॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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सच्चे साधक का व्यवहार कैसा होना चाहिए ?/ भगवद् तत्व और लीला को सही तरह से कैसे समझें ? // 07/09/2025

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पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम रद ितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वाय परम शीतल माशयाम निर्वापय परम शीतल माया श्यामा श्याम के रंग में रंगो चहत ये कुूल गुण गावत नित श्याम के कैसे पर है पू श्यामा श्याम के रंग में रंगना चाहते हैं और हमारी प्रियाजु का नाम नहीं रटते प्रियाजु की शरण में नहीं है प्रियाजू की आराधना नहीं है तो कह रहे प्रेम रंग में नहीं रन सकता। चाहे वह श्याम सुंदर की स्वयं कितनी भी आराधना क्यों ना कर ले। ललित किशोरी जी कह रहे हैं ये अनुभव की बातें हैं।

इसमें तर्क वितर्क नहीं। क्योंकि श्री कृष्ण के हृदय का मूर्तिमान प्रेम श्री राधा किशोरी है। जब तक उपासक गोरे चरणारविंद का आश्रय नहीं लेता राधा नाम रटन नहीं करता तब तक उसे प्रेम की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुण गावत नित श्याम के कैसेिक परिह पूर भले वह श्याम सुंदर के गुण गा रहा है पर जब तक राधा किशोरी का आश्रय नहीं श्री किशोरी जी के चरणों का आश्रय लेकर नाम रटन नहीं तब तक वो कृष्ण प्रेम नहीं प्राप्त कर सकता श्यामा पग लवलीन हो श्यामा जु के हाथ बिकाए तो ही कर में ये भटु मोहन बिक है आए जिसने श्यामा जी के चरणों का चिंतन प्रारंभ कर दिया श्यामा पग लव लीन गोरे चरणारविंद का ध्यान और श्री जी के हाथ साथ जो बिका गया पूज्य श्री रूपलाल गोस्वामी जी कहते हैं जैसे

रूपलाल हित हाथ बिकानी निधि पाई मनमानी मैं तो जब श्री जी के हाथ बिक गई तो निधि मिल गई मनमानी निधि संपूर्ण सुख की प्राप्ति किशोरी जी की कृपा से है जो श्यामा जी के चरणों का चिंतन करके श्याम रामाजू के हाथ बिक गया मन वचन कर्म से तो बोले तो ही कर्म में ये भटु मोहन बिक है आय अपने आप श्री लाल जो आपके कर कमल में बंध जाएंगे अर्थात वो आपसे कभी दूर नहीं जा सकते आपके हाथ में जैसे पतंग जैसे चाहो वैसे उड़ा सकते हो यदि डोरी हाथ में है तो यदि यदि राधा नाम है राधा

सुमिरन है तो पतंगो यथा मन ब्राह लाल जो महाराज जाएंगे कहां वो तो पतंग की तरह आपके हाथ में हो जाएंगे श्यामा जुत घनश्याम को मन में राखो ध्यान जुगल लाल छवि गन धरी यह रसिकन पहचान श्यामा जी के नाम बल से चरणारविंद की आराधना से ये घनश्याम विवश होकर हमारे ध्यान में आ जाते हैं। तो श्यामा श्याम का निरंतर ध्यान निरंतर रटन यही रसिक की पहचान है। रसिक कौन? जो श्यामा श्याम के अनुराग रंग में डूबा हुआ है। श्यामा पग दृढ़ गहु सखी तो मिल है निश्चय श्याम ना माने दृग देख ले श्यामा पद बिच श्याम जहां श्यामा जो विराजमान है वही श्याम है अगर श्यामा जो नहीं तो प्रेम स्वरूप श्याम सुंदर का आप साक्षात्कार नहीं कर सकते।

इसलिए श्री ललित किशोरी जी कह रहे हैं कि जब श्री वृंदावन वास मिलो सजनी तब तीर्थ आन गए न गए। यदि वृंदावन वास हो गया तो और तीर्थ किसी जाने की जरूरत नहीं। विश्वास कर लो समस्त तीर्थ तीर्थराज प्रयाग में जाकर पावन होते हैं और तीर्थराज प्रयाग जब यहां 12 वर्ष के बाद कुंभ पड़ता है तब यहां आकर रज में लौटते हैं जिससे वह परम पावन हो जाते हैं। यदि वृंदावन वास मिल गया, वृंदावन दर्शन करने का सौभाग्य मिल गया, आने का मिल गया तो अब कहीं भागने की जरूरत नहीं। हां आंख अगर आपकी बहुत चंचल हो रही तो चले जाओ और अगर आंख प्यारी जो प्यारे जो पर एकाग्र हो रही तो फिर धाम से अन्य कोई तीर्थ अन्य कोई जगह जाने की जरूरत नहीं है।

क्योंकि यह मूल है सब धामों का मूल वृंदावन धाम। जब श्री वृंदावन वास मिल सजनी तब तीरथ आन गए न गए जब लाडली लाल को नाम लियो तब नाम ना आन लय न ले यदि राधा नाम मिल गया युगल नाम मिल गया तो इससे बढ़कर कुछ नहीं इसी में चित्तवृत्ति को जोड़ दो यदि वृंदावन धाम दर्शन करने को आने को वास करने को मिल गया तो अब किसी और तीर्थ जाने की आवश्यकता नहीं। यदि राधा नाम की महिमा सुनने को मिल गई, रटने को मिल गई, लाडली लाल की उपासना मिल गई। अब और कुछ नाम जपने की हमारी रुचि ना रह जाए।

रसना कटो जो अन रटो पद पंकज किशोरी चित पगो तब पायन आन नए नए यदि गोरे चरणारविंद में प्रणाम करने का अवसर मिल गया तो अब और कहीं शीश झुकाव या न झुकाव कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों? क्योंकि सब चराचर जगत भगवान को नमस्कार करते हैं और रसघन मोहन मूर्तिम विचित्र के महोत्सव लसितम राधा चरण विलोत रुचिर शिखंडम हरि वंदे जहां मोर पक्ष धारण करने वाले श्री लाल जो महाराज मोर मुकुट पधराते हैं जिन चरणों में वो है श्री राधा स्वामिनी के चरणारविंद तो ललित किशोरी जी कह रहे हैं यदि राधा चरणारविंद की शरण मिल गई प्रणाम करने को मिल गया तो सबका का परिणाम हो गया।

जब नैन लगे मन मोहिनी सो तब अवगुण आल भय न भय ये सबसे बड़ी बात है यदि नेत्र हमारे लड़ गए मनमोहन मनमोहिनी प्यारी जु प्यारे जु से तो बोले अब और कहीं नेत्र लगाने की जरूरत नहीं है। सबसे बड़ा अवगुण हो गया। मेरे नेत्र प्यारी जो प्यारे जू में लग गए तो अब हमें और कहीं नेत्र लड़ाने की जरूरत नहीं नेत्र लगाने की जरूरत नहीं कहीं कुछ और देखने की जरूरत नहीं जब कंठ तुलसी गल में तब मोतिन माल कहा करवे जब गले में तुलसी की माला धारण हो गई तो इससे बड़ी कोई माला नहीं ना स्वर्ण की ना मोतियों की इसकी महिमा के बराबर कोई नहीं।

गले में यदि तुलसी जी की माला बंधी हुई है और अंतिम समय आ गया तो यमराज की फांसी उस गले में नहीं पड़ेगी जिसमें वृंदा सखी श्री तुलसी की कंठी विराजमान है। यह बड़ा सौभाग्य का विषय है। जिसका अंतःकरण मलन है, जो तार्किक है, जो विरोधी भाव रख वो इन भावों को नहीं समझते। सब अगर ऐसा समझ जाए तो सब मुक्त ही ना हो जाए। इसलिए बड़े भाग्यशाली हैं जिनके हृदय में श्रद्धा और विश्वास ऐसा प्रकट होता है। जब कंठ लसी तुलसी गल में तब मोतिन माल कहां करिवे जब चंदन रज की छाप छपी तब और श्रृंगार कहां भरिवे जब गले में तुलसी की माला तो और फिर मोतियों की माला स्वर्ण की माला आप आश्चर्य मानिए भगवत बस चरणारविंद का आश्रय कितना प्रबल होता है।

एक एक स्वर्ण आभूषण में भाई भाई में झगड़ा हो जाता है और अपने सब श्रृंगार स्वर्ण के न्योछावर कर दिए। नई पहनना गले में तुलसी माला और रज धारण कर ली। ऐसे कितने उपासक जिन्होंने सर्वस्व त्याग कर दिया। रस और तुलसी माला धारण करने पर कभी आभूषण नहीं धारण किए। जब कंठ लसी तुलसी गल में तब मोतिन माल कहा करवे जब चंदन रज की छाप छपी तब और श्रृंगार कहां भरवे यहो भाग्य जब हम ब्रज रज से तिलक रचना करते हैं और अपने श्री जी के कल जो श्रृंगार में चंदन प्रयोग हुआ वो प्रसादी चंदन धारण करते बोले अब इससे बड़ा श्रृंगार क्या होगा?

गले में कंठी तुलसी जी की और मस्तक पर रजरानी वृंदावन की और ऊपर से श्री जी का पत्रावली किया हुआ प्रसादी चंदन तो जब चंदन रज की छाप छपी तब और श्रृंगार कहां भरवे जब लाडली लाल की ओर ढरे तब और की ओर कहां ढरवे जब हरि जी की कृपा हो गई, गुरु जी की कृपा हो गई और हमें लाडली लाल का मार्ग मिल गया तो अब और कोई मार्ग मुझे नहीं चलना। जब नागर नंद किशोर धरे उ और को ध्यान कहा धरवे जब नागरी श्री प्रिया जो और नव किशोर श्री लाल जो जब ये हमारे ध्यान का विषय है तब और कोई ध्यान नहीं धरना जब गौर किशोर की आस भई तब हासन लोक कहा डरवे जब श्री वृंदावन आए डरे तो प्राणहु जाए कहां डरवे जब लाडली लाल के लिए हमने अपना जीवन दे दिया तो अब हंसी कोई हमारी करे उपहास करे निंदा करे इसकी कोई परवाह नहीं और जब वृंदावन में आकर पड़ गए तो अब प्राण भी निकल जाए अब कोई परवाह नहीं धाम नहीं छोड़ सकते ये बहुत सुंदर बात निष्ठा जब वृंदावन वास मिला तो हमें और किसी तीर्थ जाने की जरूरत नहीं।

जब लाडली लाल का नाम मिल गया, राधा नाम मिल गया तो अब हमारी रचना अनन्य होकर इसी को रटेगी। जब गोरे किशोरी के चरणारविंद का चिंतन करने का सौभाग्य मिला तो और कोई चिंतन नहीं। जब नयन लड़ गए प्रिया प्रीतम से तो फिर इससे बड़ा अवगुण और कोई नहीं। अब किसी और की तरफ नयन नहीं लड़ाएंगे। जब गले में तुलसी की माला धारण कर ली तो अब स्वर्ण के आभूषण और मोतियों की मालाएं किसी काम की नहीं। जब रज और चंदन की छाप लगा ली तो इससे बड़ा और कोई श्रृंगार नहीं। जब लाडली लाल का मार्ग मिल गया तो इससे बड़ा कोई मार्ग नहीं।

जब नागरी नंद किशोर का ध्यान धर रहे तो इससे बड़ा कोई ध्यान नहीं। जब गौर किशोर की आस हुई तब चाहे उपहास करो, निंदा करो, अपमान करो हम हटने वाले नहीं। जैसी हरिवंश डरो काके डर हो ना मति कांची मैं सच्ची मति वाला हूं कच्ची मति वाला नहीं अब वृंदावन में जब आकर के पड़ गया जीवन के लिए तो अब चाहे जितना कष्ट हो प्राण क्यों ना निकल जाए वृंदावन नहीं छोड़ेंगे उपासक की ऐसी जब निष्ठा हो तब प्रेम रस जागृत हो श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी कह रहे हैं कि वृंदावन में कैसे वास करें जो बड़े-बड़े मुक्त पुरुषों के लिए भी दुर्लभ है।

मुक्तान प्रत्य चिन दति संदर्शनम शुद्धया रीत्या सुख नारदाद भरप प्राप्तांग संंगा मना जो जीवन मुक्त महापुरुष हैं उनके भी ध्यान में ना आने वाले प्रिया प्रीतम जिस वृंदावन में खेलते हैं ये वृंदावन सहित प्रिया प्रीतम ये बड़े-बड़े जीवन मुक्तों के भी ध्यान में नहीं आते मुनि मन ध्यान धरत नहीं पावत श्री सुख नारदा आदि महापुरुष जिनके लीला चरित्र का गायन करते पर श्री अंग सेवा में नहीं ऐसे प्रिया प्रीतम का यह निज महल ऐसे प्रिया प्रीतम के चरण चिन्हों से चिन्हित ये भूमि यहां जो वास करते हैं तो सा श्री कृष्ण पदा भक्ति श्री धाम वृंदावने यम कंचित प्रतिमुकी तितो भावेन व भ्रमते यहां लालसा से युक्त होकर प्रेम लक्षण भक्ति घूमती रहती है।

