महाशिवरात्रि - शिव-पार्वती जी का विवाह महोत्सव // 26/02/25
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदा वनेश्वर तव पदारविंदम प्रेमा मृतक मकरंद रसो पूर्णम हद पितम मधुपति स्मर ताप मुग्रॉडी आज लोगों ने प्रेरित किया कि भगवान देवाधि देव महादेव जी का शिवरात्रि उव है तो कुछ शिव चर्चा शिव लीला कथा जैसे श्री की इच्छा परम वैष्ण आचार्य भगवान शिव की ही कृपा से इस अधम को वृंदावन और प्रियाज का परिचय अगर वह कृपा ना करते तो हमें तो पता ही नहीं था वृंदावन क्या है क्या है प्यारी ू प्यारे ू राधा वल्लभ लाल ज का प्रादुर्भाव भी भगवान शिव के हृदय से ही हुआ है अष्टयाम उपासना की स्थापना भन देवाधि देव महादेव जी ने ही की है जहां ये चर्चा आती कि भगवान शिव का भी प्रवेश नहीं वहा श्री जी के श्री अंग श्रृंगार के श्री अंगों का श्रृंगार करने का अधिकार केवल ललिता विशाखा आदि सखिया और उनके कृपा पात्र जनों को ही है चलते हैं परम वैष्णु आचार्य भगवान शिव के पावन यश का कथन श्रवण करके प्रिया के चरणारविंद की अनन्य भक्ति की भावना को पूर्ण करें जब तक शक्ति नहीं है तो शिव में
शक्ति हटा दीजिए मात्रा तो क्या बचा श हुआ ना यही परम शक्ति है य जो परम शक्ति है हमारी श्री जी के अंश से है जितनी भी अंबा शक्तियां हैं व स्वामिनी ज के अंश से हैं ऐसे अंसी प्रिया जू की चरणारविंद की रति स्पष्ट देवाधि देव महादेव जी की कृपा से मिली है राधा बाबा की प्रारंभिक उपासना भी भगवान शंकर की ही उन्हीं की कृपा से राधा राधा राधा भाव देश में प्रवेश करके प्रिया प्रीतम की सेवा में आज वृंदावन में ही उपस्थित है पूज्य राधा बाबा पूज्य भाई जी बड़े-बड़े महापुरुष गंगा तरंग रमणी जटा कला गंगा तरंग रमणी जटा कलाप गौरी विभूषित वाम भागम नारायण प्रिय मन मदा हारम वाराणसी पुर पद भज विश्वनाथ वाचा म गोचर मनेक गुण स्वरूपम वागीश विष्णु सुर सेवित पाद पीठम वामन विग्रह वरे कलत वंतमूरी राज नाम बर धरम जटिल नेत्रमणि वाराणसी पुर पतिम भज विश्वनाथम सीता सुशोभित किरीट विराज मानम भाले क्षणात पंच वाणम नागा दिपा चित भासुर कण पूरम राण सी नाथ भज विश्वनाथम पंचानन दुत मत मतंग जनाम नागा कम दनुज पुंग पन्न गाना दवा नलम मरण सुक
जरावी नाम वाराणसी पुर पतिम भज विश्वनाथम तेजो मयम सगुण निर्गुण मवती मानंद कंदम पराजित प्रमेयम नागा क्म कम सकल निष्कल आत्म रूपम वाराणसी पुर पतिम भज विश्वनाथम रागा दोष हितम स्वजन रागम वैराग्य शांति निलयम गिरजा सहायम माधुर्य धैर्य सुभग गला विरामम वाराणसी पुर पतिम भज विश्वनाथम आशाम विहाय परि हत परस्य निंदा पापे रति च सु निवार मन समाध आदा कमल मध्य गतम परेशम वाराणसी पुर पतिम भज विश्वनाथम वाराणसी पुर पति स्तवन शिवस व्याख्या मटकम दम पटते मनुष्य विद्याम श्रीयम विपुल सौख्य अनंत कीर्ति संप्रा देह विलय लभते च मोक्षम विश्वा नाथा कोमदम शिव सध शिव लोको मवा पनोती शन स मोते नमः पार्वती पते हर हर हर महादव परम वैष्ण आचार्य भगवान शंकर का कृपा प्रसाद किसी न किसी जन्म में हर हरि भक्त को होता है जा पर कृपा न करही पुरारी सो न पाव मुनि भगति हमारी जिस पर भगवान शंकर की कृपा नहीं हुई व विशुद्ध हरि की प्रेम लक्षणा भक्ति को कभी प्राप्त नहीं कर सकता जो भगवान शंकर से तनिक भी अ श्रद्धा और द्रोह करे शिव द्रोही मम दास
कहावा सो नर मोहि सपने हो नहीं भावा उसे स्वप्न में भी कभी हरि पसंद नहीं कर सकते हरि कृपा नहीं कर सकते जो भगवान शिव से द्रोह करें ऐसे करुणा में भगवान शिव से भी द्रोह कर बैठे दक्ष प्रजापति प्रसंग बड़ा शिक्षा स्पद है जब किसी को पद मिलता है तो पदा भिमान से रहित होना ये केवल भगवत कृपा का का ही स्वरूप है अन्यथा कोई भी पद हो वो पद अभिमान प्रकट कर देता है को नरस जन्मा जग माही प्रभुता पाही जाही मद नाही कौन ऐसा इस संसार में जन्म लिया जिसको पद मिला हो और अभिमान ना हो वो हम अमुक एक गर्व बना रहता है विदुर जी ने पूछा इतने उच्च पद में विराजमान प्रजापति पद यह ब्रह्मा जी के समान सम्माननीय पद होता है प्रजापति सबसे बड़े ब्रह्मा जी हैं तो दक्ष को प्रजापति पद मिला इतने बड़े ज्ञानी इतने बड़े प्रजा के रक्षक इन्होंने भगवान शिव से द्रोह क्यों कर लिया विदुर जी ने प्रश्न किया जिन्होंने अपनी परम सुंदरी परम ज्ञानम जिनका नाम सती जी था उनका ब्याह भगवान शंकर से किया फिर भगवान शंकर से हमने सुना कि उन्होंने द्रोह किया
तो कस्तम चराचर गुरुम निर्वैर शांत विग्रहम क्या करे पुरानी दोस्ती व इसीलिए मनाना पड़ा था जब यहां तो मनाना पड़ा था कि आप कृपा करके अपने इस लीला को जब इधर भेजा है तो नहीं तो चित्त जब आसक्त हो जाता है उसको हटाना बड़ा कठिन होता है य भगवान शिव ने ही कृपा करके श्री जी के चरणों में दिया असंभव था कि चित्त हट जाए क्योंकि अनन्य जिसे अनन्य होता कहते हैं ऐसी कट्टर अनन्य होता देवाधि देव भगवान महादेव जी में उन्हीं की कृपा से थे अब जैसे उनकी चर्चा होते कैसे इसलिए जैसे गाड़ी रफ्तार से चल रही हो एकदम अचानक मोड़ आ जाए तो संभालना मुश्किल पड़ता है ऐसी अपनी जो सहज चर्चा चल रही उसम जैसे अचानक मोड़ आया शिव चरित्र तो चराचर गुरुम निर्वैर शांत विग्रहम और हरि कि जरा सी भी भक्ति हृदय में आ जाए तो यह छाए रहते हैं अपने आप छाए रहते हैं बिना बुलाए छाए रहते हैं जैसे मारकंडे जी हरि के ध्यान में मगन थे तो भगवान शिव और अंबा साथ आकर के आंख ही नहीं खोला ध्यान में जाकर प्रवेश कर गए वहां हरि का ध्यान अंतर ध्यान और देखा
देवाधि देव महादेव आंख खोला सामने देखा कहा प्रभु हमने तो आपका चिंतन भी नहीं किया बोले हमारे प्राण प्यारे हरि की जो आराधना करता है मैं बिना बुलाए आ जाता हूं उसको बिना बुलाए कृतार्थ कर देता हूं कस्तम ऐसे करुणा में करपूर गौरम करुणावतारं बड़े करुणा में यद्यपि महान रुद्र है आवेश में आ जाए तो त्रिभुवन को भस्म करने में सेकंड ना लगे तीसरा नेत्र खुले सब भस्म हो जाए खुलते ही भस्म हो जाए यद्यपि तने इतने रुद्र है और बड़ा ही सरल स्वरूप है करपूर गौरम करुणा अवतार करुणा का साक्षात हरि की करुणा मूर्तिमान शिव रूप में विराजमान है कस्तम चराचर गुरुम ऐसा कैसे हो सकता है कि चराचर के गुरु भगवान शिव से कोई विरोध कर ले निर्वैर जो सदैव निर्वैर स्थिति में रहते हैं शांत विग्रहम जो सदैव शांत स्वरूप में स्थित रहते हैं आत्मा रामम जो बोध संपन्न है जिनको किंचन मात्र भ्रम नहीं वह द्वेष कैसे और जिनका किसी से द्वेष नहीं उनकी निंदा कैसे हो सकती उनसे वैर कैसे हो सकता है आत्मा रामम कथम दष्ट जगतो देवत महत भला ऐसे महान से वैर
कैसे किया जा सकता है जो चराचर का गु है वैर रहित है शांत मूर्ति है आत्माराम है जगत के परम आराध्य देवाधि देव है उनसे वैर कैसे फिर दक्ष ने तो अपनी पुत्री व्याही थी वह तो उनके वैसे ही परम पूज्य है मैं सुनना चाहता हूं ऐसा क्या हुआ कि परम पावन भगवान शिव से दक्ष ने द्रोह कर लिया और अंत में सुना कि भगवती सती जी ने अपने का यज्ञ जनि में बल दे देना संपूर्ण यज्ञ का विनाश हो जाना ऐसा क्या हुआ मैत्री जी बहुत बड़े महापुरुष है त्रिकाल ज्ञ महापुरुष है वो कह रहे पुरा विश्व सजाम सत्र समता परमर शया तथा मरग सर्वे सानु मुन योगय विदुर जी एक बार का प्रसंग है जब दक्ष जी को पद मिला प्रजापति पद तो सभा लगी बड़े-बड़े देवता ऋषि मुनि अग्नि वायु आद प्रधान प्रधान देवता अपने अनुयायियों के साथ उस सभा में एकत्रित हुए अब उस सभा में महान पद प्राप्त किए हुए दक्ष प्र पति प्रवेश किए जैसे मानो तेजू में भुवन भास्कर पधार रहे हो क्योंकि प्रजापति पद तो उस पद की योग्यता भगवान देते हैं उस पद की सामर्थ्य देते हैं उस विशाल सभा भवन का
अंधकार दूर करते हुए भुवन भास्कर की तरह तेज से प्रकाशित दक्ष प्रजापति पधारे उनको आता देखकर संपूर्ण सभा हाथ जोड़कर खड़ी हो गई क्योंकि पद ऐसा है केवल ब्रह्मा जी नहीं खड़े हुए और महादेव जी नहीं खड़े हुए और सब जितने देवता जितने लोकपाल गंधर्व सब खड़े हो गए ऐसा तेज था कि हाथ जोड़कर प्रभावित होकर सब खड़े हो गए समस्त सभासदों से भली भाति सम्मान प्राप्त हुआ स्तवन बंधन महान तेजस्वी दक्ष ने दृष्टि डाली यह दो नहीं खड़े हुए भगवान ब्रह्मा जी और देवाधि देव महादेव
ब्रह्मा जी को तो प्रणाम किया क्योंकि प्रधान प्रजापति वही है पद से भी और सृष्टि के रचयिता भी है इसलिए उनको सबसे बड़े पूर्वज कहा गया है प्र पितामह सबसे बड़े प्र पितामह ब्रह्मा जी है ब्रह्मा जी को प्रणाम किया आसन ग्रहण किया दक्षण महादेव जी शांत बैठे थे ना प्रणाम ना नमस्कार ना हाथ जोड़ना कोई चेष्टा नहीं दृष्टि गई महादेव जी के ऊपर तो देखा कि किसी भी तरह का कोई आदर सत्कार नमस्कार प्रणाम कुछ नहीं जिससे ब्रह्म बोध हो जाता है व बाहरी व्यवहार नहीं करता यह तो साक्षात ब्रह्म है एक बार पूज्य पाद शी उड़िया बाबा जी महाराज प्रभु दत्त ब्रह्मचारी जी ने उत्सव किया था उसमें हरि बाबा उड़िया बाबा पधारे हैं साक्षात मूर्तिमान शिव और हरि माने जाते थे शिव भगवान का स्वरूप उड़िया बाबा हरि भगवान का स्वरूप हरि बाबा उड़िया बाबा जी आसन में बैठे हुए थे तो स्वामी एक रसन जी महाराज जिनके 60 शिष्य ब्रह्म बोध प्राप्त थे बड़ी महिमा थी 80 वर्ष की अवस्था होगी ज सुना उड़िया बाबा आए तो समीप आए तो ना आसन से खड़े हुए ना हाथ जोड़ा
