॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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मन को एकाग्र और शान्त करने का अचूक उपाय / कुवलयापीड हाथी का उद्धार / चाणूर और मुष्टिक का उद्धार

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

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वृंदावन स्वरी तैव पदारविंदम प्रेमा मृत मकरंद रसो पूर्णम हदर पितम मधुपति स्मर ताप मु ग्रम निर्वा पय परम शीतल मा शयाम परम शीतल मा श्रय परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नव निवत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले युगल सरकार प्राणा आराध्य प्राण प्रिय श्री प्रिया प्रीतम जू समस्त सहरी वृंद खग मृग पशु पंछी तरु लता यमुना रस रानी जी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिकर इनके चरणों में कोटि शह प्रणाम कोटि शह नमन नमस्कार श्री प्रियालाल के पावन धाम की निष्ठा न जाने कितने जन्मों से हम भटक रहे हैं आज मिली है जाकर निष्ठा का तात्पर्य है भगवत प्राप्ति सीधे समझो एक है साधन पद्धति से चलते हुए मन और चित्त को भगवता का करके भगवत प्राप्ति एक सुविधा भगवान ने भूमंडल में रखी है धामों की परियों की कि अगर इनमें निष्ठा पूर्वक वास किया जाए तो जो साधना से भगवत प्राप्ति में हो सकता है कि विलंब लगे या कई जन्म लग सकते हैं लेकिन धाम में ऐसा संशय नहीं अगर कोई महत अपराध बन जाए तो बहुत बहुत एक

जन्म और लगेगा पर धाम निष्ठा वाले को धाम में ही जन्म होगा और फिर धाम में ही शरीर पूरा होकर श्री प्रिया प्रीतम की प्राप्ति हो जाएगी बड़े सौभाग्य उदय हुए जो हम लोगों को परम पावन महामहिम श्री धाम वृंदावन का वासी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ श्रीपाद प्रभु दन जी महाराज कह रहे हैं क्वा धर्मम र्थ कामो विमुक्ति मसी भक्ति वात तत साधनानी राधा कृष्ण सेवित केप धन्या वृंद वा समा मृत्यु कुर्य छोड़ो आशा धर्म की भी अर्थ की भी काम की भी और मोक्ष की भी यह चारों आशाएं प्रेम प्राप्ति में बाधक है इसीलिए हरिवंश महाप्रभु ने कहा धर्मार्थ चतुष्टय विजय ताम किम तद व्रथा वार्ता धर्म अर्थ काम मोक्ष की मेरे सामने व्यर्थ की वार्ता मत करो क्योंकि मुझे प्रेम चाहिए प्रियालाल का प्रेम प्रेम पंचम पुरुषार्थ है जो चारों पुरुषार्थ कहे गए हैं धर्म अर्थ काम मोक्ष इनका जो त्यागी होता है और भगवत भजन परायण भगवत आसक्त चित्त वह प्रेम को प्राप्त होता है वैसे धर्म और मोक्ष के तो प्राया सब त्यागी है विरला ही कोई धर्म से चलता है नहीं

तो धर्म त्यागी है और मोक्ष तो बड़ी दुर्लभ बात है उसके तो सब त्याग कोई करोड़ों अरबों में एक आद मोक्ष प का अभिलाषी होगा मुमुक्षु नहीं तो अर्थ और काम रूपी पिशाच में सब फसे हुए हैं लेकिन यहां उस महापुरुष की बात कहते हैं जो धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों का अधिकारी है पर उसे नहीं चाहिए उसे भगवत प्रेम चाहिए तो कह तक्वा धर्मम चा अर्थ काम अ विमुक्ति क्वा तो तब हो जब हमारे पास मलो हमारे पास 00 रुपए है हमने 00 रुपए का त्याग किया तो माना जाएगा त्याग है अब रुपए ही नहीं हम बोले एक अरब के त्यागी है है रुप नहीं तो यह उपहास ही तो होता है तो हमारे अंदर धर्म संपूर्णता अर्थ की बाहुल्य कामनाओं की पूर्ति के पूरी सुविधाएं और मोक्ष की पूर्ण अभिलाषा और मोक्ष पद का अधिकार यह सब प्राप्त होने पर भी हमें नहीं चाहिए प्राप्त होने पर भी हमें नहीं चाहिए हमें प्रेम चाहिए उसे कहते चार पुरुषार्थ का त्याग धर्म अर्थ काम मोक्ष मुझे नहीं चाहिए यह बहुत बड़ी बात है मतलब बहुत बड़ी बात है लाखों में कोई एक भगवत मार्ग में चलना चाहता है

चलने वालों में मनोरज में फस जाते हैं बहुत कोई विरला निकल पाता है निकलने वालों में कोई विरला प्रेमा सक्त हो पाता है जैसे रामचरित मानस में भगवती अंबा जी भगवान शिव से कहती हैं हजारों पुरुषों में हजार में नहीं हजारों पुरुषों में कोई एक धर्मात्मा होता है हजारों धर्मा आत्माओं में कोई एक वैराग्य वान होता है और लाखों वैराग्य वान में कोई एक ज्ञान को प्राप्त होता है और हजारों ज्ञानियों में कोई एक जीवन मुक्त होता है हजारों जीवन मुक्तो में कोई एक माया मद से रहित भगवान का प्रेमी महा भागवत होता है बड़ी दुर्लभ बात है भगवत प्रेम चवा धर्मम चार्थी भक्ति और ईश्वर की भक्ति की भी कोई परवाह नहीं जैसे हरिवंश महाप्रभु कहते हैं धर्मार्थ चतुष्टय वि जयता किम तद व्रथा तया सै कांत स्वर भक्ति योग पदम त्वा रोपिना मुर्धनी ईश्वर की एकांतिक भक्ति को भी माथ जोड़कर प्रणाम करते हैं ईश्वर शब्द से भगवान की भगवता का महिमा है और लाड़ली लाल की उपासना में भगवता का विस्मरण है मेरे प्राण प्यारे लाडली लाल यहां भगवान लाडली लाल नहीं

कहते यहां भगवान राधा वल्लभ लाल नहीं कहते भगवान बांके बिहारी नहीं कहते यहां भगवान राधा रमण नहीं कहते नहीं श्री राधा रमण लाल जू अत्यंत दुलार ऐश्वर्य का विस्मरण यह निकुंज रस है वही प्रभु पर इतनी आत्मीयता बढ़ गई है कि अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक परात्पर ईश भगवान प्रिया जू की सहचर की चरण वंदना करते हैं प्यारी जू के सेवा सुख की प्राप्ति के लिए अब यह बाहर के लोग बात नहीं जानेंगे यह महल की बात है अंदर की इसीलिए इतना महा सुख है सोचो जो प्रभु प्रिया सेवा के लिए सहचर की चरण वंदना करते हैं चाटुकारिता करते हैं उन प्रभु के महा रूप सौंदर्य लावण्य और ऐसी प्रिया जू का महा प्रेम महा दुलार दासी वत सला कर राधा और ऐसे प्रियालाल को स्नान कराना वस्त्र धारण कराना सुंदर इत्र लगाना अंगराग चंदन पत्रावली पुष्प आभूषण श्रंगार भोग आरती चरण चापना सन कराना आठों पहर सेवा में मगन रहने का सौभाग्य केवल दर्शन जिन जिन महापुरुषों को हुए भगवान के तो उनकी दशा बदल गई और इन्हीं प्रभु को जब हम अपने कर कमल से स्नान कराएंगे प्रियालाल

को को अंग पूछेंगे वस्त्र धारण कराएंगे इनको आभूषण पहनाए चंदन लगाएंगे पत्रावली करेंगे भोग लगाएंगे जल रेंगे आरती करेंगे यह महा सुख इसीलिए क मुझे धर्म अर्थ काम मोक्ष नहीं जाए कैसे पान की प्रसादी श्री जी देती एक दिन बड़े भाव में भर करर वैसे तो पहले प्रिया जू को हमारे यहां भोग लगता है पर लाडली जू के प्राण प्यारे प्रीतम है तो लाडली जू ने पान की बीड़ी जब लाल जू लाडली जू के मुख की तरफ की तो लाडली जू ने कर कमल पकड़ कर के लालु के मुख में पवाया ललित नव लवंग दार करपूर पूरम प्रीतम मुख चंदो गरण तांबूल खंडम अब लाल जू ने प्रिया जू के सुख के लिए थोड़ा तांबूल चपाया और लाड़ली जू के मुख कमल में प्रदान किया प्रीतम मुख प्रीतम के मुख से श लाल अब लाडली जो देख रही थी जो सेवा में मगन दासी थी तो सजनी जी को बुलाया इशारे से और अपने मुख कमल से कपोल पर कपूल मिलाकर व पान प्रसादी सहचर को दी यह महा सुख जिन लाडली जू का ध्यान बड़े-बड़े ईश्वर कोटि के महापुरुष नहीं कर सकते वो लाडली जू मुख में चबाए हुए पान के बीड़े को अपनी

