॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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ताज़ा

इस बात को सुन लोगे तो कभी निराश नहीं होंगे // सनातन धर्म के 30 लक्षण // 06/10/2024

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

राधा वल्लभ श्री हरिवंश श्री वृंदावन श्री वन चंद राधा वल्लभ गुरु हरि श्री वृंदावन श्री वन चंद राधा वल्लभ श्री हरिवंश श्री बृंदावन श्री वन वृंदावन स्वरी तैव पदारविंदम प्रेमा मृत मकरंद र सघ पूर्णम हद पितम मधुपति स्मर ताप मग्रमस मा शयाम परम शीतल मा शयाम परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नव निवृत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले प्राणा आराध्य प्राण प्रिय श्री युगल सरकार श्यामा श्याम समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी तरलता यमुना रस रानी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिकर बड़ी विडंबना बहुत दूर तक उपासक के हृदय में यह बनी रहती है कि भोगों में सुख है या प्रभु में यह प्रश्नवाचक चिन्ह मन खड़ा कर करता रहता है जब वो दृढ़ता पूर्वक भजन में चलता है तो भोग आकर्षण करते हैं जब भोगों में गिरता है तो फिर जलन होती है भजन की तरफ बढ़ना चाहता है ऐसे जन्म के जन्म निकल जाते हैं यदि वह दृढ़ता धारण कर ले कि सुख है कि नहीं है मुझे इससे मतलब नहीं पर वो मेरा मार्ग नहीं है मुझे नहीं भोगना तो

निकल जाए पर यह दृढ़ता नहीं रहती बड़े बड़ों के हृदय में यह फिसलन के लिए जगह बचा के रखी जाती है वह चाहता नहीं है पर ना चाहते हुए भी जबरदस्ती यह मन और इंद्रियों की अधीनता उसे विषय सेवन में लगा देती है विषय सेवन से भजन का उत्साह नष्ट हो जाता है आप देखो 10 दिन निर्विक रहकर भजन करो 10 दिन मात्र तो आपके भजन की उत्साह वृत्ति बढ़ेगी और जहां फिर गलत किया फिर बैठ जाएगी फिर ना वो क्रम रहेगा ना वो जोश रहेगा ना स्वाद आएगा भजन में एक खिन्नता सी उदासीनता सी भजन की तरफ आ जाएगी अब भोग और भजन पूरी सृष्टि को दो भाग में एक तरफ भोगा आकर्षण और चलना हमें भजन की तरफ है अब भजन में अभी आनंद नहीं मिला प्रियता नहीं हुई और भोगों में जन्म जन्मांतर से हम आनंद खोज रहे हैं प्रियता है इसलिए बार-बार हम भोग की तरफ ही फिसलते हैं भजन मार्ग में हम सुदृढ़ खड़े नहीं हो पा रहे भगवान की आश्रय वृत्ति ही यहां बचाएगी जिन आराध्य देव प्रभु की आप हृदय से शरण में हुए हैं इसीलिए भक्ति सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसमें भगवान का बल है भगवान का

भरोसा है भगवान का सहारा है ज्ञान में स्वयं का बल है अगर आप गिर गए तो गिर गए फिर किसी जन्म में तैयारी करना लेकिन भक्त में गिर कर के भी भगवत प्राप्ति हो जाती है वो भगवान के भरोसे होता है भगवान का आश्रय लिए होता है भगवान से फिर विनय करता है भगवत बल मिलता है और वो भगवान को प्राप्त होता है भगवत बल से ही भगवत प्राप्ति होती है इसलिए जिसको ऐसा लगता है कि मैं तैर कर के भव समुद्र पार हो जाऊंगा ज्ञान आदि साधनों से देख ले बड़े-बड़े महापुरुषों का अनुभव संतों का अनुभव बिना भगवान श्री हरि की शरण हुए इस दुरंत माया पर विजय प्राप्त करना बहुत कठिन है दो चार 10 दिन ठीक चलोगे फिर गिर जाओगे फिर उठो फिर गिर गए बार बार ऐसा होने पर साधक निराश हो जाता है कब तक यह निराशा यदि शरणागति है तो पूर्ण भगवान के चरणों में समर्पित करा देगी अगर अहंकार शेष रहा तो फिर गिरना पड़ेगा इसलिए पहले से ही अहंकार सहित भगवान की शरण में हो जाए तो इस सब विषयों पर विजय प्राप्त करके इसी जन्म में व गाढ भजन के द्वारा भगवान की प्राप्ति कर ले

फिर हम तो प्रियाज की शरण में है जिनकी शरणागति का जिनके चरणों का बड़ा प्रताप है पूर्ण महिमा चरणों की तो वृंदावन और लाल जू जानते हैं प्रिया जू के श्री चरणों की श्रीपाद प्रबोधा अंद जी महाराज कह रहे हैं राधा पादा अरविंदा नंदम वृंदावनम हरे हद प पूर्व सैव धत परत हरिप यते बलाती श्री प्रिया जू के चरणारविंद का आनंद पूर्ण रूप से तो दो ही करते हैं वृंदावन और लाल जू महाराज श्री वृंदावन की रज में हमारी प्यारी जू जब चलती है तो चरण चिन्ह बनते हैं 19 चरण चिन्ह और जब प्यारी जू चलते हैं तो लाल जू का हृदय ऐसा होता है कि वह भूमि लाल जू का हृदय बनता है और लाडली जू के चरण लाल जू के मानो हृदय पर पड़ रहे हैं श्रीमद चतुराश्रम तरुणी कदम मुकुट मणि श्यामा आज बनी इस पद में आखिरी के दो लाइनों के ऊपर लाइन पद अंबुज जावक जुत भूषन प्रीतम उर अवनी नव नव भाय बिलो भी भाम भ विहारत वर करनी ब्रज नव तरुण कदंब मुकुट मणि श्यामा आजु बनी पद अंबुज जावक जुत भूषण श्री प्रिया जू के चरण कमल जिनमें महावर लगा हुआ है मेहंदी से चित्रकारी की

गई है और पायल नपुरा आदि भूषण धारण किए हुए हैं कहां विराजमान है बोले प्रीतम उर अवनी प्रीतम के हृदय से लगे हुए इसमें वर्णन करते हैं पूर्व सैव धत्र परत हरना पते बला तीय श्री चरणों के समीप बैठकर श्री कृष्ण चंद ज श्री लाल जू बल पूर्वक श्री लाडली ज के चरणों को लेकर अपने से हृदय से लगाते हैं श्रीमद राधा सुधा निधि में हदर पितम मधुपति स्मर ताप मुग्रॉडी आश्रया श्री लाल जू लाडली के चरणों को जब ऐसे अपने वक्षा स्थल पर रखते हैं तो उनके हृदय का जो स्मर ताप है उसका समन हो जाता है परम शीतलता परम शांति हम ऐसे राधा चरणारविंद के आश्रित हैं जिनकी महिमा दो ही जानते हैं संपूर्ण महिमा वृंदावन और या लाल युग ऐसे हम गोरे चरणारविंद के आश्रित है हमारा बल श्री वृंदावना आधी स्वरी के चरणारविंद है हमें हारना नहीं है चाहे जैसी परिस्थिति हो हमें भागना श्री जी के चरणों की तरफ ही है हमें कभी निराश नहीं होना यह माया निराश करेगी बार-बार हमसे ऐसी गलती होंगी ऐसे आचरण होंगे कि लगेगा कि अब हम श्री जी के लायक नहीं है ऐसा लगेगा यह

