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भोगासक्ति की जलन से बचने का सरल उपाय / आनंद चाहिए तो इन 11 बातों से सावधान रहिए // 24/07/2025

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदा वनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद अशोक पूर्णम हद्यपित मधुपते स्मरतामुग्रम निर्वापय परम शीतल माशया परम शीतल माया आज देख ब्रज सुंदरी मोहन बन के ब्रज सुंदरी मोहन बनी के अंश अंश बाहु दे किशोर जोर रूप राशि मनो तमाल अरुझी रही सरस कनक बे मनो तमाल अरुझी रही सरस कनक बेली अंश अंश बाहु देय किशोर जोर रूप राशि मनोत्तमाल अरुझी रही सरस कनक बेली आज देख ब्रज सुंदरी मोहन बनी के नवनिकुंज भ्रमर गुंज मंज घोष प्रेम पुंज गान करत मोर पिकन अपने सुर सो मेरी मदन मुदित अंग अंग बीच बीच सूरत रंग बीच बीच सूरत रंग पल पल हरिवंश विवत नैन चसक झेली मदन मुदित अंग अंग बीच बीच सुरत रंग रंग पल पल हरिवंश पीवत नैन चसक झेली पल पल हरिवंशं पीवत नैन चशक झेली आज देखी ब्रज सुंदरी मोहन बनी के मोहन बनी के उपासना में जड़ चैतन्य बुद्धि स्त्री पुरुष बुद्धि दुरात्मा महात्मा बुद्धि इन सब का लय हो जाता है।

उसकी दृष्टि में ना कोई स्त्री है, ना कोई पुरुष है, ना कोई दुरात्मा है, ना कोई महात्मा एकमात्र परमात्म दृष्टि जागृत होती है। यह जागृत होती है। पहले भावना की जाती है। फिर स्थिति होती है। जैसे पार्थिव स्थिति होने पर पहले स्त्री पुरुष जड़ चैतन्य दुरात्मा महात्मा ऐसा दर्शन होगा बाद में भगवत भाव होगा लेकिन स्थिति होने पर केवल भगवत भाव रहता है केवल प्रभु भाव रहता है जब तक यह भाव नहीं रहता तब तक बहुत कच्चाई है और उपासक को सावधानी पूर्वक अपने को परिपक्व करना है परिपक को अपना प्रयास और गुरु इष्ट कृपा अपना केवल प्रयास ही है।

कृपा का भरोसा नहीं तो परिपक्व अवस्था नहीं प्राप्त हो सकती। और आप वाणी से केवल कृपा शब्द का उच्चारण करते हैं और आप प्रयास बिल्कुल नहीं कर रहे। पुरुषार्थ नहीं कर रहे। मनमानी आचरण कर रहे हैं तो स्थिति नहीं प्राप्त हो सकती। स्थिति प्राप्त होती है। अपना संपूर्ण पुरुषार्थ लगा दे और भगवत कृपा का गुरु कृपा का भरोसा तो स्थिति निश्चित प्राप्त हो जाती है। यही स्थिति जीवन मुक्त करती है और जीवन मुक्त महापुरुष ही प्रियाल के प्रेम का रसास्वादन करता है। जब तक देह भाव पुष्ट है तब तक प्रेम का प्रादुर्भाव नहीं होता।

जैसे जैसे देह भाव गलित होता है वैसे वैसे प्रेम प्रतिषण वर्धमान होता रहता है। बढ़ता रहता है। प्रेम अगाध समुद्र है इसलिए कभी इसमें पूर्णता नहीं होती कि अब पूर्ण प्रेम आ गया। कभी प्रेमी को ऐसा अनुभव नहीं होता कि मैं प्रेमी हूं या मेरे में प्रेम है या पूर्णता है। नहीं। हर समय एक विचित्र कोटि की चाह उत्पन्न होती है। यद्यपि जिनकी चाह है वो मिले हुए हैं। फिर भी वो इतनी प्यास है कि वो चाह बढ़ती ही रहती है। चाह बढ़े दिन रहन रात दिन चाह बढ़ती है। यद्यपि तन मन के बिछुरे नहीं ना शरीर से दूर है ना मन से दूर है पर चाह बढ़े दिन रहन कबहु संजोग न मानह देख भरी भरी नैन हर समय नेत्र भर के रूप रस का पान करते हैं पर ऐसा लगता है मानो कभी देखा ही नहीं ऐसी प्रेम की महामहिम वृत्ति जब उपासक के हृदय में जागृत होती है यह है मोक्ष सुख भी कड़वा कर देने वाला सुख मानो देह में जो मृत्यु लोक का सुख है तो बड़ा घृणित सुख है इससे उच्च कोटि का सुख देवलोक में है।

देवलोक से भी तपोक महरलोक जनोक फिर सबसे ज्यादा महान सुख ब्रह्मलोक में है। लेकिन ये जितने सुख है सब मायाकृत है। जो दास को सुख मिलता है वह ब्रह्मा जी को भी सुख ब्रह्म पद में नहीं मिला। भगवत दासत्व फिर जो सखाओं को सुख मिला उसकी तो महिमा ही क्या? जो वात्सल्य भाव से प्रभु को दुलार करते हैं उनके हृदय को क्या कहना? जो कांता भाव से प्रभु से प्यार करते हैं उनको कौन उपमा दे किसी से? क्योंकि वह अद्वती है जो कांत श्री कृष्ण को मानकर आठों पहर उनमें चित्त को श्रृंगार भाव से जोड़ते हैं और ये तो महाधुर्य रस वृंदावन नित्य विहार यहां जब चित्त स्पर्श करता है तो मोक्ष कड़वा लगने लगता है।

मोक्ष सुख भी थुतकीकृत हो जाता है। जिसे कड़वा हम स्वीकार नहीं कर सकते। थूक देते हैं। ऐसा श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी ने कई बार वर्णन किया। महाप्रभु हरिवंश चंद्र जो भी कहते हैं विभीम कैवल्यता ये तो भयाव है मोक्ष पद भय लगता है इससे। श्री रूप जी ने कहा कि यह तो पिशाचिनी है। जब तक यह भक्ति मुक्ति पिशाचिनी लगी रहेगी तब तक प्रेम नहीं प्रकट होता है। भोगों को भोगने की इच्छा रूपी पिशाचिनी या मुक्त हो जाने की पिशाचिनी ऐसा महापुरुषों ने जब प्रिया प्रीतम के प्रेम रंग रस का रसास्वादन किया तो मोक्ष मुक्ति पिशाचनी लगने लगी।

भयावा लगने लगी, कड़वी लगने लगी, थुतकी कृत हो गई। फिर और कौन सा सुख बचा? सर्वश्रेष्ठ महा सुख, आत्म सुख जीवन मुक्त महापुरुषों को प्राप्त होता है। लेकिन प्रेम सुख के आगे ये सब सुख फीके हो जाते हैं। इन विलोकत अति अनुरागा बरबस ब्रह्म सुख मन त्यागा। ब्रह्म सुख का भी त्याग करके मन प्रभु के रूप रसाशों का रूप का आनंद प्राप्त करने के लिए विकल हो गया। जनक जी महाराज का और ज्ञानियों की और ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुषों की तो अलग वृत्ति रही। ये तो बड़े-बड़े ज्ञानियों के गुरु है।

इसलिए श्रीपाद कह रहे कि त भूता विमुक्ति विषम निरभ सर्वेंद्र्थ सर्वे भोगा भवती प्रबल गल वनभट ज्वाल कल्प कीट प्राया समस्त प्रवर सुरगणा सिद्ध जाल प्राय संस्वाद वृंदावन रसिक रसम माध्यते में हदम जब आपको प्रियाल का थोड़ा भी प्रेम प्राप्त होगा तो तती भूता विमुक्ति ये जो जीवन मुक्ति अवस्था है मोक्ष पदवी है बोले तती भूता है कड़वी लगने लगेगी नहीं चाहिए मोक्ष शुभ पर ये बहुत ऊंची बात है। अभी तो मृत्यु लोक के भोग ही आपको परास्त कर देंगे। मोक्ष सुख तो जो ब्रह्मलोक तक के भोगों का त्यागी होता है उसको प्राप्त होता है।

यह प्रेमी जन मोक्ष के आगे भी जो महारस है उसमें स्थित है। मृत भोग तुम्हें आकर्षित करके भ्रष्ट कर देते हैं। तो मोक्ष सुख तो बहुत दूरी की बात है। हमारी स्थिति नहीं है। पर हमारे गुरुजन जो आगे चल रहे हैं उनकी स्थिति है और उसी मार्ग में हम चल रहे हैं तो हम स्थिति ना होते हुए भी उसी मार्ग का अनुसरण करेंगे जिसमें हमारे गुरुजन गए हैं। महापुरुष जन गए हैं। महाजनो गन स्वपथा जिसमें महापुरुष जन गए उस पंक्ति में हम खड़े हैं। स्थिति हमारी नहीं है पर हमको वही वही आचरण करने हैं वैसा ही भाव रखना है जैसा हमारे आगे विराजमान गुरुजन जो पंक्ति में है जो प्रियाल को दुलार करने वाले हैं जो प्रियाल के समीप पहुंच चुके हैं जिनके आसपास आठों पहर महा सुख घेरे रहता है तो हम उसी मार्ग से चल रहे हैं इसलिए जैसे कोई कहे कि हमारी स्थिति तो नहीं पर हम उसी पंक्ति में तो खड़े हैं ना तो हमको वैसा ही व्यवहार करना है।

इतना बड़ा त्याग किसी और की सामर्थ नहीं सिर्फ प्रेम की सामर्थ है। जो मोक्ष सुख का भी त्यागी बना दे और ऐसा त्यागी कि पुनः उसकी इच्छा ही कभी ना हो। त भूतवा विमुक्ति मोक्ष पदवी कड़वी लगने लगती है। श्रीपाद कह रहे हैं विषम निरव भाति सर्वेंद्र अर्थ निर कहते हैं नरक को और जितने भी भोग हैं ये विषम है ये एक रस नहीं है आज कामना जितनी बड़ी हुई तो भोगो तुम्हें अच्छा लगेगा फिर भोगो फिर भोगो तो मन कहने लगेगा इस शरीर में नहीं उस शरीर में देखो इस भोग में नहीं उस भोग में इस वस्तु में नहीं उस वस्तु में इसका मतलब हमको केवल भुलावे में डाला जा रहा है सुख नहीं है लिखा विषम निरय वभाति सर्वेंद्रिय इंद्रियों के जितने भी भोग हैं यह सब नरक प्रदान करने वाले हैं।

इनमें किंचिन मात्र सुख नहीं है। श्री कृष्ण चंद्र जी ने गीता जी में कहा दुख योनया अर्थात केवल यह दुख प्रकट करते हैं। पक्की बात है सच्ची बात है। अज्ञान के कारण आपको ऐसा लगता है कि इंद्रियों के भोग भोग कर मैं सुखी हो रहा हूं। लेकिन सत्य विषय यह है कि जब उनको भोगो तो अंदर से आता है कि जो मैं चिंतन में सुख प्राप्त कर रहा था वह तो है ही नहीं। बड़े-बड़े भोगियों को घृणा होने लगती है। पर वह घृणा दूसरी तरह की होती है। वैराग्य नहीं होता। उस शरीर से नहीं दूसरे शरीर में उस शरीर से नहीं तीसरे शरीर में।