सहचर के मुख में मुख से प्रदान कर रहे हैं ललित ल बंगो दार करपूर पूरम प्रीतम मुख चंदो गरण तांबूल खंडम घन पुनक कपोला स्वाद अति मदा प कि वत्सला कर राधा ऐसी दासी वत्सला श्री स्वामिनी जो ऐसे सुख प्रदान करती इसके आगे मोक्ष क्या है करोड़ों मोक्ष सुख भी इसकी समानता नहीं कर सकते अब क ईश्वर की भक्ति जो भगवान श से उत्पत्ति च विनाश च भूता नामा गतिम गतिम वेति विद्या म विद्याम सटार भगवा जो इस सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं विनाश करते हैं इसका पालन करते हैं जो विद्या अविद्या के स्वामी है भूतों की गति और अति का निर्णय करने वाले हैं वही ईश्वर वही भगवान है श्री कृष्ण कोई और थोड़ी है पर भगवता में भाव आने पर फिर प्रेम नहीं रहता जैसे थोड़ी भगवता वात्सल्य में दिखा दी भगवान ने जब मैया ने कहा ने मिट्टी खाई है दाऊ दादा भी कह रहे हैं और छड़ी उठाई मुंह खोल तो प्रभु ने मुंह खोला अनंत ब्रह्मांड दिखा दिए मैया कांप गई अरे मेरी य कैसी बुद्धि कि मैं अपने को नंदरानी समझती हूं ब्रज की अधिष्ठात्री मानती हूं अरे यह तो मेरी

बुद्धि कैसी यह तो परब्रह्म परमात्मा है थोड़ी देर में ही वात्सल्य ने श्वर को कहा हम अधिकार है और ऐश्वर्य अंतर ध्यान हुआ मैया बोल पड़ अरे तो मेरी निगड़ी आंखों का दोष था यह तो मेरा लाला है और गोद में बैठा लिया जहां ऐश्वर्य आता है वहां भाव दब जाता है फिर माधुर्य रस श्रृंगार रस कांता भाव यहां तो ऐश्वर्य में देखो ना ऐश्वर्य दिखाया तो प्रेम में भंग हो गया विकल आ गई भगवान अंतरध्यान हो गए यही तो ईश्वर इनका है लेकिन महा माधुर्य रस निकुंज में एक बार भी अंतर्धान की कोई बात नहीं आती इसलिए कह रहे हैं कि हमें ईश्वर की एकांतिक भक्ति को भी नमस्कार है मुझे ऐसा नहीं चाहिए मुझे वह माधुर्य महा माधुर्य मेरे प्रियालाल मेरे लाड़ली लाल यह भगवान है इसका भी विस्मरण मेरे लाड़ली लाल तो कह रहे विमुक्ति और मसीम भक्ति वात मुझे ईश्वर की भक्ति भी नहीं चाहिए और बड़ी बात कह रहे ध्यान से सुनो तत साधनानी भगवत प्राप्ति के मोक्ष के जो साधन वो भी मुझे नहीं चाहिए बड़ी विचित्र बात कह रहे श्रीपाद धर्म नहीं चाहिए अर्थ नहीं

चाहिए काम नहीं चाहिए मोक्ष नहीं चाहिए और हमें ईश्वर की भक्ति नहीं चाहिए और मोक्ष प्राप्ति भगवत प्राप्ति के साधन भी नहीं चाहिए हरिवंश महाप्रभु ने भी कहा दुराद पास स्व जनान सुख मर्थ कोटि सर्वेश साधन निराशा सब साधना हों से चिरकाल तक नैराश्य को प्राप्त होकर के हम क्या एक मात्र श्री किशोरी जू के चरण रज का आश्रय यो वृंदावन शीम नि कचन घना चर्या किशोरी मनिस तत कंकर रसा मृता परम चिते नमे रोचते जो वृंदावन की सीमा में विराजमान श्री राधा किशोरी है इनके चरण की दासता से के सिवा मुझे और कुछ अच्छा नहीं लगता यहां श्रीपाद कह रहे हैं कि जो अर्थ धर्म काम मोक्ष का त्यागी ईश्वर की भक्ति का त्यागी बड़ा विचित्र है और सब साधनों का त्यागी वह केवल श्री प्रिया प्रीतम की सेवा में अनुराग करने वाला राधा कृष्ण सेवितम कोपि धन्य वह धन्य है जो आठो पहर राधा कृष्ण की सेवा में लगा है श्यामा श्याम की सच्ची मानी है सच्ची मानी सेवा के आगे कोई भजन नहीं सबसे बड़ा भजन सेवा आप देख लो जीवन भर कंस के राज्य में रहकर कंस के लिए माला

गथ थे सुदामा माली एक बार भगवान को माला का श्रृंगार किया तो अक्षुण लक्ष्मी भगवान ने उनको कुल परंपरागत ईश्वर बढ़ता रहे इंद्रियों की अखंड साम और भगवान ने सबसे बड़ी बात कही मेरी अविरल प्रेम लक्षणा भक्ति और मेरे भक्तों में अनुराग यह मैं तुम्हें प्रदान करता जिंदगी भर कंस के पोशाक सिलता रहा एक बार भगवान के कपड़े सही नाप करके काट करके सिल करके भगवान को पहना दिया भगवान ने क्या वरदान दिया आपने देखा कूबड़ तीन जगह से टेढ़ी एक बार चंदन भगवान कोल तो सर्वांग सुंदरी बना दिया आप रोज चंदन प्रसाद अपने लगाते हैं प्रभु का आप रोज चंदन घिसते हैं प्रभु के लिए आप रोज चंदन की पत्रावली करते हैं आप प्रभु को प्रसाद पवा के प्रसाद पाते हैं प्रभु को पोशाक पहनाते हैं प्रभु को शयन कराते आपकी सद्गति में कोई संशय विचार करके देखि यदि आपको अ भी लगता है कि हमें कोई साधना तो मतलब बुद्धि मारी गई है और कुछ नहीं भजन का मतलब जानते हो क्या होता है उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते हर समय इष्ट का वृति रहना तो हो आप किसके श्री जी के

कर क्या रहे हो श्री जी की सेवा किसके लिए कर रहे हो भगवत प्राप्ति की हो गई बीच में जो असाधारण कैसे अच्छा लगता है तुम्हें चक्क नींद कैसे आती यह नहीं नहीं खान पान ते भावे है नहीं कोमल वसंत सुहावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आसिक का मग न्यारा है सिद्धांत से चलो ठाड़े बैठे परे उता कबीर कहे हम रा ठिकाना खड़े हैं या बैठे हैं हम समय भजन में अब हमारा क्या भजन है बिक चुके भाई हम बिके हुए हैं अब हमारा भजन क्या है अब भजन करें श्री जी समझ रहे क्या भजन हम उनके हैं इस बात विसर हो ना विसार हो विसार हो अब आप भजन करो विसार नहीं हमें हम भी कोशिश कर रहे हैं आपके बल से कि आपको ना भूले लेकिन हम भूल सकते हैं क्योंकि आपके माया रचित है और आप माया को प्रकट करने वाले है आप मत भूलना हे अब ये रोना धोना इस बात के हमारा कल्याण करते सब ये नहीं तो बस यह है कि मेरी लाड़ली है बस कहां हम तुच्छ परम अधमा प्राण ग कमा कहा मुझे ऐसा संबंध मिला महारानी जो हमारी बस इस आनंद से रखत नित्य विहार पुलकित तन रोमा वली आनंद नैन सुधार य

आनंद कोई इसके थोड़ी कि बचा लो मुझे नरक से हम चलेंगे तो तुमको भी घसीट के लिए चलेंगे पक्का समझो यत्र यत्र मम जन्म कर्म भीर नार के परमे पदे थवा तोरा निकुंज मंडली तत्र तत्र ह में विराज अब हृदय आपका घर है जा ले चलो अरे बड़ी मस्ती का मार्ग है हम आपके आप हमारे बस अब होड़ लग गई हमारी और आपकी होड़ है आप भी ना विसार ना हम भी विसार नहीं कोशिश करेंगे हम हम कोशिश करेंगे लेकिन आपको कोशिश तो करना नहीं सर्वज्ञ त्रि कालज्ञ बिल्कुल निर्भय रहो यार अगर तुम निर्भय भयभीत हो तो उसका कारण है गलत आचरण बकाया बात पक्की मान लो हम एक दिन पूछा था कि भजन के सिवा होता क्या है तो सच्ची बात कोई मजाक नहीं पूछ रहे थे कि मतलब किसका चिंतन होता है और होता क्या है अब जो हमारे आपके सिवा कोई है नहीं तो हम किसका चिंतन करें उठते बैठते आप ही का चिंतन है किसी का भी चिंतन होता है तो आपका चिंतन होता है क्योंकि आपके संबंध से चिंतन होता है किसी का पर्सनल क्या रह गया है अब क्या रह गया क्योंकि एक ही परमात्मा सर्वत्र व्याप्त दिखाई दे रहा