बड़ा नीच मन है यह कभी विश्वास योग्य नहीं है बहुत अच्छा सपोर्ट करेगा एकदम विरोध करके गिरा देगा और जब साधक गिरता है तो उसको लगता है मैं लगता हूं नहीं चल पाऊंगा इस मार्ग में यह बार-बार मुझे गिरा देता है मन निराश नहीं होना हताश नहीं होना फिर भागो श्री जी के चरणों की तरफ बहुत उदार चरणारविंद है बहुत करुणामय है प्रेम की अजस्र धारा शरणागत पर बरसती रहती है बाट जो हो कब वर्षा होगी हमारे ऊपर प्रेम की जब ये काम क्रोधा आदि दोष सब धुल जाएंगे और हम निर्मल भाव से अपनी प्यारी ज प्यारे जू में ही तन्मय बने रहेंगे दुर्भाग्य है श्री जी तो कृपा करती हैं पर हम उस कृपा की अवहेलना करके फिर भोगों की तरफ चले जाते हैं मीना जाले न दा सई सरसी मृग गणावा गुरा विश्वर हिंस संसार हरि विमुख नरा मायाया मोह पास कारागारे सुगा धत नति भट तस्करा श्रंखला भर वृंदा वयं चाद भुत रस बलित स्त गुणा गई निर्ब जैसे सरोवर में जाल डाल कर के खेलती हुई आनंदमय मछलियों को पकड़ लेता है पकड़ने वाला जैसे क्रूर व्याध बना की ध्वनि में मुग्ध करके

हिरणों को पास बुलाता है और बाणों से बेद देता है ऐसे ही यह काल भोगों की डालकर जाल डालकर हमें फसाकर पूरा जीवन नष्ट कर देता है ऐसे ही नाना प्रकार की मधुरता सुनाकर इस लोक में यह सुख परलोक में अप्सराएं मिलेंगी यह ये हमको काल अपने अधीन किए हुए है नाना प्रकार की भोग सामग्री भोगने की इच्छा रूपी जाल में हम फस करके आनंद समुद्र प्रभु से बिलग हो गए नाना प्रकार के भोगों की महिमा सुनकर के हम ऐसे बंध गए जैसे व्याध वीणा सुनाकर मृग को बाणों से बेध देता है अब ऐसा लगता है कि हम प्रभु के मार्ग में ही नहीं चल सकते हमें तो भोगों ने परास्त कर दिया और भोगों के बिना हम जी नहीं सकते यह बहुत बड़ी दुर्गति है इसी का नाम दुर्गति है श्रीपाद कह रहे हैं ऐसे माया चक्र में वही फसता है जो हरि शरणागत नहीं जो जो वृति हरि से विमुख है वही फसा देगी अगर हरि के सन्मुख हर वृतिया अर्पित की जाए हर आचरण अर्पित किए जाए तो फिर माया की ताकत नहीं कि हमें फसा सके इसीलिए कहते निरंतर नाम जपने का अभ्यास करो राधा राधा राधा राधा जो प्रियालाल

से विमुख है वह बंधन में बंधेगा ही बंधेगा कहा हनुमंत विपत प्रभु सोई जब तो सुमिरन भजन न होई जिस समय सुमिरन भजन नहीं होता तो वृत्ति माया में फसा ही देती खेल खेल में फसा देती है ना चाहते हुए भी फसा देती है बहुत दूर रहने की बात है हम प्रभु से दूर रहते हैं भोगों के नजदीक रहते हैं जबकि हमें प्रभु के नजदीक रहना भोगों से दूर रहना है जैसे असाधा राजा को उसके अनुचर उसी के अनुचर गण बांध लेते हैं और उसे परास्त करके स्वयं अधिपति बन जाते हैं उसी प्रकार मन और इंद्रिया भोगों की लालसा दिखा कर के निर्बल हुए आत्मज्ञान रहित जीव को ये बांध लेते हैं और अधिपति बन जाते हैं अब जो चाहे वह करावे मन बुद्धि इंद्रिया य ऐसे जीवात्मा को जो आत्मज्ञान रहित है उसको अधीन कर लेते हैं जैसे मंत्री और सेनापति मिल जाए और राजा को बंदी बना ले और स्वयं राजा बन बैठे हुसैन शाह ने अपने राजा सुबुद्धि राय के साथ ऐसा ही किया था वैसे तो राजा यदि प्रवीण हो तो य नहीं बांध सकते प्रवीण आत्मज्ञान भगवत शरणागति पर ये भगवत शरणागति और आत्मज्ञान

से रहित जीवात्मा मन और इंद्रियों के अधीन होकर परास्त हो गया पूरे हाथ उठा दिए कि अब मैं भोगों के बिना नहीं जी सकता बहुत बड़ी कमी बहुत बड़ी हानि हे वृंदावन धाम जब यह सब बांधने में समर्थ है तो आप बांधने में समर्थ नहीं हो क्या आप प्रियालाल के प्रेम रस रूपी जंजीरों से हमें बांध लो ये छोटे-छोटे भोग ये छोटे-छोटे छल कपट ये जब बांध लेते हैं और हमारे जन्म के जन्म बर्बाद कर देते हैं तो हे वृंदावन धाम अद्भुत रस से आप हमें क्यों नहीं बांध लेते आप अद्भुत प्रियालाल के रूप से क्यों नहीं बांध लेते आप अद्भुत प्रिया लाल की सेवा सुख से क्यों नहीं बांध देते कृपा करो आप भी अपने प्रेम जाल को फैलाओ और संसार समुद्र में खेलते हुए हमारे मन और इंद्रियों को अपने अधीन कर लो भवन मति सु तुम छेम वृंदावन ह माया तः हरि हरि तत्र ममा भू द्वंद प्या चाल सेन वृंदावन आपके लिए तो ये संसार बंधन तुच्छ बंधन है इसे काटने में कोई देर लगेगी क्या और यही महिमा सुनकर मैं आपकी शरण में आया हूं हे वृंदावन धाम हे हरि हे हरि मैंने सुना

है कि वृंदावन ने ईश्वर को अधीन कर लिया है वृंदावन में प्रिया प्रीतम आसक्त है वृंदावन से वृंदावन परित्यज्य पादम कम न गच्छति एक कदम भी प्रिया प्रीतम वृंदावन से बाहर नहीं जा सकते जहां किसी प्रेमी उपासक को दर्शन देना होता है तो पहले वृंदावन प्रकाशित होता है फिर प्रिया प्रीतम तो हे वृंदावन धाम हरि हरि मैंने ऐसा सुना है कि आपने ईश्वर को अधीन कर रखा है प्रिया प्रीतम को आपने प्रिया प्रीतम को अधीन कर रखा है तो क्या मुझ जैसे नीच मन और इंद्रियों को अधीन नहीं कर सकते आपकी अपार सामर्थ्य है जब आपने प्रिया प्रीतम के मन बुद्धि को अधीन कर लिया वृंदावन परित्यज्य पादम कम न गच्छति तो मुझ जैसे नीच के मन और इंद्रियों को अधीन नहीं कर सकते अर्थात हरि हरि मैं बहुत दैन्य हूं मैं बहुत नीच हूं मैं बहुत अधम हूं मेरी मन और इंद्रिया भोगों की तरफ जा र हैं आप अपने में आसक्त कर कर लो हे वृंदावन धाम कामी मिलित युवती मदि राम पतव पान संयुत अधनपुर को कामिनी मिल जाए तो हर्षित हो जाता है जैसे नशेबाज को मदिरा मिल जाए तो वह

