सब बात बन जाएगी, बस यह बात पकड़ लो / भौमासुर का उद्धार, और 16100 राजकन्याओं के साथ भगवान् का विवाह
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
वृंदा वनेश्वर तैव पदारविंदम प्रेमा मृत मकरंद रसो पूर्णम हदर पितम मधुपति स्मर काप मग्रमस मा शयाम निर्वा पय परम शीतल मा शया परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नव निवृत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले युगल सरकार प्राणा राध्य प्राण प्रिय श्री प्रिया प्रीतम जू समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी तरु लता श्री यमुना रस रानी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिकर के चरणों में कोटि शह प्रणाम कोटि शह नमन नमस्कार हम श्री जी के हैं हमारी श्री जी हैं यह वृत्ति हर समय बनी रहनी चाहिए यह जपना नहीं है कहना नहीं है य वृत्ति बनी रहनी चाहिए जैसे हम शरीर से तदा आत्म करने के कारण अपने कोई स्त्री या पुरुष तो हम कभी जपते नहीं कि हम स्त्री हैं या जपते नहीं कि हम पुरुष हैं पर कभी भूलते भी नहीं ऐसे हम श्री जी के हैं श्री जी हमारी हैं हम किसी के नहीं कोई हमारा नहीं यह वृत्ति अंदर आ जाए तो बहुत उच्च कोटि की अध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ हो जाए फिर समझो इसे जपना नहीं है इसे बोलना नहीं है बोलो
कोई निषेध नहीं है लेकिन हम जो बोल रहे हैं वो इस भाव को बोल रहे हैं जैसे हम शरीर भाव में अपने कोई स्त्री पुरुष कभी जपते नहीं ध्यान नहीं धरते और कभी भूलते भी नहीं जैसे सो के जगते हैं तो हमको यह जानना नहीं होता कि मैं पुरुषों की स्त्री स्वभाव में बैठा है मैं पुरुष हूं मैं स्त्री हूं ऐसे ही हमारे स्वभाव में बैठ जाए कि मैं लाडली लाल की हूं लाडली लाल मेरे हैं लाडली लाल के सिवा मेरा कोई नहीं और लाडली लाल के सिवा मैं किसी का नहीं यह बात अंदर स्वभाव में बैठ जाए तो बहुत जोर की बात है इसी से सेवा सुख मिलता है श्री जी के चरणों का यहां साधना हों का तो प्रवेश नहीं है यहां अपनेपन का इस कोटि का अपनापन हे प्रिया जू आपके सिवा कोई हमारा नहीं यह अंदर आ जाना चाहिए और आपके सिवा मैं किसी का नहीं अब इसकी जांच कर लो तो उत्तर मिलेगा प्रिया जू के सिवा सब कुछ हमारा प्रियाज के सिवा सबके हम पत्नी के पुत्र के भाई के मित्र के परिवार के पर प्रियाज के नहीं प्रियाज के सिवा घर संपत्ति रुपया पैसा नाना प्रकार ये सब मेरा और
यहां अध्यात्म में इसका उल्टा एकदम है यह सब मेरा नहीं ये सब प्रभु का दिया हुआ है सेवा संपादन करने के लिए कर्मयोग की पूर्ति के लिए हमें यह सब सामग्री मिली है प्रभु की तरफ से जब हमारा किसी व्यक्ति वस्तु स्थान पर अपनापन नहीं रहेगा तो हम अपने आप जीवन मुक्त हो गए क्योंकि जीवन मुक्त थे जीवन मुक्त है जीवन मुक्त रहेंगे पर जीवन मुक्तता में जो बाधा है वो किसी भी एक व्यक्ति एक वस्तु एक स्थान पर मेरी है बस यह बाधा है कहीं अहम ममता ना रह जाए संपूर्ण अहम ममता प्रभु के चरणों में समर्पित हो जाए तो जीते जीव मुक्त हो गए जीवन मुक्त हो गए बस यह वस्तुओं की ममता शक्ति व्यक्तियों की ममता शक्ति भोगों की ममता शक्ति यही जीवन मुक्त नहीं होने दे रही यद्यपि हम अब भी जीवन मुक्त हैं कोई हमें नहीं बांधे पर हमने स्वीकार किया है वस्तु व्यक्ति स्थान की स्वीकृति को भगवत स्वीकृति से नष्ट कर दो प्रियालाल के सिवा हमारा कोई नहीं हम प्रिया लाल के प्रिया लाल हमारे यह बिल्कुल अंदर की बात समझ लो भाई जी महाराज कहते हैं कि कोई समझे
या ना समझ सबसे हमारी समझ भली ठाकुर नंद किशोर हमारे ठकुराइन ब्रश भानु लली यह बात हृदय में बैठ जाए हमारी प्रिया जू हमारे लाल जो ये बैठा लो इसी से भगवत प्राप्ति होती है चाहे जितना बड़ा भजन आनंदी हो मूर्छा के समय नींद के समय मृत्यु के समय इसमें केवल भगवत कृपा काम करती है अपनी साधना नहीं साधना तो बहुत जोर की कर रहे हैं भरत जी महाराज चक्रवर्ती सम्राट पद त्याग कर राजा है रानियों का त्याग करके राजा हैं खजाना त्याग करके प्रजा त्याग करके गंडकी नदी के किनारे एकांत भजन में लगे हैं लेकिन ममता हो गई हिरन से तो अगला जन्म ममता ने हिर का करवा दिया हम प्रभु के हैं प्रभु हमारे हैं यही हमें भगवत प्राप्ति कराता है साधन तो छूट सकते हैं अस साधन हमसे हो सकता है कि जो साधना के विपरीत भाव है उनको हम स्वीकार कर सकते हैं क्योंकि हमारा गंदा स्वभाव रहा है अब हमारी भगवत प्राप्ति होगी प्रभु के दिव्या आश्रय से ये दिव्या आश्रय अलौकिक बात है ना कोई व्यक्ति वस्तु स्थान को लेकर केवल प्रभु से प्रभु को पाने के लिए अपनापन
केवल प्रभु से प्रभु को पाने के लिए अपनापन इसी से भगवत प्राप्ति होती है मान लीजिए हमारी बात अपनापन जगत में है तो चाहे जितना साधन कर लो भगवत प्राप्ति होने वाली नहीं और उसी जगत के वस्तु व्यक्ति स्थान में अपनापन अपने स्वामिनी ज के चरणों में तो खूब व्यवहार करो खूब परिवार पोषण करो धर्म के द्वारा धन कमाओ ठीक से अपने कर्तव्य का पालन करो आप कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होंगे क्योंकि आपने अपनी बात बना ली क्या हम प्रभु के थे प्रभु के हैं प्रभु के रहेंगे प्रभु के सिवा हमारा कोई नहीं अव्यक्त भगवान रहते हैं व्यक्त उनका नाम रहता है रूप लीला गुण यह सब आ जाएंगे जब व्यक्त नाम को पकड़ लोगे राधा राधा श्यामा श्याम राधा वल्लभ श्री हरिवंश राम कृष्ण हरि जो नाम प्रिय हो उस नाम को निरंतर रटो फिर आप देखोगे नाम के प्रताप का कैसा प्रभाव पड़ता है आपके मन पर तन पर बुद्धि पर इंद्रियों पर बड़ी दिव्य हो जाती इंद्रिया जो दुर्वासना में खेलने वाली होती है उनको घृणा हो जाती है दुर्वासना से इसलिए आश्रय पकड़ो आश्रय बहुत
बड़ी वस्तु है इष्ट का आश्रय गुरु का आश्रय यह जिनके हृदय में जागृत हो गया काम हो गया ऐसा आश्रय भरोसा कि स्वयं आश्रय दाता कहे कि तुम्हारा कल्याण नहीं होगा तो हमको इस बात पर कोई चिंता नहीं पक्का समझ लीजिए अंदर की बात कह रहे हृदय की बात कह रहे भगवत प्राप्ति सिर्फ भगवत आश्रय से होती है यह जल्दी समझ में नहीं आएगी हम बहुत हृदय की बात कह रहे मान लीजिए प्रार्थना है कलिकाल है मलिन बुद्धि है हर समय भजन नहीं हो सकता बातें बनाना अलग बात है और जिस समय भजन नहीं
