॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
The Radhavallabh Times श्री हित समाचार भक्त चरित्र · युगल लीला · पद · वाणी · सत्संग
ताज़ा

वाणी,दृष्टि,आहार,श्रवण,मनादि को कैसे सयंम में करें / उद्धव जी के विविध प्रश्नो के उत्तर // 17/02/25

▶ YouTube

पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावन शवरी तैव पदारविंदम प्रेमा मृतक मकरंद रसो घ पूर्णम हृद्य पितम मधुपति स्मर ताप मग्रमस मा आश्रया निर्वा पयत परम शीतल मा शया परम सच्चिदानंद घन प्रेमा अमृत स्वरूप नव निवत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले युगल सरकार प्राणा आराध्य प्राण प्रिय श्री प्रिया प्रीतम जू समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी तरलता श्री यमुना रस रानी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिकर के चरणों में कोटि शह प्रणाम कोटि शह नमन नमस्कार श्री प्रियालाल की कृपा ही हमारी साधना है हमारे अहम में भले बैठ जाए कि मैं बहुत अच्छा साधन करने वाला साधक हूं पर वास्तविक अच्छाई है तो श्री जी की कृपा से है अन्यथा पग पग पर माया अपना प्रभाव दिखा रहे है कभी इंद्रियां मन विषयों की तरफ खींच रहे हैं कभी राग कभी द्वेष कभी ईर्ष्या कभी मत्सर यह सब कूड़ा करकट भरा हुआ है जब हम अपनी तरफ देखते हैं तो ऐसा लगता है भगवत प्राप्ति बहुत दुर्लभ है और जब प्रभु के स्वभाव की तरफ देखते हैं तो लगता है हमारा भी बेड़ा पार हो जाएगा बड़े

कृपालु हैं प्रभु क्षमा कर देंगे हमारे अवगुणों को हमारे दोषों की तरफ ध्यान ना देकर यह मेरा शरणागत है ऐसा मानकर ऐसा जानकर कृपा कर देंगे बस एक यही भरोसा है नहीं तो ऐसी माया की आंधी चल रही है कि पग पग पर कुछ दिखाई नहीं देता केवल विषय दिखाई देते हैं भोग दिखाई देता है मान प्रतिष्ठा दिखाई देती है जो भगवत प्राप्ति में बाधक है वही दिखाई दे रहे हैं जो भगवत प्राप्ति में साधक हैं वह तो हमारी समझ में नहीं आ रहे हमें तो केवल एक कृपा का भरोसा है और वह कृपा का साक्षात स्वरूप है श्री वृंदावन धाम लाडली लाल की कृपा से श्री धाम वृंदावन का आश्रय मिल गया श्रीधाम वृंदावन का वास मिल गया तो चाहे जितना पतित हो उसे निश्चित भगवत कृपा भगवत प्राप्ति करा देती है श्रीपाद प्रबोधा अंद जी महाराज कह रहे राधा पति रति कंदम बृंदावन मेव जीवनम एम त चरणाम बुज रेण रासा मेवा हमा से श्री राधा प्राण पति श्री लाडली लाल श्री राधा उनके प्राण पति लाड़ली लाल जिस धाम में निरंतर विलस हैं उनका निज धाम ये वृंदावन है और वृंदावन जिसका जीवना

आधार है जिसका जीवन वृंदावन बन गया है अर्थात जिसने राधा पति उदार धी श्री प्रिया प्रीतम ज के इस निज महल को अपना जीवन मान लिया है कि अब साधन साध्य य सब वार्ता हमारे बस की नहीं हम तो श्रीधाम वृंदावन के बासी हैं बस राधा राधा राधा राधा तो श्रीपाद कहते हैं वो इतना महान हो जाता है कि मैं उनके चरणों के पराग की प्राप्ति की आशा रखता हूं जिसने अपनी आशा श्रीधाम वृंदावन में समर्पित कर दी और प्राण वृंदावन जीवन वृंदावन सर्वस्व वृंदावन ऐसा स्वीकार कर लिया श्रीपाद

कहते हैं मैं उसके चरणों की रज की आशा करता हूं और प्रार्थना करता ऐसे अखंड वृंदावन वासी का ही मुझे संग प्राप्त हो गण सुख सारिका सु चरिता नि राधा पते त देक परतु तरु लता सद फलिता सराश कमलो पलाद भी रध यत्र श्रीयम तद उत्स कृते मन स्मर त देव वृंदावनम हम ऐसे वृंदावन का स्मरण करते हैं गंत सुख सारिका सु चरिता नि राधा पते जहां के सुख और सारिका श्री राधा वल्लभ लाल के प्रेम चरित्रों का गायन करते हैं जहां के पक्षी वृंदावना धी सर युगल सरकार के लीला चरित्रों का गायन करते हैं जहां की तरु लताएं केवल प्रिया प्रीतम को संतुष्ट करने के लिए परिष्ठ करने के लिए नवम नवम पल्लव नवम नवम पुष्प नवीन नवीन सुगंध यह बिखेरते रहते हैं वृंदावन में शोभा छाई हुई है केवल प्रिया प्रीतम के परिष्ठ के लिए जहां के पक्षी केवल प्रिया प्रीतम का जस गान करते हैं जहां की लताएं सुंदर पत्र पुष्प पराग सुगंध बिखेर रही केवल प्रिया प्रीतम के लिए जहां के सरोवर मानो आनंदित हो रहे हैं ऐसा प्रदर्शन करते हैं नील कमल श्वेत कमल अरुण कमल पीत कमल यह

खिल रहे हैं प्रिया प्रीतम के लिए जहां के सरोवर अपना आनंद कमल के रूप में प्रकट कर रहे हैं ऐसे में श्री धाम वृंदावन का जो निरंतर राधा कांत को अपने आनंद शोभा में मत किए हुए है ऐसे वृंदावन धाम का हम आश्रय लेते हैं ऐसे वृंदावन का हम वास स्वीकार करते हैं और सदैव ऐसे ही वृंदावन की हम शोभा का स्मरण करते हैं नाना केल निकुंज मंडप यते नाना सरो वा पिका रम गुल मलता द्रुम परतो नाना विध शोभते नाना जाति समूल सत खग मगर नाना विलास स्थली प्रोन मिलन मणि रोच स प्रिय कदा यो श वृंदावन अनेक प्रकार की नवीन नवीन निकुंज जहां नवीन शोभा से व्याप्त है कोई लता महल रूप हो गई है कोई लता मंडप रूप हो गई है बड़ी सुंदर सुंदर लताएं आपस में लिपट कर सुंदर सुंदर नव निवृत निकुंज में भवनों का निर्माण कर रहे नाना केलिए निकुंज मंडप यते और नवीन नवीन पुष्पों से खिले हुए बहुत से सरोवर हैं बावड़ी है रमणीय मन को लुभा लेने वाली गुल्म लताएं तर वृक्ष आदि है नाना विधि आनंद में कोला हल करने वाले खग मृग है यहां के कहीं मयूर का झुंड कोला हल कर

