॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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अगर जीवन में सुख-शांति चाहते हो, दु:ख और विपत्तियों से छूटना चाहते हो तो ये ध्यान से सुनो /11/07/25

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदावन तव पदारविंदम प्रेमाइक मकरंद रसोग पूर्णम हृद्यपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वापयत परम शीतल माशयाम निर्वापयत परम शीतल माया खजन मीन कुरंग ते सुंदर कंज से अंजन रंजित तैसे खजन कुरंग ते सुंदर कंज से अंजन रंजित तैसे दीघ गर्व भरे भगवंत चले जुग बाण मनो जह जैसे ताप पर तानत कान लोबर भ सरासन साध से प्यारी स्वरूप बिलो की नए बलि देख बिहारी के नैन जुसे श्री किशोरी जो ने देखा कि श्याम सुंदर नेत्र झुकाए हुए हैं।

तो पूछा तुम नेत्र क्यों झुकाए हुए हो? तो उस समय बिहारी जी के बोलने की भी हिम्मत नहीं थी। ऐसे प्रेम शिथिल थे। तो श्री ललिता जी ने कहा हे किशोरी जो ये आपके जो अंजन से रंजित और कमल की शीश शोभा वाले यह नेत्र हैं जो कुरंग अर्थात मृग खंजन पक्षी तथा मछली के नेत्रों से भी बहुत अनंत गुना सुंदर है। खंजन मीन मृगज मद मेटत कहा कहो नैनन की बातें। हे प्रियाजु आपके नेत्र सदैव विजय रहे हैं। और हैं इसलिए विजय होने के कारण यह गर्व भरे हैं। विशाल है। और चंचल हैं। यह दोनों नेत्र ऐसा लगता है मानो महामहिम प्रेम के अमोग दो बाण हैं।

भकुटिकाम को दंड नयन सर कज्जल रेख अन बेधत मोहन मन लालजू के मन रूपी मृग को बेधने के लिए आपके दोनों नेत्र महान प्रेम बाण हैं। और भकुटी रूपी बाण में धनुष में यह बाण संधान करके जब कज्जल रूपी नोक लाल जू के मन रूपी मृग पर प्रहार करते हैं तो ये शिथिल हो जाते हैं। प्यारी जो आपकी बलिहारी जाऊं आपके नेत्रों का ऐसा विलास है कि अखिल लोक चूड़ामणि इस समय बिहारी जो महाराज की सामर्थ्य नहीं कि आपके नेत्रों की तरफ देख सके। इसीलिए वह नेत्र झुकाए विराजमान है क्योंकि प्रेम विवश अंतर्दशा को प्राप्त है।

ऐसी हमारी महामहिम श्री बिहारिन जो है श्री श्यामा जो है जो उपासक अनंत करुणा वरुणालय श्री लाल जी की कृपा का भाजन बनता है। उसके हृदय में महामहिम प्रेम समुद्र का सार श्री श्यामा जी के चरणों की प्रीति उत्पन्न होती है और वह प्रीति दिव्य लीलाओं में प्रवेश करा देती है जो किसी अन्य साधना से नहीं प्रेम देवता मिले बिना सिद्धि होए न कारज भगवत सब सुखदान प्रकट भए रसिकाचार्यज जो सखियां रसिकाचार्य के रूप में प्रकट होकर श्री प्यारी जी की रस रीति प्रदान की। मंत्र प्रदान किया।

उसी रस रीति और मंत्र से प्रिया प्रीतम की दिव्य लीलाओं में प्रवेश होता है। इन लीलाओं का ऐसा सुख है कि मोक्ष सुख भी जो सर्वोपरि सुख है वह फीका लगने लगता है। प्रिया प्रीतम की रूप माधुरी, लीला माधुरी, गुण माधुरी ये मोक्ष सुख को भी फीका कर देती है। कभी आप मोक्ष सुख का परिचय नहीं जानते क्योंकि अभी तो भोग से ही नहीं ऊपर उठे। विषय आनंद से ही ऊपर नहीं उठे। अभी जगत के जो विषय आनंद है उसी में मन फसा हुआ है। मोक्ष सुख तो अखंड है। दिव्य ज्ञानंद है। जहां अचाह स्थिति है।

कोई चाह नहीं वह सुख भी लघु हो जाता है। जब प्रिया प्रीतम की रूप माधुरी प्रकाशित होती है। श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज कह रहे हैं सदा खेलन नित्य स्मर तरल राधा मधुपति सुर विद्यामय सकल धामो परिसदा स्वधुर्य जल्याद भित रसवा भव कृद भूम प्राप्तम वृंदावन महो को न भजते यह हमारे प्रिया प्रीतम यहां खेल रहे हैं। यह प्रिया प्रीतम की नित्य क्रीड़ा भूमि है। निरंतर क्रीड़ा भूमि है। यहां निरंतर खेल हो रहा है। इसीलिए यहां वास की बहुत बड़ी महिमा है। कदावा खेलंतो ब्रज नगर विथ हृदय हरंतो श्री राधा ब्रजपति कुमारो सुकृति कभी यह खेलते खेलते दृष्टि पड़ी कि इसका जीवन वृंदावन का आश्रय वृंदावन का वास अर्थात मेरे द्वार पर पड़ा है।

इनकी करुणा दृष्टि पहुंच गई। वहीं से जीवत्व खत्म अविद्या खत्म वो दिव्य भावात्मक देह से युक्त होकर प्रियाल की खेल में क्रीड़ा में लीला में वो सम्मिलित हो जाता है। सुकृतवान शब्द आया है कदावा खेलंतो ब्रज नगर विथ सु हृदयम हरंतो श्री राधा ब्रजपति कुमारो सुकृति ना क्या पुण्य की इतनी ताकत है कि मुझे प्रिया प्रीतम से मिला सकता है जबकि शास्त्रों में शुभ को भी बंधन माना गया है। अशुभ बंधन लोहे की जंजीर और शुभ कर्म सोने की जंजीर बंधा दोनों से है तो बंधन का हेतु शुभ भी है।