ना प्रणाम कुछ नहीं कोई मुद्रा नहीं किसी भी तरह का कोई व्यवहार नहीं व आए बैठ गए थोड़ी देर बैठे रहे अपने शिष्यों के साथ चले गए बाबा प्रभु दत्त ब्रह्मचारी जी आए बोले समाज को अच्छा नहीं लगा क्या बाबा ने कहा क्या बोले कृष आनंद जी आए थे आपने प्रणाम नहीं किया आप खड़े नहीं हुए आपने हाथ नहीं जोड़ा बहुत बड़े महापुरुष हैं उनका तो यह किसी को भी य अच्छा नहीं लगा आप हमारे कान में आकर कह देते इनको प्रणाम करो तो प्रणाम कर देते अच्छा नहीं लगा अब क्या करना चाहिए बोले बाबा आपको चलना चाहिए प्रणाम करके उनके नीचे बैठना चाहिए बाबा गए प्रणाम किया तो अरे अरे स्वामी जी आप नीचे बैठ गए जहां उनकी पादुका थी अरे स्वामी स्वरूप स्थित महापुरुष है जब द्वैत की कहीं किंचन मात्र भावना ही नहीं रह गई तो किसको प्रणाम किसको नमस्कार ये बहुत उच्च कोटि की अवस्था और फिर उस अवस्था को प्रदान करने वाले भगवान शिव वंदे बध मयम नित्यम गुरुम शंकर रूपिम क्रोधा से जलने लगे दक्ष और कहने लगे देवताओं वायु अग्नि आद बड़े-बड़े लोक पालो ब्रह्म
ऋषियों मेरी बात सुनो मैं किसी नासमझी अ द्वेष से नहीं कह रहा हूं बल्कि शास्त्र सम्मत बात कह रहा हूं मैं दक्ष प्रजापति हूं ये ये कह रहे मैं शास्त्र सम्मत बात कर रहा हूं मैं दक्ष प्रजापति हूं और यह महादेव हमारा सम्मान नहीं किया भाषा बदल गई जब सती जी को अर्पित किया था तो चरण धो केर पिया था और कहा था प्रभु मैं आपके इस लायक नहीं मैं आपको कन्या दान कर सकू आपने स्वीकार किया मुज धम को तुम्हारी पुत्री को सदा अपनी सेविका समझना और मैं आपका सदैव होगा क्योंकि मैं जानता हूं आप कौन है य दक्ष प्रजापति बनने के पहले की भाषा थी और जब प्रजापति बने तो शब्द उनका निकला सरता ब्रहम सयो में सह देवा सहाया साधु नाम ब्रतो तम नानान चमत सरात मैं कोई मत सरता से या ज्ञान से नहीं बोल रहा हूं अयम तु लोक पाला नाम यशोन निर्प प्र सद भीरा चरिता पंथा यन स् देन दूषित महादेव समस्त लोक पालो की कीर्ति को धूल में मिला रहा है देखो एम शिता प्राप्तो यन में दर ग्रत य मेरे शिष्य के समान है ले जगतगुरु भगवान शिष्य के समान क्या बुद्धि
भ्रष्ट हो जाती है पद से घमंड स्वयं में है तो जी में ये घमंड करके सत्पुरुष के आचरण का लांछन कर रहा मिटिया मेट कर रहा है खड़े होकर मेरा सत्कार नहीं किया मैंने अपनी परम सुंदरी पुत्री सती इसे प्रदान की पाण विप्रा मुखता सावित्र धुत कितनी सुंदर सुशील अग्नि को साक्षी करके इसको पानी ग्रहण किया ये है कौन पानी मर्कट लोचना मेरी पुत्री ग्रवा मृग सवाया मृग सावक के जैसे नेत्रों वाली सुंदरी और ये कैसे कठोर शब्दों का प्रयोग किया पानी मर्कट लोचना बंदर के से नेत्र
वाले को इसका अधिकार था मेरी पुत्री लेने का पर मैंने दिया मेरी उदारता ये मेरे शिष्य के समान है उचित थाय सबसे आगे आकर उठकर मुझे प्रणाम करता मेरा स्वागत करता इसलिए वाणी से भी कुछ नहीं नेत्रों से भी कुछ नहीं बड़ी गलती हो गई जैसे अनाधि कारी को वेद ऐसे इसको मैंने अपनी पुत्री प्रदान कर दी यह भावी ही समझो नहीं बिल्कुल अधिकारी नहीं मेरी पुत्री के योग्य सत्कर्म का लोप कर दिया बड़ा घमंड में बड़ा दोष उत्पन्न हो जाता है अहंकार इसीलिए सर्वनाश की जड़ कही गई है ये अभिमान करके बैठा रहा धर्म की मर्यादा को तोड़ रहा है प्रेतों का निवासी स्मशान में विचरण करने वाला भूतों का मित्र पागल अब अभिमान आ गया है तो बोलते चले जा रहे बाल बिखेरे दिगंबर भटकता रहता है कभी हंसता है कभी रोता है सारे शरीर पर चिता की भस्म लगाए रहता चिता भस्म कृतना प्रेत न भूषण अस्थि के भूषण धारण करता है चिता की राख लगाता है चिता भस्मा लेपो गरल मशम दिग पट धरो जटाधारी कंठे भुजग पति हारी पशुपति कपाली भूते सो यह सारे शरीर में हड्डियों के गहने
पहनता है नाम भर का शिव वैसे तो पूरा अव अमंगल मतवाला तमोगुण मैंने केवल ब्रह्मा जी के बहकावे में आकर अपनी पुत्री दे दी आचार हीन को ऐसे स्वभाव वाले को जो कदापि नहीं देनी चाहिए थी महादेव जी को ऐसे बुरा भला जब कहने लगे तो सब ब्रह्म ऋषि खड़े हुए क्या बोल रहे तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट है देवाधि देव महादेव जी को क्या बोल रहे हो दक्ष का क्रोध का पारा और भी चढ़ गया हाथ में जल लिया और कहाय देवताओं में महादेव सबसे बड़ा माना जाता है पर इसने आज मेरा अपमान किया है
इसलिए आज मैं शाप देता हूं इंद्र उपेंद्र लोकपाल देवताओं की किसी भी सभा में यज्ञ में इसका सम्मान ना हो यज्ञ भाग से इसे वंचित कर दिया जाए दंड विधान साब प्रजापति आज से किसी भी लोक पालो के साथ अवाय अग्नि इंद्रा आदि उपेंद्र दि देवताओं के साथ बैठकर यज्ञ भाग नहीं लेगा मैं शाप देता उपस्थित बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषियों ने कोलाहल किया अरे तुम्हारी बुद्धि नष्ट हो गई ऐसा कैसे बोल दिया आपने महादेव जी को कोई मतलब नहीं कोई मतलब नहीं शांत ये है ब्रह्म स्थिति शांत बैठे
हैं महादेव जी को जब शाप दे दिया अत्यंत क्रोध में भर कर के फिर सभा में बैठने की ताकत नहीं रह गई क्यों शक्तिहीन हो गए ऐसे प्रभु को जो शाप दिया तो शक्तिहीन हो गए वहां से कांपते हुए वापस हुए नंद केश्वर वही बैठे हुए थे नंदीश्वर जी तत्काल खड़े हुए जो वापस होने लगा तो बोले दक्ष रुको तुम प्रजापति पद पर विराजमान हो कर के और हमारे परम गुरु हमारे इष्ट आराध्य देव भगवान शिव को ऐसा साप दिया और तुम्हारे कुछ अन्याई मुस्कुरा रहे थे जब तुम साप दे रहे थे मैं देख रहा था तुम्हारा अनुमोदन कर रहे थे तुमने बड़ा भयंकर शाप दिया विचार नहीं किया क्या तुम समझते हो कि भगवान शंकर तुम्हे दंड देने में असमर्थ है वह तो नहीं बोलेंगे मैं उनका एक सेवक हूं अरे मरण धर्मा शरीर पर अभिमान करने वाले पदा भिमानी भगवान शिव को तू भूल चुका है जान नहीं रहा तेरे अंदर यह संकर्ष द्वेष मूर्ख दक्ष जा मैं शप दे हो तू और तेरे अनुयाई कभी तत्व ज्ञान को प्राप्त ना हो तत्व बोध कभी तेरे को प्राप्त ना हो सदैव तू विद्वता वर्णन करता रहेगा लेकिन तत्व
बोध नहीं होगा तू इन यज्ञों के द्वारा अक्षय पुण्य जो प्राप्त करता है तो वेदों के अर्थ वाक्य से सदैव मोहित रहे विवेक भ्रष्ट हो जा और विषय सुख में ही तोत रमण कर ये मैं साफ देता हूं शंकर द्रोही विषय भोगों में ही तू सुख मान विद्वता की बात करेगा तत्व बोध नहीं होगा तेरे को विवेक नहीं होगा केवल बाहरी अर्थवा में तेरी बुद्धि फसी रहेगी कपट धर्म का आश्रय लेगा विषयों में आसक्त रहेगा कर्मकांड प्रधान रहेगा देह बुद्धि तेरे में रहेगी आत्म भाव का कभी तेरे अंदर चिंतन नहीं आएगा जा तू अपने स्वरूप को विस्मृत होने वाले अज्ञान को प्राप्त हो जा साक्षात भगवान शिव को अपमानित करने वाला कभी ज्ञान प्राप्त कर सकता है जा तू स्त्री लंपट हो जा जा तेरा मुख जिससे साप दिया कुछ ही समय में बकरे का हो जाए मूर्ख कर्मम अविद्या को तोत विद्या समझता है सांसारिक पदों को तू शाश्वत समझता है शकर का अपमान करने वाले इस दक्ष के जितने अनुयाई हैं सब अपने पद से भ्रष्ट हो जाएं सब जन्म मरण के चक्र में फसने वाली अविद्या को प्राप्त हो वेद
वाणी का रहस्य इनके हृदय से गुप्त हो जाए लुप्त हो जाए यह कर्म फलों में आसक्त हो जाए शब्ध हो जाए ये शंकर द्रोही माया के जाल में फस जाएं मैं ऐसा श्राप देता हूं नंदेश्वर भगवान ने बड़ा भयानक श्राप दिया है दक्ष और उनके अनुयाई ब्रह्म ऋषियों को आज से मैं इस दक्ष के अनुयाई ब्राह्मणों को शाप देता हूं कि इनका आहार विहार का संयम टूट जाए ये भक्ष भक्ष का विचार छोड़ कर के केवल रसेंद्र के लिए ये लाला इत्र है इनकी ब्रह्म विद्या नष्ट हो जाए इनका तप क्षीण हो जाए इनका व्रत का फल इनको ना मिले ये केवल शरीर और धन और स्त्री इन्हीं के गुलाम बन कर के भिक्षुक की तरह जीवन व्यतीत करें विषयों का भोग करने के लिए बड़ा भयंकर सिद्धांत का खंडन हो गया भगवान शिव के नंदीकेश्वर ने बड़ा भयंकर शाप दे दिया बहुत यह सबसे बड़ा हितकर हुआ क्योंकि अपने इष्ट का अपमान सह जाना ये सेवक के लिए सिद्धांत नहीं है जहां ऐसा हो वहां या तो कान में अंगुली डाल के निकल जाए या इष्ट और गुरु की निंदा करने वाले का दंड विधान करें ऐ शास्त्रीय आदेश जोही
