जीवनयात्रा | काशी से वृंदावन
श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
लक्ष शर्मा जी उत्तराखंड से राधे-राधे राधे-राधे महाराज जी महाराज जी मैं शिव भक्त हूं शिव शिव जपता हूं महाराज जी मेरा प्रश्न है कि जब आप काशी में थे तो आपने गुरु का चयन कैसे किया अतः गुरु हमें खुद चुनते हैं जब आप वृंदावन आए तो नाम और मंत्र आपके स्वास्थ्य पर वो कैसे परिवर्तित हुआ वैराग्य पंथ से प्रेम मार्ग में क्या पूर्व नाम जप की गणना नए पथ में जुड़ती है इसे नई साधना मानेंगे या पूर्व की ही कैसे बताएं बतावे तो पूरा इतिहास है बचपन से लेके अभी तक का कुछ शब्दों में बता देते हैं कि जैसे हम घर से निकले तो हमारी खोज हुई दो-तीन दिन में सबसे पहले बड़े भाई आए तो उनको कठोर जवाब देकर वापस कर दिया फिर पिता आए पिताजी बहुत कड़क स्वभाव के थे कठोर स्वभाव उनका था शासन बिल्कुल सत्य धर्मा परमात्मा नंगे पैर हल जोतने वाले किसान कभी जूता नहीं पहना कभी सिलेले कपड़े नहीं पहने तो जब वो आए तो हमें लगा कि अब पिटाई होगी क्योंकि वो बहुत कठोर स्वभाव कहा खड़े हो जाओ तो कहा नहीं खड़े होंगे क्योंकि तुम घर ले जाओगे कहा
नहीं खड़े हो जाओ खड़े हो गए तो बोले क्या बात है क्यों भाग आए तुम कहा हम भगवान का भजन करके भगवान को प्राप्त करना चाहते काहे से भगवान की प्राप्ति होती है? मारेमारे घूमने से भगवान की प्राप्ति होती है। भगवान की प्राप्ति तो साधना से होती है और वह गृहस्ती में भी हो सकती है। हम लोग भजन नहीं कर रहे क्या? तो हम कहा हमें ऐसा भजन नहीं करना। हमें विरक्त होकर भजन करना है। तो हम कहा सच्ची बात तो हम रो पड़े। एक तो भय उनका और दूसरा कि हमें घर ना ले जाए। हमें भगवान की प्राप्ति करनी है।
पूर्व जन्म का कुछ ऐसा था कि जो हमें भगवान की प्राप्ति करने का चसका लगा। कोई हम दुख या किसी समस्या से थोड़ी निकले। 11 वर्ष के बालक को क्या दुख नाइंथ क्लास में पढ़ रहे थे तो पिताजी ने ऐसे गले लगाया। राम राम राम वो स्वयं भक्त थे। ऐसे गले लगाया। तीन बार कहा राम राम राम और कहा बेटा ऊसर में बैठोगे तो फूल बरसेंगे। जाओ हमारा आशीर्वाद है। लेकिन जिंदगी में अगर हमने यह सुना कि किसी माई बहन की तरफ तुम्हारी गंदी दृष्टि हुई नहीं गृहस्थी में चलो और भजन करो और अगर बाबा जी बनो तो जीवन में कभी यह शिकायत हमें ना मिले तो उनका वादा करते हैं कभी शिकायत नहीं मिलेगी तो उनका चलो हमारे साथ और उन्होंने पहले सदगुरुदेव भगवान जिन्होंने हमें वरण किया अपने शिष्य के रूप में उनके पास ले गए और स्वयंसी में रहते थे एक पर्णकुटी बनाकर रहते थे मंदिर बना आज भी मंदिर बना हुआ है समसी में गुरु जी से कहा ढूंढ का
देखा बोले कैसे आना हुआ बोले स्वामी जी ये लड़का कह रहा हम बाबा जी बनेंगे उन्होंने कहा कोई बात नहीं एक छोड़ दो एक हफ्ते में भाग के घर आ जाएगा या तो बाबा जी बन जाएगा एक हफ्ते भोजन ना देना हो आश्रम के सब काम करवाना और कठोर नियम और दूसरे को पेड़ा बर्फी बांट रहे हैं हम देख रहे हैं तो हमें ना देना लेकिन हमारे मन में आया कि हमको भगवान की प्राप्ति करनी हमको गुरु जी दे या ना दे एक हफ्ता बाद उन्होंने कहा जाओ गंगा स्नान करके आओ आज तुम्हें मंत्र देंगे फिर उन्होंने हमको शिव मंत्र दिया उसी शिव मंत्र के जप के और गुरु जी ने केवल हमको यही बताया कि बेटा जितना जपोगे उतना ही तुम्हारे अंदर ज्ञान प्राप्त होगा बस हमारे को गुरु जी को वो बात बैठ गई कि मेरा काम है हर समय इसी मंत्र का जप करना तो जब हम अपवित्र होते तो शाम सदा शिव जपते और जब पवित्र होते तो गुरु जी ने जो मंत्र दिया था शिव भगवान का वो मंत्र जपते दो साल में गुरु जी पधार गए फिर अनाथ हो गए क्योंकि परमार्थ का मार्ग चलना बड़ा कठिन है कोई साथी तो चाहिए ना
