जान लो इस शरीर की असलियत क्या है ?/ वृंदावन में नंदलाल का प्रथम बार वंशी वादन /वत्सासुर का उद्धार
श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
वृंदावन स्वरी तैव पदारविंदम प्रेमा मृतक मकरंद रसो पूर्णम हदर पितम मधुपति स्मर ताप मु ग्रम निर्वा पयत परम शीतल मा शयाम परम शीतल मा आश्रया परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नव निवृत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले प्राणा आराध्य प्राण प्रिय युगल सरकार श्री श्यामा श्याम जू समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी तरु लता यमुना रस रानी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिकर के चरणों में कोटि शह प्रणाम कोटि शह नमन नमस्कार यह मानव देह प्रमाद में स्थित होकर के भोगों में सुख बुद्धि करके अपने समय को व्यर्थ ना करने के लिए नहीं है यह बात समझ में आ जाए तो जीवन सार्थक हो जाए श्रीपाद प्रभ उधान जी महाराज कह रहे हैं तत कुत्सित मस्थ मांस रचित ण मूत्र पू याद भी पूर्ण दृष्ट नष्ट इंद्रिय गणा मरदे नित्या दितम आधि व्याधि सता विभूत मनम कामा दि दाहा कुलम देहम तित या तुवा हरि रस त्वम नंद वृंदावन हे भाई तत कुचित मस् मांस र चितम ण मूत्र पया द भी यह जो तुम्हारा शरीर है यह तुम नहीं हो पहली बात तो यह
समझो यह शरीर पंच भूतों से बना हुआ है इसमें मल मूत्र भरा हुआ है मूत्राशय मलाशय और ये कोई खास नहीं एक क्षण में नष्ट हो जाने वाला है और इसमें बहुत से रोग छुपे हुए हैं आधि व्याधि पूर्ण दृष्ट नि नष्ट मिंद्र गणा मर्दन नित्या अधितम और ऐसे शरीर को पाकर के जो इंद्रियों को छूट दे दी कि मन मानी भोग भोगो पापा चरण करो अपना सर्वनाश कर लिया इस शरीर से हमें दिव्य भाव देह प्रात करना है इस शरीर से ऐसी साधना करनी कि अब हमारा जन्म इस मृत्यु लोक में ना हो इस शरीर से ऐसी साधना करनी कि हमें श्री भगवान का सानिध्य मिल जाए हम वहीं से बिछड़े हैं और वहीं पहुंच जाए पर ये अज्ञान कि विषय भोगों में सुख है नाना प्रकार की चिंताएं शोक व्यर्थ की कल्पना व्यर्थ का चिंतन करते करते पूरा जीवन नष्ट कर देता है देहम तित या तुवा हरि रस तुम नंद वृंदावन यदि तुम ऐसा कर सको तो तुम्हें परम लाभ मिल जाए संसार के कार्यों से दो चार दिन के लिए ही निवृत होकर वृंदावन आ जाओ बैठकर सत्संग सुनो रज रानी का शरीर पर लेप करो यमुना रस रानी के पास बैठ
कीर्तन करो शरीर स्वस्थ है तो वृंदावन की परिक्रमा लगाओ यहां के भगवत स्वरूपों का दर्शन करो जो साक्षात स्वयं प्रकट हुए हैं श्री बांके बिहारी लाल श्री राधा वल्लभ लाल श्री राधा रमण लाल श्री राधा गोविंद देव जी श्री राधा दामोदर देव सब प्रभु के सच्चिदानंद बप है पैरों से चल चल करके जाओ तो तुम्हारे पाप नष्ट होंगे जब श्री भगवान के लिए एक एक कदम चला जाता है वो यज्ञों के समान होता है जब प्रभु के दर्शन करने जाओ तो केवल प्रभु के दर्शन करो आसपास नहीं प्रभु के दर्शन करने की पद्धति सर नीचे की हुए मंदिर में जाओ और सर ऊंचा करो तो सामने ठाकुर जी बस उनमें नेत्र मिलाओ नक सख लो अंग अंग माधुरी का पान करो चरणों से लेकर के मुकुट तक मुकुट से लेकर चरणों तक बार-बार नेत्रों में बसाओ बंद करो फिर ध्यान में देखो वही रूप आ रहा है कि नहीं फिर देखो फिर आंख मंद लो फिर देखो जब मन भर जाए कि अब क्षमता नहीं रही दर्शन करने की तो नेत्र नीचे करो मंदिर के बाहर हो जाओ मंदिर में प्रणाम नमस्कार बातचीत एक दूसरे से हंसी मजाक यह सब कुछ
नहीं मंदिर में देखना अरे वह क्या कर रहे हैं वह क्या कर यह सब अपराध वृति है नेत्र नीचे किए सीधे मंदिर गए प्रभु के दर्शन किए फिर नेत्र नीचे किए अपने निवास स्थान आ गए यदि ऐसा वृंदावन में ऐसा कर सको और कहीं ऐसा सौभाग्य हो कि आजीवन के लिए वृंदावन वास ले ले तो कह हरि रस तुम नंद तुम हरि के आनंद में आनंदित होकर रस में डूब जाओगे वृंदावन ऐसी कृपा कर देगा प्रगट कृपा स्वरूप वृंदावन विराजमान है कोटि कल्प तरु कोटि कामधेनु वृंदावन की समानता नहीं कर सकते रज की समानता नहीं कर लता की समानता नहीं कर सकते श्रीपाद कह रहे अदवा प्रप सतोष भरण विड भांड कश्या चरण हाहा मूल महा विनट मय से स्त्री संग नाम संगत सोनाक यातना कति नावा हंता मात्रा किम वृंदावन वास भास ना महानंदा मंदा से अरे मूढ़ क्यों अहंकार करके दूसरों को दुख दे रहा है पापा चरण कर रहा है चोरी हिंसा कर रहा है दूसरों का मांस खा रहा है मदिरा पी रहा है क्यों अपना नाश कर रहा है अरे अद्य सवा प्रप तोष य भी शरीर छूट सकता है क्या पता तुम सत्संग सुनकर बाहर जीवित
निकलोगे कि नहीं क्या पता हम अगला शब्द बोल पाएंगे कि नहीं कोई भरोसा नहीं किस समय कैसे शरीर का नाश हो जाए कुछ पता नहीं है कर्मों का बड़ा विचित्र जाल है जब हमारा कर्म दंड देने के लिए आता है तो सिर्फ भगवान बचा सकते हैं दूसरा कोई नहीं बचा सकता इसलिए विड भांड कश्या चर इस विष्ठा के पात्र को भरते भरते जीवन होता जा रहा है कभी घृणा नहीं होती कितना खाऊ इसको कितना खवा जीवन होता जा रहा है यह 181 वर्ष की अवस्था में हमारे अंदर प्रश्न आया था गंगा किनारे जब भ्रमण
कर रहे थे अरे क्या जाल है आज यह मिल जाए खाने को आज यह मिल जाए ये क्या मांग है और वह मिल गई तो फिर और यह क्या है ब लगा कि नहीं य इंद्री लिप्सा है इसको ठीक करना पड़ेगा इसकी मांग इसको तोड़नी पड़ेगी आकाश वृत्ति से प्रभु जो भेज दे गंगा के किनारे हमारे पास गांव भिक्षा मांगना भी बंद जो भेज दे वैसे बहुत आनंदमय जीवन बहुत आनंद एक दिन चला नहीं जा रहा था भूख के कारण बस गंगा किना एक चरवाहे ने देखा अपने आप कहा बाबा कुछ खाओगे यहां क्या रखा है गंगा किनारे बोले हमारी गाय चल रही कमंडल हमारे हाथ में बोलो अभी दूध द दे जैसे भगवान देने वाला परमात्मा कदम कदम पर कहीं जाना नहीं बोला गाय चल रही हमारी अभी आप बोलो अभी धो के दे दे शाम का टाइम था दो भगवान कदम कदम पर आपको सच्ची कहते जब कोई मि जाता ऐसे कोई एक दो परे या गुड़ ऐसे जरा सा देता तो एकांत में एकदम अश्र भरते भगवान आप कितने कृपालु हो आप कितना आपको भर थाल भोजन मिलता है आप कभी जय जयकार अंदर से करते हो कि नाथ आप कितने कृपाल हो क्यों व भाव नहीं है ना नहीं तो जब
जैसे कभी ऐसे कुछ भी आहार मिलता ना तो सीधे भगवान पर प्रभु आप कितनी कृपा ये नहीं होता कि तीन दिन बाद नाराज ऐसा कितने कृपाल हो प्रभ प्रति पद उनकी कृपा का कितना भरोगे चाहे जितना रोज भरो पूरा जीवन इसी में चला जा रहा है शरीर की समस्याओं का समाधान करने में लेकिन जन्म मरण रूपी चक्र के समाधान का विचार ही नहीं आ रहा अदवा प्रप सतोस यह तुम्हारा शरीर कभी भी पतित हो सकता है नष्ट हो सकता है कभी भी नष्ट हो सकता है भरम विड भांड कश्या चरण अरे इस विष्ठा के पात्र को
कितना भरते रहोगे रसेंद्र सुधर गई तो सब इंद्रियां सुधर जाएंगी रसेंद्र सबसे ज्यादा घातक इंद्रिय है नौ इंद्रिया विजेता है एक इंद्री परास्त कि रसेंद्र तो व हार जाएगा और एक इंद्री जीत गया रसेंद्र तो नौ इंद्रियां उसके वश में हो जाएंगी पांच कर्मेंद्रिय पांच ज्ञान इंद्रियों में यह सर्वश्रेष्ठ प्रधान इंद्र है रस इंद्र यह महा विनाश कारी है महा विनाशकारी जितनी चटोरा होगा उतने इंद्रियों में विषय विलासिता होगी बहुत गंभीर होना चाहिए खानपान में बहुत संयम रखना चाहिए बारबार परने वाला तो भोजन हमें लगता है साधक के लिए तो ठीक नहीं है साधक को एक बार रखवा लेना चाहिए पांच रोटी रख दो सब्जी रख दिया यह रख दो अब हमारे पास दोबारा पूछना नहीं बस राधा वल्लभ लाल की पाले जितना पाना है एक बार शांतम शाश्वतम म प्रे मनम निर्वाण शांति प्रदम जैसे हमारे भगवान का स्वरूप है ऐसे भक्त का स्वरूप होता है कितना भरोगे कितना आज ये आजय आज मरोगे ये मरे शरीर इसलिए बहुत सा वही साधु जिसने रसेंद्र को संभाल लिया बस बात समझ लो अभ्यास करो एक