ऐसे वो भटकता है और जो विवेकी होता है वो संपूर्ण भोगों से नरकवत अपना पिंड छुड़ा लेता है। इन भोगों के भोगने में तुम्हारा चिंतन प्रधान है और कुछ नहीं। धतो विषय पुष संग देशते यदि तुम विषय चिंतन ना करो तो किसी विषय में सुख नहीं है। तुम्हारा जब एकांत में चिंतन बनता है तब वो तुम्हें चिंतन के कारण सुखानुभूति होती है ना कि उस विषय में सुख है। जैसे एक कुत्ता सूखी हड्डी लेकर एकांत में भागता है कि मेरे सुख को कोई छीन ना ले और जब चबाता है तो उसी की गलफरों से रक्त स्राव होकर हड्डी में दिखाई देता है।

उसको लगता है इसमें रस है। इसमें पावर है कुछ नहीं। ऐसे ही अज्ञानी पुरुष के द्वारा समस्त भोगों के भोगने का जो चिंतन है वही चिंतन उसे सुखानुभूति कराता है ना कि भोगों में। नहीं तो भगवान की आज्ञा मानो अनन्य चिंतयंतो माम केवल भगवत चिंतन हो फिर हमको परिणाम बताओ कौन सा भोग तुम्हें सुख प्रदान करता है घृणा हो जाएगी ये भगवत प्राप्त महात्मा कह रहे हैं इनके वचनों को मानना चाहिए अनुभव में नहीं उतरना चाहिए ऐसा दलदल है भोगों का कि आज तक कोई अनुभव करके नहीं निकला है जब निकला है तो रो के असंतुष्ट होकर के ही छोड़ा है कभी कोई ऐसे भोग नहीं छोड़ पाया कि बहुत भोगा हमें तृप्ति हो गई।

अब मैं जा रहा हूं भगवान की शरण में। ऐसा कभी नहीं हुआ। एक भी नहीं हुआ। चाहे जितना बड़ा सम्राट हो चाहे जितना भोग बाहुल्यता हो। रोया पश्चाताप किया और असंतुष्ट होकर अतृप्त होकर त्यागा। वही बात आज है आपके हृदय में कि आप अतृप्त है भोगों से। असंतुष्ट है तो अनुभव के लिए मत जाइए। गुरुजनों की महापुरुषों की बात मान लीजिए और उसका चिंतन छोड़ दीजिए। बस खास बात है। तुम्हारे को अगर कोई परेशान करता है तो तुम्हारा चिंतन परेशान करता है। अंदर से ठीक बैठकर देख लीजिए।

बड़े भाग्यशाली उपासक है जिन्होंने अपने चिंतन को बचाने की चेष्टा की। कोई भी क्रिया तब होती है जब चिंतन होता है। यह बहुत सिद्धांत है। भगवान के वचन है। धतु विषय पुसास संगुजा जब हम किसी विषय का ध्यान करते हैं, चिंतन करते हैं, मनन करते हैं तो हमारे अंदर उसके भोगने की इच्छा प्रकट होती है। चाहे वो कोई खान-पान की वस्तु हो, पहनने ओढ़ने की वस्तु हो। ये सब भोग के अंतर्गत आते हैं। सर्वेंद्र अर्थ समस्त इंद्रियों के अर्थ भोग अलग-अलग है। श्रवण इंद्री घणेंद्र नेत्र इंद्री तग्द्री वाकेंद्र हस्त्री पाद इंद्री जनेंद्रिय गुदा इंद्री ये सब इंद्रियां हैं।

पांच कर्मेंद्रियां हैं। और पांच ज्ञानेंद्रियां हैं। इनका मुखिया मन ये 11 इनका काम ही है जगत के भोगों में चिंतन लगाना बहुत सूक्ष्म विषय प्रार्थना है ये संतों की अनुभूत विषय है चिंतन किसी विषय का ना हो और फिर कोई भोग भोगो बिल्कुल 100 में 100% आपको सुख नहीं मिलेगा ऐसे महापुरुषों का जो चिंतन भगवान में स्थित है प्रियाल में स्थित है उनके लिए कहा गया विषय ग्रहण मुंच कोई फर्क नहीं पड़ता विषय सेवन में पाप कृत में पुण्य कृत में अंतर से देखा जाता है कि उसको बराबर पांच व्यक्ति बराबर वही क्रिया कर रहे हैं।

चाहे वह पाप के हो या पुण्य की हो लेकिन पांचों का फल अलग-अलग हो सकता है। एक का राग नहीं है। बिल्कुल केवल क्रिया है। बिल्कुल राग नहीं है। बिल्कुल नहीं बंधेगा। उसका हर कर्म अकर्म हो जाएगा। एक है बहुत कम राग है। उसको बहुत कम फसाव उसको होगा। एक है संपूर्ण राग चित्त में है। उसको पूरी आसक्ति उसकी दुर्गति करा देगी। अंतर से तुम कितना चिंतन करके उस भोग को स्वीकार किए हो बस खास बात है। इसीलिए भगवत प्राप्ति के मार्ग में चाहे जो विषय हो यदि वह बहुत प्रिय लग रहा है और उसका हमारा चिंतन बना है तो उसे हमें सेवन नहीं करना चाहिए।

चाहे वो कितना सतोगुणी भोग क्यों ना हो क्योंकि हमारा चिंतन बना है और अगर हम भोगेंगे तो चिंतन पुष्ट हो जाएगा और बार-बार चिंतन होगा तो हमारे चिंतन में विघ्न पड़ेगा इसलिए जिस वस्तु का चिंतन हो कि आज तो अमुक चीज खानी है अमुक चीज देखनी है अमुक चीज भोगनी है उसका बहुत सरलता पूर्वक यदि माया ने सानिध्य दे दिया तो भी ना भोगा जाए यह बहुत अंदर से अध्यात्म पुष्टि की बात है। इसे समझ लो। श्रीपाद कह रहे हैं विषम पहली बात यह है कि तुम हर्षित होकर जे ही भोग में जाओगे तो परिणामता तुम्हें शोक मिलेगा क्योंकि द्वंद है ये।

यह विषम है। हरिवंश महाप्रभु। इसी संसार पर विजय प्राप्त करने के लिए प्रेम की बात कही है। अगर इस संसार को जीतना है तो एकमात्र भगवत प्रेम है दूसरा कुछ नहीं दूसरी किसी की सामर्थ्य नहीं है प्रेम में बहुत प्रबल शुभ अशुभ दुर्ग विध्वंस बल तब जयति जयति जग सेवक जी महाराज कह रहे हैं जीत विषम संसार कीर्ति जग विस्तरे जीत विषम संसार कौन जय जय श्री हरिवंश नाम गुण गाय है जो नाम जप कर रहे हैं लीला गायन कर रहे हैं सर्वेंद्र अर्थ समस्त इंद्रियों के अर्थ उनके भोगने का चिंतन और भोग क्रिया नरक प्रदान करती है।

नरक स्पष्ट सर्वे भोगा भवती प्रबल गर क्योंकि जितने भी भोग हैं यह प्रबल विष है। प्रबल विष प्रबल विष का मतलब होता है तत्काल असर करने वाला एक मीठा विष होता है। महीनों में असर करता है। लेकिन भोग तत्काल पागल बना देने वाला है। चिंतन हुआ, सानिध्य भोग का हुआ। पागल बन गया। क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए सब भूल गया। देखो कितना असर चढ़ा उसका कि उसका चिंतन, उसकी क्रिया सब भागवतिक मिट गई और उस समय वो कामांद हो गया। उस समय वासना में हो गया। सारा चिंतन खत्म।

सारी की सारी वृत्ति यह जहर है। इसे कह रहे सर्वे भोगा भवती प्रबल गर ये प्रबल विषय जो तत्काल चढ़ता है। देखने से चढ़ता है, छूने से चढ़ता है, चिंतन से चढ़ता है। फिर भोगने से क्या होता होगा? यह ऐसा प्रबल गरल है, विष है कि एक विष तो खाने से ही केवल एक शरीर में चढ़ेगा, एक जन्म नष्ट करेगा। लेकिन ये भोग कह रहे सर्वे भोगा भवती प्रबल गर ये इतना बड़ा विषय कि देखने से चढ़ जाता है। सुनने से चढ़ जाता है। चिंतन से चढ़ जाता है। फिर भोगने से क्या दुर्गति होगी? इसलिए कहा निरव वात सर्वेंद्र्थ जो इंद्रियों के भोगों का चिंतन करके उनको भोग कर सुखानुभूति करते उनको नरक की प्राप्ति होती है।

भगवान ने भी कहा त्रिवध नरकसद द्वार ना मात्मन काम क्रोधा तथा लोभा तसत ये तीनों नरक के द्वार हैं। काम क्रोध लोभ ये निश्चित नरक प्रदान करते हैं। वन्युत भट ज्वाल कल्पाहा और यह भोग क्या करते हैं? हृदय को जलाते हैं। अग्नि जैसे जला के त्वगेंद्र को शरीर को कष्ट देती है। लेकिन यह कारण शरीर तक प्रभाव डालते हैं। भोग स्वभाव अंतःकरण इंद्रियां और स्थूल शरीर भी इस तीनों शरीरों पर विष का प्रभाव पड़े। ऐसा विष की रचना आज तक नहीं हुई। प्रकृति में प्राकृतिक विष केवल स्थूल शरीर पर प्रभाव डालता है इस पर।

लेकिन ये सर्वे भोगा भवती प्रबल गर ये स्थूल शरीर पर भी प्रभाव डालते हैं। सूक्ष्म शरीर को वशीभूत कर लेते हैं और स्वभाव को बिगाड़ देते हैं। देहाभिमानी पुरुष जब इंद्रियों के द्वारा विषयों का चिंतन करके भोग करता है तो उसके तीनों शरीर बर्बाद हो जाते हैं। तीनों शरीर उसके गंदे हो जाते हैं। ये इसीलिए जो विज्ञ जन है वो कह रहे हैं कि इससे बड़ा कोई जहर ही नहीं है। सर्वे भोगा भवती प्रबल गर वन भट ज्वाल कल्पा हृदय जलाता है। भोगने पर भी जलन भोगने के बाद भी पश्चाताप की जलन पश्चाताप की जलन और वो पश्चाताप टिकाव नहीं होता है।

एक घंटे दो घंटे जलन हुई तीसरे घंटे फिर उसी भोग की चिंतन वृत्ति फिर वही भोग की क्रिया बड़ी दुर्गति है सांसारिक जीव की बड़ी दुर्गति ऊपर से चिकना चुपड़ा शांत नजर आ रहा है अंदर देखो इसमें लिखा है वन भट ज्वाल कल्प का काम अग्नि क्रोधा अग्नि लोभा अग्नि उससे जल रहा है वो कीट प्राया समस्त प्रवर गणा सिद्धसेंद्र जाल कह रहे हैं कि बड़े महापुरुष हैं। इसलिए कह रहे हैं कि इन कीड़ों में और देवताओं में कोई फर्क नहीं है। क्यों? प्रारब्ध अनुसार कीड़ा भी अपने भोग को भोग रहा है।