नंदेश्वर से सा साप सुना संपूर्ण जो ऋषि व्याकुल हो गए जो दक्ष के पक्ष में थे उनमें भगु जी खड़े हुए और कहा ब्रह्म ऋषियों को तुमने शक्तिहीन समझ रखा है तुमने तो ब्रह्म दंड का प्रयोग कर दिया समस्त ब्राह्मणों को जो दक्ष के अनुयाई है कितना बुरा साप दे दिया जाओ मैं साप देता हूं बड़े कमंडल उठ गए भाई वो अपने जल लिए मैं साप देता हूं शास्त्र के विरुद्ध भेष धारण करने वाले और पाखंड का सेवन करने वाले शिव अनुयाई व हो जाए ऐसा साथ बड़ा विच भवत धराय तान समन ब्रता पाखंड नस्ते भवंति स शस्त्र परिपथ सौचा चार विहीन मंद बुद्धि जटा और राख धारण करने वाले ऐसा साप दे दिया तुमने ब्राह्मणों को जाओ तुम लोग जो ब्राह्मणों की निंदा की है इससे तुम्हारे अंदर पाखंड जागृत हो जाए ऐसा साप बड़ा सापा सापी शुरू हो गया भगवान शिव कुछ नहीं बोल रहे ना अपने परिकर को ना उन परिकर को भगु जी के साप देने के बाद भगवान शंकर उठे बागमबर समारा चल दिया कोई मतलब नहीं कोई मतलब यह है ब्रह्म बध प्रदान करने वाले जगतगुरु भगवान शिव की स्थिति प्रजापति
लोग उस सभा में एकत्रित हुए कि भगवान श्री हरि को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ की जाए प्रजापति हों ने श्री गंगा जी यमुना जी के संगम में प्रयागराज में यज्ञांति स्नान किया और मंगल गान करते हुए सब अपने अपने ग्रह को गए बड़ा मंगल हो गया शिव और भगवान के पार्षदों में जो भगवान शिव के पार्षद और दक्ष में ऐसा अंदर से बड़ा बैर विरोध दक्ष रखते भगवान शिव से अभिमान बहुत बढ़ गया था भगवान शंकर का अपमान करने के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया बड़े-बड़े यज्ञ किए वाजपेई आदि बृहस्पति सवाद यज्ञ लेकिन कहीं भी शिव भाग नहीं रखा इन महान यज्ञों में ब्रह्म ऋषि देव ऋषि पितर देवता सब अपनी पत्नियों के साथ पधार रहे थे दक्ष सब का निमंत्रण किए थे स्वागत सत्कार किए थे और यह देवता लोग भी बड़े विचित्र और मार्ग से जाते कैलास के ऊपर से जाने की जरूरत थी सती जी ने देखा बड़े मानो में कोला हल करते हुए परिवार का परिवार यात्रा कर रहा है अब जैसे हेलीकॉप्टर तो इसमें ड्राइवर की जरूरत है तेल की जरूरत हैय फेल भी हो सकता है लेकिन विमान में ना
ड्राइवर की जरूरत है ना तेल की जरूरत है ना फेल होगा चलो जहां दक्ष प्रजापति का यज्ञ हो रहा है वहां चलो कैलाश के ऊपर से चलो ऐसा तो ऐसे कैलाश के बगल से ही ऐसे निकल रहे थे तो सती जी ने देखा और सब बातें कर रहे थे दक्ष के यज्ञ की सती जी ने सुना कि यज्ञ तो मेरे पिता का हो रहा है और सब लोग जा रहे हैं हमारे य निमंत्रण नहीं आया और वह हमारे कैलाश के समीप से निकल रहे हैं विमान या सब प्रेषक कंठी सुवास सहा बहुत सुंदर हार वगैरा धारण किए हुए उनकी पत्निया और हस हस
करके कि हमको तो ऐसा निमंत्रण आया हमको तो ऐसा और सब सुन रहे सती जी बड़ी उत्सुकता हुई और कहा देवाधि देव मेरे पिता के यहां उत्सव हो रहा है निमंत्रण नहीं आया क्या मैं जा सकती हूं वामदेव मैंने सुना है इस समय इस शरीर के पिता और आपके ससुर बड़ा भारी यज्ञ उत्सव कर रहे हैं सब निमंत्रण में जा रहे हम भी चले क्योंकि अपने आत्मीय से मिलने का मन करता है मैंने देखा इन विमानों में हमारी बहने भी थी जो अपने पतियों के साथ थी बड़े सुंदर गहने आदि धारण किए हुए प्रसन्न मुद्रा में जा रही थी बहुत समय हो गया मैंने अपनी मां को नहीं देखा उत्सुकता हो रही है हमको भी शिव कल्याण में ब्रह्म ऋषियों के द्वारा रचा हुआ महा श्रेष्ठ यज्ञ हो रहा है वैदिक मंत्रों से भगवान श्री हरि की प्रधानता है चलना उचित होगा अजन्मा प्रभु आप ही जगत की उत्पत्ति हेतु और पालन करने वाले मुझे है आप ही त्रिगुणा आत्मिका माया के सृजन करता है मैं आपसे प्रार्थना करती हूं बहुत दिन हो रही हूं क्या आप मुझे मेरे पिता के पास ले चलेंगे माता के दर्शन कराएंगे
यज्ञ का उत्सव में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिलेगा कुछ नहीं बोले भगवान से काहे नीलकंठ आप जन्म रहित है अजन्मा है आप में भले उत्साह ना हो पर मेरा जन्म हुआ है वो मेरे मां पिता है मैं दर्शन करना चाहती हूं उनसे मिलना चाहती हूं देखो ना आकाश में कैसे राजहंस जैसे उड़ते विमान और उनमें हमारी बहने जा रही है ऐसी अवस्था में कौन ऐसा होगा जो अपने माता-पिता के उत्सव में सम्मिलित ना हो प्रभु हो सकता है आप को ऐसा उत्तर देने का मन हो कि उन्होंने निमंत्रण नहीं दिया तो पति के ग्रह गुरु के पास और माता-पिता के यहां बिना निमंत्रण के जाना चाहिए शास्त्री सिद्धांत है ये अंबा जी सती जी कह रहे भरथर गुरुर देह कृत केतनम गुरु के ग्रह में पति के घर में और माता-पिता के पास बिना निमंत्रण के जाया जाए ऐसा शास्त्री सिद्धांत निमंत्रण आ तो खास बात नहीं है बिना निमंत्रण के भेजा है गुरु के यहां पति के यहां और माता-पिता के यहां इसलिए आप शायद य कहना चाहते हो कि निमंत्रण नहीं आया तो मैं नहीं लिवा चलूंगा तो सिद्धांत है आपको हमारी
इच्छा की पूर्णता करनी होगी और आपको मैं याद दिला देती हूं कि आपने मुझे ंग में विराजमान किया है मैं उसी सम्मान को आप आपको याद दिला र कि मैं आपकी अर्धांग हूं याचना करती हूं अनुग्रहित कीजिए मुझे हमारे माता-पिता के पास भेज दीजिए सती जी की बात सुन कर के भगवान शंकर थोड़ा मुस्कुराए कहा सुंदरी तुमने ठीक कहा कि बिना निमंत्रण के भी जाया जा सकता है यो दितम शोभन मेव शोभने अनाहता अयंती बंधु तेनु पादित दोष दृष्ट बली साना मदन मनना यद्यपि माता पिता पति और गुरु के
यहां बिना बुलाए जाना चाहिए सिद्धांत है पर तप विरोध मान जहां कोई तहा गए कल्याण न होई यदि माता-पिता तुम्हारे वैर मानते हो तो फिर नहीं जाना चाहिए फिर नहीं जाना चाहिए देहा भिमानी मद क्रोध से प्रबल हुआ यदि वह अपमान करता हो तो फिर नहीं जाना चाहिए यह सिद्धांत वहां चलता है जहां देहा भिमान हो करके मद रहित होकर के दोष द्वेष रहित होकर के वह जो रिश्ते हैं उनका पालन किया जाता है विद्या तप धन सुद शरीर युवावस्था उच्च कुल यह छह गुण है पर अभिमान आ जाए तो यही छह दुर्गुण बन जाते हैं और उसका नाश कर देते हैं ये छह गुण अवगुण जब बन जाते तो महापुरुषों का अपराध करा देते हैं और वो नष्ट हो जाता है जो महापुरुषों का अपराध करता है मुझे लगता है यदि तुम अपने माता पिता के पास जाओगे तो वह तुम्हें आदर नहीं देंगे मेरे संबंध के कारण भव चढ़ा कर देखेंगे ऐसी अवस्था में तुम सुख नहीं पाओगे देवी बाणों से बिन जाने पर उतनी पीड़ा नहीं होती जब प्रियजनों के द्वारा अपमान होता है सबसे कठिन जाति अमाना जब अपने पर कर के अपने प्रेमी जन
अपने संबंधी तुम्हें सम्मान नहीं करेंगे और रोस भरी दृष्टि से या उपहास करेंगे तब तुम्हारा जीना मुश्किल हो जाएगा इसलिए हृदय को शांत करो और इसी कैलाश में ही रहो सती जी को भगवान शिव की ये बात अच्छी नहीं लगी क्यों क्योंकि ममता जागृत हो गई तो ममता त सन ज्ञान कहानी फिर नहीं समझ में आती मानो सती जी ने कहा कि अगर आप एक बार खड़े होकर प्रणाम कर लेते हमारे पिता को तो समस्या ही नहीं होती पूरा झगड़ा इसी से तो हुआ भगवान शिव अंदर की बात जान कहते सुंदरी तुम ये कह सकती हो कि परमो को प्राप्त दक्ष प्रजापति पद पर जब विराजमान थे तो आप खड़े होकर प्रणाम क्यों नहीं किया तुम मेरी आशिता हो इसलिए मैं तुम्हें बता रहा हूं ये खड़े होना हाथ जोड़ना प्रणाम करना नमस्कार करना य देहा भिमा नियों का व्यवहार है ब्रह्म बध संपन्न महापुरुष उसी आत्म स्वरूप वासुदेव का सम्मान करते हैं बाहरी प्रक्रिया नहीं अहंकार का पोषण अहंकार शून्य महापुरुषों के द्वारा नहीं होता इसलिए मुझे लगता है तुम्हें नहीं जाना चाहिए सु मध्य में ये नम्रता दिखाना
प्रणाम करना हाथ जोड़ना ये केवल व्यवहारिक क्रिया है अगर अंदर के वासुदेव को नहीं पहचानता तो य सब नाटक हो जाता है तत्व ज्ञानियों द्वारा उसी आत्म स्वरूप वासुदेव का सम्मान होता है बाहरी देहा अभिमानी का नहीं विशुद्ध अंता कर का नाम वासुदेव है अपने स्वरूप में स्थित होना सबसे बड़ा सम्मान है ये भगवान ज्ञान स्वरूप शिव का मैं उसी वासुदेव में निरंतर स्थित रहता हूं इसलिए ना किसी को नमस्कार ना किसी को प्रणाम इसलिए अगर तुम्हें लगता हो कि मैंने तुम्हारे पिता का अपराध किया तो बिल्कुल नहीं मैं देहा अभिमानी को प्रणाम नहीं करता देह में विराजमान उस आत्म तत्व को नमस्कार करता हूं और वह मैं हूं इसलिए किसको नमस्कार कौन इस समय सती जी को अच्छा नहीं लग रहा है ज्ञान विज्ञान व्याकुलता देखि यद तुम मेरी बात नहीं मानोगी और जाओगी तो संकेत में बता देता हूं ये तुम्हारे लिए बहुत ही हानिकारक होगा क्योंकि जब प्रतिष्ठित व्यक्ति की आत्मीय जनों के द्वारा अपति होती अपमान होता है तो उसकी तत्काल मृत्यु का कारण बन जाती है वो संकेत