जब शुभ और अशुभ दोनों का नाश हो जाता है तब वो प्रियाल की सेवा योग्य भाव दे को प्राप्त होता है। इसीलिए शरण निरापक पद रमित सकल अशुभ शुभ नंस देत सहज निश्चल भगति सु जय जय श्री हरिवं तो यहां कौन से सुकृत की बात कह रहे हैं जिसने रसिकों का संग किया ये सबसे बड़ा सुकृत श्री हरिवंश सुधर्म दृढ़ अरु समझत निज रीति तनको हो सेवक सदा सु मन क्रम वचन प्रतीति मन मन कर्म वचन प्रतीति प्रीति दिन चरण पखारो इनके चरण पखारने को मिले इनकी जूठन खाने को मिले इनके श्री मुख से जो भगवत चर्चा है उसका अमृत की पान अमृत की भांति हम पान करें हमारी श्रवणेंद्र कभी तृप्ति का ही अनुभव ना करें यह सुकृत प्रिया लाल के प्रेमी जनों का चरणामृत उच्छिष्ट अमृत उनकी की आज्ञा में रहना हो दरस परस अग्नाश वास निज संग करो दिन उनके दर्शन मात्र से पाप का नाश कहीं स्पर्श हो जाए वास उनके समीप मिल जाए कहीं उनका संभाषण सुनने को मिल जाए यह महान सुकृत सेवक जी महाराज जैसे कह रहे हैं कि श्री हरिवंश प्रसिद्ध धर्म समझे ना अलप तप हरिवंश धर्म को छोटी तपस्या वाला नहीं समझ सकता बड़ी तपस्या चाहिए।

तो बोले इसमें बड़े तप का आपका क्या प्रयोजन है कि बड़ा तप क्या हो सकता है? श्री हरिवंश प्रसिद्ध धर्म समझे ना अलप तप समझो श्री हरिवंश कृपा क्या सेवो धर्मिन जप भगवत रहस्य के ज्ञाता जो रसिक महापुरुष जन है इनकी सेवा ये सबसे बड़ा तप ये सबसे बड़ा सुकृत जो रसिकों की सेवा में है तो कभी खेलते खेलते प्रियाल ऐसी ऐसी करुणा दृष्टि देते हैं कि उसका जीवत्व अविद्या नष्ट हो जाता है और वह प्रियाल के प्रेम रहस्य का ज्ञाता हो जाता है। यह समस्त कलाएं निकुंज की प्रियाजु की कृपा दृष्टि से प्राप्त होती है।

यह किसी शिक्षा से और से नहीं स्वयं चला कलास कुशली कृता न कदा सुरास मधुरोत्सवे किमपत स्वामिनी जो ही स्वामिनी अपनी प्रसादी देकर के उसे सहचरी वपू धारण कराती है तो अनंत विद्या संपन्न समस्त कलाओं में प्रवीण प्रिया प्रीतम की रस रीति का ज्ञाता वो रसिक महापुरुष निरंतर प्रियाजू की सेवा में रथ हो जाता यह दिव्य बात है। श्री धाम वृंदावन के रसिकों का संग, उनकी सेवा या अहोभाग्य प्रायः जब भगवत कृपा होती है और अवसर मिलता है तो लोग खो देते हैं। कभी सेवा बन गई तो वह अहंकार कर बैठते हैं।

मैंने अमुक कार्य किया, मैंने अमुक किया। वह सब नष्ट हो जाता है। अपनी की हुई भागवतिक वृत्ति तपस्या साधना दान पुण्य कभी अपने मुख से उच्चारण नहीं करना चाहिए। दूसरा प्रशंसा करें तो कानों में अंगुली दे देनी चाहिए। नहीं सुनना चाहिए। नहीं सुकृत नष्ट हो जाते हैं। साधन का जो फल है वो आपको फिर नहीं प्राप्त होगा। प्रशंसा अपने मुख से करने से बचे और दूसरे के मुख से प्रशंसा सुनने से बचे। दूसरे की निंदा अपने मुख से करने से बचे और दूसरे के मुख से सुनने से बचे। अपनी निंदा आनंद पूर्वक सुने।

अपनी निंदा करने वाले का सम्मान करें। अपनी प्रशंसा स्वयं ना करें। दूसरा जो अपनी प्रशंसा करे उसका सम्मान ना करें। यह भागवतिक सिद्धांत बहुत उल्टा है। इसे जल्दी सांसारिक प्राणी नहीं समझ पाते। सांसारिक प्राणी जो हमारे अनुकूल चले, प्रशंसा करे, हम उसको आदर देंगे। लेकिन भगवत भक्त ऐसा नहीं करेगा। अनुकूल चलने वाले के प्रति प्रशंसा करने वालों के प्रति प्रणाम नमस्कार करने वालों के प्रति उदासीन वृत्ति रहती है। अपमान निंदा करने वालों के प्रति प्रिय भाव रहता है।

बिल्कुल उल्टा बिल्कुल उल्टा संसार में अपमान निंदा करने वाले के प्रति तिरस्कार भावना रहती है। सम्मान प्रियता अनुकूलता इसके लिए फिर हृदय में आदर बुद्धि होती है। ओ ये तो बहुत अच्छा आदमी ये है सांसारिक भाव। परमार्थ बिल्कुल इससे उल्टा है। इसको धारण कीजिएगा। अपनी प्रशंसा कभी अपने मुख से ना करे। अपनी प्रशंसा जब कोई कर रहा हो दूसरा तो कान में अंगुली दे दे। सुने ना। दूसरे की निंदा कभी अपने मुख से ना करें। कोई दूसरा कर रहा हो तो कान में उंगली दे दे। अपनी जब कोई निंदा कर रहा हो तो प्यार भरकर सुनना चाहिए।

कैसा लगता है? अपनी जब कोई निंदा कर रहा हो और हम प्रियता में भरकर सुने। भगवान की कितनी कृपा है। आज मुझे सहनशील बनाने के लिए कैसा सुंदर प्रयोग कर रहे हैं। हम मुस्कुराकर अपनी निंदा सुने। अपनी निंदा करने वाले का आदर करें। तब हमारे जो सुकृत होंगे वह प्रियाल कृपा करके सार्थक कर देंगे। सुकृतों का सार्थक होना है। प्रियाल करुणा करके हमारे नेत्रों में झलकने लगे। हमारा मन उनकी स्मृति में उनके नाम जप में निरंतर लग जाए। श्रीपाद कह रहे हैं यह सदैव श्यामा श्याम वृंदावन में खेलते रहते हैं।

जितने अविद्याय धाम है मायाकृत लोकों को अविद्याय कहते हैं। एक विद्यामय है। कैलाश, साकेत, वैकुंठपुरी, द्वारिका ये सब दिव्य विद्या में है। कह रहे विद्यामय और अविद्या मेंय इन सबसे परे यह महा प्रेममय श्री वृंदावन धाम है। इस सात धामों का मूल वृंदावन का जो प्रेम रस है यह बिना श्री जी की कृपा से नहीं मिलता। आपका वृंदावन आना, वृंदावन दर्शन करना, वृंदावन वास करना, सत्संग मिलना ये केवल श्री जी की कृपा से है। अब विश्वास करो जब श्री जी ने इतनी कृपा कर दी है तो वो मिलने वाली पूरी वृत्ति बना दी।

