॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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भगवन्नाम कीर्तन का प्रभाव / श्री पण्डित बाबा के परम प्रिय ये सात श्लोक / भक्ति का महत्व // 18/02/25

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पूज्य महाराज जी द्वारा रसिक वाणी की व्याख्या — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

वृंदावन स्वरी तैव पदारविंदम प्रेमा मृतक मकरंद रस पूर्णम हदर पितम मधु पते स्मर ताप मु ग्रम निर्वा पय परम शीतल मा शयाम निर्वा पय परम शीतल मा श्रय परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नव निवत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले युगल सरकार प्राणा आराध्य प्राण प्रिय श्री प्रिया प्रीतम जू समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी तरु लता श्री यमुना रस रानी रज रानी समस्त बृजवासी परिकर के चरणों में कोटि शह प्रणाम कोटि शह नमन नमस्कार प्रभु का विधान अटल है अगर उस विधान को कोई परिवर्तित कर सकता है तो भगवन नाम ही कर सकता है भगवान के विधान को भी जो टाल सके इतनी सामर्थ्य केवल भगवान के ही नाम में है अनंत जन्मों से हम भटक रहे हैं इसी विधान में तो भगवान ने माया माया त्रिगुण मय त्रिगुण मय माया के द्वारा कुछ शुभ कर्म कुछ अशुभ कर्म शुभ कर्म का फल सांसारिक सुख लोक परलोक के सुख और अशुभ कर्म का फल दुख इसी विधान को भोगते हुए हमारे न जाने कितने कल्प व्यतीत हो गए आज सदगुरु की कृपा से पता चला

भगवन नाम ही इस आवागमन के चक्र को सुख दुख के चक्र को मिटा सकता है अब हमें अवसर नहीं चूकना चाहिए बढ़िया दाव लग गया है जैसे बने तैसे अगर भोगों का त्याग नहीं हो सकता तो भगवन नाम का त्याग क्यों करो यदि बुराई नहीं छोड़ सकते तो अच्छाई को क्यों छोड़ दो कम से कम अच्छाई तो पकड़े रहो तो एक दिन जिसकी सत्ता नहीं है वह बुराई नष्ट हो जाएगी यदि नाम को पकड़े रहे तो असत की सत्ता नहीं है यह शुभ शुभ कर्म असत है ये संसार असत है यह दृश्य सब असत है सत्य है सत्यम सत्यम पुनः सत्यम हरेर नाम केवलम भगवान का नाम सत्य है इस असत संसार से हमें भगवान ने तो छुड़ाया नहीं क्योंकि भगवान अनंत काल से अनादि काल तक हमारे हृदय में ही रहेंगे पर हमारी जिव्या पर जब तक नाम नहीं आया तो भगवान भी सो रहे हैं नाम जीह जप जाग जोगी जब जीव से नाम जपना शुरू किया तो जगना प्रारंभ हो गया हमारा हमारे भगवान का भी और जब नाम रात दिन चलने लगा तो भगवान हृदय में प्रकाशित हो गए और हमारी अविद्या की नींद सदा सदा के लिए खुल गई इसलिए नाम नाम ना भूलो चाहे

कार्यरत हो या कार्य विरत हो भोग रत हो या भोग विरत हो नाम ना छोड़ना नाम नहीं छोड़ोगे तो जीत जाओगे नाम छोड़ दिया तो हारे तो है ही श्रीपाद प्रभु दन जी महाराज कह रहे वाण गदगद या कदा मधु पते नामानि सं कीर्त धारा भीर नयना भम तरु तल छोण कदा पंक दृष्ट वा भाव नया पु मिल दिव स्वात भोगम महो द्वंद हेम हरि मणि छवि कदा नन से मुहर हल हाय मैं कब अपनी वाणी से गदगद कंठ होकर भगवान मधुपति श्री कृष्ण के नाम और गुणों का गायन करूंगा वाणिया गदगद या कदा मधुपति नामा सं कीर्त श्री हरि राम व्यास जी भगवान के मधुर नामों का पद गायन कर रहे हैं जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय जगदीशा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय जगदीशा असुर संघन विपत विदारण ई सन के ईसा असुर संघ न विपत विदारण न के साथ जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय जगदीशा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय जगदीशा कृष्ण मुरारी कुंज बिहारी कृष्ण मुरारी बिहारी बाल मुकुंद दे गोपाला बाल मुकंदे गोपाला दीन उधारी

संत सुधारी न उधारी संत सुधरी गिरधारी गोपाला गिरधारी गोपाला दीन उधारी संत सुधारी गिरधारी गोपाला दी सुधारी संत सुधारी गिरधारी गोपाला कृष्ण मुरारी कुंज बिहारी बाल मुकुंद लाला कृष्ण मुरारी कुंज बिहारी बाल मुकुंद जद कुल नायक दीन सहायक ध कुल नायक दन सहाय सुखदायक जन बंधु सुखदायक जन बंधु सुषमा सुंदर महिमा मंदिर सुमास महिमा मंदिर करुणा पूरण सिंधु करुणा ण से जय श्री कृष्ण जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जगदीशा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा सुर

