॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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ये चमत्कार केवल दृढ़ आश्रय से ही संभव है / ये 6 दोष आपके भगवद् प्राप्ति में बाधक हैं // 14/07/2025

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदा वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरताप मुगम निर्वापयत परम शीतल माशयाम परम शीतल माशयाम जयति नवगरी रूप गुण आगरी सर्व सुख सागरी कुंवरी राधा कुंवरी राधा जयति नवनागरी रूप गुण आगरी सर्व सुख सागरी कुंवरी राधा जयति हरि भामिनी श्याम घन दामिनी केल कलकामिनी छवि अगाधा कुंवरी राधा जय जय अति मनमोहनी करो दृग बोहनी दरस दे शोहनी हरो बाधा कुंवर राधा जयत रस मुररी सुरभ सुर भूरी भगवत रसिक जन प्राण साधा कुंवर राधा जयति नवनाथ री रूप गुणयारी सर्व सुख सागरी कुंवरी राधा जय हो हे नवनागरी हे किशोरी आपकी जय हो आप रूप और गुणों की निधि हैं।

आप सब सुख प्रदान करने वाली हैं। सुख सागर हैं। आपकी जय हो। हे अपार सौंदर्य शालिनी प्रिया जो हे उज्जवल प्रेम की विलास की भावनाओं से भरी हुई मेरी स्वामिनी जो प्रीतम मेघ के तुल्य श्री अंग वाले उनसे आप संश्लेषष्ट अर्थात बिल्कुल एकमेक होकर विराजमान दामिनी की तरह दमक रहे हो। हे कुंज बिहारी की प्राण जीवन धन हे प्राण वल्लभा श्री श्यामा आपकी जय हो जय हो लाडली जो आप परम शोभामय हैं। श्री बिहारी जी महाराज का मन सदैव आपकी श्री अंग शोभा को देखकर प्रेम उन्मत रहता है।

आनंद समुद्र प्रभु को भी आनंद प्रदान करने वाली हो। हे प्रियाजु आपकी जय हो। आप अपने दर्शनों की अब बोहनी करा दो। बहुत दिन व्यतीत हो गए जीवन की दुकान खोले हुए। अब आप अपने दर्शन की बोहनी करा दो। अर्थात हमारे जीवन व्यापार की पूर्णता इसी में है कि एक बार आप हमारे नेत्रों में अपने रूप का प्रीतम के साथ प्रकाश कर दें। आप पधारे करो दर्ग बोहिनी मेरे नेत्रों की बोहनी करा दो। दरस दे सोहनी अगर एक बार हमें दर्शन मिल गया तो फिर यह संसार का दर्शन हमें आकर्षित नहीं कर पाएगा।

हरो बाधा समस्त बाधाओं की हरण करने वाली हे राधा किशोरी आप कृपा करो जयति रस मूर री आप रस की मूल हैं। क्योंकि रस समुद्र प्रभु के हृदय में अद्भुत रस प्रकाशित करने वाली रस समुद्र प्रभु सबको रस का दान करते हैं और वह आपसे मांगते हैं मांगत लाल लाडलो नागर प्रगट भई दिन की चोरी दान देरी नवल किशोरी अद्भुत रस दाता हे श्यामा जी आप आनंद की मूल है। आपका जो स्वरूप है बड़ा ही मनोहर है। अनिर्वचनी वाणी के द्वारा कहा नहीं जा सकता। ऐसा रूप है। हे प्यारी जो दिव्य सौरभ आपकी श्री अंग की ऐसी है कि लाल जो की घण इंद्री में जाकर उनको उन्मत्त कर देती है।

हे रसिक जनों की प्राण जीवन धन स्वामिनी आपकी जय हो जय हो मेरी महारानी श्री राधा रानी श्री राधा रानी श्री राधा रानी मेरी महारानी श्री राधा रानी मेरी प्राणाधीश्वरी सर्वस्व आराध्य देव वृंदावनाधीश्वरी मेरी स्वामिनी है राधा रानी मैं बिका हुआ उनका दास हूं और वह हमारी स्वामिनी है। मेरी महारानी है। कौन? बोले श्री राधा रानी। यह बहुत दुर्लभ प्रेम रस है। बहुत दुर्लभ प्रेम रस। प्राय कर्म धर्मों में फंसे रहते। फिर कोई उनसे निकल कर के भागवत धर्म में फिर कोई भक्ति में भक्ति में नव लक्षणा भक्ति कोई पूर्ण भक्ति फिर उसमें प्रेम भक्ति प्रेम में भी भगवान की विविध अवतारों की भक्ति उसमें भी मथुरा द्वारिका ब्रज पर ये नवनिवत्त निकुंज की महा प्रेम महाधुर्यमई ये बिकने पे आती है बस बस हृदय सम हम कैसे हैं हमको कुछ मतलब नहीं हम किनके हैं बस इस बात पर ध्यान देते हैं हम कैसे हैं अगर यह ध्यान देंगे तो हम एक कदम नहीं चल पाएंगे हम कैसे हैं यह ध्यान दें तो कभी हम श्री जी को प्राप्त नहीं कर पाएंगे हम किनके हैं जब यह ध्यान देते तो दौड़ लगा देते हम श्री जी के हैं।

श्री जी ने हमें स्वीकार किया है। हम उनके लायक नहीं पर उन्होंने पसंद कर लिया। उनकी पसंद तो दौड़ पड़े श्री जी की तरफ। मेरी महारानी यह बहुत अंदर की बात है। अंदर यह बैठ जाए बाहर से कूड़ा बन जाओ। अंदर से रत्न जागृत हो जाएगा। कूड़ा बन जाओ। किसी के लायक ना रह जाए। कोई अपना ना कहे। जब तक किसी के काम लायक होते हैं तब तक हमें लगता है हमको कोई प्रेम करता है। हमारा कोई है। तब तक यह ठसक अंदर पूर्ण रूप से नहीं आती। मेरी महारानी श्री राधा रानी प्रेम अद्भुत प्रेम उज्जवल प्रेम इसी ठसक से आता है मेरी महारानी परम पद इसी ठसक से मिलता है बहुत दुर्लभ बातें हैं जो हम कहा करते हैं हमारे माई श्यामा को राज बहुत बड़ा इसमें रहस्य छुपा हुआ है बस हृदय में आ जाए कि मेरे तो श्यामा श्याम दूसरो न कोई हृदय में आ जाए मेरी महारानी मैं बिका हुआ हूं जैसे रूप लाल हित हाथ बिकानी तो निधि पाई मनमानी हमें किसी से तात्पर्य नहीं ना नर्क से ना स्वर्ग से कल एक बड़े अच्छे संत भगवान हैं वो कह रहे थे कि हम ब्रज में कैसे दोबारा जन्म ले ऐसा साधन बताए कि हम ब्रज में जन्म लेना चाहते हैं।

उनका जन्म ही क्यों लेना चाहते हैं? सीधे बृजराज की लीला में क्यों नहीं प्रवेश हो जाना चाहते? हम क्यों जन्म लेंगे? पता नहीं हमारा जन्म लेने के बाद स्थिति क्या हो। देखो ना। ब्रज में जन्म लेकर क्या बृजराज का ही भजन कर रहे हैं। ब्रज में जन्म लेकर क्या बृजराज की ही ठसक में हैं। ब्रज में जन्म लेकर क्या ब्रजराज के विरह में है? जैसे ब्रज गोपी जनरम राजन कृष्ण दर्शन लालसा नहीं तो हमें ऐसा जन्म भले मिले या ना मिले अगर जन्म ही देना है तो चाहे नारकी योनियों में जन्म देना पर आपका विरह हो आपका प्रेम हो आपका चिंतन हो ये खास बात है जन्म होना ना होना इसका कोई मतलब इसका कोई मतलब नहीं यत्र यत्र मम जन्म कर्मवीर नारके परमे पदे थवा नरक भेजो परम पद भेजो आपकी मौज मालिक हम तो बिके हुए आपके हैं तो आपको क्या चाहिए हमें चाहिए राधिका रति निकुंज मंडली तत्र तत्र हृद में विराजताम जहांजहां भेजोगे वहां वहां आपको परिकर सहित हमारे हृदय में रहना होगा हृदय में स्फुरित रहना होगा बस जहां मन आवे वहां भेजो जो मन आवे सो बनाओ हमें प्रभु प्रभु से तन्मयता चाहिए।

हम अगला जन्म लेकर फिर साधना करेंगे। ऐसा कोई विश्वास नहीं है। कलिकाल है। प्रतिदिन मलिनता बढ़ती जा रही है। अगले जन्म में पता नहीं कैसी स्थिति हो। यहां भजन का भाव हमारा किस कोटि का बने। हमें ऐसा संग मिले कि ना मिले। इसलिए हम इस जन्म में चूक नहीं करेंगे। हम तो इस जन्म में सीधे आपसे मिलना चाहते हैं। आपसे आप मिलकर फिर हमारे साथ हो। जहां चलो चलो यत्र यत्र मम जन्म कर्म भी नारके परमे पदेवा नरक परम पद जहां चाहो चलो आप चलो साथ हमारे आपके बिना अब हमारा नहीं कोई मेरी महारानी श्री राधा रानी भगवत ऋषिक जी महाराज कह रहे हैं जा के बल में सब सोरी लोक वेद कुलकानी मेरी महारानी श्री राधा रानी लोक रीति का त्याग कर पाना बहुत कठिन है।

फिर उससे भी कठिन है। कुल रीति का, वेद रीति का इनहीं में प्राय शास्त्रों में वर्णन किया गया है। जैसे बैल को छोटी रस्सी नाथ से बांधकर बड़ी रस्सी से इशारे से चलाया जाता है। ऐसे ही एक वेद भगवान का शासन है। संपूर्ण जीवों को अपने अधीन किए हुए चलाते हैं। लेकिन प्रेम भगवान को अधीन कर लेता है। इसलिए वेदातीत है। प्रेम उसी के हृदय में स्पित होता है जो केवल आराध्य देव की चिंतन वृत्ति में उन्मत्त रहता है। तदतालाचारिता त स्मरण परम व्याकुल ते उसके हृदय में प्रेम जहां प्रेम आया वेद प्रसन्न वो वेद का भी त्याग कर देता है कुल रीति लोक रीति की तो बात जाने दो वेद रीति का ऐसी प्रेम उन्मत्तता न लाजती न लोकन की न वेद को कहो करे न शंख भूत प्रेत की न देव जच्छते डरे सुने न कान और की दृश्य और इच्छना आठों पहर इष्टाकार वृत्ति इस बल से लोक कुल वेद इन सब रीतियों का त्याग करके प्रीति रीति को स्वीकार किया जाता है।