देवता भी भोग को भोग रहे हैं। देवता कोई नवीन कर्म करके भजन थोड़ी कर रहे हैं। अपने पूर्व पुण्य को भोग रहे हैं। तो कीट प्राया समस्त प्रवर सुरगणा ये प्रवर माने होता श्रेष्ठ। श्रेष्ठ जो देवता लोग हैं हमारी दृष्टि में कीड़े से ज्यादा नहीं है। क्यों? क्योंकि जैसे कीड़ा अपना प्रारब्ध भोग रहा है। ऐसे देवता अपने प्रारब्ध भोग रहे हैं। शुभ कुछ नहीं है उनके पास। नवीन कर्म नहीं जितना रुपया जमा है उसका भोग कर रहे हैं। जैसे बढ़िया होटल है, हर व्यवस्था है, आपका पेमेंट है तो आप भोगिए हर भोग जिस दिन पेमेंट खत्म हुआ धक्का मार के बाहर कर दिए जाओगे।

ऐसे ही स्वर्ग से धक्का मार के गिरा दिया जाता है। उसके गले में माला पड़ी होती है। वो माला नित्य नवीन सुगंधित रहती है। जब तक उसको स्वर्ग में रहना है। और जहां माला कुमलाई तो पता चला कि पुण्य नष्ट हो गए। अब उसको भारी वियोग उसका विमान छीन जाएगा। उसका महल छीन जाएगा। उसको अप्सरा जो मिली थी वो सब भोग सामग्री एक क्षण में हटा के देव शरीर से हटा के भ्रष्ट कर दिया गया। फिर मृत्यु लोक में क्या बनेगा कि कीड़ा पतंगा क्या बनेगा वो भगवान जाने। इसीलिए कह रहे हैं मेरी दृष्टि में कीड़े से और देवता से समानता जब करते हैं तो बराबर नजर आता है।

वो अपने प्रारब्ध का भोग भोग रहा है। अपने प्रारब्ध का। बोले मनुष्य का उदाहरण क्यों? मनुष्य श्रेष्ठ है देवताओं से। क्यों? क्योंकि राधा राधा कृष्ण कृष्ण जप करके वो भगवत प्राप्ति कर सकता है। देवता नहीं कर सकते। कीट प्राया समस्त प्रवर सुरगणा सिद्धसेंद्र जाल। अब कह रहे हैं ये जो अष्ट सिद्धियां और भी 28 सिद्धियां और भी अन्य छोटी सिद्धियां बोले ये इंद्र जाल है कोई भगवत आनंद नहीं है। इंद्र जाल माने होता है जो है नहीं पर दिखाया जा रहा है। माया का जादू का एक नया तमाशा।

सिद्धियां क्या है? माया का एक नया तमाशा। अगर उनको और क्या तमाशा यही है अभी यहां है और इसी समय कहीं और है जब दोनों अरे बड़े तो सिद्ध पुरुष है अभी तो यहां हमारे सामने तो बोले ठीक इसी समय हमारे पास भी थे बोले बड़े सिद्ध पुरुष है ये क्या है कोई खास बात थोड़ी है अष्ट सिद्धिया सिद्धस इंद्र जाल ये इंद्र जाल माया जादू का तमाशा यह है प्रेम की प्राप्ति के लिए जो हमें विकलता चाहिए वह यहां कहीं नहीं टिकना। प्राय संस्वाद वृंदावन रसिक रसम माध्यते मे हृदम जिनको वृंदावन प्रेम रस की प्राप्ति की चाह है वो इतने में किसी में भी ना टिके किसी को भी स्वीकार ना करें।

नहीं प्रेम रस नहीं मिलेगा। इसीलिए आप देखें हमारे वृंदावन ब्रज धाम या कहीं भी जो भगवत प्रेमी सिद्ध महापुरुष है आपको कोई जादू तमाशा कोई ऐसी बात नहीं मिलेगी सीधे सरल स्वभाव नमन कुटिलाई तो यहां की सिद्धि क्या है यहां के सिद्धों को क्या प्राप्त होता है रुद सुरम राजन कृष्ण दर्शन लालसा पर रोना यहां की सिद्धि है जिस पर तुम हो रीझते क्या देते यदि वीर रोना सिसकना तड़पना आहों की जागीर ये ये यहां के सिद्धों की परिपाटी है। एकांत में बैठे हुए चिल्ला चिल्ला के रो रहे हैं प्रभु से हा कृष्ण हा कमल लोचन हा प्रियाजु हा स्वामिनी ये यहां की सिद्धि है।

तो ये किसको मिलती है? बोले जो मोक्ष को कड़वा मान के जो समस्त इंद्रियों के भोगों को नरक मान के जो समस्त भोगों को महा विष जान के क्योंकि ये जलाने वाले हैं और समस्त देवताओं को भी कीड़े से भी ज्यादा भाव ना रखना कीड़ा अपना प्रारब्ध भोग रहा है। वो अपना प्रारब्ध भोग और इंद्रियां तो जादू का तमाशा है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी लिखा है रिद्धि सिद्धि पेरे बहु भाई बुद्धि लोभ दिखावे आई होए बुद्धि जो परम सयानी तंत चित ना जानी ये हमारा अमंगल कर देंग भगवत प्राप्ति नहीं होने देगी इसलिए भगवत प्रेमी महात्मा कभी किसी सिद्धि को स्वीकार नहीं करता इसीलिए बहुत सरल होते अब फिर उनमें कोई चमत्कार नहीं दिखाई देता क्या चमत्कार बाहरी क्योंकि वो इंद्र जाल स्वीकार नहीं किए।

उनका चमत्कार होता है उनके समीप एक बार जो आ गया और उन पर भाव कर लिया तो उसका जीवन परिवर्तित हो गया। वो भक्त बन गया। भगवान का नाम जापक बन गया। अच्छे आचरण वाला बन गया। मनुष्य जीवन का उसको लाभ मिल गया। यह चमत्कार होता है। तो श्रीपाद कह रहे हैं श्री वृंदावन का जो महा रसास्वादन मतवाला कर देने वाला मोक्ष सुख को भी थुतकीकृत करने वाला प्रेम है उसकी प्राप्ति के लिए यदि आप चल रहे हो तो स्त्री मात्र मात्र बुद्धि बहुत ध्यान से सुनिए गृहस्थ है तो जिनके साथ पाण ग्रहण संस्कार किया है उनके अलावा आपका किसी के प्रति भी काम भाव वाली वृत्ति का संबंध नहीं होना चाहिए।

यानी बड़ी दुर्गति होती है। चाहे वो स्त्री शरीर हो, चाहे पुरुष शरीर हो, यदि अपनी मर्यादा से अलग ये देखो धर्म शास्त्र हैं। इनका एक कानून है। भारतीय संविधान के अनुसार आपने यदि कानून विरुद्ध आचरण किया और नहीं पकड़े गए तो आप अपने को बहुत प्रवीण मानते हैं कि मैं बच गया। देखो लेकिन तुम भारतीय संविधान के प्रगट में दंड ना मिलने पर ऐसा ना समझ लेना कि दंड मुक्त हो गए। एक है भागवतिक संविधान जिसमें किसी की गवाही, किसी की साक्षी की या किसी की रिपोर्ट की जरूरत नहीं।

तुम्हारा कर्म ही तुम्हें दंड दे देगा। जो तुमने कर्म किया है इसलिए जो पति वंचक पर पति रति कर रो नरक कल्प सत पर जो स्त्री अपने पति की वंचना करके दूसरे पुरुषों के साथ सहवास करती है बहुत समय तक वो रोरो नर्क को प्राप्त होती है। ऐसी जो पुरुष पानी ग्रहण करके अपनी पत्नी को धोखा देकर दूसरी स्त्री के साथ सहवास करता है। ऐसी उसकी दुर्गति होती है। और जो भगवत मार्ग में चलने वाले उपासक हैं चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त समस्त संसार की जितनी भी स्त्री शरीर धारी हैं उन सबके प्रति पूज्य बुद्धि भगवत बुद्धि दैवी बुद्धि मातृ बुद्धि ऐसा कहा गया है।

जिनसे पानी ग्रहण किया उनकी बात अलग गृहस्थ में प्रकाश सबके प्रति भगवत बुद्धि सबके प्रति ऐसे विरक्त भाव में गोस्वामी जी इसी की टीका करते हैं। स्त्री मात मात्र बुद्धि के लिए जननी सम जानह पर नारी धन पराए बिते विष भारी जिनह राम तुम प्राण पियारे तिनके मन शुभ सदन तुम्हारे जो आपको प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं उनका मन आपका निरंतर निवास स्थान है। हे रघुनाथ जी वाल्मीकि जी के जो सदैव माताओं बहनों की तरफ दृष्टि केवल पूज्य बुद्धि से जाती है। ये जननी है। हम इन्हीं से पैदा हुए हैं।

इन्हीं माताओं के गर्भ में बड़े-बड़े महात्मा बड़े-बड़े राष्ट्रभक्त प्रकट हुए। यह दैवी शक्ति है। इनका जो अपमान करता है, निरादर करता है, नष्ट हो जाता है। बड़े-बड़े अपराध रावण ने किए लेकिन नष्ट नहीं हुआ। लेकिन जब दैवी शक्ति का अपमान किया तो भस्म हो गई सोने की लंका और रहा न कोकुल रोवन हारा। बड़ी उददंडता करता था दुर्योधन। लेकिन बड़े-बड़े महात्माओं की कृपा बनी रही उसके ऊपर। पर जो उसने देवी का अपमान किया, सभा में निर्वस्त्र करने का आदेश, उसी समय सारे सुकृत नष्ट हो गए और हर महात्मा की कृपा हट गई और नष्ट पूरा कुल का कुल नष्ट हो गया।

जिनके घरों में माताओं बहनों को सताया जाता है, कष्ट दिया जाता है, वह कभी श्री संपन्न घर नहीं हो सकते। और जो माताएं बहने धर्म भ्रष्ट आचरण करती हैं, वह कभी सुखी नहीं रह सकती। दुर्गति को प्राप्त होंगे। यह धर्म है। यह हमारा देश धर्म प्रधान देश है। बहुत महिमा इस भारत देश की गाई गई है। क्योंकि इसमें धर्म प्रधान क्षेत्र अलग-अलग भगवान ने क्षेत्र जैसे स्वर्ग है वो भोग भूमि है। नर्क है वो पाप भोग भूमि है। मृत्यु लोक है। मृत्यु लोक में भारत भूमि भगवत प्राप्ति का परम धर्म स्थान है।

जैसे गंगा यमुना सरस्वती का समागम तीर्थराज प्रयाग एक स्थान है अपना उसका महत्व है। ऐसे पूरे विश्व में भारत का महत्व है। यहां भगवत प्राप्ति रूपी महान धर्म की स्थापना भगवान ने की है। ये वो भूमि है। इस भूमि में वास करने वाले के ऊपर भागवतिक शासन है। धर्म शास्त्र का आप यहां परस्पर व्यभचार नहीं कर सकते। जो हमारे शास्त्र मर्यादा है उसके विरुद्धचरण नहीं। स्त्री मात्र मात्र बुद्धि आदेश कर रहे हैं। संपूर्ण स्त्रियों में मातृद्धि देखो गांव में हमने देखा है छोटी-छोटी जो बालिकाएं 10 घर से तो सब उनके चरण छूने की भावना घर के जन्म अरे तू तो कन्या है देवी है जैसे वो पिता के चरण छूने के लिए चले ला इधर पैर ला हम गांव की बात करें ऐसे चले तू तो दुर्गा है कन्या है देवी है ऐसी भावना है नवरात्रि में पवाया जाता है ना आराधना करके तो उनके प्रति वही बुद्धि रखो जो नवरात्रि में बुद्धि रखते हो कि ये तो सब नवीन अवस्था की बच्चियां दुर्गा स्वरूप है देवी स्वरूप है तो वैसे स्त्री मात्र मात्र बुद्धि ये सब जगदंबा है हमारी श्री जी की निज सखियां है इनके चरणों में वंदना करें तो प्रिया जी से प्रेम हो जाएगा और इनके प्रति दोष भाव करे तो नरक की प्राप्ति होगी।