है उसके सिवा कोई नहीं हम उसी से लड़ते हैं उसी से प्यार करते हैं जो भी हमारी चेष्टा होती केवल उसी से होती वह देखने को लगता है कि शिष्य है यह अमुक है य अमुक है नहीं हम अपने प्रभु से ही प्यार करते हैं अपने प्रभु से ही लड़ते हैं अपने प्रभु को ही देखते हैं अपने प्रभु के ही चरणों में अपना समर्पण है क्या अब चिंता करनी तो यह जो सेवा प्राप्त हुई है बहुत दुर्लभ वस्तु है सिद्धांत से चलोगे तो माया कभी घसीट नहीं सकती और सिद्धांत छोड़ दोगे तो कभी परमार्थ में टिक नहीं सकते एक लिख लो शब्द लिख लो सिद्धांत से चलोगे तो माया कभी घसीट नहीं सकती और सिद्धांत का त्याग कर दोगे तो परमार्थ में कभी टिक नहीं सकते हजारों बार का अनुभव है इसलिए उपासक जिसको भगवत सेवा मिली है उसे यह ना समझो कि ये भजन नहीं है भज धातु सेवाया सही माने में भजन का अर्थ है सेवा नहीं हनुमान जी दो बार थोड़ी भजन की बात कहते कह रहे हैं काहा हनुमंत विपत प्रभु सोई जब त सुमिरन भजन ई सुमिरन नाम जप आदि को लेके और भजन सेवा को लेके वही विपत्ति है जब

सेवा और सुमिरन छूट जाए सेवा और सुम अच्छा हम किनकी सेवा कर रहे इतना ज्ञान नहीं है क्या अपन को श्री जी की सेवा कर रहे बस उन्मत है हम हम दासत से युक्त है य ठसक कैसे हम प्रभु के दास हैं इससे बढ़कर के अरे सात गांठ कौपीन में इंद्र बापु कौन बोले लंगोटी कैसी बोले सात जगह से गांठ लगी हुई फटी है और बोले स्थिति क्या है बोले बेचारा इंद्र उनके सामने क्या है यह है फकीरी न पारम न महेंद्र धम सार्वभौम र पत्य योग सिद्धि अपन भव यह है भगवान का दासत कि ना परमेष्ठी पद

चक्रवर्ती सम्राट पद ना देवराज इंद्र पद ना योग की सिद्धियां ना मोक्ष पद ये उसकी समानता नहीं कर सकते जिसके हृदय में भगवत दा सत्व आ जाता है तो उपासक को यह समझना चाहिए कि जो हमें प्रिया प्रीतम की सेवा मिली है यह सिद्धि है साधना नहीं सर्वेश साधन वरेश चरम निराशा ये सिद्धि है तो श्रीपाद कह तवा धर्मम र्थ काम विमुक्ति मसीम भक्ति वात तत साधनानी धर्म अर्थ काम मोक्ष ईश्वर की भक्ति और उसके सब साधन हम दूर से त्याग हैं क्या करते बोले आठो प श्री जी की दासता स्वीकार करते हैं सेवका स्वीकार करते हैं कई बार आपको बताया है कि साधन से भ्रष्ट होने वाले को फिर जन्म होगा फिर साधना होगी फिर चूक हो गई तो फिर जन्म होगा फिर साधना होगी जैसे साधन में चल रहे थे श्री भरत जी महाराज चूक हुई हिरण बने फिर साधन हुआ फिर ब्रह्म बोध हुए लेकिन आपको हम बता रहे हैं सेवा में जो रहता है उससे अपराध बन जाए चूक हो जाए या गलती ही गलती होती रहे तो भी उसका अगला जन्म नहीं होगा जगन्नाथ जी की श्री अंग सेवा में रहते थे पूज्य श्री मथुरा दास

जी महाराज की श्री मुख से सुनी हुई वो कुसंग व सात वैश्या संग कर बैठे अब वैश्या में इतनी आसक्ति हो गई ऐश्वर्य था ही उसको अपने पास रख लिया अब श्री जगन्नाथ जी के पार्षदों ने संगोष्ठी की और उनको बुलाया और कहा भाई या आप जगन्नाथ जी की सेवा छोड़े या वैश्या तो उनका चित्त इतना आसक्त हो चुका था वैश्या के रूप सौंदर्य हाव भाव ऐसे तो उन्होंने कहा जगन्नाथ जी को छोड़ते बड़ा आश्चर्य हुआ कि भगवान को छोड़ दिया तो उनको जो उनका धन संपत्ति थी हटा दिया गया उनको वो एक बात खास बात व जगन्नाथ जी की पादुका साथ लेकर गए थे रोज सुबह उठकर पादुका माथे पर रख लेते फिर बड़ा रोग हुआ क्योंकि अपराध बन गया शरीर पूरा हो गया कुछ समय के बाद तो जगन्नाथ जी ने स्वप्न में अपने प्रधान पार्षद को कहा जैसे हमारे अंग सेवियो का अंतिम संस्कार होता वैसा उसका करो नका प्रभु स्वप्ने में कहा कि प्रभु वह स्वप्न क्या साक्षात जैसा ही होता है बोले प्रभु उसने तो आपका त्याग कर दिया था वैश्या को स्वीकार किया था प्रभु आपके पार्षदों जैसा संस्कार कैसे हो

सकता है तो ध्यान देने की बात भगवान ने कहा उनसे भूल हो सकती है वह हमें छोड़ सकते हैं लेकिन हम उनको नहीं छोड़ा हम उन्हें नहीं छोड़ा उनकी वही गति होगी जो हमारे अंग सेवी पार्षदों की होती अस स्वभाव क सुने न देखे ऐसा स्वभाव कोई सुना देखा नहीं गया कि अपने स्वामी का त्याग कर दिया पर स्वामी ने उनका त्याग नहीं किया ऐसा केवल हमारे प्रभु का स्वभाव श्री श्रीनाथ जी महाराज की अधिकारी पद पर श्री कृष्ण दास जी अधिकारी थे किसी कारण से मनमुटाव हो गया वल्लभाचार्य जी के बड़े पुत्र श्री विट्ठलनाथ गोस्वामी से तो एक दिन सेवा में पूज्य पाद श्री गोस्वामी विट्ठलनाथ जी महाराज पर्दा हटाए तो ठाकुर जी गरम गरम जलेबी पा रहे थे यह भी श्री पूज्य म रा दास जी के मुख से सुनी हुई बात तो श्री विट्ठलनाथ गोस्वामी जी ने कहा जय जय बाजार की वस्तु का तो भोग नहीं लगता श्रीनाथ श्रीनाथ जी से और अभी हमने भोग पधरा नहीं आप यह भोग कहां से पा रहे हैं तो उ कहा कि वह अधिकारी जी कृष्ण दस अधिकारी जी आगरे में है उन्होंने एक दुकान में गरम गरम

जलेबी बनते देखा उनके भाव आ गया कि श्रीनाथ जी को पावे तो वहीं से भोग लगा रहे तो हम पा रहे हैं तो उ उनका तो त्याग कर दिया है तो बोले आप आचार्य हो आप त्याग कर सकते हो लेकिन मैं त्याग नहीं कर सकता समझे श्रीनाथ जी ने कहा आप गुरु हो आचार्य हो आप त्याग करने में समर्थ हो लेकिन मैं त्याग नहीं कर सकता एक बार जिसको मैं स्वीकार करता हूं वह कितना भी बड़ा अपराधी हो मैं उसे त्याग नहीं करताय हमारे भगवान का स्वभाव है सेवा सेवा से बढ़कर के मतलब काग भ सुंडी जी का निज अनुभव उन्होंने कहा सेवक सेव भाव बिन भवन तरी उरगा अगर आपका प्रभु के प्रति सेवक भाव नहीं बना तो बात नहीं बनेगी बड़ा सौभाग्य जब श्री महल की टहल का सौभाग्य रसिक महापुरुषों से मिला तब समझ में आया कि अरे सब साधनों का फल सेवा है श्री जी की सेवा है तो श्री राधा कृष्णो सेवितम केप धन्या बोले धन्य है जो प्रिया प्रीतम की सेवा त्रिपुर दास जी हर वर्ष त्रिपुर दास जी ठाकुर जी को बहुत सुंदर वस्त्र रत्न जट पहुंचाते थे और संत सेवा करते थे तो उस समय अन्य

धर्मावलंबी बादशाह था उस काजी जन चिढ़ करके बोले कि ये आपकी खजाने से जरूर बेईमानी करते हैं क्योंकि इतना वैभव संतों को रोज पवा भेट देना और सब तो भगवान की लीला ही समझो बादशाह की बुद्धि पलट गई और उन्होंने आदेश कर दिया कि पूरा जपत कर लिया जाए सब संपत्ति अब पूरी फौज आई एक एक बर्तन तक उठा ले गए कुछ नहीं रखा घर में सब खत्म सब खत्म अब जो राजकी विभाग में था वो जपत जो घर में था वो जपत जो जमीन थी सब जपत कर लिया गया अब राज आदेश एक बर्तन तक नहीं रखा सोचो कितना कष्ट हुआ होगा रोज संत सेवा करते थे भगवंत सेवा करते थे वैभव था सब जपत सब दिन होतना एक समान इसीलिए सुख में फूलो मत और दुख में भूलो मत तो दुख तुम्हारे ऊपर हावी नहीं होगा जैसे तैसे जब सर्दी का समय आया तब याद आया कि श्रीनाथ जी को तो दगला भेजते थे पोशाक भेजते थे अब क्या करें बहुत पीड़ा मन में हुई बहुत पीड़ा और गोस्वामी जी के पार्षद जन आया करते थे लेने तो और एक दो जगह जो सेवाएं थी जब लेने आए उनको पता चला तो वह त्रिपुर दास जी के यहां इसलिए नहीं गए कि