प्रीति रीति कुल रीति लोक रीति वेद रीति इन सब का फल है कि हरि के चरणों में प्रीति हो जाए। प्रीति नहीं हुई तो सो सब धर्म कर्म जऊ ज राम पद पंकज भाऊ किस काम के आए धर्म कर्म रीतियां प्रीति रीति हृदय में आ जाए भगवत ऋषिक जी कहते हमने तो महारानी जी के बल से सब छोड़ दिया कुल रीति लोक रीति वेद रीति अब तो महारानी जी राधा राधा अब तो आप ही आप चाहो जैसा करो राधा राधा अपना जीवन बेच दिया आपको आपके चरणों सेवा के लिए आपकी प्रीति के लिए अपने आप को बेच दिया आपको अब जैसा चाहो पूर्ण स्वतंत्र हो है कौन ये राधा रानी बोले लाल बिहारी को प्राण जीवन धन वारी पियत नित पानी मेरी महारानी श्री राम धानी संपूर्ण अनंत ब्रह्मांडों के प्राण जीवन धन श्री बिहारी जो महाराज हैं।

इनहीं से सब कला अवतारम सावतार विविध प्रकार के अवतार होते हैं। सब अवतारों के मूल वृंदावन विहारण नमः जो वृंदावन में विहार करते सब इनको नमस्कार करते हैं। और यह सबके प्राण जीवन धन है। जिसमें भी प्राण शक्ति, मन शक्ति, इंद्रिय शक्ति जो जहां कुछ भी दिखाई दे रहा है वह सब इन्हीं के बल से बलवान है। यही सबके जीवन धन है। सबके प्राण है। इन्हीं से सबका महत्व है। लेकिन इनका प्राण जीवन धन कौन है? यह वृंदावन रजोसेवी रसिकों ने देखा लाल बिहारी को प्राण जीवन धन प्राण जीवन धन कौन है?

बोले श्री राधा श्री श्यामा जी ये वारी पियत नित पानी पानी वार करके पान करते हैं संजीवनी मूर है हमारी लाडली जो लालजू की जय हरिवंश मदन सर जजर विथित श्याम सजीवन मूली दिव्य प्रमोद रससार निजांग संग पीयूष बीच निच रवि सेती कंदप कोटि सर मूर्छित नंद सोनु संजीवनी जयति काप निकुंज देवी आहो भाग्य जिनके हृदय में श्यामा जी के चरणारविंद की शरण की भावना आ गई बहुत बड़ी बात है लाल बिहारी जी को प्राण जीवन धन है हमारी किशोरी जो जिनके ऊपर जल वार करके स्वयं बिहारी जो पान करते हैं ऐसी मेरी महाराज रानी श्री राधा रानी और जो श्री श्यामा जी के चरणों का आश्रय ले लेता है भगवत रसिक सहायक शबिन शबदिन शब्द से क्यों कहा इसका आंतरिक रहस्य आज हमारी भावना ठीक है आज हमारे मन इंद्रियां ठीक है अभी एक घंटे में खराब हो सकते हैं।

हो सकता है कल हमारी भावना बिगड़ जाए तो श्री जी की भावना नहीं बिगड़ेगी। नेक न रिस कहूं भूलीहु न होत सखी रहत प्रसन्न सदा ही मुख हास है ऐसी सुकुमारी प्यारे लाल जू की प्राण प्यारी धन्य धन्य धन्य ते जिनके उपास है श्री जी कभी गुस्सा नहीं कभी उनको रि नहीं आता। हमारा भाव बिगड़ सकता है। हम जीव हैं। माया असक्त है। लेकिन उस समय भी हमारी सहायता हमारी स्वामिनी जो करती है। जब हम बिल्कुल स्वामिनी जी से विमुख होते हैं। विमुख ही थे। सन्मुख तो उन्होंने किया है। पकड़ के घसीटा तो उन्होंने हमें नहीं तो मोह प्रपंच माया दलदल में ऐसे फंसे थे कि राधा नाम वृंदावन धाम प्रिया प्रीतम ये सब स्वप्न में भी कभी नहीं।

जागृत की तो बात जाने दो। स्वप्न में भी इतनी हिम्मत नहीं कि एक बार राधा बोल देते जीवन में। ये तो अहतु की कृपा है। हमारी स्वामिनी भगवत रसिक सहायक सब दिन सब दिन शब्द का भाव सहायक तो है ही लेकिन सब दिन का भाव है कि आज हमारा भाव बन रहा है। कल बिगड़ सकता है। हम जीव हैं। माया ग्रसित है। आज हम ठीक है। कल गलत हो सकते हैं। लेकिन उस समय भी प्रियाजु नहीं छोड़ती। उस समय भी वो सहायता करती वचन की शरणागति को इसने कहा है कि श्यामा का राज हम श्यामा के इस बात का निर्वाह करती है।

वचन शरणागति का निर्वाह करती है। फिर हृदय से जो शरणागत है कहना ही क्या है? सहायक शब्द और परिणाम सर्वो सुख दानी सर्वोपरि वैसे भी जगत में देखा गया है अगर ज्यादा अपराध बन जाए तो पिता नाराज होकर कहता है मैं देखना भी नहीं चाहता ऐसे पुत्र को हटाओ मेरे सामने से वैसी स्थिति में भी मां में जो वात्सल्य है उसका चमत्कार वो एकांत ले जाती है खवाती पिलाती है कुछ पैसे देती जा दो चार दिन के लिए कहीं घूम आ फिर चला आना हम बताएंगे तुम्हें कैसे इनको हम रिझा लेंगे वात्सल्य का एक अंश त्रिभुवन के अनंत माताओं में उस वात्सल्य के समुद्र लाल जो

उस वात्सल्य समुद्र का सार श्री लाडली जो दासी वत्सला कर ही राधा इसलिए मेरी महारानी श्री राधा रानी सहायक सब दिन और सर्वोपरि सुखदानी जो किसी साधना से महा प्रेम की प्राप्ति नहीं होती यह गुण साधन ते नहीं हुई ये तो भागवतिक धर्म प्रेम की बात कह रहे लेकिन महा प्रेम ये केवल लाडली जो की कृपा कटाक्ष से होता है सर्वोपरि सुखदानी बढ़ो आनंद मोद सबके के महा प्रेम सुरंग रंगी यह महा प्रेम प्यारी रूप प्रदान करती है पर यह एक बार हृदय में आपको धारण करना पड़ेगा कि मेरी

महारानी श्री राधा रानी हृदय में किसी अन्य का आश्रय नहीं होगा मैं नीच हूं अधम हूं चलेगा पर अन्य आश्रय नहीं चलेगा जैसे हूं अपनी स्वामिनी झुका हूं किसी और के द्वार नहीं पड़ा हूं किसी और का नहीं हूं। जैसा हूं अपनी स्वामिनी जू का हो। अपनी महारानी जू का हूं। राधा राधा राधा पक्का काम बन गया। पक्का वो बात बनेगी जो किसी साधना से नहीं बनती। ये गुरुजनों के प्रताप से आचार्य चरण के प्रताप से अपने स्वामिनी जी का स्वभाव जैसा जैसा अनुभव में वो दे रही वैसा हम देख के कह रहे हैं बहुत करुणा समुद्र है नेक हो नरिश इस बात पर सदैव ध्यान रखना और लाडली जो की ठसक का मतलब है लाल जू को अधीन किए रहना सारी साधनाएं हरि की प्रसन्नता के लिए है।

हरि प्रसन्न हो जाए सब काम बन गया। अगर हरि प्रसन्न ना हुए तो हमारा सब व्यर्थ गई साधना उपासना जे विधि प्रभु प्रसन्न मन होई हमारा साधन हमारा आराधन हमारे आचरण जे विधि प्रभु प्रसन्न मन होई मेरे प्रभु प्रसन्न हो जाए हरि जो प्रसन्न हो जाए मात्र लाडली जो के चरणों का आश्रय लेने मात्र से प्रसन्न नहीं हरि अधीन हो जाते यत किरी शुभस जिनकी दासियों की बहुत चाटुकारिता करते हैं, विनय करते हैं। भगवान यह वो पद है राधा दासी पद केवल श्री जी के चरणों का आश्रय लेने मात्र से हरि प्रसन्न नहीं अधीन हो जाते हैं।

अधीन हो जाते हैं। ये वृंदावन असीम कृपालु जो यह महारस का परिचय प्रदान किया। श्री स्वामिनी जी के नाम और उनके चरणों का आश्रय प्रदान किया। बलिहारी है कोटि-कि वृंदावन वृंदावन के रसिक जनों की रजरानी की जो ऐसी अद्भुत बात की बात बात हृदय में प्रकाशित की श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी महाराज कह रहे हैं याम याम रूपवती नवीन तरुणीम लावण्य लीला कला मुनि मोहिनी मनुरता भाव व्यंजिनी ताम ताम विक्ष सा करोति परमाम दिव्यापीमान श्री राधा पद किं पदख प्रांतोत्मनी जिसके हृदय में यह गर्व आ गया हम श्यामा जी के बल अभिमानी श्यामा श्याम श्यामा श्याम मैं श्री जी की प्रिय सखी हूं मैं प्रिय प्रियाजु की दासी हूं मैं

प्राण प्रिय स्वामिनी जी की शक्ति संधिनी शक्ति हूं अरे छोटी मोटी बात नहीं राधा चरणारविंद की शरणागति कह रहे हैं याम याम रूपवती नवीन तरुण लावण्य लीला कला मुनि मोहिनी मनताम भावोत्सव व्यंजनी श्रीपाद कह रहे जितनी जितनी त्रिभुवन में सब नवीन तरुणी रूपवती हैं जो बड़े-बड़े अपने लीला लावण्य से मुनियों के मन को मोहित कर ले वो श्री किशोरी जी के चरणों की शरण आश्रय लेने वाले को जो भाव देह प्राप्त होता है सखी स्वरूप वो ऐसा स्वरूप है भाव देह का उसका जब प्रकाश होता है ऐसा दिव्य होता है कि त्रिभुवन की जितनी भी सुंदरिया है इसमें जो शब्द लिखा ताम ताम भीक्षसा थत करोति परमाम दिव्या हे हो जाती है त्रिभुवन की जितनी सुंदरिया सब हे हो जाती है ऐसा स्वरूप है आप कहोगे कि लिखने में क्या होता है?