ऐसे स्त्री शरीर को चाहिए पुरुष शरीर के प्रति भगवत भाव रखना। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है मध्यम परपति देख कैसे भ्राता पिता पुत्र निज जैसे अपने बराबर का देखा तो जैसे हमारा भाई हो तो कैसा हमारा भाव रहेगा? छोटा देखा तो पुत्र हो तो कैसा भाव रहेगा? और पिता के समान जो वयोवृद्ध बड़े हैं उनके प्रति पूज्य भाव रहता है। तो माता बहने कैसे पुरुष को देखती हैं? भ्राता पिता पुत्र निज जैसे और पुरुष कैसे देखते हैं? बोले जननी समझाने पर नारी जो बड़ी माता बहने और साक्षात मां है जो छोटी और साक्षात दुर्गा है नवीन कन्या रूप उनके चरण स्पर्श करें।

जहां पानी ग्रहण वहां अर्धांगिनी भाव स्त्री मात्रे मात्र बुद्धि समस्त चराचर जगत की ये प्रेम प्राप्ति के लिए आदेश दे रहे श्रीपाद स्थिर चर निखिल प्राणी प्राणी उपास बुद्धि चाहे जड़ हो चाहे चैतन्य हो उसमें गौर से देखो राधा वल्लभ लाल जी की भावना करते हुए तो राधा वल्लभ लाल जी दिखा देंगे कह रहे स्थिर चर निखिल प्राण उपास बुद्धि ये क्रूर पापिन चम संभास दृश्य सर् परम स्वराध्य बुद्धिमम मेरे आराध्य देव चरचर में विराजमान है बाह सेष लाभेश कह रहे कि सांसारिक जितने भी लाभ है ये सब धोखे के हैं।

समझना है केवल समझना है कर्तव्य पालन करना है पर यह समझना है कि ये कोई लाभ नहीं है धोखे का लाभ है एक अरब रुपया बैंक में जमा है आपके पास बढ़िया मकान बना है पूरे जीवन भर मेहनत की खूब छल कपट जैसे भी बना सब व्यवस्था कर ली अब मरने का समय आ रहा है अब वो कब आएगा ये तो पता नहीं किसी का कभी भी आ सकता है जवानी में आ सकता है बुढ़ापे में आ सकता है बाल्यावस्था में यहां जो कह रहे हैं कि बाह शेषार्थ लाभि जितने भी सांसारिक लाभ है वह सब बेकार है बाह हैं कैसे बेकार है हमारे तो इतने बैंक में जमा है इतने मित्र हैं इतनी फैक्ट्री ये ये ये ठीक है फाइनल में आओ अब आपका शरीर छूटने वाला है अब अब आपके पास क्या जाएगा हुआ ना सब बेकार तो क्या करें ना कुछ करें नहीं अपने कर्तव्य का पालन करो धर्म पूर्वक धर्म पूर्वक किया हुआ कर्तव्य तुम्हारी रक्षा करेगा तुमसे पापाचरण नहीं होने पाएंगे तुम्हें बचा लेगा और नाम जप करोगे यह धन तुम्हारे साथ जाएगा हृदय मुखम ला कृद्धान बुद्धि कभी भी इन भोगों की हानि हो जाने पर मुख मिलान करके उदास

निराश मत हो क्योंकि ये कोई लाभ नहीं था जिसे तुम हानि मान रहे हो कि वो वो वस्तु नष्ट हो गई, धन नष्ट हो गया। हमें तो सबने छोड़ दिया। हमारा तो उपहास करते कुछ नहीं। ये लाभ ही नहीं था। यदि नाम जप कर रहे हो तो भगवान तुम्हारे हैं तो तुम्हें शोक कैसे आ सकता है? ना यहां मना कर रहे हैं। हृदय मुख मिलानी निकृद्ध निबुद्धि ऐ बुद्धिहीन किसी भी हानि में तू उदास मत हो। ये कोई हानि है। तो बोले हानि फिर किसे कहते हैं? बोले हानि हरिवंश के नाम अंतर परे अगर आप राधा राधा जप रहे हो कृष्ण कृष्ण जप रहे हो श्री हरिवंश श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश कोई भी हानि हो गई उदास होने की जरूरत नहीं है मेरे स्वामी ने एक सेकंड में पलक झपकते अनंत ब्रह्मांड रच दिए वो जब जैसा चाहेंगे कर देंगे जोई जोई प्यारो कर रहे सोई मोह भावे मुझे निराश या मुख मिलान करने की जरूरत नहीं देह स्त्री मित्र पुत्राद नहीं बहुत पवित्र बात कह रहे देह तुम्हारी और स्त्री और पुत्र और वित्त अर्थात धन पुत्र

स्त्री शरीर तुम्हारा नो ये नहीं है तुम्हारा नहीं कैसे नहीं है तो सब फाइनल में फाइनल में आओ ये शरीर जाएगा तुम्हारे साथ नहीं पत्नी नहीं पुत्र नहीं बैंक बैलेंस नहीं तो कह रहे देह स्त्री मित्र पुत्राद नहीं इसलिए ममधी मित्र बुद्धि अपनी बुद्धि को बचाओ इनसे ममता ना होने पावे इनमें भगवत भाव करो स्व शत्रुष पीड़ाया समतात कोई कितनी भी पीड़ा दे उससे दुश्मनी ना होने पावे क्यों क्योंकि मुझे भगवत प्राप्ति करनी है ना और भगवत प्राप्ति उसी को होती है विश्व में जिसका एक भी दुश्मन नहीं होता।

ध्यान दो यह जन्म बहुत दुर्लभ है। कितना एक एक बात को एकदम अलग-अलग करके बता रहे हैं। तुम्हारे पास धन है, स्त्री है, पुत्र है, मकान है, बड़े मित्र हैं। फाइनल में तुम्हारे पास कुछ नहीं है। राधा राधा नाम जप करो। है अब तुम्हारे पास है नाम जप है साधु संग हां ये तुम्हारे पास है वाणी गायन हां ये ठीक है दूसरों की परोपकार भरी सेवा हां है तुम्हारे पास संपत्ति ये ये जाएगी आपके साथ मम धी धी माने बुद्धि मम माने मेरा इनको कभी मेरे भाव से स्वीकार मत करो कि मेरी पत्नी मेरा पुत्र मेरा धन मेरा मकान तुम्हारा शरीर भी तुम्हारा नहीं है ये छूट जाएंगे यही तो क्या भाव करें इनसे भगवत भाव इनमें जो पावर है सब में भगवान बैठे हैं।

ऐसा भाव करोगे तो ये भाव तुम्हारा उद्धार कर देगा। संसार में फंसने नहीं देगा। और स्व शत्रु पीड़ायाम समता शत्रु भाव रखकर कोई हमसे कितनी भी हमें पीड़ा दे हमको उससे शत्रु भाव नहीं होने देना क्योंकि मुझे भगवत प्राप्ति करनी है। अगर एक से भी शत्रु भाव हो गया तो भगवत प्राप्ति में बाधा पड़ जाएगी। यह पक्की बात अगर कोई तुमसे दुश्मनी करता है यद्यपि बहुत कठिन है कि वह सामने से कटु वचन बोले हम हाथ जोड़ के निकले निकलना पड़ेगा क्योंकि तुम्हें महान पद में जाना है तो हाथ जोड़ना पड़ेगा तुम्हें देखो यहां भी किसी पद में अगर जाना होता है तो हाथ जोड़ने पड़ते हैं नहीं पड़ते गांव का प्रधान बनना है ना तो पूरे गांव के घरों में जाते हैं वैसे तो कभी राम कृष्ण हरि नहीं बोलते पर वैसे जब बोट का समय आता है तो भैया राम राम ऐसे हाथ जोड़ते हैं ना फिर और बड़े-बड़े

पद और ये तो परम पद है इसमें पूरे विश्व का वोट चाहिए हरिवंश नाम लीन जे अजात शत्रु ते सदा प्रपंच दंभ आदि दे तहा कछु न पेखे सेवक जी महाराज कह रहे हैं अगर भगवत प्राप्ति करनी है तो पूरे विश्व में कोई भी एक शत्रु नहीं शत्रु पैदा ही नहीं हुआ अजात शत्रु भक्त होता है उसका शत्रु ही नहीं तो क्या उसकी दुश्मनी या कोई उससे द्वेष नहीं करता कोई उसको गाली नहीं देता कोई अपमान नहीं करता नहीं होता है रोज होता है पर उनमें भगवत भाव किया जाता मेरे प्रभु क्यों वो तो ऐसी

बात कर रहा है ऐसी चेष्टा कर रहा है ऐसेसे नहीं 100 रूप में प्रभु आकर के सैकड़ों रूप में प्रणाम करके सम्मान बढ़ा रहे तो दो चार रूप में आकर उसका बैलेंस ठीक कर रहे बड़े कृपालु है अगर आपको गुस्सा आ गया तो आपने प्रणाम का भोग स्वीकार किया है तो फिर आपका परमार्थ रुक जाएगा। क्या बात है? कितना सुंदर भजन है। कितना इनका यश है। कितनी कीर्ति एक तो यह हुआ और दूसरा ये हुआ गाली गलौज अपमान ऐसी मुद्राएं जो क्रोध भरी जो द्वेष भरी तो ये ना जाए कि गाली गलौज करने लगे लड़ने लगे आपका परमार्थ रुक जाएगा।

वो चाहते ही हैं माया के पार्षद कि आप थोड़ा बोलिए आप थोड़ा लड़िए उनसे नहीं लड़ना क्या करना है और हाथ जोड़ के सर झुका के निकलना है कल कुछ प्रेमी जन आए हुए थे संत भीष्म तो उन्होंने कहा कि यदि हमारे गुरु को कोई निंदा करता है तो फिर हम उसके साथ क्या व्यवहार करें आप कहते सब में भगवत भाव करो क्या उसमें भी भगवत भाव करें तो देखो ईमानदारी से देखो तो क्या उसमें भगवान नहीं है क्या आप ना तो नहीं कर सकते ना जब सर्वम खलमिदम ब्रह्म जब वासुदेवा सर्वम तो उसमें भी तो है हमको क्या करना है पहले उसमें भगवत भाव करना अपने को सोचना है कि मेरी गुरु निष्ठा के यहां परीक्षा ली जा रही है।

मेरे गुरुदेव की अवहेलना और निंदात्मक वचन बोल के भगवान मेरी गुरु निष्ठा की परीक्षा ले रहे हैं। जैसे पार्वती जी के पास सप्त ऋषियों को भेजा था ऐसे मेरे पास इस निंदक को भेजा है। तो निंदक को प्रणाम किया और दूरी बना लिया और अंदर से प्रसन्न रहे कि हे गुरुदेव आपकी निष्ठा में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आप परीक्षा ले देख लो। वो गुरुदेव का भेजा हुआ परीक्षक है हमारा। वो गुरुदेव का निंदक नहीं है। जैसे सप्त ऋषियों को महादेव जी ने भेजा। पार्वती जी के पास। अरे मुंडों की माला धारण करते हैं।