कौन मुझे स्वीकार करेगा? जिसके हृदय में जरा भी प्रेम लक्षणा भक्ति की चाह है तो हृदय से आलिंगन करके उसके हृदय में समा जाती है। यह वृंदावन की महिमा यहां भक्ति आलिंगन करने के लिए भाव से युक्त होकर भ्रमण करती रहती है। प्रेम लक्षणा भक्ति जो कोई उपासक प्रेम लक्षणा भक्ति की आकांक्षा करता है। यह प्रेम लक्षणा भक्ति उसके हृदय में विराजमान हो जाती है। जिस प्रेम लक्षणा भक्ति के प्रभाव से अत्यंत दुर्लभ महापुरुषों के लिए भी श्री जी की श्री अंग सेवा का अधिकार प्राप्त होता है।

ऐसे वृंदावन में यदि आपको वास मिल गया है कि आप यहां आए हैं तो कैसे रहे? एक दिन दो दिन या आजीवन सर्वसत्कर्षदा दाई भव सततमय नीच नीचा स्वयं स्या एवं वृत्य धीमन न दिवस मधुरम धाम वृंदावना्यम तुल्य मानाव मानो कुरभज समता स्त्रोत्र दवा कोट ग्रास लाभ महा संपदी च भ समो तुल्य भाव यदि इस श्लोक की रहने से वृंदावन में रहा जाए तो निश्चित प्रियाल के प्रेम की प्राप्ति हो जाएगी। प्रेम लक्षणा भक्ति यहां आलिंगन करने के लिए कामुकी होकर यम कंचित प्रतिमुखी तत हितो भावन व भ्रमते वो भ्रमण करती है कि कोई मुझे स्वीकार कर ले यहां फिर स्वार्थ अपने भजन गए फिरे वाह यहां प्रेम लक्षणा भक्ति आलिंगन करने के लिए कामुकी होकर भ्रमण करती है कि कोई वृंदावन वासी मुझे स्वीकार कर ले पर यहां रहना कैसे यह खास बात है अगर अगर रहनी ठीक है तो बहुत जल्दी आपका काम बन जाएगा।

बहुत पावर है। भागवतिक शक्ति से संपन्न ये भूमि है। इसमें थोड़ा भजन भी बहुत उन्नति प्रदान करता है। पर इसमें रहना कैसे? बस ये रहने में चूक हो जाती है। सर्वस उत्कर्षदाय भव सतत नीच नीचा स्वयं स्यात अपने को सबसे नीचा नीच होकर के वृंदावन वास करना है। अपने को सबसे नीच मानना है। कल एक संत भगवान आए थे। 65 वर्ष की आयु होगी। वह कह रहे थे कि अहंकार शरणागत नहीं होने देता। तो यह अहंकार त्याग करके पूर्ण शरणागति कैसे हो? कल चर्चा हुई थी। देखो थोड़ा भी वह महात्मा है अपने हृदय को देख रहे हैं।

वह जो प्रश्न करते हैं हम लोगों के लिए करते हैं। पर थोड़ा भी जब तक अहंकार होता है तब तक भगवत राज्य में प्रवेश नहीं होता। आप शास्त्रों की बातें दूसरों को सुना सकते हैं। तर्क विवाद करके दूसरों को परास्त कर सकते हैं। आप ऐसे भी हो सकते हैं कि आपको लोग बहुत ज्ञानी कहे। लेकिन थोड़ा भी देहा अभिमान है तो ना शुद्ध ज्ञान होगा ना भगवत प्रेम होगा ना भगवत राज्य में प्रवेश होगा। वृंदावन विधि बसे तज के सब अभिमान तण ते नीचो आपको जाने सो जान हमारा वैष्णव सिद्धांत है तणप सुनीचे सेवक जी महाराज कहते हैं तण ते नीच अपन को कहे शुभ और अशुभ न जान तण से भी नीच अपने को जो मानता है वही शुभ अशुभ पर विजय प्राप्त करके भगवत प्रेम को प्राप्त करता है।

देखो विचार करके देखो तो तुम्हारे पास अभिमान करने लायक है क्या? विवेक पूर्वक देखो। तुम्हारे पास है क्या अभिमान करने लायक? शरीर भगवान ने दिया। बुद्धि भगवान ने दी। भगवान ने सतार्ग दिया। भगवान ही हम पर कृपा करके ये सतमार्ग के सद्गुण प्रकाशित कर रहे हैं। उन्हीं के द्वारा सब कुछ हो रहा है। फिर अभिमान आप किस बात का करते हैं? आप में इतनी भी तो ताकत नहीं कि आपका एक रोम गिर जाए और आप पुनः उसे स्थापित कर ले। इतनी ताकत नहीं कि एक रू आप लगा सके। अगर रोम गिर गया तो दोबारा आप लगाने की सामर्थ्य नहीं रखते।

फिर आप में किस बात का अभिमान? प्रभु ना चाहे तो आप एक शब्द नहीं बोल सकते। वह चाहे तो मुकम करोति वाचालम पंगुम लंगते गिर यत कृपा तम वंदे परमानंद माधव वो गूंगे से वेद पढ़वा दे लूले लंगड़े से पहाड़ फंदवा दे अर्थात जो असमर्थ है उससे बड़ा कार्य करवा दे वो सर्व सामर्थशाली तो अभिमान किस बात का भाई वृंदावन इ विधि बस तज के सब अभिमान सब अभिमान का त्याग करके अपने को तण से भी नीच समझे तो वृंदावन की महिमा प्रकाशित हो जाए। कह रहे हैं नीचा नीच स्वयं स्यात अपने को तो सबसे नीचाति नीच समझे।

देखो भाई इसे पकड़ो। ये वृंदावन की रहनी है। यह अहंकार कहता रहता है। हम कुछ हैं। कुछ नहीं भाई। कुछ नहीं। एक शब्द नहीं बोल सकते। एक श्वास नहीं खींच सकते। जितना जैसा विधान मेरे हरि का है वैसे चल रहा है तुम्हारा जीवन। हां दो मार्ग हैं। एक है असत मार्ग, एक है सतार्ग। अब असत मार्ग में चलोगे तो दुख भोगोगे, सत मार्ग में चलोगे तो सुख भोगोगे। यह भगवान ने तुम्हें छूट दे दी है। तुम गंदा कार्य कर सकते हो या उत्तम कार्य कर सकते हो। पावर उन्हीं का है। सामर्थ्य उन्हीं की है।

अब आप कर क्या सकते हो? जो बोगे वही तुम्हें काटना पड़ेगा। बस इतना तुम्हारा अधिकार है कि तुम शास्त्र सम्मत चल लो या शास्त्र विरुद्ध चल लो पर चलने का पावर प्रभु ने ही आपको दिया है। अपने को अभिमान से युक्त कभी मत होने दो। किस बात का अभिमान करोगे? कुछ अभिमान करने लायक है ही नहीं। जब तक भगवत साक्षात्कार नहीं हो जाता तो अभिमान करने लायक कुछ नहीं। प्यारे एक क्षण में माया सब नष्ट कर सकती है और जब भगवत साक्षात्कार हो गया तो अभिमान रहता नहीं इसलिए अभिमान की तो सत्ता ही नहीं है तो अपने को नीचाति नीच समझ देखो जब हरिवंश महाप्रभु कह रहे हैं क्वाहम तुच्छ परम अधमा प्राण हो ग कर्मा कहा मैं तुच्छ अधम अपराध करने वाला अपने लोग भगत माने संत माने महापुरुष माने अपने को तो कितनी लघु बात है हंस हंसने की बात है।

कितनी उपहासास्पद है कि हमारे गुरु हमारे आचार्य अपने को ऐसा कह रहे हैं। का हम तच्छा परम मधमा हम अपने को संत महात्मा समझे। इसलिए सावधान श्रीपाद कह रहे हैं वृंदावन कैसे वास करो बोले सतत मय नीच नीच स्वयं स्यात अपने को सबसे नीच माने और नीच से भी नीच नीचाति नीचा और दूसरों को सर्वोत्कर्ष दाई भव सततमय दूसरों को निरंतर सम्मान देने की कोई भी आ जाए उनके सम्मान में फर्क ना पड़े उनको सम्मान दो उनका बड़ा ही सम्मान यश अपने को सबसे दीनहीन नीचा मानकर वृंदावन तभी आपके हृदय में कृपा करके अपनी महिमा प्रकाशित करेगा ये बात को समझ लो दूसरों को सम्मान दो बढ़ाई दो सब मान प्रद पर आप अमानी अपने को नीच मानना सम्मान स्वीकार ना करना अमानीना मान देना अमानी होकर दूसरों को मान देना एवं वत धीस मधुरम धाम वृंदावन्यम और इस वृत्ति को धारण करते हुए वृंदावन वास करो तुल्यो माना मानो यदि तुम्हारा सम्मान हो रहा है तो फूलो मत हर्षित मत हो किसका सम्मान होता है अगर हम भजन कर रहे हैं।

हमारे को कोई भजनंदी मानकर सम्मान करता है तो मेरे गुरुदेव को कर रहा है। वेश गुरुदेव का मंत्र गुरुदेव का कृपा गुरुदेव की तो मेरे को क्यों प्रणाम कोई करेगा? ये गुरुदेव को प्रणाम हो रहा है। ऐसा सोचना चाहिए। ये श्यामा श्याम को प्रणाम नमस्कार मान मिल रहा है। मेरे को थोड़ी मिल रहा है। जैसे समझा जाए कि हमें लोग प्रणाम करते तो उतारो कपड़े। फिर पहनो सांसारिक कपड़े और देखो तुम्हें कौन प्रणाम करता है। तो तुम्हें जो वेश मिला वह गुरुदेव के द्वारा प्रदत्त जो मंत्र मिला वो गुरुदेव के द्वारा जो हमें उपासना मिली गुरुदेव के द्वारा जो हम में सद्गुण आए वो गुरुदेव के द्वारा तो जब हमारा सम्मान हो तो हमें ये मानना है यह सम्मान मेरे गुरुदेव का हो रहा है।

मेरे इष्ट देव का हो रहा है। और कह रहे अपमानौ अब जब अपमान हो तब क्या विचार करना है तब यह विचार करना है कि मेरे किसी पाप का मार्जन कराने के लिए ये भगवान मंगल में विधान किए हुए हैं जो मेरी निंदा हो रही है मेरा अपमान हो रहा है ये मेरे किसी पाप का मार्जन हो रहा है और आनंदित होना चाहिए विचार के द्वारा हम मान और अपमान में ना फंसे ये विवेक एक ऐसी महान शक्ति है जो हमको बचा लेती है मान अपमान से विवेक जागृत हो जाए सत्संग के द्वारा शास्त्र स्वाध्याय के द्वारा गुरुजनों के वचनों पर श्रद्धा विश्वास करने से विवेक जागृत हो जाता है और जहां विवेक हुआ वो हमें मान अपमान से बचा लेता है।

देखो अगर गलती हो जाती है तो मेरे से अगर अच्छाई है तो मेरे गुरुदेव की ये उपासक सच्चे मार्ग में जो चलता है उसके हृदय की ये गति होती है गुण तुम्हार समझे निज दोष अगर गलती हो गई तो मेरा अपराध है और अगर अच्छाई बन गई तो मेरे गुरुदेव भगवान मेरे इष्ट देव की कृपा ऐसे ही सम्मान हो रहा है तो इष्ट इष्ट देव गुरुदेव का अपमान हो रहा है तो मैंने कोई गलती की है पूर्व में उसका प्रायश्चित हो रहा है इसमें तर्क वितर्क की जरूरत नहीं ये परमार्थ है श्रद्धा और विश्वास से चलो लाभ प्राप्त हो जाएगा मान और अपमान में हम बराबर अपने हृदय को समान रख पावे हमारे हृदय का आनंद हृदय का भगवत चिंतन ना छूटने पावे ना मान में ना अपमान में तुल्य माना मानव कुरभज सतता स्त्रोत दुर्वा कोट्य यदि कोई हमें दुर्वचन बोलता है सच्ची मानिए सम्मान से हृदय में एक भय प्रकट हो जाता है।