लिख दिया किसी ने ऐसे। ये किसी में नहीं है। यह वो सिद्ध महापुरुष जो देख रहे हैं। आपको एक उदाहरण बताते हैं। एक दिन द्वारिकाधीश प्रभु अश्व प्रवाह करते हुए विकल स्थिति में राधा राधा राधा रुक्मणी जी महालक्ष्मी जी का अवतार है। हर समय जैसे पलक पुत्री की ऐसे वह प्रभु को प्यार करती हैं। एक क्षण के लिए भी अलग नहीं रहती। प्रगट में अगर देह स्वरूप से अलग है तो छाती में श्री श्री वांछ चिन्ह के रूप में विराजमान है। लक्ष्मी जी कभी एक क्षण के लिए प्रिया है। उन्होंने देखा तो उनका प्रभु आप स्वतंत्र हो।

मेरा कोई आप पर शासन नहीं है। पर आपको रोते देखकर मेरा हृदय विकल हो जाता है। मैं क्या करूं? कैसे आपको रिझाऊं कि आपकी यह विरह वृत्ति मुझे सही नहीं जाती। तो उनका ऐसा है ही। श्री लाडली जी का रूप ही ऐसा है। उनका स्वभाव ऐसा है। तो उनका प्रभु दिव्य शक्तियां सब अवतरित हुई आपकी सेवा के लिए 16100 और हम आठ महाशक्तियां हैं। कोई साधारण नहीं जैसे जामवती जी हैं। ये त्रिपुर सुंदरी भगवती अंबा का स्वरूप है। भूमि का अवतार, सत्यभामा जी, मां लक्ष्मी का अवतार, रुक्मणी ऐसे सब हम आठ महाशक्तियां हैं और 16100 दिव्य शक्तियां आपकी सेवा में उपस्थित इसलिए 16108 ये कोई नारियां नहीं है।

कोई साधारण स्त्रियां नहीं है। ये भगवान की अनंत शक्तियों में से ये दिव्य महत शक्तियां जो भगवान की सेवा में है। क्या प्रभु इनमें से कोई ऐसा नहीं है जो राधा विरह की पूर्ति कर सके? भगवान ने कहा कोई ऐसा नहीं। प्रभु मैं एक बार देखना चाहती हूं कैसी है श्री राधा कि हम सब सर्वांग सुंदरी दिव्य शक्तियां आपके विरह का समन नहीं कर सकती। प्रभु मैं एक बार दर्शन पाना चाहती हूं। कहा कि कभी ऐसा श्री जी चाहे दर्शन देना चाहे संयोग बनावे तो हो सकता है हम तो केवल कह सकते हैं कभी ऐसा अवसर आया तो दर्शन कराएंगे ब्रज लीला के अंतर्गत निकुंज लीला में तो वृंदावन परितज पाद एकम न गच्छतिते प्रिया प्रीतम एक कदम भी वृंदावन से बाहर नहीं जाते लेकिन ब्रज लीला में ऐसा आया कि सूर्य ग्रहण पड़ा उस समय कुरुक्षेत्र ऐसा सब ब्रजवासी परिकर वहां गए बाबा वृषभानु जी भी लाडली जी भी अपने पर ये ब्रज लीला के अंतर्गत की बात उधर से द्वारिका परिकर और हस्तिनापुर से पांडव परिक द्रोपदी आदि सब जब रुक्मणी जी ने सुना कि वृषभानु बाबा और राधा किशोरी जो पधारी हैं तो बड़ा उल्लास होगा प्रभु एक बार देखने की इच्छा थी जिन राधा का स्मरण करके आप रोते हैं वो है कैसी उनका पहले हम दर्शन करके आते हैं फिर आपको गए प्रभु लाडली जो से मिले वो विविध विस्तार पूर्वक प्रसंग है।

फिर प्रभु आए और कहा जा सकते हो आप रुक्मणी जी सत्यभामा जी आदि ये चलिए प्रथम द्वार पर गई तब लक्ष्मी कोटि विलक्ष लक्षण लस लीला किशोरी सत राध्य ब्रज मंडले मधुरम राधाम परम श्री जी की दासी जो करोड़ लक्ष्मियों को मूर्छित कर दे याम याम रूपवती नवीन तरुणीम लावण्य लीला कला माधुर्य मुनि मोहिनी मनोरताम भावत्सव व्यंजनी बड़े बड़े मुनियों को मोहित कर ले ऐसी सुंदरिया त्रिभुवन में है वो ताम ताम विक्ष थुत करोति जिनकी सुंदरता के आगे थुत करोति वो अक्षरशा सत्य जी ही देखा प्रधान द्वार पर ये राधा किशोरी है सब महालक्ष्मी स्वरूपा श्री रुक्मणी जी सत्यभामा जी सब उनका स्वामिनी जो अंदर है उनको लगा ये दासी है उनकी उनकी दासी इतनी सुंदरी लक्ष्मी कोटि विलक्ष लक्षण लसल लीला कि कैसे कोई वर्णन करे स्वामिनी जी के प्रतिबिंब स्वरूप सदासी अंदर गई तो ठसक में खड़ी है।

उन्होंने समझाया ये तो राधा किशोरी ही है। प्रणाम मुद्राम उनका स्वामिनी जी अंदर सात देड़ी में ऐसे उनको आश्चर्य हुआ जब अंदर गई तो ऐसा तेजोम पीता अनंत त लताभम कि ये दिव्य शक्तियां देख ही नहीं पाई श्री जी को क्योंकि ये अंश है श्री किशोरी जो और ये अंश है जब तक अंशी ना चाहे तब तक अंश उनको देख नहीं सकता जैसे हम अंश है हमारे अंशी श्री हरि है सर्वत्र परम हम नहीं देख पा रहे और वो कृपा करें हम आराधना करें हम पर कृपा करें तो कण कण में वही विराजमान है कोई अंतर नहीं पड़ेगा श्री ललिता विशाखा आदि सहचर्यों ने स्वामिनी जी का चरणामृत उतार कर छिड़का क्यों चरणामृत में क्या है सत प्रेम सिंधु मकरंद रसोग धारा बिना प्रेम दृष्टि के लाडली जी को ये दिव्य शक्तियां नहीं देख सकती तो श्री जी के श्री चरणों से प्रेम स्रवित होता रहता है।

सत प्रेम सिंधु मकरंद रसौ गधारा उस प्रेम को जे ही तो दृष्टि वो सब रोने लगे सबके अस्रु चल रहे फिर जब लौट के आई तो यही कहा कि प्रीतम आप कैसे जीते कितने कठोर हृदय के हैं कि आप जीते हैं कि सूरी जी से विलग होकर जीते क्योंकि अवतार लीला का विषय ऐसे प्रभु ने कहा उत्तर मिल गया ना आप कहती थी कि आप क्यों रोते हैं? जैसे उद्धव जी मैं जाऊंगा ज्ञान समझाऊंगा। जब यहां आए तब सोच रहे हैं यहां से जाते हो कि कितने वज्र हृदय के हैं कि वो इन प्रेमी जनों से विलग होकर जी रहे हैं।

ऐसे प्रेम समुद्र का वितरण करने वाली स्वामिनी जी के चरण दासियों का वैभव है। श्री राधा पद किंकरी पद नख प्रांतो यसत्मन श्री किशोरी जी की चरण दासियों की नख कांत प्रकाशित हो जाए तो महानंद प्रकट हो जाए। वृंदाण्याधीश्वरी पाद पद्म ज्योति सिंधुरा वते व्यक्तम लीला रूप का तदासी नाम वृंदीक्ष दिव्यम श्री वृंदावनाधीश्वरी श्री किशोरी जी के चरण कमलों का आश्रय जिसने लिया तो प्रेम ज्योति उसके हृदय में प्रकाशित ही हो जाए। कल्याण तो राधा बोल दिए ना तुम चिंता मत करो।

पक्का समझो। जैसे गरीब किसान को हीरा मिले तो वो कांच ही समझता है कि कहां मेरे भाग्य हीरा मिल सकता है। ऐसे ही राधा नाम आप सुनते हो ना तो आपको ऐसे लगता है कि अरे ये वो बात है। एक बार राधा नाम कान में पड़ गया। एक बार जबान से ले लिया तो एक नाम त्रैलोक तारे त्रिभुवन में कहीं भी हो राधा नाम सुनने वाला राधा नाम जापक परिणाम बताने नहीं आओगे कि हमारा क्या परिणाम हुआ पर जो सिद्ध महापुरुष बता रहे हैं उनके और अपनी छाती की बात के अनुसार कल्याण तो यहां बहुत छोटी सी बात है।

यहां सोहनी की अग्रभाग की टक्कर से मुक्तियों को ऐसे झाड़ दिया जाता है। यह कोई प्रवचन नहीं है। यह प्यारी जो प्यारे जो के महल की ठसक की बात सुन रहे हो वृंदाण्याधीश्वरी पाद पद्म ज्योति सिंधु राक वृत्त एक वृत्त केवल यह जागृत हो जाए तुम्हारे हृदय में अत्यंत सौभाग्य से कि हमारी लाडली जो हमारी प्यारी जो हमारी महारानी जो वह इतना महान पावन हो जाएगा कि त्रिभुवन को दर्शन देकर कृतार्थ करने की सामर्थ उसमें आ जाएगी। एक वृत्त केवल यह आ जाए कि श्री लाडली जो हमारी सी प्यारी जो हमारी ये बहुत बड़ी बात है।

ये लाल जो सर्वे सर्वा है लेकिन लालजू के भी सर्वे सर्वा सर्वेश्वरी राेश्वरी है। ये अंतर की बात समझो। जहां थोड़ा प्रेम आ गया किसी भगत के अंदर तो महाराज उसके चरण दाबने में भी हिचकते नहीं है। तो लाल जी के हृदय के प्रेम समुद्र का सार रूप हमारी महारानी जो के चरणों का जिसने आश्रय ले लिया कितना कृपालु लाल जी हो जाएंगे। ध्रुत कनक सुगरी मंगव्ली दधा नाम नव तरुण मल्लीला कांत पुर राराम विपुल जघन खेलत वेणी माश्चर्य रुचर नवकनक महेंद्र प्रक्षो लक्ष्मी बहुत करुणामय स्वरूप हमारी स्वामी का है अगर भाव में जरा भी झलक जाए तो चिल्ला चिल्ला कर रो।

वैसा आनंद आनंद का तूफान उठता है। ऐसे नेत्र हैं प्यारी जी के कि वाणी की सामर्थ्य नहीं कहा कहो एक जीव सखी बात की बात की बात रुचिर मनोहर वक्र विलोकन सूरत समरदल गंजन जैसे हित हरिवंश कहत ना बने छवि हित सजनी जो जो देख रही अरे देख क्या रही अंजन जो लगाती है उन्हीं आंखों में वो कह रही रुचिर मनोहर वक्र विलोकन सुरत समर दल गंजन जैसी धरिवंश कहत ना बने छवि सुख समुद्र मन रंजन ऐसे ही खंजन मीन मृगज मद मेटत कहा कहो नैनन की बातें ऐसे सुंदर नेत्र प्यारी जी के करणाय लज्जा भरे प्रेम भरे ऐसे रस भरे