उनको संकोच होगा पता है कि कुछ है नहीं उनके पास राज आज्ञा से सब जप्त कर लिया गया है त्रिपुर दास जी महाराज भगवान की याद में बहुत रोए कि प्रभु हर वर्ष सेवा जाती थी इस वर्ष सेवा नहीं मेरा जीवन धिक्कार है पूरे घर में फिर खोजा कि कुछ वस्तु तो एक दावत रखी थी वो अब बड़े घरों लिखा पढ़ी के लिए सरकारी वो दावा एक रुपए की बिक उस समय एक रुपए का एक थान खरीद कर लाए मार्किंग का मोटी मारग और लाल रंग से रंगा मानो रो रो कर प्रभु से यही कह रहे हो कि प्रभु बस हृदय का अनुराग ही आपको भेज रहा हूं और तो हमारे पास क्या है बहुत संकुचित होकर के जो गोसाई जी के पार्षद आए हुए थे उनसे उनके पास जाकर कहा कि अब सामर्थ्य तो कुछ रह नहीं गई और यह वस्त्र श्रीनाथ जी के लायक नहीं पर भेजता हूं इसलिए कैसी व्यवस्था जैसी बनी अब आप उचित समझे तो इसको ले जाए कम से कम पोशाक के नीचे बिछा देना और इसके ऊपर पोशाक रख देना तो उनके आंसू चल रहे थे बड़ी दनता से तो गोसाई जी के पास ने कहा अवश्य अवश्य इतनी सेवा में तो आ ही जाएगा क्योंकि श्री अंग तो

बिल्कुल नहीं है और ऐसे पहनाया भी नहीं जा सकता कि ठाकुर जी को मार्कन पहना दी जाए और वैभव की कोई कमी थोड़ी ठाकुर जी के पर यह पोशाक के नीचे बिछाने के काम में आ जा बिछा के इसके ऊपर पोशाक रख दे बोले इतना ही सौभाग्य काफी वो ले गए श्री श्री नाथ जी महाराज सर्वांतर्यामी प्रभु कांपने लगे तो श्री विट्ठलनाथ जी गोस्वामी ने जय जय सर्दी लग रही बोले बहुत जोर की बड़ी बड़ी गर्म पोशाक निकाली पहनाया फिर भी कांप रहे रजाइया उड़ाई बहुत सुंदर रजाई होती है कभी आई थी श्रीनाथ जी की प्रसादी रजाई बड़ी कृपा है महारानी जी की भारत के माने हुए जितने भी भगवत धाम है भगवत स्वरूप है सबकी प्रसादी कृपया वृंदावन शवरी यहां भेजती रहती है कैसे अब बताए आप आपको विश्व के जितने भी माने हुए भगवत स्थान है ऐसा कोई स्थान नहीं जहां की प्रसादी लाए बद्री नारायण केदारनाथ और वैष्णो देवी विंधेश्वरी और अपने द्वादश ज्योतिर्लिंग सब जगह का प्रसाद सब जगह के भगत मीरा जी के सब जगह को भगवत प्रसाद अभी कुछ ही समय पहले श्रीनाथ जी की रजाई आई थी अहो

भाग्य श्रीनाथ जी को रजाई उड़ाई श्रीनाथ जी फ बहुत स उ कहा जय जय अब तो समझ में नहीं आ रहा अब समझ में नहीं आ रहा क्योंकि इतनी गरम गरम पोशाक और रजा आपने कभी ऐसा नहीं किया बोले मुझे बहुत सर्दी लग रही है बहुत सर्दी लग रही तो उनका किसी भक्त का कोई वस्त्र ऐसा तो नहीं है जो प्रयोग में ना लाया गया हो और यह लीला कर रहे हो रजिस्टर लाओ जो रजिस्टर सेवा कर बोले त्रिपुर दस रजिस्टर में नहीं चढ़ाया गया था क्योंकि पहनाना नहीं है त्रिपुर दास जी का तो सेवक ने कहा जय जय आप तो जानते हैं राज आज्ञा से सब उनका जप्त हो गया उन्होंने एक मार्किंग भेजी है लाल रंग से रंग करके और वोह अरे बोले जल्दी पोशाक सिलो उसकी इसीलिए इनको सरदी और मार की इनकी पोशाक बोले हा बोले जय जय आपकी ली अच्छी अच्छी गर्म पोशाक रजाई से सर्दी ले गए जब मर्किन धारण की बहुत सस्ती आती है हमारे प्रभु का स्वभाव ऐसा सेवा हमारी महारानी जी कहती हैं राई के सम भजन को मानत मेर भजन का तात्पर्य माला चलाना से नहीं है भजन का तात्पर्य सेवा से है एक राई भर सेवा राई

बहुत छोटा श्री जीी मानती सुमेर के बहुत हमारी सेवा कर द इसलिए अहो भाग्य जिनको श्री लाडली की सेवा मिली है श्रीपाद कर धर्म अर्थ काम मोक्ष ईश्वर की भक्ति भगवत प्राप्ति की साधनाएं इन सबको हम नमस्कार करते हैं बस केवल एक मात्र श्री राधा कृष्ण की सेवा वृंदावन की रज रसियो का संग पूज्य पाद श्री उड़िया बाबा जी महाराज महापुरुषों के वचन समस्त संयो का नाश करके भगवत प्राप्ति में बड़ी सहायता करते हैं पूज्य बाबा जो उपासक अपने मन को एकाग्र और शांत करना चाहता है तो

बाबा उसको क्या करना चाहिए पूज्य बाबा मन का कार्य है मनो करना मनो आज्य का मतलब समझ रहे हो ना बेमतलब की बातें कल्पना करना ऐसा हो जाए तो ऐसा फिर ऐसा कर लेंगे फिर ऐसा ऐसा किया था वैसा ये मनो है यदि मन को एकाग्र और पवित्र करना चाहते हो तो मनो राज्य का त्याग करो कैसे त्याग होगा राधा राधा राधा रा वह बारबार आपसे कहेगा सुनो हमारी बात सुनो जो मैं कल्पना कर रहा हूं उसमें आप सहयोग करो वह बारबार जैसे एक प्रश्न करता ने कहा क्या स्वप्न नहीं बनाना चाहिए हमका स्वप्न तो स्वाभाविक मन में एकांत में जब सय करते तब आते तो उनका था कि मनोरथ मनोरथ को शायद वह स्वप्न कह रहे होंगे कि स्वप्न नहीं जागृत स्वप्न स्वप्न भी मिथ्या है तो मनोरथ क्या करोगे यह मनोरा से चलता रहता सबका चलता रहता है इसी मनो राज्य को रोक दे वह भजन वह भजन सेवा करते हुए नाम जप करते हुए वाणी पाठ करते सच्ची कहते चतुरा जी बहुत कृपाल आप चतुराश्रम में था तब एकदम धन्य है धन्य है जय हो हरिवंश महाप्रभु की जय हो चतुरा जी की जय हो एक सेकंड भी खाली नहीं

अपने आप चल पड़ते पद चल मनो राज्य की जगह नहीं रह जाती मनो राज्य की जगह नहीं रह जाती नाम प पकड़ो वाणी पकड़ो सेवक शरण सदा र है अनत नहीं विश्राम क वाणी हरिवंश की क हरिवंश नाम मनो राज्य नष्ट करना है तो दो बातें पकड़ लो नाम जप और चतुरा जी के दसई पद याद कर लो उन्हीं को बार-बार गुनगुनाओ ना द आते होंगे तो दो तीन तो सबको आते हैं तीन आज नीकी बनी श्री राधिका नागरी बनी श्री राधा मोहन जू की जोरी और आज नागरी किशोर भावती विचित्र जोर ये आती होंगी क्योंकि आरती तो कर ही हो ग अब आरती ना करते हो तो फिर बात अलग है अगर एक बार भी आरती करते होगे तो धूप और श्रृंगार दो तो दो में तीन पद है मान लो बेसर कौन की तो चलो तीन तो है याद हो गए तीन तीनों गुणों से पार कर देंगे केवल तीन पद दोहराते रहो बोनी श्री राधा मोहन ज की जोरी इंद्र नील मण श्याम मनोहर और अगर सामने दिखाई ना दे श्याम मनोहर तो हमें बताना नील मण श्याम मनोहर सात कुंभ तन मनोरा हटाने के लिए दो बात पकड़ लो नाम नाम नहीं चल रहा तो पद देख लेना मनोरा खत्म ना बे मतलब