जब कोई स्तुति करता है, बाई करता है तो हम कमजोर हो जाते हैं। हमें डर लगने लगता है। कहीं निंदा ना हो जाए। कहीं कोई हमारा अपमान ना कर दे। कहीं कोई हमारे प्रति गलत ना बोल दे। बिल्कुल नहीं। यह सम्मान भोक्ता के होने के कारण आपको भय लगा है। नहीं तो आप निडर हो जाएंगे। कोई गाली दे रहा है। ये उसकी रुचि है। गाली बोल रहा है। उसका स्वभाव है। उसकी रुचि है। उसकी मति है। वो निंदा कर रहा है। ये उसका स्वभाव उसकी रुचि है। हमें अपने प्रभु में मगन रहना चाहिए। दुर्वाच्य कोट्य करोड़ों गालियां दे फिर भी हमारे हृदय में उसके प्रति द्वेष भाव ना हो द्रोह भाव ना हो और स्तोत्र खूब आपकी स्तुति करें लेकिन आपका प्रिय भाव नहीं होना चाहिए स्तुति करने वाले पर प्रिय भाव और निंदा करने वाले पर अप्रिय भाव यह संसारी पुरुष में होते हैं भक्तों में नहीं होते भक्तों में क्या भाव होता है निंदा करने वाले में प्रिय भाव और स्तुति करने वालों में उदास भाव उदासीन भाव ना प्रियता और ना कठोरता उदासीन भाव लेकिन निंदा करने वाले में

प्रिय भाव जो निंदा करने वाला है उससे ऐसे जैसे कोई स्तुति करे तब कैसा हम व्यवहार करेंगे वैसा निंदा करने वाले के प्रति व्यवहार यही साधु उमा संत कही यही बाई वो मंद करत और ये करत भलाई जब वो बुरा बोले और और हम उसका मंगल प्रिय भाव रखें तब हमारी साधुता सुरक्षित तब हमारी भक्ति सुरक्षित ग्रासा लाभ महासंपति श्री धाम वृंदावन वास कर रहे हैं भजन मार्ग में हमें हो अब तो बड़ी व्यवस्थाएं हो गई है नहीं पड़े बड़ी समस्या उदर भरने की ही केवल थी मथुरा और दूरदूर जाकर के टुकड़े मांग के रसिक महापुरुषों ने उदर पोषण किया है।

बहुत ही कष्टप्रद जीवन वैराग्य का जीवन बहुत कष्टप्रद अब तो हर सुविधाएं भगवान दिए फिर भी अगर भजन ना हो भगवत प्राप्ति की प्रबल इच्छा ना हो तो फिर जीवन ही बेकार है। बहुत कष्टप्रद जीवन व्यतीत करे महापुरुष जो पीछे हो गए। बड़े-बड़े मच्छर क्योंकि खूब लताएं थी। सांप बिछे खाने पीने की व्यवस्था नहीं कोई रहने की व्यवस्था नहीं आज इस वृक्ष के नीचे कल उस वृक्ष के नीचे भारी कष्ट सहते हुए प्रियाल के लिए हर समय तड़पते रहते रोते रहते तो आज तो हमें भगवान ने बहुत सुविधा दे दी ना भूख का चिंतन करने की ना वास के चिंतन की ना वस्त्र के चिंतन की ना औषधि के सब व्यवस्था प्रभु की अब अगर भजन ना हुआ भगवत चिंतन ना हुआ तो फिर धिक्कार है जीवन को।

प्रभु ने सब जो चिंतन करने के अवसर थे सब वो बंद कर दिए। आपको अपने वस्त्र का चिंतन करने की जरूरत नहीं कि कैसे तन ढके आपको पेट भरने का कैसे पेट भरे। आप कहां वास करें इसका भी आपकी औषधि कैसे इसका भी कोई चिंतन करने की गुंजाइश नहीं। अब तो अनन्य चिंतन तो माम अब अनन्य चिंतन करो क्योंकि वो योगक्षेम का वाहन स्वयं कर रहे तो कह रहे ग्रासा लाभ यदि एक कौरा अन्न मिल जाए 24 घंटे में तो उतने में ही प्राण पोषण हो जाएगा और रात दिन भजन करो श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी कह रहे हैं कैसे वृंदावन वास करो अपने को सबसे नीचि नीच मानकर दूसरों को सम्मान बढ़ाई देते हुए अपना जब अपमान हो या सम्मान हो दोनों में समान भाव रखें और कोई हमें गाली दे या स्तुति हम उससे अपने हृदय को बचाए और एक कौरा भी अन्न मिल जाए तो उससे प्राण पोषण कर ले और द्व तुल्य भाव बहुत बढ़िया बात है परिवार की ममता छोड़ दे हमारी प्रार्थना है यदि आप मोबाइल अत्यंत आवश्यक है तो कसम खाकर के लीजिए कि गंदी बातें नहीं देखेंगे प्रपंच नहीं देखेंगे नहीं बहुत हम कह रहे सुबह से शाम तक मोबाइल इतना है आराम से समय कट जाएगा बिना भजन के बिना चिंतन के देखते रहो इतनी रीले इतने सब प्रपंच भरे और प्राय चूक हो रही है दिव्य समय को व्यर्थ किया जा रहा है इन बातों से बैठे बैठे बस मोबाइल में लगे हैं।

मोबाइल में ऐसे अंगुली ऐसे करते रहते हैं। वो गया फिर दूसरा फिर तीसरा क्या मिलेगा आपको? आपका समय नष्ट हो रहा है। अच्छा घर परिवार से जब बैरागी हो गए हो तो बात क्यों करते हो? क्या जरूरत है? अरे भगवान को समर्पित कर दिया। वो देखें या तो बैरागी ना बनो। जाओ कपड़ा लद्दा पहनकर घर में मेहनत करो। माता-पिता की सेवा करो। परिवार का सेवन भगवत भाव से करके भजन करके भक्ति के द्वारा भगवान को प्राप्त करो। दो मार्ग हैं। एक निवृत्ति और एक प्रवृत्ति। अब मार्ग तो रखे निवृत्ति का कार्य कर रहे सब प्रवृत्ति के तो कैसे बात बनेगी?

अपने मार्ग में चलो। अगर घर से प्रवृत्ति मार्ग से निकल पड़े हो, निवृत्ति मार्ग में आ गए हो, घर की स्वीकृति लेकर के तो फिर अब चाहे मर जाए कोई अब दोबारा उसकी स्मृति नहीं और वहां जाना नहीं। यह नियम लो परमार्थ के नियम है। रात दिन अगर परिवार से बात रिश्ते नातेदारों से बात करोगे मोबाइल रख के तो और किसी की हानि नहीं कर रहे। आप अपनी हानि कर रहे हैं। निवृत्ति परक जो आपका जीवन है और बहुत सावधान हमें लगता है कि अगर सुनने के लिए तो और यंत्र ले लो सत्संग भर लो।

एक चिप में तीनती00 घंटे के सत्संग हैं। 300 घंटा सत्संग हमें लगता है कि अगर एक एक सत्संग एक घंटा का रोज सुनो तो 365 दिन साल में होते हैं। तो एक साल एक चिप चलेगी। सुनने वाला रख लो। और अगर आपका बहुत ऐसा है कि आप कोई अलग रहते हो। आपको सिलेंडर इन सब की जरूरत है तो एक वो 2000 वाला मोबाइल रख लो। यह टच वाला क्यों रखते हो? इसी में सारे जहर हैं। छोटे वाले में तो हमें लगता है कुछ दिखाई नहीं देता। उसमें चित्र तो आते नहीं। ऐसा करना चाहिए साधक को। यह जिनकी बहुत बड़ी-बड़ी सेवाएं हैं वो बात अलग है।

नहीं हमारी प्रार्थना है बाहरी भी साधकों से अपने यहां तो जिनको सेवा है उन्हीं के पास मोबाइल है अन्यथा नहीं है। बाहरी साधकों से ये मोबाइल बहुत जहर है। भगवत प्राप्ति के बाधा के लिए कलयुग ने बड़ी भारी रचना रच दी है। और अगर नियम संयम से प्रयोग करो तो बड़ा सहयोगी है। सत्संग सुन लो आप इससे मोबाइल से कोई विपत्ति वाली बात है तो आप सूचना दे सकते हो बहुत तरह से बचाव पक्ष इसमें है लेकिन फसाव पक्ष बहुत ज्यादा है फसाव पक्ष से जिनकी बचने की सामर्थ्य है वही मोबाइल रखे साधक तो बिल्कुल जहर समझे मार देगा भैया बिल्कुल मार देगा बिल्कुल मार देगा हर समय हम देखते हैं चाहे छोटा बच्चा हो चाहे बड़ा हो एकांत बैठे चल भी रहे हैं तो कान में बटन से लगे रहते हैं और बात करते घूम रहे जैसे ना बात करते और ऑफिस और समय बर्बाद कर रहा और और खोदे चला जा रहा है संसार की बातें और क्या राधेधे मेन बात कर लो काट के रख दो भजन आओ कान में लगाए बस और समय बर्बाद मत करो यहां कह रहे हैं कि द सुर तुल्य भाव अगर तुमसे कोई शत्रुता का भाव करता है तो तुम भगवत भाव करो और अगर कोई प्रियता का भाव करता है तो भगवत भाव करके राग रहित रहने के लिए उससे ज्यादा प्रियता मत करो।

यह भगवत मार्ग है। घर परिवार वालों से तो प्रभु यदि निवृत्ति मार्ग में हो तो भूल जाओ कि तुम कहां पैदा हुए थे। इसलिए उपासक बहुत सावधान हमारी बात मान लेना। यदि निवृत्ति मार्ग में चले हो तो परिवार से संबंध छोड़ दो। पैसे का बल छोड़ दो। किसी से दोस्ती मत करो। शत्रुता तो किसी से भूल के मत करो। तो एकमात्र भगवान का भरोसा सब व्यवस्था हो जाएगी। सब व्यवस्था मान लीजिए सब व्यवस्था हो जाएगी। विश्वास कीजिए। हमारी बात पर विश्वास कर लीजिए। किसी का सहयोग और विरक्त होकर घर से ले खाना ये तो जहर खाना है।

जहर का मतलब समझते हो? जैसे जहर खाते हो हमें मार देता है। ऐसे ही हमारे वैराग्य को मार देगा। पूज्य श्री रघुनाथ दास गोस्वामी जी को उनके पिता बहुत बड़े आदमी थे। मजूमदार खूब धर्म वैभव। जब देखा कि बेटा जगन्नाथ पुरी में वैराग्य तो यहां से हलवाई सामग्री रुपया पैसा सब भेजा। दो चार दिन श्री पूज्य रघुनाथ दास गोस्वामी जी ने महाप्रभु चैतन्य देव को भोग पाया। फिर विचार किया जब मैं वैराग्य के मार्ग में हूं तो पिता के द्वारा दी हुई वस्तु और संपत्ति का भोग जाकर जगन्नाथ जी के द्वार पर सिंह पौर पर खड़े हो जाते जो भिक्षुकों को प्रसाद बता वो प्रसाद लेकर बस एकांत भजन करते कुछ दिन बाद वो भी छोड़ दिया था एक क्षेत्र से ले आते कुछ दिन बाद वो भी छोड़ दिया जो प्रसाद गायों को डाल दिया जाता गाय छक जाती ना पाती वो रात्रि में बिन के लाते और धोकर उससे उधर पोषण करके खूब भजन में रहते।

हमें महापुरुषों के चरित्रों से पता चलता है कि विरक्त को अपने परिवार के दिए हुए धन के द्वारा अपना भरण पोषण नहीं करना चाहिए। बैरागी को भगवत आश्रित रहना चाहिए। अब दूसरा पक्ष यह श्री धाम वृंदावन है। अब समय वो रह नहीं गया। कि आपको अगर हम सब भिक्षा मांगने निकले तो 400 500 जिस गांव में जाएंगे दरवाजे बंद हो जाएंगे कि भैया रोज कौन 500 रोटी दे अच्छा कितनी व्यवस्था कोई करे तो भगवान ने व्यवस्था कर दी है अब जिनके पूरे परिवार विरक्त है पत्नी पुत्र बेटा बेटी सब अब वो अपने संपत्ति को लेकर वृंदावन आए अपना मकान खरीदे अपना खा पी भजन कर रहे बढ़िया है।

वह भी एक पद्धति क्योंकि वो धामवासी हैं। पूरा का पूरा गृहस्ती से पूरा का पूरा परिवार भजन मार्ग में तो उनके लिए फिर यह विधान है कि अपने द्वारा जो कमाई हुई संपत्ति है उसी से अपने परिवार का पोषण करते हुए और भजन में तन्मय है। लेकिन जो नौजवान हैं गृहस्थी में प्रवेश नहीं हुए और घर छोड़कर श्री धाम वृंदावन या भगवत मार्ग स्वीकार भूलकर भी परिवार का पैसा ना स्वीकार करें। समझ रहे हो? हमने दो भाव यहां प्रकट किए। जो एक गृहस्ती पूरा का पूरा परिवार विरक्त होकर रह रहा है।