करुणा भरे कि देखते ही रोने का चिल्ला के रोने का मन हो ऐसा स्वरूप हमारी प्यारी जी ध्रुत कनक सुगौरी मंगव् दधा नव तरुणी मलिया कांत पुर पारा ऐसी स्वर्णवत सुंदर गौरांगी प्रियाजू नौ किशोर स्वरूप विशाल वेणी मानो सुमेरु की शोभा को भी मात कर रहे सुमेरु कंचन वर्ण और सात कुंभ तनु गोरी और अनंत सहचर्या घिरे हुए और लाल जो महाराज एकटक रूप रस का पान करे तो मुख चंद्र चकोर नैना ऐसी स्वामिनी जो जहां विराजमान है श्रीपाद कह रहे हैं अब मुझे वृंदावन का जो आश्रय मिल गया

वास मिल गया तो श्री जी मिल जाएगी इसमें कोई संशय नहीं वागवाणा प्रपतंत मर्मस सतम पाद प्रहारा सिरो संतु सतम सतम धना सतम संतु स्मारम स्मारमथाप जीवन धनम तद गौर नीलमो द्वंदम सांद्र श मूर्ति मुदितो व्स्याम वृंदावने कह रहे हैं कि यदि मुझे कोई 100 गाली दो रोज दे और लातों से मारे सतम पाद प्रहारा सिरो 100 लात रोज हमारे लगे तो भी मैं वृंदावन नहीं छोड़ने वाला ए बात पकड़ो कुछ है कैसे सह सकते हो 100 कदम दूरी पे 50 करोड़ रुपया की एक अटैची रख दी जाए और चलो तुम लेट के चलो वहां तक जाओ।

छू लिया तो तुम्हें मिल जाएंगे। लेकिन आदमी हम छोड़ेंगे। पांच सात 10 आदमी। वो तुम्हें रोकेंगे। मारेंगे। अगर तुम रुक गए तो नहीं मिलेगा। तो वो आदमी चाहे 100 नहीं 500 लात उसकी खोपड़ी में मारे वो 50 करोड़ वाली अटैची तक पहुंचने की हर कोशिश करेगा। वो गाली नहीं देखेगा। वो लात नहीं देखेगा। कोई भी और श्री जी को प्राप्त करने के लिए हम चले हैं और हमें कोई गाली दे, हमें कोई मारे, कोई हमें तिरस्कार करे और हम इतने पर रुक जाएंगे। वो नाशवान 50 करोड़ के लिए प्राण देने के लिए तैयार हो जाएगा।

तो कहे द्वंदम श्र मूर्ति मुदितो दुख पूर्वक नहीं मुदितो स्मारम स्मार मथाप जीवन धनम तद गौर नीलम जीवन धन गौर श्याम की प्राप्ति के लिए उनका स्मरण करते हुए 100-100 लात खा के भी हम किसी को कुछ नहीं कहेंगे। अपनी श्री जी की प्राप्ति के लिए चलेंगे। वागवा प्रपत मर्म पाद प्रहार ये है प्राप्ति करने की इच्छा का नाम यह है। आपसे बहुत हृदय से बात कर रहा हूं। जब आप भगवत प्राप्ति के लिए कमर कसेंगे तो माया तुम्हें रौदेगी रौदेगी पक्का। वह या तो इतनी अनुकूलता दे देगी कि आप प्रमाद में भूल जाओ और या हर कदम में प्रतिकूलता दे देगी कि चलना मुश्किल हो जाएगा।

अब क्या करूं उस स्थिति में भी चाहे सर्वस्व नाश हो जाए मैं श्री जी को नहीं छोड़ सकता। मैं भगवत प्राप्ति की किसी भी तरह से अब इसमें गुंजाइश नहीं मैं और साझा नहीं कर सकता। सिर्फ भगवत प्राप्ति जीवन भगवत प्राप्ति के लिए हर कष्ट सहूंगा पर श्री जी को नहीं छोड़ सकता। बस हो गया। वा प्रप मर्म सुसतम पाद प्रहारा चाहे जितना कष्ट दो 100 लात मारो 100 गालियां दो हम वृंदावन नहीं छोड़ेंगे हम प्रियाजू की उपासना नहीं छोड़ेंगे सब छूट जाए सब नष्ट हो जाए आप जानो आपका काम जाने हम आपको नहीं छोड़ सकते स्मारम स्मारम मथाप जीवन धनम तो क्या मिलता है बोले वो स्मरण करता हुआ बार-बार स्मरण करता हुआ अपने जीवन धर्म गौर श्याम प्रिया प्रीतम ऐसा मुदितो ऐसा आनंदित रहता है कि उसको परवाह ही नहीं रहती कौन गाली दे रहा है कौन मार रहा है ऐसी उत्तम स्थिति वत्स्याम वृंदावन मैं ऐसे वृंदावन में वास करूंगा चाहे मुझे कोई मारे चाहे गाली दे चाहे अपमान करे भक्तम जन्म जन्म प्रियवध चंदनादम तया अहंकार कारस्त शोहरितम ना बहुत सुंदर बात कह रहे अभ्यस्त समस्त शास्त्र मोहस्त ना तद समस्त तो भज महानंदाय वृंदावनम जन्मजनम में हमने बहुत भोग भोगे काम भोग भी भोगा है नव वधू माला चंदन नाना प्रकार के सुख सामग्री बहुत अहंकार था।

बड़े-बड़े पदों में गया। कुछ नहीं। आज फिर वैसे का वैसा हूं। भाई मेरी प्रार्थना मान लो ऐसे आप भी हो। कभी आप भी देवता बनेगे। स्वर्ग के भोग भोगे कभी नरक गएगे। कभी नाना प्रकार की और योनियों में गएगे। सब भोगा सब कर लिया। भगवत प्राप्ति नहीं की। एक बार भी अब हिम्मत कर लो। बहुत शास्त्र पढ़ लिए ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं है। कह रहे हैं अभ्यस्तात समस्त शास्त्र वित मोहस्तु मोह ही होगा। अज्ञान ही बढ़ेगा क्या? अष्टांग योग में चले कि यह सिद्धि प्राप्त करें कि इस मार्ग में चले कि इस मार्ग में चले बहुत शास्त्रों का ज्ञान होना दुर्भाग्य ही है।

कोई कह सकता है ऐसा कैसे कह सकते हो? क्योंकि वो निर्णय ही नहीं कर पाता मैं किधर चलूं। हजारों मार्गों का ज्ञान है। एक कदम नहीं चला किसी मार्ग में तो दुर्भाग्य नहीं और क्या है? निर्णय निकला पूरा जीवन हो गया। हर किलोमीटर का ज्ञान है हर रास्ते के लेकिन चले एक कदम नहीं कि उस किलोमीटर के बाद फिर क्या है? अब गए ही नहीं तो अनुभव ही नहीं है। ऐसा शास्त्र ज्ञान किस काम? आपको भारत के हर मार्ग का ज्ञान है किलोमीटरों का। लेकिन आपने यात्रा किसी भी पावन तीर्थ की नहीं की।

तो बैठे-बैठे इस ज्ञान से क्या आप परम पवित्र हो जाएंगे क्या आपने कभी अवगाहन नहीं किया किसी तीर्थ का किसी धर्म क्षेत्र का किसी पुरियों का धामों का और आपको सब ज्ञान है वो ज्ञान किस काम का हलवा की पूरी प्रक्रिया बनाने के आप एक सांस में बता जाओगे लेकिन कभी बना के पाया बोले नहीं तो फिर मतलब क्या रहा ये शास्त्र ज्ञान तभी सार्थक है जब भगवत साक्षात्कार करो तो श्रीपाद कह रहे हैं अहंकारस्तु न शांत ये अहंकार तुम्हारा शांत नहीं होगा अभ्यस्त समस्त शास्त्र विति मोहस्त नास्तम गत मोह तुम्हारा नहीं जाएगा चाहे जितने शास्त्र पढ़ लो बोले क्या करें आप उपाय बताओ तो बोले हम उपाय आपको बता रहे हैं महा आनंदाय वृंदावनम भज भज माने होता है सेवा सेवन कर वृंदावन का वृंदावन का आश्रय ले वृंदावन धाम आ रसिकों का संग कर प्रिया लाल के अनन्य हो जा ज्यादा जानने की जरूरत सबसे बड़ा ज्ञान सत वस्तु श्यामा श्याम वैराग्य इनके सिवा सबसे प्रीति इनके नाम रूप लीला धाम से गति इनके चरणारविंद की सेवा बस इतना ही ज्ञान चाहिए इतना ही सार

ज्ञान है। ये बुद्धि को दौड़ा दौड़ा के दौड़ा दौड़ा के थका करके बस प्रभु के चरणों में बैठाल देना है। यही साधना है। श्रीपाद कह रहे हैं कि अब मेरे हृदय में एक बात बैठ गई कि वृंदावन का आश्रय लेकर प्रिया प्रीतम की आराधना करो। इसी में परम विश्राम है। संत वाणी जो भगवत प्रेमी भगवत प्राप्त महात्मा जन है वह हमारी छोटी छोटी त्रुटियों से लेकर बड़ी त्रुटियों का सुधार करने के लिए शास्त्र के वचनों का अनुभव करके बोलते हैं। जीवन दो गतियों से गुजरता है। एक गति है जन्म मृत्यु में भटकना।

और एक गति है जन्म मृत्यु से मुक्त होना। दो ही मार्ग है। अस्तु मा सद्गम है। असद से सद की यात्रा करो या सद स्वरूप का विस्मरण करके असद में रत हो जाओ। जन्म मृत्यु के चक्र में 84 लाख योनियां हैं। कर्मु इन 84 लाख योनियों में जीव भ्रमित होता है। इस योनि में एक एक योनि लाख लाख प्रकार की है। एक योनि लाख लाख प्रकार की है। अब जैसे रेंगने वाली योनि अब रेंगने वाले में कितने प्रकार के जीव है? सांप है, घन खजूर है, केचुआ है। कितने प्रकार के जीव हैं रेंगने वाले में?

