्षीण कर देते हैं कि वो आनंद जो भजन से प्रकट होना चाहिए व आ नहीं पाता इसलिए बहुत समय हो जाता है फिर वही रोना धोना बना रहता है मेरा मन

नहीं लगता यह नहीं होता वो नहीं होता अरे एक बार थोड़ी हिम्मत कर जगत मन से निकला की तत्काल परमानंद की बाढ़ आ गई जगत को निकालना है अपने चित्त से यह स्वयम आपको करना है बारबार चिंतन अभ्यास योग युक्त चेत सा नान्य गामिन चित्त में जितने राग है द्वेष है हर्ष है उद्वेग है क्रोध है इन सबको भजन बल से निकालना है इतना भजन करके अंदर जमा करते रहो खर्चा मत करो इतना ठस जाए कि पुलाई रही ना जाए तो ये राग द्वेष हर्ष शो काम क्रोध इनका प्रवेश ही बंद हो जाएगा भजना नंदी की यही कसौटी है कि उसके चित्त का कितनी देर भगवान में स्थित रहना होता है कितनी देर चिंतन भगवान का यही कसौटी है अंदर ही अंदर देखो तुम कितनी देर टिकते हो भगवान पर भगवान जगत की फसा वाली वस्तुएं अपने भक्तों को बिना मांगे नहीं देते यह बात ध्यान रखना जब बहुत कोई हट कर लेता जैसे छोटा बच्चा कि हमको यह मोटर कार चाहिए जहाज चाहिए तो फिर माता-पिता की वैसे खाने पीने वाली चीज तो है नहीं बेकार के तोड़ देगा पर क्या करें देना पड़ेगा ऐसे ही जो इच्छा करि हो मन माई

हरि प्रसाद कछ दुर्लभ नाही अगर जैसे छोटे बच्चे के लिए कार खिलौने अच्छे लगते हैं ऐसे हमको ये माया के खिलौने अच्छे लगते हैं अगर भगवान से आप हट कर के ना मांगे तो भगवान आपको खिलौने नहीं देंगे भगवान कृपा करके अपना भजन देंगे भक्ति देंगे पर हम लोग ऐसे हैं कि भगवान हमको चाहिए ही अंदर ही अंदर तो फिर कहते लो खेल लो जब उब जाना तब हमारी गोद में आ जाना तो विलंब हो रहा है हमारी तरफ से जब भक्त अड़ जाता है तो भगवान को देना पड़ता है पर भगवान की कृपा य रहती कि देते

हैं खिलौना पर नजर रखते हैं कि कहीं खिलौने से अपना अहित ना कर ले यही खास बात होती भगवान से मांगने पर कि भगवान अगर विषय देते भी हैं तो अपनी दृष्टि रखते हैं जहां यह रोए बस तुरंत हटा दो इस विषय से जहां हो कि अब हमें नहीं तुरंत हटा दो क्योंकि वह तो देना ही नहीं चाहते थे आपने हट करके मांगा है भगवान कभी अपने भक्त को स्वेच्छा से फसावल वाली वस्तुएं देते ही नहीं है जिसका चित् ऐसे भजन में डूब गया है कि अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में भजन का प्रवाह नहीं रुक

रहा है नापो अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में भजन का प्रवाह नहीं रुक रहा है चाहे कोई वस्तु आ जाए या नष्ट हो जाए ना उसे हर्ष होता है ना शोख होता है गुरु जी की प्रसादी मिल गई भगवत प्रसादी वस्त्र मिल गए भगवत प्रसाद अहो भाग्य नाम जप संसार की कोई वस्तु संसार की कोई प्रियता की वस्तु मिले हर्षित नहीं हो हमें तो इस बात में बड़ा आश्चर्य लगता है संसार की कोई वस्तु मिलने पर भक्त को गर्व कैसे हो सकता है जैसे 2000 के नोट एक ट्रक आपको दिए जाए तो आपको गर्व कैसे हो सकता है क्योंकि वो चलते रहे ऐसे ही जब जान लिया कि ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या जब जान लिया कि उमा कहो मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना तो इस सपने की जादूगरी चीजें तुम्हें मिलने पर हर्ष कैसे हो सकता है गर्व कैसे हो सकता है अगर गर्व और हर्ष हो रहा है तो अभी ठिकाने पर तुम नहीं हो ठिकाने पर तो नहीं पक्का फिर क्या मतलब हे साधुओं की मस्ती देखी बड़े-बड़े संतों की मस्ती देखी है बड़े-बड़े संतों की मस्ती देखी कहीं भी किसी भी जगह सांसारिक वस्तुओं पर उनको