अब मिलना बाकी है। यह आपको संभालना है। सबकी कृपा आपके ऊपर है। अब आपको अपनी कृपा अपने ऊपर कर लेनी है। अपनी कृपा गलत आचरणों वाले मन को धिक्कारना। सही संग, सही विचार, सही क्रिया इसका आदर करना जो शास्त्र प्रमाणित है। ये अपने ऊपर कृपा आप कर रहे हैं। भगवन नाम जप करना भगवन लीला गुणानुवाद भगवत भक्तों के चरित्र भगवत भक्तों का संग दूसरों की परोपकार भावना परहित भावना इसका आदर करो दूसरों का अहित प्रपंच वार्ता काम चिंतन काम क्रीड़ा ये सर्वनाश करने वाली बात इसका त्याग करो यह होगा अपने ऊपर कृपा करना गुरु की कृपा हो गई।

शास्त्र की कृपा हो गई। श्री जी की कृपा। अब अपनी कृपा बकाया रह गई। आप जो प्रमाद स्थिति में समय काटते हैं अपने ऊपर कृपा कर लीजिए। देखो बिना आसनों का अभ्यास किए कोई उधरता ब्रह्मचारी नहीं हो सकता। यदि आप आसन में नहीं बैठते हैं कम से कम दो घड़ी 48 मिनट आप ब्रह्मचर्य रह ही नहीं सकते। कागज में लिख लीजिए चाहे दिमाग में लिख लीजिए। यह अनुभव गम में बातें कह रहे हैं। आप प्राण वायु का संशोधन नहीं करते हैं। आप अंदर मंत्र नहीं चलाते हैं। आप ब्रह्मचर्य रह ले। असंभव बात है।

बिना किसी क्रिया के उसका पतन हो जाएगा। सिद्धासन उधरेता ब्रह्मचारी जी के लिए अत्यंत आवश्यक है। आदर का पात्र वही है जो उर्धरेता हो जाता है। अगर सिद्धासन में नहीं बैठे तो उधरता की गुंजाइश ही नहीं है। प्राण संशोधन नहीं है तो निरंतर मंत्रवत्ति चला ही नहीं सकते क्योंकि स्थूल प्राण है। मंत्र तो सूक्ष्म प्राण में निरंतर चलते हैं। हमारी प्रार्थना है सेवा करो 24 घंटे में एक घंटा ही सही पर जवान साधक को सिद्धासन और पद्मासन का अभ्यास करना चाहिए। जिस समय हम 24 मिनट क्रॉस करेंगे आसन में बैठकर तो हमारे शरीर में भयंकर पीड़ा होगी।

जांघों में हर नस नाड़ी में वह पीड़ा बड़ी अमृतमई होती है। शरीर को निरोग कर देती है। चर्बी को भस्म कर देती है। वायु को शांत करके सूक्ष्म करती है। जो आसनों पर बैठने वाला है। ब्रह्मचारी है। प्राण संशोधन प्राणायाम के द्वारा करता है। बहुत सुंदर मंत्र चलता है। निरंतर जवान जवान साधक हैं। झुक के बैठना। दीवाल का आश्रय ले लेना, शरीर का रोग ग्रसित हो जाना। यह सूचना देते हैं कि आप ब्रह्मचर्य की हानि किए हैं। आपका आहार ठीक नहीं है। आपकी साधना ठीक नहीं। असाध्य रोग आकस्मिक पूर्व पाप के परिणाम स्वरूप आ जाना यह हो सकता है।

पर वो हमारी साधना को बाधित नहीं कर सकता। प्रारब्ध साधना को बाधित नहीं कर सकता। ध्यान रखना प्रारब्ध आया है उसको भोगेंगे। साधना यथावत चलनी चाहिए। साधना में फर्क नहीं पड़ना चाहिए। तब भगवत आनंद की प्राप्ति होती। इसीलिए कह रहे हैं हमारे ऊपर सब कृपा है। केवल अपनी कृपा करने की जरूरत है। आप लोग अपनी कृपा कीजिए। जैसे हम कहते हैं कि हमारे शरीर में ब्लड प्रेशर का रोग हो गया। हाई या लो। वह थोड़ी देर के लिए है। थोड़ी देर के लिए हमको शिथिल कर सकता है। लेकिन नहीं वो हमारे साधन को नष्ट नहीं कर सकता।

वो हमारे साधन को नहीं। हम सम में है ब्लड प्रेशर हाई या लो विषम में है। कोई फर्क नहीं पड़ता। और हम विषम चिंतन करते हैं तो ये सब सही भी हो तो गलत है। हमारा विचार हमारी साधना प्रारब्ध नहीं बाधित कर सकता। ध्यान रखना। प्रारब्ध पाप कर्म का परिणाम है। वर्तमान की हमारी साधना भागवतिक है। हमारी भागवतिक साधना को आच्छादित कर दे। इतनी बड़ी सामर्थ प्रारब्ध में नहीं है। प्रारब्ध बाधा खड़ी करता है। लेकिन हमारे भजन को नहीं रोक सकता। हमारी भागवतिक उन्नति को नहीं रोक सकता।

लेकिन हम लोग इससे बेपरवाह से नजर आते हैं। धिक्कार है उस शिष्य को जब गुरु को आज्ञा देने में सोच करना पड़े पता नहीं मानेगा कि नहीं मानेगा। इसीलिए परमार्थ की दिव्यता प्रकाशित नहीं हो रही। जीना समय काटना गुरु कृपा से कल्याण हो जाना ये सब हो जाएगा। इस पर कोई चिंता की बात नहीं। लेकिन जीते दी अध्यात्म की भूमिकाओं पर विचरण करना ये अपने ऊपर कृपा करना है। प्यारे यह बहुत कीमती शरीर है। आपका कल्याण तो निश्चित है। लेकिन यदि आप यहां हजारों का कल्याण करके नहीं गए तो आपका साधु भेश धारण करना किस काम का?

अपने कल्याण के लिए तो कोई खास बात नहीं। हमारी साधना अपने कल्याण के लिए नहीं होती। ध्यान रखना हमारा कल्याण तो जिस दिन हम गुरु की शरण में हुए उसी दिन हो गया। अब हम साधना करते हैं इस जगत मंगल के लिए। साधु का पूरा जीवन परोपकार के लिए होता है। परहित के लिए होता है। दूसरों के दुखों का नाश करने के लिए होता है। रात दिन भजन करके फिर संकल्प बनता है। सर्वे भवंतु सुखिना सर्वे संत निरामया। इसलिए पूरा जगत उसे नमस्कार करता है। आप सबसे प्रार्थना है इस नाशवान मलमूत्र बनाने वाले शरीर को प्रिय मानकर केवल खानपान विश्राम शयन इसी में काटते रहोगे।