में बता दिया भगवान शंकर शांत हो गए यह देखकर सती जी को बिल्कुल अच्छा खड़ी हुई एक बार देखती भगवान शंकर की तरफ कि अगर मैं जाती हूं तो य रुष्ट हो जाएंगे क्योंकि आज्ञा नहीं एक तरफ विमानों की तरफ नहीं जाती हो तो माता का दर्शन कैसे होगा कैसे सहत जनों से मिलूंगी बा बार क्रास चिंतन हुआ हृदय चंचल हुआ भगवान शिव की तरफ रुद्र दृष्टि से देखा और आंसू भी आ गए इन्होने आदेश क्यों नहीं किया समझ नहीं पा रहे अंबा भगवान शिव कह रहे हैं जब प्रतिष्ठित व्यक्ति की अप्रतिम से बढ़कर दुखदाई होता है हो सकता है मृत्यु हो जाए इसलिए नहीं जाना चाहिए क्रास चिंतन से ही क्रोध का भयानक स्वरूप आता है देवी सती थरथर कांपने लगे एक तरफ शिव प्रेम एक तरफ मात्र पितृ प्रेम रोस भरी दृष्टि से भगवान शंकर की तरफ देखा प्रती वैत जात वे पथ शरीर काप रहा रुद्ध दृष्टि से देखा श्रोक और क्रोध ने बेच कर दिया कि आपने आदेश क्यों नहीं किया और दांतों से ओठ दबाते हुए शिव जी की तरफ रुद्ध दृष्टि करते हुए चल और विचार किया मैंने कई बार इनसे प्रार्थना की
शारे से कि मुझे आदेश दे दो पर आदेश नहीं दिया ठीक है ना दो आदेश में जा सकती हूं देखो यहां त्रुटि हो रही सदगुरु प्रिय प्राप्य जन बिना इनकी आज्ञा के कदम नहीं रखना चाहिए अगर आज्ञा नहीं है तो बड़ा मंगल है यदि कदम रख दोगे लंबी-लंबी सांस खींची भगवान शिव की तरफ देखाओ चल पड़े अपने पिता के घर अकेले महादेव जी ने मणिमानतऴं शिव पार्षदों को साथ लो सुंदर पालकी तैयार करो बड़ी भारी यक्ष की सेना साथ होनी चाहिए और इनका अनुगमन करो जाओ पीछे सती तत्काल सुंदर पालकी की रचना सती जी को विराजमान किया 100 हज भगवत भगवान शिव के पार्षद और हजारों की संख्या में यक्ष सैनिक क्योंकि कुबेर मित्र है भगवान शिव के नंद केश्वर ने कहा प्रभु पालकी से अच्छा रहेगा मुझे आदेश कीजिए भगवान के नित्य वाह नंद केश्वर गए कहा माता विराजमान हो हम पर मैना पक्षी गेंद दर्पण कमल समस्त राज सामग्रियां छत्र चम शंख दुंदु भी आदि बजने लगी चव डुलने लगे और अंबाजी विराजमान होकर अपने पिता के घर जा रही बिना आदेश के गुस्सा होकर समस्त शिव पार्षदों के साथ दक्ष
की विशाल यज्ञशाला में प्रवेश किया वहां तो वेदत ध्वनि गूंज रही थी बड़े ऊंचे स्वर से ब्राह्मण दस्त्र सरखा पुरखा सहस्रा सहस्त्र पात एक दूसरे की आवाज दबाने के लिए होड़ लगी हुई थी बहुत से अलग-अलग वेदियो पर देवताओं की स्थापना हुई थी दक्षण एक बार देखा सती आए ना नजदीक गए ना बात की ना पूछा भयभीत हो गए सती जी कि क्या जो भगवान शिव ने कहा था वही होगा पिता ने देखा और कोई आदर नहीं दिया बहुत घबरा गए बहनों के पास गए तो ऐसे मुस्कुराते हुए कटाक्ष करते हुए बिना निमंत्रण के आ गए हमें तो निमंत्रण भी गया था भेट भी गई थी लिवाने भी गए थे शायद आपके य निमंत्रण तो गया नहीं होगा कोई लिवाने तो गया नहीं होगा बहुत चोट सती जी के हृदय में एक केवल अगर प्यार से मिली तो माता मिली गले से लग कर के गदगद हो गई सती जी माता के मिलने पर सती जी ने पूरी यज्ञशाला में देखा कहीं भगवान शिव का कोई स्थान नहीं यह देखते ही माता के द्वारा मिला हुआ प्यार भस्म हो गया हृदय जलने लगा सर्व लोक महेश्वरी देवी शक्ति की अधिष्ठात्री अंबा उन्होंने
पूरे यज्ञ मंडप पर देखा सब उत्साहित कहीं भी भगवान शंकर का कोई भाग नहीं तो उन्होंने कहा ऐसा नहीं हो सकता कि प्रभु से बढ़कर प्यार माता-पिता का हो अपार क्रोधाग्नि प्रकट हुई ऐसा लगा संपूर्ण लोगों को भस्म करने के लिए अंबा ने ठान लिया है कहा दक्ष अब पिता नहीं कहा पिता श्री नहीं कहा दक्ष तुझे कर्मकांड के अभ्यास से बड़ा घमंड हमारे प्राण प्रीतम शिव से द्वेष करता है सती जी का ऐसा बोलना हुआ कि शिव पार्षद टूट पड़े ब्रह्म ऋषियों पर यज्ञ विध्वंस करने के लिए सती
जी ने सबको रोक रुको जब तक हमारा आदेश ना हो तब तक दंड किसी को मत दो सती जी ने कहा भगवान शंकर परम करुणा में उनसे तू द्वेष करता है सब लोग मुझे कहेंगे कि यह दक्ष की पुत्री है यह शरीर दक्ष से निर्मित है और तू हमारे प्राण प्रीतम शिव की निंदा करने वाला शिव का विरोधी यज्ञ में कोई शिव भाग नहीं अरे कोई वाणी से भी निंदा कर दे तो सर्वनाश हो जाए तू तो हृदय से उनसे द्वेष करता है ऐसा कौन होगा तेरे जैसा जो महादेव से विरोध करे जो दुष्ट मनुष्य स्वरूप शरीर को और स्प पदों को पाकर अभिमान करता है शिव की निंदा करता है आश्चर्य है आश्चर्य है अपने सर्वनाश को नहीं जानता इतने बड़े महान अपराध करने पर भी भगवान शिव ने तेरे लिए कोई दंड विधान नहीं किया तू महापुरुषों का निंदक जघन्य अपराधी दुष्ट पुरुषों में शोभा पाने वाला है दक्ष के प्रति ये यह है अपने इष्ट का प्रेम शिव ये दो अक्षर जिसकी जिव्या से निकल गए कभी कोई पाप उसको दंड नहीं दे सकता अहो ऐसे पवित्र कीर्ति देवाधि देव महादेव शिव की तूने अपमान वृत्ति धारण की तू अमंगल
रूप है तेरे अमंगल रूप से पैदा इस मंगल रूप शरीर को रखना मेरे लिए अय नहीं होगा जब मैं जाऊंगी तो दक्ष पुत्री कहेंगे भगवान शिव इसलिए शरीर को मैं नहीं रखूंगी जो मेरे प्राण प्रीतम आराध्य देव की विरोधी अंश से पैदा हुआ ऐसे शरीर को नहीं रखूंगी निरंकुश धर्म की मर्यादा का तूने विस्मरण कर दिया है आश्चर्य य होता है कि इष्ट का प्रेम कितना जोर का होता है मात पित्र प्रेम से ऐसा लगा था कि भगवान शिव की अवहेलना करके सती जी आ रही हैं लेकिन हृदय में कितना गुही प्रेम अपने आराध्य देव के प्रति है वैसे तो शास्त्र आज्ञा यही कहती कि अपने इष्ट और अपने पूज्य का अपमान होने पर शक्ति हो तो बल पूर्वक उसको दंड देकर बकवा करने वाली अमंगल रूप दुष्ट जिव्या को उसी समय काट डालना चाहिए छिंदा प्रस रुष मस्ति प्रभु जिव्या मसन पतो विस धर्मा ऐसा धर्म आदेश करता है नीलकंठ भगवान करुणा समुद्र शिव की निंदा करने वाले अगर कोई निंदनीय वस्तु खा ली जाए तो वमन करना ही उचित होता है इसलिए ते निंदनीय अंश से इस शरीर की रचना हुई है अब इसको रखना ठीक
नहीं है हे कामा शत्रु को जीतने वाले भगवान शिव क्षमा करना आपकी आज्ञा का उल्लंघन करके ममता वसाई पर अब मैं आपका अपमान सेने सक्ति आचमन किया नया पीला वस्त्र धारण किया आंख मुंदी योगा अग्नि का चिंतन किया शिव शिव शिव शिव शिव तत्काल श्री चरणों से अग्नि पैदा हुई और योगा अग्नि में शरीर भस्म हो गया क्योंकि अंबा है नहीं रखूंगी यह शरीर तेरा अंश है यह शरीर ये तेरा अंश है जब मैं जाऊंगी तो कहेंगे आओ दक्ष पुत्री ये मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी अब सब कोई कहेगा दक्ष पुत्री सती है इसलिए मैं अ शरीर को नहीं रखूंगी तूने मेरे इष्ट देव का अपमान किया जिस शरीर को भगवान शिव वा मांग में विराजमान करते थे महा मनसनी सती ने तत्काल अग्नि की धारणा की देखते देख देखते सबके बीच में भस्म हो गया शरीर अब तो हाहाकार मच गया क्योंकि रोकने वाले कोई थे नहीं पार्षदों को सती जी नेही रोका भारी विध्वंस मचाना शुरू कर दिया पर मंत्रों में बड़ी सामर्थ होती है ब्रह्म ऋषियों ने तत्काल मंत्र बल से सब सेव पार्षदों को रो और अध जली लकड़ियों से
पिटाई शुरू की मंत्रों का बल और आक्रमण का वेग ब्रह्म ऋषियों का बहुत बड़ा होता है ब्रह्म बल भाग पड़े शिव पार्षद अप हतम रक्षम ब्रह्म ऋषियों ने उच्चारण किया ऐसे मंत्र का उच्चारण करके आहुति दी तो यज्ञ कुंड से रिभु नाम के महान प्रतापी देवी शक्ति संपन्न प्रकट हुए शिव पार्षदों को मार मार के खदेड़ना प्रारंभ कर दिया यज्ञ विध्वंस नहीं कर सकते ब्रह्म तेज संपन्न उन रिभु की आक्रमण शक्ति इतनी प्रबल हुई भाग कर के शिव पार्षद कैलाश में आए इधर देवर्ष नारद जी पहले ही पधार चुके थे देवाधि देव महादेव जी की वंदना करके पूरी की पूरी सूचना तत्काल अभी दक्ष के यज्ञ में सती जी ने योगा अगनि में शरीर भस्म कर दिया देव जीने और इधर पार्षद भागते हुए गए और कहा मंत्र बल से विभूत देवताओं ने हमारी दुर्दशा कर दी भगवन हम असमर्थ हो गए कोई उनके आगे टिक नहीं सकता देवाधि देव महादेव जी का दात से ओठ चबाते हुए दांतों से स्प पर्षद सन्यम च तव र भुर भीर विद्राधि जटा तद दवन सट गरो च समम एक जटा पकड़ी उखड़ी और पटक दी भूमि पर जेही जटा उखाड़
कर पृथ्वी पर पटका मानो आकाश को छूता हुआ ऐसा महावीर प्रकट हो गया ना तो छाती की चौड़ाई दिखाई दे रहे थे ना शरीर की लंबाई दिखाई दे रही थ ऐसा विराट महान इतना विशाल था कि स्वर्ग से भी ऊपर उनका सिर हो रहा था हजार भुजाएं श्याम वर्ण सूर्य के समान जलते हुए तीन नेत्र विकराल भयंकर दाढ़े लाल लाल जटाए हा में हजारों हाथों में अस्त्र शस्त्र लिए हुए हाथ जोड़कर कहा जगतगुरु क्या आज्ञा है भगवान शंकर ने कहा तेरा नाम वीर रुद्र है तू उठ मेरे संकल्प से प्रकट हुआ है और जा दक्ष के यज्ञ को विध्वंस कर दे और जिन ब्रह्म ऋषियों ने हमारे पार्षदों को दंड दिया बला उनको दंड देकर के यज्ञ ध्वंस करके हमारे पास आओ देवाधिदेव भगवान शंकर की आज्ञा हुई तो वीरभद्र ने परिक्रमा की और चल दिया उस समय वो जब चरण रखता था तो ऐसा लगता था भूकंप आ गया ऐसा महान बलशाली भयंकर सिंगनाथ करता हुआ कराल त्रिशूल हाथ में लेकर यज्ञ मंडप की तरफ दौड़ा मानो काल दंड स्वयं पधार रहा हो ऐसी गर्जना की यज्ञ मंडप में लगा के आकाश से बिजली टूट गई और कैलाश से गर्जना