वो अपनी कमाई के द्वारा मकान खरीदा। वास की व्यवस्था भोजन की व्यवस्था पूरा परिवार भजन में लगा है प्रणाम है अच्छा है चलो धाम के कारण धाम के कारण और जो गृहस्ती में नहीं गए और विरक्त होकर उनको परिवार का दाना नहीं खाना चाहिए मांगो भगवत आश्रित रहो आकाश वृत्ति से या जैसे तुम्हारा जीवन केवल भगवत आश्रित रहो अपने सुहद जनों के द्वारा दी हुई सुविधाएं स्वीकार करने से भगवत आश्रय में बाधा पड़ जाती है। विरक्त होकर के द्व तुल्य भाव शत्रु में मित्र में समान भाव परिवार वालों से दूरी बना के दोनों भाव बता दिए।

उसमें प्रश्न करने की जरूरत नहीं कि आप हमसे फिर कहने लगे कि अब हम तो आपकी उस आज्ञा का पालन कर रहे हैं कि अब तो परिवार का नहीं। नहीं आपका पूरा परिवार विरक्त है तो जो माता-पिता ने संपत्ति कमाई उससे जो भरण पोषण उससे कीजिए और बिल्कुल एकांत सेवन करते हुए भजन कीजिए लेकिन जिन्होंने ब्याह नहीं किया गृहस्ती में नहीं गए विरक्त भाव में आए उनके लिए बिल्कुल सख्त शासन एक पैसे कभी परिवार से नहीं कभी नहीं कोई संबंध परिवार से नहीं तो आपके परिवार का भी कल्याण हो जाएगा क्योंकि आप निवृत्ति मार्ग के पथिक है कांत मात्र संछा विकृतम स्त्री मया पिंडम नम सुत विधान कष्टम पाना सुभज वना त्रपथा सर्वे शषद वति विनतो ध्यास वृंदावन भो यदि आपको वृंदावन वास मिल गया है तो अब जो है काम आदि भोगों पर शासन वृत्ति राखिए वनवास कर रहे हो सावधान हो जाओ श्रीपाद कह रहे कांत मात्र संछादित विकृतम स्त्री मयामे पिंडम ये जो स्त्री पुरुष शरीर है यह मांसाद से बने हुए हैं।

इसमें कोई सुख कहीं नहीं है। यह केवल भ्रमात्मक कामाद दोष उत्पन्न होने के कारण परस्पराकर्षण और ऐसा लगता है यह सुख है। श्रीपाद कह रहे हैं इस अपवित्र देह से घृणा कर लो अपनी। कहीं सुख नहीं। कैसा भगवान का विचित्र खेल बना हुआ है कि परस्पर आकर्षण आकर्षण कहां स्थानों में है वह सब देख रहे हो। श्रीपाद कह रहे यदि वृंदावन वास मिला है तो थोड़ा विचार करके इस कामाद दोष से रहित होगे तभी तो प्रेम प्रकाशित होगा। जहां काम होता है वहां प्रेम नहीं। जहां प्रेम होता है वहां काम नहीं।

अर्थात अनर्थान रुपया पैसा के लिए व्याकुल हो जाना व्यवस्था में चित्तवत्ति जोड़ देना प्रिया प्रीतम से चिंतन हटा देना बहुत बड़ा अनर्थान ये नाश का कारण बनता है सहज स्वभाव में हमारी चिंतन वृत्ति भगवदाकार रहे प्रिया प्रीतम में और जैसे वो रखे महलों में रखो चाहे झोपड़ी में बांध हमको प्रयास नहीं करना व्यापार नहीं करना विरक्त होकर के गृहस्थ होकर के यदि वृंदावन वास कर रहे तो व्यापार के लिए नहीं भजन के लिए वृंदावन वास भजन के लिए है तो अब आप मान लो ऐसे धनी नहीं हो तो आप कुछ थोड़ा रिक्शा चला ले रहे या जो भी ऐसे कार्य करके अपने परिवार का भरण पोषण करते हो खूब भजन करते हैं हम प्रणाम करते हैं लेकिन यदि आपके पास खाने पीने की व्यवस्था है आप विरक्त हैं फिर आप व्यापार करते हैं तो अनर्थान परिणाम में वह अनर्थ ही पैदा करेगा।

देख लेना जो संत शास्त्र गुरुजन कहते हैं वो परिणाम को बोलते हैं। परिणाम को परिणाम ही हमारे जीवन का परम लक्ष्य है। तो परिणाम क्या होना चाहिए? प्रिया प्रीतम की प्रीति, प्रिया प्रीतम के लिए तड़पना, प्रिया प्रीतम की प्राप्ति के लिए रोना। लेकिन हमारी वृत्ति यदि अर्थ में तो अर्थ में सबसे बड़ा दोष यह है कि वो संख्या पर वृत्ति चली जाती है। अब 10 लाख हो गए अब 10 लाख हो गए। अब 11 लाख हो ऐसे चिंतन करते करते वो मर जाता है और संख्या बढ़ाता रहता है मरते समय तक।

ये संख्या बढ़ाने की बहुत बड़ी दोष वृत्ति अनर्थ वृत्ति इस अर्थ में है। वो चित्त को लुभायमान कर लेता है। और इतना लुभायमान कर लेता है कि गोस्वामी जी ने ऐसा ही मांगा लोभी जिम प्रिय धाम तिम रघुनाथ निरंतर प्रिय लागो मु राम दो बातों में जैसे काम नारी प्रिय जी लोभी जि प्रियता यहां कह रहे कांत तुम मात्र संछाद विकृत स्त्री बया पिंडम तुम्हारे शरीर अन्य शरीर की तरफ जो आकर्षण कुछ नहीं है चमड़ी चिकनी गंदगी भरी हुई है। काहे को व्यर्थ में अपने जीवन को वृंदावन में अपवित्र करते हो, नष्ट कर रहे हो।

दूसरा धन धन के लिए प्रयास गृहस्ती में हो तो उचित प्रयास कर लो। अगर विरक्त हो तो जितना है उससे काम चला लो। मरना है, प्रिया प्रीतम के पास जाना है और भगवान सबका भरण पोषण करते हैं। विश्वास करो वृंदावन जब आए थे तो ना एक व्यक्ति का परिचय था ना एक वस्तु पास थी। परम विरक्त सन्यास वेश जब श्री जी ने स्वीकार किया और व्यवस्था की जरूरत थी। देखो आप सब बैठे हो। कभी किसी से गुरु कृपा से मांगने वाली बात ही नहीं। अपने आप वो सब व्यवस्था करती है। तो भगवत व्यवस्था में अपना कोई अहम नहीं रहता।

जैसे कभी एक बार स्मृति में नहीं आया होगा कि मेरी राधा के कभी नहीं। नहीं श्री जी का विधान चल रहा है। मेरा तो कहीं कुछ नहीं है। अब जब शरीर छूटेगा तो यह थोड़ी ध्यान आएगा कि इसकी कौन देखरेख करे क्योंकि हमने देखरेख किया ही नहीं। हमने बनाया ही नहीं। हमारा है ही नहीं राधा राधा राधा हमारी तो श्री जी है और श्री जी का चिंतन हो रहा है अब श्री जी जो व्यवस्था के उनकी व्यवस्था है उन्हीं की व्यवस्था उन्हीं को समर्पित ये धन की जो बढ़ोतरी करने की भावना विरक्त होकर होती है ये अनर्थ पैदा कर देगी आखरी में अरे अब तो गुजारा करो केवल जिस पर तुम्हारा ममत्व होगा वही आखरी चिंतन होगा ममत्व का विषय श्री जी हो देखो जब कोई आवश्यकता होती है उसकी व्यवस्था श्री जी से होती है ना बड़ा हृदय में शीतलता रहती है देखो कितना

स्वामिनी जो देख रहे हैं कि अगर आवश्यकता है हमने देख रहे एक एक बात को देख रहे बिछाने वाले की आवश्यकता है कालीन की तो दो ही चार दिन में कोई आ जाएगा वो अपने आप कालीन आकर के कटवा के रख जाएगा बिना कहे है बिना मांगे और उससे पूछो बोले दोती दिन से चिंतन चल रहा था कि क्या सेवा क्या फिर हमारे मन में आया कि यह सेवा तो स्वीकार कर लेंगे और हम ये ले तब ये लोग कहते हैं इतनी बड़ी कालीन आई हम कहा हां बिछाने के लिए सत्संगियों के श्री जी अपने आप जो विश्वास तब आपको पता चलेगा श्री जी की जिम्मेवारी है योगक्षम वहां तो वो देखो कर रहे तुम्हारी जिम्मेवारी है अनन्य चिंतोम तुम अनन्य चिंतन श्री जी का करो वो तुम्हारी सब व्यवस्था को देख रही निवृत्ति परक और जो गृहस्ती में है तो उचित कर्मों का धर्मानुष्ठान करते हुए अपने जीवन यात्रा को पूरी करें जो अर्थ है वो अनर्थ का स्वरूप है अनर्थ का स्वरूप यदि वो भगवत आश्रित होकर जिए अर्थ के आश्रित नहीं अर्थ आश्रित हो गए तो अनर्थ पैदा कर देगा अब ये बातें केवल जीवन में उतार ले तो भगवत

प्राप्ति बिल्कुल नजदीक है। सुत सुरद वि बंध यह स्त्री पुत्र आदि का राग अंधा कर देता है। अज्ञान अंधकार में बांध देता है। बहुत विचित्र है भगवान कृपा करे। इसीलिए कहा है गृह का रज नाना जंजाला तेति दुर्गम शैल विशाला ये शरावत अति कठिनाई राम कृपा बिन आए न जाई बिना भगवान की कृपा के ना संत समागम मिलता है ना भजन मिलता है ऐसे लोग फंसे हुए है बस वही लड़का बच्चा परिवार उनको यही लगता है बस यही जीवन है यही सब कुछ है पहली बार मानो सृष्टि में जन्मे उनको ऐसा लग रहा है हां जरा सा शरीर में कुछ हो जाए हाहाकार मच गया लड़का के कुछ हो जाए तो लड़का भी परेशान पिता भी परेशान पूरा परिवार परेशान अरे थोड़ा धैर्य पूर्वक सोचो

तुम जन्मे किस देश में हो इसका नाम है मृत्यु देश मृत्यु लोक कोई ना कोई कारण बनेगा कोई ना कोई मरेगा कोई ना कोई जाएगा कोई ना कोई आएगा ये आना जाना इस देश में लगा हुआ है इसलिए भाई यहां कमाने आए हो कमा लो कौन सा धन अविनाशी धन भगवन नाम भगवत रूप भगवत लीला भगवत धाम कह रहे हैं कि ये जो स्त्री पुत्र सुद आदि में आसक्तित है अंधे हो जाते हैं इनको मृत्यु का भय नहीं रह जाता इनको ये नहीं दिखाई दे रहा मैं किस लिए आया था क्या कर रहा हूं हम ये नहीं कह रहे कि सब विरक्त हो जाओ हिम्मत ही नहीं विरक्त होने की तो कम कम से कम उनमें भगवत भाव करके नाम जप करते हुए धर्म पूर्वक रहो तो तुम्हें वही कृपा प्राप्त हो जाएगी।

पर नहीं जो धर्म पूर्वक चलता है वहां सुख होता है। अधर्म में सुख नहीं है। इसलिए कह रहे सुत सुद बांधवान विद बंधान ये बड़ा बंधन है अज्ञान अंधकार का। इसी बंधन से मुक्त होने के लिए तुम्हें मनुष्य शरीर मिला है। कुछ लोग कहते हैं बड़े प्रश्न करता है। हमें लगता है कि भगवान आकर के सबको समझावे तो भी प्रश्न खत्म नहीं होंगे। प्रश्न करते हैं कि आप कहते हो अन्य योनियों से कोई कर्म होते नहीं। मनुष्य योनि बड़ी दुर्लभ है। तो फिर ये भोगना कौन से कर्म का पड़ता है? आप कहते हो पीछे के कर्मों का भोग भोग रहे हो।

बड़ी बुद्धि लगाते हैं नेगेटिव में पॉजिटिव में नहीं लगाते भैया कोई पहली बार मनुष्य बने हो लाखों करोड़ों असंख्यों बार मनुष्य बन चुके हो भगवान ने आपको हर बार चांस दिया है लेकिन आप हर बार वही चूक करते हो जो इस बार भी कर रहे हो इस बार तो होश में हो जाओ एक एक कर्म का बहुत बड़ा-बड़ा दंड मिलता है यही देख लीजिए 10 मिनट कुकर्म हुआ और उसका फल आजीवन कारावास एक लाख जुर्माना अब विचार करो एक कर्म ऐसे तुमसे लाखों अरबों पाप अपराध हुए तो अन्य योनियों में भटकते भटकते देखकर फिर हरि कृपा करते फिर मनुष्य जन्म देते पर फिर वही चूक कर देता है फस जाता है अपने परिवार के राग में पापाचरण करने लगता है श्रीपाद कह रहे हैं कष्टम मिष्ठान पाना भज वसनाल तप था यदि तुम्हें अच्छे अच्छे पदार्थ वृंदावन में खाने को मिले तो कष्ट मान के उनको छोड़ दो क्योंकि भजन नहीं होने देंगे अच्छे पदार्थ नहीं होने देंगे डंडा चलवाएंगे एक दूसरे की खोपड़ी फुरवाएंगे जब तुम्हारा अर्थ पे बुद्धि बुद्धि रहेगी।