रहा कहीं कोकिला कहीं सुख सारिका कहीं हंसा आदि एवं मृग आदि नवीन नवीन शोभा से युक्त वृंदावन स्वर्णिम भूमि और पंक्ति बनाए हुए मृग खड़े हुए प्रिया प्रीतम पधारेंगे उनके दर्शन के लिए नाना प्रकार की लीला स्थली विलास स्थली से युक्त महा ज्योतिर्मय श्री वृंदावन मैं कब ऐसे वृंदावन को देख पाऊ गा जहां नवीन नवीन तरु लताएं मंडप बनाए हुए हैं जहां नवीन पुष्पों की सैया है जहां उस सैया पर विराजमान होकर नवीन नवीन केल कर रहे प्रिया प्रीतम और उसी केल का सुंदर सुख सारि

का गायन कर रहे हैं मयूर के झुंड हंसों के झुंड कोलाहल कर रहे हैं जहा मृग मंडली प्रियालाल के दर्शन के लिए अपने नेत्र एकटक अपलक लगाए हुए हैं ऐसे वृंदावन की शोभा ऐसे वृंदावन को मैं कब देख पाऊंगा पूज्य पाद पंडित गया प्रसाद जी महाराज महामहिम पूज्य पाद शी उड़िया बाबा के कृपा पात्र है एक एकक शब्द साधक के लिए अमृत है यदि ध्यान पूर्वक सुना जाए और उसे अपने जीवन में उतारा जाए संयम जो इन बातों को अपने जीवन में उतार लेता है उसे संयमी पुरुष कहते हैं संयमी साधक कौन है जो आगे बताई जाने वाली बातों को अपने जीवन में उतारे संयम पहले वाणी का फिर दृष्टि का फिर आहार का फिर श्रवण का फिर नेत्र का फिर मन का ऐसे आगे वर्णन कर रहे एक एक को बड़े ध्यान से सुनो वाणी का संयम वाणी सदैव संभारिक बोन कह अनुचित शब्द ना निकल जाए ऐसो ध्यान रखन वाणी का संयम वाणी को संभार के बोलनो कह अनुचित शब्द ना निक जाए ऐसो ध्यान रखन कम बोलनो सत्य बोलनो मृदु बोलनो ओ हित कर वाक्य ही मुख स उच्चारण करनो क कैसी परिस्थिति आ जाए काह सो कठोर वचन नहीं

बोलनो यह वाणी का संयम है कम बोलना हितकर बोलना मृद बोलना सत्य बोलना और मौन रहना यह वाणी का संयम मौन रहो बोलना है तो कम बोलो सत्य बोलो हितकर बोलो मीठा बोलो जिससे दूसरे को सुख प्राप्त हो दृष्टि का संयम नेत्र का जो हम देखने की हमारी दृष्टि है उसका संयम बहुत संभल के आंख खोलन दृष्टि बहुत संभार के डालन काहु स्त्री के शरीर पर दृष्टि ना पड़ जाए कहीं कोई पशु पक्षी मैथुन कर रहा है उस पर दृष्टि ना पड़ जाए नेत्र झुका के रखन जब चले तो नेत्र झुका के चले इतने में आसपास सब दिखाई देता है ऐसे करना तो बहुत संभाल के करना कहीं किसी ऐसे जीवों पर दृष्टि ना पड़ जाए जो मैथुन संयोग कर रहे हैं अगर एक बार दृष्टि चली जाए तो दोबारा दृष्टि ना जाए अब सोचो शास्त्र मना करता है ऐसा और जो मोबाइल से गंदी बातें देखते उनकी दुर्दशा क्या होगी बहुत बचा के रखना है अपनी दृष्टि को नेत्र जितने चंचल करोगे उतनी तुम्हारी दृष्टि की शक्ति जाती रहेगी मार्ग में चलते समय इत उत को न झाक नो सीध देखलो काह जीव पर पैर ना पड़ जाए यह दृष्टि को

संयम है नेत्रण को ठीक संयम यही है भक्तन के दर्शन करो भगवान के श्री विग्रह के दर्शन करो भक्त भगवान के चरित्र पढ़ो इ से अश्लील बातें मत पढ़ो अश्लील चित्र मत देखो ज ग्रंथ में काहू की निंदा लिखी हो किसी आचार्य किसी महापुरुष वह ग्रंथ वह वाणी वह किताब हमें नहीं पढ़नी खंडन लिखे होए ऐसी पोथी नहीं पढ़नी संतन के वाक्य नेत्रण से देख के पढ़ो संत भक्त भगवत विग्रह के दर्शन करो और अश्लील चित्रण के देखे से अपने नेत्रण को बचाओ ये तुम्हारे दृष्टि और नेत्र का संयम अब आहार का संयम आहार उतन ही करनो जितने में भूख मिट जाए भूख तो मिट जाएगी लेकिन स्वाद दृष्टि से जो अधिक पाया जाता है वह भजन के लिए हानिकारक है इसीलिए ज्यादा स्वादिष्ट पदार्थ ना पावे नहीं तो अगर जबान से स्वादिष्ट पदार्थ पाओगे तो फिर और मन चंचल हो जाएगा रूखा सूखा खाए के ठंडा पानी पियो देख पराई चुपड़ी मत ललचावे जीव कुछ नहीं रखा व बस दो अंगुल जवान है इसी में जितनी देर टिका टिका गले के नीचे गया सब बेकार यहीं तक का स्वाद है तो थोड़ी देर हिम्मत करके स्वाद

का त्याग करके प्रसाद रूप उतना ही आहार करो जितनी तुम्हारी भूख है दो रोटी हम और पा सकते हैं ऐसी स्थिति में बंद कर दो जैसे चार पाते हो तो दो रोटी पाओ फिर शाम के दो रोटी पा लो प्राणों का पोषण करना है कोई पह वानी तो नहीं करनी ना हमें प्राण सूक्ष्म करने हैं प्राण स्थूल निर्बल होते हैं सूक्ष्म प्राण बलवान होते हैं तो आहार उतन ही करनो जितने में उदर पूर्ति हो जाए आहार सात्विक करनो हितक करनो हल्को आहार करनो सहज में पच जाए और कम पैसे का हो आहार पर देखना है सात्विक हो हितकारी हो पचने में हल्का हो और पैसे कम लगे हो ऐसा आहार करो तो हमको ये गणित लगा के पानी है ये कम पैसे वाला भोजन होना चाहिए दाल एक कटोरी दो तीन रोटी पा ली थोड़ा सलाद पा लिया थोड़ी सब्जी पा ली हो गया बहुत स्वस्थ रहने के लिए सात्विक भोजन है ये मीठा एक पीस 24 घंटे में एक पीस मीठा बहुत 50 ग्राम नहीं तो जो शुगर है वह रोटी में भी होती है शुगर हर पदार्थ में होती है तो अपना शरीर के लिए जो शुगर चाहिए व ले लेती सब पदार्थों से तो अगर स्वाद के लिए