हो रहा उस समय मृत्यु हो गई तो जो चिंतन होगा वही हमारी गति होगी तो हमारे चिंतन से हमारी सद गति वाली बात तो असमर्थ है हम भगवत आश्रय से भगवत प्राप्ति हो रही यह बात समझ में आ गई कैसी भी परिस्थिति हो आश्रय नहीं छूटता जैसे देह आश्रय ये कभी छूटता ही नहीं सो गए तो स्वापक शरीर में आस्था हो गई मर गए तो नारकीय यातना देह में या स्वर्गीय देव देह में देह का आश्रय छूटता ही नहीं जीवन मुक्त देह में रहते हुए मरने के बाद वाली हम जीवन मुक्ति की बात नहीं कर रहे शरीर में जीते हुए द्वंद को जीत गया द्वंद से परास्त नहीं हुआ वह जीवन मुक्त महापुरुष है आश्रय में बहुत आनंद है बहुत आनंद बस आश्रित रहो यही आश्रय कि श्री जी के सिवा हमारा कोई नहीं हम श्री जी के सिवा किसी के नहीं सदा सनातन इरस जोरी महिमा निगम न जाने यह सनातन दिव्य महिमा प्रिया प्रीतम की जुगल जोरी है य आश्रय से प्राप्त होती है यह जोरी अविचल वृंदावन नान आन सु काज बस इस प्रिया प्रीतम के चरणारविंद नाम लीला गायन उनकी सेवा नान आन सुका किसी और का आश्रय मत ले
लेना एक मात्र होए अनन्य एक व्रत गहो अनन्य होकर अपने इष्ट देव के एक व्रत में स्थित हो जाओ बहुत निर्भय हो जाओगे हम कैसे तुम्हें बताए हमारे पास शब्द नहीं है व जो कहना चाहते हैं क्योंकि अनिर्वचनीय है तो शब्द नहीं मिल रहे भरोसा आश्रय दृढ़ आश्रय इसी जन्म में भगवत प्राप्ति बस दृढ़ भरोसा दृढ़ आश्रय नहीं प्रिया जो मेरी पियाजू के सिवा मेरा कोई नहीं रोने का मन करेगा जब यह बात आ जाएगी प्रियाज के सिवा मेरा कोई नहीं और य आपको अनुभव होने लगेगा कि जहां जहां प्रियता है वह केवल स्वार्थ की है स्वार्थ हटा प्रियता गई जिस दिन तुमसे सामने वाले का स्वार्थ नहीं बनेगा उसी दिन से वो वैर कर लेगा प्रीति नहीं करेगा तुम्हारा मंगल नहीं करेगा यह तो कोई महा भागवत में स्थिति होती है कि नीचता का आचरण होने पर भी व प्रसन्न मुद्रा में रहे नहीं तो जरा जरा सा मान अपमान दुख सुख लाभ हान यह हमें परेशान कर रहे और हम जीवन मुक्त हो जाएंगे बस एक भरोसा लाडली ज का भरोसा सब बात बन जाए जी कभी किसी का भरोसा नहीं तोड़ते हम तुम्हें उनका
स्वभाव बता रहे हैं हमारी प्यारी जू कभी भरोसा नहीं तोड़ती और प्यारी ज के अधीन प्यारे जो है तो सारा सिस्टम हमारे लाल जू के अधीन है और लाल जू लाडली ज के अधीन है और लाडली जू बहुत कृपालु दयालु कैसे भरोसा कर लो हमारा काम हो गया समझ रहे हमारी बात भरोसा कर लीजिए य हम आखिरी बात है सब बातें तो भगवत चर्चा होती रहेगी ये हम हृदय की आखिरी बात कर ें जिससे काम बनना है य मान लो हमारी बात हृदय से कह रहा हूं बिल्कुल श्री जी से मिलकर कह रहा हूं यह बात बिल्कुल वही बात कर रहा हूं मान लो इस समय हमारी बात मान लो वहीं से बात कर रहा हूं महारानी जी का भरोसा मात्र भगवत प्राप्ति करा देगा हमारे में ताकत नहीं कि हम अपनी साधना को को इतनी उज्जवल बना सके कि माया की मलिन स्पर्श ना कर पाए हम अपनी चादर श्वेत की श्वेत धर दे जाकर प्रभु के सामने नहीं मैली हो गई है चादर भगवत प्राप्ति योग्य नहीं रह गई है हमारी वासना है हमारी इंद्रिया हमारा मन बिल्कुल कूड़ा है कूड़ा भगवत योग्य नहीं है भरोसा वो एक क्षण में हमारी बना देंगे बात
मेरे बनाए ना बनेगी कोट कलप लो आपके बनाए बनेगी पल पाव में बिल्कुल बात मान लीजिए हम बिल्कुल कैसे तुम्हें बताए इस समय बस श्री जी का भरोसा हम देख रहे हैं उनकी मुस्कुराहट केवल भरोसा कर लो बस और इस भरोसे में आच ना आने पावे य तुम ठीक नहीं हो तुम्हारा भजन ठीक नहीं है तुम्हारा मन ठीक नहीं तुम अशांत हो तो तुम्हें उस समय सोचना मैं श्री जी के भरोसे पर हूं मेरी महारानी जो मेरा कल्याण करेंगी मेरा मंगल करेंगी मुझे अपनी सेवा में ले लेंगी मुझे इस जगत से महारानी जो पार करेंगी पक्का य हम अपने हृदय की बात कह रहे बिल्कुल सब साधन किए हुए पर साधनों का भरोसा नहीं भरोसा मारा नहीं झुका सब बात बन जाएगी अगर यह बात तुम्हारी पकड़ में आ जाए तो सब बात बन जाएगी हम बिल्कुल अब कैसे बताए इस समय जैसे बोल ले बस पकड़ लो हमारी बात भरोसा श्री जी का अगर पकड़ पा रहे हो तो बस भरोसा सब साधकों की साधना का तपस्वी हों की तपस्या का योग की जितनी भी वृतिया है साधन की सबका फल है एक मात्र इष्ट में भरोसा दृढ़ हो जाना और हम प्रारंभ से में
कह रहे बस आश्रय वही आश्रय वही प्रपत्ति वही शरणागति वही भरोसा यह माया का जो चरित्र है यह भगवत कृपा से पार हो हमारी सामर्थ्य नहीं इस प्रपंच पर विजय प्राप्त कर ले मेढक खुले तलने होना जिंदगी में नहीं ल पाओगे द रखोगे दो निकल जाएंगे दो संभालोगे चार निकल जाएंगे यह हमारी दशा है हम तुम सबकी प्रहलाद जी कह रहे हैं कि जैसे बहुत सी पत्नियां हो और एक पति शयन ग्रह की तरफ एक घसीट रही दूसरी घसीट र तीसरी उसकी क्या दुर्दशा होगी वैसे हे नरसिंह यह हमारी 10 इंद्रिया और एक मन मिलकर के हमको घसीट रहे बार-बार बार बार बारबार प्रकृति की तरफ माया की तरफ केवल बातें बनाना अलग चीज है माया पर विजय प्राप्त करना बहुत कठिन बात है यह केवल इनके भरोसे से होगा अगर तुम्हारी समझ में आ रही हो इस समय की बात तो निश्चिंत हो जाओ प्यारी ज के भरोसे पर हम यह नहीं कह रहे कि निश्चिंत होकर पापा चरण करो कर ही नहीं सकते जब प्यारी जी का भरोसा है चिंता मत करो जितना बने उतना भजन करो नहीं जब भजन ना हो उस समय बैठ जाओ मैं श्री जी का हूं श्री जी
मेरी है मैं भ लाडली जू आज तक हमने सुना है कि आपका जिसने भरोसा लिया आपने भरोसा नहीं तोड़ा मैं आपके भरोसे परू बस हो गया का दृढ़ भरोसा दृढ़ भरोसा बस दृढ़ भरोसा य हमारे इस समय गूंज रहा है दिमाग में दृढ़ भरोसा महारानी का हो प्रिया जो का संबंध गुरुजी के द्वारा मिलता है भरोसा अपना होता है जिसे हमारा संबंध श्री जी की मैं सहचर हूं यह मेरी सोच नहीं है यह मेरा भाव नहीं है मेरे गुरुदेव ने दिया है जब गुरुदेव ने दिया है तो इष्ट को बरबस य संबंध स्वीकार करना ही पड़ेगा वोह अपनी बात पीछे रख देते हैं अपने प्रेमी जनों की बात पहले रखते तो हमारे गुरुदेव ने हमको य भाव दिया इस पर तो मुझे चिंता ही नहीं है क्योंकि देने वाले ने दिया स्वीकार करने वाले को स्वीकार करना होगा इष्ट ने दिया है मुझे सहचर भाव गुरु रूपा आ करके और इष्ट रूप में स्वीकार किया है स चरी भाव लेकिन भरोसा य हमारा है यह हमारी तरफ से है अगर इसमें कमी हुई तो बात नहीं बनेगी भरोसा बिल्कुल दृढ़ होना चाहिए ऐसे ऐसे लक्षण वालों को श्री जी कृपा नहीं करते हमें