प्रारंभ की जितने बुद्धिमान त्वस थे वो तो लघु शंका जाना बोले जाओ महाराज वह समझ गए कि अब कुछ प्रसाद लंबा होगा तो पचास ब्रह्म ऋषि तो लघु शंका के बहाने निकल गए कहां तो इशारे की केवल जरूरत है ब्राह्मण लोग जने पहते इसका मतलब होता है कि लघु शंका जाना जो अपने तप अभिमान मंत्र बल के की पार्षदों को मार के मंत्र बल से भगा दिया था व वहां बैठे रहे दक्ष प्रजापति को मूर्छा से आने लगी अब यह तो लगा है कि सती जी भस्म हो गई हैं तो सती के पति कुछ करेंगे जरूर संघार मूर्ति भगवान रुद्र देव के द्वारा य जो वीर भद्र है प्रलय कालीन की अग्नि के स जटाए फहराता हुआ हजारों भुजाओं में अस्त्र शस्त्र लिए हुए मानो तांडव कर रहे हो भुजाओं के द्वारा ऐसे व पधारे और यज्ञ में आकर के गर्जना की अटस किया जितने महात्मा ब्रह्म ऋषि सब बैठे थे वह सब एक दूसरे की तरफ देख रहे हो शुरू कर दिया हरि ओम हरि ओम वहा कुछ नहीं हो रहा है अब पह ले तो भगवान शिव ने कुछ संकल्प नहीं किया था इसलिए देवी रिभु प्रकट हुए अब कुछ नहीं मंत्र से चाहे जितने
मंत्र उच्चारण करो चारों तरफ से शिव पार्षदों ने यज्ञ मंडप को घेर लिया अब एक चरण प्रहार किया जितने खंबे यज्ञ मंडप के से थे सब टूट गए वीरभद्र जी ने तरफ से यज्ञशाला को विध्वंस करने लगे जहा अग्नि प्रज्वलित थी शिव पार्षदों का व रुद्र रूप तांडव शुरू हुआ यज्ञ पात्र फोड़ दिए अग्नि हों को बुझा दिया काहे से लघु शंका से भ्रष्ट कर दिया वेदी को तोड़ दिया मंत्र बल से जो बंधी हुई थी और मुनियों की जो पिटाई शुरू की क्यों शिव द्रोही होकर मंत्र उच्चारण करते हो एक एकक देवता एक एक ऋषि की पकड़ कर के वीर भद्र नहीं कर रहे उनके संघ के कर रहे वीरभद्र ने प्रजापति दक्ष को जाकर ऐसे पकड़ लिया नंदीश्वर ने भग देवता को मणि मानने भृगु ऋषि को जो और भगवान शंकर ने कहा यथोचित दंड देना ज्यादा नहीं देना भगवान शंकर के पार्षदों की जो भयंकर लीला शुरू ई पूरा यज्ञ भ्रष्ट हो गया विध्वंस हो गया जो भाग रहे थे मार पिटाई सब ऋषियों की शिव द्रोही भगु जी हाथ में सुआ लेकर हवन कर रहे थे वीरभद्र ने धरी छाती पिला तो दाढ़ी उखड़ी मुछ उखाड़ अब व
कोई सम्मान कोई किसी का मंत्र बल किसी का तप बल कुछ काम नहीं कर सकता क्योंकि जब दक्ष प्रजापति शाप दे रहे थे तो मुस्कुरा मुस्कुरा के ऐसे ऐसे तो सबसे पहला काम किया भगु जी की दाढ़ी फसाई जड़ से उखारे मुच्छ खाड़ी क्रोध में भरकर जब भ भग देवता है यज्ञ के बहुत बड़े अधिकारी देवता है जब दक्ष जी श्राप दे रहे थे तो ये कहते ठीक है ठीक है दोनों आंखें पहले अमली डाल के निकाली इही आंखों से शिव विरोध करते थे भग देवता को पृथ्वी में उठा के पटक धया धरा टला छाती में दोनों आंखें उनकी निकाल ली अब दैवी शक्ति दिखाओ दक्ष देव सभा में जितने जितने सहायोग किए थे सबको यथोचित दंड मिल रहा है एक पूसा देवता थे साप देते समय उनके 3200 ऐसे उखाड़ लिए मार घोसे उनके एक ले ले गए दांत एक को ले गए पूसा देवता के आज भी उनको भोग लगाया जाता तो पिसा हुआ भोग लगाया जाता क्योंकि दात नहीं उनके अच्छा अब य मृत्युलोक में आकर के डेंटल हॉस्पिटल में लगवाए नहीं देवता है पूसा देवता को उठा के पटक दिया घूस से मार करर बत्ती सी पूरी बाहर कर दी जो जो
जैसे जैसे जब गाली दे रहे थे कटु वचन दक्ष कह रहे थे तो उस समय और जो ऋषि थे बढ़िया है बढ़िया जबान को अंगुली में फसा फसा मतलब जो लीला शिव पार्षदों ने की जो गालियां दे रहे थे उनकी जबान काट ली जवान उखाड़ ली अब दक्ष की छाती में बैठ कर के पूर्णाहुति यज्ञ की गला नहीं कटा हर अस्त्र का प्रयोग किया वीरभद्र ने दक्ष का गला नहीं कटा क्योंकि यजमान को सुरक्षित रखने के लिए मंत्रों के द्वारा कवच बांधा जाता है परम अस्त्र त्रिशूल का प्रयोग किया उन्होंने विचार किया यज्ञ की पूर्णता तो बलि से ही होती इसकी बलि कैसे दे भगवान शिव की कृपा से तत्काल ध्यान आ गया कि सब ऋषियों ने इसको ब्रह्म मंत्र से सुरक्षित रखा है तो उठा के पटक दिया हाथ से मस्त्र नहीं चलेंगे तो हाथ से नछ लिया खोप बैठ करके नोच लि और यज्ञ कुंड में स्वाहा पूरा यज्ञ विध्वंस कोई बोलने वाला नहीं हर हर महादेव कैलाश की तरफ वापस हुए रुद्र देव के सेवकों ने समस्त यज्ञ को विध्वंस कर दिया रित्व सदस्य जितने सब अच्छे से प्रसाद पा चुके थे किसी की आंखें नहीं हाथ
पकड़ के ब्रह्मा जी के पास किसी के दांत नहीं किसी के दाढ़ी नहीं मुछ नहीं जबान नहीं सब ब्रह्मा जी के पास पहुंचे बोले महाराज तो ब्रह्मा जी ने कहा सर्वांतर्यामी नारायण ही संभाल सकते हैं एक हमारे बस की बात नहीं रह गई देवताओं ने भगवान नारायण का चिंतन किया वह आए और कहा बताओ महादेव जी से विरोध करने पर किसका मंगल हुआ है उन्होंने कहा प्रभु आज से यज्ञ परंपरा बंद हो जाएगी न कहा कि भगवान शंकर का जिस यज्ञ में भाग नहीं होगा वो यज्ञ पूर्ण ही नहीं हो सकती हमारे मनाने से अच्छा है कि भगवान शंकर को मनाओ जाकर और वो मान जाएंगे तो हम आ जाएंगे यज्ञ में हम आ जाएंगे तो यज्ञ पूर्ण हो जाएगी पर उनको भाग दो तो कहा गया यज्ञ का समस्त अवशेष भाग भगवान शंकर का सब भगवान शंकर के पास गए प्रार्थना की बहुत रोए करुणा वरुणा ल राजी हो गए फिर यज्ञ हुआ तो यजमान जिंदा होना चाहिए यजमान की जो खोपड़ी थी जिससे तो उन्होंने साप दिया था भगवान को तो भस्म हो चुकी थी य हुआ क्या हो तो बोले जो बलि के लिए पशु था वही बलि पशु तो दक्ष बन गए तो बलि
पशु की गर्दन इनमें लगा दी जाए बकरे की गर्दन लगा दी गई तो दत जी खड़े होकर अब जिस जबान से साप देते थे उससे बोलने की क्षमता वो खत्म हो गई भगवान शिव के चरणों में जब गिड़गिड़ा आए पड़ कर के प्रसन्न हुए बोले यज्ञ पूर्ण होने चाहिए भगवान शिव की कृपा से यज्ञ पूर्ण हुई इधर अंबा जी भगवान शिव से बिलग होकर अपने शरीर को भस्म किया हिमालय के यहां जाकर के पार्वती जी के रूप में प्रकट हुई हिमालय पुत्री पार्वती बाल्यावस्था से ही निरंतर ध्यान स्थ रहना शिव अनुराग में जब किशोर अवस्था हुई किसी से कोई संभाषण नहीं करती थी माता जी हर समय भगवान शिव के ध्यान में निमग्न रहना कठोर तप करना शुरू कर दिया जो बिल्व पत्र सूख कर गिर जाते थे माता जी उसको अपने मुख में रख कर के पा लेती एक बिल अपर्णा शरीर सूखने लगा माता जी का नाम अपरण भारी तपस्या भगवान शंकर को एकदम बोध हुआ कि सती का जन्म पार्वती के रूप में हिमालय के यहां हो चुका है और वह हमारे लिए कठिन तपस्या कर रहे हैं तो सप्त ऋषियों को बुलाया और उनसे कहा कि जाओ इनके प्रेम की
परीक्षा लो जानते हैं सब कुछ जानते हुए भी होता है जैसे लोग कहते भगवान जानते हैं अपने भक्तो को तो परीक्षा क्यों लेते हैं तो पढ़ाया तो टीचर नहीं है तो सालाना परीक्षा तो होगी कि तुम क्या पढ़े हो ऐसे तुम्हारे प्रेम की परीक्षा होगी तुम हरि को चाहते हो या हरि की रची हुई माया को हरि की ई रची हुई माया में आकर्षित हो गए तो जीरो आ जाएगा व हरि की तरफ देखते रहे माया से बच गए तो नंबर आ जाएंगे 100 के 100 आते हैं यहां 98 96 नहीं आते दो ही चैप्टर है हरि पसंद कर रहे हो या हरि की माया हर भक्त के सामने आता है तो प्राया लड्डू ही खाने को मिलता है बचता वही है जो मामे प्रपद्यंते माया में ताम तरते केवल हरि पार्वती पह जाई प्रेम परीक्षा लेहु गिरि पेर पठ भवन दूर करहु संदेह हे सपत ऋषियों जाओ हमारी आज्ञा है पार्वती की प्रेम की परीक्षा लो यदि पास हो जाए तो उनको तपस्या से निवृत करो बोलो महादेव जी प्राप्त हो जाएंगे जाओ भवन को चली जाओ तपस्या की आवश्यकता नहीं ऋषियों ने जाकर के पार्वती जी को देखा मूर्तिमान तपस्या विराजमान
हो अस्थि मात्र हुए रहे शरीर सूखे पत्ते बिल के मुनि बोले हिमांचल नंदिनी इतना कठोर क्या प्राप्त करना चाहती हो किसकी आराधना कर रहे हो तुम्हारा लक्ष्य क्या है यदि हम सुनने के अधिकारी हो तो आप कृपा करके बता सकते हैं पार्वती जी ने कहा मन बड़ा सकुचा आता है आपसे बताने में आप लोग कहीं मेरी हंसी ना उड़ा दे जो मेरा लक्ष्य है मैंने भी बहुत सिखाने की कोशिश की लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा हट पकड़ लिया है क्योंकि मेरे गुरुदेव ने मुझे जो आकर के बचपन में बता दिया मैं वही हृदय से स्वीकार कर ली मन हठ परा सुन न सिखावा चहत बारी पर भीति उ ठवा नारद कहा सत्य सुई जाना बिनु पंखन हम चाही उड़ाना मुनियों वैसे आप भी हस दोगे ऐसा लगता है जैसे हम भारी प्रबल धारा में बालू का बांध बनाना चाहती हैं कहा भगवान शिव और कहा मैं मेरे गुरुदेव नारद ने बचपन में आकर के तुम्हारे पति देवाधि देव महादेव होंगे बस मैं तब से अपने पति की प्राप्ति की आराधना कर रही हूं पता नहीं आप मेरी बात सुनकर हसेंगे कि मानो बिना पंख के मैं आकाश को छूना चाहती