भी पाना तो प्रसाद रूप एक मीठा अगर ठीक से चलोगे तो शुगर नहीं होगी अगर शुगर हो गई तो फिर आधा जीवन नष्ट हो गया सावधानी हुई तो पूरा जीवन नष्ट हो गया शुगर लीवर किडनी इन पर प्रहार करती है कोई साधारण रोग नहीं पूरा जीवन खोखला कर देती है इसलिए मीठा खाने से बचो ज्यादा मीठा रजोगुण उत्पन्न करता है थोड़ा मीठा सतोगुण होता है हम उन साधकों से प्रार्थना करते हैं कि कल फिर पाना है इतना ध्यान रखो आज पा के नहीं परम पद में पहुंच जाना है भजन में तब मन लगता है जब सात वृति होती दो रोटी पाई थोड़ी दाल प्राणों का पोषण है प्राणों का पोषण करना है खूब भजन करना भजन से बल प्राप्त करना है अपना भारत पवित्र देश है बहुत धर्मशील है अ व गंदी गंदी बातें देश विदेशों की इधर आ गई हैं तो वह सब खानपान आहार संयम सब कल एक सज्जन बता रहे थे कि आपको पता नहीं होगा महाराज जी आजकल 8 लोग रात्रि में जगते हैं और दिन में सोते हैं अब तो कितना सुंदर समय है दिन का प्रातः कालीन चार से लेकर के ब्रह्म मुहूर्त में उठो संध्या वंदन करो नाम जप करो

व्यायाम करो और दिन में अपने कार्यशील रहो रात में 10 से 3 बजे तक सो जाओ 11 12 एक दो तीन पा अगर 4 बजे तक सो जाओ तो 6 घंटे हो गए बढ़िया समय तु कहा रात में करते क्या है बोले नशा व्यभिचार यही सब गंदी बातें करते जीवन बर्बाद जीवन बर्बाद हम क काहे को जीवन बर्बाद कर इतना उत्तम मनुष्य जीवन भगवत भजन करके लोक परलोक सब चमका दे हो तोय आहार बुद्धि भ्रष्ट करता है शरीर की रक्षा के लिए भोजन किया जाता है जिव्या के स्वाद के लिए नहीं गरमागरम धुआ निकलता हुआ भोजन पाने से चाहे जितना सात्विक भोजन हो तमोगुण हो जाता है नहीं पाना चाहिए ऐसे लोग पाते देखते हैं जल रही जवान अब यह कोई स्वाद है जवान में नहीं रखा जा रहा ऐसे ऐसे कर रहे हो अरे थोड़ा ठहर जाए यार कोई उठा थोड़ी ले जाएगा थोड़ा राधा राधा नाम जप कर थोड़ा ठंडा हो जाए धुआ निकल जाए फिर पा धुआ निकलता हुआ भोजन नहीं पाना चाहिए अपने को धुआ वाला तो मिल ही नहीं सकता है क्योंकि गरम गरम अनुकूल भोग तो पहले प्रियालाल को प्रिया लाल के बाद जो प्रसाद मिलेगा वह अद्भुत स्वादिष्ट

उष्टा मृत भुक्त व गरमागरम तो पाई नहीं सकते ना प्रियालाल को अर्पित करके पाना है जिव्या के स्वाद के विचार स कोई आहार ना करनो बहुत गर्म भारी भर कंप जो तला हुआ है यह सा इसको साधक ना खाए ज्यादा य समोसा है पूड़ी है चौड़ी है हलवा है गुलाब जामुन है लड्डू है जलेबी है इमरती है आहार सरनो लाल मिर्च खटाई ज्यादा मिठाई उत्तेजक बासी भोजन वैसे भूख रखने का अभ्यास बनाना चाहिए एक दो दिन बिल्कुल कुछ नहीं खाया खुब भजन डट के हो रहा है और कोई जान नहीं पाया ऐसा अभ्यास रखना चाहिए कभी भोजन पाके भी कभी बिना भोजन के भी भजन का अभ्यास करें कभी कोई नशा ना करें भोजन करते समय विशेष सावधानी यह है कि उस समय का विचार आपके 24 घंटा के लिए आहार के साथ जा रहा है विचार तो किसी की गुस्सा वाली बात ना याद करें कोई काम भोग वाली बात ना याद करें कोई गंदे विषय याद ना करें उस समय जरूर पद चिंतन करें या नाम जप करते हुए आराम आराम से कोई भागम भाग नहीं पड़ा है आराम आराम से भोजन पाओ पर इतना आराम से भी नहीं कि डेढ़ घंटा सवा घंटा दो पंक्ति उठ

गई आराम आराम से पा रहे हैं कितना पाना है दो रोटी तीन रोटी 15 मिनट 20 मिनट बढ़िया अच्छे से पाने में 15 मिनट 20 मिनट 30 मिनट लंबा आहार एकएक कवल कम करते जाओ तो आप कुछ दिन देखोगे थोड़े आहार में आपका काम चल जाएगा शरीर में स्फूर्ति रहेगी शरीर वैसे ही रहेगा और एकएक कवल बढ़ाते चले जाओ तो देखो लंबा आहार होने लगेगा बल घटने लगेगा वो प्रमाद स्थिति आने लगेगी शयन मतलब नींद और भोजन इन दो को बहुत कम किया जा सकता है बहुत बढ़ाया जा सकता है अगर रोज हम आधा घंटा नाम जब अपना बढ़ाते रहे तो 24 घंटे भजन कर सकते हैं रोज हम 10 पाच मिनट ज्यादा सोते रहे तो 24 घंटे सोने का अभ्यास कर सकते नहाया खाया सो गए और अगर आहार का अभ्यास अधिक बढ़ा लो तो तीन-तीन बार चारचार बार लोग तो दो दो घंटे में पाते हैं आहार के लिए नियम है एक बार 24 घंटे में या दो बार यह 14 बार पाना साधक का लक्षण नहीं है जब जो आया मुह चल रहा है देख रहे हैं सदैव पवित्र विचार करते हुए ना जप करते हुए भोजन पावे भोजन के समय काह सो क्रोध ना करें ऐसे कर सो भोजन को