एक है जलचर। अब जल में कितने प्रकार के जीव हैं? वायु में उड़ने वाले कितने प्रकार के जीव एक योनि में लाख लाख योनियां उन लाख लाख योनियों में कई कई बार जन्म अरे बड़ा प्रपंच है बड़ा दुर्गति है जीवों की अन्य योनियों के साथ जो दुर्व्यवहार हो रहा है बहुत ही घणित है। कैसे तुम्हें बता? डेढ़ डेढ़ घंटा धीरे-धीरे जला जला के पका रहे हैं पशुओं को। फिर उन्मत होकर मदिरापान करके उसका खान खानपान कर रहे। क्या कैसी दुर्गति? कैसी दुर्गति जीते जीव अपनी कर रहे हैं। 84 लाख योनियों में एक एक योनि में लाख लाख प्रकार की योनियां।

एक एक योनि में लाख लाख बार जन्म होना। ऐसे थोड़ी है प्रपंच हाहाकार डिसीजन इसलिए कह रहे हैं कल्याण कर ले कल्याण कर ले भूल मत कर यही एक चांस है मनुष्य दे जिससे तू अपना कल्याण कर सकता है अन्य योनियों में नहीं अब सोचो उस जीव की क्या हालत है हाथ पैर बंधे हुए लोहे की क्षण में फंसा हुआ है आराम से धीरे-धीरे अग्नि उसे जला रही वो कीक रहा है चिल्ला रहा है और वो आनंदित हो रहे हैं वो थोड़ा थोड़ा पीते जा रहे देख रहे हैं पक रहा है पका लो तुम्हारे तो खाने के काम में आएगा।

तुम खाने के भी काम में नहीं आओगे। ऐसी तुम्हारी हालत काल करेगा। जब वो जलाएगा तो तुम खाने के काम में भी नहीं आओगे। बहुत होश में बहुत होश में बहुत होश में। ये कर्म तुम्हारा कहीं बखशने वाला नहीं। तुम्हें दंड देगा। 84 लाख योनियां एक केवल मनुष्य योनि जिनमें आप अपना उद्धार कर सकते हो। मानव जीवन गिने चुने स्वासों वाला है। गिने चुने स्वासों वाला इतनी स्वासे आपकी हैं। बस प्रति पल माइनस होता चला जा रहा है। खत्म होती चली जा रहे हैं। या हम आनंदित हो रहे हैं। 30 वर्ष के हो गए।

35 अरे आनंदित नहीं 35 वर्ष गए जीवन के। मूल कार्य के लिए जो आए हो भगवत प्राप्ति उसमें क्या किया? बोले कुछ नहीं। अभी तो खेलने खालने की उम्र है। मरने की उम्र कौन सी है? कभी भी तो मर सकते हो। तो अपना काम क्यों नहीं बना लेते? राधा राधा राधा यही अवसर है। जीव आवागमन के अनादि चक्र से अपना छुटकारा करके अपने स्वरूप में स्थित हो सकता है। भगवत प्राप्ति कर सकता है। जन्म मृत्यु का चक्र कब तक चलेगा? अकल्पनीय कल्पना भी नहीं कर सकते। काल चक्र आपको घुमाता रहेगा। इसलिए मनुष्य जीवन में भगवत प्राप्ति का अवसर है।

ये काम, क्रोध, लोभ और मोह ये चार प्रधान ऐसे हैं जो इस चक्र को चलाते रहते हैं। आवागमन पुनरपि जननम, पुनरपि मरणम, पुनरप जननी, जठरे शयनम ये चक्र चलाते रहते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह इनहीं को नरक की गति कहा गया है। इनमें से किसी में भी एक में पैर पड़ जाए। काम में, क्रोध में, लोभ में, मोह में। फौरन चारों आज करके उसे घुमाने लगेंगे। बार-बार जन्म बार-बार मरण। नरक की दारुण यंत्रणा हर योनि में उसको प्राप्त होगी। केवल मनुष्य योनि ऐसी जिससे अपने को बचा सकते हो।

केवल मनुष्य ही सतकर्म करने में स्वतंत्र है। नवीन कर्म करने में स्वतंत्र है। अन्य प्राणी तो पूर्व में जो संचित कर्म गोदाम लगा है उसी को भोगते रहते हैं। वो अशुभ कर्मों का नाश करते रहते हैं। भोग भोग करके वो नवीन कर्मों का उपार्जन नहीं कर सकते। मनुष्य नवीन कर्म उपार्जन कर सकता है। मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है। मनुष्य ही है जो अपने कर्म संस्कारों को भस्म कर सकता है। दूसरा कोई योनि नहीं। अब उसे सोचना है कि जो आपके गंदे कर्म जमा है उसमें और प्लस करना है या आग लगाना है।

पूरी गोदाम को स्वतंत्र हो आप। काम, क्रोध, लोभ, मोह यह जिनके जीवन में है निश्चित समझो उनका जन्म मरण पक्का है। जन्म मरण पक्का है। इन चारों को मिटाने के लिए चार ये पहलवान ताल ठोक के खड़े हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ये शत्रु तो सत्संग, परोपकार, वैराग्य और नाम जप। यह चार ऐसे हैं कि इन चारों को चटनी बना देंगे। रोज सत्संग सुनो। अपने भोजन में से चाहे एक रोटी निकालो। रोज दूसरों के उदर में जाने वाला विधान करो। परोपकार की भावना और वैराग्य जननी जनक बंद सुतारा तन धन धाम सुहद परिवारा सबकी ममता ताग बटोरी मम पद मनह बांध बर डोरी।

छोड़ दो भगवान के भरोसे में और अपने कर्तव्य का पालन करो। ज्यादा चिंता मत करो। चिंतन करो प्रभु का। वह सब संभाल लेंगे। अनंत ब्रह्मांड संभाल रहे हैं। तुम्हारे परिवार में तो दो चार छह लोग ही होंगे। वैराग्य सब भगवान का है। भगवान देखेंगे। जो जैसा कर्म करेगा वैसा भोगेगा। राधा राधा राधा और अपने कर्तव्य का पालन जिसके प्रति जो संबंध है ईमानदारी से आप करो। लेकिन राग मत करो और नाम जप सत्संग परोपकार वैराग्य और नाम जप इसके द्वारा इस चक्र का नाश कर दो काम क्रोध लोभ मोह इनकी मिटियामेट करने के लिए सामर्थ है सत्संग परोपकार वैराग्य और भजन अब भगवत धाम और नरक ये दो हैं।

चयन करो तुम्हें कहां जाना है। अगर काम क्रोध लोभ मोह तो त्रिवध नरकसदम द्वार नाशन मात्म कामा क्रोधा तथा लोभा और यदि सत्संग परोपकार वैराग्य भजन तो भगवत धाम ये दो गतियां हैं। उपासक देख लो अगर भगवत धाम जाना है तो इन चार बातों को छोड़ना होगा। काम, क्रोध, लोभ, मोह चार बातों को पकड़ना होगा। रोज सत्संग, रोज परोपकार और सबसे अंदर से वैराग्य और खूब नाम जप इसी के द्वारा भगवत प्राप्ति होती है। तीर्थ पात भगवान श्री हरि के जो गुणानुवाद लीला कथा है ऐसा नशा चढ़ जाना चाहिए कि कभी तृप्ति नहीं होनी चाहिए।

कप्य या तीर्थ पदो विधाना सवाना यह करना पुरुषसया तो भव प्रदाम गति छिनती जो भगवान की चर्चा को कानों से सुनता रहता है तो उसके हृदय का मोह मल नाश हो जाता है वो वैरागी हो जाता है वैरागी का केवल भेष से मतलब नहीं अंदर से है। जैसे चक्रवर्ती सम्राट अमरीश जी वैरागी है। चक्रवर्ती सम्राट अवध का पूरा शासन कर रहे हैं भरत जी लेकिन परम बैरागी जो अनुरागी है वही परम बैरागी है। जो परम बैरागी वही अनुरागी है। जो भगवत चर्चा सुनता रहता है रोज तो सर्व संगोप हिमाम सत्संग सर्व संगोप हिमाम सत्संग आपको सब संगों से अलग करके भगवत अनुरागी बना ही देगा कौन ऐसा है जो प्रभु की चर्चा सुनते सुनते अघा जाए नारद आदि महात्मा गण बड़े-बड़े साधु जन जिनका सदैव यशगान करते रहते हैं अहो भाग्य है उन मनुष्य शरीर धारियों का जो अपने कर्ण रंधों से भगवत चर्चा सुनते रहते हैं।

उनका संसार चक्र में डालने वाला यह विकार घर गृहस्ती की आसक्ति ये उसे अब अगला जन्म नहीं करने देगी। घर गृहस्ती की आसक्ति काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि उसको अगला जन्म नहीं दे सकते जिनके कानों में रोज भगवत चर्चा पड़ती है और वो भगवत चर्चा सुनते हुए कभी अघाते नहीं। सा श्रद्धधान विवर्धना विक्ति मनत्र करो पुष हरे पदा निवस समस्त दुखा्यमा सुधते जब कथा सुनते सुनते कथा में स्वाद आने लगे एक एक शब्द बहुत गंभीर आनंददायक लगने लगे तब समझ लेना चाहिए कि अब हमारे कल्याण का अवसर आ गया भगवान की बातें बहुत प्रिय लगने लगे भगवत चर्चा चर्चा एक आनंद देने लगे।

समस्त विषयों से वैराग्य उसी का होता है जो रोज सत्संग सुनता है। पर सत्संग सुनना समझ लीजिए। कल श्रोता का वर्णन हुआ था। चातक की तरह सुनना। हमारा जीवन है सत्संग। उसका मनन करना। उसको आचरण में होता ना कि सुने बस चले गए। इतना समय तो सार्थक हुआ पर मनन नहीं करोगे। तो सत्संग का हृदय रूपी अंधकार नाश करने का जो प्रभाव है वो मनन से होता है। मनन नहीं तो फिर नहीं बन पाएगा। सुन लिया दूसरों को सुना दोगे काम नहीं बनेगा। भगवत चरणारविंद के निरंतर चिंतन की सामर्थ सत्संग से प्राप्त होती है।

समस्त दुखों का नाश भगवत चिंतन से होता है। भगवत चिंतन की प्राप्ति सत्संग से होती है। इसलिए तान सोच सोच विदो सोचे हरे कथाया विख नघन छिणो देवो निमस्तु मायथावा गति स्मृति नाम मुझे तो सबसे ज्यादा वो सोचनीयों में भी सोचनी अज्ञानी पुरुष लगते हैं जो कभी सत सत्संग सुनने नहीं आते। पिछले पूर्व पापों के कारण उनको भगवान की कथा में सुनने में बिल्कुल रुचि नहीं है। और अगर कभी कोई उनका मित्र आदि ले भी आवे तो सुनना नहीं चाहते। तुम आओ सुन के हम बाहर खड़े हैं। वो इतनी दूर खड़े हो जाएंगे कि कान में शब्द ना पड़े।