का मनोरा समय नष्ट करते और गाढ़ चिंतन जैसे समाधि व्यर्थ के मनो राज्य चलते रहते दूसरा हम अगर पद चलाना है और नाम जप करना है तो दो बातें बाबा कह रहे मौन या मित भाषण मौन रहो या मित भाषण मतलब बहुत कम शब्द बोलने का अभ्यास बनाओ ऐसा करना चाहिए हर साधक को करना चाहिए कुछ साधकों को तो देख रहे कि मौन ही रहते हैं और कुछ साधक मित भाषण वाले भी हैं मौन या मित भाषण मौन रहो बहुत बढ़िया है समम टाइम प्राया मौन नहीं रहते हैं अगर कुछ कहना हुआ अभी तो इ सारे से बात करते हैं क्योंकि एकाकार वृत्ति चलाने के लिए तो कुछ समय आप लोग भी निकालिए कि आपका मौन हो कुछ समय मित भाषण आवश्यक है तो मित भाषण कर दीजिए व वाला मत कीजिए उस समय मित भाषण कीजिए और कुछ समय रखिए मौन जब यहां से सेवा से निवत हो जाओ तो अपने कमरे के लिए मौन हो जाओ इतने में तो नाम जप और वाणी का अभ्यास बना लो कि साढ़े से और सय तक जो भी आपका सय का समय है उस समय तक आप केवल नाम वाणी में रहोगे कोई और कार्य आपके है नहीं मौन रह जाओ शांति से मनो राज्य का त्याग मौन अथवा

मित भाषण और तीसरा बहुत कठिन बात यह प्राया भगवान भी इसी बात को कहते रहते हैं काम संबंधित हर चेष्टा का त्याग काम संबंधी बारत नहीं काम संबंधी दृश्य नहीं काम संबंधी संकल्प नहीं काम संबंधी चेष्टा नहीं अगर मन को निर्मल और शांत और भगवता का करना है चाहे गृहस्थ भक्त हो चाहे विरक्त भक्त हो आपको संतान उत्पत्ति के लिए शास्त्र आज्ञा करता है अन्यथा आपका भी उद्देश्य भगवत प्राप्ति ही है माया प्रपंच में फसना नहीं है मानव जीवन साधन धाम मोक्ष कर द्वारा पायन ज परलोक

सहारा इस पर ध्यान दीजिए और दिन भर तो चाहे कट जाए पर जब शयन करने रात्रि का जाओगे उस समय बहुत सावधानी की जरूरत है जहां एकांत हुए मध्यान में विश्राम के समय या रात्रि में एकांत के समय फिर आपका मन जो है वह इसी चेष्टा में जाएगा इसलिए बाबा बहुत सिद्ध महापुरुष है व काम चेष्टा काम चिंतन काम दृश्य काम संकल्प विकल्प इसका त्याग कर दिया जाए चौथा कुछ समय एकदम एकांत रहने वाला स्वभाव बनाया जाए सोने के अलावा सय के समय तो सब एकांत रहते हैं जब सो गए तो क्या एकांत हो चाहे समाज में हो जागृत अवस्था में एकांत अब ये एकांत का तात्पर्य अकेले बैठना नहीं है कमरा बंद करके अकेले बैठ कर के प्रपंच चिंतन कर तो एकांत नहीं है एकांत का तात्पर्य एक प्रभु के सिवा और सब खत्म आधा घंटा एकांत सुख मास ताम अथातो ब्रह्म जिज्ञासा भगवान शंकराचार्य जी ने कहा एकांत की सफलता यही है कि एकांत में बैठ कर के ब्रह्म चिंतन किया जाए वहां तो ब्रह्म जिज्ञासा कह रहे बैठ कर के या खड़े होकर या लेटकर एकदम भगवता का वृति केवल प्रभु का चंदन य 10 मिनट

करना सीख जाओ अगर आपको बैठने में परेशानी है तो आप सोफा में बैठ जाओ कुर्सी में बैठ जाओ जैसे बने चित्त वृत्ति भगवता का कर दो उस समय हटाओ सब जगह से हटाकर एक मात्र प्रभु में भागे तो फिर घसीट कर लाओ फिर प्रभु में अगर 10 मिनट प्रभु में टिक गए टिक गए तो आप देख लेना आपके जीवन में क्या प्रकाश होता है प्रभु में टिक जाना केवल प्रभु में 10 मिनट टिक करके दिखाओ पांचवी बात कह रहे हैं जो आचार्य ग्रंथ है उसका नित्य नियम पूर्वक पाठ करना धार्मिक ग्रंथों को ये पांच बातें जिसके जीवन में है वह मन को जीत लेगा मन को एकाग्र कर लेगा मन को पवित्र कर लेगा पहला मनो राज्य का त्याग दूसरा मौन अथवा मित भाषण तीसरा काम प्रसंग का त्याग चौथा एकांत सेवन पांचवा धार्मिक ग्रंथों का आचार्य ग्रंथों का स्वाध्याय जो अपमान और निंदा सहन कर सकता है वही तपस्वी भगवान का सेवक कहलाने योग्य होता है जो अपमान और निंदा को सह सकता है वही तपस्वी भगवान का सेवक दास कहलाने योग्य है सेवक सुख चा मान भिखारी जो दूसरों से अपने शरीर की सेवा करवाता है

उसका पुण्य और तप नष्ट हो जाता है और जो अपने शरीर से दूसरों की सेवा करता है उसका पुण्य और तप बढ़ता है इसलिए जब तक पानी उठा लेने की ताकत हो तब तक किसी से सेवा ना ले अपनी हम इसी से कहते हैं कि अगर कोई रसोई बना रहा है तुम भोजन पा रहे हो तुम पोछा लगाओ दोना पत्तल फेंको कोई सेवा करो नहीं यह सेवा तुम्हारे भजन तुम्हारे तप को तुम्हारे पुण्य को क्षीण कर देगी जब तक समुद्र से कनेक्शन नहीं होता तब तक बात बहुत होश में अब जब समुद्र में चित्त प्रभु आनंद समुद्र है

प्रभु पुण्य समुद्र है अ फिर फर्क नहीं पड़ता कि इतना हिस्सा भजन में जाए गए तो तुम घसीट लो जितना घसीट पाओ तुम घसीट लो जितना घसीट पाओ हमा समुद्र है बोले एक बार प्रणाम कोई कर दे तो भजन का इतना हिस्सा चला जाता है भोजन का इतना हिस्सा चला जाता है वस्त्र देने वाले का इतना हिस्सा चला जाता है कब तक जब तक भगवता का वृति नहीं हो जहां भगवता का भगवत साक्षात्कार हुआ अब तस्म तजने भे भावा भक्त और भगवान में अभेद स्थिति होती है अब वहां कोई फर्क नहीं पड़ता तो जब तक भगवत साक्षात्कार ना हो तब तक किसी से शरीर सेवा ना लो बीमारी के अलावा अगर बीमार हो गए हो तो बात अलग है अपनी कोई भी सेवा शरीर सेवा ना लो अब अगर आप भोजन पाते हैं तो आपको सेवा ऐसी करनी चाहिए जिससे आपका तप आपका भजन सुरक्षित रहे क्योंकि अगर आप सेवा नहीं करते तो आपके भजन का हिस्सा उनको मिलेगा जो भोजन बना रहे हैं क्योंकि वो फ्री नहीं बना रहे वो भी साधक भजन कर रहे हैं और बना रहे हैं अगर पा रहे हो बड़ी मस्ती से रह रहे हो नहीं यह प्रकृति की बिजली है यह

प्रकृति की सब वस्तु फिर टैक्स है सबका भगवान की प्राप्ति जब तक नहीं हो जाती तब तक टैक्स भरना पड़ेगा इसलिए बहुत एक चुल्लू भी पानी बर्बाद नहीं करना अगर हमें एक गिलास जरूरत है तो एक गिलास से ही काम चलाएंगे ऐसा नहीं कि पूरी खोल दी मन मानी मनमानी गीजर चल रहे मन मानी पानी चल रहा मन मानी बिजली चल रही यह मत समझो कोई नहीं देख रहा हो एक एक बूंद का तुम्हें टैक्स देना पड़ेगा उतने प्रकृति का भोग करो जितने से जीवन चल जाए और खूब भजन करके भगवत प्राप्ति कर लो फिर भगवान की जैसी इच्छा फिर जैसी इच्छा अभी अपनी सावधानी से चलो सेवा करने वाले को लाभ ही लाभ है सेवा कराने वाले को घाटा ही घाटा है इसलिए जो कोई सेवा करता है वह महान तप रूपी धन से परिपूर्ण हो जाता है सबकी सेवा अरे देहा विमान नष्ट करना हो तो जिनके जूते उतरे हुए वहां चुपचाप खड़े हो गए कपड़ा लेकर सबके जूते साफ कर यह मत सोचो य गृहस्थ है सबके हृदय मंदिर में भगवान है ये करने का सौभाग्य मिल जाए तो बहुत कृपा हो जाए कहीं की नाली साफ कर दी कहीं सोनी लगा दी देहा

भिमान नष्ट हो जाएगा देहा भिमान नष्ट करने के लिए यही सेवाएं हैं और सेवाएं तो चव डला रहे हो अगर देहा विमान है तो श्री जी को चव नहीं डला रहे चार लोग हमें देख रहे कि चव डला रहे हैं लेकिन जब नाली साफ कर रहे हैं तब चार लोग देख रहे हैं यह भाव नहीं आएगा हे भगवान हम पर कृपा करो वो बहुत दनता आ जाएगी ये इसीलिए सेवा जरूरी कभ कभी खड़े हो जाना चाहिए जहां सबकी पादुकाएनु काए सा वो सब सत्संग में बैठे हैं उधर पादुका कोई जाना भी नहीं और इसके बाद वही कपड़ा माथे पर रख के और जल रख कर के जल से उसको धो के सबका चरना देखो अभी हृदय में प्रेम आता है कि नहीं तो सेवा करने से लाभ ही लाभ है ढूंढना चाहिए सेवा सबकी जूठन उठाने का सौभाग्य मिले सब संतों का जूठन का किनका मिले ये सब दनता के भाव है बड़ा कठिन है दनता आना बड़ा कठिन है इसीलिए सबको कृपा मिले इसीलिए यहां वृंदावन के सुहनी सेवा वालों को निमंत्रण दिया गया सबके चरण धो और सबको बताया था कि होश में किसी भी तरह का अपराध नहीं बनना चाहिए इनको ऐसे देखो कि जैसे साक्षात भगवान