नहीं माननी बात हम किसी लक्षण से भरोसा नहीं किए हम तो वैसे को लक्षण है तब भरोसा किए कि मुझ जैसे लक्षण हीन पर भी लाडली जू कृपा करेंगी तभी उनकी महिमा है बस यह बात स्वीकार कर भगवत प्राप्ति बिल्कुल सहज है यही एक हृदय की हमारी शुरू से बात रही है कभी-कभी जब आनंद में पद्मासन में बैठे हुए प्रफुल्लित होते मुरारी शरण आ जाते तब कहते सुन सुन भा यही कहते दृढ़ विश्वास कर ले दृढ़ भरोसा कर ले इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी कोई साधन ना होने पर भी जिसने प्रभु का भरोसा किया भगवान की प्राप्ति हो गई भगवान की प्राप्ति हो गई आगे पड़ा जटायु देखा सुमिरत राम चरण की रेखा दृढ़ भरोसा भगवान का था आएंगे अंतिम समय भगवान अपने कर कमल से हमारा अंतिम संस्कार करेंगे भगवान आए जटायु को गोद में लिया और कहा तात आज्ञा करो तो अभी तुम्हारे शरीर को वज्र के समान बना दू नहीं प्रभु नहीं बड़े बड़े ऋषि मुनि इसी समय की याचना करते हैं और आज वो समय हम खो दे नहीं प्रभु मैं शरीर रखना नहीं चाहता भगवान ने वह परम पद प्रदान किया जो केवल उनकी
कृपा से ही मिलता है और किसी साधना से नहीं तत्काल हरि रूप धारण करके गीत परम धाम को गए और जो दशरथ जी को सौभाग्य नहीं मिला वह जटायु जी को सौभाग्य मिला टाई जी को अपने कर कमल से अंतिम संस्कार भगवान श्री राम भरोसा गोस्वामी जी बहुत जोर से कह रहे एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास भरोसा बैठा लो य बात बैठाने की भाई कुछ बातें होती करने की कुछ बातें होती है होने की यह होने की बात है इसे स्वीकार कर लो सब बात बन जाएगी मूल में देखा जाता है मूल में देखा जाता है इसका भरोसा कहां है साधना पर है रुपया पर है लोगों पर है कहां है अप बल तप बल और बाहुबल चौथ बल है दाम सूर किशोर कृपा ते सब बल हारे को हरि नाम सुनेरी मैंने निर्बल के बल राम भरोसा जिस समय हृदय में केवल भरोसा जागृत हो जाए आप देखेंगे आनंद की बाढ़ आ जाएगी सब साधन एक तरफ भरोसा एक तरफ कभी एकांत में बैठकर भरोसे का चिंतन करो ना मैं प्रभु के भरोसे हू आप देखना कितना आपको आनंद मिलेगा आनंद सिंधु का भरोसा अच्छा उनको कोई बताने की जरूरत थोड़ी है आपके अंदर जो भरोसा भाव
उठा वही वो बैठे हुए हैं पूछो तो वही दे रहे हैं तभी ये भरोसे का भाव आ रहा है हम श्री जी के कितनी बड़ी बात हो गई हम महारानी जी के हैं श्री जी हमारी हैं आप देखना तो इसका फल देखना इस वृत्ति का फल देखना ये हमारे प्रभु प्रेरित कर रहे हैं सौभाग्यशाली जन इस बात को सुन रहे हैं और महा सौभाग्यशाली जन इस बात को पकड़ पाएंगे कि हम कह क्या रहे हमारा कहने का आशय क्या है हम अंदर से क्या चाह रहे हैं बहुत जल्दी आप निर्भय हो जाएंगे निश्चिंत हो जाएंगे निशोक हो जाएंगे
भरोसा दृढ़ भरोसा बस विश्राम समझो जीवन का जीवन का परम विश्राम आप कौन है कैसे हैं इससे कोई हमें लेना देना नहीं बस भ करलो हमारे प्रभु पर भरोसा कर लो हमारी लाडली ज पर भरोसा कर लो बस जीवन को आप देख लीजिएगा किस धारा में पहुंच जाएगा अपनी चिंता छोड़ दो जब तक अपनी चिंता करोगे भरोसा दृढ़ नहीं हुआ प्रियालाल का चिंतन करो प्रियालाल के सुख के लिए आचरण करो जितना बन सके नहीं बैठे भरोसे में यह हम बहुत आखिरी की बात क रहे जोर की बात क रहे बहुत ऊपर की बात क रहे काह के बल भजन को काह के आचार व्यास भरोसे कुवर के सोवत पाव पसार सोवत पा पसार मेरी महारानी मेरी लाल मेरी प्रिया कैसे व देख रहे मुस्कुरा रहे ब यह बात वही पकड़ पाएगा फिर भी क माइक से कह रहे हैं पकड़ वही पाएगा जिसका महाभाग्य उदय हुआ जो हम कह रहे हैं जो हमारे हृदय में इस समय स्त हो रहा है भरोसा य हरिराम व्यास जी कह रहे आचार्य है विशाखा सखी अवतार है क काहू के बल भजन को किसी को भरोसा अपने भजन का होता है अपनी साधना का होता है जो शरीर से साधन बनते उनका भरोसा
होता है कि इससे हमें यह फल मिलेगा किसी को जितेंद्रिय का आचार व्यवहार का भरोसा होता है मैं बड़ा पवित्र हूं मैं बहुत जितेंद्रीय हूं मैं बहुत और किसी को होता भरोसा महारानी जो का यह खास बात है भजन तो हमारा छूट सता जितेंद्रिय तो टूट सकती है व्यवहार हमारा बिगड़ सकता है लेकिन भरोसा हमारा नहीं बिगड़ सकता दृढ़ भरोसा व्यास भरोसे कुवर के सोवत पाव पूज्य पद शि उड़िया बाबा जी महाराज महापुरुषों के वचन हमारा व्यवहार और परमार्थ दोनों पुष्ट कर देते हैं पकड़ लेना बात य बिल्कुल आप समझ लो स्थित होकर वहीं से बात तुमको सुनने को मिली है पकड़ लो जिसको पकड़ना हो बिल्कुल फ्री बिना किसी प्रयास के वह बात बन जाएगी य एक पैसे की जरूरत नहीं भगवत प्राप्ति में एक पैसे की केवल स्वीकृति केवल स्वीकृति केवल भरोसा छा गया आनंद छ गया हृदय में केवल भरोसा हृदय में भरोसा कर लेना फिर देखना आपको कैसा लगता है पर वह जैसे आ रहा है वह पता नहीं आप समझ पा रहे हैं कि नहीं समझ पा रहे हमारी बात इस समय हम प्रवचन नहीं कर रहे इस समय हम अपने
हृदय की बात आपके सामने रख रहे हैं जिससे हम हर समय आनंदित रहते जिसमें हर समय गरजते रहते हैं मत्य का भय है ना दुख है ना कोई पीड़ा है ना कोई परेशानी है सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है वह बात जो भरोसा है य श्री जी ने दिया है ये जो आज अभी हम आपको बोले अब हम तुम्हें घटना बता रहे हैं अपने जीवन की जिस समय पहली रिपोर्ट हमारे हाथ में आई कि तुम्हारी किडनी फेल हम गंगा किनारे रहने वाले हमको यह भी पता नहीं कि किडनी किसे कहते हैं सच्ची मानना क्योंकि कभी जन समुदाय जन संपर्क से संपर्क ही नहीं हुआ संसार का ज्ञान ही नहीं हुआ 35 वर्ष की अवस्था तक संसार क्या मुझे ज्ञान ही नहीं हुआ गांव के किनारे से केवल जो गंगा जी जहां रास्ता नहीं है तो निकल गए हैं लेकिन मुझे किसी संसारी आदमी से बात करना है संसार का ज्ञान संसार का ज्ञान तो श्रीधाम वृंदावन में हुआ मानो मेरा जन्म नया वृंदावन में हुआ जिससे हम व्यवहार को समझ पाए नहीं केवल परमार्थ के सिवा कुछ नहीं परमार्थ के लिए अपने जीवन को निछावर करके मृत्यु की भी परवाह ना
करना ऐसा साधन प्रधान जीवन था ना कृपा और ना भरोसा यह दो शब्द हमारे जीवन में नहीं थे कृपा और भरोसा शब्द नहीं थे साधना जीवन में थी ऐसा करने से यह होगा इस साधन से यह होता है इस साधन से यह होता है रामकृष्ण मिशन में जब स्वामी जी जो उस समय विराजमान थे उनके पास बलराम भाई ले गए उने रिपोर्ट देखी कहा बाबा तुम्हारी दोनों किडनी बहुत शीघ्र खराब हो र और परिणाम मृत्यु इसमें कोई उपाय नहीं है शायद उस समय डायलिसिस उपलब्ध नहीं होगा क्योंकि इस शब्द का कहीं भी ना दिल्ली में उच्चारण हुआ था ना यहां हुआ था हम कहा इसका मतलब मृत्यु कितने दिनों में व कभी भी हो सकती है उन्होंने ऐसा कहा रामकृष्ण मिशन में स्वामी जी ने बस व रिपोर्ट लेकर आए एक रुपया हमारे पास नहीं एक व्यक्ति पानी देने वाला नहीं वही बलराम भाई जो शाम तक आते कभी 9 बजे पूछते थे कुछ खाया कुछ मिला ा में अगर हम ऐसे कह देते तो भाग जाता तुरंत कुछ ना कुछ जरूर लाता और खता आज तक वैसे श्रद्धा एक एक व्यक्ति है जो पहले दिन वृंदावन में मिला था आज तक वैसे समर्पण