चिता की भस्म लगाते हैं। इसके लिए तुम तपस्या कर रहे हो। ना उनके घर है ना द्वार है। बरगद के पेड़ के नीचे रहते हैं। अरे उदासीन रहते हैं। ऐसे दूल्हे की क्या जरूरत? दूल्हा दिलाए हम बैकुंठना। जहां बड़े-बड़े पार्षद भगवान की सेवा में लगे हुए लक्ष्मी जी चरण चाप रही। पार्वती जी को गुस्सा आया था क्या? नहीं। उन्होंने कहा कि आप बढ़िया उपदेश कर रहे हैं। माना कि महादेव अवगुण भवन माना आपकी बात विष्णु सकल गुण खान ये भी माना लेकिन जाकर मन जेन रमे ते सन हमने तो वरण कर लिया है भगवान शिव कोटि जनम लग हमारी बर शता रहो को क्या निष्ठा माता जी ने प्रकट की मैंने तो वरण आप जो कह रहे हो ठीक है ऐसे ही होना चाहिए गुरु निष्ठा कि आप जो कह रहे आपकी बुद्धि मेरे तो परम ब्रह्म है अंदर उससे बोलना नहीं अंदर मेरे तो परम बह्म परमात्मा है फिर हम ना उसकी बात सुनते हैं ना उसकी तरफ देखते हैं ना उससे द्वेष करते हैं स्वा शत्रु पीड़ाया समतात सुखमति रमितंद वृंदावनस्तु मैं सर्वदा सुख मगन रहूंगा किसी से द्वेष नहीं करूंगा किसी से अपनापन नहीं करूंगा और वृंदावन का आश्रय लेकर प्रिया प्रीतम के प्रेम में मगन रहूंगा।

जिसे प्रेम प्राप्ति करनी है जो श्रीपाद प्रबोधनांद जी कह रहे हैं एक बहुत बड़े महापुरुष कह रहे हैं। कह रहे हैं कि नंबर एक ये बात सहने के लिए निरंतर नाम जप चाहिए। जो अभी तक आपने सुना कि मोक्ष कड़वा लगने लगे। समस्त इंद्रियों भोग नरक के समान लगने लगे। समस्त भोगों में विष दिखाई देने लगे कि ये तो पूरे तीनों शरीरों को नष्ट करने वाला है। गंदा करने वाला है। और हृदय से हमारे इंद्रियों का जो विलास है ये तो नरक तुल्य है। लेकिन सिद्धियां भी ये माया का जाल है। नहीं चाहिए मुझे कोई सिद्धि।

मुझे भगवत प्रेम चाहिए। भगवत प्रेम प्राप्त करने के लिए समस्त संसार की स्त्री शरीरों में जगदंबा बुद्धि होना अनिवार्य है। और समस्त स्थिर और चेतन जड़ चेतन में भगवत बुद्धि होना अनिवार्य है। अपना शरीर, अपनी पत्नी, अपना पुत्र, अपना धन, अपना मकान यह अपना नहीं है। अंतिम में छूट जाएगा। यह वैराग्य बुद्धि होना अनिवार्य है। फिर भगवत भाव का प्रादुर्भाव तभी होता है जब पूरे संसार में किसी से भी हमारी दुश्मनी ना हो। अब यह सब कैसे होगा? तो बोले नंबर एक निरंतर जो नाम जप करता हुआ मालिक से प्रार्थना करता रहता है मालिक कौन अपने इष्ट से कि हे प्रभु मुझे ऐसी सामर्थ्य दो कि कोई भी विषय मुझे परास्त ना कर पावे और पूरे संसार में मेरा किसी से भी द्वेष ना हो अद्वष्टा भूत नाम गीता जी भी कह रही अद्वष्टा सर्वभूत नाम किसी भी भूत प्राणी के प्रति हमारा द्वेष दोष भाव ना हो पहला पहला निरंतर नाम जप और प्रभु से प्रार्थना।

इसमें लिखा है मालिक से प्रार्थना। अपने स्वामी श्री हरि से इष्ट से प्रार्थना कि मुझे ऐसी साम प्रार्थना में बहुत सामर्थ है। अरे बहुत सावधानी की जरूरत है। किसी के प्रति जरा सा भी दोष चिंतन जो भजन जिनका एक तार चलता है। बड़ी बाधा खड़ी हो जाती है। श्री रूप गोस्वामी जी लीला चिंतन कर रहे हैं। उसमें दिखाई दिया कि प्रियाजू पुष्प चयन कर रहे यह पुष्प तो लालजू गोदी में उठा लिए प्रियाजू ऐसे पुष्प का गुच्छा ले रहे एक हाथ से डाल पकड़े हुए लालजू ने देखा कि सुरक्षित डाल पकड़े प्रियाजू नजदीक की छोटी कुंज में तो छोड़ दिया तो प्रियाजू ऐसे और लालजू आनंदित हो रहे हैं तो पूज्य श्री रूप गोस्वामी को भी हंसी आ गई कि लालजू को ऐसा विनोद सूजा इस समय अत्यंत सुकुमार और प्रिया जो डरप रही है।

फिर लाल जी ने अपनी गोद में ले लिया। फिर उनका शमन हुआ। जिस समय हंस रहे थे उस समय एक संत जा रहे थे जो लंगड़ा के चलते थे। ऐसे ऐसे अब वो ऐसे अर्ध निलित नेत्रों में ऐसे हंस रहे थे। ऐसे उनको दृष्टि गई कि अरे भगवान ने मुझे लंगड़ा बनाया है तो हंस रहे हैं। हम तो समझ रहे थे बहुत बड़े महापुरुष हैं और ये हमारी हंसी कर रहे हैं। ऐसा कैसे हो सकता है? हां ना हमारा प्रारब्ध भोग है ना हमारा पैर ऐसा है इसलिए हंसी का पात्र मैं बड़े अंदर से दुखी हो गए चले गए लीला बंद हो गई उनकी अब आप बताओ उन्होंने सोचा नहीं देखा नहीं वो तो प्रिया प्रीतम को देख रहे थे बड़े विकल हुए जब लीला बंद हो गई तो फिर पूज्य श्री सनातन गोस्वामी से चर्चा की क्योंकि दोनों महापुरुष की हमारी लीला बंद बंद हो गई उनका एक ही उपाय वैष्णव अपराध बन गया वो वैष्णव अपराध किसी वैष्णव को अभद्र बोले या दुख पहुंचाए ऐसा संभव ही नहीं महाप्रभु चैतन्य देव की कृपा से ऐसा संभव ही नहीं है कैसे उनका है तो वैष्णव अपराध अब ये विचार हुआ कि कैसे जाना जाए कि किससे अपराध बना कैसे जाना जाए जब किया ही नहीं प्रकट में तो जाना कैसे जाए बोले कोई वैष्णव दुखी हो गया है तो वैष्णव सेवा की जाए।

आसपास के जितने संत सबको निमंत्रण दिया जाए। पता चल जाएगा। सबकी जूठन पाई जाएगी तो शायद पुनः अपराध कोई हुआ हो जाने अनजाने में तो उसका मार्जन हो जाएगा। ऐसा हुआ। आसपास के सब संतों को निमंत्रण दिया गया। वैष्णव जे ही उनके पास निमंत्रण गया तो नाराज होकर बोले पहले तो उपहास करके हंसी उड़ाते हैं फिर निमंत्रण देते हैं हमें नहीं जाना तुरंत सूचना आई कि वो नाराज है अरे तुरंत गए पूज्य श्री रूप गोस्वामी जी और कहा प्रभु कब हमने आपका उपहास किया तो कहा प्रभु प्रभु आप कर रहे हो उस दिन हम जा रहे थे और जैसे हमारा भगवान ने पैर ऐसा कर दिया है तो झटका मार के चलते तो आप हंस रहे थे तो कहा मुझे तो याद ही नहीं कि आप कब निकले और हम कब हंसे तो उन्होंने समय बताया कि अमुक दिन उस समय अच्छा अच्छा तो उनका प्रभु ऐसे बतानी नहीं चाहिए पर आप नाराज हैं इसलिए बता रहा हूं प्रभु उस समय में लीला देख रहे थे प्रिया जो पुष्प चयन करने ले तो लाल जी गोद में उठा के वो पूरी घटना बताई और कहा अगर ऐसा भाव में हम हंस रहे तो आप उसी समय निकल रहे होंगे।

आपको ऐसा लगा तो प्रभु आपके लिए नहीं था। आप क्षमा कीजिए। वो तो प्रिया तो चरणों में गिरे जो दूसरे वैष्णव थे और कहा अरे आप जैसे महापुरुषों के प्रति हमारा दोष भाव बन गया। क्षमा करो। वो राज तत्काल लीला प्रारंभ हो गई। तत्काल अब आप विचार करो जब दोष नहीं है और वैष्णव दुखी हो गए तो लीला रुक गई फिर अगर की केवल स्वीकृति की हां ये गलत है वो गलत कर रहे तो भी हां गलत है नहीं और भगवान की लीला भगवान जाने नहीं आप बताओ कि ये गलत है कि सही नहीं तो हम कोई जज है क्या जिनके सहारे हम चल रहे उनके सहारे वो चल रहे उनसे पूछो जाके चले जाओ राधा राधा राधा कभी किसी का फाइनल करने के नहीं दस शास्त्र तो तुम्हारा यह बहुत सूक्ष्म विषय में इसलिए वर्णन किया बहुत सूक्ष्म विषय है।

बहुत सावधान नाम जापक भगवत प्रेम प्राप्ति के लिए इतनी सामर्थ जो अभी पीछे चर्चा हुई उसके लिए निरंतर नाम जपो प्रभु से प्रार्थना कि किसी भी के प्रति हमारा तनिक भी दोष भाव ना बनने पावे। प्रभु से प्रार्थना वही सबके हृदय में बैठे हैं। वही आपको ऐसे सामर्थ्य देंगे क्योंकि सृष्टि में आपके प्रति प्रतिकूल व्यवहार होगा। आपका उपहास करेंगे। आप नाना प्रकार के कटु वचन बोलेंगे। आपको सह जाना है उनके प्रति कटु वचन नहीं करना। दोष भाव नहीं करना। नहीं अपनी भगवत प्राप्ति में बाधा आ जाएगी।

यह सूक्ष्म विषय सब कोई नहीं समझ पाएगा। लेकिन उपासक जो भगवत प्राप्ति करना चाहते हैं, अपना भजन बचाना चाहते हैं, वो इस बात को अच्छे से पकड़े। दूसरा जो दिनचर्या दी गई है उसमें आलस्य ना होना भगवत प्रेम प्राप्ति या ऊंचाई पर चढ़ने के लिए जो दिनचर्या है हमको यह नहीं देखना है कि अमुक साधक आता है कि नहीं आता है अमुक नहीं आता तो हम भी नहीं आते हैं ऐसा नहीं अमुक की त्रुटि है उसका सुधार वो करना चाहे तो कर सकता है लेकिन आप सुधरे हुए हो तो आपको अच्छे आचरणों का अनुकरण करना है।

आपको ऐसे आचरण नहीं करने हैं जिनसे हमारी दिनचर्या बाधित हो जाए। एक चीज और ध्यान रखना है। इसको बहुत विस्तृत रूप से समझा इसलिए रहे कि एक दिनचर्या है जिसके पास सेवा नहीं गुरु सेवा। और एक दिनचर्या है जो गुरुजनों की सेवा में रहते हैं उनसे हो सकता है जो भागवत दिनचर्या का आदेश दिया गया है वह ना हो तो उनको असंतुष्ट नहीं होना क्योंकि वो गुरु सेवा में है सारी दिनचर्या का फल जो है वो गुरु प्रसन्नता है तो अगर वो गुरु सेवा में जैसे हमारे श्री जी की भोग सेवा में है।