हूं इसी हस पड़े और कहा बात तो सही है पर्वत से उत्पन्न हुई हो तो इसलिए तुम्हारी बुद्धि भी हमें लगता है जड़ ही है नारद के उपदेश से आज तक किसी का घर बसा है नारद के उपदेश से किसी का घर बसा है अरे जिस जिसका उपदेश किया उस उसको बैरागी बना दिया गृहस्ती तो बनाया नहीं नारद उपदेश सुनकर किसी का घर बसा हो ऐसा आज तक प्रमाण नहीं है देखो दक्ष के पुत्रों को उपदेश किया 10000 एक को 1000 लौट कर नहीं आए सब बैरागी बन गए चित्रकेतु को उपदेश किया घर चौपट हो गया प्रहलाद जी को उपदेश किया पूरा हिरण कश्यप का नाश हो गया नारद सिख ज सु नहीं नर नारी अवसी होई तज भवन भिख रे गुरु नारद जी नारद जी की जो सीख सुना बर्बाद हो गया बाब जी बन गया भजना नंदी बन गया वैसे हम बताए नारद जी है बड़े कपटी ऊपर से साधु का चिन्ह अंदर से कपट क्या कपट उसके संसार का नाश कर देते हैं भगवान से जोड़ देते हैं मुझे नारद जी की बात कम समझ में आती है ये उल्टा बोल रहे ऋषि परीक्षा के लिए गुरु निष्ठा हटाने के लिए समझ रहे हो पार्वती जी ने कहा बचपन में मेरे
गुरुदेव ने बता दिया वही में नारद जी की बात आज तक घर किसका जो नर नारी नारद की बात सुने भवन त्याग करके भिखारी बन गया प्रमाण है उनके वचनों पर तुम विश्वास मान रहे हो महादेव जी को पति निर्गुण लज कुबस कपाली अकुल अगे दिगंबर ब्याली नारद जी ने तुम्हें भगवान शिव को पति बिल्कुल निर्गुण समझो निर्गुण को दूसरा भी अर्थ होता है और एक अर्थ होता है कि कोई गुण नहीं लज नंगे ंगे घूमते कभी कभी दिगंबर कोई लज्जा नहीं कुबस भाई सुंदर मुकुट लगाए हो पोशाक पहने हो नहीं चिता के भस्म लगाए मुंडो के माला पहने बहुत बहुत बागमबर डाल लिया यह कुबस है कपाली मनुष्य के मुंडो की माला अकुल आज तक कोई पता नहीं लगा किस किस कुल के हैं महादेव जी क्योंकि सब कुलों के मूल है मूल का मूल वही है उनके मूल कोई है नहीं आगे एक दीवाल नहीं है 6 हज योजन का एक बरगद का पेड़ है उसी के नीचे रहते 6 हज योजन एक योजन चार कोष एक कोष 3 किलोमीटर कितना बड़ा वटवृक्ष कैलाश में एक वटवृक्ष जिसके नीचे रहते 6 हज योजन का छह ऋतुए शोभा देती उसी वटवृक्ष के और कोई घर तो
है नहीं माहादेव जी के और आभूषण भूल मत करना बड़े-बड़े विषैले सांपों का आभूषण कोई सोना चांदी नहीं पहनते महादेव जी हमें लगता है ऐसा दूल्हा के लिए ऐसा तप नारद जी ने ठग लिया तुम्हें पागल बना दिया तुम्हें देवाधि देव महादेव के सुनो इन्हीं ने शिक्षा दी थी सती को ऐसे बरे पति मिले आग में जाकर शरीर भस्म करना पड़ा इसलिए हम तुम्हें बता रहे कि बहुत सुंदर दूल्हा हम देख के आए हैं हम जान गए थे कि तुम तपस्या कर रही हो हरि का नाम सुना बैकुंठ में रहते बहुत सुंदर हरि
है यदि उनका आप वर्ण कर ले तो सुखी हो जाएंगे बैकुंठ राजधानी अब आभूषण उनके क्या कहना पार्षद सही ऐसे शिव जो चिता की राख लगा लगाते सांपों की माला पहनते मुंडो की माला सांप का जनीव बागमबर हमें तो पसंद नहीं आए और हमारी बात मान लो ऐसे के पास स्त्रियां टिक नहीं सकती जिनके घर नहीं आभूषण नहीं धन नहीं कोई भोग सामग्री नहीं उदासीन उनको किसी से मतलब नहीं तो सुनो हमारा विचार स्वीकार कर लो अति सुंदर सुच सुखद सुशीला गाव वेद जासु जस लीला असवर तुम मिलाव आनी बहुत सुंदर त्रिभुवन पति बड़े सुशील गुणवान जिनका यश वेद गाते गाते अघाते नहीं है कोई दोष नहीं सद्गुणों के समुद्र लक्ष्मी पति बैकुंठ ध पति तुम्हें कुछ नहीं करना हां बोलो वह आएंगे गरुण पर बैठा के ले जाएंगे तपस्या करने की जरूरत नहीं पार्वती जी बहुत हंसी सुनती बहसी कहा वचन भवान अच्छा अच्छा अच्छा आपने ठीक कहा कि पर्वत से हमारा प्रादुर्भाव हुआ है इसलिए आपको यह भी पता होगा कि पर्वत बहुत हठीला होता है जहां डटा है वहीं ड रह सकता है सुनो पर्वत से सोना भी उत्पन्न
होता है जो आग में जलाने पर भी अपना तेज बढ़ाता है घटाता नहीं तो मेरे गुरुदेव के प्रति ऐसा बोले कि वह जिसको उपदेश करते हुए उसका घर उजड़ जाता है तो बसो भवन उजर नहीं डर पर नारद वचन न मैं परिहर अपने गुरुदेव के एक भी शब्द को मैं नहीं काट सकती चाहे मेरा जीवन रहे या ना रहे बसन हमारा हमारा भवन हमारा श्रंगार हमारा सर्वस्व ये मिले या ना मिले पर हमारे महादेव जी मुझे मिले तुम आभूषणों की बसन भूषण की बात कर रहे हो ग्रह की बात कर रहे हो पद की बात कर रहे हो गुरु के वचन प्रतीति न जही सपनेहु सुगम सुख सिद्धि तेही एक बात तुम्हे बता दूं सत ऋषियों जिसे अपने गुरुदेव के वचनों पर विश्वास नहीं गुरुदेव का भरोसा नहीं उसे कभी कोई सुख और सिद्धि कदा प्राप्त ही नहीं हो सकती महादेव वगुण भवन विष्णु सकल गुण धाम ज कर मनोरम जा संते तेही स काम आपने बताया कि महादेव में कोई गुण नहीं है और विष्णु समस्त सद्गुणों के धाम मैं मानती हूं लेकिन मेरा मन महादेव जी से रम गया है अब तो केवल महादेव जी पहले मिलते हो सलाह करते तो तुम्हारी बात
सुनती अब तो गुरुदेव नारद जी ने जो उपदेश किया वही मैं करूंगी अब मैं जन्म संभु हित हारा को गुण दूषण करे विचार ये इष्ट निष्ठा होनी चाहिए अब तो हमारा जन्म आराध्य देव के लिए अब कौन गुण दोष का चिंतन करे जन्म कोटि लग रगर हमारी बर शंभु नता रह कुमारी करोड़ जन्म लूंगी अगर इस जन्म में महादेव जी ने मिले तो करोड़ जन्म लूंगी हर जन्म तप करूंगी पर हमारे प्रीतम होंगे महादेव पति होंगे महादेव तजना नारद कर उपदेश आप कहाई सत बार महेश हजार बार आकर के सैकड़ों बार आकर महादेव जी भी कह कि अपने गुरुदेव के वचन छोड़ दो तु अपने गुरुदेव के वचनों का त्याग करने वाली नहीं आप जा सकते हैं बहुत जगत में कुंवारी कन्याएं और कुवारे वर है उनका ब्याह करा दीजिए मेरी तो केवल एक ही बात रहेगी हर जन्म महादेव जी के लिए समस्त सप्त ऋषियों ने साष्टांग दंडवत की और कहा जगदंबा आप नित्य शिव की अर्धांगिनी भगवान शिव ने ही मुझे भेजा था आपकी परीक्षा के लिए जाओ भगवान शिव सब जान रहे हैं ब्याह पक्का अब आपको तप करने की जरूरत नहीं है तुम माया भगवान
शिव सकल जगत पितु मात नाई चरण सिर मुनि चले पुनि पुनि हर सत गात प्रणाम करके सत ऋषि गए हिमांचल से कहा सादर अपनी कन्या को लेवा लाओ और ब्याह की तैयारिया श करो महादेव जी ब्याह के लिए पहले से ही राजी है और समस्त देवता ब्रह्मा जी आज उनके पास जा रहे प्रार्थना करने के लिए इधर जब पार्वती जी को लेकर हिमालय अपने घर पर आते हैं तब भगवान विष्णु समस्त देवता ब्रह्मा जी कैलाश पहुंचे जहां भगवान शिव विराजमान थे सबने स्तवन किया और कहा प्रभु बहुत दिन से एक लालसा है सकल
सुरन के हृदय शंकर परम उछा ह निज नैनन देखा चा नाथ तुम्हार विवाह भगवान विष्णु ब्रह्मा जी समस्त देवताओ ने कहा प्रभु हम सबके मन में एक उत्साह है आप लाओ हम सब बाराती हो आपका विवाह देखना चाहते हैं प्रभ यह उत्सव देख ले तो हमारा जीवन सार्थक हो गया आप हां बोलो कामदेव के मद को चूर करने वाले आपको दूहा रूप में देखना चाहते हैं हम सब स्वामी का स्वभाव होता है सेवक को सुख देना पार्वती जी ने अपार तप किया है आपके लिए आप उनको अंगीकार कीजिए भगवान विष्णु ब्रह्मा जी की प्रार्थना सुनकर के भगवान शिव जी ने कहा तथास्तु ठीक है व्या पक्का देवताओं ने नगाड़े बजाए फूलों की वर्षा होने लगी देवाधि देव महादेव की जय के नारे कैलाश में गूंजने लगे सपत ऋषि भगवान शिव के पास आए कहा प्रभु बड़ी अनन्य है पार्वती जी आपकी अखंड प्रेम है हमने बड़ा छल करके उपदेश किया लेकिन उन्हो उने कहा कि मैं नारद जी का उपदेश नहीं त्या सक्ति करोड़ों जन्म लूंगी और हर जन्म महादेव जी के लिए भगवान शिव जी की आंतरिक वृति जो पार्वती जी की प्रीति की है उसे
कोई नहीं जानता बहुत विरह में रहे ऐसा ना समझे कि देवाधिदेव महादेव जी परम उदासीन है नहीं जी के वियोग में बड़ी विचित्र दशा महादेव जी की हुई थी सत ऋषि फिर गए पार्वती जी के पास और कहा भी बीच में घटना घट गई कामदेव गया था महादेव जी की समाधि को भंग किया तो महादेव जी ने कामदेव को भस्म कर दिया तो अब ब्याह का मतलब क्या रह गया भवानी ने कहा तो तुम क्या अभी तक भगवान शिव को काम युक्त देखते थे क्या क्या तुम समझते हो तुम्हारे जान काम अब जारा अरे अब लग शभु रहे सकारा तुम्हारी नजर में अभी तक भगवान विकारी थे अब काम को भस्म किया है अरे हमने भगवान शिव की आराधना की हमरे जानी सदा शिव जोगी अ अनद अकाम अभोगी मैंने तो शिव को सदा ही योग संपन्न ब्रह्म बध देखा है वचन और कर्म से मन से मैंने यदि भगवान शिव को अपना स्वामी माना है योगी अजन्मा अनिंद्य काम रहित भोग हीन तो निश्चित मुझे प्राप्त होंगे भगवान शिव के पास फिर सत्य ऋषि गए बोले प्रभु गजब की निष्ठा है केवल आपके प्रति प्रेम है ब्रह्मा जी ने लगन रची सप्त ऋषियों को