संघार विपत विदान नह के ई सा सार विपत विदारण न धन गहन बन घन सोहन धन गहन बनधन सोहन मनमोहन ब्रज चचंदा महन बज नटवर नागर पर उजागर नागर परम उ सागर गुण सागर गोविंदा सागर गोविंदा नटवर नागर परम उजागर गुन सागर गोविंदा सागर परम उदाग गुन सागर भो जद कुल नंदन दनुज निकंदन धुल नंदन नुज न करत सनन सेवा भत सनन सेवा जय गरुणा सन प्रेम प्रकासन ज करुणास प्रेम प्रकाशन व्यास दास कुल देवा दस दास कुल देवा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जगदीशा जय श्री कृष्णा जय श्री क कणा जय श्री कृष्णा जगद असुर संघन विपत विदारण ई सन के ईसा सति विना न के ईसा जय श्री कृष्णा जगदीशा जय श्री कृष्णा जग वाण गद गद या कदा मधुपति ना मान संकीर्तन हमारी वाणी गदगद कंठ से युक्त होकर सदैव मधुपति भगवान श्री कृष्ण के नामों का कीर्तन करें धारा विनय नाम बसाम तल क्ण कदा पंक मेरे नेत्रों से इतने आंसू गिरे कि जहां मैं बैठ जाऊं वहां की धूल गीली हो जाए पंकल कीचड़ बन जाए इतना मैं भगवान के आनंद में या विरह में रोऊ कि जहां बैठू वहां की भूम

गिली हो जाए गदगद कंठ से भगवान को पुकारू अधारा से भूमि को पंकल करू दृष्ट वा भाव नया पुरो मिल दिव स्वात भोगम महो अहो मैं ऐसी भावना के आवेश में मैं प्रिया जू की हूं इसी भावना में मेरी सारी दिनचर्या जाए हर समय में सहचर भाव की ठसक में रहकर श्री श्यामा श्याम की सेवा में समय व्यतीत करूं वाणी से गुणा गुणावा करू गदगद कंठ नैनों से अधारा बहाऊं और हृदय से भावा वेश में मैं श्री जी की सखी हूं चरी हू आठो पहर उनकी सेवा में रह और विशिष्ट दंद हेम हरिन मणि छवि कदा नन से मुहर बहला अपने सामने इंद्र नील मणि श्याम सुंदर ताप कचन कंचन गौरांग श्री प्रिया जू की शोभा देखकर विकल हो जाऊं और वृंदावन की भूमि में लटू ऐसा कब होगा हाय मेरा जीवन कब ऐसा होगा भोगों से विरत होकर भगवन नाम कीर्तन करते हुए अशु प्रवाह से भूमि को पंकल करते हुए भावा वेश में आठो पह श्री जी की सेवा में रहते हुए अचानक प्रिया प्रीतम का दर्शन पाकर विकल होकर वृंदावन की भूमि में रज में लूटू ऐसा कब सौभाग्य होगा वृं निकुंज शी मनि वसन प्रेमार चिंतन स्व प्राण

क धनमंडी कश्चन मतो वाधा केवल श्री धाम वृंदावन में ही वास का दृढ़ नियम लेकर वृंदावन की सीमा के बाहर ना जाना और वृंदावन में वास करते हुए एक क्षण भी प्रिया प्रीतम को ना भूलना आठो पहर प्रेमार होकर उनकी सेवा का ही चिंतन करना अब श्रृंगार करना है अब भोग लगाना है अब श्री जी को सन कराना है श्री जी का उत्पन कराना है श्री जी को वन विहार कराना है अब श्री जी का बहुला करना है श्री जी को सन भोग लगाना है श्री जी को सन कराना है आठो पह श्री जी की सेवा का ही चिंतन इसी में डूबे रहे और अकस्मात अपने जीवना श्री युगल सरकार को अपने सामने देख कर के प्रकट प्रेमा तुरस चिंतन प्रेमा आतुर होकर उनका चिंतन कर रहे हैं अकस्मात देखा कि सामने युगल सरकार खड़े स्व प्राणिक धनमंडी अकस्मात मैंने देखा कि अरे मेरे सामने तो प्रिया प्रीतम विराजमान है कैसे श्यामा कांचन चंद्रिका रसमय गौरी श्री श्यामा ज अद्भुत कांति प्रकाशित करती अद्भुत गौर वर्ण है हमारी श्री लाडली जू का और घनश्याम श्री लाल जू महाराज हरिन मणि छवि इंद्र नील मणि जैसी

कांति हरि की ऐसी रसमय गौर वर्ण छटा किशोरी दोनों को उनको देख कर के उनके चरणों में लौट जाऊंगा य भावना देखो अकस्मात देखा दोनों के चरणों में लूट गए और दोनों एक एक हाथ पकड़कर उठाए और शीतल मधुर वाणी से हमसे बात किए ऐसा कब होगा हमारे जीवन में पहले श्लोक में कहा वाणी से निरंतर प्रभु का नाम जप नाम कीर्तन करते हुए आंसुओं से अशु धारा बहाते हुए वृंदावन की भूमि को गीली करते हुए अपने भावात्मक सहचर स्वरूप रू की ठसक में आठो पहर उनकी सेवा करते हुए अकस्मात युगल दर्शन हुआ और हम भूमि पर लठन करने लगे दूसरे में वर्णन किया कि श्री वृंदावन नौ निवृत निकुंज में सीमा में वास करने का दृढ़ संकल्प कभी वृंदावन के बाहर नहीं जाऊंगा चाहे जैसी हमारी कष्टम परिस्थिति हो मैं भोग पर वृंदावन से बाहर नहीं जाऊंगा और प्रेमार होकर प्रिया प्रीतम की सेवा का चिंतन प्रिया प्रीतम की रूप माधुरी गुण माधुरी का चिंतन करते-करते अकस्मात देखा कि श्यामा ज जो गौर वर्ण महा रसमई छटा है जिनकी और घनश्याम श्री लाल जो महाराज इंद नीलमणि छटा है जिनकी