हर्षित होते हुए नहीं देखा बड़े-बड़े भोग सामग्री बड़े-बड़े वैभव की तरफ भी उनको हर्षित होते नहीं देखा अनुकूलता प्रतिकूलता विनाश और मिलन दोनों उसके लिए समान भजन अनवरत चल रहा है देख लो हरि ही और गुरु ही आपकी परीक्षा लेंगे इस बात की आपको सांसारिक किसी वस्तु में बहुत अच्छा लगता है जब साधक होता है एक साधक के माता-पिता आए मिलने भी कलही उनके पिता मिले थे वह भी बहुत सुलझे हुए व्यक्तित्व वाले हैं व कहा यहां से है कि यहां अर्जी लगाइए आप प्रार्थना कीजिए तो फिर हमारा जो सेवा विधान है वह आपको आपके परिवार से मिला देगा या परिवार वालों से उस संत को मिला देगा जो य वास कर रहे हैं बहुत कठिन शासन है आप कहीं जा नहीं सकते किसी से मिल नहीं सकते बिना आदेश के तो मिलने गए प्रणाम किया और कहा कि आप हमसे अनुराग रखते हैं ये आपके सौभाग्य का विषय आपका कल्याण होगा लेकिन हम आपसे अनुराग नहीं रखते क्योंकि हम आपसे अनुराग रखेंगे तो हमारा परमार्थ बिगड़ेगा और आपका कल्याण भी नहीं होगा इसलिए आज के बाद हमारी आपकी राधे राधे प्रणाम

किया तुरंत वह खुद उनके पिता बता रहे थे कि थोड़ा हमको लगा कि ऐसा तो हमने भी कहा कि मन में सोचा कि आज के बाद आएंगे महाराज जी से मिल लेंगे लेकिन उससे नहीं मिलेंगे हम कहा द्वेष पूर्वक मत सोचिए वो किस ऊंची बात को बोला आप समझ नहीं पाए कि आपका अनुराग हमसे बार-बार हमारा चिंतन करोगे वृंदावन चिंतन में आएगा तुम्हारा कल्याण हो जाएगा और यदि हम आपसे अनुराग किया ममता किया तो मारे जाएंगे ना तुम्हारा कल्याण होगा ना हमारा कल्याण इसलिए हम जिस मार्ग में चले हैं और वह ऐसा है भी कि दुनिया खड़ी हो दुनिया से मतलब नहीं श्री जी का च तो च हो रहा है और सर झुकाया और निकल गया धन्य है अपने जीवन को ऐसा ही बनाना चाहिए हम जिस मार्ग में चले उसमें ढकोसला पाखंड रहे जब छोड़ दिया तो छोड़ दिया अब आपको भगवान पोषण करेंगे तो बोले हां हम इस गर्व इस बात का गर्व है कि वह सही मार्ग में चलता है पर थोड़ा लगा था कि हमसे प्रेम से बात क्यों नहीं की बोले आज वह भी भ्रम नष्ट हो गया और हम बहुत खुशी हैं बहुत प्रसन्न है जब तक अनुकूलता