वैसे ही भाव तनिक भी कहीं किंचित भाव में अंतर नहीं सुधा निधि का पाठ साम के करते थे चतुरा जी सेवक वाणी का पाठ सुबह करते थे पौने दो घंटा सेवक वाणी पने दो घंटा चतुरा जी और दो घंटा लगभग सुधा निधी सुधा निधि का गान कर रहे थे चार बजे एकदम भाव में आया कि ब्राह्मण के घर जन्म हुआ बचपन से भगवत मार्ग में निकले साधना तो जो काशी का काम था वह तो भगवान विश्वनाथ जी की कृपा से जैसा हुआ हुआ अब वृंदावन के कार्य में तो अभी अधूरा हूं अभी दोही तीन वर्ष हुए होंगे वृंदावन
में आए हुए और राधा वल्लभ जी के बने हुए सोई रिपोर्ट मिल गई थी अधूरा जीवन वृंदावन रस को तो हमने जाना ही नहीं और जाने का समय आ गया और अब मन कोई साधन बन पाएगा मेरे से क्योंकि अब तो जाने का समय बहुत भोलापन था था इसलिए कि अब समाज को देख कर के समझ में आ रही नहीं तो समाज शून्य जीवन था चिल्ला चिल्ला के रोने लगा एकांत कमरा था ऐसी तन्मयता बने की हे लाड़ली बिल्कुल अबोध हो आपको भी नहीं जानता ना इस मार्ग को जानता हूं तो अधूरा जीवन और ऐसा पवित्र जीवन निकला अधूरा जीवन जाएगा अब कोई साधना तो कर नहीं सकता आपको रिझाने की सामर्थ्य नहीं हमारे पास ना भोग है ना ना वस्तु है ना पदार्थ है केवल मैं ही मैं हूं और शरीर था कि साधना करूं तो अब तो व भी गया क्योंकि अब किडनी खराब है बड़ा अर्थ भाव आया बहुत मतलब वह स्थिति हम आपको नहीं बता सकते वह वही जानता है जिसने जिसका कोई संसार में नहीं है बस उसी समय घटना घटी वो हम नहीं बता सकते बस इतना केवल कहते हैं मेरे लिए ही तो साधना होती है तू मेरा भरोसा शब्द यहां आया कभी जीवन
में भरोसा शब्द नहीं था साधना शब्द था पद्मासन जितेंद्रिय पवित्रता ब्रह्मचर्य निष्ठा भजन साधन इसी से हम जीवन मुक्त हो जाएंगे बस फिर उस दिन से जो बेपरवाही हमारे अंदर आई मस्ती आई तो हम तो मनाते हैं कि धन्य है ये किडनी जो फेल हो गई तो हमें पास कर दिया हमारा भरोसा महारानी जी ने बस उस दिन से वही बढ़ता चला जा रहा था भरोसा उसी भरोसे का यह सब जो कुछ आप देख रहे हो सब उसी भरोसे का है और करता धरता वो वही हम आपको दे रहे हैं भरोसा महारानी जी का भरोसा हृदय से भरोसा बैठ जा बस बेपरवाह मेरे लिए ही तो है ना मैं कह रहा हूं तू मेरे बस भरोसा जागृत हो गया अच्छा आपको श्री जी ने कहा तो आपको भरोसा हो गया लेकिन मेरे तो आप प्रश्न कर तो कौन कहला रहा है कौन कहला रहा है अगर तुम संत मानते हो भक्त मानते हो गुरु मानते हो जो भी तुम्हारे अंदर भाव है कोई भेद नहीं भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर नाम बप एक इनके पद बंदन किए ना सत विघ्न अनेक मान लो मेरी महारानी जो बोल र मेरे लिए मेरे लिए सिर्फ मेरी महारानी जो बोल रहे कि मेरा भरोसा
कर ले मेरे गुरुदेव के रूप में मेरी महारानी बोल रहे इस संत के रूप में महारानी बोल रही भक्त के रूप में महारानी बोल रहे मान लो अभी अभी निहाल हो जाओगे इस शरीर पांच भौतिक नाशवान मल मूत्र का भांड इससे हम साधना करके श्री जी को झा पावे बस आप रीज जाओ अपने से रीज जाओ और वो रीज चुकी है अगर वो रीज चुकी ना होती तो हम यहां बैठे हुए चर्चा ना कर रहे होते ना आप सुन रहे होते यहां वृंदावन में प्रवेश पाना श्री किशोरी जी की कृपा से है वृंदा देवी की कृपा से है भरोसा पूज्य पाद सूरिया बाबा जी महाराज बाबा आजकल जिसको देखो वह पतन की तरफ ही चला जा रहा है क्यों क्योंकि उत्तर असत पुरुषों का दर्शन संभाषण स्पर्श इससे पाप बढ़ता है मन मलिन होता है ध्रुव दस जी ने भी कहा है कि धाम प्रिया प्रीतम इनके प्रति जिनके हृदय में प्रियता ना हो ऐसों का स्पर्श ना करें वृंदावन के वास को जिनके नाए हुलास तिनको प्रश्न कीजिए तज ध्रु तिनको पास श्री धुर दस जी महाराज कह रहे कि जो अगर धाम वास की उल्लास वृति नहीं है तो ऐसे लोगों का स्पर्श नहीं
करना चाहिए जो भगवत विमुख है पापा चरण करते हैं उनसे संभाषण करने से उनका स्पर्श करने से उनके साथ खानपान करने से अगर आप भजना नंदी हो तो भजन का तेज नष्ट हो जाएगा बुद्धि मलिन हो जाएगी भजनानंद नहीं तो और बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी जहां तहां के पावन भजन तेज घट जाए जहां जहां जैसा भोजन मिला वैसा खा लिया जैसे लोग मिले हसे खेले बात किए यह साधक की दृष्टि नहीं है यदि असत पु का दर्शन स्पर्श संभाषण किया जाए तो पापों की वृद्धि होती है यदि पूर्ण आत्मा महात्माओं का दर्शन किया जाए संभाषण किया जाए स्पर्श हो जाए तो पुण्य की वृद्धि होती है पवित्रता आती है इसी से हमारे यहां पाप कर्म बढ़ते चले जा रहे हैं क्योंकि अधिक संग सत आचरण करने वाले दुरा आत्माओं का मिलता है सत आचरण करने वाले महात्माओं का तो बिरला ही जब द्रव दिन दयालु राघव तो साधु संगति पाइए जब भगवान द्रवित होते हैं तब भक्तों का संग संतों का संग मिलता है सुत दरा धन लक्ष्मी पापियो के घर होए संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोए आजकल तो इन बातों को भी सत्य नहीं
मानते हैं शास्त्रों को भी सत्य नहीं मानते हैं जब शास्त्रों को सत्य नहीं माना जाएगा संतों को सत्य नहीं माना जाएगा तो पतन ही होगा कौन तुम्हें संभालेगा कि तुम्हें यह करना चाहिए यह नहीं करना चाहिए आजकल के लोग आधुनिक पद गाने वालों के पद गाते हैं नहीं गाना चाहिए कह रहे सूरदास जी तुलसीदास जी मीराबाई जी हरिवंश महाप्रभु स्वामी हरिदास जी हरि व्यास देवाचार्य इन महापुरुषों के जो समाधि के द्वारा भाव में प्रियालाल की दिव्य लीलाएं देख रहे वो पद गाने चाहिए इधर उधर के तुक बंदी जोड़ के आजकल यह तुक बंदी से थोड़ी है चतुराश्रम लाल की दिव्य लीलाए जो हो रही उन्हीं को रच रहे हैं पूज्य पाद उड़िया बाबा जी कहते हैं ऐसे आधुनिक शब्दावली को जोड़े हुए पदों का नहीं गायन करना चाहिए अब जैसे अभी आते हैं एकांतिक में कोई कोई हमने गीता की टीका की है ठीक गीता भगवान की वाणी है लेकिन तुम टीका करने की अधिकारी हो तुम्हारी स्थिति कहां है अगर कृष्णा का स्थिति है तो तुम्हें लेकर बात कहने की हिम्मत कैसे हुई कि मैंने गीता की टीका की
अगर भगवता का वृति नहीं है तो तुम्हारी सामर्थ्य क्या है कि गीता के शब्दों को समझ लो शब्दार्थ भावार्थ रार्थिकल प्राप्त उनकी वाणी पढ़ो जो भगवत प्राप्त महापुरुष उनके द्वारा जो पद है उनके द्वारा जो वचन है उनको मानो वाणी उनकी जो समदर्शी है जो निरपेक्ष है जो मननशील है जो निर्वैर है जो भगवत स्थित द्वंदा तीत है उनकी वाणी उनकी रचना ये भारतवर्ष की जनता जो अधोगति को प्राप्त हो होने वाले आ चरणों में जा रही है हम सबसे निवेदन करते हैं हमारे सनातन पद्धति में नया