जीवन रंग नहीं लाएगा। रंग ना लाने के लिए गुरु आज्ञा की कसौटी में कसना होगा। तब आप प्रियाल की सेवा के आभूषण बनेंगे। तब आप प्रियाल के श्रृंगार सेवा में आएंगे। बिना कसौटी में कसे बिना आग में तपे निर्विकार नहीं होता। एक बार हिम्मत करो। तुम शरीर नहीं हो। ये शरीर छूटेगा। तुम्हें दिव्यता प्राप्त करनी है। दिव्य पार्थिव शरीर की आसक्ति वाला नहीं अनुभव कर सकता। इससे ऊपर उठो। बहुत घटिया सोच है। यदि यह सोच बनी रहे कि मुझे अच्छा खाने को मिले, अच्छा सोने को मिले, अच्छा रहने को मिले।

बहुत घटिया सोच है। रात के 12:30 बजे जग गए। अपनी दिनचर्या में लगे। 10:30 बजे तक लगे रहेंगे। फिर जाके अपनी ये हम इसलिए कह रहे हैं कि आप स्वस्थ हैं और आप कमाई नहीं कर पा रहे हैं। चाहे गृहस्थ हो या विरक्त। अरे मरना है यार जाना है यहां से अच्छी नाम की कमाई कर लो अच्छी अध्यात्म की उन्नति कर लो लाखों का कल्याण कर दोगे सतर सतरति सा लोकांत हमारा जन्म दूसरों का मंगल करने के लिए हुआ है आप विश्वास कीजिए बहुत घाटे का सौदा हो रहा है बहुत घाटे का किसको चढ़ाएं किसको उत्तम रीति में पहुंचाएं जब तक हमारी आज्ञा पर तुम बलिदान होना नहीं चाहोगे तब तक नहीं बन सकता।

पंच प्यारों की रचना जानते हो कैसे हुई थी? हमें तुम्हारा रक्त चाहिए। तुम्हारी गर्दन चाहिए। खड़े हो सभा में कौन? तो एक खड़े हुए अंदर गए और ऐसे रक्त की धारा चल पड़ी। अब दूसरा कोई खड़ा हो। पांच केवल खड़े हुए थे लाखों की सभा में। फिर पांचों को निकाल के लाए क्योंकि कांटा नहीं था। वहां केवल लीला की थी। अन्य रक्त की लीला केवल हुई थी। वहां किसी की हिंसा नहीं हुई थी। सब आश्चर्यचकित हो गए। ये है पांच और एक एक से इतनी सामर्थ भर दूंगा कि सवा लाख को एक परास्त कर देगा।

परम पूज्य श्री गुरु गोविंद सिंह के वचन। एक को सवा लाख परास्त करने वाली सामर्थ तैयार करो। क्यों? प्राणों को बलिदान कर दिया। हे नारायण अति कठिन है हरि मिलन की बाट या में पग पीछे धरे प्रथम शीश काट चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त दिव्यानुभूति के लिए तुम्हारा मानव शरीर मिला है पार्थिव भोगों के लिए नहीं पर इसमें आपको अपनी कृपा करनी बकाया रह गई सब कृपा आपके ऊपर है आप अपनी कृपा कर ले इसमें हमें सब घाटा नजर आ रहा है गुरु कृपा धाम कृपा इष्ट कृपा शास्त्र कृपा गुरु लाखों ने बनाया लेकिन गुरु की बात मानने वाला कोई बिरला ही है।

ऐसा नहीं कि नहीं है। पर वो इतने में अंगुली में गिने जाए तो एक साधु जब साधना करता है तो प्रांत के प्रांत को पावन कर देता है। और सैकड़ों साधु जहां भजन करे तो राष्ट्र को पावन करने की सामर्थ्य रखते हैं। इसलिए जगो मोह निद्रा से जगो तुम मानव नहीं हो तुम भगवान के दिव्य अंश हो तुम्हारा जन्म ही हुआ है दिव्यता के लिए पशुता के लिए तो अन्य योनिया है निद्रा भय आहार मैथुन ये पशुता है इसके लिए अन्य योनिया है तुम दिव्य नारायण स्वरूप हो हरि स्वरूप हो अपने स्वरूप की तरफ बढ़ो ये सब छोड़ो ये आंतरिक वृत्त को सुधारो भाई खानपान विश्राम यह कुछ नहीं है।

कुछ नहीं है। पूरा जीवन खाते खाते मर जाओगे। फिर भी रस्द तृप्त नहीं होगी। भोगते भोगते मर जाओ पर जनेंद्रिय तृप्त नहीं होगी। देखतेदे मर जाओ पर नेत्रेंद्र तृप्त नहीं होगी। ये कैसा झूठा नाटक? इस नाटक का पर्दाफाश करने के लिए तुम जन्मे हो। अपने हृदय के नाटक का पर्दाफाश करने के लिए। यही सुकृत है, यही तप है। और ऐसे हृदय वालों का आकर्षण श्री प्रियाल करते हैं। बिना देखे जीवन चला जाए तो धिक्कार है जीवन को। क्या देखना है? प्रिया प्रीतम को इनहीं आंखों से ऐसे स्पष्ट इन नैनन सब सुख देख अपनो जन्म सुफल कर ले।

इसके लिए श्रीपाद वर्णन कर रहे सुना धमनी ततो मजव केशो जत कथया कपी ने चर खंडक कृते ना सौम्या कृति तू का सकला धमा धम इवांतम विदुरे चरण श्री राधा पद दास लीन हृदयो वृंदावने श्याम कृति बोले इतना साधन में तन्मय है कि भोजन बहुत अल्प हो गया इसलिए सुक्षणा धमनी नस नाड़ियां एक एक गिन लो देखो यह है अपने ऊपर कृपा वो आपसे सच्ची कहते हैं कई कई दिन भोजन भोजन ना मिलने पर भी ना शक्ति का ह्रास और ना निराशा ना चेहरा उदास कैसे साधन बल आसनों में बैठने वाला प्राणों का संयमन करने वाला कभी भी तेज रहित नहीं हो सकता उत्साह रहित नहीं हो सकता क्योंकि उसके पास बहुत बड़ी सामर्थ्य है भजन ब्रह्मचर्य आसन प्राणायाम बहुत बड़ी सामर्थ्य है बहुत बड़ी किसी भी संप्रदाय का हो ये अत्यंत आवश्यक है।

अत्यंत आवश्यक है। कोई सुन नहीं रहा। यह अपने ऊपर कृपाए राग त्यागी वैरागी कहलाने वाले आप हैं। परमार्थ के पथिक हैं। सुक्षणा धमनी ततो मृजप केशो जरत कथया शरीर की एक एक नस नाड़ी गिन ली जाए ऐसी क्योंकि अल्पाहार पूज्यपाद दु बाबा पूज्यपाद मगनानंद सरस्वती जी महाराज श्री स्वामी अनंग बोधाश्रम जी रोटीराम बाबा एक सितवा बाबा ऐसेसे सिद्ध महापुरुष एक दिन सतवा बाबा जा रहे थे तो गांव में पहले शौच बाहर जाया जाता था तो एक लोटे में तीन माताएं शौच उनमें से एक ने कहा कि तुम्हें कितना तो बोले दो तीन चुल्लू बोले हाथ तो साफ नहीं हुआ होगा बोले आटा लगाना है साफ ही हो जाएगा उसमें विनोद