पधार रहे और भगवत कृपा से ऐसा ही हुआ था और उनका जब चरणामृत पिया तो आपको कैसे बताए एक अद्भुत आनंद एक अद्भुत क्योंकि सबसे बड़ी दैन्य होता की बात य है कि व हमारे वृंदावन की सेवा करते हैं और वह सेवा करते जहां कोई सेवा नहीं कर सकता सच्ची मानी दनता लाने के लिए अहंकार का नाश करने के लिए कहीं भी आप सोनी लगाओ कहीं भी आप नाली साफ कर दो किसी की पादुकाएनु दवारे जी में तो हमें लगता है सेवा बड़े बड़ों को दी जाती है जोरी सेवा जोरी सेवा पादुका सेवा बड़े बड़ों को दी जाती है और जाते हैं जो गुरुद्वारे में उतरे हुए पादुका होती है उनको साफ करते हैं सेवा करने से लाभ ही लाभ है बहुत बढ़िया बात है अहंकार नष्ट होता है इससे बहुत बढ़िया बात है बहुत बढ़िया बात है भगवान कृपा करें और दनता आ जाए पूज्य पाद बाबा कहते हैं सात जगह मौन रहना चाहिए जब माला कर रहे हो तब मौन रहना चाहिए और जब भोजन कर रहे हो तो मौन रहना चाहिए और शौचालय में हो तब मौन रहना चाहिए अब आजकल के नए बच्चे जानते नहीं तो शौचालय में मोबाइल ले जाते हैं पहली

बात तो मोबाइल अपवित्र हो गया और दूसरी बात सोच में बैठे बैठे बातें भी करते रहते फोन से अरे थोड़ा तो समझो शौचालय में तब तक मौन नहीं खोलना चाहिए जब तक नहाकर आचमन ना कर ले नहीं तो उसके सुकृत नष्ट होते हैं तो सुकृत रही नहीं गए तो नष्ट क्या होंगे रही नहीं गए बुद्धि भ्रष्ट होती चली जा रही है सोच में बैठे बैठे फोन से बात करते हैं सोच में बैठे बैठे पेपर पढ़ लेते अरे कम से कम वहां तो राधा राधा मन में जप लो वहां तो एकांत में भगवत स्मरण कर ले बहुत बढ़िया एकांत है हो पेपर पढ़ रहे हैं हो मोबाइल लेकर जा रहे हैं हमें लगता है नए बच्चे तो प्राया लेके जाते होंगे क्योंकि एक दो बच्चों से पता चला तो ऐसे लगता है कि प्राया लेके जाते सोच के समय यह साधना है उतने ही वस्त्र धारण करो जितने प्रक्षालन करना है और बैठ कर के भगवत चिंतन करते सोच हो फिर दाहिने हाथ से बाएं रज में मतलब कम से कम तीन बार तो रज से झोलो हाथ फिर दोनों हाथ दो बार कम से कम रज से फिर आचमन जाकर के जब नहा धो के तब बात करो लघु शंका करते समय मौन सोच

करते समय मौन खड़े खड़े लघु शंका यह नहीं करना चाहिए सोच में लघु शंका में स्नान करते समय या तो मौन मंत्र जाप या फिर स्तोत्र गाय जैसे अपने स्नान करते तो जो ही जल डाला ब्रजाराज नंदन नाम बदा बत्र चंदना यमुनाष्टक का गान स्नान करते करते यमुनाष्टक हो जाता है नित्य स्नान के समय यमुनाष्टक का गान और जब हवन कर रहे तो अब तो यज्ञ हवन का तो कोई है नहीं विधान अब कहां और मार्ग में चलते हुए मार्ग में चलते हुए मौन चलना चाहिए अगर बात करना है किसी से तो साइड में खड़े

हो जाओ मार्ग चलते हुए हंसते हुए बात करते हुए ये बुद्धि को निम्न धरा में है ऐसा परिचय दिलाती है महापुरुषों ने जो लिखा उसको सम भोजन करते समय बात नहीं नाम जप करते हुए भजन करो माला पूरा हो जाए तभी बात करो माला छोड़ के बात नहीं करनी और सोच में बात नहीं करनी मौन रहना है लघु शंका करते समय जब तक आचमन न कर लो फिर स्नान करते समय मौन या कोई स्तोत्र और यज्ञ हवन लिखा हुआ है तो उस समय तो और सातवा मार्ग में चलते हुए यह सात बात मन को एकाग्र और निर्मल करने के लिए

चार बातें मनो आज्य का त्याग मौन थवा मित भाषण काम प्रसंग का त्याग एकांत और धार्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय पूज्य पाद उड़िया बाबा जी महाराज ऐसे सिद्ध महापुरुष की जो भक्ति ज्ञान वैराग्य तीनों साधनों को ऐसी पुष्ट होता से किया है कि ब्रह्म बध और भगवत प्रेम दोनों में एक भी शब्द ऐसा आज तक नहीं मिला जिसमें संशय हुआ हो इसलिए महापुरुषों के वचनों को धारण करो और आज के सत्संग में बाबा के वचनों को एक खास बात दी गई है कि 63 बजे से सय तक मौन अब ना रहना तो कोई अपराध

नहीं हमारी तरफ से कोई हम कसम नहीं दिला रहे लेकिन रहोगे तो साधन में ज्यादा लाभ मिलेगा चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण भगवान श्री कृष्ण चंद्र ज ने कंस के धोब को को परम पद दिया सुदामा माली को बहुत से मंगलमय आशीर्वाद दिए दरजी को बहुत से मंगलमय आशीर्वाद दिए और कुब्जा को सुंदर किया फिर जाकर धनुष यज्ञ में जो धनुष रखा हुआ था उसको भंग किया तो सैनिक जो रक्षा वाले थे एक बलराम जी ने टुकड़ा धनुष का ले लिया एक श्री कृष्ण चंद्र जी ने उनको मार डाला जब कंस ने सुना तो और बलवान सैनिक उनको भी भगवान ने मार डाला जब कंस ने सुना कि श्री कृष्ण बलराम ने धनुष तोड़ डाला रक्षकों तथा उनकी सहायता के लिए भेजी हुई सेना को संघार कर डाला और यह सब खेल खेल में कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ी तो कंस भयभीत हो गया उसको उस रात नींद नहीं आई जागृत अवस्था में वो ऐसे अपशकुन देखने लगा जो अपशकुन बताते कि मृत्यु तेरी निश्चित है जागृत अवस्था में देखा कि दर्पण या जल में उसका प्रतिबिंब नहीं पड़ रहा ऐसे दर्पण में देखे तो प्रतिबिंब नहीं पड़

रहा जल में देखे तो प्रतिबिंब नहीं पड़ रहा फिर देखा तो केवल सिर दिखाई दे रहा धड़ नहीं दिखाई दे रहा अंगुली आदि की आड़ ना होने पर दो चंद्रमा दिखाई दे रहे हैं दीपक की दो ज्योतियां दिखाई दे रही हैं उस उसने देखा कि अपनी छाया में छेद पड़ गया है कानों में अंगुली डालकर सुनने पर भी प्राणों का शब्द नहीं सुनाई दे रहा जैसे कानों में अंगुली डालो ऐसे ये प्राणों का शब्द है और उसको अपने पैरों के चिन्ह नहीं दिखाई दे रहे जो चरण चिन्ह बनते हैं इस ये सूचक है कि हम मरने वाला है कंस ने देखा कि वो प्रेतों के गले लग रहा है वो गधे पर चढ़ा हुआ विष खा रहा है उसको यह सब दिखाई दिया मृत्यु सूचक है बड़ी चिंता बढ़ गई और डर गया उसे पूरी रात नींद नहीं आई जब भगवान भुवन भास्कर प्रात काल प्रकाशित हुए तो कंस ने जो बड़े-बड़े पहलवान दिग्विजय विश्व विजय उन सबके दंगल रचा था उन सबको बुलाया और कहा श्री कृष्ण बलराम आएंगे पक्का आएंगे आते ही उनको घसीट लेना और अखाड़े पर पछाड़ के मार देना रात भर नींद नहीं आई कि इतने बलवान धनुष तोड़