बार भोजन लेने का अभ्यास करो एक बार का मतलब दिन में एक बार लो तो और बढ़िया है लेकिन दो बार ले लो पर एक बार परशा हो क्या जाता है अपने हिसाब से एक बार जय राधा दोबारा नहीं यह सद वही है हमने संतों को देखा है जो भजना आनंदी संत है खड़े खड़े ऐसे के साथ रहे कुछ दिन रहे बहुत विरक्त महापुरुष नहीं ये नहीं ये हटाओ ये हटाओ हा ये रख ये रख लेया नारायण नारायण नारायण भजन में डूबे हैं हर समय भजन के लिए देखो गाढ़ वृत्ति भजन में कहां होती गाढ़ वृति का मतलब जैसे बढ़िया रबड़ी पी जाए तो जबान रुकती नहीं ऐसे नाम में जबान राधा नाम सुधार सम रसी तुम राधा राधा वल राधा वल बोलने का मन नहीं हो रहा देखने का मन नहीं हो रहा डूबे चले जा यह है अपना मार्ग कितना भरोगे कह रहे हैं भरण बड भांड क सचर चाहे जो कुछ पाव तना गंद मशीन है पूछो अपने को बहुत महान मान रहे इस शरीर की महानता नहीं महानता चिंतन की है यह तो बहुत गंदा शरीर पशु से भी गिरा हुआ शरीर है यद भगवत भजन ना हुआ जिन हरि भगत हृदय नहीं आनी जीवित स समानते प्राण श्रीपाद
प्रभु दन जी महाराज कह रहे हैं तुम्हें अभी पता नहीं कि तुम अणु मात्र नरक यंत्रणा नहीं सह सकते ऐसी भयानक पीड़ा दी जाती है नरक में एक दृश्य कल दिखाया कि देखो आप उपदेश देते हो तो दिखाया एक ट्रक का एक्सीडेंट हुआ आग लग गई और वो ड्राइवर चीख रहा है जिंदा और जिंदा जल रहा है अब ऐसे फस गया निकल सकता नहीं बड़ा ट्रक निकलने की कोई चांस मतलब पा मिनट तक उसकी चीख चलती जिंदा ऐसे चलता है यह है यह है कर्म का फल अवश्य में भोगत व्यम कृतम कर्म जो जो कर्म करो व भोगना पड़ेगा किसी भी जीव को दंड दिया जानबूझकर तुमने ने दुख दिया वो कई गुना बढ़कर आपको दुख दे लोग हाहाकार कर रहे हैं आसपास लेकिन वो ऊंचे पर बैठा जल रहा है और उसके निकालने कोई उपाय नहीं वो हाथ ऐसे पटक रहा है मार विकल होता हुई हमें देख कर के कि भगवान कितना भारी दंड जिंदा आदमी जल रहा है और ऐसी एक घटना है नहीं सैकड़ों घटनाए तो वो कौन है जो हमारे पूर्व के ऐसे कर्म बिगड़ गए श्रीपाद कह रहे हैं नरक यंत्रणा अणु मात्र नहीं सह सकते इतनी भयानक होती है तो नरक तो बात
जाने दो यही मृत्यु लोक में देखो अब पता नहीं कौन सा अंग में कौन सी सरिया उसके कौन सा लोहा घुसा जिससे व निकल नहीं सकता अब वो चीख रहा है और आग की लपट उसको जलाती चली जा जिंदा आदमी जल रहा है ज थोड़ा विचार करो कितना भयानक कष्ट होगा श्रीपाद कह रहे हैं इतने पर भी तू भगवत भजन नहीं कर रहा तुझे डर नहीं लग रहा बड़े तार्किक लोग होते हैं लोग कहते हैं कि यदि हम मांस नहीं खाएंगे तो जीव बहुत बढ़ जाएंगे सृष्टि में बहुत बढ़ जाएंगे सृष्टि में अरे भगवान का यह जिम्मेवारी है सृष्टि की रचना सृष्टि का पालन और सृष्टि का लय यह तीनों भगवान की जिम्मेवारी है आप मनुष्य शरीर में आए हो आपको जैसी रहनी से कहा गया है शास्त्र कहता है वैसे रहो और निकल जाओ इस संसार समुद्र से पार हो जाओ पर यह बुद्धि भ्रष्ट है इसलिए समझ में नहीं आती कह रहे य महा आनंद प्राप्त करा देने वाला भी मनुष्य शरीर है यदि तुम नाम जप करने लगे दूसरों का उपकार करने लगे किसी को दुख नहीं दिया तो भगवान तुम्हें महा आनंद प्रदान करेंगे स्त्री भी केन वसीक त्र
जगती प्रायो यसो लिप सव दृश्यं विष प्रोप पतित संगन महान तो पही बुद्ध वम प्रति बोधन च स्वार्थमोर मावस त्रिभुवन में ऐसा कौन है जो कामिनी के अधीन ना हो गया हो नारी नयन सर जाहि न लागा कौन ऐसा वही जिसको भगवान के नेत्र कटाक्ष चित्त को चुराने के लिए चल पड़े अब उसके हृदय को कोई नहीं चुरा सकता जिसे भगवान के नयन कटाक्ष का बाण लग गया अब उसके हृदय को और किसी कटाक्ष की ताकत नहीं है इसलिए कह रहे हैं तत्र अहर निसम रात दिन प्रम हृदय राधा राधा राधा राधा कल किसी ने
कहा कि हमें आशीर्वाद दीजिए क्या बोले 10 साल से मैं किसी को बहुत प्यार कर रहा हूं और मुझे ब प्यार नहीं कर मैं उसके बिना जी नहीं सकता तो मेरे प्राण बचाओ आशीर्वाद दे ये आशीर्वाद संतो से आशीर्वाद यह आशीर्वाद नहीं मांगा कि द साल से कुबुद्धि के द्वारा मैं वासना के जाल में बंधा ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि वासना का जाल नष्ट हो जाए और मैं निर्मम हो जाऊं मेरी हृदय की आसक्ति प्रभु के बहुत बुद्धि बहुत बुद्धि स्त्री भी केन वसी कृता जगती त्रिभुवन में कौन ऐसा है जिसे
कामिनी के कटाक्ष ने अपने अधीन न कर लिया हो प्रायो यशो चिप सव कह रहे कि प्राया देखा जाता है कौन ऐसा तपस्वी है कौन ऐसा है जिसके अंदर यश की आकांक्षा ना हो दृश्यं विषय प्रोप पतित कौन ऐसा है जो विषय भोग का समय उपस्थ हो और अपने को रोक ले बोले अगर ऐसा कह ले तो संगन महतो पही वह महापुरुष है जो स्त्री के कटाक्ष से ना बंधा हो पूरे जीवन में जिसे अपने यश की आकांक्षा ना हुई हो और जो उपस्थित भोगों के संग से अपने को बचा लिया भोगने से बोले वह कौन हो सकता है बोले केवल महापुरुष हो सकता है भगवान या भगवान का कोई कारक पुरुष या भगवान की प्राप्ति के लिए व्यथित कोई विरही पुरुष अन्यथा नहीं इसलिए बुद्ध वं प्रतिबोधितम करतम ततो यह मनुष्य जन्म हाथ में मुक्ति रखी है बस सावधान हो जाओ तुम्हारे हाथ में परमार्थ रखा हुआ बस चल दो परमार्थ की तरफ मानव देह से परम पद प्राप्त किया जाता है इसलिए जागो मोह की निद्रा से जागो मोह निशा सब सो अ निहारा देखे स्वपन अनेक प्रकारा यही जग जामिनी जागे जोगी परमार्थी प्रपंच योगी जागो शांत हृदय
हो रात दिन भगवन नाम शांत का मतलब वेग आ रहे हैं काम के वेग आ रहे हैं क्रोध के वेग चुपचाप दबा लो इनको अंदर अंदर इनको नष्ट कर दो नाम जप के द्वा नाम एक वो डिलीटर है बहुत जल्दी सब जैसे लिखा जाता है वो बोर्ड में और फिर डस्टर से मिटा दो एकदम साफ यह नाम डस्टर है जो मन वासना की चित्र लिखता है अंदर मन में ही चित्रगुप्त बैठे हुए हैं और वह चित्र सहित गुप्त रूप से हर बात नोट करते रहते सीसी कैमरे की तरह वही जन्म जन्मांतर के सब मन में भरे हुए हैं और इसी को डिलीट कर दे तो निर्मल मन हो जाए और निर्मल मन जन सो मोही पावा व भगवान को प्राप्त कर ले तो यह जो नाम है ये हर वासना को डिलीट करता है जितना जपते जाओगे वासना आती जाएंगी जो मन में छुपी हुई है वो सब डिलीट कर दे कई बार चर्चा की अगर नाम जप करते समय वासनाओं के दृश्य आ रहे तो घबराने की जरूरत नहीं वो तुम्हारे मन को निर्मल कर रहा है नाम तत्र आर निसम रात दिन जपो बहुत जल्दी मन को निर्मल करके भगवत प्राप्ति कर लो वृंदा टवी मावस और हो सके तो वृंदावन वास करो एक
दिन ही सही दो दिन ही सही तीन दिन ही सही जिनको सौभाग्य मिला है रात दिन रहने का तो अहर निश वृंदावन बस के इतनो बड़ो सयान जुगल चरण के भजन बन निमिस न दी जय जान प्रिया प्रीतम के भजन के बिना एक पलक झपक का समय भी व्यर्थ ना जाए यही वृंदावन वासी का परम सौभाग्य होगा और आप दो तीन दिन के लिए आओ तो निर् पराध वृत्ति से वृंदावन का सेवन करो बहुत जल्दी वृंदावन संचित कर्मों को भस्म करके क्रे माण को निष्फल करके प्रारब्ध को नि प्रभावित करके जीव को परम सुख परम पद प्रदान करता है चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण जिसमें भगवान श्री कृष्ण चंद्र जू श्री वृंदावन में प्रवेश किए समस्त ब्रज वासियों के साथ वृंदावनम सं प्रविश सर्व काल सुखावटी अर्ध चंद्रवंका पुलिला च विक्षा सतमा प्रीति राम माधव योर भगवान श्री कृष्ण बलराम जब वृंदावन में आए गिरिराज गोवर्धन को देखा पावन यमुना पुलिन यमुना जी को देखा लताओं को देखा वृंदावन की कुंज निकुंज को देखा तो वीक्षा सी तमा प्रीति राम माधव योर वृंदावन के के दर्शन करके गिरिराज जी के
दर्शन करके यमुना जी के दर्शन करके वृंदावन की लताओं के दर्शन करके विक्षा सीध उतमा प्रीति राम माधव योर्न प्रेम स्वरूप भगवान श्री कृष्ण बलराम के हृदय में उत्तमा प्रीति का प्रादुर्भाव हुआ वो तो भगवान है हम जीव के हृदय में क्यों उत्तमा प्रीति नहीं प्रकट कर देगा वृंदावन गिरिराज गोवर्धन यमुना रस रानी यहां की लताएं लाल जू एवं ब्रज कम प्रीति यंतो बाल चेत कल वाक्य स्व कालेन वत्स पालो बुत भगवान कुछ हल्का सा तोतली वाणी में बोलते हैं रातो रात दिव्य वृंदावन का