में उसने कहा आटा लगाने में तो साफ ही हो जाएगा उसी समय सेतु बाबा ने संकल्प लिया आ जीवन कभी कभी रोटी नहीं खाऊंगा तो अन्न भुंजवा लेते और उसे इतना ऐसा वो बड़े सिद्ध महापुरुष हुए रोटीराम बाबा जिस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी ये दर्शन करने जाया करती थी जैसे देवरा बाबा के बड़े सिद्ध महापुरुष रोटी बस हाथ में ऐसे रोटी ले ली बस उसी को बस यह छप्पन प्रकार के भोग प्रियाल पावे देखो स्वामी जी उत्तम भोग लगाए मोर मरकट को सेवे ऐसे प्रसाद बिहारी जी का ले लेते हो सब आप चना पा के हे भाई कमाने आए हो लक्ष्य पे तीर एकदम अमोग बाण की तरह जाना चाहिए यही समय यही समय कमाने का यही समय कमाने का यही समय गवाने का है।

जिसकी जवानी तप में उसकी वृद्धावस्था महान आनंद में जिसकी जवानी भोग में उसकी वृद्धावस्था दुर्गति में कागज में लिख लो। और जिसका प्रारंभ से भजन उसका अंतिम भगवदाकार निश्चित जिसका प्रारंभ विषयकार अंतिम बदलना बड़ा कठिन। यह जीवन की बातें कह रहे हैं। सुक्षणा धमनी ततो मृजवप कैसे कैसे तुम्हें बताएं लक्ष्य ही नहीं है तो कैसे बताएं लक्ष्य जब बन जाएगा तो नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वचन सुहावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आशिक का मग न्यारा है हलवा और गुलाब जामुन पाने वाले लाखों हो सकते हैं लेकिन प्रियाल के लिए आंसू बहाने वाले दो कहो हरिवंश रस बिरलो समझनहार एक दोई जो पाइए खोजी सब संसार सत्य सत्य परम सत्य बात कह रहा हूं परम कसौटी कस के अपने आप को झोंक दो तपस्या में अभी आगे प्रियाल मिल जाएंगे दिव्य अनुभूतियां बिना गुरु की आज्ञा पर चले दिव्या अनुभूतियां नहीं हो सकती है खा पी के मोबाइल से गंदी बातें देख के समय काट लो प्रिया प्रीतम की दिव्य लीला देखने का अधिकार नहीं प्राप्त कर पाओगे मान लो और एक बार चढ़ाई पर चढ़ जाओ तो सब खत्म हो गया।

साधन काल में एक कवल अन्न पूज्य पादुिया बाबा सिद्धावस्था में 70 घरों में एक दिन में भिक्षा पाने जाते थे। एक दिन में 70 घरों में अगर एक एक कवल पाते होंगे तो 70 कवल पाते। समझ लीजिए आप एक बार चढ़ाई पे चढ़ जाओ। खेल हो गया। भगवत साक्षात्कार हो गया। अब क्या तो बादशाह हो गए। घूमो। आनंद मगन घूमो। कोई परास्त नहीं कर सकता। पर चढ़ाई ही नहीं चढ़ रहे। बिना विजय हुए कोई सम्राट नहीं बनता। संतों को बादशाह का बादशाह कहा गया है। चाह मिटी चिंता मिटी मनवा बेपरवाह जिनको कछु ना चाहिए वो साहन के सा देखो तुम गुलाम हो या साहसा हो।

बड़ी विचित्र दुर्दशा है। बड़ी विचित्र दुर्दशा हे भाई जगो सुना धमनी तज केशो जया कभी एक मिनट जीवन में किसी के पास बैठकर के वार्ता करने की कभी रुचि नहीं रही। वार्ता करने की रुचि। यहां वृंदावन तक में ये बलराम ब्रजवासी जब मिलने आते थे तो सबसे ऊपर छत में पद्मासन लगाए बैठे। कभी जब दृष्टि खुलती तो देखते हाथ जोड़े खड़ा है। हे बाबा कुछ पाया है कि नहीं? ये ले ले प्रसाद पा लेना। हां ठीक है भैया रख दो अब आप जाओ कभी विश्वास कीजिए प्रपंच वार्ता हंसी मजाक मिलना जुलना आग लगाओ अंदर ये दूसरे के समझाने से नहीं होता है खुद की आग से होता है नई अवस्था है आपकी या परमार्थ में चल रहे हो चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो यह पेट बढ़ने का मतलब है साधन विहीन जीवन कर लेना।

सिद्ध पुरुषों के पेट बढ़े तो आनंद तोंद है। आनंद उनकी कोई बात नहीं। अभी कुछ देखा ही नहीं है। बढ़ने लगा चर्बी और मांस और ये सब बिल्कुल नहीं। बिल्कुल नहीं। 18 से 48 तक घोर तप में जीवन। फिर आगे जो सिद्धा अवस्था आ जाएगी आप खुद देख लोगे। कैसी आनंदमय वृत्ति होती है। हमारी प्रार्थना मान लो। आप सेवा में रत रहे लेकिन निरंतर चतुराशी जी नाम जप मंत्र जप चलता हुआ और जब समय मिले फौरन आसनों पर बैठ जाओ दो घंटे तीन घंटे विश्राम बस आसनों पर बैठकर के ही अपना समय व्यतीत करो जवान हो ब्रह्मचारी हो भगवत मार्ग के प्रतीक हो ततो मृजवपुहु आ कभी शरीर में साबुन तेल सांसारिक वस्तुएं में इनका प्रयोग मत करो।

वैसे प्राय नहीं करते। मत प्रयोग करो। कह रहे कि अमृज व साबुन लगा के इसके चमड़ी को चिकनी करके क्या तुम्हें संसार को दिखाना है। किसके साबुन घोर रजोगुणी वस्तु है। शरीर में नहीं कभी लगाना। अगर कभी जटा आदि की बात आती है धोने की तो शास्तुएं आती है रीठा आदि ऐसी घ के डाल लो जल डाल लो उचित साफ हो जाती है जीवन में कभी कभी नहीं गंगा मैया की कृपा से ग अपने आप निर्मल ऐसे कहीं भी तेल का कभी प्रयोग ना हो तो कभी ज नहीं पड़ सकते ध्यान रखना कभी जटा में कोई कीड़ा नहीं पड़ सकता यदि आपने तेल का प्रयोग नहीं किस बात का तेल का प्रयोग करना है क्यों चमड़ी चिकनी करनी है।