प्रतिकूलता हर्षित शोख नहीं इन सब में रंग दो निरंतर भजन परायण चित्त जगत को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता इसको समझा बुझाकर तैयार किया जाता है जैसे उस साधक ने उत्तर दिया हम तुमसे अनुराग करेंगे तो हम भी भ्रष्ट हो जाएंगे तुम्हारा मार्ग भी बाधित हो जाएगा अगर हम प्रभु से अनुराग करेंगे तुम हमसे अनुराग करोगे तुम्हारा काम तो हो जाएगा जिस प्रकार हम पूर्व की ओर जाने की बात करने वाले का मुंह जब पश्चिम की ओर कर दे और फिर दौड़ाया तो क्या कभी पूर्व की ओर पहुंच पाएगा नहीं ऐसे ही हम बातें तो परमार्थ की करते हो चलते संसार की यो गए संसार की तरफ तो हमारा क्या बुद्धि योग भगवान से हो जाएगा हमारा बुद्धि योग विषय भोगों से होगा ज्ञान वैराग्य की बातें करने वाला यदि भोगों को भोगता है और भोगों में मन को दौड़ा है तो ठीक व वैसे जिसे पूर्व की जाने की बात करता दौड़ता पश्चिम की तरफ है हमको ऐसे लोगों से नहीं हम साधकों से बात कर रहे हैं पूज्य भाई जी महाराज कह रहे साधक स्वयं को धोखे में ना रखे बहुत अच्छा लगता है जब कोई

आशिक साधक दिखाई देता है ना भगवान का तो एक दिल में फूलन आते हैं बहुत सुंदर शाबाश चल भगवान का आशीष तुम्हारे साथ है माया का यह प्रपंच प्रवाह तुम्हें रोक नहीं सकता तुम निकल जाओगे बस जिसने ठान ली वही निकल पाता है यहां कोई प्यार दुलार करेगा प्यार दुलार तो सिर्फ हरी का चाहिए सिर्फ परी कहे सब बादशाह हो तुम भगवान के दास हो किसी से मत घ य सब प्यार के कंगाल है प्रेम कहां यहां है प्रेम तो प्रेम समुद्र प्रीति की रीति रंगी लोई जाने हरि ही है बड़ा दुलार करते हैं प्यार की भीख मांगो तो हरि से मांगो जगत में नहीं है जगत में स्वार्थ काम राग आसक्ति मोह प्यार नहीं है प्यार नहीं आप प्यार का नाटक करके परोसा जाता है काम राग मोह आसक्ति प्यार तो सिर्फ हरि से सिर्फ हरी से विश्वास मान लीजिए सुदम सर्भ जवा शांति मती जो जान लेता है कि भगवान सबके सुद परम शांति को प्राप्त अत हमारे प्यार का विषय सिर्फ भगवान विहाय का मानिया सरवान पुमा निहा निर्मम निरंकारा सति बति जो समस्त कामनाओं का त्याग करके निहा किसी से कोई पहा नहीं

रखता किसी से ममता नहीं रखता अहंकार भी नहीं करता वो परम शांति को प्राप्त हो जाता है शांति अंदर है कहीं बाहर से नहीं भगवान अंदर है बाहर खोजो तो ढूंढते चले जाओ कहां मिलेंगे चाहे जहां चले जाओ बैठ जाओ राधा राधा जपो अंदर से पर्दा हटेगा अंदर से त्रिगुण का पर्दा हता योग माया का पर्दा हटा भगवान का साक्षात्कार हुआ हमारा हृदय जैसा है वैसे हम हैं अभी हमारा परिचय क्या है जैसा हृदय है झाक के देखो विषय अभिलाष हृदय तो विषय पुरुष भगवद बिलासी हृदय तो भागवत पुरुष भोगा शक्ति इतनी बध मूल हो रही है कि बार-बार समझाने पर कि असत है फिर भी उसी में मन जा रहा है वृतिया संसार की ओर जा रही छोड़ना नहीं चाहती भगवान में लगना नहीं चाहती इन्ह जबरदस्ती लगाओ डाट फटकार के लगाओ धिक्कार करके लगाओ जगत को छोड़कर भगवान के चिंतन में वृत्तियां जब तक नहीं लगेंगी तब तक शांति नहीं तब तक आनंद नहीं मन भगवान के आने से खिल पड़ेगा जन्म जन्मांतर से भटका गोस्वामी जी कह रहे जा की कृपा लवलेस ते मति मंद तुलसी दास हू पायो परम विश्राम राम समान