दोनों गलया दिए सामने खड़े हैं तो साष्टांग दंडवत उनके चरणों में लट गए एकएक हाथ पकड़ कर के दोनों ने हमें उठाया और दोनों हमसे बात किए निहा कर दिया यह सौभाग्य ब्रह्मा जी को भी आज तक नहीं मिला द श्रीपाद कह रहे एक एक कर कमल पर एक प्रियाज ने कर कमल पकड़ा एक लाल जू ने दोनों उठा ली और दोनों बात कर रहे हैं हमसे यह सौभाग्य ब्रह्मा जी को भी नहीं मिला यह सौभाग्य बड़े बड़े देवताओं ने देव ब्रह्मा देर नखल हरि भक्तन सुदा भगवान के सुद जनों को भी सौभाग्य नहीं मिला यह सौभाग्य देने वाली वृंदावन की भूमि है वृंदावन के रसिक जन है वृंदावन का अखंड वास है और प्रिया प्रीतम का अनन्य भाव से चिंतन यही प्रदान करता है पूज्य पाद श्री पंडित गया प्रसाद जी महाराज साधक के जीवन में कटुता को सर्वथा आभाव होना चाहिए कट स्वभाव नहीं होना चाहिए मृदु स्वभाव होना चाहिए इतने बड़े संसार में अपनो एक हो शत्रु ना होए तब भगवान की प्राप्ति होगी एक भी शत्रु नहीं होना चाहिए किसी से भी थोड़ा भी द्वेष होगा तो भगवत प्राप्ति नहीं होगी लाला बाबू

उनका चरित भी है व जब श्री कृष्ण दास जी से कहते गुरुदेव भगवान थे उनके कि अब विरक्त भेस दे दो कहते अभी नहीं एक लंगोटी लगाते झोली टांग करर मधुकरी मांगते रात दिन भजन करते लाला बाबू जी उनके श्याम चंद्रमा जी ठाकुर जी बहुत महिमा में है उन्होंने विचार किया कि मेरे में कौन कमी है जो गुरुदेव मुझे विरक्त भेष नहीं दे रहे सर्वस्व धन का त्याग सब भोगों का त्याग कोपन बंता खल भाग्यवंता एक लंगोटी लगाए हुए मधुकरी से जीवन यापन कोई उनको त्रुटि नहीं दिखाई देती और जब कहते तब कहते अभी नहीं अभी तुम योग्य नहीं हुए हो विरक्त वेष के तो उनके दिमाग में आया कि र नाथ जी के सेठ से उनकी लाग डाट चलती थी द्वेश था रंगनाथ जी के सेठ से तो उन्होने विचार किया कि शायद सृष्टि में और किसी से हमारा द्वेष नहीं रंगनाथ जी के सेठ से शायद यही हमारी विरक्ति में बाधा पड़ रहा हो रोज सुबह रंगनाथ जी में भिखारियों को कुछ पदार्थ बांटे जाते थे उसी पंक्ति में डाला बाबूजी लग गए जाके सेवकों ने देखा रंगनाथ जी के सेठ वृंदावन में थे उनसे प्रार्थना

की कि लाला बाबू लाइन पर लगे हुए हैं जहां भिखारियों की अरे उका भिखारियों की लाइन में क्यों लगे हुए हैं व तो बड़े महापुरुष है तो हाथ में थाल और थाल में रत्न आद लेकर के आए और कहा बाबू जी आप भिक्षा की पंक्ति में क्यों खड़े हैं आपका तो स्वागत है तो उका नहीं मैं भिक्षुक हूं मुझे मुझे एक मुट्ठी चावल केवल जैसे सबको बांट रहे हो ऐसे मुझे दे दो वो गले लगा लिए बोले मैं आपका भिखारी हूं मुझे केवल भिक्षा चाहिए रंगनाथ जी के सेठ ने गले लगा लिया राग द्वेष खत्म हो गया वहां से लौट रहे थे तो रास्ते में मिले गुरु जीी और कहा लाला बाबू आज तुम्हें विरक्त भेस दे देंगे एक भी व्यक्ति से यदि द्वेष है तो भगवत प्राप्ति के मार्ग में बाधा है इसलिए पंडित गया प्रसाद जी महाराज कह रहे बाबा गिरिराज वाले इतने बड़े संसार में अपनों एक ह शत्रु न बन पावे सेवक जी महाराज लिखते हैं हरिवंश नाम लीन जे अजात शत्रु ते सदा प्रपंच दंभ आदि दय तहा कछु न पखे जो श्री हरिवंश श्री हरिवंश श्री हरिवंश ऐसा नाम रटता है इस नाम के प्रभाव से संसार में

उसका कोई एक भी शत्रु नहीं होता अजात शत्रु से ही कहते हैं पूरी सृष्टि में एक भी कोई दुश्मन ना हो एक भी कोई द्वेष का पात्र ना हो तभी वह सर्वात्मक प्राप्त कर पाता है तो इतने बड़े संसार में अपनो एक हो शत्रु ना बने और ना काहू स आसक्ति रहे किसी से ज्यादा आसक्ति ना हो जाए ना किसी से बैर और ना किसी से मित्रता सम अवस्था सबके प्रति समान भगवत भाव ना काह सो आसक्ति और ना काहो सो विरोध कबीरा खड़ा बाजार में सबसे पूछे खैर ना काहो सो दोस्ती और ना काहो सो बैर किसी