उलसत हो जाता है जैसे किसी दरिद्र को मणि मिल जाए तो आनंद से नाच पड़ता है ऐसे ही मैं वृंदावन को पाकर परम सुखी हो गया हूं श्रीपाद कह रहे ऐसे ही मैं वृंदावन को पाकर परम सुखी हो गया हूं परम मतवाला हो गया हूं परम तृप्त हो गया हूं वृंदावन को पाकर अभी वृंदावन आए हैं अभी पाए नहीं है जब वृंदावन पा जाएंगे धाम की प्राप्ति का मतलब है स्वरूप बोध अपने सहचर स्वरूप से प्रिया प्रीतम के समीप रहना यह वृंदावन पा गए आप बोले उनको वृंदावन की प्राप्ति हुई है अर्थात प्रिया प्रीतम के समीप पहुंच जाना शरीर रहते हुए भी शरीर राग का त्याग और अपने सचर स्वरूप से से सेवा भाव में आराध्य देव के समीप पहुंच जाना ये वृंदावन की प्राप्ति है बोले मैं वृंदावन को प्राप्त हो चुका हूं श्रीपाद कह रहे हैं इसलिए मैं ऐसा सुखी हूं जैसे किसी व्यसनी को मदिरा मिल जाए कामी पुरुष को कामिनी मिल जाए निर्धन को मणि मिल जाए ऐसे मुझे वृंदावन मिला मैं अब तृप्त हूं कृतकृत्य हूं परम विश्राम को प्राप्त हूं अब मुझे कोई चाह नहीं अपने लोगों के भी हृदय

में ऐसी लालसा होनी चाहिए कि हम वृंदावन को कब प्राप्त करेंगे एक उपासक बड़े अच्छे उपासक थे जब एकांत में मिलते तो कहते हमें वृंदावन जाना है तो हम कहते वृंदावन में तो होही बोले हमें वृंदावन जाना है हमें वृंदावन जाना है जब हित धाम में आते थे तो तो उस समय ऐसा लगता ऐसा क्यों कहते हैं तो ना वृंदावन में लेकिन वो दिव्य वृंदावन की बात करते मुझे वृंदावन जाना है मुझे वृंदावन जाना है जहां हमारे प्रियालाल खेल रहे हैं मुझे उस वृंदावन में प्रवेश पाना है यह लगन लगे जैसे व्यसनी को नशा की कामी को कामिनी की गरीब को धन की चाह होती है ऐसे हमें दिव्य वृंदावन प्रिया प्रीतम की चाह ये जन्मना मरना ये मान अपमान सुख दुख भोगते हुए बहुत जन्म हो गया अब नहीं खेलना इस खेल को लेकिन वाणी से कहने से नहीं रुकेगा ये हृदय से चा हो जाए कि अब इस खेल को नहीं खेलना चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण प्रसंग आपने श्रवण किया भगवान नरसिंह देव का प्रादुर्भाव हिरण कश्यप का उद्धार प्रल्हाद जी की पावन स्तुति भगवान की विशेष कृपा प्रहलाद जी

पर फिर भगवान महादेव जी के द्वारा जो माया सुर ने तीन पुरों की रचना की और विश्व का संघार करने में लग गए दैत्य लोग भगवान पिनाक पानी ने बाण संधान किया तो अरबों असंख्य एक बाण से बाण प्रकट होते हुए त्रिपुर में वास करने वाले समस्त दैत्यों का विनाश कर दिया पर माया सुर ने उन सब दैत्यों को उसी पुर में एक अमृत कुंड था उसमें डाल डालकर सबको जीवित कर दिया फिर वह विमान पर आरूढ़ होकर के विश्व का संघार करने लगे तो भगवान श्री हरि बने गाय और ब्रह्मा जी बने बछड़ा और

चुपके से जाकर के पूरा अमृत कुंड का अमृत पी गए फिर महादेव जी से कहा आप संधान करो पिनाक पाणी महादेव जी ने पुनः संधान किया बाण तीनों पुरों को भस्म कर दिया इसलिए भगवान शंकर का नाम त्रिपुरारी पड़ा श्री देवर्ष नारद जी राजस यज्ञ में महाराज युधिष्ठिर को ये कथा सुना रहे हैं गंगा जी के पावन तट पर श्री सुखदेव जी महाराज परीक्षित जी को सुना रहे हैं युधिष्ठिर जी ने पूछा नारद जी से भगवन अब मैं आपके श्री मुख से वर्ण और आश्रमों के सदाचार के साथ मानव धर्म का सनातन

धर्म का महामहिम स्वरूप सुनना चाहता हूं क्या सदाचार है क्या वर्ण धर्म है क्या आश्रम धर्म है और क्या मानव धर्म है और क्या सनातन धर्म है क्योंकि धर्म से ही मनुष्य को ज्ञान होता है अधर्मी को अज्ञान घरता है धर्मात्मा को ही ज्ञान होता है और ज्ञानी पुरुष ही संसार के भोगों का त्याग करके भगवत मार्ग का अनुसरण करके भगवान का साक्षात्कार करता है हे देवर्ष नारद जी आप स्वयं प्रजापति ब्रह्मा जी के पुत्र हैं आपकी तपस्या योग एवं समाधि ये इतनी सर्वश्रेष्ठ है कि आपकी समानता कोई नहीं कर सकता आप समान भाव वाले नारायण परायण दयालु सदाचारी शांत और भगवत धर्म के गुप्त से गुप्त रहस्य को जानने वाले हैं इसलिए आप जैसा वर्णन करेंगे दूसरे की सामर्थ्य नहीं है आप कृपा करके हमारे प्रश्न का उत्तर दीजिए वर्ण धर्म क्या है आश्रम धर्म क्या है मानव धर्म क्या है और सनातन धर्म क्या है नारद जी ने कहा युधिष्ठिर अजन्मा भगवान समस्त धर्मों के मूल कारण है जितने भी धर्म है सबके मूल कारण परमेश्वर ही है भगवान ही है चाहे जिस नाम से पुकारा

जाए सबके मूल कारण भगवान है वही प्रभु चराचर जगत के कल्याण के लिए धर्म रूप से अवतरित हुए जो सनातन धर्म है वो वेद स्वरूप है जो वेद है वो भगवान है इसलिए भगवान श्री हरि ही सनातन धर्म है जो भगवान श्री हरि के तत्व को जानने वाला महात्मा है वह सनातन धर्म है जो स्मृतियां है व सनातन धर्म है धर्म पूर्वक जब कर्म किया जाता है तो कभी आत्म ग्लानि नहीं होती सदैव आनंद प्राप्त होता है और जब धर्म से विमुख आचरण किया जाता है तो आत्मग्लानि होती है हमारे सनातन धर्म के 30 लक्षण है ये देवर्ष नारद जी कह रहे सनातन धर्म क्या है वेद वेद क्या है भगवान का साक्षात स्वरूप श्री हरि ही वेद रूप से हैं तो सनातन धर्म वेद सनातन धर्म श्री हरि और सनातन धर्म साक्षात भगवान का स्वरूप है और यह 30 लक्षण है सनातन धर्म के यह जो सनातन धर्मावलंबी जन है ध्यान दें हमारे सनातन धर्म के 30 लक्षण है ये सबसे पहला है सत्य ये जो झूठ बोलते हैं अपने को सनातन धर्मावलंबी कहते हैं यह धर्म का उल्लंघन कर रहे हैं और अब 100 में कम संख्या होगी हजार में