दिया फिर उसी से सब सैनिकों को मार दिया धोबी भी मारा गया य सब सूचना पहुंची राज कर्मचारियों ने रंगभूमि को तो कई दिन पहले से ही सजाया था प्रात काल होते ही तुरही भेरी बजने लगे फूलों के गजरे झं बंदनवार यह सब सजाया गया था प्रातः काल होते ही राज आज्ञा हुई सबको बुलाकर बैठाला जाए यथा स्थान पूरी प्रजा बैठी हुई थी अपने अपने मर्यादा अनुसार राजा कंस अपने मंत्रियों के साथ मंडलेश्वर के बीच में राज सिंहासन पर जा बैठा भयंकर बलशाली पर उसके चेहरे पर भारी घबराहट थी पहलवान ताल ठोकने लगे जब व ताल ठोकते तो ऐसा लगता बिजली कड़क रही है चाडोर मुटि कूट सल तोशल य विश्व विजय पहलवान अखाड़े में आकर के अब कंस ने अपने सैनिकों को और निज मंत्री को भेजा जाओ नंद बाबा को बुला के लाओ परिकर सहित और उनका बड़ा आदर करना जिससे वो जान ना पावे जाके बड़ा आदर करके नंद बाबा को बुलाया गया एक मंच पर बैठाला गया काम क्रोधा महान शत्रुओं को पराजित करने वाले भगवान श्री कृष्ण चंद्र जी ये क्या है काम क्रोधा महान शत्रु को पराजित करने वाले श्री

कृष्ण और बलराम जी प्रातः काल स्नान आदि से निवत होकर के चंदन अंगराग वस्त्र भूषण धारण किए और रंगभूमि देखने के लिए चल पड़े बाबा को पहले ही बुला लिया गया था भगवान श्री कृष्ण रंगभूमि के दरवाजे पर पहुंचते 6 हज हाथियों का बल रखने वाला कोलिया पेड़ हाथ महावत ने भारी अंकुश से प्रहार किया और दौड़ाया भगवान श्री कृष्ण की तरफ क्योंकि कंस का आदेश था दरवाजे पर आरते ही मार डाला जाए अब भगवान श्री कृष्ण ने अपने पीतांबर को कमर में कसा कि अच्छा भाई यहां तो शुरुआत से ही मृत्यु का आवाहन किया गया है और अपनी घूंगराली अलके समेट करके उनको बांधा कमर में पीतांबर अपने केस पास को बांधा और के सामने ताल ठोके और क ला अपना हाथी महावत ने पहले ही अंकुश मार रखा था भगवान ने कहा महावत हटा अपना इतना कमजोर हाथी सामने खड़े किए मार्ग से हट जाए सुनता नहीं अगर देर की तो तेरे हाथी को तेरे को दोनों को यमपुरी पहुंचा देंगे पर महाराज आपके हाथ से मारे जाने पर यमपुरी तो कोई जाएगा ही नहीं परम पद जाएंगे देर मत कर नहीं तो मैं हाथी के साथ अभी

तुझे यमराज के घर पहुंचाता हूं नो चत सकं जरम त्वा नया यम साधन भगवान श्री कृष्ण ने जब ऐसा कहा तो क्रोध से तिल मिलाकर महावत ने यमराज के समान भयंकर कोलिया पेड़ हाथी को अंकुश मारकर भगवान की तरफ दौड़ाया कुलिया पीड़ भगवान की ओर झपटा और बड़ी तेजी से भगवान को सण में लपेट लिया और पटकने के लिए किया इतने भगवान सरक गए क्योंकि उसने तो एक ही साइज में पकड़ा ना भगवान ने अपने को सूक्ष्म कर लिया तो ढीला पड़ गया और उसने पटकन किया तो केवल सण ही पटक पाया भगवान तो दूर खड़े थे जब उसने देखा कि श्री कृष्ण तो हमारी पकड़ से बाहर हो गए भगवान उसके पीछे दोनों पैरों के बीच में जाकर खड़े हो गए कुलिया पीड़ को बड़ा क्रोध हुआ उसने सूंघ से टटोल करके सुंघा और फिर श्री कृष्ण को पकड़ लिया बल पूर्वक भगवान ने ऐसे उसकी सण को किया जैसे बंधन बांधता बल पूर्वक छुड़ा लिया इसके बाद भगवान पीछे की तरफ गए और पूछ पकड़कर 100 हाथ तक उसको घसीटते गए भगवान तो भगवान है जैसे गरुण सांप को घसीट लाते हैं वैसे 100 हाथ पीछे उस हाथी को घसीटा महावत सहित

गजब हो गया जिस प्रकार घूमते हुए बछड़े के साथ बालक घूमता है भगवान ने सैकड़ों राउंड उसको लगाए पूछ पकड़ के ऐसे कभी दाए कभी बाए कभी दाए कभी बाए विशाल काय हाथी बाए दाए दाए बाए बड़ा गुसा गया कुलिया पीर भगवान सामने जाकर खड़े हुए दोनों हाथ कमर में रख के और दौड़ा भगवान एक घुसा मारा उसके मस्तक पर जही घुसा जमाया वह घुटने टेक दिए भगवान के सामने ऐसे घुटने थे फिर वह क्रोधित होकर उठा भगवान ने ऐसा अभिनय किया मानो भाग रहे हो भगवान की ओर झपटा क्रोध से जला भुनाव कोलिया पेड़ हाथी समझा भगवान को दांतों से मारे ऐसे दांत से प्रहार किया लेकिन आक्रमण व्यर्थ गया भगवान आगे जहां प्रहार किया वहां से आगे तो दांत उसके पृथ्वी में घुस गए महावत ने फिर प्रेरणा अंकुश मारकर भगवान श्री कृष्ण की तरफ दौड़ाया उस हाथी को भगवान श्री कृष्ण ने देखा कि यह समझ रहा है कि मैं डर रहा हूं या भाग रहा हूं भगवान गए नजदीक और उसकी सण पकड़ी मरोड़ना शुरू किया अब जितना जैसे सण मरोड़ी गई तो धम्य से गिर गया भगवान ने अपने चरणों से उसकी गर्दन दबाई

और उसका दांत पहले तोड़ा और महावत को मारा फिर हाथी को जान से मार दिया कोलिया पीड़ हाथी महावत दोनों मारे गए अब भगवान वही रणभूमि में रखे हुए कोलिया पेड़ के प्रवेश जोही रंग भूमि में प्रवेश किया गुप्त चर ने बताया महाराज रंगभूमि के प्रवेश द्वार पर ही कोलिया पेड़ हाथ और महावत मारा गया देखा नील मेघ के समान सिंव वैसे अगर दुष्टता ना करता तो पूज्य मामा था पूज्य भांजे थे जेही क खा मानो महाकाल पधार रहे साक्षात मूर्तिमान काल हाथी को मारा था महावत को तो कुछ रक्त की बूंदे शरीर में पड़ी थी और कुछ पसीने की बूंदे भगवान श्री कृष्ण और बलराम दोनों प्रवेश किए ग्वाल बाल साथ चल रहे थे रंग भूमि में प्रवेश किया जिस समय भगवान श्री कृष्ण बलराम के साथ रंगभूमि में पधारे उस समय बलवान को परास्त किए हुए विजयश्री से सुशोभित जो पहलवान थे बज्र के समान शरीर उनके कठोर थे साधारण मनुष्य तो लड़ ही नहीं सकते थे उन्होंने भगवान को देखा तो उनको दिखाई दिया कि अरे इनसे नहीं जीत सकते पहलवानों को दिखाई दिया यह तो महा बलशाली इनसे नहीं

जीत सक पहले दर्शन में ही वो अंदर से घबरा गए जो मथुरा की स्त्रियां थी उनको भगवान दिखाई दे रहे मानो मूर्तिमान काम पधार रहे हो और जो बड़े बूढ़े गोप जन सब उनको दिखाई दे थे लाड़ले श्री कृष्ण राजाओं को दंड धारी महान शासक माता-पिता को बच्चे और कंस को मूर्तिमान काल अज्ञानी हों को विराट योगियों को परम तत्व भक्त शिरोमणि बृष्ण वंश हों को इष्टदेव सबने अलग-अलग भगवान श्री कृष्ण के दर्शन किए जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरति देखी तिन तैसी सबने भगवान के अलग-अलग रंग भूमि में दर्शन किए वैसे कंस तो बड़ा बलवान था पर जब सुना कि दोनों ने कोलिया पीड को मार डाला उसकी समझ में आ गया कि अब मेरी मृत्यु निश्चित है घबरा गया अजान बाव सुसज्जित वस्त्र पुष्पों के हार आभूषण धारण किए ऐसा लग रहा था कि दो अभिनय करने वाले श्रेष्ठ नट पधारे हो जिनकी एक बार दृष्टि पड़ी दृष्टि ही लग जाती यही नहीं उसका मन भी चुरा लेते दोनों रंग भूमि में पधारे जितने लोग मथुरा के थे सब पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण बलराम को देखकर अतिशय आनंदित प्रसन्न