से ना दोस्ती ना किसी से बैर एक ही ईश्वर की संतान हुए वे सो सब ही अपने बंद हुई है क्योंकि मित्र से दृष्टया समीक्षा महे वेद भगवान आज्ञा करते हैं कि सबके प्रति मैत्री भाव रखो पर कहीं आसक्ति ना होने पावे भगवान ने भी कहा अष्टा सर्व भूता नाम मैत्र करुण लेकिन निर्मम मित्रता हो पर ममता ना हो मित्रता हो पर आसक्ति ना हो यह बड़ी कला है अध्यात्म ही इसमें पुष्ट देता है कि हमारी आपसे मित्रता है पर ममता नहीं आसक्ति नहीं है मित्र से दृष्टया समीक्षा में है सेवक जी महाराज सेवक वाणी में वर्णन करते हैं सब जीवन सो प्रीति पर ति निहत आपनी हरिवंश धर्म की रीति क्या है सुख देवे को चाव चित सब सोहित निष्काम निष्काम सब जीवन स प्रीति पर रीति निभाता अपनी अपनी रीति क्या है सब सो हित निष्काम मति किसी से कुछ नहीं चाह स्वार्थ बसात किसी से प्रेम नहीं सबसे निष्काम प्रेम यह प्रेमी धर्मी की एक वृत्ति होती है उसमें स्वार्थ भाव रहता ही नहीं है वह सबसे प्यार का बर्ताव करता किसी से भी आसक्ति नहीं किसी से ममता नहीं किसी से कोई

चाह नहीं श्री वृंदावन और गिरिराज जी की परिक्रमा की रज सदैव शरीर में लगी ही रहे रज सदैव शरीर में लगी ही रहे दूसरों तुम्हारी निंदा भले ही करें तुम अपनी निंदा सुन ले पर काह की निंदा कबहु मत करो वृंदावन गिरिराज जी की परिक्रमा की रज शरीर में लगी रहे और तुम्हारी कोई निंदा करे तो उसे सहलो तुम किसी की निंदा मत करो कोई तुम्हारी हानि कर दे पर तुम पलट के काहो की हानि मत करो कोई तुम्हारा अपमान कर दे तो तुम सह लेयो पर तुम काह को अपमान कबहु मत करो ना कबहु काह पर क्रोध करो क्योंकि तपस्या एवं यज्ञ आदि कों को जो दान दिया जाता है क्रोध आने पर वह सब नष्ट हो जाता है तपस्या पुण्य यह सब नष्ट हो जाता है जब क्रोध आता है इसीलिए काम क्रोध लोभ को नरक का द्वार बताया गया है त्रिविध नरक सदम द्वार नासन आत्मन कामा क्रोधा तथा लोभ तस्मा देम तेजे काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ सब परिहर रघुवीर भजो भज ज संत भजन कब होता है जिन जैसे संत जन भजन करते जब काम क्रोध मद लोभ का त्याग कर दिया जाए क कि सीधे नरक के द्वार है कामा

क्रोधा तथा लोभा तस्मा दे त्रेम तजे इन तीनों का त्याग कर दे भगवान कह रहे गीता जी में इसलिए कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए शास्त्र में लिखा है तपते यज्ञ ते चैव यच दानम प्रय छति क्रोध स्तु सर्व हरति तस्मा क्रोध विव जय जो भी तपस्या है जो भी पुण्य है जो भी साधना है जब हम किसी पर क्रोध करते हैं तो हमारी साधना नष्ट हो जाती है हमारा साधन से किया हुआ तप पुण्य य क्षीण हो जाता है तपते यज्ञ चैव य दानम प्रति क्रोध स्तु सर्वम हरति तस्मा क्रोध विव जयत जो तपस्या यज्ञ दान पुण्य आदि व सब नष्ट हो जाता क्रोध करने से जिनकी नाक में गुस्सा उनके पास क्या रह गया नरक का रास्ता क्रोध करना कोई अच्छी बात नहीं है अपने पुण्यं का नाश करना इसलिए क्रोध मत करो जब कभी क्रोध हृदय में आ जाए तो मौन धारण करके वहां से हट जाओ जिसके प्रति क्रोध आ रहा है सहनशीलता सो तप बढ़े है जो जितना सहन करता है मान अपमान निंदा स्तुति वह उतने तपस्वी महान तपस्वी होता है देखो व्यर्थ चिंतन ना होने पर कबहु काल व्रथा नहीं जाए सेवक जी महाराज कह रहे कभी

काल माने समय व्यर्थ नहीं जाना चाहिए व्यर्थ के चिंतन में नहीं जाना चाहिए चिंतन तो होगा ही यदि भगवत चिंतन नहीं करोगे तो विषय चिंतन होगा विषय चिंतन करोगे तो व्यर्थ चिंतन है वह व्यर्थ चिंतन तुम्हारे जीवन को व्यर्थ कर देगा भगवान के संबंध में ही बोलनो भगवान के संबध में ही सुनन तथा भगवान के संबंध में ही चिंतन करनो श्री गीता जी भगवान की वाणी है स्वयं भगवान कहते हैं मव मन आध स्व म बुद्धि निवेश निष्य स मव अर्धम संया मेरे में मन लगा दो मेरे में बुद्धि लगा दो तुम मेरे में ही निवास करोगे इसमें कोई संशय नहीं अर्थात आप भगवान में वास करेंगे हम अपने मार्ग में ठीक चल रहे हैं यह तब समझन जब अपन स्वभाव दिनव दिन सरल बनतो जाए भजन में बनतो जाए तो जानो तुम्हारा मार्ग ठीक है स्वभाव सरल मृदु सरस भजन में जीवन तो आपकी अध्यात्म में उन्नति हो रही है अति उत्तम स्वभाव बने एक वाक्य मिले कि है जितनी बातें दुनिया की सब भूल गए कुछ याद नहीं ऐसा स्वभाव ऐसा भजन में रति कि है जितनी बातें दुनिया की सब भूल गए कुछ याद नहीं अब एक