स्वादिष्ट अन्न पर बुद्धि रहेगी। हम आपको सच्ची कहते हैं जो अर्थ पर बुद्धि रखते हैं विरक्त होकर वो घर पैसे भेजते हैं। क्योंकि पैसा जब एकत्रित होगा सुख सामग्री एकत्रित होगी तो घर ले जाने क्योंकि वही राग है। प्रभु से तो अनुराग है नहीं। और कुछ ऐसे हैं जिनका प्रभु से अनुराग है। तो हमने देखा बिहारी जी के दरवाजे पर बैठ के पद गाया करते थे। बड़े सुंदर सुंदर महापुरुषों के रहीम जी के रसखान के बड़े बड़े महापुरुषों उनको जो पैसा मिलता उससे जीवन यापन करते जो बचता तो राम जी वाई सत्संग भवन में एक दिन बहुत सुंदर प्रसाद सबको पवाया जा रहा था भक्तों को तो पूछा कि वो महात्मा जो है सबसे हाथ जोड़ जोड़ के कहा ये महात्मा बोले यही तो करवा रहे कहा ये तो भिक्षावत्त से जीते बोले जो बच जाता है उससे ऐसे कुछ ऐसे विरक्त भिक्षुक स्वभाव वाले महापुरुष कि अपना शरीर पोषण किया और शेष संतों की सेवा में नहीं तो घर

की प्रियता आती विरक्त होकर घर पैसे भेजने का मतलब है कुल परिवार का पतन कुल परिवार का पतन साधु भाव में आकर के भगवत भाव में आकर के जो हमको धन मिलता है वह संत सेवा के लिए भगवत सेवा के लिए यदि चाचा भतीजा जाओ इनको सब ना नरक ही जाना पड़ेगा पक्की बात समझ लो दुर्गति पक्की है इसके लिए हमें एक प्रमाण मिला भक्त माली जी महाराज वो पधार चुके वो बता रहे थे कि स्वप्न में एक बड़े महापुरुष वो अपने भाई को कुछ लाख रुपए दिए थे वो आके महंत थे बहुत बड़ी जगह के तो उन भाई

आए और बोले बेटी का ब्याह इतने लाख रुपया दे दो बाद में हम ब्याज सहित दे देंगे तो उन्होंने दे दिया अब उनको उनको लगा मेरे भाई क्या देना है? वो दो चार बार कहे और दिया तो नहीं तब तक उनका शरीर पूरा तो वो प्रेत योनि को प्राप्त हुए। अब और भी जो लीला हुई हो। फिर उन्होंने स्वप्न में आकर भक्त माली जी से कहा कि हमारा ऐसा ऐसा ऐसा आप वो पैसा निकलवाकर भाई से और संत भंडारा कर दो तो हमारी मुक्ति हो जाए। यह एक एक रुपया जो श्री जी के लिए आवे जो संत सेवा के लिए आवे जो गौ सेवा के लिए जहां जिसके लिए आया उसको वही खर्चा कर दो तो आपका सेवा बन जाएगी और भगवत मार्ग तो ये कह रहे हैं कि जो मिष्ठान आदि है अच्छे-अच्छे पदार्थ ये बहुत होश में खाओ पियो ये कर्जा है अगर भजन नहीं होगा तो हां पक्का समझ लो कर्जा है ये बुद्धि खराब कर देगा भजन नहीं होने देगा इसलिए श्रीपाद कह रहे कष्टम मिान पानादु जब आप ब्रह्मचारी रहेंगे तो आपके शरीर में जैसे कोई इंजेक्शन लगा दे ना

बिजली दौड़े ऐसे शरीर में एकदम बिजली दौड़ती है बहुत होश में खानपान करो रूखा सूखा खाए के ठंडा पानी पियो सत्संग को ये भगवत प्राप्ति के लिए है तो इन बातों को मानिए आप ये अच्छे पदार्थ दूसरे का कर्जा लेना है यह ना समझो कि अरे बहुत पंडित रामकृष्ण बाबा जी जब राधा रमण जी दर्शन करने गए उनके चरित्र में आता है दो ना भर के उनका जय जय नहीं हमें तुलसी दल और चरणामृत दीजिए ये और किसी को हमें तुलसी दल दीजिए जो चरणों में चढ़ी और चरणामृत दीजिए पंडित रामकृष्ण नहीं जय जय मिठाना आदि खाने में कष्ट मानिए तो अब प्रियाल को देख ले लिखले थे भंडारा देख लेंगे बहुत समझ के चलने का हां देखो कुछ बातें ऐसी है जो समझ में आनी चाहिए ये भंडारा सच्ची मानी जब आप हम ये कह रहे हैं खाओ विरक्त हो एक जगह चले जाओ कम पैसे वाली सामग्री पा लो दिन भर भजन करो कुछ नहीं परेशानी होगी अब चार जगह भंडारे जाओगे और हर जगह की दक्षिणा लोगे तो सच्ची मानो भजन नहीं होगा।

क्यों चार जगह गए? एक जगह पेट भर लो। दक्षिणा मत लो। जरूरी है अगर आपको बिजली पानी खर्चा की तो दक्षिणा ले लो। एक जगह चले जाओ। जो पद्धति है मिष्ठान खाने में कष्ट माने कि ये हमारे भजन को क्षण कर दे। खूब अनुभव की बात कह रहे हैं। महापुरुषों के अनुभव की बात है। रूखा सूखा खाओ प्राण निकल काहे को लकड़ी का वजन बढ़वाओगे। जितने शरीर में चर्बी होगी उतना ज्यादा लकड़ी लगेगी। हल्का शरीर रहेगा कब लकड़ी लगेगी? आखिरकार जलाना ही है इसको। जल नहीं है और पावर तो ब्रह्मचर्य है जो ब्रह्मचर्य से रहता है अपार सामर्थ उसमें रहती है देखने की सुनने की बोलने की चलने की फिरने की उठने की शरीर में बिल्कुल कोई भयानक रोग प्रारब्धात हो तो भी कोई कष्ट उसको गिरा नहीं सकता ब्रह्मचर्य एक अमोख शक्ति और ब्रह्मचर्य क्षीण है तो जवान है कमर में दर्द गांठ में दर्द 242 की अवस्था है गांठ में दर्द।

यह तो 70 80 वालों के कि अब बुढ़ापा आ गया। गांठ में दर्द है। बोले ग्रीस खत्म हो गई गांठ की। अब हमको तो ज्यादा अंग्रेजी आती नहीं। हम उसको वैसे ही कहते हैं। ग्रीस जो भी हो बोले गांठ की वो चिकलाहट ग्रीस खत्म हो गई। तुम्हारी गांठ में जो ब्रह्मचर्य रूपी ग्रीस थी उसी को नष्ट कर दिया। तो अब जोड़ों में कहां से पहुंचे? सब पावर उसी से बनता है। भाई चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त बहुत सावधानी से ब्रह्मचर्य का रक्षा का भाव रखो। ये तुम्हारे जीवन को बहुत उत्तम बना देगी।

विश्वास कीजिए। हां बहुत कीमती वस्तु है। बहुत कीमती वस्तु है। ब्रह्मचर्य पर ध्यान दीजिए। ब्रह्मचर्य जो है अधिक मीठा खाने वाला ब्रह्मचारी नहीं रह सकता। पक्का नहीं रह सकता। काहे को? अपने अमूल्य जीवन को इधरउधर नष्ट करें। अब कह रहे हैं विरक्त होकर कीमती वस्त्र वना जलते त्रपथा जब अच्छे वस्त्र पहनने की बात आवे तो शरीर कम पायमान हो जाए त्रपथा कम पैसे वाली वस्तु का प्रयोग किया जाए जितने कम से काम चल जाए अपने जहां तक भाव है अपने प्रयोग में आने वाली म पूरे जीवन में मार्किन ही नीचे की पहन ऊपर जो वस्त्र गुरुदेव प्रदत्त किए वही अभी नहीं तो भगवा वस्त्र गेरू से रंग के पूरे जीवन अब तो शरीर अस्वस्थ है इसलिए और ऐसी भीड़ है कि अगर हम अभी पैदल दोबारा वापस जाए तो दोबारा उतनी रस्सी उतने आदमी और उससे ज्यादा आदमी खड़े हो जाएंगे जब गाड़ी से लौटते तो इतने भीड़ लगी रहती है नहीं आप क्या समझते दुर्भाग्य है ये गाड़ी घोड़ा हमारा कोई अभिमान का विषय थोड़ी है।

अभिमान का विषय नंगे पैर फटे पुराने कपड़े भिक्षा से शरीर पोषण। अब आपके हवाले महलों मेरा कुछ है। झोपड़ी में जैसे चाहो नहीं हमें केवल प्रवचन नहीं कर रहे। जीवन है अत्यंत उज्जवल वस्त्र कीमती वस्त्र विरक्त भष बिल्कुल नहीं। बोले शरीर का उठना चाहिए। और कह सर्वे शिष्या व्यास वृंदावन सबके आगे ऐसे व्यवहार करो जैसे गुरु के आगे किया जाता है शिष्य की भांति सर्वेशा शिष्य भत्याद विनितो ध्यास वृंदावन भो सबके सामने वृंदावन वासी वृंदावन के जो जन है सबके सामने एक शिष्य जैसा बर्ताव करो दीन भाव से तो इसी जन्म में श्री प्रिया प्रीतम की कृपा से प्रिया लाल के साक्षात्कार का संयोग वृंदावन बना देगा।

बहुत कृपा है। यदि यह रहनी जो श्रीपाद कह रहे हैं यह रहनी हमारे जीवन में आ जाए तो वृंदावन वास करते हुए बहुत जल्दी भगवत साक्षात्कार हो जाए। एक प्रश्न किसी ने किया कि आप जो प्राय कहते हैं कि श्री जी सर्वोपरि और उन्हीं के अंश से दुर्गाद शक्तियां हैं। तो मुझे चुभता है कि जैसे आपकी इष्ट राधा महारानी है ऐसे हमारी इष्ट माता जी हैं। तो आप कहते हो करोड़ वे अंश में दुर्गा जी है श्री राधा रानी के तो हमको भी तो चुभता है कि आप कहते हो हम नहीं कह रहे तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित पहली बात तो हमारी श्री जी क्या है जब हम श्री जी सेित जोड़ेंगे तब पता चलेगा और दूसरी बात है कि जो शास्त्रों में लिखा है उसे पद्म पुराण पाताल खंड अध्याय 81 भगवान शिव कह रहे हैं बहुत ध्यान से सुनिए अंतरंग तथा नित्य विभूत चिदा गोपला दुचते गोपी राधिका कृष्ण वल्लभा देवी कृष्णमई प्रोक्ता राधिका पर देवता सर्व लक्ष्मी स्वरूपासा कृष्णाद स्वरूपणी तथा सा विप्र लाद नीति मनीष ध्यान से तत कला कोटि कोटसा दुर्गा त्रिगुणात्मिका सात साक्षात महालक्ष्मी कृष्ण नारायण प्रभु नते भ स्वल्पोप मुनतम यम दुर्गा हरि रुद्र कृष्णा सक्र यम स सावित्री हरि ब्रह्मा धमनास यमो हरि बहुना किम मुनि श्रेष्ठ विनाभ्याम न कििंचन चिद चिद लक्षण सर्वम राधा कृष्णम जगत इम सर्वम तयो रेव विभूति वि नारद नाशते मयाक्त वर्ष कोटि सत रपी भगवान शंकर कैलाश में विराजमान है।

देवर्षि नारद जी सनका आदि बड़े-बड़े महापुरुषों की सभा लगी हुई। उस सभा में कह रहे हैं नारद जी को संबोधन करके भगवान शिव कह रहे हैं हे नारद जी ये जो श्री कृष्ण प्रिया राधा है ये महा चैतन्य शक्ति स्वरूपा जितनी भी देवियां हैं ये सब इनके अंश से प्रकट हुई है। ये अंतरंग विभूति है। इसीलिए इनको कोई जानता नहीं। अत्यंत गोपन तत्व है। इसलिए इनका एक नाम गोपी है। श्री कृष्ण सदैव इनकी आराधना करते इसलिए नाम इनका राधा है और ये सदैव श्री कृष्ण की आराधना में रहते इसलिए इनका एक नाम राधिका है।