रस बनवे की अपेक्षा भोजन विष हो जाए शरीर में नाना प्रकार की विकृति पैदा करें साथ ही आसो भाव और रक्त दोनों दूषित हो जाए तो भोजन करते समय कभी किसी से क्रोध ना करें कबहु श्री भगवत असर्प आहार ग्रहण ना करें जो भगवान को भोग लगाया गया व कभी अलग से ना पावे जो भगवान को भोग लगा वही प्रसाद पावे और बड़ी महिमा है यह निष्ठा रखने की एक अंगद जी नाम के महा भागवत हुए हैं वैसे वह स्वभाव से तो पहले नास्तिक प्रवृत्ति के थे उनकी जो पत्नी थी व बड़ी भागवत थी और संतों की सेवा उनके मायके में होती रहती थी और सदगुरु का वर्ण वो हुए थी और जब अंगद जी के साथ ब्याह हुआ तो य राजा के चाचा थे पूरा राज वैभव था पर किसी संत का वहां दर्शन भी नहीं कर सकते किसी का आना जाना नहीं कोई भगवत चर्चा नहीं कोई सत्संग नहीं तो जो रानी थी व बहुत व्याकुल हो गई कि हमें तो रोज संतों का उच्छिष्ट घर में मिलता था सतगुरु देव भगवान के प्राया दर्शन होते रहते थे यहां तो बिल्कुल भक्ति स कोई भी लक्षण नहीं पर अंगद जी की एक महिमा वाली बात बन गई अपनी पत्नी

को भगवत भक्त जानकर बहुत श्रद्धा करते थे विरोध नहीं करते थे पत्नी का पर कोई भी भक्ति का आचरण उनमें नहीं था और ना किसी संत महात्मा के प्रति उनकी कोई श्रद्धा थी ना व भगवान की कोई आराधना करते थे जब काफी दिन हो गए संतों के दर्शन में तो व्याकुलता हुई रानी को अंगद जी की पत्नी को और माइके पत्र लिखा और माइके से प्रार्थना करवाई कि हमारे जो सदगुरु देव भगवान उनसे प्रार्थना कर दो कि एक बार करुणा करके आप यहां आए और दर्शन दे दे क्योंकि मैं यहां से निकल नहीं सकती आपके दर्शन हेतु क्योंकि हमारे पति में बिल्कुल संतों के प्रति श्रद्धा नहीं गुरुदेव भगवान को जब मायके के राज परिवार ने प्रार्थना की तो संत तो करुणामय होते हैं संत सरल चित जगत हित जान स्वभाव सनेह उनका स्वभाव उनका प्रेम एक अलौकिक होता है आप 100 गाली दो फिर मिलो तो वैसे ही मिलेंगे यह गाली दिया है ऐसा कभी नहीं सोच सकते हो जो ऐसा सोच कर मिलते हैं कि तो गाली देने वाला है अभी साधु नहीं आई है साधु का मतलब है जो गाली दे अपमान करे जब आवे तो उसे गले

लगावे उसे सम्मान दे ऐसे जैसे अपने प्रियजनों से मिला जाता जब गुरुदेव आए तो रानी तो नाच पड़ी मेरे गुरुदेव भगवान आ गए चरणामृत उतारा चरणामृत पान की आरती उतारी भोग पवाया गुरुदेव आसन पर बैठे तो धीरे-धीरे चरण दबा रही थी इतने में अंगत जी आ गए मेरी रानी और किसी संत के पैर पकड़े हुए वो आते ही संत भगवान से बिगड़ गए रानी के तो होश उड़ गए कि इतनी प्रार्थना पर तो गुरुदेव भगवान आए हैं और ये सीधे गुरुदेव का अपमान उन्होंने रानी की तरफ कहा बेटा आप शांत रहना उठे और

चल पड़े अब रानी ने कहा कि मैं अपना जीवन नहीं रखूंगी जब गुरुदेव भगवान का अपमान कर दिया तो ना तेरा स्पर्श करूंगी और ना तेरे से संभाषण करूंगी ना तेरे घर का एक अन्न ना एक जल और अपने शरीर को नष्ट कर दूंगी क्योंकि मेरे बुलाने पर मेरे गुरुदेव का अपमान हुआ गुरुदेव का अपमान तो मेरा जीवन नहीं छोड़ दिया अन और अंगद जी बहुत आसक्त थे अपनी पत्नी पर उनका हृदय बड़ व्याकुल हो गया अ अन्न जल सब छोड़े जब कई दिन हो गए तो अंगत जी चरण पकड़ लिए पत्नी के और कहा तुम जानती हूं मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता तुम मुझे आज्ञा करो तुम कैसे प्रसन्न हो गी तो बोले जाओ हमारे गुरुदेव भगवान के चरण पकड़ो उनको मनाकर लाओ और यहां उनको भोग पवाओ यदि वह भोग यहां आकर पा ले तो फिर हम उनका उच्छिष्ट पाएंगे और फिर हम जैसी हमारी दिनचर्या थी वैसे चलने लगेगी अंगत जी भक्ति से नहीं गए पत्नी के प्रति आसक्त होने के कारण वह संत के पास गए चरण पकड़ा संतो को तो कह रहे ना कितनी बार उनका अपमान करो फिर जाकर दंडवत कर दे तो वैसे मिलेंगे विमुख भए निमिस

ना अ कृपा जब चित तब वैसे हमारे स्वामी का स्वभाव है ऐसे संतों का स्वभाव है वो सहज आ गए कोई ज्यादा मनाना नहीं पड़ा चमत्कार जेही आए दोनों ने मिलकर चरण धोए भोग लगाया और यह सब अंगत जी भक्ति से नहीं कर रहे पत्नी प्रसन्न हो जाए और ही गुरुदेव का उच्छिष्ट चरणामृत गया पश्चाताप होने लगा मैं कितना नास्तिक हूं संतो के प्रति ऐसा भाव करता हूं कितने कृपालु संत है अब बुद्धि जो विपरीत चिंतन करती थी व अनुकूल चिंतन करने लगी पत्नी से कहा आज तक का जीवन हमारा व्यर्थ गया अब मुझे बताओ भक्ति कैसे करनी है ठाकुर सेवा में सहयोग देने लगे अंगत जी और बिना भोग लगाए अब कुछ नहीं पाते वर्षों से अब यही दिनचर्या उनकी चलने लगी ठाकुर जी को भोग लगाना भोग लगा केर ही प्रसाद पाना पत्नी की भक्ति की पूरी अनुकूलता चार पार्षद लगा दिए जहां संत दिखाई दे उनको रोज घर में बुलाकर लाओ भोग लगाओ राजा अंगद जी का भतीजा था व अंगत जी बहुत वीर पुरुष थे तो एक जगह किसी राजा के हा चढ़ाई की तो उसका मुकुट जीत कर लाए थे उसमें 101 हीरे थे एक हीरा ऐसा