मात्र प्रिया प्रीतम अपने में दुर्गुण को बढ़ावा देन पशुता है गंदी बातें करने का उत्साह रखना पशुता है एव में अपने में सदगुण बढ़ो दिव्यता लानो या समय भले ही कोई युग बरत रहे होए मान लो कलयुग है आप बुराई से बच रहे ना जप कर रहे भगवान का गुणगान कर रहे हैं लीला चरित्र सुन रहे हैं तो सतयुग में ही हो तुम कलयुग में नहीं हो नाम जप कर रहे भगवान के गुण चरित्र सुन रहे बुराई से बच रहे हैं तो आप कलयुग में नहीं हो आप आप सतयुग में हो श्री भगवान को कह हुए को आश्रय है कि मन को काम ही है संकल्प बनान अब तुम ऐसा अभ्यास बनाओ कि जब मन में संकल्प उठे तो सबरे केवल भगवान के ताए ही संकल्प उठे जैसे भोगों के संकल्प उठते रहते हैं उस जगह भगवान के संकल्प उठे जब मन में संकल्प उठे वे सवेरे केवल भगवान की ताई हो कल्पना करो कि मु को श्री प्राणनाथ के दर्शन होंगे तो मैं इनके श्री चरणन में गिर पड़ूंगा रोंगा ये मो को उठा मेंगे पुछ करेंगे प्यार करेंगे अपने पीतांबर से आंसू पूछेंगे मैं धन्य बन जाऊंगा मैं मर के नित्य लीला में पहुंच

जाऊंगा वहां मुको इनकी सेवा प्राप्त होएगी मैं सेवा करूंगा जहां ये खेले मैं वा स्थल को स्वक्ष कर दियो करूंगा ये सन करेंगे मैं पंखा करतो रहूंगा आदि आदि ऐसी भावना में डूबो श्री भगवान के ताई करी गई भावना असत्य होते हुए भी परम सत्य बन जाए जैसा तुम सोचोगे वैसा ही तुम्हें प्राप्त होगा जैसे श्री गंगा जी में कैसो हो पानी परे सब व पानी गंगाजल बन जाए ऐसे ही कैसी भी भावना भगवान से की जाए व सब परम पवित्र हो जाती है एव में कल्पना हो सत्य बन जाए है जो भगवान से जोड़ दी जाए मन के समस्त संकल्प श्री प्रीतम के ताए ही बन में लगे तब यह तो निश्चय है ही गयो कि यह म श्री भगवान को बन गयो तब भगवत वस्तु श्री भगवान के ही काम में आवे या नियम उपासना में है ही जैसे मंदिर में जो धातु के पात्र श्री ठाकुर जी की सेवा में रहे हैं उनको अपने काम में नहीं ले सके तब जब कि यह मन इनकी वस्तु बन गए तब अपने ताए मन का कोई संकल्प नहीं क्योंकि ठाकुर जी की वस्तु है अपनो तो जो कछु होए ग वो शरीर के प्रारब्ध के अनुसार हो तो ही रहे ग या की

ओर ध्यान ही नहीं देन निरंतर श्री प्राणनाथ के चिंतन को ही अभ्यास बनावे ना अपने ताई संकल्प ही बनावे और ना संसार की ओर ध्यान ही दे विधि प्रपंच अस अचल अनादि इस संसार प्रवाह में उथल पुथल होती ही रहे हैं हां हमें तो यह देखना है कि संसार की उथल पुथल में अपने प्राणनाथ को भूल तो नहीं रहे हैं अपने जीवन धन को कहीं भूल तो नहीं रहे संसार की घटनाओं में अपने सबरे संकल्प इनके ताई शरीर की सबरी चेष्टा इनके ताई खानपान सय तथा समस्त व्यवहार केवल अपने प्राणनाथ के ताए ही होए जैसे पतिव्रता को जीवन केवल अपने पति के ताय ही र है अपने समस्त क्रिया कलापन को ह केवल अपने श्री प्राणनाथ के ताए ही होए यहां तक कि जीनो ही इनके ताए और मर्नो ही इनके ताई शरीर में इंद्रिय में मन में केवल इनको ही इनको अखंड साम्राज्य होए अब बची बुद्धि बुद्धि को श्री कृष्ण में लगाए देन कैसे बुद्धि को काम है निर्णय करनो यह करनो आवश्यक है यह अति आवश्यक है और यह अनावश्यक है यह सब निर्णय बुद्धि करती है यह बुद्धि का काम है तब बुद्धि काम ले भगवान के

ताई बार-बार बुद्धि यही निर्णय करे कि हमें चाहिए केवल एक भगवान हमें भगवान चाहिए हमें भगवान चाहिए संसार नहीं हमें भोग नहीं चाहिए हमें श्यामा श्याम चाहिए यह मेरे मैं इनको यह निर्णय करो बुद्धि से बार बार बार बार यही पाठ को फेरो मैं इनको यह मेरे मुझे भगवान चाहिए संसार नहीं और कोई लौकिक कामना ना बनन पावे जब कोई कामना उठे तब यही सूत्र दोहरा मैं इनको यह मेरे मुझे भगवान चाहिए संसार नहीं काटो इस बात से हर कामना को परम पूज्य परम श्रद्धेय श्री पंडित जी महाराज के एक निकट स्थित जन ने अपने परम पूज्य श्री पंडित जी से प्रार्थना करी कि आप हमें श्रीमद् भागवत पुराण के कोई सात श्लोक जो आपको परम प्रिय हो लिख के देव अपने प्रियजन की प्रार्थना पर पूज्य बाबा ने ये सात श्लोक लिख के दिए कृष्णाय वासुदेवाय देवकी नंदना च नंद गोप कुमारा गोविंदाय नमो नमः पहला और दूसरा दिया ब्राह्मण ही देहो यम शुद्र कामा निते कय तपसे चह तनत सुखाय यह जो मानव शरीर मिला है जो द्विज देह मिली है यह भोग विलास के लिए नहीं मिली यह उत्तम