और अगर कभी सत्संगियों को देखेंगे भी तो उनके दोष दर्शन करेंगे। इनका क्या सुधार हुआ सत्संग से? ये वो ऐसा हाय हाय बड़े सोचनीय है कि मानव देह प्राप्त करके उनको सत्संग नहीं मिला। काल भगवान ऐसी अमूल्य स्वासों को व्यर्थ में नष्ट करवा रहे हैं। उनकी वाणी दूसरे के निंदा प्रपंच गायन में देह भोगों में व्यर्थ के वाद विवाद व्यर्थ की चेष्टा व्यर्थ के चिंतन में उनका जीवन चला जाता है। इसलिए इस लोक में तुम केवल धर्म का आचरण करते हुए ही अर्थ का सेवन करो। भोगों को भगवत अर्पित करके परम पुरुषार्थ भगवान की प्राप्ति का उपाय करो।

वही मनुष्य जीवन श्रेष्ठ है। य संसारणी प्रज्ञा धर्मार्थ वनवर्तते धर्म पूर्वक अर्थ कमाओ। पाप का पैसा नहीं। खूब भगवन नाम जप भगवत कीर्तन यह परम पुरुषार्थ है। इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी और ज्यादा प्रपंच करने की जरूरत नहीं। क्षमावसी कृति लोके क्षमया किम न साध्यते शांति खगा करे य किम करिश दुर्जना जब तुम धर्म मार्ग में चलोगे तो दुर्जन लोग तुम्हें परेशान करेंगे। तुम्हारे पास ढाल और तलवार है जैसे तो शत्रु को परास्त कर दोगे उसके वार को सह लोगे तो ढाल क्या है क्षमा आपको जब कोई गाली दे अपमान करे तो अपने भजन को बचाने के लिए क्षमा रूपी ढाल का प्रयोग करो और दुर्जन जब प्रहार करते हैं निंदा करते हैं अंदर से बाहर से अंदर से काम क्रोध आदि तो शांति रूपी तलवार से काट दो शांत रहो चुप रहो क्षमा कर दो क्षमा रूपी ढाल शांत रूपी तलवार इससे आप क्रॉस करते हुए चले जाओगे भगवत मार्ग में आगे स्वर्ग के देवता बड़े-बड़े देवता जिसको नमस्कार करते हैं वो कौन सा पुरुष होता है बोले वो दो प्रकार के होते हैं।

एक होते हैं जो बल पूर्वक दंड देने में क्षमता रखते हैं। पर उनका अपमान निंदा करो वह सह लेंगे और निर्धन होने पर भी अवसर आने पर सब कुछ लुटाने के लिए तैयार हैं। इन दो पुरुषों को बड़े-बड़े देवता भी नमस्कार करते हैं। गरीब होने पर भी दान देने का उत्साह और बलवान होने पर भी सहनशीलता दूसरे के द्वारा किया हुआ निंदा अपमान आदि मौन होकर सह लेते हैं। यद्यप सामर्थ उनमें दंड देने की है। गरीब होते हुए भी दूसरों को खिलाने पिलाने दान देने का उत्साह इन दो को बड़े-बड़े देवता भी नमस्कार करते हैं।

दभसी निवेष्टव्य गले बवा दृणा शिलाम धनवंत मादातारम दरिद्रम चापनम ये दो मरे हुए समझो संसार में जीवित है पर इसका अर्थ सीधे होता है कि गले में पत्थर डालकर डूब के मर जाने वाले स्वभाव वाले हैं। क्या जो धनी होने पर भोग विलासिता में पैसा खर्चा करते हैं। एक होटल में गए लाखों रुपए खर्चा कर दिए। अरे 250 ग्राम आटा नहीं खा सकते हो। कितने का 250 ग्राम आटा होता है? एक दो कटोरी दाल सब्जी ले लो, दो चार रोटी ले लो, खा लो। प्रकृति के पैसे को बर्बाद करते हो। 5 लाख उड़ाया है।

5 लाख में 500 आदमी खूब बढ़िया भोजन पाते और बढ़िया स्वस्थ रहते। ऐसे विचार करना चाहिए। दुर्गति किनकी होती? जिनको इस जन्म में धन मिला। और वह दूसरों की सेवा में भागवतिक सेवा में ना लगाकर भोगों में लगाते हैं। पीछे वाले श्लोक में था कह दम पुरुषो राज स्वर्गस पर प्रभु क्षमया युक्त दरिद्रस प्रदानवान जो गरीब होकर दूसरों को दान देने का उत्साह रखता है वो और जो बलवान होने पर दूसरों को क्षमा कर देता है वो इन दो को देवता भी नमस्कार करते हैं। देवलोक के भी ऊपर गति पाने वाला है।

और इन दो को जो धनी होने पर धन होने पर भी साधु सेवा गौ सेवा भक्त सेवा या समाज सेवा में ना देकर वो उड़ाता है नाना प्रकार के काम भोग विषय भोग मनोरंजन में ऐसा नहीं कि प्रकृति का धन तुम्हें मिला तुम उसके स्वामी हो जो चाहो कर लो तुम सिर्फ मुनि हो स्वामी तो भगवान है हिसाब से हिसाब से चलो नहीं सब छीन लिया जाएगा जो धनी होने पर मददाम होकर गलत जगह धन खर्चा करता है। मैं इसका स्वामी हूं और सही ढंग से उसका खर्चा नहीं सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। अरे कितने ऐसे बीमार लोग हैं जिनके पास अर्थ व्यवस्था नहीं।

कितने भूखे लोग ऐसे हैं जिनके पास भोजन व्यवस्था हम कह रहे बहुत वास रहित लोग हैं जिनकी वास व्यवस्था नहीं। तुम्हारे पास धन बड़ा है। अरे कितने कितने करोड़ ऐसे मनोरंजन में पूरे भारत में एक एक कुटिया बना दो। एक एक गांव में तो एक एक परिवार तो रह जाएगा। धन का सदुपयोग है दूसरों के सुख में लगाना। अपने मनोरंजन में लगाना नहीं। अपनी आन बान शान किस में है? भगवान प्रसन्न हो जाए। इसमें नहीं है कि संसार जान जाए कि हमने इसके लिए इतना पैसा खर्चा किया। दुर्गति होती है।

धन अगर वह धर्म विरुद्ध आचरणों में जा रहा है तो तुम स्वामी के द्वारा दिए हुए धन का अपमान कर रहे हो। तुम स्वामी नहीं हो। लक्ष्मी पति नारायण है। तुम थोड़ी हो। तुम तो मुनिम हो। तुम्हें केवल पुण्य बल से उतना अधिकार मिला है। छीन लिया जाएगा। देख लेना इसी जन्म में दोनों क्रियाएं देखी गई। मदोन्मत्त हो जाने से श्री वैभव अंतर् ध्यान हो जाता है। खत्म खेल पूरा जीवन जेल में काटो और जो दरिद्र होने पर कष्ट सहकर भगवन नाम जप करके अपना काम नहीं बना लेता है। भोगों के लिए ललचाता हुआ दूसरों की चाटुकारिता करता है।

दोनों मरे हुए पुरुष हैं। मरे हुए जिन हरि भगत हृदय नहीं आ जीवित सब समान ते प्राणी हरणम परस नाम परदभशन सुदस परित्याग दोष छयावहा महान धर्मावतार भगवान के परम प्रेमी विदुर जी ये जो दूसरे को फुसलाकर या जबरदस्ती या किसी भी प्रभाव से दूसरे की संपत्ति का अपहरण करते हैं या मित्र की पत्नी या व्यवहार बनाकर या प्रलोभन करके दूसरे की स्त्री के साथ सहवास करते हैं और जो अपने मित्र के साथ दगाबाजी धोखाबादी सुरदों का परित्याग करते हैं इनको निश्चित दुर्गति प्राप्त होती है।

ध्यान से सुन लो। यही निर्णय करने वाले हैं। धर्मराज का सीधा अवतार विदुर जी हैं और धर्म का अंशावतार युधिष्ठिर जी हैं। सीधा धर्मराज ही आए हैं विदुर जी के रूप में। वही कह रहे हैं हरणम परस परदाराम बहुत बड़ा पाप है। अपनी भागवतिक पद्धति से स्वीकार की हुई अर्धांगिनी के सिवा किसी माता बहन की वो तुम्हारी दुर्गति कर देगा या अपने पति के सिवा किसी और वो तुम्हारी दुर्गति कर देगा। परदारा विमर्शनम आयु क्षीण हो जाती है। श्री क्षीण हो जाती है। आपको लगता है कहते हैं कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि आप जो जो वर्णन करते हो वो सब उसमें बड़े मौज से है।

तुमको बताया है आखिरी इच्छा पूर्ति की जाती है मरने वाले की। इनकी आखिरी इच्छा है। तुम अजर अमर तो हो नहीं। नहीं नहीं तो देख लेना इनकी क्या गति होगी। भैया दो चार बार डकैती से सफल हो गया तो लाखों रुपया उड़ा रहा। तुम कह रहे हो बड़े मौज में और जिस दिन पकड़ा जाएगा ना और फिर जब दंड उसको मिलेगा तब आप देखने नहीं जाओगे कि उसको क्या-क्या दंड मिलता है। ऐसे ही जब यमपुरी में जीव जाता है यहां से कर्म करके तो शास्त्रों में पढ़ो तुम्हें शास्त्रों तक पहुंच नहीं और विश्वास नहीं तो तुम मानते नहीं हो कि नरक है।

जो दूसरे का धन अपहरण करता है। दूसरे की स्त्री का संसर्ग करता है। मित्र बना के व्यवहार बना के पराई स्त्री के साथ सहवास करता है या पराए पुरुष से सहवास करता है जो अपने सुहद मित्र को धोखा देता है परित्याग करता है ये सब नरक जाने वाले पाप है भक्तम च भजमानम च तवा च वादिन त्रनेता शरणम प्राप्त विश ना संतजे जो तुम्हारा भक्त हो तुम्हारी सेवा में रहा हो और एक बार हृदय से कह दिया कि मैं आपकी शरण में हूं। ऐसे तीन प्रकार के मनुष्यों के संकट आने पर पूर्ण रूप से सहयोग करना चाहिए।

गृहस्थ में अपने कुटुंब में जो सबसे बूढ़ा हो उसको सबसे पहले भोजन देना चाहिए। धर्म का आदेश है। यहां बहू और लड़का कॉफी और समोसा चाय छान रहे हैं और बूढ़े टुकुर टुकुर हेर रहे हैं। अगर कुछ कहे भी तो डांट देंगे। तुम्हें घर में तो रहना है। बना लेना चाय पी लेना। हमें ऑफिस जाना है। और ज्यादा बात किए तो दो चार थप्पड़ मार दिए। मां के पिता के कुटुंब में सबसे पहले भोजन का अधिकार किनको है? गरम गरम भोजन बना के पहले वयोवृद्ध फिर दूसरा अधिकार बच्चे फिर तीसरा अधिकार अपने जो आए हुए जन है जो घर के जन है बनाने वाला सबसे बाद के ये नहीं कि बनाने वाला पहले चक्र छान के फिर जो मनाया सो परोस दिया ये वो रसोई में कभी कमी नहीं हो सकती जो ऐसी रसोई होगी एक अन्नपूर्णा जी का कृपा प्रसाद होता है उस रसोई में रसोई में कभी भोजन पाया ना जाए रसोई कभी झूठी ना हो बाहरी कोई रसोई देख ना पावे रसोई पर्दे में रहे और पवाते रहो आप देखो अन्नपूर्णा कैसे आप पर कृपा करती है लेकिन यहां तो ऐसे दलित दुराए की हद है हद है वो उतार के रखा धुआ निकल मुंह में डाल के खा रहे हैं वही खा रहे हैं परोसा ना भगवान से मतलब ना भगत से मतलब है ना बूढ़ों से मतलब है ना ऐसी दरिद्रता छाई हुई है रस्द जनेंद्र की पूछो मत।