वर्ष चैत में लगता है संवत्सर से बदलता है ठीक है आप अंग्रेजी तारीख का नया उत्सव मनाते हैं मनाइए मुझे कोई विरोध नहीं क्योंकि किसी भी निमित्त से उत्सव मनाइए नाम कीर्तन कीजिए भगवत चर्चा कीजिए वृंदावन धाम की परिक्रमा लगाइए तीर्थों का अवगाहन कीजिए अन्य आवश्यकता जिनको वस्तुओं की है उनको दान कीजिए ब्राह्मण गौ संत महात्मा जो भी जैसा तुम्हारा भागवत भाव सबसे प्रार्थना है यदि आप ये हैप्पी न्यू ईयर मनाएंगे तो हैप्पी तभी होगा जब भगवान का नाम कीर्तन करवाइए 24 घंटे नाम कीर्तन करवाइए भगवान की 24 घंटे नाम कीर्तन की वृत्ति से जगत मंगल होता है जहां जहां नाम की आवाज जाती है जिसके कान में पड़ती उसके पाप नष्ट होते हैं उसकी पुण्य वृद्धि होती है उसका मंगल यह है पी ये है प शराब पीना है पी नहीं मांस खाना है पी नहीं व्यभिचार करना है पी नहीं उद्दंडता करना आप देखो नए नए सैकड़ों बच्चे ऐसे नशे करेंगे कि घर तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा और वो क्लबों में केवल ये कि आज है है न्यू यर किस बात का हैप्पी अधर्मा आचरण का महापाप
जिसे कहा गया व मदिरा पान व्यभिचार जुआ खेलना नशा कर यह सब हैपी मूर्खता प्रसन्नता तो भगवान के चरणारविंद का आश्रय लेने से उनके चिंतन से है ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा हैप्पी माने प्रसन्नता तो ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा ना कि ये मलिन आचरण करना इसलिए सबसे प्रार्थना है इस नवीन वर्ष के प्रारंभ में ही कसम खाइए कि मैं कभी भी अगर आप मानते हैं इस अंग्रेजी नवीन वर्ष को हम कहते हैं मानो मानो किसी भी तरह मानो तु उसे भगवान से जोड़ दो सब मंगल हो जाएगा कभी भी किसी भी स्थिति में मैं कभी पराई माता बहनों के साथ व विचार नहीं करूंगा नियम लो मैं कभी शराब नहीं पिऊंगा मैं कभी मांस नहीं खाऊंगा मैं कभी किसी का भूलकर अहित नहीं करूंगा तब तो तुम्हारा हैप्पी न्यू ईयर होगा नहीं हैप्पी नहीं हो सकता पक्का हैप्पी नहीं हो सकता असत आचरण करने वाला कभी प्रसन्न नहीं हो सकता थोड़ी देर हर्षित हो सकता है लेकिन शकित होना पड़ेगा हमारा भारतवर्ष महान भगवत धर्म युक्त है यह अधोगति को जो जा रहा है नवीन नवीन बच्चे नवीन नवीन अवस्था की
बच्चियां ये सब अपनी मर्यादाओं को छोड़कर गलत आ चरणों की तरफ बढ़ रहे इसलिए बहुत हानि है पूज्य बाबा जो शास्त्र के नियमानुसार चलता है उसकी भागवत और लौकिक दोनों उन्नति होती है ऐसी धूर्तता छाती है कि हैप्पी न्यू ईयर धूर्तता उद्दंडता मलिन अपवित्र असभ्य ये हैप्पी होगा तुम्हारे लिए न्यू न्यू ईयर ये नया साल तुम्हारे लिए आनंद नया साल आनंद होगा घी का दीपक जला कर के कलश में रखो और नियम लो कि आज से मैं असत आचरण नहीं करूंगा 24 घंटे नाम कीर्तन करो सुंदर सुंदर भोग पकवान बनाओ भगवान को भोग लगाओ 102 भूखे को पवाओ सर्दी का समय 102 कंबल खरीदो फुटपाथ में जो सो रहे हैं उनको बांटो और कहो हैप्पी न्यू ईयर माना तुम्हारी बात हैप्पी न्यू ईयर हो गया भगवत संबंध से संकल्प करो आपसे कभी असत आचरण नहीं करेंगे तो यह बात समझ में आएगी ये मलिन के आचरण करने वाले कभी हैप्पी रह सकते हैं आज हैप्पी मना लो कल डिप्रेशन में जाओगे क्योंकि पाप आचरण कर रहे हो ये तुम्हें ऐसी जगह ले जाएंगे जहां शोख चिंता भय उदगता अशांति जन्म मृत्यु यह सब
होगा इसलिए अपने वास्तविक भारत देश का जो हैप्पी न्यू ईयर है वह है संवत्सर जब संवत्सर बदलता है चैत की शुक्ल प्रतिपदा वो है प लेकिन आप मनाते हो मनाओ हम भी आप में सम्मिलित है पर नाम कीर्तन करो भगवत यस चर्चा करो भगवत साधन करो गौ सेवा करो कि आज साल का नया दिन है आज 5000 गायों को भोजन पवाएं आज 5000 गरीबों को भोजन पवाएं आज हम अस्पताल में जाकर पा देंगे कि किसी गरीब की सेवा में हमारी जितनी सामर्थ्य है हम उतना ऐसा करेंगे ये नहीं कि 500 की शराब पी के लड़खड़ाते हुए आ रहे हो कि हैप्पी न्यू ईयर यह गंदी बात अगर हमारी आवाज कां में पहुंच रही है तो आप वृंदावन में बैठे हो या जहां भी हो हमारी आवाज का अगर जरा भी आप आदर करते श्रद्धा करते हैं तो आप कोई भी गलत आचरण नहीं करेंगे नियम ले पूज्य बाबा हमें जैसे रोग होने पर डॉक्टर की जरूरत है ऐसे बुद्धि भ्रष्ट होने पर बुद्धि को शुद्ध करने के लिए हमें गुरु की जरूरत है हमें संत की जरूरत है अगर हमारे देश में भगवत प्राप्त महान संत ना हो तो जो पापा चरण हो रहा है यह
किसी को भी शांति ना होने दे किसी को भी चैन से ना रहने दे पर तो संतों की कृपा भजन करके सर्वे भवत सुखना सर्वे संत निरामया ऐसा तो आनंदमय जीवन सुखमय जीवन पाप करते हुए भी पृथ्वी फट नहीं रही आकाश हमको अवकाश दे रहा है वायु हमको जीवन दे रही जल हमको जीवन दे रहा है लेकिन अगर ज्यादा बढ़ता चला जाएगा तो सब दूषित होते चले जाएंगे इसलिए हम अपने आ चरणों को सुधारे अपने पापा आचरण को सुधारे भगवन नाम से जुड़े भगवत महिमा से जुड़े तो हमारा जीवन पवित्र होगा हृदय आनंदित होगा चलते है श्रीमद् भागवत महापुराण भगवान श्री कृष्ण चंद्र ज ने जब द्वारिका लीला का विस्तार किया तो अष्ट पट रानियों को स्वीकार किया प्रथम श्री रुक्मिणी जी द्वितीय श्री जाम तृतीय तीसरी श्री सत्यभामा जी चौथी श्री कालिंदी जी पांचवी श्री मित्रविंदा जी और छठवीं नाग निजत सत्या जी और सातवी भद्रा जी और आठवी लक्ष्मणा जी यह आठ पटरा निया भगवान की राजा परीक्षित ने पूछा भगवन भगवान श्री कृष्ण ने भोमा सुर को जिसने राजकुमारियों को बंदी गृह में डाल रखा था क्यों
और कैसे मारा आप कृपा करके भगवान श्री कृष्ण का यह पावन चरित्र हमें सुनाइए श्री सुखदेव जी ने कहा परीक्षित भवासर ने अपने बल से वरुण भगवान के छत्र का अपरण कर लिया और सबसे बड़ी बात यह थी कि माता आदित्य के कुंडल छीन लिए जाके महाबली था भ मासु य संभव बात त्रिभुवन में अभी तक किसी ने ऐसा नहीं किया था कि परम पवित्र जगत बंदनी देव माता अदिति के कुंडल छीन लिए वरुण जी का छत्र छीन लिया और सुमेर पर्वत पर मणि पर्वत नाम का एक स्थान अपने कब्जे में कर लिया द्वारिका में राजाओं के द्वारा प्रार्थना भेजी जाती छोटे-छोटे राजा आकर भगवान से उसकी सब करतूत बताते भोमा असुर की भगवान श्री कृष्ण चंद्र ज ने विचार किया कि बहुत हो गया इसका पापा चरण जब घड़ा भर जाता है तो फिर उसको फूटना ही पड़ता है भगवान ने निश्चय किया कि इसका वध करना पड़ेगा सब सूचनाएं मिलती किसी भी योनि की किसी भी जीव को कहीं भी जहां यह ज्यादा हाहाकार मचा देता क्योंकि इसकी मृत्यु सिर्फ भगवान से दूसरा कोई मार नहीं सकता जहां जाता वहां आतंक फैलाए हुए था भ और