शरीर को पाय के संयम पालन करते भए तपस्या पूर्वक भगवान को भजन करना चाहिए तभी तो मृत्यु के पीछे मोक्ष प्राप्त हो सके है वास्तव में या शरीर की सफलता तब ही मानी जाएगी जब भगवान की प्राप्ति हो जाए मोक्ष की प्राप्ति हो जाए यह मानव मात्र का परम कर्तव्य है समस्त शरीर धारियों का परम कर्तव्य है कि इस जन्म में भजन करके भगवान को प्राप्त कर लिया जाए तीसरा श्लोक महत सेवा द्वार माहुर विमुक्त तमो द्वार योशिता संग संगम मह तस्ते सम चिता प्रशांता वि मनवा सुदा साधव महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है मोक्ष का मार्ग है और विषय प्राण को संग नरक को द्वार है अब महापुरुष के लक्षण वर्णन करें कहते हैं महान तस्ते सम चिता प्रशांता विमन सुदा साधव ये जो सम चित है सुख और दुख में मान अपमान में लाभ हानि में एक रस रहे हैं वह सम चित्ता जो शत्रु मित्र में भेद नहीं रखे हैं जो सदा रहे प्रशांता जो कब क्रोध नहीं करे हैं विमन और सबसे मैत्री भाव रखे हैं सुर साधो ये ऐसे सदाचारी जनों को महात्मा कहा गया है ऐसे महात्माओं का संग

मोक्ष का द्वार है और कामी पुरुषों का संग नरक का द्वार है चौथा श्लोक रहो गणे त तपसा नया नचे जया निर पणा ग्रहा दवा न छंद सा नव जलाग सूर्य बिना महत् पाद रजो विषेक श्री जड़ भरत जी महाराज राजा रहु गण को समझा रहे हैं कि हे रहु गण वा परम तत्व को जा को ज्ञान कहे हैं जा को वासुदेव कहे हैं वही पाय सक है जो महापुरुषों की श्री चरण रज में अपनों को अभिषेक करे हैं जब ताई महापुरुषों की चरण रज ग्रहण नहीं करोगे वह परम तत्व हाथ नहीं लग सके है चाहे भले ही कठिन सो कठिन तपस्या कर ले चाहे बड़े से बड़ो यज्ञ कर ले चाहे बड़ो भारी वैरागी बन जाओ चाहे पूरे गृहस्थ बन के देख लो चाहे वेद पाठ कर लो चाहे जल की उपासना कर लो चाहे अग्नि की उपासना चाहे सूर्य की उपासना इनमें से एक ह प्रयत्न भगवत प्राप्ति नहीं करा सके जब तक महापुरुष के चरण रज से अभिषेक नहीं करोगे केवल एक ही प्रयत्न है महापुरुषों के चरणन की रज को अपने माथे पर श्रद्धा पूर्वक धारण करनो बस शलोक परम धाम को अधिकारी वही है जाम या लक्षण जागृत हो जाए सांता सम दृष

शुद्ध सर्व भूता अनु रंजना यात सा चत पद मचत प्रिय बाधवा जो शांत होए जा में चंचलता ना होए यह लक्षण जिसम व परम पद का अधिकारी हो चुका है जो शांत शांता समद सुद्धा सर्व भूता अनु रंजना जो शांत होए जा में चंचलता ना होए जो समदर्शी होए सबको एक भगवत दृष्टि से देखे सियाराम में सब जग जानी करो प्रणाम जोरी जुग पानी और सुद्धा काह को मित्र ना बनावे जो शरीर स और मन स सर्वथा शुद्ध होए जो प्राणी मात्र को प्रसन्न करना चाहते होए अर्थात काह को कष्ट ना पहुंचाते होए तथा श्री भगवत भक्तन को अपन सग भाई माने ऐसे जो भाग्यशाली साधक है वे परम धाम में पहुंच जाते हैं वो परम धाम के अधिकारी हैं छठवां ति शया करुण मैत्र्या खिल जंतु सु समन च सर्वात्मक कष्ट विपत्ति सर्दी गर्मी आदि के सहवे की शक्ति होए सबसे दया का भाव हो सब सो मैत्री हो और सब में क्ता हो जा में य सद्गुण होए वाही सो श्री प्राणनाथ भगवान प्रसन्न हो सके हैं जो दुख कष्ट विपत्ति सर्दी गर्मी अपमान य सहवे की सामर्थ्य रखते हो जो सबसे दया मैत्री जो सबसे समता का व्यवहार

उससे भगवान प्रसन्न हो जाते हैं सातवा श्लोक निरपेक्ष मुनि शांतम निर्वैर सम दर्शन अनु ब्रजा में हम नित्यम पूए यत रेणु भी श्री प्राणनाथ भगवान श्री कृष्ण स्वयं अपने श्री मुख स भक्त की प्रशंसा करके कहते हैं हे उद्धव मैं ऐसे भक्त के पीछे पीछे सदैव चलता र हूं में ऐसे लक्षण होए निरपेक्ष जो काहो सु कछु लेवे की कामना ही नहीं करता होए मुनि जो मननशील होए कैसी हो परिस्थिति में जा की शांति भंग न होए निर्वैर जो काहो सो बैर ना करतो होए सम दर्शन जो सबको एक समान देखतो हो यह अपनो है यह परायो है यह शत्रु है या मित्र है ऐसो भेदभाव जाके मन में ना होए वो समदर्शी ऐसे लक्षण वाले भक्तन के पीछे पीछे या लोभ स डोलते रहो हो कि या की श चरणन की रज उड़क मेरे ऊपर पर जाएगी तो मैं पवित्र हो जाऊंगा बाबा ने यह सात श्लोक लिख कर के दिए साधक के ताई बचन होए तो स्त्री स बचे अगर भेड़ना होए तो संत स भड़े सावधान होए के सर्वोत्तम भगवत साधन करे अधर्म से बचा प्रत्येक चेष्टा भगवत प्रीत अर्थ ही करे श्रीमद् भागवत महापुराण भगवान श्री