ध्यान से सुने। इसीलिए महापुरुषों के वचन सुना रहे। आज से जो सुन रहे हैं भोजन में सबसे पहला अधिकार रसोई में भयो वृद्ध का है। हम कह रहे ठाकुर जी को भोग लगा के दिखा के उनको पवाओ। पहले बच्चों को पवाओ। जो और अपने जन उनको रसोई करता वो सबसे बाद के जो घर का स्वामी बनने का अधिकार रखते हैं उनको सबसे बाद के पाना चाहिए पहले सबको पवा देना मुखिया मुख सो चाहिए खानपान सो एक भी ऐसा कोई भोजन का पदार्थ ना हो जो किसी को ना दिया गया हो छुपाव नहीं होना चाहिए रसोई में जो बने सबको पंगत में जो परोसा जाए सबको नहीं परोसा ही ना जाए ध्यान रखना नहीं इससे इससे अपराध लगता है कि 20 को कुछ और 30 को कुछ और 50 को कुछ और ऐसा नहीं एक मुखिया मुख सो चाहिए खानपान सो एक घर में जो चीज बनाओ वो सबको बराबर दो ऐसा नहीं होना चाहिए कि आप अपने लिए कुछ अलग उनके लिए कुछ अलग जब अपनी मोह वृत्ति होती है सत्संग का ज्ञान नहीं होता तो अलग-अलग होता है बहुत विचित्र होता है बड़ा अपराध बनता है दूसरा अपने संबंध में जो संकट में पड़ा हो तो बिना बुलाए अपने आप जाकर उसका सहयोग करना चाहिए।

तीसरा यदि अपनी बहन संतान हीन हो व्यवस्था ना हो और वह अपने पास रहना चाहे तो आदर के साथ पूरे जीवन उसको रखना चाहिए। भगवान धर्म स्वरूप विदुर जी कह रहे हैं अगर गृहस्थी में रहकर यह चार आचरण संभाल ले जो अभी बोले गए और नाम जप करें तो भगवान की प्राप्ति निश्चित है। बड़े बूढ़ों को भोजन में सबसे पहला अधिकार है। बड़े बूढ़े भगवान साक्षात मातृ देवो भव पितृ देवो भव यदि तुम्हारा कोई संबंधी कष्ट में है तो बिना बुलाए जाओ उसका सहयोग करो और यदि तुम्हारी बहन संतान हीन धनहीन है परिवार में उसको नहीं रखा जा रहा आप आदर पूर्वक जीवन भर रखो इससे भगवान प्रसन्न हो जाएंगे शट दोष पुरुषण हाव्या भूतता निंद्रा तंद्रा भयं क्रोधम आलस्यम दीर्घ सूत्रता ये छह दोष जिसमें होते हैं उसे भगवत सिद्धि प्राप्त नहीं होती।

परमार्थ की उन्नति चाहने वाले भगवान को प्राप्त करने वाले को ये छह दोष त्याग देना चाहिए। महात्मा विदुर जी कहते हैं क्या? पहले निद्रा त्यागने का मतलब उचित निद्रा चार घंटे पांच घंटे। इसके बाद छ घंटे उसके आगे जुड़ता है जो बहुत मेहनत करता है। सात घंटे उसके आगे जुड़ता है जो गृहस्ती में है। थोड़ा भी परमार्थ में अगर अभी चलना शुरू किया है बस इसके आगे जो सोते हैं वो भगवान जाने। और कलयुग की जीत ऐसी हो गई। वो कह रहा था कि हम सबको नरक पहुंचाएंगे। सूर्य उदय होते समय जो सैया में पड़ा सोया होता है उसकी बुद्धि उसकी स्त्री कीर्ति आयु यह सब नष्ट होता है और प्राय इस समय हमें लगता है कि 100 में 30 जगते होंगे और 70 सोते होंगे सूर्य भगवान के उदय होने या और प्लस हो सकता है और प्लस हो सकता है 4:00 बजे जग जाए वो तो बहुत बड़ी बात है।

हम कह रहे हैं 5:00 बजे हम कह रहे हैं ऐसे जग जाओ कि सूर्य भगवान उदय हो रहे हैं। आप जल्दी से नहा धोकर दो चुल्लू अर्घ तो दे दो। भुवन भास्कर पधार रहे हैं। अर्घ देने की तो बात जाने दो 11:00 बजे दिन तक सोते हैं। हमें लगता है इनकी जिंदगी क्या है जो 11:00 बजे दिन तक सोते? 11:00 बजे तो विश्राम का समय दूसरा आ जाता है। 1:00 बजे रात के जगे तो 11:00 बजे तो थोड़ा विश्राम का समय आ जाता है। ये 111 बजे तक जगते होंगे तो राजभोग कब पाते होंगे? इनका स्वयं भोग तो निशाचरी ही होता होगा।

रात्रि में 11 के बाद नहीं 2:00 बजे सोते होंगे। तीन चार पांच छ सात आठ नौ 10 11 मतलब कम से कम नौ घंटे सोते हैं। ये ये जिंदगी ठीक नहीं। इससे पूरा का पूरा आपका परमार्थ नष्ट हो जाएगा। विदुर जी महाराज कह रहे एक बार कुछ ऐसे नाइट ड्यूटी वाले जन है तो हमें लगता है अगर ऐसा कुछ हो तो सूर्य उदय के समय उठ जाओ हाथ मुंह धोकर के अरे सूर्य भगवान को प्रणाम करो और थोड़ा नाम जप करो फिर सो जाओ अगर आप रात में जगे डीटी पर सूर्य उदय के होते समय अगर सोते मिले तो आपके सुकृत नष्ट हो जाएंगे पक्का समझो आपका श्री वैभव क्षीण हो जाएगा आपको लगेगा बहुत धनी है ये धन धन कितने मिनट का भैया आंख मूंदी खत्म खेल जाएगा यहां का बैंक बैलेंस हम उस धन की बात कर रहे हैं जो तुम्हें जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाएगा पहला है निद्रा इस पर शासन करो दूसरा है तंद्रा तंद्रा का मतलब होता है ना नींद है ना जागृत है वो एकदम खोए रहते हैं ऐसे चेतना में है ना सो रहे हैं ना जग रहे हैं सोने का मतलब सोने सोने में एक अलार्म बजता रहता था।

वो पता चल रहा है कि सो रहा है और एक तंद्रा होती है कि उसमें अलार्म नहीं बजेगा। वो चल रहा वो तंद्रा और तीसरा भय। किसी ने हमसे पूछा कि आपको भय है। मुझे लगता है आपको कभी कोई भय नहीं क्योंकि आपका सत्संग सुनते हैं। हम कहा एक भय है। एक भय हर समय बना रहता है कि लाखों की श्रद्धा है। हे भगवान कभी हमारे द्वारा मन वचन कर्म से ऐसा कोई कार्य ना बन जाए जिससे किसी की श्रद्धा नष्ट हो जाए। उसका भगवत मार्ग रुक जाए। बस एक बात का भय रहता है। हमारे द्वारा कहीं कोई ऐसी वचन ना निकल जाए।

किसी को पीड़ा पहुंचे। हमारे द्वारा कोई ऐसा कर्म ना बन जाए जिससे किसी की श्रद्धा नष्ट हो जाए। क्योंकि संतों पर श्रद्धा बहुत समय के बाद होती है। समय-समय पर ऐसा भगवान का एक संत की क्रिया से लाखों संतों के प्रति अश्रद्धा हो जाएगी। हे प्रभु कभी हमारे द्वारा ऐसा आचरण ना बने। हमारे वचन ऐसे ना निकले। हमारा कोई ऐसा भाव ना हो जिससे किसी की श्रद्धा का नाश हो। इस बात से भय लगता है। बस किसी की श्रद्धा नष्ट ना हो। हमारी गति दुर्गति को उसे कोई फर्क नहीं। सामने वाले की गति ना बिगड़े।

उसका भाव मंगलमय रहे। हमारे अंदर कोई ऐसी वार्ता ना आ जाए। कोई ऐसा दोष ना आ जाए जिससे किसी को भाव बिगड़ जाए। बस एक भय रहता है और यह भय भजन बढ़ाने में काम आता है। यही डर ही डरप हरिवंश हित जिनो भ्रम गुण सलील पर जिनान मंगल लोक त सुहर पद भज न विलंब कर इस डर से डरते रहना चाहिए कि कहीं हमें माया की त्रिगुणात्मिका वृत्ति फिसला ना दे। इसलिए हर समय जिनका नाम तीनों लोकों का मंगल करने वाला है उन हरि का जप करते रहना चाहिए। राधा राधा हरि हरि और भय ये अन्य भय भगवान की प्राप्ति में बाधा पहुंचा देगा।

निद्रा तंद्रा और भय और क्रोध ये तो निश्चित समझो अनुभव की हुई बात कह रहे हैं। महीनों के भजन को ये शांत कर देता है। जो भजन का तेज उत्पन्न होकर ज्ञान प्रकाशित करता है उसी को बैठाल देता है। क्रोध नहीं आना चाहिए। गुस्सा नहीं आनी चाहिए। और आलस्य यह आलस्य भजन मार्ग में बहुत ही घातक है। अरे कल कर लेंगे। 11 माला तो कहा है आज पांच कर लिया है। कल 11 और छह कर लेंगे और कल ही आलस्य दिखाएगा। परसों कल धीरे-धीरे खत्म नियम दीर्घ शूद्रता हर कार्य को आगे टालते रहना।