कोई एक हो जो इस बात पर विचार करता हो कि मैं झूठ ना बोलूं हजार में 100 तो नहीं पड़ पाएगा 100 में 99 बोले तो नहीं चलेगा हजार में एक कोई होगा जो यह विचार वान हो कि मैं सत्य बोलूं झूठ ना बोलू हम लोग बड़े गर्व से कहते हैं हम सनातन धर्मावलंबी हैं तो सनातन धर्म का पहला लक्षण है सत्य और सत्य क्या है भगवान सब कोई जानता है मरने के बाद जब स यात्रा होती तो सब बोलते हैं राम नाम सत्य है जैसे अपने ब्रज में बोला जाता है कृष्ण नाम सत्य है गोपाल नाम सत्य है गोविंद

नाम सत्य है अगर भगवान का नाम जप नहीं करते तो किस बात के सनातन धर्मावलंबी सत्य नहीं बोलते तो किस बात के सनातन धर्मावलंबी रघुकुल रीति सदा चल आई प्राण जाए पर वचन न जाई एक बार कह दिया तो प्राण चले जाए पर अपने वचन नहीं झूठे होने देते थे और यहां सुबह वचन देते हैं शाम के भूल जाते हैं सुबह कसम खाते हैं शाम के तो और हमें गर्व से कहते हैं हम सनातन धर्मावलंबी हमारे सनातन धर्म के 30 लक्षण है अगर यह लक्षण नहीं है तो आप कैसे कह सकते हो पहला ही लक्षण है सत्य सत्य है भगवान नारायण हरि राम कृष्ण सत्य नारायण सच्चिदानंद रूपाय विश्वपति आद हे तवे ताप विनाशाय श्री कृष्णाय वयम नम जब भगवान कंस कारागार में प्रकट हो रहे हैं तो समस्त देवता करके जब स्तुति करते हैं तो पहला श्लोक है सत्य व्रतम त्र सत्यम त्रिकाल में जो सत्य है वो भगवान सत्य नाम जप नहीं करते सत्य नहीं बोलते सत मार्ग पर नहीं चलते किस बात के सनातन धर्मावलंबी सत्य को समझो दूसरा दया यह हमारे सनातन धर्म के 30 लक्षण है दया सब पर दया दया करने की सामर्थ्य उसी

के हृदय में आएगी जो दया का उल्टा क्या है याद जिसे याद है कि मैं कौन हूं मेरा कर्तव्य क्या है मैं सनातन धर्मावलंबी हूं कर्तव्य सब पर दया करना और सदैव भगवान की याद में रहना और सत्य बोलना सत्य आचरण करना दोए हुए तीसरा है तपस्या सनातन धर्म का लक्षण तपस्या किसे कहते हैं जो अपने धर्म में चलने पर कष्ट प्राप्त होता है उसे आनंद पूर्वक सहा जाए उसे तपस्या कहते हैं जो भी अपने धर्म पर चलने पर कष्ट मिले काम आदि जलाते हैं क्रोध आदि जलाते हैं बहुत प्रकार के ताप हैं जैसे अब प्रातः कालीन बेला पर उठ कर के स्नान करके अपनी दिनचर्या पर आना बड़ा कठिन है 8 बजे तक खूब सोना तो कहां व 8 बजे तक सोना और कहां दो बजे रात्रि के जग कर के अपनी दिनचर्या करना तो अपने धर्म के पालन में जो हमें कष्ट मिलता है उसे तपस्या कहते हैं हमारे सनातन धर्म का तीसरा लक्षण है तप तपस्या चौथा है सोच सोच माने पवित्रता शरीर की बाहरी पवित्रता और हृदय की आंतरिक पवित्रता यह सनातन धर्म है खड़े खड़े लघु शंका करते हैं पूरे कपड़े में छट्टी पड़ती है

अपवित्र शौचालय की सीट पर बैठकर ल शंका करते हैं उठे चल दिए अपवित्र सौ छुए वसे हाथ धो लिया चल दिए नहीं बाहरी और भीतरी दोनों पवित्रता होनी चाहिए लघु शंका ऐसे स्थान पर करो जहां लौटकर तुम्हारे ऊपर चिट्टी ना पड़े हाथ धोए पैर धोए आचमन कीजिए सोच उतने ही कपड़ा पहन कर होइए जितने प्रक्षालन धो सको और साबुन मात्र से पवित्रता नहीं मानी जाती साबुन से एक बार हाथ धो लो तो एक बार रज से जरूर हाथ धो थोड़ी रज ले लो मान लो आजकल बड़ी आधुनिकता है कि नालियां जाम हो जाएंगी तो थोड़ी रज ले लो और रज का स्पर्श ही पवित्र करता है जल मिट्टी रज आदि से बाहरी पवित्रता और छल कपट गंदी बातें सोचना गंदी बातों के संकल्प बनाना ये सब अंदर की अपवित्र इसका त्याग कर दे छल कपट गंदी बातों का चिंतन गंदी बातों का संकल्प त्याग करने से आंतरिक पवित्रता होती है और बाह्य और आंतरिक दोनों पवित्रता पूर्ण रूप से सुरक्षित रहेगी यदि धर्म का पहला लक्षण सत्य सत्य है हरि सत्य है हरि नाम यदि नाम चल रहा है तो भीतर और बाहर दोनों से पवित्र हो गए सवा

अभ्यांतर सूची वाय अभ्यांतर सूची जो नाम जापक है उस अंदर और बाहर दोनों से पवित्र रहता है जब तक पवित्र नहीं रहोगे तब तक आप उच्च कोटि के विचार वाले नहीं बनोगे पक्की बात समझना जितना आप पवित्र होगे उतने ही आपको दैवी संपदा के विचार आएंगे उतने दिव्य महापुरुष आपसे मिलने आएंगे अव्यक्त रूप से अब आप समझो यह बात हम कह रहे हैं इसमें कितने परसेंट लोग बच रहे हैं पवित्रता बहुत जरूरी है पवित्रता ये जो आज के लोग है ना बोले मन पवित्र होना चाहिए स बाहरी सब क्या तो दिखावा है तो मन कैसे पवित्र होगा बाहर ही तो तुम्हारा मन अपवित्र हुआ है भोगों में शरीर में संसार में तो यहीं से पवित्रता शुरू होगी तब तुम्हारा मन पवित्र होगा बाहर से पवित्र होते होते अंदर पवित्र हो जाओगे बाहर अपवित्र है तो हमारा सनातन धर्म का लक्षण चौथा है पवित्रता पह सत्य फिर दया फिर तपस्या फिर पवित्रता 30 लक्षण है यह सनातन धर्म है इसको समझो पवित्रता बड़ा कठिन है पवित्र रहना आप देखो बड़ा कठिन है पवित्र रना पवित्रता अत्यंत अनिवार्य है सब साधक के