जहां यह रह रहा था ऐसी व्यवस्था थी कि वायु भी बिना आज्ञा के प्रवेश नहीं कर सकती ऐसा ताकतवर भौ मासु 16100 कुमारिया व जो जिनका ब्याह नहीं हुआ था ऐसी राजकुमारियां अपहरण करके बंद किए हुए थाय पूरे त्रिभुवन में जहां कोई सुंदरी नव कन्या दिखाई देती शायद भगवान का कार्य पूरा कर रहा था पृथ्वी का अवतार सत्य भामा जी है और यह भोमा सुर भूमि का पुत्र है तो सत्यभामा जी से कहा बैठो गरुण पर आगे आज तुम्हारे सामने तुम्हारे पुत्र का वध करूंगा मानो यह संबोधन करने के लिए
कि बाद में भूमि अवतार है कहीं रुष्ट ना हो जाए तो कहा बैठो जब तुम ही कहोगे कि मारो प्रभु इसको तब हम मारेंगे तो गरुण पर सत्य भामा जी को बैठाला प्राग ज्योतिपुर ये इसकी राजधानी थी भगवान गरुण जी को आदेश किया प्राग ज्योतिपुर में प्रवेश करना बहुत कठिन था पहले तो चारों जुड़े हुए पहाड़ों की किले बंदी थी उसके बाद दिव्यास्त्र का घेरा था आप प्रवेश करेंगे तो आपको काट डालेंगे दिव्यास्त्र चलाने की जरूरत नहीं इसके बाद जल की खाए थी उसके बाद बिजली की चार दीवारी थी
इसके बाद जहरीली गैस की चार दीवारी थी इसके बाद मुर दैत ने चारों 100 हज घोर दिखाई ना देने वाले फंदे में जाल कोई भी चले फस गए इतनी तो उसकी प्राग ज्योतिपुर की सुरक्षा थी कि वहां प्रवेश कोई नहीं कर सकता जहां भौमा सुर रहता था भगवान श्री कृष्ण ने कमोद की गदा को आदेश किया पहाड़ों को चकना चूर कर दो आदेश देते फोड़ डाला भगवान की दिव्य गदा ने चूर चूर कर दिया पहाड़ों को सुदर्शन चक्र को आज्ञा की जितने दिव्यास्त्र सबको नष्ट कर दो सब शस्त्रों की मोर्चा बंदी छिन्न भिन्न कर दी सुदर्शन जी को आदेश किया ये अग्नि की जल की गैस की जितनी चाहर दीवार सबको नष्ट कर दो भगवान का सुदर्शन चक्र उनको नष्ट कर दिया मुर दैत्य के फंदो को अपनी तलवार को आदेश किया काट दो दिखाई नहीं देते थे तलवार ने सबको दिव्यास्त्र भगवान के इसके बाद बड़ी बड़ी मशीने लगी हुई थी यंत्र अगर कोई वीर पुरुष गया तो यंत्र उसे घसीट के तुरंत नष्ट कर देंगे उस समय भी भ मासु ने ऐसी व्यवस्था भगवान ने पांच जंद शंख का नाद किया तो सब मशीने विदीर्ण हो गई नष्ट
हो गई अब जो आखिरी परकोटा था भगवान गदाधर ने मारा गदा तो पूरी विध्वंस कर दिए परकोटे जब पांच जन शंख की ऐसी धुनि हुई प्रलय कालीन बिजली कड़क रही हो मानो तो मुर दैत्य आखिरी रक्षा में था प्रवेश करने के लिए मुर दैत्य को मारना आवश्यक था वो जाग पड़ा शंख ध्वनि सुनकर निकल आया मुर दैत्य के पांच सिर थे पांच सिर वो जल में पड़े सोता रहता था क्योंकि कोई आ ही नहीं सकता वहां प्रणय कालीन सूर्य और अग्नि के प्रचंड तेज के समान पांच खोपड़ी वाला मुर दैत्य बड़ा भयंकर कोई आंख उठाकर उसकी तरफ देख नहीं सकता था उसने त्रिशूल उठाया और गरुण जी पर प्रहार किया भगवान गरुण जी पर विराजमान थे आगे सत्यभामा जी ऐसा मालूम हुआ पांचों मुख से त्रिलोकी को निगल जाएगा जब गरुण जी पर त्रिशूल चलाया और पांचों मुख से सिंघनाद किया सिंघनाद थरथरा दिया भूमंडल को भगवान ने देखा कि मूर दैत्य का त्रिशूल गरुण जी की ओर आ रहा है बड़ा हस्त कौशल दिखाते हुए सारंग धनुष से दो बाण मारे कि त्रिशूल काटकर गिरा दिया और मुर दैत्य के मुख को भगवान ने बाणों से भर
दिया पांच मुख अटस किया पाच पांचों को बाणों से भर दिया अब व दैत बड़ा क्रुद्ध हुआ और अपनी गदा उठाई और भगवान पर प्रहार किया परंतु गदाधर भगवान ने वो गदा उनके समीप पहुंचे इस पहले ही अपनी गधा से उस गधा को नष्ट कर दिया अब वो भुजाएं फैला कर के भगवान श्री कृष्ण और गरुण जी को मिसने के लिए चला इतना बलवान भगवान ने सुदर्शन जी को आदेश किया कि इसका हिसाब किताब कर दो भुजाएं जांग गर्दन छाती सब जगह से काट के वही ढेर कर दिया सुदर्शन जी ने अमर दैत्य के प्राण पखेरू उड़ गए और जल में गिर पड़ा जैसे इंद्र के वज्र से शिखर कट जाने पर कोई पर्वत समुद्र में गिर पड़ा हो इसके बाद मुर दैत्य के सात पुत्रों की रक्षा थी नगर की ऐसे थोड़ी था मोमासर का नगर ताम अंतरिक्ष श्रवण विभा वसु वसु नभ स्वान अरुण यह सब महा बलवान मुर दैत्य के समान हो क्रम बाइ क्रम इनकी पूरी सुरक्षा थी प्राग ज्योतिपुर की ज सुना पिता को महाराज श्री कृष्ण चंद्र ज ने सस्त्र अस्त्र से सुसज्जित होकर पीठ नामक दैत्य को अपना सेनापति बनाकर भगवान श्री कृष्ण पर
चढ़ाई कर दी भगवान श्री कृष्ण पर बाण खट गदा शक्ति दृष्टि त्रिशूल प्रचंड शक्तियों की वर्षा करने लगे व दैत्य भगवान ने सारंग धनुष से निकले हुए बाणों से सब अस्त्र शस्त्रों को काट गिरा दिया और शट प्रहार से सेनापति पीठ उसके साथी दैत्यों के शिर जांगे भुजाएं पैर कवच सब सुदर्शन चक्र को आदेश किया काट काट करके सब ढेर कर दिए भगवान का सुदर्शन अमोग जब पृथ्वी के पुत्र नरकासुर जिसे भोमा सुर कहते थे देखा कि भगवान श्री कृष्ण प्रवेश कर गए सब विध्वंस कर दिया अस कोद हुआ वह मद वाले हाथियों की सेना में गजराज पर विराजमान होकर भगवान श्री कृष्ण के सामने आया उसने देखा कि आकाश पर गरुण पर पहले सत्यभामा जी विराजमान है फिर भगवान विराजमान है जैसे सूर्य के ऊपर बिजली वर्षा कालीन श्याम मेघ सुभाय मान सूर्य गरुण जी और बिजली सत्य भामा वर्षा कालीन मेघ श्री द्वारिकाधीश महाराज भवासर ने देखते ही भगवान पर सतनिक का प्रहार किया भगवान ने सारंग धनुष से अमोक बाण के द्वारा तुरंत उस शक्ति को नष्ट कर दिया भगवान ने सुदर्शन चक्र को आदेश
किया जितने इनके सैनिक है वो तो बस केवल घूमना है वहा कोई सस्त सुदर्शन जी को नहीं रोक सकता जिधर घूम गए सब साफ हो गया उस समय भगवान गरुण जी पर सवार होकर के गरुण जी को आदेश किया इनके हाथियों की सेना को विदन कर दो पंजे और पंखों के मार से बड़े-बड़े गज राजों को विदीर्ण कर दिया चोंच पंजा पंख महाबली गरुण जी है महाबली त्रिभुवन में इनसे बड़ा बली कौन होगा जो भगवान को विराजमान करके चलता अनंत ब्रह्मांड का भार भगवान लेकर चलते हैं चोच पंखे और पंजों की मार से भसुर
के जितने भी गजराज हाथी थे सब मारे गए अब भोमा सुर अकेले खड़ा उसने देखा गरुण जी की मार से तो मेरी सेना सब नष्ट हो गई तब गरुण जी पर वज्र से भी कठोर शक्ति का प्रहार किया गरु जी ने एक पंखे के झटके से पूरी शक्ति को नष्ट कर दिया गरुण जी है गरुण जी कभी अवसर आएगा तो जब अमृत हरण करने गए ना स्वर्ग लोग तब इनके बल का विक्रम देखो वायु देवता अग्नि देवता बड़े-बड़े देवता देवराज इंदराज सब कुछ नाए देवराज ने बज्र चलाया तो इतना बड़ा पंख छोड़ दिया कहा तुम्हारे बज्र का