निद्रा तंद्रा भय क्रोध आलस्य दीर्घ शूद्रता ये छह दोष भगवत प्राप्ति नहीं होने देते। इसलिए इनका त्याग करें। जो अपने सुख में प्रसन्न नहीं होता। दूसरे के दुख में हर्षित नहीं होता। जो दान देने के बाद कभी किसी से बोलता भी नहीं है। कि मैंने इतना अमुक को दिया। बिल्कुल शांत। कोई जानता ही नहीं कि दिया। वह भगवत मार्ग में आगे बढ़ता चला जाएगा। चाहे जैसा सम्मान, प्रियता, सुख, अनुकूलता बिल्कुल गंभीर। दूसरे का दुख देखकर दुखी होना ना कि हर्षित होना। और अपना जो दान है वह कोई जान ना पावे कि हमने दिया है।

ऐसे तीन प्रधान आचरण ये है जो भगवत मार्ग में आगे बढ़ाते हैं। एक भक्त थे एक दिन वो वो कह रहे थे कि हमारे हृदय में एक प्रबल लालसा जागृत हुई। जैसे छत्रपति वीर शिवाजी ने अपने गुरुदेव को सब कुछ दान कर दिया। मेरा हृदय कहता है मैं अपने गुरुदेव को अपने प्राण तक दान कर दूं। फिर भी मैं संकुचित हूं कि गुरुदेव को मेरे प्राण किस काम में आएंगे। जब मैं देखता हूं कि अपने गुरुदेव को जो देना चाहता हूं अरुचि है। तब मुझे लगता है क्या करूं जिससे मैं अपने गुरुदेव को प्रसन्न कर लूं।

अंदर यह बात जरूर है और ऐसा नहीं कि वो कोई साधारण पुरुषों में कि घर गृहस्ती के ऐसे ही नहीं ऐसे नहीं और वो खरबों का वैभव है उनके पास बस ऐसे साधारण पुरुष की तरह रहते हो दोनों पति पत्नी रो के ऐसे कह रहे थे हृदय में लालसा है पर जब मैं देखता हूं कि मेरे पास जो कुछ है वो सब घास फूस है उनके लिए तब लगता है क्या ऐसा कर दूं कि मेरे गुरुदेव प्रसन्न हो जाए यह बात जिनके हृदय में बनी रहती है कि मेरे इष्ट देव कैसे प्रसन्न हो? मेरे गुरुदेव कैसे प्रसन्न हो? वो कभी दोष कर ही नहीं सकते।

बोले मुझे कभी कुछ नहीं चाहिए। ना परम पद चाहिए ना कुछ भागवतिक चाहिए ना लौकिक चाहिए। आपकी केवल मुस्कुराहट चाहिए कि मेरे गुरुदेव प्रसन्न रहे। बस इसी बात से मैं जलता रहता हूं कि मैं क्या करूं जिससे मेरे गुरुदेव प्रसन्न हो जाए। यह बात जिनके गुरु प्रसन्न तो साह अनुकूला मिटी सकल कल्पित भयूला जो समुद्र पर्यंत पृथ्वी का वैभव प्राप्त होने पर भी खुश नहीं होता। ये खुशी का विषय नहीं। खुशी का विषय है भगवान की प्राप्ति होना। जो प्रचुर धनराशि का स्वामी होकर भी उसका भोग नहीं करता।

अपनी इंद्रियों को वश में करके उतने ही उचित एक हमने देखा बड़ा वैभव था। लेकिन वह उतना ही प्रयोग करते थे जितना अगर उनको 100 ग्राम पानी की जरूरत है तो 5 ग्राम पानी भी एक्स्ट्रा नहीं गिरने देंगे। कहते प्रकृति का है ये उतना ही लो जितना आपको जरूरत है। बिजली उतना ही लो जितनी जरूरत है। वस्तु बहुत है लेकिन उतना ही प्रयोग करो जितना जरूरत है। वो प्रकृति की है। भगवान ने आपके हिस्से में दी है। प्रकृति की सेवा में लगा दो। समुद्र पर्यंत पृथ्वी का वैभव प्रचुर धनराशि का स्वामी होकर भी जो अपनी इंद्रियों पर अधिकार रखता है फूला नहीं होता अभिमान नहीं करता उचित प्रयोग करके दूसरों की सेवा में लगाता है वो भगवत प्राप्ति के लिए आगे बढ़ जाता है और जो उसका इंद्रियों में वश इंद्रियों के वश होकर भोगों में व्यतीत करता है वह ऐश्वर्य से भी भ्रष्ट हो जाता है और दुर्गति को प्राप्त होता है अनुसूया आज शच संतोष प्रवादिता दम सत्य मना यासो न भवती दुरात्म नाम किसी के गुणों में दोष ना देखना सरल स्वभाव रखना पवित्र वस्त्र पवित्र शरीर पवित्र विचार रखना संतोष प्रिय वचन इंद्रियों को भोगों से हटाना सत्य भाषण करना और क्लेश तनिक भी मन में ना आने देना।

संतुष्ट केन हर स्थिति में प्रसन्न रहना सीखो। बोले यह भगवत प्राप्त होने वाले पुरुष के लक्षण है। फिर देख लो किसी के गुणों में दोष ना देखना अर्थात किसी में दोष दर्शन ना करना। किसी में भी एक ने दो-तीन दिन पहले एकांतिक में प्रश्न किया कि हमारा संतों के प्रति दोष दर्शन होता है। क्यों क्या आपको दोष दर्शन होता है? क्या आप संतोष से पता नहीं ऐसे ही मन हमारा नहीं तुमको तुम्हारा मन पापी है इसलिए दोष दर्शन करता है। पाप है तुम्हारे अंदर इसलिए दर्शन होता है। अगर पवित्र हो जाए अभी चश्मा ठीक हो तो देखो आप।

बोले कई बार जैसे सत्संग सुनते हैं, सब बातें सुनते हैं तो विश्वास नहीं होता। तो अशुभ कर्म करने वाले को विश्वास होगा। पापात्मा को विश्वास होगा। पापवंत कर सहज सुभाव भजन मूर्ति भाव नकाओ। अशुद्ध आचरण करोगे। दूसरों पर दोषारोपण करोगे। अभी अपना चश्मा ठीक कर दे। भगवान के सिवा कोई नहीं है। सच्चिदानंद प्रभु के बोले मन मेरे बस में नहीं। हम कहा नहीं उसको डांटिए। बोले नहीं है बस में। तो हम कहा आप अपनी बेटी की तरफ गंदी दृष्टि से देख सकते हो। बोले नहीं हम कहा बहन की तरफ।

बोले नहीं तो गुरु की तरफ कैसे देख सकते हो? केवल बकवास ऐसा तुम्हारा मन है। अगर ऐसा मन है कि जो तो फिर ऐसा भी कर सकता है नहीं तो फिर ऐसा कैसे कर सकता है? शासन में एक तरफ छूट दे दो। एक तरफ उसको नहीं ऐसा नहीं है। मन पर शासन बुद्धि का हो और बुद्धि पर शासन शास्त्र और सद्गुरु देव का हो तब चलता है। किसी के भी गुणों में तुम्हें दोष देखने का अधिकार नहीं है। तुम अपने दोष देखो। बुरा जो देखकर मैं चला बुरा न मिलिया कोई जो दिल खोजू आपनो तो हम सब बुरानो को पक्की बात है ईमानदारी से अगर बुराई देखने चलो तो अपने हृदय रूपी महल में घुस के देखो तो अभी पता चल जाएगा अनुसूया किसी के गुणों में दोष देखना सबसे बड़ा छिद्राषण सबसे बड़ा भजन मार्ग में बाधक भाव है कभी इसको अंदर मत आने देना आ जाए तो तत्काल प्रभु से प्रार्थना करना सरल स्वभाव रखो।

पवित्र वस्त्र रखो। पवित्र शरीर रखो। पवित्र विचार रखो। संतोष भाव रखो। प्रिय वचन बोलो। इंद्रियों को खुला मत छोड़ो। सत्य भाषण क्लेश सहो। जितने भी दुख आवे आनंद पूर्वक सहो। तो बोले ऐसे लक्षण भगवत प्राप्त महापुरुषों में अब वो भगवत प्राप्ति करने वाला है या भगवत प्राप्त होने ही जा रहा है जिसके अंदर यह लक्षण आ जाते हैं और भजन परायण रहता है हिंसा बलम साधु नाम राम दंड विवध बलम सुशातु बलम स्त्री क्षमा गुणवताम बलम दुष्ट पुरुष कटुक वचन और मारपीट करके अपना बल दिखाता है लेकिन जो साधु पुरुष होता है वह मुस्कुराकर सहकर अपने बल का दर्शन कराता है।

बलवान कौन जो दूसरों के द्वारा कट वचन विपरीत व्यवहार करने पर भी मुस्कुरा के चला जाता है। वही गुणवान है। वही बलवान है। वही क्षमावान है। इसलिए रे हे राजन मैं मधुर शब्दों में कह रहा हूं कि यदि तुम्हें भगवत प्राप्ति करनी है तो यह निद्रा तंद्रा भय क्रोध आलस्य दीर्घ सूत्रता इनको त्यागो गुणों में दोष मत देखो किसी के सरल रहो पवित्र भाव रखो संतोष प्रिय वचन बोलो इंद्रियों का दमन करो सत्य भाषण बोलो और जितना भी क्लेश दुख आवे चुपचाप सह जाओ नाम जप करो भगवत प्राप्ति हो जाएगी इन महान पुरुषों के वचनों का बार-बार मनन करो और अपने आचरण में उतारो।

कभी तुम्हारा कोई पुण्य दान आदि बन जाए तो ये तुम्हारा अहंकार अंदर से उठेगा कि उसका वर्णन करो मत करना। वो तुम्हारे बहुत काम आएगा आगे चलकर के। कभी किसी को पानी पिला दिया हो, कभी किसी को भोजन पवा दिया हो, कभी कोई दान पुण्य कर दिया हो, मौन रहना, पूछने पर भी मत बताना। कोई पूछे वृंदावन गए थे, कुछ तो खवाया पिया होगा। संतों को मत बोलो। अरे हमारे को खाने को नहीं। हम दूसरे को क्या खवा देंगे? हम ही को भगवान पवार रहे हैं। ऐसे अपने पुण्य को छुपाओ। और अगर कोई संत महापुरुषों का समागम मिले तो भगवत प्राप्ति के योग्य जो वचन निकल रहे हैं उनको ऐसे पकड़ो जैसे कोई गरीब आदमी संपत्ति को पकड़ता है।

और उन वचनों का बार-बार मनन करो। तो जैसे पात्र को मांजा जाता है तो निर्मल हो जाता है। ऐसे जब हम सत्संग के वचन चिंतन करते हैं तो हमारा मन, हमारा बुद्धि, हमारा चित्त, हमारा अहंकार ये निर्मल होने लगता है। निर्मल अहंकार भगवत स्वरूप है। इसलिए खूब नाम जप करो। सत्संग का मनन करो और इसी जन्म में हम भगवत प्राप्ति करें ऐसा निश्चय करो। शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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