ध्यान पवित्रता अगर पवित्रता नहीं तो आपका विचार उत्तम नहीं हो सकते आप महापुरुषों का जो चिंतन शैली है वहां नहीं पहुंच सकते कल एक आए थे भगत जी एकांतिक में उन्होंने कहा आपने सत्संग में और एकांतिक में कहा कि मन की पीएचडी की है तो हम भी मन की पीएचडी कर रहे हैं तो हम आपसे बात करना चाहते हैं हमारा मन आपका मन क्योंकि आपने भी पीएचडी की हमने भी की तु पढ़ के की बोले हां तुम हम पढ़े थोड़ी पीएचडी हमारा तो विनोद में कहा था हम तो मन को पढ़ा है हमने मन को पढ़ा है

आप मन के विषय में पढ़ा होगा हमने मन को पढ़ा है तो बोले हमारा और मन आपका समान हुआ तुमका तुम्हारे मन को देखने की हमारी रुचि नहीं है और हमारे मन में पहुंचने की तुम्हारी सामर्थ्य नहीं तुम्हारे मन को देखने की हमारी रुचि नहीं है क्योंकि मन मन की रुचि जान ने विधि अनुसरे और तुम्हारा मन हमारे मन तक पहुंच जाए इतनी सामर्थ्य नहीं आज जाएगी मानो देह है हरिवंश शरणागत हो किसी सहचर की कृपा हो जाए तो भले नहीं ऐसे अनुमान से थोड़ी जान सकते हो तितिक्षा पांचवा है सहनशीलता तितिक्षा यह सनातन धर्म है देखो महाराज शिवी ने कबूतर की रक्षा के लिए अपने देह के मानस को काट के तितिक्षा दूसरों के हित के लिए दूसरों के मंगल के लिए भीषण से भीषण कष्ट से जाना भारी से भारी कष्ट धर्म के लिए सह जाना श्री गुरु गोविंद सिंह के दोनों लाड़ले राजकुमार प्राण प्रिय दीवाल में चुना जा रहे हैं लेकिन धर्म के आगे ना उनके हृदय में शोक है ना उनके हृदय में मोह है धर्म के लिए बलिदान तितिक्षा हर कष्ट को सहकर अपने धर्म का पालन करना धर्म का

त्याग नहीं करना धर्म भगवान का साक्षात स्वरूप है अगर आप धर्म के लिए कष्ट सहेंगे तो फिर कष्ट रही नहीं जाएंगे अद्भुत आनंद आएगा तितिक्षा हर कदम धर्मात्मा पुरुष के सामने कष्ट रूपी कांटे बिछाए जाते हैं और जब उन पर व चलता है तो हर कांटा उसके लिए फूल के समान हो जाता है पर इतनी हिम्मत होनी चाहिए धर्म रूपी मार्ग में चलने पर य सूल फूल बन जाएंगे पर पहले सूल पहले सूल इसीलिए धर्म पर चलना बड़ा कठिन होता है तितिक्षा सहनशीलता हर परिस्थिति में सहनशीलता और उचित अनुचित का विचार छवा है यह विवेक सनातन धर्म का छठा लक्षण विवेक सत असत का विचार उचित अनुचित का विचार उचित क्या है अनुचित क्या है सत क्या है असत क्या है इसका विचार यह विवेक से होता है यह विवेक कहां मिलता है बुद्धि तो सबके हो सकती है पर विवेक नहीं विवेक सत्संगी हों को मिलता है बिन सत्संग विवेक ना होई ना होई बिना सत्संग के विवेक हो ही नहीं सकता और सत्संग बिना भगवान की कृपा के नहीं मिलता बिन सत्संग विवेक न होई राम कृपा सुलभ न सोई राम कृपा बिन सुलभ न

सोई उचित अनुचित का विचार सातवा मन का अधीन करना ये सनातन धर्म मन का अधीन करना संयम में लेना जो मन चाहे वो थोड़ी नहीं जो धर्म कह रहा है उसके अनुसार मन को चलाना ये मन का संयम करना बड़ा कठिन है मन का संयम करना बातें बना लेना अधिक बात बड़े-बड़े ज्ञान की बातें आकर जब करते हैं फिर जब मन के संयम की बात करते हैं ईमानदारी से वृंदावन में बैठे हो सत्य बताओ तो फिर चुप हो जाते ज्ञान तभी सार्थक है जब सतेंद्र श्रद्धावन लभते ज्ञानम तत्परा सहित इंद्रिया जो तुमने ज्ञान जाना तत्परा उसके परायण हो और अपनी इंद्री मन को संयम में लो तब तो तुम्हारा ज्ञान सार्थक नहीं तो बकवास है ज्ञान थोड़ी है यह बातें बनाना अलग बात अपने लोग पूरा जीवन इसी में चल रहे हैं पूरा जीवन का निर्णय बता रहे भगवान की कृपा के बिना एक कदम नहीं चल सकते भगवान की कृपा के बिना एक दिन भी पवित्र नहीं रह सकते एक दिन भी य हाथ उठा कहते हैं कोई मु छटे तो भाई अलग है कभी हमें मिले ऐसा कोई कि भाई बकाया हम जैसे बता रहे हैं कि एक दिन भी साधना परायण होकर

पूर्ण पवित्र जीवन तो य भगवान की कृपा से निता पूरा जीवन तो बहुत बड़ी बात है मन का संयम और फिर इंद्रियों का संयो फिर अगला है अहिंसा मन से वचन से शरीर से किसी की भी हिंसा ना करना यह सनातन धर्म है अहिंसा वाणी से ऐसे कठोर शब्द मत बोलो किसी का दिल दुख जाए आपको बोला हो तो उसका स्वभाव है आप सना नातन धर्मावलंबी आप ऐसा ना बोले शरीर से किसी को पीड़ा पहुंचाए ऐसा हमारा आचरण ना हो मन से किसी का बुरा सोचे ऐसा हमारा मन ना हो तो हमारा तन मन वचन तीनों हिंसा रहित हो तभी अहिंसा इस सनातन धर्म का लक्षण हमारे हृदय में आए फिर है ब्रह्मचर्य य सनातन धर्म का लक्षण सत्य दया तपस्या सोच तितिक्षा उचित अनुचित का विचार मन का संयम इंद्रियों का संयम और नवा अहिंसा और दसवा ब्रह्मचर्य यह ब्रह्मचर्य सबके लिए है बहुत घातक है भोगों का आकर्षण ब्रह्मचर्य के बिना पूरा का पूरा खोखला हो जाता है मन से वचन से और शरीर से तीनों से ब्रह्मचर्य होता है मन का ब्रह्मचर्य विषयों का चिंतन ना करना यहीं से नाश प्रारंभ होता है पतन यहीं से होता

है ध्यायतो विषयात संगत सं जायते काम काम क्रोध हो भी जायते क्रोधात भत सम्मोहा सम्मोहा स्मृति विभ्रम स्मृति भ्रम सात बुद्धि नासो बुद्धि नाशाद प्रणति सबसे पहला पतन जो होता है वो विषयों का चिंतन होता है ध्यायतो विषन पुनन जब हम भोगों का चिंतन करते हैं तो हमें भोगों की आसक्ति प्रकट होती फिर संग करने का मन होता है संगा सते सुप जायते जब हम विषयों का चिंतन करते हैं तो विषयों का संग करने का विषय भोगने की इच्छा प्रकट होती है जहां विषय भोगने की इच्छा प्रकट हुई कामराज हृदय में छा गया संगत संजत कामा और कामना जब बड़ी तो सब मढ़ता छा जाती है स्मृति नष्ट हो जाती है हम कौन है हमारा क्या कर्तव्य हम क्या कर रहे सच्ची मानिए बहुत निकृष्ट बहुत निकृष्ट काम वचन से हमें कभी भोगों की बातें नहीं करनी और शरीर से हमें कभी भोग क्रिया नहीं करनी अधर्म युक्त क्रिया का त्याग धर्म युक्त क्रिया की स्वीकृति यह गृहस्थ धर्म और संपूर्ण तया विरक्त धर्म जो ब्रह्मचर्य रहता है उसे शरीर बल मनोबल बुद्धि बल वचन बल यह सब जागृत हो जाते