यह और श्री कृष्ण दो नहीं है। श्री कृष्ण में राधा है। राधा में श्री कृष्ण है। यह राधा परा देवता है। जितनी भी लक्ष्मी आदि शक्तियां सब इनहीं के अंश से हैं। आपको भगवान का आल्हाद कहा गया है। आल्हाद और जब मूर्तिमान हुई तो राधा कह गई किशोरी जो कह गई और तत् कला कोटि कोटसा भगवान शिव बोल रहे हैं तत्कला कोटि कोटसा दुर्गाध्य त्रिगुणात्मिका दुर्गा आदि जितनी त्रिगुणात्मिका देवी शक्तियां हैं ये इनके कला से करोड़वे से करोड़वे अंश में प्रकट है यही यही प्रकट है पर करोड़वे अंश में प्रकट है।

हम नहीं कह रहे ये भगवान शिव कह रहे हैं। जो राधा कृपा कटाक्ष पढ़ते हैं वो पढ़ के देखें। आखरी में भगवान शिव कह रहे हैं क्रशरी मखेश्वरी सुधेश्वरी त्रिवेद भारतीश्वरी प्रमाण शासनेश्वरी हमारे यहां सुधा निधि में महाप्रभु हरिवंश चंद्र जी कह रहे हैं प्रेमणास मधुरस हदय श्रृंगार लीला कला वैचित्री परमावध भगवता पूज्य कापी सता ईशानी सची महा सुख तनु शक्ति स्वत वृंदावन नाथ प महष रा से्याम बोले तत कला कोटि कोटि अंसा कला उनहीं की कला राधा की ही कला श्री किशोरी जी के ही अंश से करोड़ों करोड़ अंश में सब शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ श्री राधा अपने अंश से महालक्ष्मी रूप धारण करती है तो भगवान श्री कृष्ण नारायण रूप धारण करते हैं।

मुनि श्रेष्ठ थोड़ा भी भेद नहीं है। यह श्री राधा दुर्गा रूप धारण करती है तो श्री कृष्ण शिव रूप धारण करते हैं। रुद्र जब श्री कृष्ण के अंश से इंद्र तो श्री राधा किशोरी के अंश से सची इंद्राणी जब श्री कृष्ण के अंश से ब्रह्मा तो राधा किशोरी के अंश से सावित्री देवी जब श्री कृष्ण के अंश से यमराज तो उनकी पत्नी धूमरणा के रूप में श्री राधा किशोरी अधिक क्या कहूं इन दोनों के सिवा किसी की सत्ता ही नहीं यही सब चिद लक्षण म सर्वम राधा कृष्णमयम जगत चेतन अचेतन सारा संसार श्री राधा कृष्ण का स्वरूप है।

नारद जी मैं इन विभूतियों का क्या वर्णन करूं अगर 100 करोड़ वर्ष तक राधा की महिमा वर्णन करूं तो भी नहीं कर सकता। भगवान शिव कुछ ऐसे भावुक जन है कि वो कहते हैं कि आप भगवान शंकर को श्री कृष्ण से छोटा कहते हैं। वो हमारे आराध्य देव हमको चुभता है। देखो जब तत्व की चर्चा होगी तो एक है। और जब लीला की चर्चा होगी तो वही एक विविध लीलाएं करता है। वही एक विविध लीलाएं करता है। रास में भगवान शंकर आए। अगर थोड़ा भी शास्त्र को पढ़े हो तो पढ़ के देख लेना। गोपी रूप धारण किया।

रास में प्रवेश पाया। श्री कृष्ण चरण वंदना किशोरी जो की चरण वंदना और फिर गोपी रूप धारण करके रास में प्रवेश। अच्छा कोई भी यह कैसे नकार सकता है कि भगवान शंकर की जटाओं में गंगा जी हैं और वो गंगा जी क्या है क्या आप नहीं जानते हो गंगा तरंग रमणीय जो जटा कलापम गौरी विभूषित वाम भागम भगवान शिव के लिए आता है तो जो जटा कटा सम भ्रमम भ्रम नीलंप निर्झरी जो विराजमान है गंगा जी वो वो कौन है? गांगम वारी मनोहारी मुरारी चरण अचुतम त्रिपुरारी चिरचारी पापाहारी पुनत्मा देखो भाई तत्व एक है पर लीला में जब प्रारंभ होगा तो लीला में छुटाई बड़ाई हंसी मजाक वो उनकी आराधना उनकी आराधना तबत तो एक है।

अभी आप यहां सुन रहे हो कि जब श्री कृष्ण शिव रूप धारण करते हैं तो राधा किशोरी दुर्गा रूप धारण करती यही है। कोई और थोड़ी है। पर जब लीला की बात आती है तो वही भगवान शंकर गोपी रूप आज भी भगवान गोपेश्वर का श्रृंगार होता है। गोपी रूप में शाम टाइम जल नहीं चढ़ता। नथुनी बाला और सब चुनरी धारण करके भगवान शिव गोपीश्वर के रूप में विराजते हैं। भगवान शंकर गंगा जी को नेत्रों से भी रोक सकते थे। लेकिन जटाव में धारण किया कि श्री कृष्ण का चरणामृत है। वामन भगवान का चरणामृत है।

वामन के रूप में श्री कृष्ण ही है। प्राणाधिक प्रियतमा सर्वाभ्या सुंदरी परा सर्वयुक्त सौभाग्य भागिनी गौरवािता हमारी जो श्री किशोरी जो है एक यहां बात ध्यान रखनी है कि एक प्रश्न और आता है सभा में जब चर्चा होती है तो उसको सुनकर के लोगों के अंदर प्रश्न आता है कि शिव पुराण में लिखा है कि भगवान भगवान शंकर सर्वश्रेष्ठ है। देवी पुराण में लिखा है कि इनहीं से सबकी उत्पत्ति है। आप गणेश महिमा को देखो तो यम ब्रह तम ब्रह सब कुछ जिस पुराण को देखो उसी से सृष्टि हुई है।

इसका मतलब क्या है? गलत है क्या? जब तुम शिव पुराण पढ़ोगे तो शिव तत्व से ही सबकी उत्पत्ति है। सब कुछ शिव तत्व है। पढ़े हैं। जैसे कहा भगवान शंकर ने चिद चिद लक्षणम सर्वम राधा कृष्णमयं जगत ऐसे कहा गया है हे भगवती हे भगवान आपसे ही सृष्टि प्रकट है शिव पुराण में क्योंकि जितनी माताएं हैं वो सब भगवती है और जितने पुरुष हैं वो सब हे भगवान शिव आपका ही स्वरूप है। चराचर जगत शिव और पार्वती मय है। भगवान का ऐसा लिंग प्रकट हुआ शिव जी का कि 100 कल्प तक ब्रह्मा जी उतरते चढ़ते रहे पार ना पाया फिर भगवान विष्णु महा उसमें पढ़ना शिव पुराण में हम तो पढ़ करके बात कर रहे आर पार नहीं पाया भगवान शिव से ही नारायण का प्रादुर्भाव होता है भगवान का प्रादुर्भाव होता है भगवान शिव से ही ब्रह्मा का प्रादुर्भाव होता है जब देवी भागवत पढ़ो तो सब कुछ देवी जी से प्रकट हुआ तो क्या झूठा है क्या पुराण कोई झूठे हैं क्या?

तो अगर उनसे प्रकट हुआ तो इनसे कैसे भागवत पढ़ के देखो तो श्री हरि से नाभि कमल से ब्रह्मा ब्रह्मा की भ्रकुट से शंकर रुद्र का अवतार उधर पढ़ के देखो तो भगवान शिव से ब्रह्मा और श्री हरि प्रकट होते हैं। देवी भागवत पढ़ के देखो तो देवी शक्ति ये है क्या? तत्व तत्व एक है वही परमात्मा है वही जब शिव पुराण पढ़ोगे तो सब कुछ शिव की जब भागवत पुराण पढ़ोगे तो सब कुछ श्री हरि का और जब देवी भागवत पढ़ोगे तो सब कुछ वही देवी प्रपनार्थ हरे प्रसिद्ध प्रसिद्ध मातर जगतो खिलस प्रसिद्ध विश्वेश्वरी पा विश्वम तश्वरी देवी चराचरस हे देवी तुम ही चराचर में व्याप्त हो तुम ईश्वरी हो तुम सर्वशक्तिमान हो तुमसे बढ़कर कोई नहीं क्या समझते हो जो जहां है वही परम तत्व है और वो वही सब कुछ है इधर से हम देखेंगे तो कृष्णाकार उधर से देखोगे तो शिवाकार उधर से देखोगे तो दुर्गामय उधर से देखोगे कालीमय जो बोलो वही परम तत्व है पर जब हम लीला का गायन करते हैं तो लीला में विभाग हो जाता है वही एक परमात्मा वेद कहता है एक बहुस्यामा मैं एक बहुत रूपों में हो जाऊं।

अब वही परमात्मा शासक बन गया। वही शासित हो गया। वही धर्मात्मा बन गया। उसी के छाती से धर्म प्रकट हुआ। उसी के पीठ से अधर्म प्रकट हुआ। अधर्म करने वाला दंडनीय हो गया। धर्म करने वाला बंधनी हो गया। लेकिन दंडनीय और बंधनी में दोनों में एक तत्व विराजमान है। तत्व में अंतर नहीं। ये जो समझते नहीं ना लीला को समझते नहीं है और तत्व को समझते नहीं तो ये झगड़ा करने लगते हैं कि शिव को छोटा कैसे कह दिया पूछो शिव जी से जाके अरे उनको देखो तो रात दिन भगवत श्री हरि चर्चा करते रहते हैं और हरि को देखो उनसे पूछो जाके कि तुम्हारे आराध्य देव कौन है बोले शंकर हरि से पूछो कि तुम्हारा गुरु कौन है बोले शंकर और शंकर जी से पूछो तुम्हारा आराध्य देव बोले हरि और हम आपस में लाठी चलाएं।

अरे वो एक है। वो एक है। वो अनेक है। अनेक होते हुए भी एक है। एक होते हुए भी अनेक है। इस बात को समझो। जब देवी भागवत तो देवी ही सब कुछ है। देवी के ही अंश से राधा है। समझिए आप जब हम वृंदावन से बोलेंगे तो राधा के अंश से देवी है। जब आप शिव पुराण से बोलेंगे तो शिव के अंश से हरि है। और जब भागवत पुराण से बोलेंगे तो हरि के अंश से शिव है। आप इस बात को समझिए। जब लीला का बात लीला प्रसंग आएगी तो उसमें भेद हो जाते हैं। जैसे ब्रह्म ऋषियों ने विचार किया कि इन तीन महान भगवत स्वरूपों में कौन सबसे बड़ा है?

क्या उन ब्रह्म ऋषियों को पता नहीं कि हरि ही ब्रह्मा है। ब्रह्मा हरि ही शिव है। शिव ब्रह्मा और हरि में किन मात्र भेद नहीं। स्वयं भगवान बोले मैं ही हर हूं। मैं ही विधि हूं। मैं ही हरि रूप हूं। जगह जगह वर्णन है। लेकिन जब भृगु जी परीक्षा के लिए गए तो ब्रह्मा जी के सामने जाकर ऐसे खड़े हो गए। ये अभद्रता है। गुरुजनों के सामने ऐसे खड़े होना। ऐसे नहीं खड़े हुआ जाता। ये अभद्रता कही जाती है। गुरुजनों के सामने सावधानी पूर्वक हाथ जोड़कर या बहुत नम्र ऐसे अब वो गए और ऐसे गए और ऐसे खड़े हो गए।

ब्रह्मा जी ने कहा यह तो सभा की मर्यादा के विरुद्ध है। पर भृगु जी उनके पुत्र हैं। थोड़ा गुस्सा आया पर शांत रहे। शंकर जी के पास गए। बोले आओ भाई बहुत दिनों बाद आगमन हुआ भृघु जी से। बोले हम तुम्हारे गले नहीं लगते हैं। परम पवित्र रहते हैं। उठाया त्रिशूल उन्होंने हमको भगु जी शांत हो के वहां और भगवान हरि के पास गए। सैया में पड़े हुए थे। सीधे लात मारी जाके सीधे छाती पे ला भगवान उठे और कहा मुझे पता नहीं था आप आ रहे हो नहीं आपकी अगवानी करता और चरण दाबने लगे बोले आपके चरण बहुत कोमल है मेरी छाती बहुत कठोर कहीं चोट तो नहीं लग गई और आज के बाद जब जब अवतार भी लेंगे तब तक आपका भृगु चरण चिन्ह ये हमारे छाती पर बना रहेगा ये हमारा बड़ा सौभाग्य आंसू आ गए भृगु जी के अब आप क्या कहेंगे कोई छोटा बड़ा जब लीला होती है और एक ही तत्व है तो रंग मंच पर वही सब रूप धारण किए जगन् नाटक वैभवा इस बात को सब पर जब हम किशोरी जी की बात करेंगे तो किशोरी जी के अंश से सब शक्तियां है और जब आप दुर्गा की बात करें तो आपको वहां से दिखाई देगा किशोरी जी दुर्गा जी की अंश है क्योंकि इधर से अंश वो उधर से अंश वो वो उनकी अंशी वो उनकी अंशी कोई अंतर नहीं है।