प्रभु नाही कह परम विश्राम परम आनंद परम शांति अभी शब्द का अर्थ नहीं समझ पा रहे होंगे परम शांति किसे कहते हैं परम आनंद किसे कहते हैं जहां विश्व में पूरा प्रलयंकारी तांडव हो रहा हो फिर भी तुम्हें दुख नहीं तुम्हारे अंदर अशांति नहीं भय नहीं शोक नहीं उसे परा आनंद कहते हैं महान प्रयाग में भी जो आनंद को बाधित ना कर सके उसे परमानंद कहते हैं उसे भगवन कहते हैं और वो मिलता है चिंतन से ये भोग रूपी खेती में दुख और चिंता शोक और भय रूपी फल लगते हैं देख लीजिए और भजन रूपी खेती में आनंद परमानंद विज्ञानानंद प्रेमानंद घन जो चाहो इसलिए जब तक मृत्यु नहीं आ रही पहले पहले भगवान को प्राप्त कर लो पता नहीं मृत्यु कब आ जाए मृत्यु का कोई भरोसा नहीं बिल्कुल सच्ची समझ लीजिए बिल्कुल सर पर सवार है कब कहां किस समय ढंगा दे कुछ पता नहीं कुछ पता नहीं मृत्यु काल हर समय तैयार है बस सेकंड का इंतजार कर रही हो तुम्हारे आखिरी स्वास का कब कहां कौन सी घटना बनेगी कुछ पता नहीं इसलिए सावधान मरने के पहले पहले भगवत प्राप्ति कर लो कैसे कर

ले जब पता ही नहीं कब मर जाएंगे तो तो अभी राधा राधा बोलते अभी प्राण निकल गए तो अभी भगवत प्राप्ति हो जाएगी जीव भूला है भोगों के चिंतन में इसी चिंतन को संभालने के लिए राधा नाम सर्व समर्थ है राधा राधा राधा राधा ना जाने कब मृत्यु आ जाए हम राधा राधा बोल रहे हैं हमें निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी जो हर समय नाम को पकड़े रहता है कल्याण की चिंता छोड़ दो तुम्हारा कल्याण हो गया नाम ना छूटने पाए इसीलिए हनुमान जी महाराज कह रहे हैं कहा हनुमंत विपत प्रभ सोई जब तोत सुमिरन भजन न होई आज राधा राधा अभी राधा राधा मर जाए अभी भगवत प्राप्ति कोई फर्क की बात नहीं नाम छूटा तो भय का विषय है पता नहीं कौन सा चिंतन आ जाए हमारा शरीर कैसे छूट जाए अरे बिल्कुल सेकंड में मृत्यु होती है सेकंड में सेकंड में कई ऐसी घटनाएं होती सेकंड में मृत्यु होती कोई भरोसा नहीं है आप कल का सत्संग सुन पाएंगे कोई भरोसा नहीं कि हम कल का सत्संग बोल पाएंगे जब हो रहा है बस सुन लो सुना लो इतने काफी है आगे हम बोल पाएंगे भरोसा नहीं आगे आप सुन पाओगे

भरोसा नहीं इसलिए राधा राधा राधा हर क्षण नाम जप करो चित्त को बार-बार विषयों से हटाकर प्रभु में लगाओ किसी का अमंगल अहित मत करो तुम्हारा अमंगल कोई करना चाहे तो मंगल भवन के द्वारा तुम सुरक्षित हो तुम्हारा कोई अमंगल नहीं कर सकता सीम की चाप सके को तासु बड़ रखवार रमा पति जासु इसलिए बड़े रखवार भगवान के आशित रहकर खूब नाम जप करो श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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