कीमती था जो अमूल्य था अंगत जी को पहचान थी शेष हीरे तो राजा को दे दिए जो विजय करके लाए थे एक हीरा ले लिया और कहा यह हीरा जगन्नाथ जी के मुकुट पर लगेगा राजा को जहरी ने और मंत्री ने मिलकर बताया कि उस हीरे की कीमत तुम्हारा पूरा खजाना नहीं तो राजा ने विनय की कि वह हीरा हमें दे दो तो उन्होंने कहा नहीं वो हीरा तो हमने जगन्नाथ जी को दे दिया बुद्धि बदलने में देर नहीं लगती राजा की बुद्धि में अंगत जी को मार दिया जाए यब चाचा थे तो वैसे मारेंगे तो निंदा होगी तो उन्होंने जो रसोई बनाने वाली थी उनको अपने पक्ष में किया और वह अंगद जी की बहन ही थी क्योंकि राज परिवार में बहुत विश्वसनीय के द्वारा रसोई तैयार की जाती है वही रो रई तैयार करती थी उनसे कहा कि तुम जितना धन कहोगी मैं दूंगा और तुम्हारी सेवका छूट जाएगी तुम अंगत जी के भोजन में जहर मिला दो और जहर लाकर दिया अपने सामने भोजन में मिलवा दिया अब अंगत जी को पता नहीं था ठाकुर जी का भोग लगा भोग लगा के सन किया जब पाने बैठते तो जो बहन रसोई बनाती थी उसकी एक बिटिया

थी वो उसको बुलाकर साथ आते थे तो आज वो गायब कर दी थी क्योंकि वो बुलाएंगे उसमें जहर है तो उनका बिटिया कहां है बोले कहीं खेलने चली गई बोले नहीं जब तक वह नहीं आएगी तब तक हम भोजन नहीं पाएंगे इस बात का प्रभाव उस बहन पर पड़ा कि मेरी पुत्री से इतना प्रेम तो उनका भैया भोजन मत पाना उ कहा क्यों उन्होने कहा राजा ने मुझे प्रेरित करके प्रलोभन कर दिया मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई इसमें मैंने जहर मिला दिया है आपके लिए तो उका आपने ठाकुर जी को भोग लगा दिया मैं जहर का भोजन ठाकुर जी को लगा दिया ठाकुर जी पा लिए अब मैं कैसे हटा सकता हूं और अंगद जी ने पूरा भोजन पा लिया चाट कर पा लिया कोई भी प्रभाव जहर का अंगद जी के ऊपर बिल्कुल नहीं पड़ा स्वस्थ एकदम कोई प्रभाव नहीं प्रसाद तो यहां पूज्य पंडित गया प्रसाद जी महाराज कह रहे अमर्पित भोजन कभी मत पाना जब पाओ तो ठाकुर जी का प्रसाद मान लो ऐसी जगह कहीं आप हो जहां ठाकुर सेवा नहीं है और आपके सामने भोजन आ गया है तो आप उस समय एक मिनट आंख मदो अपने इष्ट देव का ध्यान करो और प्रभु को

अर्पित करके फिर नाम जप करो दो चार बार और जय हो प्रभु की जय करके अर्पित करके पाओ बिना प्रभु को अर्पित किए पानी भी मत पियो तो तुम्हारी बुद्धि शु हो जाएगी वाणी का संयम दृष्टि नेत्र का संयम और आहार का संयम अब श्रवण का संयम श्रवण इद्री से सावधान रहो कि किसी संत की निंदा सुनने को ना मिल जाए अगर कहीं संत भक्त भगवान की निंदा हो रही है तो य सिद्धांत है कान में अंगुली कस के ठास लो आवाज सुनाई ना दे और आप उच्च स्वर से नाम बोलो राधा राधा राधा राधा राधा और वहां से चल दो ऐसा ही करना चाहिए नहीं तो परनिंदा के कहेते आवत नहीं कछु हाथ मूर्ख पर्वत पाप को ले चल अपने साथ तो पराई निंदा नहीं सुननी चाहिए संत भक्तों की निंदा नहीं सुननी चाहिए भगवान की किसी भी रूप की निंदा नहीं सुननी चाहिए संत शभु श्री पद अपवा जहां संतों का भगवान शंकर का भगवान श्री हरि का कहीं निंदा हो रही हो तो वहां मर्यादा है कि कान में अंगुली डालो उस सभा का त्याग कर दो या उसका विरोध करके उसकी जबान बंद कर दो तो श्रवण इद्री से कभी किसी की निंदा

ना सुने भगवान के पावन चरित्रों को सुने भक्त चरित्रों को सुने काह की प्रशंसा होती हुए तो सुने पर काह की निंदा नहीं सुननी अश्लील गाने नहीं सुनने अश्लील बातें नहीं सुन और अपनी प्रशंसा नहीं सुननी जब कोई तुम्हारे सामने तुम्हारी प्रशंसा करने लगे तो राधा राधा राधा बंद करो काहे को बात करते हो तुम हम कितने नीच है तुमको क्या पता केवल तुम बाहरी बातें देख रहे हो ऐसे कह के अपने आप को बचा लेना चाहिए यदि सामने वाला प्रशंसा कर रहा है और आप खुशी खुशी सुन रहे तो आपके पुण्य नष्ट हो रहे हैं आपका भगवत मार्ग बाधित हो रहा है जो पाप लगे है पर निंदा करवे में वाही पाप लगे है अपनी प्रशंसा करवे में जो पाप लगे है पर निंदा करवे में वाही पाप लगे है अपने मुख से अपनी प्रशंसा करवे में अपनी प्रशंसा सुनवेनो अंदर भगवन नाम उच्चारण करे उसी को सुने यह श्रवण इद्री को संयम भयो मन मन में विषय संबंधी संकल्प ना उठनता मन का काम है संकल्प बनाना भोगों का ऐसे से ऐसा किया जाए अब ऐसे से ऐसा किया जाए मन में विषय संबंधी संकल्प ना उठनता

काह को अनिष्ट चिंतन ना होन पावे जब जब मन में चित गलत संकल्प उठबे लगे तब तक भगवान का स्मरण जोर-जोर से शुरू कर राधा राधा राधा उस समय मौन मत रहो नहीं तो मन घसीट लेगा आपको भगवान की बड़ी कृपा है श्री प्राणनाथ ठाकुर जी हमारे ऊपर बड़ी कृपा किए हैं मैं ऐसी गंदी बात कैसे सोच सकता हूं मु को मनुष्य जन्म दियो विद्या अध्ययन करायो उत्तम संग दियो अब हमें चाहिए कि सदैव सावधान होक उनको भजन करें अच्छी बातें सोचे गंदी बातें गंदा चिंतन गंदा संकल्प उठने ही ना पावे यह