इधर से हम बोलेंगे श्री कृष्ण के अंश से शिव और जब शिव पुराण में पढ़ोगे तो शिव जी के अंश से श्री कृष्ण अब इसमें संशय थोड़ी क्योंकि वही एक तत्व है विविध प्रकार से लीला कर रहा है इसलिए भ्रम का तो ध्यान छोड़ दो भ्रम छोड़ दो जब जब जैसा अवसर आया वही रूप धारण किए तत्व विराज पर जब लीला की चर्चा होगी तो माधुर्य रस में ऐश्वर्य का प्रवेश नहीं भगवान के ऐश्वर्य का प्रवेश नहीं तो और ईश्वर शक्तियों की तो बात जाने दो। कभी आपको कोई भी शास्त्र मिला हो कि ब्रज में सुदर्शन चक्र का प्रयोग भगवान ने किया या प्रवेश हुआ तो हमें बताना।

कभी दिव्य वैभव का प्रयोग क्योंकि यहुर्य का क्षेत्र है। यह जो ब्रज है यह वात्सल्य माधुर कभी सुदर्शन चक्र से ब्रज में किसी को मारा हो मुझे तो याद नहीं है। आप लोगों को कोई याद आवे तो हमको भी बता देना क्योंकि अभी तक तो नहीं पढ़ा है। आगे अगर किसी को लगे दूध पीते हुए पूतना को मारा। प्रवेश करके अघासुर को मारा। फाड़ के बकासुर को फेंक दिया। और उसका पैर पकड़ के धेनुकासुर को मारा। बस यही थप्पड़ घसा इसी से पहुंचा दिया है। ना तो कोमोद की गधा आई है। ना प्रभु की तलवार आई है।

ना यहां सुदर्शन चक्र आया है। ना यहां दारू सारथी रथ ले आया है। ये ऐश्वर्य नहीं ये प्रेम देश है। ऐश्वर्य का प्रवेश नहीं है यहां। और जहां कहीं ऐश्वर्य का कुछ दिगदर्शन कराना चाहा तो वहां वात्सल्य ने डांट लगा दी है। जैसे मुख में जब मिट्टी खाए ऐश्वर्य दिखाना शुरू किया तो वात्सल्य ने डांटा है यहां नहीं तो तुरंत मैया को लगा मेरी आंखों का दोष कोई है ये तो मेरा लाला है ऐश्वर्य का। अब जब निकुंज की बात आती है तो इसमें तो बिल्कुल ऐश्वर्य का प्रवेश नहीं है। ब्रज में तो आप थोड़ा ऐश्वर्य की झलक दिखा दी।

अंतर्ध्य हो गए लेकिन निकुंज में कहीं नहीं कि अंतर्ध्य की लीला एक बार भी हुई हो। निकुंज में बताना पूरे वाणियों को पढ़ के। अब जो निकुंज रस है इसमें कहीं वर्णन नहीं है कि अष्ट भुजा का प्रवेश है या सोडस भुजा का। हमारी ही श्री जी सब अंशों से है लेकिन ऐश्वर्य रूप नहीं ये महा माधुर्य रूप है। इसी महा माधुर्य की महिमा की हम उपासना करते तो हमारे लिए हमारा उपास्य देव सर्वश्रेष्ठ है। और जब उपास्य देव की सर्वश्रेष्ठता की लीला में देखते हैं तब ये वर्णन आता है कि अनंत शक्तियां देखो भगवान शिव ने स्वयं वर्णन किया कि ये जो अनंत शक्तियां तत कला कोटि कोटिसा दुर्गा त्रिगुणात्मिका अब देखिए वही प्रभु है शक्ति वही है शक्तिमान किंचिन मात्र अंतर नहीं लेकिन प्रभु आदेश करते हैं कि मैं अब अवतार लेने जा रहा हूं भागवत में पढ़ के देख लेना तुम हे महाशक्ति बलराम जी का कर्षण करके रोहिणी के गर्भ में डालो और मैं स्वयं अवतार लो तुम जाकर नंद बाबा के यहां कन्या रूप से पूरी लीला पढ़ के देख लो और नाम चामुंडा कुषमांडा दुर्गा आदि तुम्हारे विविध नाम भगवान ने रखे और तुम सबकी कामना पूर्ण करने वाली होगी जाओ मेरा आदेश ऐसा करो भगवान ने आदेश किया शक्ति कार्य कर रही भगवान की प्राप्ति के के लिए उसी शक्ति की आराधना कात्यायनी रूप से गोपिकाएं करती हैं कि मुझे श्री कृष्ण पति रूप में प्राप्त हो।

उसी शक्ति की आराधना सीता जी गौरी पूजन करती है। और सीता जी कौन है? काल रात्रि निश्चल निश्चल कुल केरी महाकाल रात्रि स्वरूप उनको गोस्वामी जी ने कहा काल रात्रि निश्चल कुल केरी जे सीता पर प्रीति घरी ये नहीं समझ रहा रावण की साक्षात इसका काल पधारा है ये काल रात्रि महाशक्ति स्वरूप चाट जाएंगी कुछ नहीं बचेगा लंका में ये दुष्ट जिनके प्रति विरोध भाव कर रहा है कौन है वही गौरी है और वही गोरी वही महाशक्ति है और वही सीता जी है। अब आप समझिए आदि शक्ति जे जग उपजाया सीता जी गौरी पूजन कर रही है।

गौरी जी खसी माल मूर मूरत मुस्कानी जाओ मनु जा हिराच मिली सोबर साद सुंदर सा तो सीता जी कौन है? मनु शत्रूपा को भगवान राम कह रहे आदि शक्ति जे जग उपजाया सो अवतरी मोर माया अरे कोई भेद नहीं कहीं भेद नहीं पर जब लीला की बात करेंगे तब लीला में भेद दिखाई दे रहा है कि सीता जी गौरी जी का पूजन कर रही उनसे वरदान प्राप्त कर रही है और भगवान प्रिया सती को संशय हो जाता है लीला भेद देखो कि ये राम जी कैसे सच्चिदानंद में जब हे खग हे मृग मधुकर श्रेणी पूरा प्रसंग पढ़ के देखो आप और है कौन या देवी सर्वभते बुद्धि रूपण संिता जब लीला में देखोगे तो तत्व की बात भूलना

पड़ेगा तभी स्वाद आएगा और जब तत्व देखोगे तो शांत रस आएगा ये दास्य वात्सल्य सख्य ये रसों का स्वाद नहीं मिल पाएगा उसमें एक ही तत्व है तो समझ में आ रहा है वही तत्व है जब लीला में देखोगे तो आपको वही तत्व परशुराम है वही तत्व राम राम जी है लेकिन राम जी के आगे परशुराम जी घुटने टेक कर जय जय जय रघुकुल केतु भ्रगुपति गए तपह बने हेतु ये समझना होगा ये जो आजकल के नए बच्चे हैं ना ये तर्क वितर्क शुरू कर देते हैं लीला में तर्क वितर्क नहीं होता है तत्व में एक ही वस्तु है तत्व की जब बात करोगे तो आप क्या समझते हो कितने दिन से तुम दुर्गा जी की उपासना करते हो बचपन से आराधना और पूरी अम्मा मान के पूरी जैसे अपनी अम्मा पूरा आसक्ति अम्मा आद्या शक्ति दुर्गा और पिता भगवान शिव तुम समझते नहीं हो जहां हमें भेजा है उस तत्व को जो समझाया उस तत्व से बोल रहे हैं तुम उसको दो पक्ष में ले रहे हो तुम्हारे को क्या पता कि महादेव जी मुझे कितना प्यार करते हैं भगवती कितना प्यार करते हम भगवती अंबा और महादेव जी से कितना प्यार करते

हैं तत्व को समझिए राधा तत्व सर्वत्र व्याप्त तत्व है चिद लक्षणम राधा कृष्ण जगत पर जब लीला में स्वरूप राधा जी का जो है वो कहीं त्रिभुवन में कहीं नहीं है क्योंकि महाधुर्य रस प्रेम स्वरूपा है जिनकी आराधना स्वयं श्री कृष्ण करते और जिन श्री कृष्ण की आराधना भगवान शंकर सनकाद ब्रह्मा आदि सब करते ये हमारे उपास्य देव है और जब आप अपने उपास्य देव के विषय में जैसे बोले कि श्री कृष्ण जिनके सेवक हैं ऐसे महादेव कोई परेशानी नहीं। श्री कृष्ण जिनके सेवक हैं ऐसे महादेव क्योंकि हमें पता है कि तुम जो बोल रहे हो वो सत्य बोल रहे हो क्योंकि वैसे ही उस तत्व को देखा जाता है।

ये तत्व है ही ऐसा कि हम जिस भावना से जैसे देखें वैसे दिखाई देगा। जब हम गणेश स्तोत्र पढ़ते हैं तो सब कुछ गणेश जी बने हुए हैं। जब राम स्तोत्र तो सब कुछ राम जब कृष्ण सब कुछ कृष्ण जब नरसिंह तो सब कुछ नरसिंह जब वराह तो सब कुछ वरा वही बने हुए दूसरा कोई नहीं इसमें हमें कोई संशय नहीं है। तुम्हें कितना ज्ञान है? उनके पति हैं शिव ज्ञान समुद्र वो कह रहे हैं हम तुम्हें पूरा परिचय के साथ बता रहे पद्म पुराण पाताल खंड अध्याय 81 उसमें कह रहे हैं तत्कला कोटि कोटिसा दुर्गा व्यास त्रिगुणात्मिका कभी रास का स्वाद लिया है रास का स्वाद लेना है तो ब्रज रस में ऐसी यही तो वृंदावन की लीला मत समझो गुरु को चीलाया ऋषि मुनि गए हार जपे जा राधे राधे ऋषि मुनि गए हार जपे जा राधे राधे राधे प्रियाल है प्रियाल अगर हम जो बोलते हैं उसकी बात को समझ लेना कहते हो कहां प्रमाण है तो हमारी छाती प्रमाण है खिलवाड़ मत समझना अगर तुमने राधा किशोरी की अवहेलना करके कहा कि अंबा जब जड़ भरत जी के ऊपर गड़ासा चलाने की बात अंबा के ही सेवकों ने किया तो भद्रकाली सहन नहीं कर पाई और मूर्ति फोड़ कर प्रकट हो गए काट के फेंक दिया अपने ही उपासकों को होश में रहना राधा राधा किशोरी राधा किशोरी है।

तत्व से बोलोगे तो मुझे कभी कोई संशय नहीं। सब एक हैं। जब लीला में आओगे तो वही स्वामी बनता है। वही सेवक बनता है। जब लीला में देखोगे तो वही छोटा बनता है। वही बड़ा बनता है। वो विविध रूप धारण करके एक ही तत्व खेल रहा है। इसमें संशय नहीं। पर जब लीला का रस आस्वादन करते तब आप उसमें संशय मत करो। वो विविध लीलाएं वही गोपी बना है वही श्री जी बना है वही वृंदावन बना है और वही प्रीतम बना है और वही खेल रहा है वही नरक बना है वही अधर्म बना है वही दंड विधान बना है वही रोग बना है वही विविध प्रकार की यातना बना है समझो ना कहते हो नर्क भी वही बना तो जब नर्क नहीं था तब कौन था श्री कृष्ण और जब नहीं रहेगा तब कौन है श्री कृष्ण तो बीच में जो भास रहा है नर्क वो है कौन श्री कृष्ण अब ये जान जाओ तो नर्क नर्क ही नहीं है।

परम पद के अधिकारी हो गए। जब यही नहीं जान रहे तो वो दुख प्रद है। अगर जान गए तो वो सुख प्रद है। अगर जानकारी का भी विस्मरण हो गया सच्चिदानंद में स्थित तो आप ही वो हो। जानत तुम्हें तुम्ह हो जाए। तुम भी वही हो जो शिव जो कृष्ण जब तत्व में आओगे तो तुम भी वही हो। कोई किंचिन मात्र अंतर नहीं। वही एक परमात्म तत्व विविध रूप में खेल रहा चित चित लक्षणम सर्वम राधा कृष्णमयं जगत ईशावादम सर्वम यत किंच जगतम जगत और सच्ची मानो बिना भजन के समझ नहीं सकते रे हमारी भाषा समझ ले ये तर्क वितर्क से नहीं समझ सकते जब तक ब्रह्मचर्य नहीं रहोगे पवित्र आहार नहीं करोगे लाखों नाम जप नहीं करोगे तब तक वैसे समझ जाओगे ये कोई बातों का विषय है भजन नहीं करोगे परमात्म तत्व तुम्हारे तर्क वितर्क से समझ में आएगा।