अब तो भाई सेटिंग फिटिंग सब पता नहीं चलता है कि क्या साधुता है। क्या वैराग्य की पद्धति क्या नियम कुछ पता ही नहीं चलता है। धातु स्पर्श करना बैरागी को मना तो 14 अंगूठियां पहने। बड़ा लगता है। बड़ा विचित्र लगता है। साधुता का बहुत सर्वनाश होता चला जा रहा है। सन्यास मार्ग और धातुओं की अंगूठी साधु और वचन की निष्फलता बिल्कुल झूठे शब्द बोले जा रहे। साधु भष रख के तब तक क्या है? परमार्थ का क्या स्वरूप समझा? साधु के वचनों पर विश्वास होता है। आप आएंगे जी कह दिया कि हां तो पांच मिनट पहले उपस्थित वहां आएंगे।

अगर बाधा हमारे पहुंचने में पहुंच रही तो सूचना पहले पहुंच जाएगी। क्षमा कीजिएगा। अमुक समस्या के कारण साधु के वचन ही होते हैं। अमार्जित शरीर केवल जल से धुल लिया। बस गंदी होनी चाहिए। चमड़े पागलों जैसी स्थिति शरीर की बनाओ। कभी दोनों कपड़े नए नहीं होने चाहिए। एक पुराना जरूर होना चाहिए। नीचे का पुराना ऊपर का नया ऊपर का पुराना तो नीचे का एक साथ कभी नए वस्त्र मत धारण करो। जो एक मर्यादा है उससे चलो। ततो अमृज वहु बस केवल जल से पवित्रता के लिए धो लिया। मलमल करके शरीर धोने की जरूरत नहीं।

जल डाल लिया पवित्रता के लिए और कह रहे केशो जत कंठया बालों को कंघा मत फेरो जटा रूप में परिवर्तित करो श्रीपाद कह रहे आज्ञा कर किसी किसी का स्वभाव होता है महीने डेढ़ महीने दो महीने में बना लेना वो बराबर दो ही मार्ग है एक जटा रखना एक पूर्वाभ्यास इस शरीर का रहा है 10 12 वर्ष में मुड़वा ले तो मुड़वा ले 10 12 वर्ष तक ऐसे पड़े रहने का किसी किसी का अभ्यास होता है जैसे पूज्य गुरुदेव भगवान प्रति दो महीने में दो ही पद्धतियां हैं वस्त्र कंथया कोपीनेन च चीर खंड कृते दो लंगोटी दो अचला एक ऊपर का ओढ़ने का जब तक ये फट ना जाए।

कोई दे रहा है तो स्पर्श किया जाता है। उसकी मर्यादा है। हमें नहीं चाहिए। ऐसे नहीं बोला जाता। कोई दे रहा है तो पहले उसे लिया माथे से लगा लिया फिर वापस कर दिया। बहुत अच्छा जो सुलझा हुआ अभी कर्नाटक से सन्यासी जी आए थे। उनको वस्त्र दिया लिया। ऐसे माथे पर लगाया और बहुत जो शास्त्र सम्मत साधु संघ के एक एक उनके आचरण प्रमाणित होते हैं। ऐसा नहीं कहा मुझे नहीं चाहिए लिया उन्होंने माथे पर लगाया सगा भी फिर इनको दे दिया ले नहीं चाहिए हमें हमारे पास है बस साधु है बहुत अच्छा लगा बहुत अच्छा लगा शरीर कैसा बोले एक एक नस एक बार चढ़ एक बार चढ़ जाओ प्यारे एक बार चढ़ जाओ इस अध्यात्म की ऊंचाई पर पहुंचने के लिए एक बार अविद्या को छीर करो ये शरीर अविद्या है अविद विद्या घोर अविद्या इससे प्रीति मत करो मत करो यावत स्वस्मद कलेवर याव दूर जरा कैसे सच्चाई से यार हमारी इच्छा है एक बार हमने सभा में

इसीलिए आज बात रखी हमारी इच्छा है एक बार प्राणों की परवाह छोड़कर एक बार ऐसे साधन में लगो जिससे प्रियाल की प्राप्ति हो जिससे प्रियाल की दिव्यता हो और उस दिव्यता से हम जगत मंगल कर सके एक दिन बलराम ब्रजवासी ने कहा बाबा तुम हो तो चल रहा है सत्संग सुनने को मिल रहा है तो तो आप चले गए तो फिर क्या होगा तुम कहा ये बगीचा है हमारी श्री जी का लगा हुआ इसमें कोई ना कोई तो तैयार करेंगे ही श्री जी वही बात तैयारी की हृदय में की बिना तप के बिना साधना के साहब नौटंकी

नाटक होता है प्रवचन करना ये चार को रिझाना हां बहुत नौटंकी नाटक क्या समझते हो? देने वाले जो आते हैं ना संसार के भोगों को देते हैं। ये पैर पूजवाते हैं। ये चाकरी करवाते हैं। साधु से करवावे सेवा नरक जाते हैं। बहुत गंदा संसार का सब उठो और अपनी दिव्यता को पहचानो और ऐसी शक्तियों को संचय करो कि ऐसे कभी ना करना पड़े। हम चाहते हैं कि अध्यात्म की ऊंचाई पर हम चढ़ावे। हमारी बात मान लेना अगर ब्रह्मा की भी ताकत नहीं कि तुम्हें गिरा दे हम आपको बहुत बड़े बल से संयुक्त होकर कह रहे हैं पर हमारी आज्ञा पर चलने के लिए बस गुरुदेव भगवान कह रहे थे कि बस मान लो जान जाओगे सुनना मत किसी की मान लो मेरी बात अक्षरशा गुरु के वचन परम सत्य तुम किसी की सुनना मत अर्थ मत पढ़ना जान जाओगे अपने आप मान लो मेरे लगे रहो नाम वाणी में लगे रहो नाम वाणी में सब जान जाओगे एक एक अक्षर महाराज का बिल्कुल साक्षात्कार होते हुए जीवन में एक एक अक्षर

कौपीनवता खल भाग्यवंता बहुत बड़ा भाग्यशाली होता है जो कोपीनता लंगोटी धारण करने का मतलब समझते हो लंगोटी लगा लिया तो काछवा मन निश्चल राखे धन धन जननी तेरी रे यह फिर हम आ गए उसी लाइन पर बार-बार कह यह जिनके पास मोबाइल हो टच वाला इस दुश्मन को छोड़ो सत्संग के बहाने कुसंग नहीं सत्संग सुनने के लिए और यंत्र रखो अभी हमको किसी ने दिखाया था कि 700 घंटे सत्संग सुन सकते हो इतनी बड़ी चिप में वो लगाओ वो सत्संग सुनो मत रखो ये टच वाला मोबाइल कि यही अवस्था है दिव्यता