प्रादुर्भाव हो गया अद्भुत महल पीछे चर्चा हुई थी भन के आदेश से रातो रात विश्वकर्मा ने नहीं तो जब ब्रजवासी जन आए थे तो तत्र चक्र बृजवासन सकट ध चंद्रवर्धन वत खड़ा किया और द्वार पर सैनिक रक्षा तो बीच में सब ब्रजवासी बास कर रहे एक जो रथों का चक्र था उसमें गौ में वास कर रहे लेकिन सबके घर के लिए रातो रात भगवत स्वरूप विश्वकर्मा जी ने दिव्य महलों की रचना कर दी यह गोषट वृंदावन में अब भगवान अपने नित्य सखा हों के साथ वृंदावन में क्रीड़ा कर रहे हैं आज तक ये कोई प्रमाण नहीं मिला कि भगवान की बंसी कहां से आई और किसने बनवाई जैसे भगवान स्वयंभू स्वयं प्रकट हुए ऐसे भगवान की बंसी भी स्वयं प्रकट हुई रस मूल मुरलि का अनंद दिनी अभी आज तक भगवान ने बंसी अपने अधरों पर नहीं धारण करी थी वृंदावन के संयोग गिरिराज जी की शोभा यमुना रस रानी का अद्भुत पावन पुलिन किसी ने कहीं नहीं आज तक य पता चला कि बृजेश तने ने वंशी कहां से प्राप्त की स्वयंभू प्रकट वंशी पूज्य राधा बाबा और वंशी की शिक्षा किसने दी जाने के अभी तो तोतली बोली
में ही बोलते हैं अभी तो भगवान बहुत ही सुकुमार अवस्था एक दिन वृंदावन की शोभा देखकर प्रथम बार प्रभु के हृदय में उमंग हुई मानो समस्त बजवास हों को प्रेमा अमृत में निमग्न करना है भगवान श्री कृष्ण ने अपने अधुरो में रख कर के वंशी बजाए झंकृत हो गया संपूर्ण विश्व चमत्कृत वृंदावन को झंकृत कर अंतरिक्ष में बढ़ी ध्वनि पाताल में बढ़ी कुछ ऊपर गई ब्रह्मलोक तक कुछ नीचे अतल सुतल पाताल कैलाश सर्वत्र प्रथम वंशी बादन पूरे त्रिभुवन को झंकृत कर दिया रुधन नम तस चमत कृति
परम कुवन मुतु बुरु ध्याना द तरन सनन मुखा विस्मा पयन वेदस औ सक बलिर बलिम चटलैंड का भेदन करती हुई पूरे विश्व में बंसी नाथ स्वयं परमात्मा जब बंसी नाद कर रहे हैं तो उनकी उपमा तो हो ही नहीं सकती किसी से सुनहु हरि मुरली मधुर बजाई अब बंशी नाथ देवलोक पहुंचा नीचे रसातल तलाल पाताल महात वितल सुतल मोहे सुर नर नाग निरंतर ब्रज बनिता उठ धाई कहां बंसी बजी जो ब्रजवासी जन है जो सखा जन है जो ब्रज जुती जन है लाल एकांत कदम वृक्ष के नीचे ललित त्रिभंगी आंख मंदे हुए अद्भुत वर्ष वादन कर रहे खग ब्रग पशु पंछी सब जमुना नीर प्रवाह थकित भयो पवन रयो मुरझाई सुनो हरि मुरली मधुर बजाई सुर नर नाग सब मोहित हो गए यमुना जी का प्रवाह रुक गया वायु बहना बंद हो गई खग मृग मीन अधीन भए सब अपनी गति बसराई द्रुम बेली अनुराग पुलक तनु सस थक निसन घटाई सूर श्याम वृंदावन बिहर चल सखी सुधि पाई सुनहु हरि मुरली मधुर बजाई यमुना जल का प्रवाह रुक गया वायु बहना बंधु खग मृग मीन सब अधीन हो गए ये सब ऐसे वृंदावन के पशु पक्षी मानो मुनि वृत धारण करने
वाले कोई परमहंस हो द्रुम बेली से रस टपकने लगा चंद्रमा थकित हो गया रात रुक गई बृंदावन में जब लाल जू ने अपने अधरों में बंसी धर करके बजाई तो जब हरि मुरली अधर धरत थिर चर चर थिर पवन थकित रहे जमुना जल ना बहत जब हरी मुरली अधर धरत जड़ में चेतना जागृत हो गई और चेतना वाले जड़ हो गए थिर चर चर थिर पवन थकित जमुना जल न बहत खग मोहे मृग जूत भुला निरख मदन छवि रत पशु मोहे सुर भी विथ की त्रण दतन टे की रहत गाय जो पाग कर रही थी सेसे व वैसे ही बछड़ा जो वैसे ही मृग के समूह वैसे ही ध्यान में थे सन काद विचलित हो गए समाध विक्षिप्त हो गए विक्षिप्त समाधि हो गए जड़ चेतना युक्त हो गए चैतन्य समाधि जड़ युक्त हो गए सुख सन काद सकल मुनि मोहे ध्यान न तनक गहत सूरदास भाग है तिनके जेया सुख ही लत बड़े भाग्यशाली जिनके कानों में वंशी ध्वनि पड़ मेरे सांवरे जब मुरली अधर धरी सुनी शिव समाधि तरी भगवान शंकर वंसी ध्वनि सुनते मेरे नाथ की वंसी ध्वनि प्रथम बार धरो में धरी त्रिभुवन चमत्कृत हो उठा मेरे सांवरे जब मुरली अधर धरी सुनि शिव समाधि
टरी सुनि थके देव विमान सुर वधु चित्र समान ग्रह नक्षत्र तजत न रास वाहन बंधे धुनि पास चल थके अचल टरे सुनि आनंद उमगया हैं विमान पाकर वृंदावन में ब जितने भी जैसे अश्व है गौ है बछड़े हैं जो बाबा के साथ आए सब उस ध्वनि में मोहित चल थक गए अर्थात चलने की सामर्थ्य नहीं ही अचल चलने लगे यह बंसी का अद्भुत आनंद चर चर गति विपरीत सुनि बण कल पित गीत झरना न झर पसान गंधर्व मोहे गान सुनि खग मृग मौन धरे फल त्रण की सुधि विसरे सुनि धेनु धुनि थकी रहती त्रण दंत नहीं गहत बछरा न पीवे छीर पंछी न मन में धीर बेली द्रुम चपल भए सुनि पल्लो प्रगट नए सुनि विटप चंचल पात अति निकट को अकुला आकुल पुलकित गात अनुराग नैन चु चात सुनि चंचल पवन थक सरिता जल चली न सक्य सुनि धुनि चली बृजनारी सुत देह गेह बसारी अति थकित भयो समीर उल्टो ज जमुना नीर मन मोह मदन गोपाल तन श्याम नैन विशाल नव नील तन घनश्याम नव पीत पट अभिराम नव मुकुट नव बन दम लावण्य कोटि काम मन मोहन रूप धर्य तब गर्व अनंग हर श्री मदन मोहन लाल मेरे सांवरे जब मुरली अधर धरी तो सुनि
शिव समाधि तरी प्रभु ने जब वंशी वादन किया झंकृत हो गया वृंदावन अंतरिक्ष को भी आत्मसात करने के लिए ऊपर उठी पाताल को प्रक पित करने के लिए नीचे चली मेघ समूह रुद्ध हो गए स्वर्ग के गायक तुमू आदि गंधर्व बंसी ध्वनि और गायन शैली देख कर के मूर्छित हो रहे हैं वृंदावन की ओर सब विमानों से दौड़ रहे देवता लोग का अनुसंधान कहां से आई बंशी सनक सनन सनातन सनत कुमार ऋषि ये ध्यान स्थ थे विचलित हो गए ध्यान समाधि से कहां बंसी बजी विधाता के आश्चर्य का पार नहीं रहा कि आज तक ना ऐसा नाद हमने रचा है ना ऐसी बंसी रची क्योंकि विधाता की रची है ही नहीं चिर शांत स्वभाव महाराज बली जब रसातल में बंसी ध्वनि गई चंचल हो गए अनंत देव भगवान शेष जी जिनके फण पर पृथ्वी विराजमान वह भी जब ध्वनि सुनी बंसी की वह भी आनंद मगन हो गए संपूर्ण वृंदावन आज आनंद से क्योंकि बंसी वाले की प्रथम बंसी ध्वनि बजी उन्माद ही उन्माद और आख मंदे अपनी ध्वनि में अब यहां तो भीड़ लग चुकी थी मयूर मंडली हंस मंडली मृग मंडली गाय बछरा अश्व ब्रजवासी ब्रज गोपिया सब आख
खुली और सब अपार भीड़ देखी भीड़ देख के संकुचित हो गए अभी बाल गोपाल है ना बंसी से छुपा ली बंसी को अधरों से हटाकर संकोच से छिपाने के उद्देश्य से अपने सखा को इशारा किया चलो हमारे साथ खेलो यशोदा मैया भी आ गई आज तक लाला का मैंने यही समझा कि चंचलता करता है उपद्रव करता है लेकिन मेरा लाला इतना गुणी है इतनी सुंदर वंसी बजा लेता है बृजरानी के तो प्राण निछावर हो रहे थे मोहन ध्वनि संपूर्ण बृजवासन में आसू यह प्रेम है रस मूल मुरलि का आनंदिनी श्री कृष्ण चंद्र को अपनी लज्जा निवारण का समुचित स्थान प्राप्त हो गया व दौड़ करके बंसी अपने पेट में कोसी मैया के कंठ से लग गए और मैया के वस्त्र से अपना मुख छुपा लिया बृजरानी के नेत्रों से आनंद असु बरस रहे हैं गोप सुंदरियों ने यह नवीन स्वरूप प्रभु का देखा अभी तक तो सुख दे रहे थे विविध प्रकार के लिए बंशी वादन अब तो जो श्री कृष्ण चंद्र जी से जब मिलती ब लाला तनिक बंसी बजा दे श्री कृष्ण चंद्र जो ब्रजेश्वर के ब्रज रानी के अंक में सुशोभित हो रहे थे दल की दल ब्रजवासी गोपिया
आती और कहती हे कृष्ण मात्र कुछ चू चुक चूषण पी नालम यदे तद अधरम पुटम तवास तेना दते कति पयो दिनेश कस्मा कस्मा गुरु रद गता कलवे पाठ हे कृष्ण हे करुणामय अभी तक तो मैं केवल इतना ही जानती थी कि तुम्हारे नन्हे नन्हे अधर केवल माता के खोज का स्वाद लेते हैं जो माता के वक्षा स्थल से निकला हुआ दुग्ध उसी के पर मुझे नहीं पता था कि छोटे अधरों पर वंसी रखकर इतनी चमत्कार पूर्ण वंसी बजा लेते हो अच्छा तो बताओ मैंने तो कभी नहीं देखा तुम्हें बंसी बजाते हुए किसी के साथ