भावना उचित नाए जो बैठे-बैठे गंदी बातें सोचते हैं अतः प्रेम प्राप्ति के ताए काह शास्त्र में और काह संत में प्रगा श्रद्धा कर लेनी चाहिए किसी एक संत में आदर्श भावना करके पूरा का पूरा समर्पण कर दो किसी एक ग्रंथ को किसी एक संत को किसी एक पंथ को किसी एक मंत्र को किसी एक कंत को तो वह सांगोपांग उपासना कही जाए शीघ्र से शीघ्र काहु संत में प्रगड़ श्रद्धा कर लेनो प्रगा श्रद्धा उनकी आज्ञा के विरुद्ध हम नहीं चलेंगे श्रद्धा ही साधक को साधु बनावे हैं श्रद्धा ही साधक को सुदृढ़ साधक बनावे हैं श्रद्धावन साधक को चाहिए कि श्री सदगुरुदेव भगवान में साधारण मनुष्य बुद्धि ना करें श्री सदगुरुदेव और भगवान अभेद मानो गयो गुरु गोविंद न भेद कराई यह दृढ़ भाव बन जाए कि मेरे कारण जो निराकार ब्रह्म है वह गुरुदेव के रूप में साकार आए हैं यदि विचार करके देखो जाए तो ज्ञान वैराग्य एवं प्रेम देवह श्रद्धा के ही फल है श्रद्धा जितनी आवश्यक है उतनी ही दुर्लभ है अगर श्रद्धा आ गई है तो संभालो बहुत बड़ा धन है गुरु के प्रति श्रद्धा

भगवान के प्रति श्रद्धा यह शिथिल ना बनन पावे श्रद्धा को दिनवा दिन सुदृढ़ बनाते रहन ही तो साधना है स्वभाव में कठोरता ना छू जाए तब प्रेम देव प्रकट होए प्रेम देव अत्यंत मृदु है अत इनके निवास स्थान हृदय को अत्यंत कोमल बनानो है सरल बनावे सत्यता स परिपूर्ण बनावे कोई विकार हृदय में रहन ही ना पावे यह माने है कि यह काम जीव के ताए सुगम नहीं है तथापि यह परम आवश्यक है प्रेम प्राप्ति के इच्छुक को हृदय अति निर्मल एवं सरल बनानो ही प्रोगो उपाय केवल एक ही है गुरुदेव में श्रद्धा दृढ़ श्रद्धा गुरुदेव में पूरी तत्परता के साथ लगन के साथ उनकी आज्ञा पालन की वृत्ति जो गुरुदेव कहे वही करना यदि काह साधक ने श्रद्धा दृढ़ बनाए ल तो आगे की समस्त उपलब्धियां सरल हो जाएंगी साची श्रद्धा होए बे प अपने विचार बंद हो जाए हैं केवल शास्त्र और संत आज्ञा में जीवन रह जाए तब पाप बन ही ना सके कारण स्पष्ट है जो करेगो शास्त्र संत की आज्ञा से करेगो वाही को उत्थान ही उत्थान तो वाणी का संयम दृष्टि नेत्र का संयम आहार का संयम मन का

संयम यह संयम रखते हुए सदगुरुदेव में अपार श्रद्धा निरंतर नाम जप श्रवण इद्री का संयम कुछ इधर उधर की बातें ना सुनना तो हमारे हृदय में प्रेम प्रकाशित हो जाएगा श्रीमद् भागवत महापुराण भगवान श्री कृष्ण चंद्र ज उ जी को उपदेश करते हैं उद्धव जी ने बहुत से प्रश्न किए थे संयम किसे कहते हैं यम किसे कहते हैं नियम किसे कहते हैं सम किसे कहते हैं धम किसे कहते हैं धैर्य किसे कहते हैं तितिक्षा किसे कहते बहुत से प्रश्न कल किए थे भगवान श्री कृष्ण चंद्र जो उसका उत्तर देते हैं बहुत ध्यान से सुनो बुद्धि का भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी कह रहे मुझ में लग जाना सम है जब बुद्धि भगवान में लग गई तो समरूपी सद्गुण आप में आ गया इंद्रियों का संयम होना इंद्रियों को जीत लेना यह दम कहते दम तुम में दम है तो जीत के दिखाओ इंद्रियों को इसे दम कहते हैं बुद्धि का भगवान में लग जाना सम कहते हैं इंद्रियों का जो संयम है इंद्रिय विजेता जो है वही दम है और न्याय से प्राप्त दुख के सहने का नाम तितिक्षा है हम अपनी दिनचर्या में जो दुख भोगते हैं

यह तपस्या है सर्दी गर्मी बरसात अपनी दिनचर्या में ठीक समय नहा धोकर तैयार होकर सत्संग में आना दर्शन करना सत्संग सुनना भूख बैठना उठना लघु शंका सोच सबका संयम हो रहा है यही तपस्या है तो न्याय से प्राप्त दुख के सहने का नाम तितिक्षा है जिव्या और जन इंद्री पर विजय प्राप्त करना धैर्य है रसेंद्र और जन इंद्री पर जो विजय प्राप्त कर लिया वही धैर्यवान कहा जाता है सबसे बड़ा दान क्या है किसी से द्रोह ना करना किसी से दुश्मनी ना करना सबको अभय दान देना सबसे बड़ा दान है सबसे बड़ी तपस्या क्या है कामनाओं का त्याग करना ही सबसे बड़ी तपस्या है जिसके हृदय में कोई कामना नहीं वह महान तपस्वी है वीर पुरुष किसे कहते हैं वीर पुरुष उसे कहते हैं जो अपनी वासनाओं को रौंद डाले किसी वासना से प्रेरित होकर कर्म ना करें अपनी वासनाओं को ही नष्ट कर दे जो वासनाओं पर विजय प्राप्त करता है वही शूरवीर कहा जाता है सत्य किसे कहते हैं सर्वत्र सम स्वरूप सत्य स्वरूप परमात्मा का अनुभव होना ही सत्य का अनुभव होना है रित किसे कहते हैं सत्य

और मधुर भाषण को रित कहा गया है महात्मा ने सत्य और मधुर भाषण को रित कहा है पवित्रता किसे कहते हैं किसी भी कर्म में आसक्त ना होना उसे पवित्रता कहते हैं नाना धोना नहीं यह तो एक बाहरी दिन चल है पवित्रता किसी भी कर्म में आसक्ति नहीं है किसी वस्तु व्यक्ति स्थान किसी कामना भोग किसी में आ अनासक्त पुरुष परम पवित्र है व नहाए या न नहाए सन्यास किसे कहते हैं कामनाओं के त्याग का ही नाम सच्चा सन्यास है कोई कामना जिसके हृदय में नहीं वह सच्चा सन्यासी है चाहे पेंट