की तरफ चढ़ने की अरे कोई समझाने वाला नहीं था। तब हम आग में पैर रखकर चल रहे थे। आगे बढ़ो। चाहे गृहस्थ हो, चाहे विरक्त जब तक तप में जीवन, पवित्र जीवन, निष्काम जीवन नहीं तब तक अध्यात्म की ऊंचाई नहीं मिलेगी। कल्याण बहुत छोटी बात है। कल्याण तो पुत्र के बहाने नारायण बोल दिया तो कल्याण हो गया। कल्याण करने हम नहीं आए। हम बाबा जी लोग हैं। जगत का मंगल करने आए हैं। अपना मंगल तो हो गया। जिस दिन घर से निकले थे प्रभु के लिए उसी दिन हो गया। एक बार कोई भगवान की शरण में हो जाए तो आजीवन निर्वाह करते हैं।

हमारा उद्देश्य जगत मंगल सतति सतति सालोकति आ कैसे प्रियाल का प्रेमी जन होता है बोले सुक्षणा धमनी ततो अमृज केशो जत कथया एक एक नस नाड़ी दिखाई दे रही है ततो अमृज कभी शरीर साफ नहीं करते बस स्नान कर लिया मल लगा हुआ है। ऐसे रज लगी हुई है। केशव जरत जटाएं बन गए हैं। बहुत बड़ी स्थिति के लिए तुम लोगों को श्री जी ने निकाला है घर से। अब चूकना नहीं। अब ये प्रमाद स्थिति मुझसे सही नहीं जाएगी। आपकी प्रमाद स्थिति नहीं सही जाएगी। उठो केशो जर कथया हर साल नए कंबल हर साल नए वस्त्र हर साल नई वस्तु अरे कभी तो रोको कि मुझे नहीं चाहिए तो मुझे शीतलता लगे नहीं चाहिए कंबल से सर्दी थोड़ी रुकते हैं जवान साधु ब्रह्मचर्य तपस्या आसन इनसे सही जाती कभी जिंदगी में स्वेटर गरम साल बनियान ये सब कभी जिंदगी में नहीं ये तो अब शरीर अश्वस्थ है भगवान जैसे रखे कभी नहीं पूछ लेना बलराम ब्रजवासी है कि जब बहुत सर्दी थी बोले बाबा का व्यवस्था करें तुम अगर कर सकते हो तो अपने तुम्हारे यहां गेहूं का वो व्यापार होता है आटे का उसका बोरा ले आओ तो बोले सिल के ले आएंगे शाम के ले आया वही वो उड़ते थे एक कुशासन पड़ा है बोरा डाल लिया ऊपर समय काट लिया अपने दो बजे से परिक्रमा शुरू वृंदावन की ये परिक्रमा नाम जप साधना ये सब दिव्यता भगवत प्राप्ति के लिए है।

कोने चीर खंड कृते कपड़ा जब तक पहनने लायक हो तब तक दिखावटी नहीं होना चाहिए। हम कभी एक कल परसों एक साधक से कहा बहुत एकदम मलिन हम कहा देखो दिखावटी नहीं स्थिति में मलिनता वो तो ठीक है वस्त्र की लेकिन दिखावटी नहीं दिखावटी दिखता है अच्छे कपड़े ऊपर जब है तुम्हारे पास तो ऊपर डालिए एक नीचे मलिन पहनिए दिखावटी मत कीजिए कि कोई कहे कि तुम बहुत वैराग्यवान हो दिखावटी नहीं वो अंतर की स्थिति दिखाई देती है और कह रहे हैं शांत स्वभाव से समस्त दंदों को सहना भाई इस शरीर को जितना तुम ढीला करते जाओगे उतना ही आपको परास्त करता जाएगा कैसे आनंद की अनुभूतियां अनुभव करोगे जब शरीर ही राग में फंसे हुए ये अंदर खजाना है आनंद का खजाना है चिल्ला चिल्ला कर रो पड़ोगे इतना आनंद है आनंद का रुदन लौटो देह भाव से लौटो अपने अंदर लौटो हमारी बहुत अंदर कल से चिंतन चल रहा है।

लौटो व्यर्थ का समय नहीं। ये जो समय चल रहा है आप ये समझ लो किसी युग में ऐसा समय नहीं चला जैसा अब चल रहा है। कलिकाल में तो चलेगा ही नहीं। ये तो केवल अभी कुछ वर्षों का समय चल रहा है। बस यह समय आया है आनंद लूटने का। भगवत प्राप्ति का लूट लो भगवत प्राप्ति कर लो ना पीछे समय था और ना आगे समय ऐसा रहेगा। बहुत बढ़िया समय है। इस समय बहुत बढ़िया समय भगवत प्राप्ति के लिए। मान लो नहीं पछताओगे। चुपचाप इसमें कह रहे हैं चीर खंडक कृते ना सौम्या कृति तणी का सकला अधमाधम सबसे मैं नीच हूं ऐसा मानकर इव्यंतम विदुरे चरण जहां विषय पुरुषों की वार्ता हो रही विषय भोगों के दूर हटकर शांत एकांत चिंतन क्या बोले श्री राधा पद दास लीन हृदयो श्री किशोरी जी के चरणारविंद की दासता में हृदय लीन है।

वृंदावन श्याम कृति कोई ऐसा वृंदावन में कृतार्थ करने वाला ऐसी रहनी से रहने वाला ये आपको कौन सी अब बाधा है? क्या क्या आपको कौन रोक रहा है? उत्तम स्थिति प्राप्त करने के लिए किसी भी बड़े महापुरुष का चरित्र पढ़कर देखो बिना तप के कुछ नहीं बिना तप के कुछ नहीं तप में जीवन व्यतीत हो ये रसगुल्ला कभी खत्म नहीं होंगे कभी भोजन के अच्छे-अच्छे जो पदार्थ कभी खत्म नहीं होंगे ये माया है माया ये बढ़ाती चली जाएगी क्या खाओगे रोज खाओ रोज खाओ रोज मरो कुछ नहीं है इसमें आओ अपने संयम में आओ एक रोटी दो रोटी का नियम बनाओ रात दिन भजन में तब आप समेट पाओगे तब समेट पाओगे तप को जितना एकत्रित कर लोगे उतना ही प्रभाव आपका पड़ेगा जगत मंगल के लिए ये साधु भेष केवल जगत मंगल के लिए मान लो मेरी प्रार्थना अपना कल्याण तो ये पैसा इकट्ठा करने के लिए पेट भरने के लिए आराम व्यवस्था के लिए नहीं मरना है यार क्या आराम मरना है क्या सजाओगे इस शरीर को चिता में रख करके इसे लकड़ी की तरह जला दिया जाएगा।