हैं वचन बल जो बोला वही लागू हो गया जबरदस्ती आपको मानना पड़ेगा और मनोबल जो संकल्प किया अंदर वही बाहर क्रिया प्रारंभ हो गई वही दिखाई देने लगा देह बल रात दिन मेहनत करो फिर भी थकान नहीं आप कुछ समय तक व्यवहार करके देखिए ब्रह्मचर्य का फिर आपको खुद पता चलेगा कि कितना आनंद प्रदान करता है ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी को विषय भोग जहर है ऐसा मानना चाहिए जैसे कितनी भी सुंदर खीर हो और कोई हमारे कान में आकर विसनी कह दे कि इसमें जहर पड़ा है तुम बिल्कुल नहीं खाएंगे हमारे शास्त्र कह रहे हैं महर्षि जन कह रहे हैं कि विषय भोग जहर है महान विषय है यह पूरे जीवन के जीवन को नष्ट कर देता है तो यह जब ज्ञान हो उसका फल है विरती जब हमें ज्ञान हो गया तो हम वैराग्य होना चाहिए पर नहीं यह ज्ञान तो है कि भोगों में सुख नहीं है भोग दुख रूप है भोग जहर के समान है कैसा ज्ञान है वाचिक ज्ञान उपदेश देने के लिए लेकिन जब भोग सामने आते हैं तब यह ज्ञान काम नहीं करता यदि उपासक भोगों से भयभीत हो जाए तो बच जाए बहादुरी नहीं भागना पड़ेगा

इसमें एक बार पूज्य पाद श उड़िया बाबा जी ने स्वप्न देखा स्वप्न में भी कितने सावधान हैं भिक्षा मदही एक घर में आवाज लगाई नारायण नारायण तो एक माई निकली सुंदर अप्सरा हीरे जहारा से रत्नों से भरी हुई थाल आवाज एक घर में लगाई सैकड़ों घरों से निकल आई और सब एक से एक सुंदर और चारों तरफ से घेर लिया और मुस्कुराना हाव भाव प्रकट कर बाबा भागे और बहुत जोर के भागे और कई किलोमीटर तक भागते रहे फिर पीछे मुड़कर जब देखा कि कोई नहीं दिखाई दे रहा तब खड़े होकर सांस ली जब सांस ले रहे थे तो आंख खुल गई आंख खुल गई तो नारायण नारायण नारायण अच्छा हुआ कि स्वपन में भी भागे भागने से ही बचोगे यहां जीतने की चक्कर में मत पड़ना बहुत धोखा है यह मन बहुत धोखेबाज है यदि कोई विषय से ऐसा भय रखे जैसे सांप बिच्छू या सिंह कोई सांप आकर गले लगना चाहे तो आप क्या करोगे भागोगे ना और बाघ देख लो सिंह देख भागोगे ना ऐसे ही विषय भोग की इच्छा वाले कोई शरीर तुम्हारे नजदीक आ रहा है और तुम्हें भय नहीं लग रहा है इसका मतलब है मरना चाहते हो भ्रष्ट होना

चाहते हो नष्ट होना चाहते हो सिंघ आ रहा तुम्हे भागना नहीं सुवाई दिया सांप दौड़ रहा तुम्हारी तो भागना नहीं सुवाई दिया ऐसे ही भोग तुम्हारी तरफ आ रहा तुम भागे नहीं मरना चाहते मरोगे तुम कोवा मदांध मदनानंद में बड़ा अंधा कौन है बोले जिसको काम सता जाए जो काम से युक्त हो गया काम से व्याकुल हो गया व सबसे बड़ा अंधा है वह कुछ नहीं समझ पाएगा आप बड़े मजे से भोग को देखते हैं और भोगते हैं और फिर विचार करें ब्रह्मचर्य असंभव जैसे जलेबी है एक बार चख लिया तो जलेबी नाम लेते ही व कुरकुरा हट व मुंह में आ जाएगा नहीं आ जाएगा इसे कहते हैं तृष्णा भोग भोगा अब वह तृष्णा जहर की तरह तुम्हारे हृदय में बस गई अब वह भगवान निकाले तो निकाले नहीं तो पूरा जीवन भर मार देगी भोगों का जहर तृष्णा तृष्णा अनंत जन्मों से हम भोगते चले आ रहे हैं इसलिए हमारी पवस हो गई है पवस इंद्रिय और भोगों में विव सता हम हार चुके हैं लेकिन मोक्ष का रास्ता जितेंद्रिय से जुड़ता है पर वता से नहीं इसलिए आपको एक इंद्रियों के भोगों से जीतना पड़ेगा लड़ना

पड़ेगा भटकते रहने से यह जन्म भी चला जाएगा जैसे और जन्म चले गए बहुत बार य सब भोगा है देवराज इद्र भी बने होंगे कभी ना कभी बहुत बार बहुत बार स लेकिन भगवान के प्रेम भक्त कभी नहीं बने जिंदगी में पक्की बात इस बार अवसर मिला है भगवान से प्रेम करने का कोलेजी अल्ल जीी के चरित्र में नहीं आता कि बचपन से बैरागी और एक राजा की उपवन वाटिका में व शयन कर रहे थे वही वह सब राजकुमार सब वैभव सब देख कर के उनके मन में ऐसी लालसा आ गई कि यार यह सुख तो बहुत बढ़िया है तो भगवत प्राप्ति रुक गई और उनका अगला जन्म हुआ और राजकुमार से मित्रता ई और सारे भोग उनको मिले अगर कोई वासना लेकर इस मार्ग में तो फिर पहले वासना पूर्ति होती है यह मन मकड़ी के जाले की तरह वासना बनता रहता है छोड़ दो इसे बस ये अपना काम करता है और हमको फसा है जाल ये बुनता है और फसा हमको है इसीलिए उपासक मन के जाल को बनने ही ना दे राधा राधा राधा राधा वो कहेगा नहीं सुनो ऐसे से राधा राधा वह आपको फसा नहीं पाएगा यह तमोगुण राक्षसी आहार विहार करके आप सच्चिदानंद

भगवान को नहीं नहीं मान जाओ जहां प्याज लहसुन जैसे ये तमोगुण होने के कारण बहुत पवित्र वस्तु की तरह प्रकट होते हैं कोई अपवित्र वस्तु थोड़ी है आप देखो जहां आलू प्रकट होती है शकरकंद प्रकट होती है ठीक उसी खेत में वैसे हीय प्याज लहसुन प्रकट होते हैं यह कोई ऐसा थोड़ी कि हत्या वाला दोष या किसी तरह गलत तरह से बनाया गया पदार्थ हो यह तो प्राकृतिक है पर इसका गुण घोर तमोगुण है बस तमोगुण के कारण इसका त्याग किया इसीलिए संत महात्मा जन इसका त्याग करते तमोगुण आहार इसको नहीं पाते फिर जहां और राक्षसी परवति के आहार विहार है तो फिर वह यह मन मकड़ी की तरह जाला बुनता और हमको फसा है यह छह हमको हर समय फसाए रखते हैं काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर यदि ब्रह्मचर्य रहना है तो हमें बहुत संभालना है तीन को वाणी से हमको कभी भी ब्रह्मचर्य हीनता वाली बातें नहीं करनी बहुत य बिल्कुल अनुभव की बात कह रहे हैं अगर आपको जम जाए तो निकल जाओगे किसी भी तरह से अश्लील बात गंदी बात बाणी से नहीं निकालनी मौन हो जाओ मत बोलो बहुत चीजें ऐसी होती