कृष्ण चंद्र ज महाराज उद्धव जी को उपदेश कर रहे हैं प्रि उद्धव यह मनुष्य शरीर समस्त शुभ फल की प्राप्ति का मूल है और य मनुष्य शरीर अत्यंत दुर्लभ है और कृपा से सुलभ हो गया है इस संसार सागर से पार जाने के लिए यह मनुष्य शरीर एक सुदृढ़ नौका है शरण ग्रहण मात्र से गुरुदेव इसके केवट हैं पतवार का संचालन करने वाले गुरुदेव और इस मरण मात्र से ही मैं अनुकूल वायु के रूप में इसे लक्ष्य की ओर बढ़ाने लगता हूं इतनी सुविधा होने पर भी जो लोग इस मानव शरीर के द्वारा संसार सागर से पार नहीं हो जाते वह तो अपने हाथों अपनी आत्मा का हनन अधा पतन करने वाले हैं आत्म हत्यारे हैं प्रिय उद्धव जब पुरुष दोष दर्शन के कारण कर्मों से उदयोग हो जाए विरक्त हो जाए तब जितेंद्रीय होकर वह योग में स्थित हो जाए और अभ्यास आत्मा अनुसंधान के द्वारा अपना मन मुझ परमात्मा में निश्चल रूप से धारण करें जब स्थिर करते समय मन चंचल होकर इधर उधर भटकने लगे तब झटपट बड़ी सावधानी से उसे मनाकर समझा बुझाकर फुसलाकर अपने वश में कर ले इंद्रियों और प्राणों

को अपने वश में रखे मन को एक क्षण के लिए भी स्वतंत्र ना छोड़े मन की एक एक चाल एक एक हरकत को देखता रहे इस प्रकार सत संपन्न बुद्धि के द्वारा धीरे-धीरे मन को अपने बस में कर लेना चाहिए जैसे सवार घोड़े को अपने वश में करते समय उसे अपने मनोभाव की पहचान कराना चाहता है अपनी इच्छा के अनुसार उसे चलाना चाहता है और बार बार फुसलाकर उसे अपने वश में कर लेता है वैसे ही मन को फुसलाकर उसे मीठी मठी बातें सुनाकर वश में कर लेना और परम योग है सांख्य शास्त्र में प्रकट से

लेकर शरीर पर्यंत सृष्टि का जो क्रम बतलाया गया है उसके अनुसार सृष्टि चिंतन करना चाहिए और जिस क्रम से शरीरा आदि का प्रकृति में लय बताया गया है उस प्रकार लय का चिंतन करना चाहिए यह क तब तक जारी रखना चाहिए जब तक मन शांत स्थिर ना हो जाए जो पुरुष संसार से विरक्त हो गया है और जिसे संसार के पदार्थों में दुख बुद्धि हो गई है वह गुरुजनों की शरण ले ले भगवान आदेश कर रहे हैं व गुरु बनावे और गुरुजनों के उपदेश को भली भात समझकर बार-बार अपने स्वरूप के ही चिंतन में सल रहे इस अभ्यास से बहुत शीघ्र उसका मन अपनी वह चंचलता जो अनामा शरीर आदि में आत्म बुद्धि करने से हुई है छोड़ देता मन एकाग्र हो जाता है यम नियम आसन प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि योग मार्ग से वस्तु तत्व का निरीक्षण परीक्षण करने वाली आत्म विद्या से और मेरी प्रतिमा के पूजन से भगवत चिंतन होने लगता है भगवान आदेश कर रहे प्रतिमा पूजन के लिए हमें भगवान के आदेश को मानना चाहे इन संसारी लोगों के नहीं अरे बोले तो मूर्ति पूजक मूर्ति पूजक भगवान आदेश

कर रहे हैं मेरी प्रतिमा विराजमान करके उसके पूजन करने से निश्चित भगवत प्राप्ति होती है क्योंकि बार-बार चिंतन बनने लगता है सेवा का चिंतन बनने लगता है और कोई उपाय नहीं उद्धव वैसे तो योगी कोई कभी निंद कर्म करता ही नहीं बहुत ध्यान देने की बात है भगत उपासक योगी कभी कोई पाप कर्म नहीं करता परंतु यदि कभी उससे प्रमाद वश कुसंग वश कोई ऐसा कार्य बन जाए जिसे पाप कहते हैं तो अन्य कोई प्रश्चित ना करे जो साधना कर रहा है उसी से भस्म हो जाएगा नाम जप नाम कीर्तन भगवत