शर्ट में ही क्यों ना हो जिसके अंदर कोई कामना नहीं है वही सच्चा सन्यासी है सबसे बड़ा धनी कौन है जो धर्म का संचय करता है वह अभीष्ट धनवान है जो धर्मात्मा पुरुष है वही धनवान है जिसके जीवन में धर्म है वही महान है अगर धर्म नहीं है तो धनवान नहीं है धर्म के द्वारा जो महिमा विकास होती है प्रकाशित होती है उसी को कहते हैं संपत्ति तो संपत्ति वान कौन धर्मात्मा पुरुष सबसे बड़ी यज्ञ क्या है परमेश्वर का चिंतन क्योंकि परमेश्वर ही यज्ञ है हरि ही यज्ञ है और हरि का चिंतन ही यज्ञ नाम जप यज्ञो में भगवान का चिंतन ही सबसे बड़ी यज्ञ है दक्षिणा दूसरे को ज्ञान का उपदेश देना ही दक्षिणा है वास्तविक ज्ञान का उपदेश देकर अज्ञान से निवृत कर दिया सबसे बड़ी दक्षिणा दे दी बल प्राणायाम ही बल है जो अपने प्राणों को संयम किए हुए है वही बलवान है भग भग माने होता है ऐश्वर्य भगवान कह रहे मैं ही हूं ईश्वर जी मैं ही हूं मेरा ही ईश्वर है लाभ सबसे बड़ा लाभ भगवान कह रहे हैं मेरी भक्ति ही उत्तम लाभ है भक्ति मिल गई इससे बड़ा कोई लाभ नहीं

विद्या सच्ची विद्या वही है जिसे ब्रह्म और आत्मा का भेद मिटा दे अध्यात्म विद्या लज्जा पाप करने में घृणा बुद्धि हो जाए इसी का नाम लज्जा है श्री सबसे निरपेक्ष है यही सबसे बड़ी श्री है किसी से कोई चाह नहीं कोई अपेक्षा नहीं यही श्री है दुख और सुख दोनों की भावना सदा के लिए नष्ट हो जाए उसे सुख कहते हैं सुख क्या है सुख और दुख दोनों भावनाओं का नाश हो जाना ही परम सुख है दुख विषय भोग की इच्छा रखना ही दुख है बंधन और मोक्ष को जो तत्व से जानता है वही पंडित है पंडित कौन जो बंधन और मोक्ष के तत्व को जानता है मूर्खता सबसे बड़ा मूर्ख कौन जो शरीर को मैं मानता है जो इस शरीर को मैं मानता सबसे बड़ा मूर्ख सुमार्ग किसे कहते हैं जो संसार की ओर से निवृत करके भगवान की ओर चला दे भगवान की प्राप्ति करा दे उसे सुमार्ग कहते हैं कुमार्ग किसे कहते हैं चित्त की बहिर्मुखी भोगों की तरफ भाग रहा है यही कुमार्ग है जो चित्त भगवान की तरफ जा रहा है यही सुमार्ग है स्वर्ग का सुख क्या है सतोगुण सतोगुण जितना बढ़ेगा मानो स्वर्ग के सुख

को भोग रहे हो नरक का दुख क्या है तमोगुण जितना तमोगुण बढ़ेगा उतना नार की दुख भोग रहे हो सच्चा भाई बंधु कौन है गुरुदेव गुरु कौन है मैं भगवान ही गुरु है और सच्चे भाई बंधु रिश्ते नातेदार हमारे गुरुदेव हैं सच्चा घर क्या है यह शरीर सच्चा धनी कौन है जो भगवन नाम जप से धनवान है खूब सद्गुणों का संचय करके भगवन नाम जप करता है वही सच्चा धनी है जिसके पास नाम रूपी खजाना है वही सच्चा धनी है दरिद्र कौन है जिसे ज्ञान का का भाव है ज्ञान का अ भाव है वही दरिद्र है क्योंकि अज्ञानी यह चाहिए यह चाहिए यह चाहिए चित्त में असंतोष है अभाव का यह मिल जाए यह मिल जाए उसे दरिद्र कहते चाहे अरबपति क्यों ना हो जो जितेंद्र नहीं है वही कृपण है जो समर्थ है स्वतंत्र है उसी का नाम ईश्वर है जिसकी चित्तवृत्ति विषयों में आसक्त नहीं है जो विषयों में आसक्त है वही असमर्थ है प्यारे उद्धव तुमने जितने प्रश्न पूछे थे उनका उत्तर मैंने दे दिया इन उत्तर को समझ लेना मोक्ष मार्ग के लिए सहायक है मैं तुम्हें गुण और दोषों का लक्षण अलग-अलग कहां

तक बताऊं सबका सारांश इतने में ही समझ लो कि गुण और दोषों पर दृष्टि जाना ही सबसे बड़ा दोष है गुण दोषों पर दृष्टि ना जाकर अपने शांत नि संकल्प स्वरूप में स्थित रहे वही सबसे बड़ा गुण है उद्धव जी ने कहा कमल नयन श्री कृष्ण आप सर्वशक्तिमान है आपकी आज्ञा ही वेद है उसमें कुछ कर्मों के करने की विधि और कुछ करने के निषेध है ये विधि निषेध कर्मों के गुण और दोष की परीक्षा करके ही होती है वर्णाश्रम भेद पति प्रतिलोम अनुलोम रूप वर्ण संकर कर्मों के उपयुक्त अनुपयुक्त

द्रव्य देश आयु काल तथा स्वर्ग नरक के भेदों का बोध भी वेदों से ही होता है इसमें संदेह नहीं कि आपकी वाणी ही वेद है परंतु उसमें विध निषेध ही तो भरा पड़ा है यदि उसमें गुण और दोष में भेद करने वाली दृष्टि ना हो तो प्राणियों का कल्याण करने में समर्थी कैसे हो हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर आपकी वाणी वेद ही पितर देवता और मनुष्यों के लिए श्रेष्ठ मार्गदर्शन का काम करती है क्योंकि उसी के द्वारा स्वर्ग मोक्ष आद अदृष्टवांठा प्रभु इसमें संदेह नहीं कि गुण और दोषों में