अब प्रातः बाल भोग से लेकर के शयन तक कितने भोग श्री जी को लगते हैं। अब उनमें उनको हो कि हमारी दिनचर्या तो नहीं। अब जैसे जो और हैं सेवा में है बहुत से कोई किसी सेवा में कोई किसी सेवा में अब उनकी दिनचर्या में माला ले नहीं बैठेंगे। थोड़ी थोड़ी देर में जो दिनचर्याएं हैं जो सेवाएं हैं तो उनको इस बात का पश्चाताप नहीं करना कि मेरी दिनचर्या नहीं चल रही। वह तुम्हारी दिनचर्या गुरु प्रसन्नता के अंतर्गत है। उसमें नहीं सोच और यह नहीं सोचना कि अब हम सेवा कर रहे हैं तो हमारा वो भजन तो हो नहीं रहा जो दूसरी माला से कर रहे हैं तो पता नहीं मेरी गति क्या होगी।

ये नहीं सोच गुरु सेवा का एक प्रताप है। ये भी ध्यान रखना। जैसे मान लो कोई शरीर के वस्त्र धो रहा है, कोई ऐसी सेवाएं कर रहा है। वह नाना प्रकार की सेवाएं हैं। जिनमें उनको समय नहीं मिल रहा कि वो बैठकर के पद गायन करे। वो 11 माला 41 माला वो संख्या पूरी करे। अच्छा सेवाओं में लगा है तो उसका मन लगा है। अब उसका मन कहां लगा है? यह वस्त्र गुरु जी का है। यह गुरु जी के लिए जल है। यह उसका चिंतन हो रहा। ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्य मोक्ष मूलम गुरु कृपा क्योंकि कई साधक ऐसे हैं जो फिर उनको पश्चाताप होगा कि दिनचर्या में बाधा पड़ रही हमारी तो दिनचर्या की चर्चा हुई थी।

नहीं जिनको सेवा मिली हुई है एक बार भगवान शंकराचार्य जी से कई शिष्यों ने कहा कि एक ये ब्रह्म सूत्र है इसकी व्याख्या सुनना चाहते हैं तो उनकी शरीर सेवा में स्नान के बाद जो वस्त्र लंगूठी आदि प्रक्षालन करना है वो त्रटकाचार्य जी रहते थे तो उन्होंने कहा त्रोटक को आ जाने दीजिए तो उन्होंने कहा प्रभु वो तो कभी व्याकरण नहीं पढ़े कभी शास्त्र जब गायन स्वाध्याय होता है तो कभी बैठते नहीं तो शरीर सेवा में ही लगे रहते मतलब ज्ञान की चर्चा थी ना तो शरीर को गुरु के शरीर को वो साधारण शरीर समझ रहे थे उनका अच्छा ऐसी बात है आ जाने दो उसको जब आ गए तो बोले खड़े हो इस ब्रह्म सूत्र की व्याख्या करके बताओ तो जो पढ़ने लिखने से नहीं आता गुरु कृपा से आता है तत्काल संस्कृत का प्रादुर्भाव हुआ और वैदिक सिद्धांतों का प्रवचन सब दंग रह गए तो उनका गुरु की लंगोटी ढोने वाले को साधारण समझते हो क्या साधारण नहीं होता गुरु की लंगोटी धोने वाला वस्त्र धोने वाला असाधारण कृपा से सौभाग्य मिलता है असाधारण कृपा से तो जिनकी जो दिनचर्या ऐसी

है कि उनको फुर्सत ही नहीं है तो उनको कभी नहीं सोचना कि इतने बजे इतने बजे इतने उनकी दिनचर्या है तो ये चीजें ध्यान रखना है उपासक को प्रमाद में हमें दिनचर्या में बाधा नहीं पहुंचाने प्रमाद युक्त हमारी दिनचर्या नहीं होनी चाहिए यदि गुरु सेवा इष्ट सेवा में हमारी जो गुरु की अन्य साधकों के प्रति बताई हुई दिनचर्या उसमें बाधा पड़ती है तो वो बाधा नहीं मानी जाएगी आपकी दूसरा जो अभी वर्णन किया गुरु प्रदत्त दिनचर्या में बाधा नहीं होनी चाहिए बहुत बड़ी चीज है गुरु

प्रदत्त दिनचर्या बहुत बड़ी वस्तु है बहुत बड़ी वस्तु गुरु सेवा मिल गई तो लाडली जो अधीन हो गई पक्का तीसरा कुसंग से दूर रहना यह बहुत जरूरी है। बहुत जरूरी है। रावण लंका में रहता था। लंका समुद्र के किनारे थी। समुद्र निर्दोष था। पर ऐसे दोषी का संग समीपता होने के कारण समुद्र को बांध लिया गया। समुद्र बांधा गया। जिसकी मर्यादा अपार है, उसे मर्यादा पुरुषोत्तम ने बांध दिया। किस लिए बांधा गया था? क्योंकि रावण का पड़ोसी था। रावण का पड़ोसी होने के कारण समुद्र को बांध दिया गया।

जो रहीम उत्तम प्रकति का कर सकत कुशंग चंदन विष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग। अच्छा जब कोई गलत करता है तो वह चार से थोड़ी कहता है कि मैं गलत करता हूं। नहीं वो सही और कुबुद्धि को वही सही दिखाई देता है। गलत सही दिखाई देता है और वो परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है। इसलिए कुसंग से बहुत दूर रहना चाहिए। सत्संग और कुसंग का कैसे पहचान करोगे कि हमारा कुसंग हो रहा है। हमारा सत्संग हो रहा है या कुसंग हो रहा है? कैसे पहचान करोगे? तो संतों ने कहा है जाके संग कुमति मति उपजय करत भजन में भंग जिससे देह भाव पुष्ट होने लगे भगवत भाव नष्ट होने लगे वैराग्य भाव नष्ट होने लगे राग पुष्ट होने लगे भजन छूटने लगे संसार अच्छा लगने लगे नाम छूटने लगे और धन अच्छा लगने लगे गुरु से अश्रद्धा हो जाए भक्ति से अश्रद्धा हो जाए ये कुसंग का फल होता है अच्छा कुसंग का फल जब आपके ऊपर चढ़ेगा तो आपको नहीं लगेगा मैं कुसंग कर रहा हूं।

नहीं तो ठीक हो जाओगे। सामने से महापुरुषों को लगेगा कुसंग कर रहा है। और वो जब कहते हैं तो उनको चिड़चिड़ा होती है। मैं कहां कुसंग कर रहा हूं। नहीं नहीं क्योंकि कुमति कभी स्वीकार नहीं करती कि मैं कुमति हूं। अगर स्वीकार कर ले तो सुमति आ जाए। कुसंग से बचना चाहिए। पहला है निरंतर नाम जप करते हुए भगवान से प्रार्थना करना कि कभी किसी के प्रति हमारा दोष दर्शन ना हो। शत्रुता का भावना हो। दूसरा गुरु प्रदत्त दिनचर्या का पालन करना। आलस्य बिल्कुल ना आने देना। तीसरा कुसंग से बचना।

और चौथा उन ग्रंथों से उन प्रवचनों से उन किस्से कहानियों से उन चित्रों से बचना चाहिए जिनसे हमारा भगवत भाव नष्ट होता है। जैसे कल एक प्रसंग में प्रश्नकर्ता कह रहे थे कि हमको उपदेश मिला है कहीं से बस स्वासों के आने जाने पर ध्यान दो। बस इसी से परम पद मिल जाए यार स्वासे तो वैसे चल रही है आने जाने के ध्यान का मतलब क्या रहा स्वासों के आने जाने का ध्यान दो कि खाली तो नहीं जा रहे हैं हर में राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा राधा राधा जैसे कल आपसे कहा था नाम रूप लीला धाम से हटा दे वो कुसंग होता है वो बेचारा पर हम कहा थोड़ी श्रद्धा है हमारे प्रति बोले श्रद्ध तो लाई है आपके पास तो हम कहा आज से राधा राधा नाम जप कर और प्रभु का जो रूप ध्यान में तुम्हारे प्रिय लगे राम रूप कृष्ण रूप हरि रूप जो भी तुरंत ध्यान कर उनके ध्यान में लग ये बिहारी जो राधा रमण जो राधा वल्लभ जो साक्षात भगवत प्राप्ति के लिए ही तो विग्रह रूप धारण करके प्रकाशित हो रहे कभी-कभी जिसे हम सत्संग समझते हैं वो कुसंग बन जाता है।

इसको ध्यान से सुनना। इसीलिए रोज सत्संग में घुमा के आ जाती है बात कि इष्ट मिले और मन मिले मिले भजन रस रीति अरे भगवान शिव नाम जप करते हैं सनकादि नाम जप करते हैं वो परमात्मा निराकार है साकार है सगुण है निर्विशेष पूरा का पूरा आपको समझ में आ जाएगा फिर उनको समझाया कि गुरुदेव साकार है कि निराकार जो उपदेश किए थे बोले साकार प्रणाम करते हो हां माला पहनाते हो हां तो गुरुदेव की पूजा हुई कि नहीं बोले हां हुई तो गुरुदेव मूर्त है कि अमूर्त बोले मूर्त तुमका मूर्ति पूजा हुई कि नहीं

बोले हां हुई तुमको फिर काहे परेशान हो समझ में नहीं आता है अरे भाई बहुत संभल के बहुत संभल के शास्त्रों में जो लिखा उसको समझने के लिए बहुत पवित्र बुद्धि चाहिए परमात्मा निराकार भी है कैसे निराकार है देखो आकार कार खंबे का इसमें है कि नहीं और जब भावना किया प्रह्लाद जी ने कि है तो निकल पड़ा ना नरसिंह रूप में तो है ना साकार वो निराकार रूप से सब जगह हो पुकारो तो साकार रूप होकर अभी दिखाई दे वो साकार भी है और निराकार भी है यहां जल है इस वायुमंडल में जल है देखो बोला कहां गीला हुआ और एक मशीन है जे उसको ऑन करके रखो तो एक कमरे में तीन लीटर चार लीटर लीटर पानी चार पांच घंटे में निकल जाता है और कमरे में कहीं बूंद नहीं है।

वाष्प मतलब जल है वाणी है। वाणी का मतलब आकाश शब्द है। वायु है। अग्नि तत्व है। इन सब कुछ विराजमान है। लेकिन निराकार दिखाई दे रहा है ना। कहां दिखाई दे रहा? सब साकार रूप में आ जाता है। वही साकार है। वही निराकार। कुछ अंतर नहीं। सबके हृदय में आकार ये देखो बाहर वो अंदर बैठा हुआ है निराकार और पुकारो तो आकार रूप के ले आ जाएगा राम मर्यादा पुरुषोत्तम कमल न रूप धर के वही आ जाए वही रूप है वही अरूप है कोई अंतर कोई अंतर नहीं सब ज्ञान हो जाता है नाम जप से सब ज्ञान पर बचो ऐसे उपदेश से जिससे भजन ही ना हो पावे ऐसी ग्रंथ है ऐसे जैसे जैसे भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी ने गीता जो लिखी है आप भगवान की वाणी को अपने भावना के अनुसार समझ लिए लेकिन संपूर्णतया तो भगवान ही समझावे तो समझ पाओगे ना सोई जाने जे देव जनाई निंदा स्थिति के विषय नहीं है पर यह बात है कि पूज्य श्री स्वामी राम सुखदास जी महाराज इतनी सरल भाषा में गीत गीता जी का स्वरूप प्रकाशित किया कि मुझे लगता है कि अपने जैसे मंद बुद्धि वालों को भी भगवान की दिव्य वाणी समझ में आए।