बुलाया और कहा ब्याह दोनों तरफ यह लड़की पक्ष की लगन य वर पक्ष की लगन ब्याह तय हो गया दिन नक्षत्र घरी नगाड़े बजने लगे देवताओं के लिए सुमन वृष्टि हुई ब्रह्मा जी ने सबको बुलाया हिमालय ने सबको निमंत्रण दिया बड़े-बड़े पर्वत भेंट लेकर आ रहे हैं बड़े-बड़े रस निधि समुद्र भेंट लेकर के आ रहे वहां भोजन पान के लिए हिमालय के पास कोई कमी थोड़ी थी रस की नदियां बह रही थी विविध प्रकार के रस विविध प्रकार के फल विविध प्रकार के भोग वहां सब व्यवस्थित किए जा रहे ब्रह्मा जी ने कहा देखो सबसे पहले नारायण की समाज रहेगी दूले की नहीं रहेगी नहीं तो गाली ही पड़ेगी हिमाल के प्रवेश पाने के लिए बारातियों में सबसे पहले नारायण फिर देवराज इंद्र का परिकर वायु देवता अग्नि देवता सब सबसे पीछे दूहा की बारात बात तय हो गई ऐसे ऐसे सब लगे सवार सकल सुर वाहन विविध विमान होही सगुन मंगल सुब करहे अप्सरा गान सब अपने अपने वैभव संपन्न सब तैयार हो रहे हैं बोले महाराज दूल्हे को तैयार किया जाए शिव ही शंभु गन करही सृंगारा जटा मुकुट अहि
मोर सवारा कुंडल कंकन पहिरे व्याला तन विभूति पटके छाला सश ललाट सुंदर सिर गंगा नयन तीन उपवत भुजंगा गरल कंठ उर नर सिर माला अ शिववे शिव कृपाला कर त्रिशूल अरु डमरु बिराजा चले बसा चढ़ी बाज ही बाजा देखी सि वही सुर त्रय मुस काही बर लायक दुल्हनी जग नाही दूहे की तैयारी हो रही भाई चिता की भसम चिता की भसम से पाउडर ले पहले चिता की भसम लगाए गई अब जटाए बांधी गई जटा ऐसे त्रिभुवन का विनाश जब करना होता जटा खोलकर जब तांडव करते तो कोई नहीं बचता जटा कटा सम भ्रम भ्रम निलम निर्झरी बलोल चिवरी विराजमान मोरधन धग धग धग जो ललाट पट पाव के तीसरा नेत्र मानो विश्व का विनाश करने के लिए उसे पट बंद किए हुए विशाल जटाए जटा का तो मुकुट सवाला आ गया जटा बंद है कासे सांप यह मुकुट साप और कुंडल करिया और भूरी बीछी हा सोने चांदी के नहीं डंक मार दे तो बेहोश हो जाओ पहिरे बयाला बाजू बंद छोटे फण वाले कोई पनिया कोई दुम और ऐसे जनेऊ वासुकी नाग गले के माला भगवान का विभूत ऐसा स्वरूप है और शेर की छाल नीचे सश ललाट दुतिया का चंद्रमा सस ललाट य
मुकुट द्वितीय का चंद्रमा सुंदर सिर गंगा भगवती गंगा फरी ले उठते जठ के बीच से गंगा जी नयन तीन माथे वाला बंद है दो खुले हैंपर त भुजंगा जनेऊ वासुकी नाग गरल कंठ नीलकंठ विसिया रो के हुए और मुंडो की माला हाथ में त्रिशूल डमरू बंधा हुआ नंद केश्वर पर सवार बोले ऐसे दूल्हा के लिए दुलहन तो त्रिभुवन में नहीं मिलेगी ऐसा दूलक दुलन का मिलेगी अच्छा दूल्हा सज गया ब्रह्मा जी ने देखा बोले महाराज आगे आपकी सवारी नारायण भगवान उनके चतुर्भुज पार्षद शोभा सुगंध सौरभ आगे गरुड़ पर सवार पीछे हंस पर सवार ब्रह्मा जी अपना परिकर देवराज इद्र भगवान विष्णु जी दूहे की तरफ देखे बोले महाराज विष्णु का अस बहस तब बोल सकल दिराज बिलग बिलग होई चलो सब निज निज सहित समाज कोई भी दूहे के पास मत फटको पीछे रहने दो सब अलग अलग समाज चलो नहीं पानी नहीं मिलेगा हिमालय के अगर आगे हुए तो अब तो वर अनुहार बरात न भाई हसी करयो पर पुर जाई नारायण ने कहा कि दूल्हा के अनुरूप ही हम सब बाराती नहीं भैया दूल्हा सबसे पीछे सब बाराती क्रम से पहले हम फिर
ब्रह्मा जी फिर देवराज इंद्र से सब भगवान शिव ने कहा तुम अपने पार्षद सब लिए हो हम बुलाते हैं संगी निकाली ही बजाया तो भगवान शिव के पार्षद आ गए शिव अनुशासन सुनि सब आए प्रभु पद जल शी जय हो महाराज की आज्ञा करो अरे बोले विवाह हमारा बहुत दिलों से आओ चुप्पा जैसे देखो ना अगिया बैताल अब कैसे शिव के बराती है जरा यह आगे पार्टी तो निकल गई बंदनी यह जो भगवान शिव ने बुलाया बारातियों को अपने साथियों को को मुख न बिपुल मुख काहु बिनु पद कर को बहुपद बाहु विपुल नयन को नयन हीना रिष्ट पुष्ट को अति तन खना किसी के एक को मुख नहीं केवल मानस का पिंड है और किसी के पूरे शरीर में मुखे मुख है किसी के एक भी हाथ पैर नहीं है लुकता चल रहा है और किसी के बहुत से हाथ पैर है किसी के नेत्र नहीं है किसी के बहुत नेत्र है बड़ा विचित्र किसी के हड्डी हड्डी है तो कोई बहुत मोटा है कोई बहुत पतला है तन खीन को अति पीन पावन को पावन गति धरे भूषण कराल कपाल कर सब सद सोनित भरे रवान सुमर सु काल मुख गन भेस अगत को गने बहु जिनस प्रेत पिशाच जोग जमात
बर्नत नहीं बने पिशाच नहीं खून लपेटे नाच रहे भगवान शिव का विवाह और भूत और किसी के सुअर के मुह किसी के कुत्ता के मुह किसी के गदा में बड़ा विचित्र भेस भगवान के शिव के पास नाच गावे गीत कौन अप्सरा गंधर्व नहीं परम तरंगी भूत यह गाल हो रहा हड्डी हड्डी है भूत की भगवान शिव के सामने नाच रहा ल कैसा शोभा होगी खून लपेटे पिशाच नहीं अगिया बैताल रोड लाइट अगिया बता भगवान शिव की बरात भूत प्रेत बड़े मौज स्वामी का विवाह हो रहा है ूब रक कर नाच रहे देख ले तो मूर्छा आ जाए अब बनी है बारात तो जस दूला तस बनी बराता बाजा कौन बाज रहे हैं कोई गाल बजा रहा है कोई मुंह बजा रहा है व बैंड थोड़ी बज रहे है कोई चीख रहा है तो जैसे अलग अलग तुरही बज रही है वहां कोई बाज नहीं सब भूत है भूत प्रेत पिशाच ऐसे स्वर निकल रहे हैं अब भगवान श्री चले नंद के पर सवार होकर जस दूल्हा तस बनी बराता हिमालय बड़े उत्सव में है देवाधि देव महादेव जी की महिमा हिमालय की पत्नी से नारद जी ने सब सुना रखी है अब तो जितने भी सुंदर सुंदर सब पदार्थ सब
व्यवस्थाएं सब कि हाथ जोड़े खरे हैं जगदंबा जहां विराजमान व सिद्धियों की कौन सी कमी है यह हुआ कि जय हो बारात पधार रही है सामवेद का गान करते हुए गरुण पर विराजमान भगवान ना सब हिमालय वासी ओहो धन्य है धन यही दूल्हा है बराती है दूल्हा तो बहुत सुंदर होंगे सब देख के लुभ मान हो गए नारायण परिकर पीछे देखा हंस पर सवार भगवान ब्रह्मा जी चतुर्मुख वेद सब दूल्हा पीछे गांव के नगर के लोग यह दूला सयाने लोग कहते दूला दूल्हा तो यह तो ब्रह्मा जी है देवराज यह दूला नहीं नहीं नहीं दूला नहीं यह दूहे की बाराती गजब इतने सुंदर दू लेकर बराती तो दू ला तो फिर बहुत हृदय में आनंद उत्साह है नगर की बालक बालिकाओं न बधु को ऐसे देख र दूहा कौन है ऊपर से जब सब निकल गए तो बहुत हृदय में आनंद था कि अब दूहा के दर्शन होंगे जोई दूहा की पार्टी आई शिव समाज जब देखन लागे चले बाहन सब जितने अगवाली कर ले आए थे धोती संभाल के जान बचा के भागे जो बड़े बूढ़े थे जो महिमा सुने थे वो धरी धीरज ताहा रहे सयाने बड़ी हिम्मत करके रुके कि शिव है लेकिन जो
नौजवान बालिका बालिकाएं बूढ़ी नौ बहुए एक वहां मंगलाचार में नहीं टिकी सब भगवानी भाग पड़ी धीरज धर कर के बालक घर में पहुंचते जवान पहुंचते बहुए क्या क्या बात है तुम लोग भयभीत क्यों हो गए कोई घटना घटी क्या ब्या में क काह कही जाई ना बाता य जमकर धार की धो बरिया आता बरात है यमराज की पूरी सेना आ गई भैया दूल्हा देखा देखा कैसा बोले बरु बौरा बसह असवारा व्याल कपाल विभूषण छारा देखा है दूला बरु बराह बरु बराह बावरा है क्यों बैल पर सवार है सांप की माला पहने भसम चिता की लगाए मुंडो की माला अरे पूछो मत ऐसा दूहा दूले के सरी तन छार बल कपाल भूषण नगन जटिल भयंकरा संग भूत प्रेत पिसा जोग बिकट मुख रजनी चरा जी के लौट के बता रहे भाग्य मनाओ जो जियत र बारात देखत पुण्य बढ़ते ही कर सही जिंदा लौट आए बड़े पुण्य समझो जो बारात देख ले जिंदा रह जाए बड़े भाग्य तिन के देखी सोमा विवाह घर घर बात सब लकन सबने कहा कि अगर दूल्हा को बराती को देख के जिंदा रह जाए तो विवाह देख पावेगा मतलब जिंदा नहीं रहेगा जो बड़े बुजुर्ग थे वो समझा रहे
देखो भगवान शिव है उनकी समाज है सबको वास दिलाया गया अ आरती करने के लिए सुमंगल गाने के लिए नवीन नवीन स्त्रियां पार्वती जी की माता के साथ आ रही हैं मैना सोने की थाल है बड़ा आनंद है दूल्हा का प्रथम दर्शन और आरती लेकर जे भी देखा दूल्हा को यही दूहा है हां भारी रोस पैदा हुआ कि नारद जी ने बर्बाद कर दिया हमारा घर हमारी बिटिया सूखे पत्ते खाके इसके लिए भजन करती रही मैला जी ने पीछे मुड़ के देखा एक भील स्त्री थी अकेले ताली लिए खड़ी थी लौट के आई उन्होने कहा कि
सब भाग क्यों पड़ी बोले प्राण बचाए ऐसे ऐसे करिया फुकार रहे थे कोई थाली पटक दी आरती की गई पार्वती जी को गोद में बैठाला और रोने लगे बिटिया ऐसे के लिए बजल के हो ऐसे के लिए तपस्या किए हो आंसू भर के कहा कि विधाता की बुद्धि मारी गई जिसने तुम्हारी जैसी सुंदर कन्या वो ऐसा बाबर दहा यह संयोग रचा है बुद्धि खराब हो गई ब्रह्मा की कस कीन बरु बरा वि तुम सुंदरता त्रिपुर सुंदरी भगवती पार्वती जी अरे जो फल लगना चाहिए कल्प तरु में बमर में लग रहा है य आज वही दिल उत्सव