भेद दृष्टि आपकी वाणी वेद के ही अनुसार है किसी की अपनी कल्पना नहीं है परंतु प्रश्न तो यह है कि आपकी वाणी ही भेद का निषेध करती है और भेद प्रतिपादन भी करती है तो यह विरोध देखकर मुझे भ्रम हो रहा है कि एक जगह विधि निषेध करेगी और एक जगह पूरा निषेध कर देगी त्रिगुण विष वेदा त्रिगुण भवा अर्जुन तो आपकी ही वाणी से प्रतिपादन हो रहा है आपकी वाणी उसका निषेध कर रही यह देखकर मुझे भ्रम हो रहा है आप कृपा करके मेरा यह भ्रम मिटा दीजिए भगवान श्री कृष्ण ने कहा प्रिय उद्धव मैंने ही वेदों में एवं अन्यत्र भी मनुष्यों का कल्याण करने के लिए अधिकार भेद से तीन प्रकार के योगों का उपदेश किया है एक है ज्ञान योग एक है कर्म योग और एक है भक्ति योग मनुष्य के परम कल्याण के लिए इन तीन के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है भगवान कह रहे हैं ज्ञान योग कर्म योग और भक्ति योग उधव जी जो लोग कर्मों तथा उनके फलों से विर हो गए हैं उनका त्याग कर चुके हैं वे ज्ञान योग के अधिकारी हैं ज्ञान का अधिकारी कौन है जो लोग कर्मों से और कर्मों के फलों

से विरक्त हो गए हैं उनका त्याग कर चुके हैं वे ज्ञान योग के अधिकारी हैं भगवान बोल रहे इसके विपरीत जिनके चित्त में कर्मों और उनके फलों से वैराग्य नहीं हुआ है और उसमें दुख बुद्धि नहीं हुई वे सकाम व्यक्ति कर्म योग के अधिकारी है जो पुरुष ना तो अत्यंत विरक्त है और ना अत्यंत आसक्त ही तथा किसी पूर्व जन्म के शुभ कर्म से सौभाग्य मेरी लीला कथा आद में उसकी श्रद्धा हो गई है वह भक्ति योग का अधिकारी है भक्ति योग के द्वारा ही सिद्धि मिल सकती है कर्म के संबंध में

जितने भी विधि निषे उनके अनुसार तभी तक कर्म करना चाहिए जब तक कर्म में जगत और उससे प्राप्त होने वाले स्वर्गा आदि सुखों से वैराग्य ना हो जाए अथवा जब तक मेरी लीला कथा के श्रवण कीर्तन आदि में श्रद्धा ना हो जाए उधव इस प्रकार अपने वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म में स्थित रहकर यज्ञों के द्वारा बिना किसी आशा और कामना के मेरी आराधना करता रहे और निषिद्ध कर्मों से दूर रहकर केवल विहित कर्मों का ही आचरण करे तो उसे स्वर्ग या नरक में नहीं जाना पड़ता वह मेरे को प्राप्त होता है अपने धर्म में निष्ठा रखने वाला पुरुष इस शरीर में रहते रहते ही निषिद्ध कर्मों का गंदे कर्मों का परित्याग कर देता है और रागा दि मलो से मुक्त पवित्र हो जाता है इसी से अना उसे आत्म साक्षात्कार रूप विशुद्ध तत्व ज्ञान द्रु चित होने पर मेरी भक्ति प्राप्त होती है यह विध निषेध रूप कर्म का अधिकारी मनुष्य शरीर बहुत ही दुर्लभ है स्वर्ग और नरक दोनों ही लोकों में रहने वाले जीव इस मनुष्य शरीर की अभिलाषा करते रहते हैं क्योंकि इसी शरीर में अंतःकरण

की शुद्धि होने पर ज्ञान अथवा भक्ति की प्राप्ति हो सकती है स्वर्ग अथवा नरक का भोग शरीर किसी भी साधन के उपयुक्त नहीं है स्वर्ग में जो देव शरीर है वह साधना नहीं कर सकता नरक में जो यातना शरीर है वह साधना नहीं कर सकता इसीलिए बुद्धिमान पुरुष को ना स्वर्ग की अभिलाषा करनी चाहिए और ना नरक की और तो क्या इस मनुष्य शरीर की भी कामना नहीं करनी चाहिए क्योंकि किसी भी शरीर में गुण बुद्धि और अभिमान ना हो जाए बहुत सावधान रहे तभी व अपने वास्तविक स्वरूप की प्राप्ति के साधन में प्रमाद रहित होकर लगेगा नहीं तो प्रमाद हो जाएगा यद्यपि य मनुष्य शरीर बड़ा दुर्लभ है फिर भी मृत्यु ग्रस्त कभी भी मर सकता है और इस मनुष्य शरीर के द्वारा परमार्थ की सत्य वस्तु की प्राप्ति हो सकती है बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि यह बात जानकर मृत्यु होने के पहले ही सावधान होकर ऐसी साधना कर ले कि जिससे भ प्राप्ति हो जाए जन्म मृत्यु के चक्कर से सदा के लिए छूट जाए मुक्त हो जाए देखो उद्धव यह शरीर एक वृक्ष है इसमें घोसला बनाकर जीव रूपी पक्षी

निवास करता है इसे यमराज के दूध प्रतिक्षण काट रहे हैं जैसे पक्षी कटते हुए वृक्ष को छोड़कर उड़ जाता है वैसे ही अनासक्त जीव भी शरीर को छोड़कर मोक्ष का भागी बन जाता है परंतु जो आसक्त जीव है व दुख पर दुख भोगता रहता है प्रिय उद्धव यह दिन और रात क्षण क्षण में मनुष्य शरीर की आयु को क्षीण कर रहे हैं यह जानकर जो भय से कांप उठता है वह व्यक्ति इसमें आसक्ति छोड़कर परम तत्व का ज्ञान प्राप्त कर लेता है और फिर इसके जीवन मरण से निरपेक्ष होकर अपनी आत्मा में शांत हो जाता है हे उद्धव यह मनुष्य शरीर समस्त शुभ फलों की प्राप्ति का मूल है अत्यंत दुर्लभ होने पर भी यह भगवान की कृपा से मिल गया है इस संसार सागर से पार जाने के लिए मनुष्य शरीर अत्यंत आवश्यक है यह सुदृढ़ नौका है यदि मेरी शरण में हो जाए और गुरुदेव इसके खिवैया बन जाए तो बहुत जल्दी भ समुद्र से पार हो जाए स्मरण मात्र ही मैं अनुकूल वायु रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूं इस मनुष्य शरीर में इतनी सुविधा है कि शरीर के द्वारा संसार सागर से पार नहीं हो

जाता तो वो आत्म हत्यारा कहा जाता है अधा पतन कर रहा है इस मनुष्य शरीर में इतनी सुविधा है कि आप भगवत प्राप्ति कर सकते हो यदि भगवत प्राप्ति नहीं किया तो आत्म को हनन करने वाले की जो दुर्गति होती वही आपको होगी आत्मा का हनन करने से अधा पतन हो जाता है इसलिए पर दोष दर्शन की वृत्ति छोड़ो अपने को शरीर मत मानो अपने कर्मों को भगवान को अर्पित करो और खूब नाम जप करो जितना जीवन है इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी शेष चर्चा आग श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

संबंधित