स्वामी जी का अवतार इसी बात के लिए हुआ था गीता जी के लिए श्री स्वामी राम सुखदास जी कि साधारण से साधारण आदमी गीता के गढ़ शब्द को राष्ट्र को जान जाए। इतना बड़ा विस्तार से अमृत दे दिया गीता जी के भाव का और ज्ञानदेव जी महाराज, एकनाथ जी महाराज, आदि गुरु भगवान शंकराचार्य जो बहुत से बड़े-बड़े महापुरुषों ने गीता जी की थी। हमें लगता है इन महापुरुषों की टीका के बाद अब हमको और कौन सा ज्ञान जानना बाकी रहेगा? एक बार एक सेवक वाणी श्री दामोदर दास सेवक जी की नए-नए हम थे तो हमको किसी ने दिया था कि पढ़ना महाराज जी को हमारा ये काम था गुरु जी से जांच करवाए बिना हम किसी क्योंकि पता है कि जिस विषय के हमें तो हमारे प्रमाण लग तो कहा महाराज जी ये वाणी जी प्राप्त हुई वो किसी और महाराज जी ने ये देखो ऐसे वाणी ली किसी की भी लिखी हुई है ऐसे लाओ और तुरंत ऐसे फूल में लपेटा बोले जाओ यमुना जी पधरा के आओ और फिर ये बनी आजीवन के लिए वो बस्ता में बंधी लेकिन यही ये टीका जो लिखी हुई है ये पास गुरुदेव से इसीलिए हम जितने भी साधक अपने हमारे गुरुदेव ने जो पास किया है अर्थ ये पूज्य जी आचार्य चरण का बस कोई भी हो गुरु से जो पास बस वही तो यह ध्यान रखना कि महापुरुषों ने जो टीका की है वो ऐसे अर्थ नहीं लिखा है।

गुरुजनों की दृष्टि बहुत पहनी होती है। अपने बच्चे को कैसे बचाते हैं? ये उन ग्रंथों का अर्थ नहीं पढ़ना जिनको ब्रह्म प्राप्त भगवत प्रेम प्राप्त महापुरुष प्रमाणित नहीं करते उन ग्रंथों को नहीं पढ़ना बहुत ही भटकाव है आपको सच्ची बता दें वाणी जी को अपने अनुकूल करके अर्थ किया जाता है वो महापुरुष जो क्षमता को प्राप्त है चाहे गीता हो चाहे भागवत हो हमारा किसी से अपनेपन वाला बात की बात नहीं कह रहा हूं आज तक पूज्य श्री हनुमान प्रसाद पोदार जी महाराज के संपादन के किए हुए वाणी ग्रंथ में एक शब्द पर कभी कभी संशय नहीं हुआ।

आज तक पूज्यपाद उड़िया बाबा के उपदेश में कभी एक शब्द पर संशय नहीं हुआ। पूज्य श्री स्वामी राम सुखदास जी महाराज के एक शब्द पर संशय नहीं हुआ। जैसे पूज्य स्वामी जी का एक छोटी सी पत्रिका निकली थी ग्रंथ में गुरु के बिना मुक्ति। स्वामी जी ने जो कहा उसके अंतर की बात समझ लो। स्वामी जी के पास इतनी शिकायतें पहुंची। इतनी शिकायतें पहुंची रोना धोना और बड़ा विचित्र कोटिका उस समय जिनके प्रति शिकायत हुई थी तब स्वामी जी ने सभा में कहा था कि तुम जो सुन रहे हो ये जगतगुरु श्री कृष्ण की वाणी सुन रहे हो इसको मानो इसी से तुम्हें परम पद मिल जाएगा ऐसे बनाने की जरूरत नहीं है जहां ऐसी शिकायतें आ रही स्वामी जी किस लक्ष्य को ले बोले थे स्वामी जी किसी संप्रदायवाद को नहीं काटे स्वामी जी किसी गुरु परंपरा को नहीं काटे स्वामी जी के शब्द थे उस बनावटीपन के लिए जो बनावटीपन से ठग

किया जा रहा ठगा जा रहा है लोगों के जो चित्तों की श्रद्धाओं का मर्दन किया जा रहा था जब स्वामी जी के पास शिकायतें पहुंची तब स्वामी जी ने वो बात कही कि ये जगत गुरु की वाणी है गीता जी इसको सुनो स्वीकार करो जाओ परम कल्याण ना हो जाए तो बताना गुरु के बिना बिना मुक्ति गुरु बनाने की जरूरत नहीं वचन सुनो मानो और जाओ कोई एक शब्द में उसको घसीटो मत इधर उधर सीधे जिस प्रसंग से महापुरुष बोले उस बात को समझना तो हमको ऐसे ग्रंथ नहीं पढ़ने ऐसी किताबें ऐसे शास्त्रों की व्याख्या ऐसे किस्सा कहानियां ऐसे दृश्य ऐसे चित्र ये सब ना देखें जो भजन में बहुत बाधक है पांचवा किसी भी बहाने से जिसमें महिलाएं नृत्य करती हो वो दृश्य ना देखिए भले कीर्तन हो रहा है भजे भजन हो रहा है लेकिन जिसमें माताएं बहने नृत्य कर रही बैरागी को देखने की जरूरत नहीं है फिर और नौटंकी तमाशा और सीरियल और वेब सीरीज वेब सीरीज इनकी तो जरूरत नहीं है बिल्कुल नहीं कि खाली समय है हम बड़ा बड़ा मोबाइल है स्मार्ट चाहे जितने स्मार्ट बनो माया से ज्यादा

स्मार्ट नहीं हो ऐसी स्मार्ट गिरी में फंसा देगी तुम्हें ये सारी स्मार्ट गिरी चली जाएगी बहुत होश में चेटक नाटक नाच तमाशा ये सब परमार्थ के लिए बहुत हानिकारक है किसी बाहरी साधक से पूछा कि मोबाइल में आओ बोले बस गेम खेल लेते हैं अरे यार गेम खेलना है तो नाम का गेम खेलो मंत्र का गेम खेलो हां वाणी जी का पूरा गेम खेलो क्या शुरू करो उल्टा चतुरासी जी आज वह देख तो प्यारी रंग भरी छान दे माननी मान मन धर नागरता की आओ उल्टा गेम खेलो अभी देखो आंसू आने लगेंगे तो ये

गेम खेलोगे अगला सूत्र प्रेम प्राप्ति के अपनी निरख परख स्वयं करते हुए गुरुदेव से जांच करा ले अपनी अंतर की वृत्तियों को देख लो। जहां कुछ संशय लगे तो जांच करवा ले कि यह वृत्ति सही है या गलत। जैसे बाहरी लोग आकर कराते हैं। अब सब खड़े ना हो जाए वहां जाके कि एकांतिक व से रोने लगे। रोज सत्संग में यही तो जांच परख होती कि आप अपनी जांच कर लो। नहीं तो एक बार कहा कि अपनी दिनचर्या बना के आओ तो इतने कागज आ गए। हम कहा कब तक हम इनको देखेंगे? दिनचर्या जांच इंद्रियों का जब विषयों के प्रति आक्रमण होता है एक वेव होता है एक आकर्षण होता है एक ऐसा जिसे तुम रोक नहीं सकते उस समय तुम्हें जरूर संत संग में हो जाना चाहिए उस समय बुद्धि काम नहीं करेगी और जिस समय तुम्हारा केवल बुरा चिंतन बन रहा है ये उस समय की बात है कि आक्रमण हो चुका है अब तुम बच नहीं सकते अब इसको संत संघ उसे मिटाओ तुरंत तुम अकेले नहीं मिटा पाओगे और अगला जो है वो कह रहे जब तुम्हारा चिंतन गलत हो रहा तो नोच के फेंक दो मिटा दो उस चिंतन को जो गंदा हो रहा है नहीं तो आगे फिर वही दशा आ जाएगी एकांत में इंद्रियां और मन साधक के ऊपर शासन करते हैं।

उस समय साधक को अपने इंद्रिय और मन की रखवारी करना है बस। इसलिए एकांत में भजन बहुत जरूरी है। दवा जैसे परीक्षार्थी परीक्षा की तैयारी करता है। ऐसे परमार्थी द्वंदों की तैयारी कर ले। मान, अपमान, निंदा, स्तुति, लाभ, हानि, सुख, दुख यह आने वाले हैं। तुम्हें समान रहना है। तैयारी करो परीक्षा की। और यह परीक्षा जब होती है तब आप समझ नहीं पाते कि आपकी परीक्षा हो रही है और समझने नहीं दिया जाएगा परीक्षा हो रही है। कम से कम परीक्षा में तो बताया जाता है कि कल से पेपर शुरू है।

सावधान तैयारी कर लियो। अपने यहां पर बताई ही नहीं जाती। बाहर निकले से शुरू हो गई परीक्षा। अब तुम्हारे दिमाग में नहीं कि परीक्षा है तो तुम उससे लड़ पड़े। फेल हो गए। नंबर कट गए। बिल्कुल हर समय कभी भी कहीं भी परीक्षा हो रही। यह बहुत बड़े महापुरुष हैं। कह रहे हैं कि जैसे परीक्षार्थी को अपनी परीक्षा की तैयारी करनी होती है। ऐसे परमार्थी को अपनी परीक्षा की तैयारी करनी क्या? स्तुति, निंदा, मान, अपमान, लाभ, हानि, शत्रुता, मित्र ये द्वंद आएंगे। आपको उत्तर देना है इनका।

तभी आपकी द्वंदातीत अवस्था आएगी। तैयार रहो। रोने की जरूरत नहीं। उसने हमको ऐसा कह दिया, उसने ऐसा किया, उसने तैयार रहो। परीक्षा हो रही है। पर उस समय याद नहीं रहता कि परीक्षा हो गई और जिसको याद रहता है बच के निकल जाता है। बड़े-बड़े महापुरुषों को ये परीक्षा देनी पड़ती है। बड़े-बड़े महापुरुषों को ये मत समझो। हां ये द्वंद आएंगे आपको इनको परीक्षा देनी। परमार्थी हो। और 11वा इतना भजन कर लो कि तुम्हारे हृदय में मौत का डर खत्म हो जाए। मृत्यु का डर खत्म हो जाए।

दो प्रकार का डर होता है। एक विचार डर होता है और एक होता है सहज डर। सहज डर सबको होता है। सहज डर जैसे अपने लोग सत्संग में एकदम कोई चीख दे। एकदम ऐसे इसे सहज डर कहते हैं। ये बड़े-बड़े ज्ञानियों को जीवन मुक्तों को भी होता है। पक्का होता है। जैसे अभी कोई किक एकदम निकले तो एकदम ऐसे हो जाएंगे। अरे सुरक्षित हो कोई ऐसा पर यह सहज डर है और एक होता है विचार डर भक्तों में ज्ञानी महापुरुषों में विचार डर नहीं होता यही बात जो यहां लिखी है एक बार स्वामी मगनानंद सरस्वती जी सेनपुर में बट वृक्ष के नीचे कर रहे थे तो एक विरक्त महात्मा आए थे ज्ञानी कहा स्वामी जी सहज डर कैसे हो सकता है जब सहज स्वरूप में रहता है ज्ञानी देह भाव में रहता है नहीं तो सहज डर कैसे हो सकता है हम हम आपकी बात नहीं मानते।