तो सीखा कहां से वृंदावन में पहली बार तुमने बंसी बजाई तो इस बंसी का गुरु कौन है बृजवासी गोपिया पूछती निर्म छम तवन याम मुख्यता वेणु पुनर ललनवा दवा मेरे लाला तेरे चंद्रमुखी की बलैया लेती हूं सांवरे तू एक बार फिर बंसी बजा दे बजा दे श्री कृष्ण चंद्र भी ब्रज वासियों की जब यह प्रोत्साहन भरी बात बाबा मैया के समक्ष तो बाबा इशारा करते बजा बजा अब लाला पर ये कभी सीधे होकर बंसी नहीं बन सकती बंसी में प्रेम रस विराजमान है इतना भार है कि तीन जगह से महाराज टेढ़े हो जाते हैं ग्रीवा कमल चरण यह इनकी मुद्रा है बंसी जब धारण करेंगे तो ललित त्रिभंगी हो जाएंगे जे भी बाबा मैया का इशारा पाया अधर पर पुन वंशी रखी और फिर उ चुर अदा स्व जननी जन कोप कंठे त दन तदा सरसी करोत उसी समय बंसी अधर पर विराजमान करके ही बंसी वादन किया ही आकाश में दिखाई देने लगे देवताओं के विमान और मध्य में हंस वाहन पर चतुर्मुख संपूर्ण सृष्टि के स्रष्टा श्री ब्रह्मा जी अष्टा भी स्तुति पुत कन वैव का कली कलयन सत तिति मुक्तो मराल पृष्ठ मोहर लुटती मराल
हंस की पीठ पर विराजमान क्यों बड़ा स्वाद आया क्योंकि चार मुख है तो आठ कान है आठ कान से बंसी नाद का पान किया तो ब्रह्मा जी भी भोर हो गए और हंस से कूद पड़े और प्रभु के सामने रज में लौट रहे इतना आनंद विकल ब्रह्मा जीवन में है आठ कानों से पान करके हंस से आए पहले तो सुनते रहे फिर लूट गए और देवराज इंद्र के हजार नेत्र है तो ललित त्रिभंगी मुरली मनोहर वंशी वादन करते हुए प्रभु को हजार नेत्रों से देख रहे हैं आज श्राप वरदान बना हुआ है वैसे हजार नेत्र नहीं थे हजार भग थे जब श्री गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या जी के साथ इन्होंने गौतम का वेश धारण करके तो फिर गौतम ऋषि को जब पता चला तो कहा तुझे भग बहुत प्रिय जा तेरे हजार भग शरीर में हो जाएं तब जब चरणों में गिरे थे तो कहा जब रघुनाथ जी प्रकट होंगे उनके दर्शन करोगे तब तुम्हारे ये नेत्र रूप में प्रणित हो जाएंगे तो भगवान त्रेता में प्रकट हुए थे दर्शन द्वापर में श्री कृष्ण चंद जू के भी कर रहे तो हजार नेत्रों से अश्व बिंदु चल रहा है और मेघ बिल्कुल छाया हुआ नहीं फिर भी
अमृत की बूंदे गिर रहे हैं वह सुगंधित वह मादकता प्रकट करने वाली बूंदे क्यों बंसी नादन से प्रेम रस की वर्षा हो रही वृंदावन में वृंदावन में प्रेम वर्षा धारा बंसी ना चित्रम वारी धरान बिनाप अर्थात चित्र मेघ नहीं है परवारी धारा बरस रही चित्रम वारी धरान बिना प तरसा य रद्य धारा मय दूरा पत देव मात्रक म भू बृंदा टवी मंडलम नन्हे से नंद नंदन की वेण ध्वनि से वृंदावन का स् जंगम सब आनंद मगन हो रहा है द्रव शिखर वंदे चं चले वेणु नाद दिस दिश वि सरती निर्झरा प समक्ष सित खग मृगा गंतु मुत का जडा स्वयम प सवि धाता नव पातु समर्था वेणु नाद का ऐसा प्रभ हुआ कि गिरिराज महाराज के पर्वत शिखर द्रवित होकर के ऐसे बहने लगे रस बहने लगा पर्वत से पाषाण में तरलता आ गई चारों र उनसे द्रवित पदार्थ बहने लगा विहंगम पशु पक्षी मृग के यूत यह समाधि हो रहे हैं जहां प्रभु बंशी वादन कर व दौड़ के जाते शांत भाव से खड़े हो जाते हैं जड़ता संचारी भाव आ जाता है वारी धारा का पान करने की सामर्थ्य नहीं रही मछलियों में उल्टा सब प्रवाहित हो
रहा है यमुना जल उल्टा प्रवाहित मछलिया वही जहा नंद नंदन वंसी वादन कर रहे वंसी नाद सरस पय प्राप्य ग्राव धर्मम हंसी संदानी पद युगा स्तंभ तांग रंस आसन नीसा स्वय जडा बध पादा न गंतु ता भयो दातुन विस सकलम नाप भोग तुम मराल बंसी नाद का ऐसा चमत्कार ऐसा प्रभाव कि सरोवर के जल को जमाकर प्रस्तर रूप कर दिया प्रस्तर पाषाण को द्रवित करके बहा दिया हंस हंसनी य जल के संसर्ग में आकर के ज के त्यों ऐसे ही खड़े क्योंकि वंशी ध्वनि का पान कर लिया निश्चल हो गए भगवान श्री कृष्ण चंद्र ज यह द्वितीय वंसी बजाए जब बाबा की गोद में मैया की सारे बाबा का सारा ब्रजवासी हों अब तो जो बृजवासी चार गोप लाला बंसी बजा पहले तो बंसी बजाने में संकोच करते थे पर अब जब मनुहार हुई तो संकोच शिथिल हो गया अब तो दिन भर यही कार्य जिधर से लाला बंसी बज लाला ललित त्रिभंगी क्या सुख इसीलिए ब्रजवासी के जैसा सुख ब्रह्मा को भी थोड़ी प्राप्त हो तो कभी कभी ब्रह्मा जी को प्राप्त है नंदलाल बजाई बासुरी श्री जमुना के तीर री अधर कर मिली सप्त स्वरस उपजत राग
रसाल री नंदलाल बजाई बांसुरी श्री जमुना के तीर री वृंदावन के आने के कुछ ही दिनों में श्री कृष्ण चंद्र का संपूर्ण बृजवासन के हृदय में पूर्ण निवास वंशी वादन करते हुए अब मानो अपने नित्य विलास भूमि में प्रभु पधारे हैं तो सब दिव्य कुंज निकुंज सब प्रकाशित है प्रभु अब किसी के घर नहीं जाते हैं अब दद दुग्ध की लीला नहीं होती है अब किसी के माट मटके टूटते रहे हैं अब हृदय पर प्रहार हो रहा है बंसी वादन धीरे-धीरे अवस्था बढ़ती जा रही है रोहिणी नंदन बलराम सदैव सावधान रहते हैं क्योंकि चपल है वह गंभीर हैं इनकी चेष्टा को देखते रहते हैं कभी गोषट में कभी किसी कुंज में कभी किसी गोवत्स के साथ ये क्रीड़ा करते हैं ब्रजराज सावधान करते हैं बलराम जी को सावधान रहना इसको ज्ञान नहीं है कभी ऐसी कोई बात जो इसके लिए हानिकारक हो बलराम जी साथ ही रहते हैं क्योंकि कई जगह रामावतार में जब लक्ष्मण जी का उत्साह बढ़ता तो भगवान इससे रोक देते थे तो कहा अगली बार जब आप लीला के लिए अवतार लोगे तो हम छोटे भाई नहीं बनेंगे बड़े भाई
बनेंगे जिससे हम आपको रोक सके आप हमें ना रोक सके एक दिन समस्त क्षणों को एकत्रित किया और अपने सखाव से कहा कि दूर लेकर के चलते हैं और वहां चराते हैं वही खेलते हैं पर मैया समझाती मैया अनुमति नहीं दे सकती बारबार अभी तू योग्य नहीं आज निश्चय किया नहीं अब तो हम बछड़ों को चलाने छोटे छोटे बछड़े लेकर गोषट में मैया री मैं गाय चराव जय हो तू कही महरी नंद बाबा सो बड़ो भयो अब ना डर हो मैया बाबा से कह दे की अनुमति दे दे मुझे अब देखो मैं बड़ा हो गया हूं अब मैं डरता नहीं हूं किसी से मुझे अब बछड़े चराने के लिए गए चराने के लिए अनुमति दे दो और फिर अकेले थोड़ी हूं श्री दमाल आदि सखा सब अरु हल धर संग ल हो दही भात कावरी भर ल हो भूख लगे तब खई हो मयारी में गाय चरा वन जय हो बंसीवट की शीतल छैया खेलत में सुख पई हो परमानंद दास संग खेलो जाय जमुन तट न हो मयारी मैं गाय चरा वन ज हो मैया रोम रोम आनंदित हो जाती है इनकी बात सुनकर नने से गोपाल बन गो चारण करने के लिए योग्यता भी चाहिए मैं कल्पना भी नहीं कर सकती कि तुझे गए
चराने के लिए भेजू इस प्रकार मना कर देती अब इस समय भगवान श्री कृष्ण की तीन वर्ष की अवस्था है कुमार भाव की झांकी आ रही श्री अंगों में शैशव अंतरध्यान हो चुका है कुमार अवस्था का प्रादुर्भाव हुआ बड़े सुंदर सुंदर वस्त्र पोशाक मैया धारण कराती हैं धोती बहुत सुंदर किनारी दार पीत वर्ण की वैसे भी कोट कंदर्प दमनी सुंदर कुछ भी धारण करे नाय ऐसे भी अच्छे लगते हैं बहुत सुंदर है आसक्ति करो व सब रूप दिखा देंगे बड़े मन योग से मैया श्रृंगार करते कितने सुंदर है थोड़ा
नाम जप करो तो तुम्हारे मानस का शीशा साफ हो तो फिर दिखाई देने लगेंगे झलक लगेंगे फिर कुछ बोलने की इच्छा नहीं होती कुछ कहने की बस उस रूप का पान करते रहो ना का हो सो बोलव ना कोई व्यवहार बस अपनी कुवर किशोरी को जियत निहार निहार बहुत बहुत मतलब मोक्ष पद प्राप्त महापुरुषों ने इनके रूप को देखकर मोक्ष सुख को तकत कर दिया ऐसा रूप है लाल जू का ऐसा रूप है प्रिया जू का ऊपर पीतांबर धारण किए हुए हैं बड़ा सुंदर श्रृंगार जननी ने किया है वस्त्रम दधानिया चिपमंक दनी बंदी हुई स्वर्ण के बाजू बंद कंकन मोर मुकुट कुंडल कमर में बंसी जे भी निकलते हैं तो नेत्रों के दोने से भर भर कर महान तपस्वी जो ब्रजवासी जन ब्रज जन ब्रज जती जन खग मृग पशु पंछी सब इनके रूप रसास का ये ऐसा रूप थोड़ी मुनि मन ध्यान धरत नहीं पावत अरे कर कमल की एक अंगुली देखने को मिल जाए तो ब्रह्मानंद में लघुता पैदा कर दे वो इतने सुंदर हैं प्रभु फिर इनके रूप को इनके यही तो परम सुख है बड़े भाग्यशाली हैं जिनका प्रभु के नाम में रूप में लीला में धाम में थोड़ी