हैं जो अनुभव करके बोली जाती है वाणी से आप रोज किसी से कहो झूठी ऐसे मैं आपके बिना नहीं जी सकता मैं आपके बिना नहीं जी सकता एक दिन आपके मन में आ जाएगा मैं आपके बिना नहीं जी सकता एक दिन आप स्वीकृति स्वयं में कर लेंगे कि मैं आपके बिना नहीं जी सकता वाणी से बोलते रहो तुम देख लेना एक दिन किसी एक से बोलते रहो मैं आपके बिना नहीं जी सकता फिर दूसरे दिन बोलना मैं आपके कुछ दिन में मन से आ जाएगा मैं आपके बिना नहीं जी सकता फिर स्वयं में आ जाएगा मैं आपके बिना नहीं जी सकता जब हम वाणी से गंदी बातें करते तो तुरंत मन उसका चिंतन करता है और वह लसित हो जाता है इसलिए वाणी से पहला ब्रह्मचर्य हमें रसना कटो जो अन रटो अन बात जो प्रियालाल से विमुख करने वाली बात जो कुत्सित बाद विकार है जो विकार बढ़ाने वाली गंदी बात है वह हमें नहीं करनी नियम ले लो नहीं करनी आज से नियम ले लेते जितने लोग कथा सुन रहे हैं कोई इसमें पैसा लगने की बात नहीं वाणी से हम गंदी बात अश्लील बा बात गलत बात नहीं बोलेंगे वाणी का ब्रह्मचर्य वाणी से

गंदी बात नहीं बोलेंगे अश्लील बात नहीं बोलेंगे जो भगवत विमुख करने वाली बात है हम नहीं बोलेंगे नियम ले लो कोई कसम खाने की बात थोड़ी नियम ले लो जहां ऐसी बात आवे मौन हो जाओ दूसरी बात श्रवण इद्री से हम कभी अश्लील बात नहीं सुनेंगे गंदी बात नहीं सुनेंगे बहुत प्रभाव पड़ता है बहुत प्रभाव पड़ता है श्रवण इद्री से जो हम सुनते हैं उसका तत्काल मन पकड़ कर के मनन करता है और वह उसी तरफ चल पड़ता है जिस तरफ की बात हम सुनते हैं और नेत्र इद्री से जो हम देखते हैं व बहुत तुरंत प्रभाव पड़ता है देखो नेत्र इद्री से ऐसी कोई ग्रंथ मत पढ़ो कॉपी ऐसी पुस्तिका जो ब्रह्मचर्य हीनता वाली है ऐसे कोई दृश्य मोबाइल से मत देखो जो ब्रह्मचर्य हीनता वाले हैं ऐसे कोई दृश्य बाहर मत देखो पशु पक्षी आदि मैथुन करते हुए ऐसे कभी मत देखो इसका बहुत बड़ा प्रभाव होता है अगर इन तीन का संयम कर सको तो आपके ब्रह्मचर्य में बहुत लाभ मिलेगा पहला वाणी से दूसरा श्रवण इद्री से तीसरा नेत्र इद्र से और खास बात ये है कि जिससे हमारा ब्रह्मचर्य नष्ट होता

उससे सानिध्य ना दे कभी ऐसी कोई क्रिया ऐसे कोई व्यक्ति का संयोग जो हमारे ब्रह्मचर्य का आघात करे बहुत बहुत सावधानी पर ये ऐसा दलदल है कि एक बार जो फस गया भगवान निकाल सकते हैं जिस समय मन अपने स्वरूप में आया वो सब करवा लेगा बहुत विचित्र है बहुत विचित्र है बहुत विचित्र मन का खेल हमें ऐसा कोई रिश्ता नाता कोई संबंध जो हमारे ब्रह्मचर्य को नष्ट कर रहा है दूरी बनानी चाहिए और भोजन का ब्रह्मचर्य पर बहुत बड़ा प्रभाव है यदि आप अधिक मिर्च वाली घर में ही बना केर कह अधिक मिर्च वाली अधिक तेल घी वाली यह पदार्थ पाएंगे तो ब्रह्मचर्य स्वाभाविक नष्ट हो जाएगा बिना किसी क्रिया के ब्रह्मचारी को एक बीमार की तरह भोजन पाना चाहिए जैसे मूंग की दाल है घिया की सब्जी रोटी बस क्योंकि उसे पावर की जरूरत नहीं है उसे अधिक पावर की जरूरत नहीं है स्वयं में सामर्थ्य सुरक्षित है इसलिए बाहरी पदार्थों से बादाम चवा रहे काजू चवा रहे हैं हलुवा खा रहे हैं और बहुत प्रकार के मीठा आद मीठा तो ब्रह्मचर्य में थोड़ा बस ले ले इसके बाद अधिक मीठा

भी वह जहर का काम करेगा स्वाभाविक ब्रह्मचर्य को नष्ट कर देगा जो भोजन कब्जियत बनाती है अगर ऐसा भोजन पाया जाएगा तो ब्रह्मचर्य अपने आप स्वप्न दोष के रूप में नष्ट हो जाएगा सात्विक भोजन पेट साफ बहुत आवश्यक हल्का भोजन कम मात्रा में पेट उधर तो बहुत सुंदर आपके भजन की वृत्ति बढ़ेगी आपका ब्रह्मचर्य बहुत लंबे समय तक आबाद चलेगा बाजार की वस्तु तो ब्रह्मचारी को ब्रह्मचारी होकर बाजार की वस्तु तो मुझे समझ में नहीं आता बाजार की वस्तु तो नहीं खानी चाहिए बनी हुई बाजार की वस्तु बनी हुई एक ही चीज को आप गौर से पा करके किसी एक चीज को बजार के फिर देखो आपके अंदर स्फू क्या होती है पहले कैसे हो रही थी फिर कैसे हो रही और आप पवित्र भोग लगा के श्री जी को पवा के पाके फिर देखो कैसी स्मरणा हो रही भजन की भजन परम पवित्र वस्तु ऐसे थोड़ी होता जहां तहां अन्न खात सखी कहत आपका सकल दिवस द्वंद जात रात सर्व सु श सेवक जी महाराज जहां तहा अन्न खा बाजार का भोजन हो बोले ब्रह्मचारी जी हैं नहीं हो पाएगा भाई ब्रह्मचर्य नहीं हो पाएगा