ब्या का उत्सव भगवान श अच्छा तो मेरा निर्णय सुन लिया जाए मैना जी का अगर मेरी बात नहीं मानी गई तो हिमालय के शिखर से अपनी बेटी को लेकर गिर के आत्महत्या कर लूंगी ब्याह नहीं होने दूंगी फाइनल तुम सहित गिरते गिरो पावक जरो आग में जल जाऊंगी अपनी बेटी को लेके समुद्र में डूब जाऊंगी लेकिन ऐसे बरे बरा जो यह बर है इसके साथ ब्याह नहीं होने दूंगी पक्का सबब रोने लगी मैना जी का आदेश सुनकर मैना जी कहती हाय मैंने नारद जी का क्या बिगाड़ा था नारद कर में काह बिगा भवन मोर जिन बसत उजा कितना बढ़िया सब चल रहा था बेटी को उपदेश किया कि वर तुम्हारे शिव देवाधि देव महादेव बर्बाद कर दिया सब ऐसा दूल्हा सच्ची मैं ठगी गई नारद जी के द्वारा पर अब अपना घर बर्बाद नहीं होने दूंगी क्या जाने नारद जी बेटी का प्रेम क्या होता है बांध कभ प्रसो की पीड़ा जानती है क्या जाने बाबा जी हमारी बेटी ऐसा दूल्हा जब देखा कि मां बहुत गुरुदेव को उल्टा सीधा बोल रही है तो उन्होंने कहा माता विचार पूर्वक जननी ही विकल विलोक भवानी बोली विवेक मृदु बानी
मां विचार पूर्व तुम क्यों ऐसा आलाप कर रहे हो अगर मेरे भाग्य में ऐसा पति लिखा है तो तुम टाल नहीं सकती कर्म लिखा जो बाउर नाह तो कत दोष लगाई का हो तुम सन मिटे की विधि के अंका व्यर्थ लेहु जन मातु कलंका मां मेरे भाग्य में ऐसा ही लिखा है आप व्यर्थ में क्यों रो र जब पार्वती जी की करुण बात सुनी तो सब स्त्रियां रोने लगी विधाता को दोष लगा रही नारद जी के पास हिमालय गए बोले हम तो संभाल लेंगे घर में सब गड़बड़ हो गया अरे इनको समझाते कि ठीक से आते कैसे आए हैं यह जैसे विनाश कर ले आए हो अरे ब्याह कर ले आए घर में सब बिगड़ गया मैना बिखर गई ब्याह बंद अब नहीं होगा संभालो जाके नारद जी गए और जाकर के मैना को कहा देखो ये इनका बाहरी रूप है ये जो आपके यहां पार्वती के रूप में जन्मी नित्य इनकी अर्धांगिनी सती है जो यज्ञ भवन में शरीर छोड़ कर के आपके यहां जन्मी य इनकी नित्य संगिनी है आप ऐसा शोक मत कीजिए नारद जी विविध प्रकार से माता को समझाया इनके द्वारा एक भ्रम हो गया था तो इनको शरीर त्यागना आवश्यक हो गया जब भगवान
श्रीराम सिया जी के लिए हे खग हे मृग हे मधुकर श्रेणी तुम देखी सीता मृग नेनी ऐसा पुकार रहे तो भगवान शिव ने प्रणाम किया और सती जी के मन में संशय हुआ सती जी ने सीता वेश धारण किया जब भगवान शिव ने जाना तो उसी समय त्याग कर दिया था क्या अर्धांगिनी रूप में कभी स्वीकार नहीं कर क्योंकि पूज्य माता का रूप आपने धारण किया तो मूल बात यह थी इसीलिए योगा अग्नि में जाकर शरीर को भस्म कर दिया और आपके यहां पार्वती जी के रूप में जन्मी है जब नारद जी ने बताया कि आप बिल्कुल धैर्य रखिए भगवान शिव का वैभव आपने देखा नहीं इनका बाहरी रूप है समझाया मैना को तसल्ली बोले अभी दूल्हा रूप आपको दिखाते हैं आप चुप रहिए तब मैना के हृदय में कुछ शांति हुई जितने गांव के नगर के सब लोग थे सबको सूचना पहुंची डरो मत भगवान शिव है य लीला कर रहे हैं अभी नारद जी गए और बोले विवाह करना है कि नहीं करना शंकर जी से कहा बोले आए इसीलिए बोले यह सब बंद करो आप यह रूप से विवाह होता है हमारी सारी बिचौलिया में पीट रहे उधर जाओ तो उधर यह रूप हटाओ बोले
कौन सा रूप धारण करे दूला रूप धारण करो भगवान शिव ने जेही बहुत सुंदर शिव है पूर गरम चिदानंद 16 वर्ष की अवस्था हाथ में दर्पण और अद्भुत मुकुट धारण की हुए जटाए ढकी हुई गौर वर्ण वो सुंदर रूप जो देखे सो मोहित हो जाए धय नित्यम मसम जति किम चारु चंद्रावत सम कैसा सौंदर्य रूप महादेव जी का चलो अब जो जेवनार के लिए सब शुभ नौ बध हुए सब मैना जी को बोला देखो दुलार है एक एक कदम ऐसे चल रहे संभाल संभाल के जैसे चलना सीख रहे हो तांडव करने वाले चरण है पर नारद जी ने अब नहीं नौ किशोर अवस्था हाथ में दर्पण वो सुंदर रूप भगवान शिव का एक एक कदम बारात में जो देखे सो मैना ने कहा हो भाग्य ऐसे दूहा बोले वही है जो नंदी पर सवार थे इनके स्वरूप को जानना बड़ा कठिन है अब जो सुंदर जेवनार हुई बारातियों के साथ भगवान शंकर की बड़े मधुर गीत गाए जा रहे हैं मुनियों ने फिर हिवा को लगन पत्रिका सुनाई विवाह का ठीक समय देख कर के समस्त देवता और वेद स्वयं मूर्तिमान हो वेद उच्चारण कर रहे हैं भगवान शिव का पाणी ग्रहण संस्कार हो रहा है पार्वती
जी जब श्रृंगार करके सभा में आई व्याह मंडप पर तो कोई ऐसा नहीं था जो देखकर मोहित ना हो गया हो त्रिपुर सुंदरी अंबा है लेकिन सबने उनके श्री चरणों में सर झुकाया क्योंकि जगदा अपमा महेश पुरारी जगदंबिका जानि भ मा सुरन मनन मन कीन प्रणाम ऐसा सुंदर रूप अंबा जी का त्रिपुर सुंदरी है जब व दुलहिन रूप में पधारी कोई भी ऐसा नहीं था जो एक बार देखकर मोहित पर सब श्री चरणों में क्योंकि जगदंबिका है भगवान शिव की आद्या शक्ति है सुंदरता मरजाद भवानी जायन कोट बदन बखानी करोड़ों मुखो से यदि वर्णन हो तो इस समय जो पार्वती जी का का सुंदर रूप है नौ किशोरी और दुलन रूप पारस में बैठे अत्यंत सुकुमार कपूर और चांदी की तरह गौर वर्ण एकम तेजों में विशाल नेत्र स्वर्ण आदि के आभूषण कहीं कोई एक बु सर्प कुछ नहीं बिल्कुल नौ किशोर राजकुमार स्वरूप भगवान शिव पार्वती का मन रूपी भवरा शिव जी के रूप को देखकर लुहा मान हो रहा है आज्ञा ई ब्याह प्रारंभ हो आश्चर्य की बात गणेश जी का पूजन सबसे शुरू हुआ लो मुनि अनुशासन गणपति पूज शभु भवानी गंवा
गणपति गवा महे प्रियाना लो बोले गणेश जी पार्वती जी के मतलब पुत्र का भावत उटल लगा रही थी उसी से य आद गणेश है याद गणेश है जैसे आदि ब्रह्म जैसे आदि ब्रह्म स्वरूपय गणेश है भगवान शिव और पार्वती जी ने प्रथम गणपति पूजन किया मुनि अनुशासन गणपति पूज शभ भवानी को सुनि संशय करे जनी य अनाद जी जान कोई संशय मत करना कि वो पुत्र है जो पार्वती जी से प्रकट हुए बोले नहीं अनादि गणपति का पूजन हो रहा है जो ब्रह्म गणपति है जस विवाह के विधि श्रुति गाई महामुनि सो सब करवाई गही गिरीश कुछ कन्या पानी भव समर्पण भवानी पाणी ग्रहण संस्कार किया कन्यादान यह बहुत बड़ा गृहस्थ धर्म में परम पावन है देखो जो हमारी पूर्व धर्म मर्यादा की संस्कृति कितनी पावन संस्कृति है जिसको आज हम भूलते चले जा रहे हैं मनमानी आचरण करते चले जा रहे हैं इसलिए गृहस्थ भी सुखम नहीं रह गया है गृहस्थ अगर धर्म के अनुसार हो तो उसको परम पद की प्राप्ति होती परम मंगल होता है बहुत यह जो हमारी धर्म मर्यादा है बहुत सुख देने वाली है लेकिन इसका प्रतिदिन उल्लंघन ही
होता जा रहा है ना माता से मतलब ना पिता से मतलब मन माने आचरण से मतलब जो मन जैसे आवे वैसे बहे यह हमारी धर्म मर्यादा देखो स्वयं भ कैसी मर्यादा है पानी ग्रहण कर रहे कुछ जल मंत्र ब्रह्म ऋषि साक्षी फिर पानी ग्रहण पानी ग्रहण जब कीन महेशा य हर से तब सकल सुरेशा वेद मंत्र मुनि बर उचर जय जय जय शंकर सुर करही बा जही बाजन विविध विधाना सुमन वृष्टि नव भय विधि नाना जिस समय पाण ग्रहण भगवान देवादार का हुआ समस्त देवता मुनि गण उच्चारण करते हुए जय हो जय हो जय हो विविध
बाजे बज रहे पुष्पों की वर्षा हो रही हर गिरजा कर भय विवाह सकल भुवन भरी रहा उछा भगवान शिव और पार्वती जी का विवाह संपन्न हुआ बहुत कुछ श्री चरणों में भेट रख कर के हिमांचल ने प्रार्थना की प्रभु आप तो कृपा के समुद्र है अगर मेरी पुत्री से कभी कोई गलती हो जाए तो क्षमा करना नाथ मा मम प्राण समम ग्रह किं कररी करे क्म सकल अपराध ई प्रसन्न वदेव हे शिव आपसे एक ही प्रार्थना है मेरी पुत्री अबोध है कभी कोई गलती कर दे तो हे नाथ मैं क्षमा चाहता हूं मेरी पुत्र से कभी
आप रुष्ट मत होना बहुत प्रकार से भगवान शिव ने उनको आशीष दिया नस बंधाया फिर भगवान शिव और उमा आनंद पूर्वक कैलाश पधारे चरित सिंधु गिरजा रमन वेदन पा ही पारू बरने तुलसी दास किमी अति मति मंद गवा क भगवान शिव की महिमा को तो वेद नहीं पार पा सकते गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे मैं भला उस महिमा को कैसे गा सकता हूं मैं तो गवार बुद्धि का हूं भगवान शिव और माता पार्वती जी आज भी भी कैलाश में विराजमान है हर गिरजा बिहार नित न यह विधि विपुल काल चले गयो भगवान शिव और पार्वती का जो मंगलमय विवाह सुनेगा भगवान के चरणों में प्रीति समस्त पापों का नाश होकर हृदय की निर्मलता हरि हर में प्रीति निश्चित प्राप्त होती है क्योंकि परम वैष्णवास्त्र अहंकार के अधिष्ठात्री और जब तक अहंकार रहता है तो हरि के चरणों में या प्रिया जू के चरणों में प्रीति नहीं होती सुनहु राम कर सहज स्वभाव जन अभिमान न राखे काहो तो भगवान शिव जिस पर कृपा करते तो अहंकार का अपहण कर लेते हैं और दैन्य भरी भक्ति हरि के चरणों में हो जाती है इसीलिए भगवान श्री
राम अपने अयोध्या वासियों से हाथ जोड़कर कहा और एक गुपत मत सबई क कर जोरी शंकर भजन बिना नर भगति न पावे मोरी भगवान शिव और पार्वती का ब्याह संपन्न हुआ आज भी कैलाश में नित्य विहार करते हुए विराजमान है ऐसे उनके चरणों को प्रणाम करके अपने आराध्य देव के चरणों में प्रीति मांगते हैं नमः पार्वती पते हर हर हर महादेव जय जय श्री राधे श्याम m
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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