भी रुचि हो गई है जही निकलते कोई कोई बृजवासन तो अरे नंद नंदन आए चलो दौड़ो सब पहले रूप रस पान घर के सब काम का छोड़कर सब बाहर खड़ी हो जाती और वो गज नायक प्रभु चाल मत एकम मस्त चल सबको सुख प्रदान करते हुए चल रहे प्रतिदिन मैया श्रृंगार करती प्रतिदिन ये बजवास को सुख देते यह कभी-कभी गोवत्स के साथ खेलते और कभी-कभी वृषभ से भी खेलने लगते जो बड़े बैल हैं सान है व बलराम जी दौड़ पड़ रहे हैं अब वो कोई बैल साधारण बैल है तमोगुण जीव थोड़ी है सब तपस्वी परमहंस जल व खेलते भगवान के साथ इसीलिए तो गाय और बैल बने हुए हैं बलराम जी आकर बल पूर्वक ऐसे पकड़ लेते कते छोड़ लाला तू दूर हट नहीं तुझे चोट लग जाएगी रक्षा करते हैं फिर बलराम जी जाकर शिकायत करते हैं मैया बछड़ों से खना सीधी गयो से खेलना यह तो ठीक है बड़े-बड़े बैलों से भी अब खेलने लगा है और यह तो कहो हम पास में थे अगर पास ना होते तो कुछ अनिष्ट हो सकता था पुरवास हों को अपार आनंद होता है राम और श्याम अपनी सुंदर शोभा से सुंदर भृकुटी संचालन मंद मुस्कान मधुर वचन एक
एक सब महान आनंद प्रदान करने वाले परमानंद में हर ब्रजवासी विभोर रहता है बृजेश्वर का सदैव भगवान नारायण को धन्यवाद देने में ही भाव जाता है धन्य है नारायण आपने साक्षात नारायण के अंसी आपने कृपा की ऐसा पुत्र दिया ऐसा परिकर दिया एवं ब्रज कम प्रीति यंतो बाल चटित कलवा स्व कालीन वत्स पालो ब भवत बहुत हट करने पर मैया ने आदेश कर दिया बछड़े लो और यही गोषट में पास में गौशाला के पास में ही बस यही चलाना अभी दूर नहीं जाना अभी आदेश हुआ स्व कालेन वत्स पालो बछड़ों छोटे छोटे बछड़ों को जाओ और घेर कर ऐसे पास में ही नंद नंदन मानो बहुत बड़ी संपत्ति मिल गई हो बल समेत शिशु सब अभिराम कंचन भूषण कंचन दाम तिन मधि अधिनायक ज नंद को बरसत अमी ज कोटि चंद को ब्रह्म मुहूर्त आरंभ होने पर बृजपुर वृंदावन का आकाश मंगल ध्वनियों से युक्त हो जाता है क्योंकि बृजवासन गोपियां जब मंथन करती तो घर घर घर यह ध्वनि और सब कृष्ण नाम कृष्ण रूप में डूबी हुई मधुर मधुर गाय करती है यशोदा मैया वत्स चारण का आदेश दे दिया है पर प्रारंभ आज करेंगे गोप
गोप सुंदरियां वयस्क गोप शिशु सब उत्साहित है ब्रजेश्वर बृजरानी ने भी रात में विश्राम नहीं किया कल लाला प्रारंभ करेगा वत्स चारण गोपाष्टमी से शायद भगवान प्रारंभ किए चराना गोपाष्टमी से गाय चराने के लिए भगवान तो आज भी हम सब जितने ब्रजवासी जन है मथुरा वृंदावन की परिक्रमा गोपाष्टमी को जो लगती है और फिर इधर वृंदावन वासियों इस क्षेत्र के ऐसे लगते फिर एकादशी को मथुरा और सब वो वो वृंदावन कैसे प्र अरे अपार भीड़ लगती थी अब तो यह जो रमण रहती थी ना भर के चलती थी कई बार परिक्रमा गुरुदेव भगवान के साथ पूरा माला बना हुआ था वृंदावन मथुरा और गरुण गोविंद ऐसे पूरा माला बना हुआ था इतने व्यक्ति श्रद्धालु सब नंगे पैर अब तो यत किंचित दिखाई देते हैं तो धीरे धीरे श्रद्धा मतलब अंतर ध्यान होती चली जा रही यहां सब मेला लगता था चार पांच दिन का सतमी अष्टमी नवमी दसमी एकादशी द्वादशी इतनी तक य मेला लगता था यार कुछ भी खरीद सकते हो यह रमण रेती सब अब तो एक भी दुकान नहीं दिखाई दी सब बंद वो बात ही धीरे जो आज के 25 वर्ष था व अब
नहीं है और 25 वर्ष और बीतने दो फिर और कुछ हो जाएगा समय रोज परिवर्तित होता चला जा रहा है सब ब्रजवासी जाग रहे थे कि कल नंदन न बछड़ा चराने जाएंगे प्रभात होने को अभी बहुत समय है लाला पहले मैया जल्दी करो मैया कहती अभी तो अर्धरात्रि तू सो जा नींद इनको भी नहीं आ रही गोवत्स को लेकर वन की ओर चलना है बड़े उत्साहित है उत्साह वस कभी-कभी तो सन गार से भाग छूटने का प्रयत्न करते पर मैया पूरी रात जगती रही यशोदा मैया और समझा जा अभी दो बजे हैं अभी : बजे अभी सो जा प्रातः कालीन जब गान होने लगा घर-घर की आवाज दुग्ध दूने की मंथन की अब प्रभु धैर्य नहीं रख सके मैया ने दरवाजा बंद करके कपाट बंद करके सिटक नहीं लगाई ये ऐसे तो मानेगा नहीं साकल लगा दी वो मैया प्रात काल हो गया देखो भगवान गौओं को कितना प्यार करते हैं आज हमारे गौओं को प्यार नहीं किया जा रहा हमारे धर्म की बहुत बड़ी नीव है गौ सेवा गौ पालन गौ दुग्ध गौ घृत गौ दधि यह सब हमारे जीवन के लिए बहुत उपयोगी है और यह हमारे आराधना में भी है हम अपने प्रभु का अभिषेक करते
हैं तो गौ दुग्ध गौ दधि गौ घृत इन् तो करते हैं अब प्राया धन के लोभ से दूध अधिक के लोभ से अपनी शुद्ध देसी जो गाय हैं इनका सेवन कम होता जा रहा है बड़े-बड़े महापुरुष संत महात्मा लाख लाख गायों का सेवन कर रहे हैं और गृहस्थ जन दूध के लोभ से अब भैंस रखने लगे विदेशी गाय रखने लगे हमें लगता है कि पैसा मिल जाएगा लेकिन बुद्धि शुद्ध नहीं रहेगी अगर अपने देश गौ की सेवा करोगे तो उसके कंडा से जो रोटी बनेगी उससे बुद्धि शुद्ध होगी जो गाय का दूध बहुत तेजस्वी होता है उसमें स्वर्ण तत्व होता है उसमें बौद्धिक स्तर को बहुत प्रेम ब्रह्म ऋषि जन इसी का सेवन करते थे देवताओं का हविष्य इसी से इसीलिए हर ऋषि गाय रखता था क्योंकि उसकी जो दिनचर्या उसकी पूर्ति ही गाय से होती थी और गौ में समस्त देवताओं का वास है और गौ हमारे सनातन धर्म की हा नीव है अगर नी गिर गई तो महल पूरा गिर जाएगा देखो स्वयं गोविंद भगवान ने गौओ की से कितना उत्साह रखते गौ सेवा का मैया उन्हें बार-बार समझाती है नन्हे से लाल जू महाराज तीन वर्ष के अब साकल पकड़
के खोल नहीं सकते इसलिए मैया से प्रार्थना करते हैं मैया मुझे बाहर जाने दो अब प्रातः काल हो गया अब मैं अपने बछड़ों को चरा हंगा बलराम जी आ गए और साथ के सखा गए वत्स चारण के लिए पूरा मैया व्यवस्था पूरी रात्रि भर की है स्वर्णिम रवि रश्मि हों की आलोक अर्थात जब भगवान सूर्य उदय हुए तब मैया ने साकल खोली कदली स्तंभ द्वार पर मंगल घट ध्वजा पता का बंदनवार पुष्प वितान आदि कला मर्मज्ञ गोपों ने एक से एक नवीन पल्लव और गोपियों ने सुंदर चौक पूरी है रंग बिरंगी बृजरानी आश्चर्य चकित हो रही जब साकल खोली पूरे दरवाजे पर चौक पूरी हुई और सब बंदनवार पुष्प वितान ध्वजा पता का मंगल घट बृहद वन वृंदावन में ऐसी सुंदर सजावट की गई आज ऐसी सजावट की गई है जैसे बाबा के हा जब लाला हुआ था जब सजावट की गई थी जैसे गोकुल सजा था से आज वृंदावन सजा और संयोग बसात आज अन्न प्रास का भी दिन है तो बृजेश्वर एक चमत्कार मानो बर्ष गाठ के अवसर पर जैसे गोकुल में सबको निमंत्रण दिया गया था बुलाया गया था ऐसे वत्स चारण महोत्सव के समय सभी बृजवासी
हों को बुलाया गया मंगल गान करती हुई ब्रज युवतियां सुंदर वेशभूषा सुसज्जित मंगल द्रव्य पूरित थाल दल की दल गोपियां भवन में पधार रही हैं जहां बाबा लाल जू और यशोदा मैया बहुत सुंदर नीलमणि श्री लाल जू का श्रृंगार किया उमंग में भरे हुए बोर मुकुट धारण की हु कितना सुंदर रूप विशाल नेत्र कमल नयन विशाल भाल कैसी सुंदर मोहिनी नासिका कैसे सुंदर अधर यह रूप ऐसा है कि बस देखते ही रोते रहो और कुछ नहीं आनंद का रुदन इसमें होता है महाप्रभु चैतन्य देव हा मोर प्राणनाथ हा
कृष्ण हा मोर 18 वर्ष गंभीरा में रुदन अनवरत निर रुदन य ऐसे प्रेम बप है ऐसे प्रेम बप मतलब कैसी दशा वो तो भगवान है साक्षात एक दिन देखा महाप्रभु खून खून ऐसे थोड़ी झपक लग गई थी निद्रा की क्योंकि रात दिन जगते रहते थे निज परकर जो गोविंददास थे प्रभु प्रभु प्रभु यह क्या और प्रभु ऐसे ऐसे हे कृष्ण हे कृष्ण बस ऐसे रगड़ रहे थे म पकड़ा ऐसे आलिंगन कर प्रभु क्या प्रभु आप ये क्या कर रहे थे बोले बार श्री कृष्ण खड़े व बुला रहे हैं तो रास्ता बना रहा था ये सब ऐसे खून