नाम लिख सकते हो टाइटल तो बन सकता है लेकिन सही माने में आपका ब्रह्मचर्य जब तक आपका आहार शुद्ध अगर अपने धर्म को सुरक्षित रखना चाहते हो तो बाजार का भोजन और छोटे-छोटे बच्चों में बहुत सी गलतियां ऐसी आ चुकी है जो उनके जीवन को नष्ट कर रहे हैं हमें ऐसे कई बच्चे मिले हैं तो माता-पिता को चाहिए कि छोटे बच्चों से भी मित्रता का व्यवहार करें उनको इतना फ्री करें कि वह आपसे अपनी बात बता सके और आप उनको सही दिशा दे सके नहीं जैसे 13 14 वर्ष के बच्चे हैं और यह गंदी क्रिया कर रहे हैं इनका जीवन बहुत बुरी तरह नष्ट हो जाएगा ये गृहस्ती लायक नहीं रहे विरक्ति तो बहुत बड़ी बात रह गई य गृहस्थी लायक नहीं रहेंगे संतान उत्पन्न करने लायक नहीं रहेंगे इसलिए माता-पिता को चाहे कि अपने बच्चों से फ्रेंड की तरह दोस्त की तरह बात करें उनको इतना उत्साह दे कि उनके अंदर जो गलती है वह पकड़ ले और प्यार से समझा दे अगर हम बार-बार बच्चों को समझाएंगे नए-नए बच्चे अभी गलत मार्ग में जो जा रहे हैं वह सुधर जाएंगे हमारे सनातन धर्म का लक्षण है

ब्रह्म फिर है त्याग दूसरों को सुख देने की वृत्ति का नाम त्याग है अपने सुख को दूसरों में बांटना ज्ञान सुख हमारे पास संपत्ति सुख जो भी सुख है सबको भाव से धर्म के अनुसार सुख देने की भावना ही वास्तविक त्याग है शास्त्रों का नित्य स्वाध्याय करना य सनातन धर्म का लक्षण है स्वाध्याय रामचरित मानस है गीता जी है श्रीमद् भागवत है गीता प्रश बहुत सी बड़े-बड़े महापुरुषों की छोटी-छोटी ग्रंथ है जैसे पूज्य राधा बाबा के भाई जी पूज्य जयदयाल जी पूज्य स्वामी रामसुख दास

जी महाराज इन महापुरुषों की छोटी-छोटी पुस्तिकाएं हैं उनको ले लेना चाहिए एक एक पेज रोज पढ़ना चाहिए रोज अपने घर में चाहे 10 मिनट ही कहो श्रीमद् भागवत या रामायण इन गाथाओं को गाओ जिससे तुम्हारा घर पवित्र हो तुम्हारे परिवार के जनों के कान में पड़े तो मंगल हो यह सनातन धर्म है फिर सरलता बहुत सरल स्वभाव होता है सनातन धर्म का अवलंब का यह मुख में कुछ और हृदय में कुछ और आचरण में कुछ और यह छल कपट नहीं सरल स्वभाव न मन कुटिला सनातन धर्म भगवत स्वरूप है फिर संतोष

जिसमें भगवान प्रसन्न हो हमें बिल्कुल वैसे ही राजी रहना है हमें इंद्रिय और मन के अनुसार ऐसे आचरण नहीं करने जो भगवान के विमुख हो जैसे भगवान हमें रख रहे हैं हम उसमें संतुष्ट हैं जैसी परिस्थिति में रख रहे पर सच्ची संतुष्ट भगवान के विधान में रत होकर के भगवत आचरण करने से होगी भगवत विमुख नहीं जिसमें भगवान राजी वही हमारे श्री कृष्ण अनुकूलन प्रतिकूल विसर्जन संतोष आ जाएगा हृदय शीतल हो जाएगा और समदर्शी संत महात्माओं की सेवा सनातन धर्म संत महात्माओं की सेवा लेकिन शर्त रखे समदर्शी जो भगवत के ज्ञाता सर्वत्र भगवान की अनुभूति करने वाले महात्मा है उनकी सेवा धीरे-धीरे भोगों की निवृत्ति का अभ्यास सनातन धर्म मनुष्य के अभिमान का फल बड़ा उल्टा विनाशकारी होता है ऐसा विचार करके अभिमान का त्याग और मौन वाणी से अधिक ना बोलना संयम पूर्वक बर्ताव करना या मौन रहना भगवत चिंतन देख लो यह सनातन धर्म के 30 लक्षणों में हर समय भगवत चिंतन परायण नहीं तो सनातन धर्मावलंबी नहीं माने जाओगे प्राणियों को उत्तम उत्तम भोजन पदार्थ बांट

कर के खाना अगर घर में भी अच्छा पदार्थ बने तो सबसे पहले बूढ़ों को रोगी बच्चे फिर अगर नौकर चाकर है तो उनको भी दे यह बात ध्यान रखना अगर कोई नौकर देख रहा है आप अच्छे पदार्थ पा रहे हो आपने उसको नहीं दिया यह अपराध है आपका आपके लिए व हानिकारक हो जाएगा पहले हम इतना ही दे दे एक दोने में थोड़ा अच्छा पदार्थ ले जाओ पाओ जाकर के और फिर आप कोई ऐसा ना हो कि आप अच्छे पदार्थ पा रहे हो उसका हृदय देख कर के ललचा गया तो उसके हृदय में भी भगवान विराजमान है वो भोजन तुम्हारे लिए हानिकारक हो जाएगा अच्छे-अच्छे पदार्थ दूसरों को बांट करके पवा करके पाना सब जीवों में खास करके मनुष्यों में अपने इष्ट देव का भाव रखना और भगवान के नाम गुण लीला का श्रवण कीर्तन स्मरण भगवान की सेवा पूजा नमस्कार भगवान के प्रति दास सख्य आत्म समर्पण यह 30 सनातन धर्म के लक्षण हैं सत्य दया तपस्या सोच तितिक्षा उचित अनुचित का विचार मन का संयम इंद्रियों का संयम अहिंसा ब्रह्मचर्य त्याग स्वाध्याय सरलता संतोष समदर्शी महात्माओं की सेवा धीरे-धीरे

सांसारिक भोगों की चेष्टा से निवृत्ति मनुष्य के अभिमान पूर्ण प्रश्नों का फल उल्टा ही होता है विनाशकारी ऐसा विचार मौन और भगवत चिंतन प्राणियों को अन्ना आदि पदार्थों का विभाजन करके पाना और विशेष करके संपूर्ण चराचर जगत में मनुष्यों में इष्ट देव का भाव रखना सब जीवों में रखना पर विशेष करके मनुष्यों में और भगवान जो परम करुणा उनके नाम गुण लीला आदि का श्रवण कीर्तन स्मरण सेवा पूजा नमस्कार दास सक्य आत्म समर्पण यह 30 सनातन धर्म के लक्षण है जो मानव इनका पालन करता है वह सीधे भगवान को प्राप्त हो जाता है यह धर्म है हमारा यह हमारा सनातन धर्म है जो इन 30 लक्षणों का पालन करे तो धन्यवाद है और कोई लक्षण ना एक लक्षण पकड़ लो नाम 29 आ जाएंगे अपने आप नाम जब पकड़ लो हो तो 29 लक्षण अपने आप आ जाएंगे और 29 लक्षणों का फल मिल जाएगा अपने आप नाती याद रहे आपको तो एक याद कर लो भगवान का जो नाम प्रिय हो खूब नाम जप करो इसी से सब साव पुनम परो धर्मो यतो भक्ति अधो जिससे भगवान अधो में भक्ति हो जाए वही परम धर्म है तो नाम जप करो

नाम जप से सब धर्मों का अपने आप पूर्णता हो जाएगी सब धर्मों की जो 30 लक्षण धर्म के हैं वो अपने आप पूर्ण हो जाएंगे शेष चर्चा आग श्री राधा वल्लभ लाल की जय

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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