हमें बताने वाला अभी 13 और दो 15 15 की आयु तो एक संत आते थे सुखदेव आश्रम जी महाराज उनसे हमने कहा महाराज जी हमारी जवानियों की तरफ कदम बढ़ रहे हैं और हमें हमारे गुरु जी अंतर्ध्य हो गए। हम चाहते हैं आप कृपा करें और मुझे आगे का मार्ग फिर उन्होंने आगे का मार्ग महावाक्य और यह दिया तो कुछ ही समय लगभग छ वर्ष सात वर्ष वहां रहे। इसके बाद गंगा का किनारा पकड़ लिया। घोर विरक्ति एक रुपया कभी जीवन में नहीं रखा। ना आज है हमारे पास। ना आज है और ना जीवन में रखा। जैसे जीवन में थे वैसे ही अंतर बस यह हो गया।
पहले एकांत रहते थे अब समाज में रहते हैं। पहले भरण पोषण आकाश वृत्ति के द्वारा होता था। आज भी भरण पोषण आकाश वृत्ति के द्वारा ही होता है। किसी से मांगना नहीं। किस कोई यहां फीस नहीं। अपने आप जो आ जाए उसी से भरण पोषण सबका होता है। भगवान की कृपा से जब काशी पहुंचे तब लगा जीवन का यही स्थान है। आजीवन काशी वास करो। घाटों में घाटों में वास करते थे किसी आश्रम में नहीं ऐसे करने का स्वभाव नहीं था तो जो हमारे सामने आ जाता इसलिए कई कई दिन भूखे रहने पड़ते वो सब कष्ट सहते हुए फिर काशी में ही हमको भगवान की प्रेरणा हुई रास कैसा होगा वृंदावन और वहीं से विधान बना इतने में 20 वर्ष कम से कम व्यतीत हो गए होंगे जितनी बात बता गए सारांश में बता फिर वृंदावन आगमन हुआ।
वृंदावनेश्वरी ने कृपा की और यह उपासना दे दी। तो इसमें मूलत भगवान की ही सब रचना है। हम कहीं कोई खोज नहीं की। हम कहीं कोई चाह नहीं की। आगे से आगे क्या करना है, क्या करना है वह सब करते चले गए। तो हमें लगता है यदि हम गुरु की शरण में हो जाए और वह हमें जो मार्ग बताएं उसके अनुसार हम चले तो आगे हमें जहां पहुंचना है वो आगे आगे सब व्यवस्था भगवान करते जाते हैं। किसका प्रश्न था? तो समझ रहे हो आप? जी दिल्ली से? राधे-राधे। जी इनका भी सेम प्रश्न है। ये कह रहे हैं कि महाराज जी जब आप काशी में ही पूर्णता का अनुभव हो गया था।
तो आपके मुख से सुना है कि भगवत प्राप्ति में किसी के भी दर्शन हो जाते तो राधा रानी के दर्शन वहीं से कर लेते। आप इतने कष्ट में जीवन क्यों व्यतीत किया फिर महाराज जी नहीं राधा रानी के दर्शन की इच्छा ही नहीं थी काशी में नहीं थी जो आनंद मिला वो पूर्णता का था हमारे पास हम बैठे थे आज भी पीपल का पेड़ तुलसी घाट में शांत बैठे थे तो एक संत आए उन्होंने कहा चलो रास देखने भाई जी हनुमान प्रसाद पोतदार जी का अंध विश्वविद्यालय है उसमें मेरा उनका नहीं हमें जरूरत नहीं उन्होंने कहा चलो ना पास हो रही देख लो चल कहा हमें नहीं जरूरत है तो आप हमें डिस्टर्ब क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने कहा एक बार चलो ना तो ऐसा लगा कि ये संत हट कर रहे हैं तो चल देना चाहिए अंदर से भगवान ऐसे ही मतलब कोई हमारी रति नहीं कोई श्रद्धा नहीं क्योंकि सन्यास मार्ग के प्रति जी गए तो दिन में चैतन्य लीला और रात्रि में रास लीला एक दो दिन देखा तो बस ऐसा लगने लगा कि हमारी मांग यही है।
एक महीना देखा तो लगा अब हम जी नहीं पाएंगे। तब हुआ कि चलो वृंदावन रास देखने के लोभ से कि वृंदावन में रास होता रहता है। अब हम रास के बिना जी नहीं सकते। तो हमको ऐसे वृंदावन लाया। हमें यह नहीं था कि मुझे राधा रानी के दर्शन करने हैं या मुझे राधा रानी की उपासना करनी है। ऐसा बिल्कुल नहीं था। हमारा तो बस भगवान शिव में अनन्यता थी और वही आपको शिव जी के दर्शन तो वहीं पर हो गए थे। तो जैसे आपने सत्संग में बताया था तो आपने बताया था कि जब एक बार दर्शन किसी भगवान के हो जाए तो हम चाहेंगे तो किसी भी रूप का चाह सकते हैं।
तो जब आप तो हम चाह कैसे हो? चाह तो वृंदावन ने प्रकट की। वही तो आपको बताना चाहते हैं। प्रियाजू के मिलन की चाह तो वृंदावन ने प्रकट की। प्रिया जी के लाल जी की लीला की चाह तो वृंदावन ने प्रकट की। यह मेरी चाह नहीं थी। यह तो वृंदावन की चाह थी। वृंदावन की चाह विश्वनाथ जी ने प्रकट की। चलो वृंदावन। वृंदावन आए। अब वृंदावन का जब रंग चढ़ा तब यह बात आई। उसमें ऐसा नहीं होता। अच्छा महाराज जी आ गए आप नहीं तो हम सब तो भगवान का
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मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)
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