खून महाप्रभु तब हो कि अब कोई नहीं सोएगा क्रम से रात दिन ऐसे इनका रूप है कि ये तो स्वयं भगवान है स्वयं आचार्य हैं ये नाम जप करते हुए विषम परिस्थितियां दे दे कर के हृदय को इतना मजबूत करते हैं कि प्रेम सह जाए नहीं तो आप क्या समझते हो यह मुस्कुरा के रद तो जीने की सामर्थ्य नहीं आप समझ लो दिल में इतनी सामर्थ्य नहीं कि य श्री कृष्ण मुस्कुरा दे और उनकी मुस्कुराहट सह जाए इतनी सामर्थ यह तो सामर्थ मंत्र नाम गुरु कृपा उनकी कृपा से धीरे-धीरे सहत सहत बाढ़ है भगत गृह तन गुरु हित गार इतना सुंदर रूप है प्रभु का कि वाणी की सामर्थ ही देखो माई सुंदरता को सागर नील कमल कपोल चिकने उन परे जो कुंडल की झलक और अल्का वली और वो कैसे वाणी की सामर्थ इनके नेत्रों में तो जादू है जादू जादू सोचो यही तो देख के हम आपसे कहते हैं कि आप चिंता मत करो बड़े उदार अति उदार भी भी सुंदर जिनको देखा नहीं आपने जिनसे मिले नहीं आप केवल उनके लिए सब कुछ छोड़कर आए हो अब आगे की बात व संभाल लेंगे तुम चिंता मत करो तुम चिंता मत करो अब सोचो ना
मुड़ मुड़ा या जटा रखा है हम काहे के लिए बैठे हैं उन्हीं के लिए तो चले केवल सुन के चले हैं सुन के उन्होंने थोड़ी बात की है हमसे श्रवण सुजस सुनी आय प्रभु भंजन भ भीर त्राहि त्राहि आरति हर हम हृदय की बात कहते हैं वह इस बात पर ऋणी है कि इन लोगों ने मुझे देखा नहीं मैंने बात नहीं की और कितने भड़काने वाले मिले कि कहां भगवान कौन भगवान फिर भी मुड़ मुड़ा के मेरे लिए चले इतना काफी तुम चिंता मत करो इतना काफी है विश्वेश्वर विश्वनाथ भगवान है वो इतना काफी व इतना
ही देखकर अवगुण करे समुद्र सम गनत ना अपनो जान राई के सम भजन को मानत मे वो सुन र आप में बैठे सुन रहे हैं व कोई कण नहीं जहां वो ना हो वत्स चारण के लिए मैया ने श्रृंगार किया है कुछ श्रृंगार रह गया भागे लाल जू मया फिर दौड़ी हाथ अरे पूरा तो श्रृंगार कर लेने दे श्री रोहिणी जी बलराम को सजा रही यशोदा मैया लाल जू को बलराम को तो देखते धैर्य विचलित हो जाता है गोरे रंग के और जब उनको नील वस्त्र धारण कराया जाता है नीलांबर बहुत सुंदर बलराम वैसे जोड़ी तो ऐसी ही रही पीते नील की बचपन से हा थोड़ा आगे चलकर के प्रिया नीलांबर धारण किए सरकार पीतांबर धारण किए और बचपन से बलराम जी नीलांबर धारण किए हैं लाल जो पीतांबर धारण किए हुए हैं अब प्रभु सहज में ऐसे श्रृंगार कराने वाले तो थे नहीं बहुत चंचल मैया बस हो गया ना अब जल्दी हमें सखाव के साथ जाने दो जननी बहुत मनाती है रुक जा लाला पूरा श्रृंगार धारण कराने दे असीम वात्सल्य महा मरकत मल श्यामल अंगों में ऐसी कांति मैया सुंदर सुंदर वस्त्र आभूषण श्रृंगार करते हैं और फिर हट
कर के मुख चंद्र को निहारती है लाला यह जरूर अपने ठाकुर को श्रृंगार करके दर्पण दिखा करके थोड़ी देर हटकर पीछे हटकर दर्शन करना चाहिए नक से सिक तक आज श्रृंगार में कोई कमी तो नहीं रही रोना आता है फिर फिर रोना आता है जब अपने प्राण प्यारे का श्रृंगार करके देखो तो फिर कुछ और ही दिखाई देता है यह सारा खेल भाव का है देखो भाव का है जैसे भाव करोगे वैसे अभी तो रूप में विराजमान है हम नाम सेवा की कह रहे राधा नाम सेवा की जब इत्र लगाकर चंदन लगाकर एक गुलाब के फूल के
बीच में से ना वही जुगल सरकार की झांकी मिलती थी एकदम विकल हो जाते घंटों श्रृंगार के बाद रोना आता था बस वो केवल भा जुड़ने की बात है जोड़ दो तो बस सब कनेक्शन जुड़ जाए तो बस वह आनंद समुद्र है मैया देखकर कहती मेरा नीलमणि नित्य नव सुंदर लगता है ऐसा लगता है मैंने कभी देखा ही नहीं क्षण क्षण में इसका रूप लावण्य बढ़ता जा रहा है आज मैंने इतने श्रृंगार धारण कराए इतना सुंदर लग रहा है कहीं मेरी ही नजर ना लग जाए जननी तिनका तोड़ते ऐसी सखियां प्रिया प्रीतम चंदन के वृक्ष में झूला पड़ा है सुंदर झूल रहे पैंग बड़ी प्रियालाल एकम एक हो रहे तो हित चिंतक निज चेरिन उर आनंदन समा इतना सुंदर रूप मिलित रूप प्रिया प्रीतम का देखकर कहती मेरी ही नजर ना लग जाए इसलिए त्रण तोरत तिनका तोड़ती अंगुलिया चुकाते है बलिहारी जाती हित चिंतक निज चेरिन उन आनंदन समात निरख निपट नैनन सुख ण तोरत बलि जात जननी हृदय से भगवान नारायण से प्रार्थना करते हैं कि हे नारायण सर्व भय हारी मेरे पुत्र को किसी की नजर ना लगे आज प्रथम दिन है ये गैया चराने
जा रहे हैं और पीछे कई ऐ से अमंगल हो चुके हैं कहीं कोई अमंगल न हो हे नारायण हे हरि मेरे लाला की रक्षा स्वयं हरि की रक्षा करने के लिए हरि से प्रार्थना करती वत्स चरा वन जात कन्हैया उबट अंग अन भाय लाल को फूली फिरत मगन मन मैया निज कर कर श्रृंगार विविध विधि का जल रेख भाल पर दीनी दी लाग केडर जस मति इष्ट देव सो बनती कीनी पूजन आरंभ हुआ कलस स्थापन आदि हीरक माणिक्य वैदुर्य पुष्प राग नीलमणि आदि बहुत से रत्नों को पात्र में रखकर ब्राह्मणों को दान किया यशोदा मैया ने दान दक्षिणा सब हो गई पूजन हो गया बछड़ों का गौओ का पूजन किया और फिर तिलक दिया गोपाल ने सोहत लाल लकुटी कर राती इनकी लकुटी भी टेढ़ी है देखो जैसे राधा पय ब्रज की लताओं की लकुटी ऐसे ही मिलेगी ललित त्रिभंगी टेढ़ ही मिलेगी लकुटी उसे ही कहते उसे तो डंडा कहते जो सीधा होता है सीधा जो होता है उसे डंडा कहते लक तो उसे ही कहते हैं जो सोहत लाल लकुटी कर राती स थन कटी चोलना अरुण रंग पीतांबर की गाती ऐसे ही गोप सब बनिया जो सब श्याम सती अब तो दिव्य सखा के
साथ लकुटी लिए हुए कमर पर फेट पर बंसी धारण किए हुए और गोवत्स का समूह का समूह सुखा साथ है नाच पड़े लाल आज गौ सेवा गोप मंडली देखकर अवाक रह जाती है बछड़े ऐसे कूदते हैं प्रभु को देखकर आनंद बगल कि अब तो साथ मिलेगा ना अच्छा आश्चर्य की बात है कि जिधर श्री कृष्ण जाएंगे उधर सब बछड़े अपने आप हो जाते हैं ना घेरना पड़ रहा है ना बुलाना पड़ रहा है क्योंकि बचपन से इनको दुलार कर रहे हैं चुपचाप जाकर पूरे के पूरे दूध पि आए हैं छोड़ दिए तो सखा तो है ही तो बछड़े जिधर
श्री कृष्ण गोप अवाक रह जा रहे देख के कि चौकड़ी भर भरकर सब श्री कृष्ण के साथ बछड़े श्री कृष्ण मध्य में खड़े हैं नन्हे नन्हे कितने बछड़े आसपास सब और इन्हीं के अवस्था के कुछ थोड़ा बड़े श्री दामाद बड़े हुए सखा सब हाथ में छड़ी लिए हुए सब हाथ ऊपर को उठाते हम तैयार हैं वस पाल नंदलाल की जय हो वत्स पाल नंदलाल की जय हो सब सखा से जय जयकार कर रहे श्री कृष्ण चंद्र बाबा पूज्य जनों के चरणों में मस्तक रखकर आशीर्वाद लेते हैं मैया ने गोप कुल की रीति चाहे ना हो पर नीलमणि बलराम के चरणों में उपा धारण कराए बिना भेजना कैसे संभव है नंगे पैर जाते थे सब गोप गण मैया को लग रहा था इतने कोमल चरण हमारे लाला को पादुका तो कोई मणि में राजपथ तो है नहीं जंगल है मन की पगडंडियों प्रभु को पादुका दी श्री कृष्ण वत्स के बीच से बाहर आए और कहा कि हमारे बछड़ों के पैरों में तो पादुका नहीं है ना हमारे सखा के चरणों में पादुका नहीं है ना मैया मैं कैसे पादुका धारण करूं मैं भी ऐसे जैसे हमारे वत्स बछड़े जैसे ही सखा हमारे नहीं धारण ऐसे हम
भी धारण नहीं करेंगे बहुत प्रसन्न हुई मैया क्योंकि लाला की जो आनंदमय उगन के साथ वह बात हुई तो मैया के हृदय में मेरे लाला को जैसे सुख पहुंचे अब एक गोप शिशु ने संगी ध्वनि बजाई सीं की क्या क्या करना है इशारे से ब सब सखाव को पता हो गया है वचा की प्रणाली का अनुसरण करते हुए सब सखाव के साथ बछड़ों को लेकर के प्रभु चले मैया ने जो बड़े सखा है मक्खन और कुछ खाने के जहां मेरे लाला को भूख लगे तुम सब मिलकर के पाना तथा कृष्ण भव भाव मनु भावता रामे प तथा अनु मतम बलराम के अनुसार चलना जैसा बलराम कहे वैसे ही क्योंकि तू छोटा है तेरी समझ कमजोर है जैसा बलराम कहे भगवान चले हरि वत्स चराव आज मुदित जसो मति करत आरती साजे सब शुभ साज मंगल गान करत ब्रज बनिता मोतीन पूरे थाल हसत ह सावत व बाल संग चले जात गोपाल बछड़ों के खुर से खुदी हुई भूमि में गोपाल जी के कोमल चरण चिन्ह पड़ते हैं यही तो देखकर अक्रूर जी लूट पड़े थे हमारे प्रभु के चरण प्रभु ने पादुका धारण नहीं की ओहो कंकर कंटक इनके विंधने का भय नहीं प्रभु को इस ब्रज भूमि