इसलिए समझा देते हैं कि समझ लो तुम्हारा मंगल हो जाए और अगर ऐसे पक्ष विपक्ष की भावनाएं रखोगे तो तुम्हें संतों में दोष दर्शन हो जाएगा। पक्की बात समझ लो। इसलिए बहुत सावधान यहां से जो चर्चा होती है वो भगवत प्रसाद स्वरूप होती है। उसका पान करो तर्क छोड़ के। खूब नाम जप करो डट के बन जाओगे। खूब संतो की चरण धली माथे पे हां गणपति छंद स जला सूर्य बिना महत पाद रजो अभिषेकम रज लगाओ संतो की चरणामृत पियो संतो के वचनों का श्रद्धा विश्वासद पूर्वक बढ़िया मंगलमय ज्ञानी हो जाओगे आपको कोई संशय नहीं रहेगा पर लीला में बड़ा अंतर है जब विमान पर चढ़ा हुआ जो वृता सुर बने थे।

चित्रकेतु उनका नाम था। और जब भगवान शिव को वो ऐसे शब्द जो नहीं बोलने चाहिए बोल रहे थे तो अंबाजी गुस्सा हो गई तो भगवान शिव ने कहा था कि तुम्हारे क्रोध और श्राप का उसके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्यों? बोले श्री हरि का निज जन्म है। श्राप दे दिया जाए। दैत्य हो जाए। क्या फर्क पड़ा? अंतिम समय जो वृद्धासुर की स्थिति है वो देख लो जो भगवान शिव ने कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्यों वो भगवान श्री हरि का निज जन है भगवान का जन भगवान शिव कह भगवान शिव को भी गुस्सा नहीं आया अंबाजी को गुस्सा आ गया ऐसे जगतगुरु भगवान शिव से ऐसे नहीं बात करना चाहिए विमान से उतर कर साष्टांग दंडवत होना चाहिए त्रुटि है तो भगवान शिव ने कहा त्रुटि होते हुए भी श्री हरि का है इसलिए इसके ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और नहीं भला वृत्तासुर मिला तो ऐसा वृत्तासुर बना हाकार त्रिभुवन में मच गया।

होश उड़ गए देवताओं के। तब दधीच की हड्डियों से वज्र का निर्माण हुआ। जब देखा कि हाथ में ऋषि का जो अस्थि पंजर उसी से वज्र का निर्माण हुआ है। तो कहा देवराज ये मत सोचना मैं वज्र से डर रहा हूं। रुक जाओ। भगवान हरि से बात की। जैसे छोटा सा बछड़ा अपनी मां की जैसे घोंसले में बिला पंख उगे हुए बच्चा चिड़िया का अपनी मां का जैसे परदेश गए हुए पत्नी अपने पति का चिंतन हे नाथ ऐसे ही हमारी वृत्ति आप में लगी रहे और चलाओ ये अमोग है चिंता मत करो ये अमोग है मेरे ऊपर चलाओगे विध्वंस हो जाऊंगा क्योंकि मैं जानता हूं ये क्या स्थिति वृतसुर की अंतिम समय एकदम भगवदाकार वृत्ति जो बड़े बड़े बड़े ब्रह्म ऋषियों की होती है वही महा भागवत वृतास की इसलिए हरि सर्वत्र सब रूपों में व्याप्त है इसमें कोई संशय नहीं मत परम नत किंच धनंजय पर पुराणों में जो है जहां जिस पुराण की चर्चा वही सर्वोपरि है अगर देवी भागवत तो सर्वोपरि उसी से सबका प्रादुर्भाव शिव पुराण तो सर्वोपरि उसी से सबका प्रादुर्भाव गणेश तो उसी से सबका प्रादु आदि गणेश जिसकी पूजा ब्याह में माता पार्वती और भगवान शंकर भी करते हैं।

जिधर देखो उधर वही परम तत्व है। इसलिए कोई छोटा नहीं। पर जब लीला में आएगा तो एक स्वामी बनेगा, एक सेवक बनेगा। विविध प्रकार की लीलाएं होंगी। लीला में प्रश्न नहीं। तत्व में अगर प्रश्न उठाओ तो एक ही तत्व है। उसमें कोई अंतर नहीं। पर जब लीला होती है जैसे अब शिष्य की लीला, गुरु की लीला, अपराधी की लीला, जीवन मुक्ति की लीला लेकिन तत्व एक ही है। तत्व में अंतर नहीं है। अब तत्व का भाव अंदर जब जागृत हो जाएगा तो जानत तुम्हें तुम्हें हो जाए। वो वही बन जाएगा। उसमें कोई अंतर नहीं।

पर लीला में अंतर जीवन भर बना रहेगा। तत्व बोध होने के बाद ऐसा थोड़ी कि गुरु के समान जाकर आसन में बैठ जाए। चाहे जितना बड़ा तत्व ज्ञानी हो जब गुरु बैठे होंगे तो सर झुका के उनके चरणों में बैठेगा। तत्व बोध हो चुका है। जानत तुम्हें तुम्हें हो जाए। वो भगवान स्वरूप हो चुका है लेकिन गुरु है इसलिए नीचे बैठेगा। इसलिए कभी कोई भगवत चरित्रों पर संशय ना करें। कोई छोटा बड़ा नहीं है। पर जब खेल खेलने में उतरते हैं तो वही तत्व छोटा बनता है। वही बड़ा बनता है। वही स्वामी बनता है।

वही सेवक बनता है। विविध प्रकार से वो जगन् नाटक वैभवा अपने जगत में नाटक का स्वरूप करके वो वैभव प्रकाशित कर रहा है। ये खेल जान जाओ। या रहस्य रघुनाथ कर वेग न जाने कोई जो जाने रघुपति कृपा तो सपने मोह ना होए। यह जो अज्ञान की बातें करते हैं इनके अंदर भजन नहीं इसलिए जान नहीं पाते। प्रवचन धंधा नहीं प्रवचन है ये जो तुम्हारे हर दुर्गुण दुराचार का नाश करके तुम्हें सतार्ग में स्थापित कर देगा। ये वो नहीं ये कोई धंधा नहीं ये केवल केवल भगवत प्राप्ति के लिए और यहां जितनी चर्चा होती है वो सब उसी एक तत्व की होती है और उसी एक तत्व में कोई स्वामी है, कोई सेवक है, कोई महान है, कोई छोटा है।

बस तत्व में अंतर नहीं। आपने लाखों बार सत्संग में सुना होगा कि तत्व एक ही है। इसमें कभी संशय नहीं है। हां जब उसकी लीला चलती तो लीला में भेद है और लीला रसास्वादन में भेद है और रस की भाव गरिमा में भेद है। जैसे कोई सखा है तो कोई दास है कोई गोपी है तो कोई सहचरी है और अलग-अलग भावों से उसी परमात्म तत्व का रस आस्वादन हो रहा है। अंतर की इसलिए सब संशय छोड़कर एकमात्र भगवत आश्रित जहां तुम जो हो गणेश उपासक के लिए सर्वोपरि गणेश सब उनके नीचे देवी उपासक के लिए सर्वोपरि देवी सब उनके नीचे शंकर उपासक के लिए शंकर जी सर्वश्रेष्ठ उनके सब कृष्ण उपासक के लिए कृष्ण सर्वश्रेष्ठ राम उपासक के लिए हमें कोई संशय नहीं क्योंकि वही तत्व बैठा हुआ है।

पर जब लीला में देखो तो हनुमान जी बन के शंकर जी ही चरण पकड़े राम जी के और राम जी सेवक बनकर के रामेश्वर की स्थापना करते लीला में तुम कहां काट सकते हो लीला में तर्क वितर्क नहीं एक ही तत्व है उसमें कोई अंतर नहीं इसलिए बहुत सावधानी पूर्वक संतों के वचनों को सुना जाए और अपने चित्त में धारण करके भगवनंद की प्राप्ति की जाए जिसके लिए हमको अवसर मिला है। कहीं हम इधरउधर दोष दर्शन करके अपने परमार्थ से भ्रष्ट ना हो जाए। इसे ध्यान से सुन लो। जो जिनकी उपासना कर रहा है उसके लिए वो सर्वोपरि है।

सर्वोपरि इसलिए कि वही सर्वोपरि तत्व है। दूसरा कोई नहीं है। पर जो जहां उपासना कर रहा है उसके लिए ये गर्व होना चाहिए कि हमारे उपास्य देव सर्वोपरि है। तर्क की जरूरत नहीं मान्यता की जरूरत है। आप सर्वोपरि मानेंगे तभी तो आपका मन आराध्य देव में पूर्ण समर्पित होगा। और जब आप अनुभव करेंगे तो सब रूपों में मेरा ही आराध्य देव है। ऐसा आपको अनुभव होगा। और यही अनुभव होना परम सत्य अनुभव होना है। इसलिए खूब नाम जप करो। अच्छे आचरण करो। तर्क वितर्क मत करो। लीला अलग क्षेत्र है।

तत्व ज्ञान अलग क्षेत्र है। तत्व का बोध होना और लीला में प्रवेश होना दोनों में बहुत अंतर है। जब लीला की बात आएगी तो तत्व अंतर् ध्यान हो जाता है। नहीं तो कैसे ध्यान? मेरे प्रभु इस समय मेरे प्रभु को शयन कराना है। मेरे प्रभु को भोग लगाना है। इस समय मेरे प्रभु को मंगल आरती इस समय मेरे प्रभु को जल पिलाना है। इस समय मेरे प्रभु को इत्र लगाना है। ये हम तत्व से थोड़ी देख रहे हैं। हम भाव से देख रहे हैं। भावोत्सवेन भजता रस कामधेनु और जब हम भाव से देखते हैं तब हमको ये दिखाई देता है कि हमारी श्री जी के समान केवल श्री जी है।

दूसरा कोई नहीं है। क्योंकि दूसरा कोई है ही नहीं। मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो ना कोई। यह हमको देखना मीरा जी से लड़ना थोड़ी है। कहेंगे करो पूजा भाई हम परेशान कब कर रहे हैं? हम तो कह रहे मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई उनकी नंद कह रही थी। ये हमारी कुलदेवी पूजा बोले करो ना। बोले नहीं तुमको करना पड़ेगा। बोले हम तो नहीं करेंगे। हमारी तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। उन्होंने कहा नहीं करना चाहिए। बोले क्यों करना चाहिए? बोले सुहागवती होती तो विधवा थी।

बोले तुमने कुल पूजन नहीं किया क्या? तुम क्यों वैधव्य को प्राप्त हो? बस यही जगह से शुरू हो गया था। उसका द्वेष भाव बहुत प्रचंड द्वेष तो सच्ची मान लो। हमारी प्रार्थना मान लो। झगड़ा झंझट की भावनाओं का त्याग करके एक ही परम तत्व है। जब लीला में उतरता है तो आप पढ़ के देख लो। भागवत में भरत जी जो जड़ भरत जी के रूप में है देवी उपासक उनको ले गए और बलि देना चाहते थे तो जे ही सर झुकाया तो अंबा जी के हृदय में आग लग गई ऐसे परम निर्मल पुत्र का वध मा सह शक्ति फाड़ करके मूर्ति प्रकट हो गई काट के फेंक दी भागवत में पढ़ के देख लो भाई वही परम तत्व है जो श्री कृष्ण है वही काली है जो काली है वही श्री कृष्ण है मुझे समझने में इतना भी भेद नहीं लीला में बड़ा भेद है।

लीला में जब आते हैं तो अलग-अलग रसास्वादन हो जाता है। तो लीला रसास्वादन पाने के लिए चरणों में जाकर के अपने अपने गुरुजनों की आराधना करो। खूब नाम जप करो। जब लीला चरित्र का प्रकाश होगा तब आप जान पाओगे। और श्री किशोरी किशोर जो का अद्भुत विलास जो भगवान ब्रह्मा सनकाद शिवादि जिसका जस गाते हैं और याचना करते हैं जो रज शिव सनकादिक की याचत अब कैसे रसमय ग्रंथों में प्रवेश नहीं तो बाहरी लोग नहीं समझते पर हम अपने सत्संगी जनों से कहते हैं अपनी उपासना में अपने आराध्य देव के समान कोई नहीं है ये सबको मानना चाहिए जब तक मानोगे नहीं निंदा किसी की नहीं कर ली पर अपने उपास्य देव अपने लिए सर्वोपरि है उनके समान कोई नहीं जब ऐसा मानोगे तभी आप प्रेम रस को प्राप्त होगे शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की जय जय।

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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