कथा लीला श्रवण गायन इसी से सारे पाप भस्म हो जाएंगे उसे कृ चंद्रायण आदि दूसरे प्रश्चित कभी नहीं करना चाहिए अपने अपने अधिकार में जो निष्ठा है वही गुण कहा गया है इस गुण दोष और विधि निषेध के विधान से यही तात्पर्य निकलता है कि किसी प्रकार विषय सक्ति का परित्याग हो जाए बस विषय आसक्ति का परित्याग हो जाए सारी साधना हों का फल है संसार का चिंतन छूटे और भगवान का चिंतन हो यह हर संप्रदाय हर साधना का यही उद्देश्य है संसार का चिंतन छूटे भगवान का चिंतन हो कर्म तो जन्म से ही अशुद्ध है अनर्थ के मूल है शास्त्र का तात्पर्य उनका नियमन ही है जहां तक हो सके प्रवृत्ति का संकोच ही करना चाहिए जो साधक समस्त कर्मों से विरक्त हो गया है कर्मों में दुख बुद्धि रखता है उसे चाहिए सब छोड़कर मेरी लीला कथा के श्रवण में खूब लगे खूब भगवान की चर्चा सुने भगवान की चर्चा कर और यह जानता रहे कि जितने भोग भोग वासना दुख रूप है किंतु इतना सब जान कर के भी जो परित्याग करने में समर्थ ना हो उसे चाहिए कि उन भोगों को तो भोग ले परंतु सच्चे

हृदय से दुखी होकर भगवान की प्राप्ति के लिए निकले भजन करना चाहिए पर ये खानपान ये दुनिया का प्रपंच हमारा पिंड नहीं छोड़ रहा दुखी होना चाहिए जैसे संसारी आदमी जब मनोनुकूल भोग मिलता है तो सुखी होता है लेकिन भक्त को जब मनोनुकूल भोग मिलता है तोत वह दुखी होता है वह रुदन करता है हे भगवान कब मैं इस प्रपंच से ऊपर उठू उसे सच्चे हृदय से दुख जनक समझे और मन ही मन उसकी निंदा करे तथा अपना दुर्भाग्य समझे साथ ही इस दुविधा की स्थिति से छुटकारा पाने के लिए श्रद्धा द निश्चय और प्रेम से मेरा भजन करें इस प्रकार मेरे बतलाए हुए भक्ति योग के द्वारा निरंतर मेरा भजन करने से भक्ति योग के द्वारा निरंतर मेरा भजन करने से मैं उस साधक के हृदय में आकर बैठ जाता हूं और मेरे विराजमान होते ही उसके हृदय की सारी वासना एं अपने संस्कारों के साथ नष्ट हो जाती हैं इस तरह जब उसे मुझ सर्वा आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है तो उसके हृदय की गांठ टूट जाती है उसके सारे संशय छिन्न भिन्न हो जाते हैं कर्म वासना सर्वथा क्षीण हो जाती है इसी से जो

योगी मेरी भक्ति से युक्त है और मेरे चिंतन में मगन रहता है उसके लिए ज्ञान अथवा वैराग्य की आवश्यकता नहीं है कितनी सुंदर बात कह रहे भगवान ना वैराग्य की आवश्यकता है और ना ज्ञान की जो भगवान की कथाएं सुन रहा भगवान का नाम जप कर रहा है नाम कीर्तन कर रहा है उसे किसी और साधन की जरूरत नहीं है उसका कल्याण तो प्राया मेरी भक्ति के द्वारा ही हो जाता है कर्म तपस्या ज्ञान वैराग्य योगाभ्यास दान धर्म और दूसरे कल्याण साधनों से जो कुछ स्वर्ग अपवर्ग मेरा परम धाम अथवा कोई भी वस्तु प्राप्त होती है वह सब मेरा भक्त मेरे भक्ति योग के प्रभाव से ही यदि चाहे तो अनायास प्राप्त कर लेता है मेरे अनन्य प्रेमी एवं धैर्यवान साधु भक्त स्वयं तो कुछ चाहते ही नहीं यदि मैं उन्हें देना चाहता हूं तो और देता भी हूं तो भी दूसरी वस्तुओं की तो बात क्या कैवल मोक्ष भी नहीं लेना चाहते ऐसे भक्ति में सुख प्राप्त किए भक्त जन होते हैं भगवान क मैं देना भी चाहूं और देता भी हूं पर वह कैवल मोक्ष तक स्वीकार नहीं करते मृत लोग स्वर्ग लोगों के भोगों

की तो बात ही क्या उद्धव जी सबसे श्रेष्ठ एवं महान नि श्रेयस परम कल्याण इसका दूसरा नाम है निरपेक्षता किसी से कोई चाह नहीं इसलिए जो निष्काम और निरपेक्ष होता है उसी को मेरी भक्ति प्राप्त होती मेरे अनन्य प्रेमी भक्तों को समदर्शी महात्माओं को जो बुद्धि से अतीत परम तत्व को प्राप्त हो चुके हैं उनको कोई पाप या पुण्य नहीं बांध पाएगा इसलिए महापुरुषों की नकल नहीं करनी चाहिए वह देहा भिमान रहित महापुरुष कभी विषय सेवन करते नजर आते हैं कभी विषय त्यागी उनको कोई पाप पुण्य कोई कर्म बंधन नहीं होता विधि और निषेध होने वाले पुण्य और पाप से उनका कोई संबंध नहीं होता कोई निषेध अगर बन जाए तो कोई पाप नहीं कोई विधि बन जाए तो कोई पुण्य नहीं क्योंकि वो देहा अभिमान रहित महापुरुष होते हैं इस प्रकार जो लोग मेरे बताए हुए ज्ञान भक्ति और कर्म मार्ग का आश्रय लेते हैं वे मेरे परम कल्याण स्वरूप धाम को प्राप्त होते हैं क्योंकि परम ब्रह्म परमात्मा के तत्व को जान लेते हैं इसलिए सब न छोड़कर एकमात्र भगवान का चिंतन करो भगवान के

आशित शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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