हो गए सबका मुख कमल खिल गया उत्कंठा से भर गया और सब जोर से बोल पड़े जय हो जय हो कंस जो है घबरा रहा है मथुरा वासी जय हो जय हो क रहे परीक्षित भगवान श्री कृष्ण चंद्र की मुख माधुरी का पान करते करते कोई भी तृप्त नहीं हो रहा है सब ऐसे देख रहे हैं मानो नेत्रों से पी जाएंगे जिव्या से चाट रहे हैं नासिका से सूंघ रहे हैं भुजाओं से आलिंगन कर रहे हैं भगवान का सौंदर्य गुण माधुर्य ये सबको निर्भय कर रहा है सब आपस में बात यह वही श्री कृष्ण है जिन्होंने अघासुर को मारा कोई कह रहा य वही श्री कृष्ण है अरे ये छ दिन के थे तब पूतना को मारा कोई कहता है अरे य वही है जो सात दिन रात गिरिराज जी को धारण किए रहे जो बड़े बूढ़े ज्ञानी जन थे व कहते अरे कोई साधारण थोड़ी है यह तो नारायण है साक्षात वसुदेव जी के घर इनका अवतार हुआ है से सब वार्ता हो रही कोई कहता अंगली दिखा यह जो सांवले सांवले है ना यह देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुए देवकी के गर्भ से हमें पता है जन्म लेते ही वसुदेव जी ने इन्हें गोकुल में पहुंचा दिया था इतने दिनों

तक वे वहां छिप कर रहे नंद बाबा के घर में इन्होंने ही पूतना तणाव शंखचूड़ केशी धेनुका सुर और भी दुष्ट दैत्यों का वध किया यमला अर्जुन का उद्धार किया इन्होंने ही गौ और ग्वालो को दावानल की ज्वाला से बचाया काली नाग के दमन और इंद्र का मान मर्दन इन्होंने ही किया इन्होंने सात दिनों तक एक ही हाथ पर गिरिराज गोवर्धन को उठाए रखा उसके द्वारा आंधी पानी तथा वज्रपात से समस्त ब्रजवासी को बचाया गोपिया इनकी मंद मंद मुस्कान मधुर चितवन सर्वदा एक रस प्रसन्न रहने वाले मुखारविंद के दर्शन से आनंदित रहती थी अनासी सब प्रकार के ताप से वह मुक्त हो जाता है जो इनके दर्शन पा लेता है कहते हैं यह यदुवंश की रक्षा के लिए अवतार धारण किए हैं यह विख्यात वंश इनके द्वारा महान समृद्धि यश और गौरव को प्राप्त करेगा यह दूसरे जो श्याम सुंदर के पार्श्व में खड़े कमल नन बलराम जी हैं किसी किसी के मुंह से सुना है इन्होंने प्रबा सुर वत्सा सुर बकासुर आदि को मारा है जिस समय मथुरा वासी ऐसी चर्चा कर रहे थे अखाड़े में तुरही बाजे बजने लगे कंस ने

इशारा किया अपने पहलवानों को मार डालो इनको चाडोर भगवान श्री कृष्ण बलराम को संबोधन करके कहा नंद नंदन और बलराम जी तुम दोनों वीरों के आदरणीय हो महाराज हमने सुना है बहुत बलशाली हो आओ जरा दो दो हाथ हो जाए देखो प्रजा मन वचन कर्म से राजा का प्रिय कार्य करती है अर्थात कंस की इच्छा है हमारा तुम्हारा द्वंद युद्ध हो आओ हम तुम मिलकर के कुश्ती लड़े महाराज कंस को प्र प्रन करे राजा प्रसन्न तो संपूर्ण प्रजा प्रसन्न भगवान श्री कृष्ण तो चाहते थे कि दो दो हाथ हो इसलिए चाणूर की बात सुन कर के भगवान ने कहा चाणूर वैसे हम भी भोजराज की वनवासी प्रजा है और हम भी इनको प्रसन्न करना चाहते हैं इसी में हमारा कल्याण है चाणूर हम तो बालक है तुम तो पहाड़ के समान बड़े बलवान पहलवान हो इसलिए हम लड़ेंगे पर अपने ब्रजवासी बालकों से तुमसे कौन लड़े इतने बड़े तुम पहलवान हो कुश्ती समान बल वालों के साथ होनी चाहिए जिससे देखने वालों को अन्याय का पाप ना लगे चाणूर ने कहा जी तुम बालक हो तुम बालक हो अरे तुम अभी अभी 6 हज हाथियों का बल

रखने वाले कुलिया पीड़ को मार के आ रहे हो तुम बालक हो खेल खेल में कुलिया पीड़ को मार डाला इसलिए बातें मत बनाओ श्री कृष्ण तुम्हारी भुजाओं में बल है आओ मेरे से जोड़ करो भगवान ने दांती पीसी और कहा कि अभी तुमको भी कंस के सामने पछाड़ पछाड़ कर मारेंगे मुट को तो बलराम जी ने पकड़ा और चाणूर को भगवान श्री कृष्ण ये बहुत बड़े बलवान थे अब कुश्ती लड़ने लगे जैसे हाथों से हाथ पकड़कर कुश्ती लड़ी जाती है उसके पकड़े होते हैं पंजे से पंजे घुटनों से घुटने माथे से माथा

छाती से छाती भड़कर एक दूसरे पर चोट करने लगे इस प्रकार दांव पेच करते-करते जोड़ीदार को जैसे बलराम जी ने मुटि को और भगवान श्री कृष्ण ने चाणूर को ऐसे खेलते रहे भगवान छोड़ना पीछे हटना एक दूसरे को धकेलना रोकना प्रहार करना दंगल के देखने वाले जितने भी लोग थे सब कह रहे थे यह अनर्थ है यह नहीं होना चाहिए कहां इतने सुकुमार बालक श्री कृष्ण और कहां पहाड़ के समान चाणूर और मुट नहीं नहीं ये अधर्म है ये नहीं युद्ध होना चाहिए यह नहीं होना चाहिए कुश्ती छोटे बलहीनता मारे गए श्री कृष्ण बलराम हमारे पहलवानों की पकड़ में आ गए कंस और सभास इशारे दिए किसी की मत सुनो पटक दो इनको कितने लोग खड़े हो गए नहीं नहीं य अधर्म हो रहा हम ऐसी सभा में नहीं बैठ सकते हम यह नहीं देख सकते कितनी खेद की बात है कि राजा ऐसे अधर्म के लिए स्वीकृति दे रहा है यह पर्वत के समान पहलवानों से बालक लड़ाए जा रहे हैं जो अभी किशोर अवस्था के हैं इनके एक एक अंग सुकुमार हैं कहां यह और कहां यह पहलवान बड़ी आवाजें आने लगी यहां धर्म का उल्लंघन हो रहा है

पाप हो रहा है अधर्म हो रहा है अन्याय हो रहा है चलो सब लोग यहां से चला जाए बुद्धिमान पुरुष को चाहिए जिस सभा में पाप हो उस सभा से उठकर चला जाए नहीं वो पाप का भागीदार बनेगा वो दोष का भागी बनेगा देखो देखो यह श्री कृष्ण को कैसे पकड़ रहा है अब तो क्रोधित हो गया चाणूर और मुटि भगवान को मारने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने बलराम जी की तरफ तीसरी दृष्टि से देखा कि अब ज्यादा फिर भगवान जैसे ब्रजभूमि में अपने सखाव के साथ लड़ते थे है तो पुरुषोत्तम महा बलशाली भगवान जिनके भगवान शंकर लक्ष्मी जी आद जिनकी आराधना करते हैं गोपियां ब्रजवासी सबके प्राण ठाकुर जी है भगवान श्री कृष्ण चंद्र ज ने मन ही मन संकल्प किया पास में ही जेल थी तो जब यह हाहाकार मचा तो जेल में भी आवा गई देवकी वसुदेव जी ने सुना उन्होंने भगवान नारायण का स्मरण किया कि हे प्रभु मेरे बालक तो वैसे अभी हम जब से छोड़े आए तब से आज तक देखा नहीं सुना आए और मारे जाएंगे चाणूर मुट के द्वारा क्योंकि बहुत बलवान है चाणूर मुट पुत्री स्नेह से भगवान के बल का विस्मरण

हो गया और वह बहुत रुदन करने लगे भगवान श्री कृष्ण और चार दाव पेच कर रहे थे बलराम जी और मुट भगवान के ऊपर घूंसे का प्रहार किया चाडोर ने मतलब यह घुसा सहने के लिए केवल भगवान ही सामर्थ उसने समझा बालक है अ इनको मार डालते हैं भगवान के अंग में ऐसे प्रहार हो रहा है जैसे वज्र का प्रहार किया जाए चिंगारिया छूटे अब भगवान ने फासा चाडोर को और दबाना शुरू किया चाणूर को भगवान मुट को बलराम जी ने चूरमा बना दिया चाणूर का दबाते दबाते भगवान अब उसके प्राण घुटने लगे व अपने को छुड़ाकर दोनों हाथों से घुसा बांधकर भगवान श्री कृष्ण की छाती पर मारा भगवान ऐसे ही खड़े रहे जैसे कोई फूलों का प्रहार करे और कुछ ना बिगड़े भगवान ने चाणूर को उठाया और उठाकर पैर पकड़ा अंतरिक्ष में कई चक्कर लगा धड़ाम से गिरा दि बलराम जी ने जब देखा कि चाणूर सब उसके अंग अस्तव्यस्त हो गए मालाएं बिखर गई वो मृत होकर गिर पड़ा बलराम जी ने एक घुसा मारा मुट को मुटि वही भगवान श्री कृष्ण बलराम चाणूर और मुटि को जे भी मारा तो वहां बहुत से पहलवान खड़े थे वो

सब भगवान की तरफ दौड़े दौड़ ले कल इनका कर देते हैं श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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