सम्मान करता हूं मैं तुम्हारे बज्र को अपनी चोत से अभी चखना चूर कर दू गरुण जी भगवान के वाहन है पक्षीराज गरुण जी ने अपने पंख से ही उस शक्ति को नष्ट कर दिया भौ मासु ने जब देखा मेरी कोई चाल नहीं चल रही कोई उद्योग नहीं चल रहा सब विफल हो जा रहा है उसने त्रिशूल उठाया और भगवान श्री कृष्ण की तरफ बढ़ा प्रहार करने के लिए तो सत्यभामा जी ने कहा प्रभु यह प्रहार कर रहा है इसके पहले बोले बस बस तुम्हारे आदेश की जरूरत थी क्योंकि उनको पता नहीं है मेरा पुत्र है सत्यभामा रूप में भूमि पुत्र ही भौ मासु भगवान ने सुदर्शन चक्र से कहा कि भवासर का सिर किरीट कुंडल सहित अलग कर दो बस सिर कुंडल किरीट के सहित सुदर्शन जी ने काट कर के नीचे फेंक दिया और यही सुदर्शन भगवान के अनन्य भक्त जो भी अनन्य भक्त होते हैं उनकी रक्षा के होता इसीलिए भक्त निर्भय होता है अमरीश जी को थोड़ी पता था सुदर्शन जी पीछे हमारे हैं दुर्वासा जी ने कृत्या प्रकट की झपट करके कृत्या को भस्म करके दुर्वासा जी को त्रिभुवन में दौड़ाया सुदर्शन चक्र ने यही
इससे बड़ा पद कौन होगा हम हरिदास हैं भगवान के जन है अब तो भो मासु के जितने सगे संबंधी सब हाय हाय पुकार उठे देवता ऋषि मुनि पुष्पों की वर्षा करने लगे अब पृथ्वी प्रकट होकर भगवान के पास आए भगवान श्री कृष्ण के गले में वैजयंती के साथ वनमाला पहने हुए जैसे विराजमान थे आई और कहा कि मेरे बेटा भोमा सुर ने आदित्य माता के कुंडल उतारे थे य कुंडल ली तपाए हुए रत्न जट दिव्य कुंडल और कहाय वरुण का छत्र और एक महाम यह सब दिव्य जो अपरण करके लाया था पृथ्वी देवी बड़े-बड़े देवताओं के द्वारा पूजित विश्वेश्वर भगवान श्री कृष्ण को प्रणाम करके हाथ जोड़कर भक्ति भाव भरे हृदय से स्तुति करने लगी पृथ्वी देवी ने कहा नमस्ते देव देवेश शंख चक्र गदा धर भक्ते छो पात रूपाय परमात्मा नमोस्तुते नमः पंकज ना भाय नमः पंकज मालिन नमः पंकज नेत्रा नमस्ते पंकजा है नमो भगवते तुभ्यं वास देवाय विष्णवे पुरुष आदि बजाय पूर्ण बोध नमः अजा जन त्रेश ब्रह्मण अनंत सक्त परावत मन भूतात्मा परमात्मा नमोस्तुते त्वम वैश सरज उत् कटम प्रभु तमो निरोध
विभय समृत स्थाना सत्वम जगतो जगतपते काला प्रधानम पुरुषो भवान परह पृथ्वी देवी ने कहा हे शंख चक्र गदाधारी देव देवेश्वर मैं आपको नमस्कार करती हूं हे परमात्मा आप अपने भक्तों की इच्छा पूर्ण करने के लिए उसी के अनुसार रूप प्रकट किया करते हैं आपको हे श्री कृष्ण मैं नमस्कार करती हूं प्रभु आपकी नाभि से कमल प्रकट हुआ है आप कमल की माला पहनते हैं आपके नेत्र कमल से खिले हुए और शांति दय हैं आपके चरण कमल के समान सुकुमार और भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले हैं आपको मैं बार-बार नमस्कार करती हूं हे प्रभु आप समग्र श्वर धर्म यश संपत्ति ज्ञान और वैराग्य के आश्रय हैं आप सर्वव्यापक होने पर भी स्वयं वसुदेव नंदन के रूप में प्रकट है मैं आपको नमस्कार करती हूं आप ही पुरुष हैं और समस्त कारणों के भी परम कारण है आप स्वयं पूर्ण ज्ञान स्वरूप है मैं आपको नमस्कार करती हूं आप स्वयं तो है जन्म रहित परंतु इस जगत के जन्मदाता आप ही हैं आप ही अनंत शक्तियों के आश्रय ब्रह्म है जगत का जो कुछ भी कार्य कारण में रूप है जितने भी
प्राणी या प्राणी है आप सबके स्वरूप है सब रूपों में आप है हे परमात्मा आपके चरणों में मेरे बार-बार नमस्कार है प्रभु श्री कृष्ण जब आप जगत की रक्षा करना चाहते हैं तब रजोगुण को और जब इसका प्रलय करना चाहते हैं तब तमोगुण को और जब इसका पालन करना चाहते तो सतोगुण को स्वीकार करते हैं परंतु यह सब करने पर भी आप इन गुणों से ढकते नहीं लिप्त नहीं होते हे जगतपति आप स्वयं ही प्रकृति पुरुष और दोनों के संयोग वियोग के हेतु काल है औरन तीनों से परे भी है भगवन में पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश पंच तन मात्रा मन इंद्रिया और इनके अधिष्ठात्री स्वरूप में भ्रम के कारण ही पृथक प्रतीत हो रहा है नहीं तो आप ही आप हैं भ्रम के कारण प्रथक प्रतीत हो रहा है हे शरणागत भय भंजन प्रभु मेरे पुत्र भो मासु को तो आपने कृपा करके परम पद प्रदान किया अब मेरे पुत्र भौमा सुर का पुत्र य भग दत्व बहुत भयभीत हो रहा है मैं इसे आपके चरण कमलों की शरण में ले आए हूं प्रभु आप इसकी रक्षा कीजिए इसके सिर पर अपना वह कर कमल रखिए जो सारे जगत के समस्त पाप
ताप को नष्ट करने वाला है परीक्षित जब पृथ्वी ने भक्ति भाव से विनम्र होकर इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण की स्तुति प्रार्थना की तब उन्होंने भोमा सुर के पुत्र भग दत्व को अभयदान दिया और भो मासु के समस्त संपत्तियों से संपन्न महल में प्रवेश किया वहां जब महल को खुलवाया तो भोमा सुर ने बलपूर्वक राजाओं से 161 राजकुमारियां छीनकर कैद कर रखी थी जब भगवान ने उन राजकुमारियों को मुक्त किया तो सब पहला दर्शन भगवान श्री कृष्ण का कर ही जब से बंद हुई देखते ही सम्मोहित हो गई और उन्होंने मन ही मन संकल्प किया कि आज तक मैंने कभी कोई साधना की हो व्रत किया हो उपवास किया हो नियम किया हो तो भगवान श्री कृष्ण मुझे पति रूप में प्राप्त हो मन ही मन भगवान को अपने परम प्रीतम पति के रूप में वर्ण कर लिया राजकुमारियों ने 16100 ने प्रत्येक अलग-अलग यह संकल्प किया कि श्री कृष्ण मेरे पति हो हे विधाता मेरी इस अभिलाषा को पूर्ण करो और सबने भगवान के चरणों में प्रणाम किया भगवान के चरणों का आश्रय लिया और भगवान सबके मन की बात जानने वाले हैं
भगवान ने उन राजकुमारियों से कहा तुम निर्भय हो जाओ और तुमने जो कामना की है उसकी तुम्हें प्रा होगी और सबको सुंदर सुंदर वस्त्र पहनाने का आदेश किया दासिया ने सुंदर वस्त्र पहनाए 16100 पालकिया मंगाई एक एक राजकुमारी को सुंदर सुसज्जित करके द्वारिका भेजा और वहां से बहुत बड़ा खजाना रथ घोड़े अतुल संपत्ति य सब भेजे द्वारिका रावत के वंश में उत्पन्न हुए वेगवान चार चार वाले सफेद रंग के 64 हाथी वो भी द्वारिका भेजे इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने सत्य भामा जी को लेकर के कहा चलो तुम्हें देवराज इंद्र की राजधानी के दर्शन करावे गरुण जी से कहा ले चलो स्वर्ग ले चलो वायु से तीव्र गति मन की मन से भी तीव्र गति गरुण जी की है जैसे आप अमेरिका गए तो सोचो अमेरिका पहुंच गए पहुंच गया इससे भी तीव्र गति कर जी काहा स्वर्ग चलना है तो है पूरा होते हुए स्वर्ग पहुंच गए स्वर्ग चलना है है महाराज स्वर्ग आ गए गरुण जी महाराज ऐसे भगवान के नासे थोड़ी बान की कितने स किलोमीटर रफतार में चलेंगे कई बजे पहुंचे ऐसा नहीं है स्वर्ग चलना है