को चरण चिन्हों से अंकित करते हुए जे पद पदुम सदा शिव के धन सिंधु सुता रते नहीं टार े सदैव भगवान शंकर के ध्यान में रहने वाले लक्ष्मी जी के हृदय में रहने वाले जे पद पदुम सदा शिव के धन सिंधु सुता उते नहीं टारे जे पद पदुम ता त्र सत्रा सत मन बच क्रम प्रहलाद संभारे जे पद पदुम परस जल पावनी सुर सरी दरस कटत अग भारे उन्हीं चरणों से प्रभु नंगे पैर चल रहे हैं पृथ्वी पुलकित हो रही है धरा के अधिष्ठात्री को आज ऐसा अनु मेरे वक्षा स्थल पर प्रभु के चरण चिन्ह बन रहे
हैं अणु अणु ब्रज का परम पावन भगवान के चरण चिन्हो से बृजेंद्र नंदन के सुकोमल चरण पृथ्वी अपने हृदय पर धारण कर वसुधा चा सुधा सेक मेवत दव चरण संचार मनवाना वया सचा योगम तन वाना तदा अनुकूल वषम निर्व शेषम अपने सखाव के साथ व को बछड़ों को चरा रहे हैं ब्रज की रीति अनोखी री माई जो को नंद भवन में आवत ता को मन हर लेत कथाई नित्य प्रभु अब वत चराने जाने लगे नित्य बृजवासन आनंद देते हुए पूरा ब्रज मंडल भगवता अंद में डूबा आज भी य सब भगवता अंद परिपूर्ति है हमारी दृष्टि थोड़ी माया कृत इसलिए अनुभव में नहीं आती किसी ना किसी बहाने से अब ब्रज के बड़े बूढ़े गोपी गोप आने लगे रोज दर्शन करने घन नंद महर के मिस ही मिस आवे गोकुल गोकुल के जितने जन है भ धाम काम आछो बदन निहारी किसी को और काम सुआता नहीं बस नंद नंदन को नि रखना नंद दास नंद लाल सो लागे नयन पलक की ओट मानो बीते जुग चारी ऐसे सब देखते रहते काम काज भूले हुए बस नंद नंदन के रूप को रखना वत्स चारण नित्य का प्रात समय उठ कर के रोज जाना और संध्या काल के पहले ही बछड़ों
सहित आ जाना रोज सखाव के साथ विविध प्रकार के भगवान खेल खेलते हैं कुच वाद तो वेण कभी वंशी वादन कर रहे छे पड़ कभी गेंद खेल रहे कभी छिपता कुचित कभी लुकाछुपी का खेल कर रहे कुचित पाद किनकीनी भी कभी-कभी इतना सुंदर नृत्य कर रहे हैं श्री चरणों के नूपुर और कमर की करधनी एक साथ बज र कुचित कृतिम गोव कभी आपस में सखाव के साथ जैसे बछड़े से खेलते हैं ऐसे बनकर खेल ले वसाया मानव नदत यधा परस्पर कभी ऐसे कुश्ती का खेल खेल रहे अनुकृत जंतु रतु प्राकृत यथा जैसे प्राकृत बालक खेल ऐसे विविध प्रकार की प्रभु कड़ा कर रहे हैं जब थक जाते तब अपने अपने घरों से लाए हुए भोजन को छाक कहते हैं सब खोल कर के बैठ जाते सखन सहित हरि जेवत छाक प्रेम सहित मैया द पठ हित सो बहु विद कीने पाक सखन सहित हरि जेवत छाक सुदामा संग सखा मिली भोजन रुचि कर खात ग्वालन ते कर छाक छुड़ा वत मुख में मेली सरावत जात कभी उसके उससे ले लिया कभी व उसके उससे ले लिया सखा जन बहुत आनंद मचाते हास परिहास करते हुए भोजन प्रसाद पाते जे सुख कान करत वृंदावन सो सुख तीन
लोक विख्यात सूर श्याम भग न बस ऐसे ब्रह्म कहावत नंद तात आहा जो ब्रह्म परमात्मा है उनके पिता नंद बाबा जो नंद नंदन है जो सुख वृंदावन में बरसा रहे हो तीनों लोकों में नहीं है प्रातः काल वन में जाना सायंकाल लौट आना और वही मध्यान में जो ब्रज गोपियों के द्वारा दिया हुआ है वो भोग पाना कमला नायक बैकुंठ दायक दुख सुख जिनके हाथ कां कमरिया हाथ लकुटी बिहर बछर नि साथ कंश को पता चला कि गोकुल खाली हो गया है अब और शंका हो गई गोकुल खाली हो गया इसका मतलब मेने मारने वाला वही है क्योंकि उसने पूतना को मारा तणाव को मारा सटासर को मारा इसका मतलब वही कहां गया हंत सत्यता सारण देव्या वचना सारण नंद गोप ता दंभ एव सकोप गोपि संभाव्य देवी ने कहा था तेरा मारने वाला पैदा हो गया मुझे पक्का हो गया नंद गप के यहां पैदा हुआ क्योंकि उसी के यहां पूतना मारी गई उसी के यहां णा और वो भाग गए गोकुल से भाग गए वृंदावन गए का मतलब है मेरे डर से भयभीत है इसका मतलब है मेरे मारने वाला अब नंद के यहां पक्का हो गया नंद गोपाल उन्हीं के पास है येन
नूतन वायव नाप दु महसा अभी नूतन अवयव छ दिन के थे तब दुश महसा पूतना देव महान बलशाली पूतना को मार दिया वही है वही है मेरे मारने वाला वही सहसा ंभ भीरिया व्रते विद्या सेना लभ नीयता लंबित जो आवर्त रूप से महा बलशाली त्रवर्त उसको भी मार डाला तस्मा दस लत त कनिया वो छल करके कहां तक बचेगा देवी की बात परम सत्य होगी उसके अनुसार प्राण अपरण करने वाले ने जन्म ले लिया तो निश्चित है वो नंद पुत्र का छद्म वेश धारण करने वाला जो पुत्र है वो साक्षात भगवान कोई और नहीं है स्पष्ट है इतनी छोटी छह दिन की आयु में बलवीर से पराक्रम से असीम पूतना को मार डाला उसके बल पर गंभीरता का विचार करना यह अब उखाड़ फेंकने का समय है सूचना मिली सखाव के साथ बछड़ा चराने जाता है शरीर काप रहा है कंस का कभी उठकर खड़ा होता घूमता विचार करता है कैसे चिंता की धारा बछिति रिक्तम युक्त मेवत प्रयुक्त वंता तथापि कर्थी भुय व्यर्थ भूता क्या छल से व मारा जा सकता है नहीं जो छल का प्रयोग करते हैं उससे बड़ा छल वो कर लेता है उसको छल से कैसे सभी व्यर्थ
हो जाएंगे कैसे मारा जाएगा द वारिक सहसा वो उठा और द्वार रक्षकों को आज्ञा की इसी समय सभी गुप्त चरों को हमारे पास बुलाया जाए चर अपने महाराज के आशय से चिर परसित थे आवाज सुनकर हदय धकधक होने लगा आज किसकी आएगी जिसको भेजेगा वह मरके आता है उधर से तो वंदना करने लगा महाराज कंस भयभीत महाराज भी किसी अन्य भूमिका के बिना ही तुरंत बोल उठे आ तो मप कतम जात क श्याम तस दर स्ने भरस परमा परामर्श क्या रे तुमने भी देखा क्या कि उस नंद पुत्र का सबसे अधिक प्रेम किस पर है किसका आदर वो करता है मेरा तात्पर्य है मनुष्य पशु पक्षी कीट पतंग किस जाति के प्राणी से व प्यार करता है उसके आदर के पात्र कौन से प्राणी हैं इसी चरण यशोदा के नील सुंदर की उस मनोहर वत्स चारण लीला के दर्शन किए थे गुप्त चर जो था उसी ने बताया था जाकर कि गोकुल छोड़ दिया वृंदावन में वोह बछड़े चलाता है अपनी आंखों से देखा था श्री कृष्ण बछड़ों को बहुत प्यार करते हैं कभी पीतांबर से ऐसे पूछते कभी हाथ से कभी मुख से चुंबन भी करते बछड़ों का किसी गोवत्स को कंठ से
लगाते हैं गोवत्स को बहुत प्यार करते हैं उसने बताया कंस को कि वह जो नंद नंदन है उसको प्राण प्यारे गोवत्स है वह अपने हाथ से उनको दुलार करता है देव गोवत सेशु तद से कहा प्रति यते नाच वो गोवत्स पर बालक बहुत प्रेम करता ऐसा मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है बस इतना जानना था गुप्तचर को लौट जाने का आदेश होता है दूसरे क्ण अंग रक्षक सेवक को आज्ञा मिलती आ काता पूरत सावत सासरा कंस के मुख में एक प्रसन्नता छा गई क्योंकि वत्सा सुर नाम का महाबली एक राक्षस था जा तुरंत सासुर को हमारे सामने हाजिर करो आ काता पूरत सावत सासुरा फिर नीतिज्ञ कंस व सासुर दैत्य की प्रशंसा करने लगा कि तुम्हारा बल तुम्हारा वीर्य तुम्हारा साहस बड़ा प्रशंसनीय है वत्स वत्सु तुम हमारे बहुत वंदनीय हो बहुत प्रिय हो गछ नंदस बजम गत्वा वत्सा चर्यता कुमारे तत् कुमारसन जम वत्स वेस मुपाद तसपुर अब तुम वृंदावन जाओ मेरा एक काम करो वहां नंद का कुमार वत्स चारण करके कुमारो चित क्रीड़ा करता है उसके समीप तुम्हें जाना है इस राक्षसी रूप से नहीं एक गोव का
रूप धारण करो बछड़े का और बछड़ों में मिल जाओ और जब वह अस सावधान हो तब उस पर घात करके उसे मार डालो समान विचार समान चेष्टा होने व बहुत प्रवीण है अर्थात बछड़े जैसी ही चेष्टा बछड़े जैसा ही रूप हो और जब वह धोखे में हो तब तुम मार डालना वत्स दैत्य के अनादि काल से जो आसुरी भाव था आज अंत होने वाला है भगवत साक्षात्कार यह मर्ष वशिष्ठ की नंदिनी के वचन सत्य होने जा रहे हैं एक दिन यह वत्सा सुर ही मुर का पुत्र प्रमिल नामक दैत्य था य अमर विजेता प्रमिल भाग्य क्रम से किसी दिन वशिष्ठ जी के आश्रम की ओर जा निकला वहां कामधेनु नंदनी पर उसकी दृष्टि पड़ी देखते ही वह लुभ मान हो गया उसे प्राप्त करने की इच्छा से प्रमिल ने ब्राह्मण का वेश मनाया फिर वशिष्ठ से नंदिनी की याचना की महर्षि ने मना कर दिया कि कदा आप संभव नहीं यह तो हविष्य देने वाली फिर वशिष्ठ जी ने देखा कि राक्षस है ब्राह्मण बनकर तू मुनियों की गायों का हरण करने आया है तू तो मुर का पुत्र दैत्य है दुष्ट बुद्धि तू छल करके ऐसी बात कर रहा था गाय चाहिए जा गोवत