विचार डर तो होता ही नहीं लेकिन सहज डर भी नहीं होता। कोई संसारी आदमी वो देह भाव से ऊपर उठे। महात्मा को चौकी लगाओ। वो बड़े सिद्ध पुरुष थे। बड़े देखो जो भगवत प्राप्त होते हैं बड़े मस्त रहते हैं। बड़े मौजे उनको किसी की परवाह नहीं होती। एक मस्ती ऊंची चौकी में बैठा। कहा अरे नहीं महाराज आप नीचे बैठे हैं। बोले आप इतना सुंदर ज्ञान की बात कह आपको चौकी ना मिले विराजो बैठ गए। अब उनको क्या पता कि सिद्ध महापुरुष लीला हो रही है। तो जो शुरू किए तो जो गीद है या जैसे चील है ये बड़े पक्षी होते हैं।

तो एक चील ऐसे बैठा बरगद की सूखी डाल पे वो खर खर खर ऐसे करती जो ऐसे आए वो ऐसे हुए चौकी के नीचे गिरे चौकी ऐसी हुई ऐसे गिरे अरे अरे भाई चौकी संभालो संभालो बैठो बैठो महाराज ये कौन सा डर था बम तो नहीं गिर रहा है ना अच्छा डार गिर रही तो कोई बहुत बड़ी तो गिर नहीं रहे हो आप देहातीत महापुरुष से डर कौन सा था हंस दिए उन्होंने कहा अच्छा अच्छा अच्छा अच्छा अच्छे तो कहा अच्छा अच्छा परीक्षा हो गई बोले इसे सहज डर कहते हैं। ये सबके ऊपर होता है। सहज डर सबको होता है।

पक्का सहज डर अचानक कोई आवाज सबको पता है। तो वो एकदम डर जाता है। वो डर डर नहीं है। वो सहज डर है। और एक है विचार डर। भक्त को विचार डर नहीं होता। तो कह रहे इतना भजन करो कि मृत्यु का डर खत्म हो जाए। खत्म हो गया। मृत्यु का डर। मरने से जो डरने का भय है वह खत्म हो जाए तब जानो कि अब हमारा थोड़ा भजन रंग लाया है। सबसे पहले मृत्यु का भय खत्म हो। देख लो परख लगाओ। मृत्यु का डर कैसे? अगर आज शाम तक डॉक्टर कहे कैंसर हो गया तो कैसा लगेगा? मृत्यु पर अगर विजय प्राप्त करनी है तो मृत्यु को याद रखना पड़ेगा।

यह बात ध्यान रखो। जिसने मृत्यु को याद किया वो भगवान से चित्त जोड़ा और जिसने भगवान से चित्त जोड़ा वो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लिया। मृत्यु ऐसी लग रही है। अब उसका उदाहरण तो कुछ है नहीं पर ऐसे बता रहे जैसे ब्याह की तैयारी होती है तो कैसा होता है? हर दोस्त से हाथ मिलाता है। हंसता हुआ फूला घूम रहा है। क्यों? क्योंकि उसका ब्याह होगा। लौकिक उदाहरण परमार्थ में फिट ही नहीं होता। पर वो कुछ फूलन जिसे कहते हैं, उत्साह जिसे कहते हैं वो ऐसा कुछ समझो जैसे मां के इकलौते बेटे का ब्याह तय हो गया और बारात की व्यवस्था बिल्कुल फिर तैयारी हो रही उससे देखो नई साड़ी पहने मार फूली फूली जो घूमती है नहीं घूमती।

इससे असंख्य गुना सुख सुपासक को होता है। जिसको मृत्यु का डर खत्म हो जाता है। भजन से यह ऐसा कि जैसे कि कब वह दिन आएगा जब श्रृंगार करके हम अपनी प्रियाजु के पास होंगे और इस शरीर का व्यवहार खत्म प्रियाजु के पास धन्य है वो घड़ी जिस दिन प्रियाजु की प्रगट समीपता सेवा की और प्रगट व्यवहार खत्म इसका ऐसा आनंद होता है जैसे उस मां को अपने बेटे के ब्याह में उस बेटे बेटे को अपनी पत्नी के मिलन की चाह में जो सुख की एक फूलन होती है वो तो एक प्राकृतिक है। इससे अनंत गुना फूलन उपासक के हृदय में होती है।

इष्ट से मिलने की मिले हुए भी अनमिल अब वो जो मिलन होगा वो निरंतर का होगा। इसलिए कितना आनंद थोड़ी देर सोचो अभी अभी अभी बात आ जाए कि चलो भाई निकुंज चलो कौन-कौन तैयार होगा अभी चलने के लिए तत्काल में तैयार वो है जिन्होंने सर्वस्व त्याग करके एकांत में रोया है प्रियाजु के लिए वो कह देंगे अभी अभी ले चलो इसी क्षण क्योंकि उनके सिवा मेरा कोई है नहीं और मैं उन्हीं के लिए तड़प रहा हूं या तड़प रही हूं ये है मृत्यु के डर पर विजय प्राप्त करना। नहीं तो सच्ची कहते हैं कि अगर अभी आ जाए भगवान की देखो बाहर विमान राधा केली कुंज के बाहर चलो बैठो पहले मरो फिर चलो कौन-कौन तैयार होगा तो बहुत कम तैयार होंगे असलियत में मृत्यु का डर खत्म हो जाएगा।

देखो हाथ जिसने उठाया हिम्मत से उठाया है और देख लेना अगर आप डरे तो कच्चे रहोगे नहीं सच्चे है श्री जी के लिए मुझे श्री जी चाहिए ये शरीर तो छूटना ही आज नहीं तो कल छूटेगा प्यारे श्री जी के लिए पक्का और जिसने हाथ उठाया है बस हिम्मत रखना चलोगे साथ ही देखो एक प्रेमानंद ऐसे यहां सोफा में बैठा और एक प्रेमानंद तुम्हारे दिमाग में बैठा है। देख लो। तुम्हारे दिमाग वाला प्रेमानंद तभी मुक्त होगा जब तुमको मुक्त कर देगा। यह बात पकड़ लेना। एक प्रेमंद ये बैठा है जो तुमको सोफा में दिखाई दे रहा है और एक प्रेमंद तुम्हारे हृदय में तुम्हारे दिमाग में बैठा है जिसकी बात पर आप चल रहे हो।

वो तभी मुक्त होगा जब तुमको मुक्त कर देगा। ये बात ध्यान रखना। सच्चा गुरु कभी अपने को मुक्त नहीं होने देगा जब तक तुम्हें मुक्त नहीं होने देगा। गुरु बंदी बन जाता है शिष्य के हृदय में। जब शिष्य को भगवत प्राप्ति करा देता है तब वो मुक्त होता है। ये गुरु बल्ला कोई खिलवाड़ नहीं है। गुरु प्रताप से गुरु का। ये जो तुम्हारे हृदय में प्रेमंद बैठा है। देखो है कि नहीं? तुम्हारे दिमाग में जो है तुम्हारे हृदय में वो तुम्हें जीवन मुक्त करने के लिए बंदी बन गया। तुम्हारे हृदय में वो तभी मुक्त होगा जब तुम्हें मुक्त कर देगा।

तो जितनी जल्दी तुम मुक्त होगे उतनी जल्दी वो मुक्त होगा। वो गुरु मोक्ष ही स्वीकार नहीं करता। पहले शिष्य का कौन सा गुरु ध्यान रखना जो तुम्हारे हृदय में बैठा हुआ है। ये हम जानते हो किसकी बात कर रहे हैं? श्री ज्ञानदेव जी की। श्री एकनाथ जी के। इन बड़े-बड़े महापुरुषों के वचनों में जब स्वाध्याय पूर्व में किया था तब पकड़ा था कि गुरुदेव शिष्य के हृदय में तब तक बंदी बन के रहते हैं जब तक उसका परम कल्याण नहीं कर देते। तो मृत्यु का डर खत्म हो जाए तो जान लो कि अब हम निकुंज में इतना भी डर नहीं है।

इतना इतना कि अब शरीर छूटेगा। शरीर का डर नहीं। डर एक है हमारे अंदर। वो हमने फिर बताया था कि कभी कोई ऐसी बात ना हो कि धाम से बाहर हो जाऊं या प्यारी जी को भूल जाऊं। बस यही एक डर है और कोई डर नहीं है। और इसी डर के लिए आचार्य और गुरु से भीख मांगते रहते हैं, याचना करते रहते हैं। हम सब जिस समय संध्या आरती होती है तो एक दो बार नहीं कहते बिसर हो ना बिसारी हो यही दान मोहि दे श्री हरिवंश के लाडले मोहि अपनी कर ले कभी मैं आपको भूलू नहीं और आप भी कभी-कभी याद कर ले कि मेरी दासी है मेरा निज जन है बस यही अपने लोग संध्या आरती में रोज प्रार्थना करते हैं बस हो ना विषारी हो यही दान दे पहला निरंतर नाम जप प्रभु से प्रार्थना करना कि किसी के प्रति हमारा दोष दर्शन हो दूसरा अपने गुरु प्रदत नित्य दिनचर्या को यथावत करना आलस्य प्रमाद ना करना तीसरा कुसंग से दूर रहना चौथा बुरी किताबें किस्सा कहानियां या ऐसी टीकाएं ना पढ़ना जो हमारे अंदर भ्रम पैदा कर दे पांचवा नाच तमाशा चेटक नाटक चित्र और ऐसे दृश्य ऐसे सीरीज आज ना देखे जिससे हमारा मन विषयों में चला जाए।

छठवा अपनी निरक परख करके गुरुदेव से अपनी जांच कराते रहना। सातवा इंद्रियों को जब देखे कि ये बुरे आक्रमण में बिल्कुल अब फसा ही देंगे तो तत्काल किसी संत का आश्रय ले तुरंत क्योंकि उस समय तुम्हारा विचार तुम पर हावी है। अब कोई महापुरुष ही तुम्हें बचा सकता। उस समय जैसे आप संत के संग में नहीं हो तो आप सत्संग शुरू कर दो और बड़े ध्यान से सुनने लगो तो शायद आपकी बुद्धि बच जाए। नहीं कोई सत्संगी हो तो उसके समीप चले जाओ और उससे वार्ता करने लगो आपका मन बटना चाहिए।

उस समय एकांत नहीं होना चाहिए। आठवा जब बुरा चिंतन उठे इसमें जो शब्द है उसे नोच कर निकाल के फेंक दो। उसका अस्तित्व मत रखो। नौवा एकांत में विशेष मनो इंद्रियां हावी होती हैं। इसलिए साधक को एकांत में बहुत सावधानी पूर्वक भगवत चिंतन करना चाहिए। दवा जैसे विद्यार्थी की परीक्षा की तैयारी होती है। ऐसे परमार्थी को अपने हर समय ध्यान रखना कि तुम्हारी कभी भी परीक्षा हो सकती है और हमको उत्तीर्ण होना है। जब उत्तीर्ण होगे तो भक्ति की भूमिकाएं या ज्ञान की भूमिकाएं जागृत होने लगेंग।

11वा मौत का डर खत्म हो जाना चाहिए। भजन के प्रताप से मृत्यु का डर खत्म हो जाना चाहिए। शेष चर्चा श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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