महाराजा गया यह तो मन की गति है आपने ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका कुछ भी जो देखा है आप देखो सोचो ऑस्ट्रेलिया पहुंच गया मन मन और मन से भी कई गुना बढ़कर तीव्र गति गरुण जी की है और गरुण जी से भी कई गुना बढ़कर के तीव्र गति भगवान श्री हरि की है तभी तो जब देखा गजेंद्र के पास गरुण ने तो छोड़ कर के भगवान तुरंत गरुण को भी छोड़ दिया और तुरंत बचा क्योंकि व डूबने में कितना समय लगता है महाराज भगवान श्री कृष्ण चंद्र जू देवराज इंद्र की राजधानी अमरावती पुरी में गए देवराज ने देखा कि भगवान पधारे तो इंद्राणी के सहित सत्यभामा और भगवान श्री कृष्ण का पूजन किया फिर देव माता आदिति को प्रणाम करके भगवान ने कहा माता अपने कुंडल स्वीकार करो भ मासु मारा गया सत्य भामा जी से कहा चलो देवपुरी की तुम्हें वाटिका दिखा देते हैं उपवन जहां अप सराए विहार करते हो बताया यह पारिजात है कल्पतरु है इसकी यह महिमा इसकी य महिमा है सत्य भामा जी ने कहा हमारे भी उपवन में कल्पवृक्ष होना चाहिए बो उखाड़ लेते गरुण जी को आदेश किया कि हम भी
विराजमान होंगे सत्यभामा एक कल्प वृक्ष रख लो गरुण जी पर कल्पवृक्ष देवराज इद्र ने जब अमृत अपहरण किया था तो कहा कि हे देव शिरोमण मैं आपसे पूछता हूं कि आप में कितना क्योंकि हम कोई भी देवता आपके बल की था नहीं पा रहे तो बोले पूरे ब्रह्मांड को एक पंख पर रख के भगवान को विराजमान करके आराम से उठ सकता हूं गरुण जी क पूरे ब्रह्मांड कल्प क्या चीज होती पूरे ब्रह्मांड को एक पंख में विराजमान करके भगवान सहित मैं आराम से उठ सकता हूं गरुण जी महाराज भगवान के महान है जिनको भगवान अपनी ध्वजा पर धारण करते गरुड़ध्वज भगवान को कहा मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुड़ धज म पुंडरीकाक्ष मंगलायतन हरी अब भगवान ने गरुण जी को प्रेरणा की तो गरुण जी ने चोच से ऐसे उखाड़ करके रख लिया कल्प देवराज इंद्र ने देखा कि हमारे बगीचे से कल्प उखाड़ अभी पूजा की है अपनी मां के कुंडल नहीं ला पाया बता अब वो है सची ने कहा ये तो हमारे बगीचे का प्रे लिए जा रहे हैं अब ऐसे तो दबा हुए थे देवराज लेकिन जब पत्नी कह दे तो कुछ और रंग आ जाता है तो सत्य भामा
जी के महल में जा तो थोड़ा ची चपड़ के भगवान ने कहा कि देख लो आप महाभारत में वर्णन थोड़ा ची चपड़ करने लगे प्रभु आप तो कहा देख लो सम्मान से ले जाने जा तो ले जाने दो नहीं तो भगवान अ बाल्यावस्था में देख ही चुके हैं गिरिराज ग न सात दिन तक धारण किए थे पूरा अपना सब वैभव लगा के कुछ कर तो पाए नहीं इतना कल्पवृक्ष की महिमा की जहां से निकले योजन सुगंध मकरंद के लोभी भरे स्वर्ग से द्वारिका में आ गए बड़ा महिमा है कल्पवृक्ष की ऐसे थोड़ी है परीक्षित जब इंद्र को अपना काम बनाना था तो सिर झुकाकर मुकुट रखकर भगवान के चरणों का स्पर्श किया और दास अपने को साबित किया और जब भगवान कल्प वक्ष लाने लाने लगे तो लड़ाई ठान ली बड़ा दोष है इनको धन्यता धिक्कार है ऐसी धन्यता श्री सुखदेव जी महाराज कहते परंतु भगवान ने एक मुहूर्त में सबको समझा दिया तुम हमसे जीत नहीं पाओगे और लाकर के कल प्रक्ष अब भाई राजकुमारियों से कि तुम्हारी सबकी कामना थी मैं पति रूप में प्राप्त हूं बनो दुलहन सब सजाओ दासिया को आदेश किया एक मुहूर्त में एक साथ
16100 एक रूप धारण करके एक मुहूर्त में विवाह किया अथो मुहूर्त एक अस्विन नाना गारे सुता स्त्रिया यथो पय मेंे भगवा ताव द्रुप धरो अव्यय वैसे जैसी भावना की थी वैसे नव किशोर रूप 16100 रूप धर के एक ही मुहूर्त में सबसे ब्याह किया कितने हो गए 16108 सर्वशक्तिमान अविनाशी भगवान के लिए इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है भगवान सुखदेव जी कहते परीक्षित भगवान ने 16108 महल द्वारिका में ऐसे जो देवराज इंद्र के पास भी भोग सामग्री वो नहीं होगी वो द्वारिका में थी जिनके बराबर जगत में कहीं कोई सुख सामग्री नहीं मति और गति के परे की लीला उन महलों में थी अविनाशी भगवान श्री कृष्ण आत्मानंद में मगन रहते उनको किसी की जरूरत नहीं लक्ष्मी जी के सब अंश स्वरूपा शक्तियां है जो 16108 है भगवान सबके साथ ऐसे ही व्यवहार करते जैसे साधारण पुरुष परीक्षित ब्रह्मादेवी जब महल में पधार तो प्रेम भरी मुस्कुराहट मधुर चितवन नव समागम प्रेमाला तथा भाव बढ़ाने वाली लज्जा से युक्त होकर वह सब भगवान की सेवा में रहती कितने अहो भाग्य उनमें से सभी
पत्नियों के साथ सेवा करने के लिए सैकड़ों दासिया रहती पर जब भगवान पधार तो दासिया नहीं वोह स्वयं भगवान की अगवानी करती चरण पखार पंखा लती इत्र फुलेल चंदन आदि लगाती फूलों के हार पहना सरती सुलाती भगवान को स्नान कराती भगवान को भोजन कराती अपने हाथों से भगवान की दिव्य सेवा करती चाहे जितना रुपया हो सेवा तभी मानी जाएगी जब अपने हाथ से करोगे अगर आप पुजारी रखते हो तो आप एक लाख रुपया लगाओगे तो दो लाख द लाख भगवान दे देंगे सेवा नहीं मानी जाएगी सेवा मानी जाएगी जब अपने हाथ से भगवान की सेवा करोगे भगवान श्री कृष्ण चंद्र जू सबके पास सब समय रहते थे किसी भी पत्नी को ऐसा महसूस नहीं होता था कि भगवान हमारे पास नहीं सबके पास रहते थे श्री राधा वल्लभ लाल की जय
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
संबंधित
- भजन का सच्चा स्वरूप ! //27/09/2026 — गुरु निष्ठा के लिए आपने या गुरु समर्पण के लिए जो अभी बातचीत की है तो बड़े चौड़े में और खुले में आज सब चर्चा करते हैं। हम लोग कहां असफल क्यों हो जाते हैं महाराज जी क्यों ऐसी अच्छा…
- अनन्यता से ही होगा सब कुछ प्राप्त ! // 26/09/26 — हम लोग भगवान के शरणागत जन है। प्रिया लाल के शरणागत जन है। लेकिन शरणागति का रहस्य ना जानने के कारण बहुत वर्षों तक या जन्म पूरा व्यतीत होने तक हमारा जो भागवतिक आनंद है वो स्पुरित…
- हमें जीवन में मुश्किलें कब तक सहनी पड़ेंगी ? //25/09/26 — कोई ना कोई सा किसी ना किसी सेवा सेवा में पांच 10 15 20 का एक होता है आमच राग द्वेष बनने से बहुत ज्यादा दुभावना रहती है उसके कारण क्या विक्षेप होता रहता है और एक दूसरे की ये मतलब…
- इस एक बात से आपका पूरा जीवन बदल जाएगा ! // 24/09/26 — देखो सबसे पहली बात कि जो ही हम शरणागत होते हैं हमारी बात ही हमारे सारे जीवन का भूत भविष्य वर्तमान का पूरा भार इष्ट पर होता है। अब हमको जो कर्तव्य करना है इस समय शरणागति का वह…
- यदि साधक स्वयं पर कृपा करे, तो यह लाभ मिल सकता है/ काकासुर, शकटासुर एवं तृणावर्त का उद्धार — वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता निर्वापय परम शीतल माश्रयाम परम शीतल माश्रया [नाक से की जाने वाली आवाज़] परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप…
- श्रीकृष्ण का छठी पूजन एवं पूतना वध / बाल कृष्ण के दर्शन को को आए महादेवजी ! // 22/09/26 — नीलमणि ने सकला वयवाना कुरविंद नेव बिंबा धरस कमल रागेने पाण पादस्य शिखर मणने नखर निकस निर्माण कदा चिन मणमयोवा इंदवरे सकला वयवस्य बंधु केनेव बिंबा धरोष् जपा कुसुमेव पाण पादस्य…