स्वरूप हो जा तो राक्षस वत्सा सुर इसलिए इसका नाम पड़ा अगणित वर्ष तीत हो गए राक्षस बले हुए नाना प्रकार के कष्ट पाते हुए अब ये भगवान का कृपा प्रसाद पाने वाला है स्वयं भगवान बृजेंद्र नंदन श्री कृष्ण चंद्र को अचिंत लीला महाशक्ति ने संकेत किया प्रभु आज माखन ज्यादा पा लेना एक आ रहा है वत्सु आपको उसका उद्धार करना है कंस के मन में यह था कि वत्सा सुर महा बलवान है निपटा देगा फिर शंका हुई कि बड़े-बड़े बलवान उससे नहीं जीत रहे ऐसा ना हो कि यह भी मारा जाए बहुत दु चित बहुत जल रहा उधर वृंदावन का अनुपम दृश्य भगवान कृपा करते तब वृंदावन का दर्शन होता है रजनी का विश्राम प्रातः काल वेला भगवान कृष्ण बलराम जागे वही दिनचर्या प्यार से उठाना मुख पोछना सुम भोजन से तृप्त करना फिर स्नान करवाना फिर मनोहर वस्त्र आभूषण धारण करना फिर सत सत गोप सखा हों को बुलाना और गोवत्स से आवृत होकर वन में चले जाना पहले संगी ध्वनि से आकाश पूर्ण होता फिर वंशी ध्वनि से चर अचर स्थावर जंगम सबको आनंद फिर कलिंद नंदिनी के दर्शन करके तट का
अनुसरण करते हुए गिरिराज परिसर की ओर दूर वनस्थली में भगवान चले जाते बछड़े लेकर अब तो अनुशासन कम हो गया था क्योंकि जान रहे थे कि कई दिन से बराबर बछड़े सुरक्षित आते हैं प्रभु भी सुरक्षित आते हैं राम श्याम सकुशल घर लौटते इसलिए अब मैया ज्यादा नहीं समझाती गोव गो बछड़े त्रण चरने लगते और प्रभु अपने सखा के साथ बट की छाया में बैठकर उनका निरीक्षण करते कभी खेलने लगते अब ये असुर आया सबसे पहले वृंदावन का दर्शन किया दिव्य वृंदावन भगवान बछड़े चढ़ा रहे हैं और धीरे से बछड़ा बना और जो वत्स है उनके बीच टोली में आकर मिल गया भगवान श्री कृष्ण की दृष्टि पड़ी हम पहचान रहे तुमको खेलो तुम भगवान पहली दृष्टि में देख ले उनसे क्या बचना है और वो समझा कि कोई जाना नहीं त्रण चरने का अभिनय कर रहा है और धीरे धीरे हर बछड़े को हटाता हुआ कृष्ण बलराम के समीप पहुंचने की चेष्टा कर रहा है किंतु सहसा एक नई बात हुई उसके निकटवर्ती गोवत्स ने जब देखा कि इसकी गंध कुछ और है और इसकी चाल कुछ और है तो अपने छोटे छोटे नन्ने नन्ने सिंघ से
मारा क्योंकि गंध नहीं आई यह हमारे परिकर की गं नहीं राक्षस की गं ज बछड़े ने मारा तो वह पूछ उठा करके लेकिन कंस ने सिखाया तो कोई नई चाल नहीं वैसे ही चाल होनी चाहिए श्री कृष्ण चंद्र जी की दृष्टि केवल उसी पर थी कि कहीं किसी बछड़े की किसी सखा की हानि ना कर दे बृहत भ्राता प्रात नाया परिचय देवा कोयप तोयं प्रतित वत्स दोनों भैया प्रात काल मेरे साथ तो यह वाला बछड़ा आया नहीं था तुम पहचानते हो बलराम जी से कहा बता सकते हो ये वो कौन सा बछड़ा है व जो पूछ उठाया हमारे बछड़े ने मारा और हटा तुम्हे दिखाना अग्र बलराम जी जो अग्रज है उसो दृष्टि नहीं दी उन्होंने कहा भ्रात नहीं नहीं मैंने ऐसा कुछ नया नहीं देखा अपने ही बछड़े हैं भैया मैंने तो निरूप ता एक बार देखो मैं तो कुछ और दिखाई दे रहा है ठीक से देखकर बताओ अर्थात अपनी ब्रह्म दृष्टि से देखो बलराम जी ने जब भगवान का संकेत पाया भीषण प्रकृति प्रति यते भ्राता अरे यह तो भीषण प्रकृति का राक्षस है भैया यह कोई बछड़ा नहीं है यह तो अत्यंत भीषण प्रकृति का है अभी बलराम जी
की बात पूरी होती पूर्वज पूर देवय दाऊ भैया दाऊ भैया यह अदवसि तो बलराम जी ने कहा सत्यम यमा दसमा वसु चा कस्मा दृष्टि जा दृष्टि दृश्य तुम ठीक देख रहे हो हम लोग अपने गोवत्स में अकस्मात इसकी कितनी कूर दृष्टि है यह मैं देख पा रहा हूं बृजेंद्र नंदन के मुख पर रोष आना शुरू हुआ और अपने बड़े भ्राता के कान में धीरे से कहा यदि भव दिम य्या तर हेतम दृष्टांत मासा दयामी आज्ञा हो तो इसको पहुंचा दे इशारा बलराम जी से ले आज्ञा हो तो भ्राता इसको पहुंचा दे अपने अनुज को यह अनुमति प्रदान करने में रोहिणी तने को झिझक हुई फिर हस करर उन्होंने कहा कि आप तो बल के केंद्र है पर सावधान अवश्य रहना सल मेत सल मेव मंद मंद मव स्कंद देखो भैया यह छलिया छल करके आया है तो इसके पास छलिया बन कर के ही जाओ ऐसे जाओ जैसे यह आया है ठीक हैता सब बड़ों को ऐसे दुलार करते हुए जा रहे मानो भगवान पहचान ही नहीं पाए सब बड़ों को दुलार करते धीरे धीरे उसी के पास पहुंचे और बछड़े के रूप में आए हुए दैत्य को देखा बलराम जी से कहा यही है ना इशारे से पीछे
से बलराम जी आगे से प्रभु यही है तम वत्स रूपण ष वस युथ गतम हरि दर्शन बल देवाय सनेर मुधवा सद यही है ना यही बलराम जी ने कहा यही है नजदीक पहुंचे ब जाकर दोनों पैर पकड़े और घुमा कर के पृथ्वी पर दैत्य पश्चिम पादा ब्याम हरि मन से तता पीछे के दोनों पैर पकड़े भगवान श्री कृष्ण ने और घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया चक्रा का घुमाकर दो तीन बार घुमाकर वत्सा सुर की हर हड्डी चटचट करके चकना चुर हो गई महाबल विक्रम केंद्र भगवान एक ही बार पटकने में निष्प्रभ दे है कैथे का वृक्ष था उस पर फेंक दिया बड़े-बड़े कैथे पके जो लगे थे सब नीचे अब जब शरीर छूटा बछड़े के रूप में जो वत्सा सुर भयंकर राक्षस शरीर विशाल काय दैत्य दे कई कैथे के पेड़ टूट गए कई कपित तर एक दूसरे के आघात से छिन्न भिन्न हो गए वत्सा साई जो वसर था धराशाई हुआ ग्रवा पर पादाम सलाल मत ब्रावा कपित ग्रे पहिरो गति जीवितम सा कप पात मान प्रपात पूछ सहित ले पिछले पाए दियो फिराय फिराय बगाए महाकाय ऊपर ही मारो बहुत कपि थन ले धर पर सब सखा देखकर आश्चर्य गए भैया कन्हैया
तुमने पहचान लिया नहीं राक्षस हमारे बछड़ों का हम सखाव का अनिष्ट कर देता अब वो श्री कृष्ण सब गले लग रहे आलिंगन कर रहे हैं उत्साह से ताली बजा रहे मेरा भैया कृष्ण इतना बलवान है ऐसे ही गर्भ में रहना चाहिए प्रभु के बल से मेरे प्रभु मेरे प्रभु सभी बालक श्री कृष्ण चंद्र को छाती से लगाते हैं दुलार करते हैं आशीर्वाद देते हैं मेरे भैया को कुछ नहीं हुआ मेरे सखा को कुछ नहीं हुआ तम विस्मिता बाला ससस साधु साध अभ आश्चर्य धन्य है देवास परि संतुष्ट ब पुष्प वर्षण इतना बलवान था वत्सा सुर जब मारा गया तो देवता विमानों पर आकर सुमन वृष्टि भगवान पर कर रहे देवास परि संतुष्ट बभु पुष्प वर्णा गोप शिशुओं के समुदाय ने देखा त दैत्य महाज्योति कृष्ण लीनम ब उस मरे हुए वत्सा सुर से दिव्य ज्योति तेज निकला और भगवान की परिक्रमा करके भगवान में लीन हो गया योगेंद्र मुनि दुर्गम गति उस वत्स भगवान ने उसके चरण पकड़ करके अपने कर कमल से उद्धार किया तन दनुज दमन मनोहर महे लालस लालस निज सहचर निकु भगवान की परम पदवी जो बड़े-बड़े योगियों
के लिए दुर्लभ है दनुज को प्राप्त हुई अब जाकर के सब ब्रजवासी ने अपने अपने घर में और मैया मैया तो डर गई हम इसीलिए नहीं भेज दे प्रभु ने कहा मैया तुझे डरने की जरूरत नहीं हमारे साथ दाऊद आदा फिर नारायण भगवान का आशीर्वाद भी है ना भैया ने कहा नारायण के आशीर्वाद से ऐसा हुआ नहीं इतना बड़ा वत सासुर तू कैसे बचता भगवान वत्सा सुर का उद्धार करके नित्य दिनचर्या में धीरे-धीरे अब दूर गौवे चराने जाने लगे हंस को जब पता चला कि वत्सा सुर मारा गया बहुत चिंतित उसने सोचा
कि दूसरे तैयार थे पूतना के भैया जी बकासुर उन्होंने कहा प्रभु आप चिंता ना करो मेरी चोच वज्र की है ब आ जाए हमारी चोच में बस ऐसे बिल्कुल चिंता मत रबड़ी दूध दूध खवा रहा है बकासुर को खा ले ले दो आज कल इनकी भी होश ठिकाने कर देंगे प्रभु शेष चर्चा ग श्री राधा वल्लभ लाल की
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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