बिल्कुल बिल्कुल सावधान ये सत्संग केवल भगवत प्राप्ति के लिए केवल भगवत प्राप्ति के लिए श्रीपाद कह रहे हैं कि वी दिव्या लक्षिर च सुषमा सौरभ घण लक्ष जिम्या करण श्रवण विति वित गु द पटते य च कोट नम नो तप्त में तथा प्रतम परमानंद वृंदावन वृंदावन अब आपकी कृपा हो गई है तो ऐसा लगता है आप कृपा करके हमें लाख नेत्र दे दो लक्ष लाख आंख नेत्र तो मैं आपकी शोभा को देख पाऊं। दो नेत्रों से नहीं देख पा रहा। ऐसी दिव्य शोभा है। पर इस दिव्य शोभा को देखने के लिए चाहिए। एक तो भगवान कभी अनुकूलता ना दे।

भरतरी जी से जब भगवान शंकर प्रसन्न हुए, प्रकट हुए तो कहा वरदान मांगो। तो उन्होंने कहा प्रभु कभी मुझे जीवन में सम्मान ना मिले और सम्मान से कभी भिक्षा ना मिले। ये वरदान दीजिए। भरतरी चक्रवर्ती सम्राट थे समझो कभी भगवान अनुकूलता प्रकट की ना दे साधना की दे प्रगट भोगों की अनुकूलता कृपा करके ना दे सदैव प्रतिकूलता देते रहे जिससे हम भगवान की तरफ बढ़ते रहे कुछ ऐसे विज्ञ साधक हैं तीन वर्ष हो गए अभी तक कूलर नहीं लगाया गर्मी में जब हमें पता चला तो आज आदेश किया उसको तुरंत व्यवस्था उसने कहा नहीं हम अपना स्वभाव नहीं बिगाड़ना चाहते आप आज्ञा करेंगे तो पालन करेंगे पर हमारा यही आंतरिक भाव कि हम अपना स्वभाव नहीं बिगाड़ना चाहते कहा धन्यवाद चलो हे जब अपने मार्ग में चले ना तो हमको भगवान ने प्रतिकूलता ही दी यही पड़ोस में हमारे कमरे की बिजली काट दी गई थी क्यों ईर्ष्या इतनी प्रबल तो जानते हो कितना आनंद होता है।

थोड़ी देर पसीना से लथपत फिर पूरा शरीर शीतल ना ऊपर छत में जाना ना कोई यंत्र और कोई अगर वो एक छोटा सा पंखा ऊपर लगा था आश्रम की व्यवस्था से तो भगवान की कृपा से जहां से हमारे कमरे का कनेक्शन था बिजली काट दी पूरी गर्मी सर्दी बरसात सीधे प्रकृति का वारसा हो देहातीत स्थिति में जो आनंद है वो इन सुविधाओं में नहीं है नरक है सुविधाएं नरक पापी पुरुष भी इसी में बैठा है पापी पुरुष भी लेकिन तुम जिस एसी के लिए आए हो हृदते मधुपते स्मर ताप निवापत परम शीतल माशयामि ये ऐसी चाहिए गोरे चरणारविंद की शीतलता की हे वृंदावन मेरे नाक नाश जो ये घणेंद्र है ये दो है इससे मुझे लाभ नहीं मिल रहा लाख लाख कर दो जिससे मैं प्रिया प्रीतम के श्री अंग रंग की गंध ले पाओ।

हे वृंदावन मेरे लाखों काम दे दो जिससे मैं तुम्हारी महिमा सुनू। प्रिया प्रीतम का यश सुनू। हे वृंदावन मैं कोटि कोटि चरणों से बार-बार तुम्हारी प्रदीक्षणा और तुम्हारे गलियों में भ्रमण करना चाहता हूं। ऐसा कृपा कर दो। यह हमारी भावना। हमारी भावना इतनी सुंदर बन जाए कि प्रभु की चर्चा प्रभु का रूप प्रभु के शंग की चढ़ी हुई तुलसी पुष्पा आदि यही हमारा जीवन बन जाए भोग वासना हम जिन महापुरुषों को देखा है उत्तम अवस्था में पहुंचे हुए ये सब भष धारण करके मनमानी आचरण करना भोगों में रति रखना ये तो ऐसा समझो कि चक्रवर्ती सम्राट का पोशाक रख के फुटपाथ में एक एक रुपया मांगना ऐसा समझो व्याकुलता होनी चाहिए हमें भगवत तत्व के साक्षात्कार की वो मुझे नहीं दिखाई दे रही जैसे एक दृष्टि ललकती है ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष के दर्शन के लिए ब्रह्म तो सब है लेकिन ब्रह्म बोध तत्वज्ञ महापुरुष के दर्शन के लिए दृष्टि प्यासी है।

भगवत प्रेमी महापुरुषों के उन्माद अवस्था दर्शन की प्यासी है। वही प्राप्त करने के लिए आपको प्रिया ने चयन किया है। आप विश्राम मत मानिए। अगर भोगों में विश्राम मानेंगे रोज समय कट रहा है। अगला समय आने वाला है। भयंकर रोगों का सूचना मिल जाएगी परेशान हो जाओगे। कैसा कैसा जीवन में मोड़ आता है। देखो साधक सोचा था क्या? गलित कुष् से कमरे में बंद रहता है। हर समय कैसी सजा है। हर समय बंद रहता है। कमरे बाहर निकलना मुश्किल नहीं। क्या तुम सोने से मढ़ा के आए हो? तुम्हारे ऊपर क्या रोग का आक्रमण नहीं हुआ?

आज स्वस्थ हो तो तुम्हें खानपान अच्छा लग रहा है। भुलावे में माया का कार्य है। डाल देना मत भूलो भाई। ऐसी ऊंचाई में पहुंच जाओ कि तुम्हें दुख कोई छू ना पाए। यहां कोई भी किसी तरह से सुखी नहीं है। इसका नाम दुखालय मृत्यु लोक है। आप लोग तो समझ जाओ। आप लोग तो उठो इस भाव से। कोई समझाने वाला नहीं। केवल केवल माया का प्रवाह चल रहा है। कितना माया का देखो भ्रम कितना भोग एकत्रित कर ले, कितना भोग भोग ले, कितना रुपया एकत्रित कर ले। बस इतना ही है। कुछ नहीं ये नाटक है माया का।

स्थूल शरीर का राग, सूक्ष्म शरीर का राग, कारण शरीर का राग त्याग करके अपने स्वरूप में स्थित हो जाए। जीवन मुक्त मृत्यु के भय से रहे। गंगा किनारे हफ्ता हफ्ता भर भोजन नहीं मिलता था। हफ्ता भर गांव जाना नहीं गंगा किनारे ही प्रारब्ध प्रसाद जो मिले आश्रमों में ठहरना नहीं वृक्ष या कोई ऐसा मंदिर जो किसी की सेवा में नहीं बाहर ऐसे शंकर जी की ऐसे ओ तब परमात्म साक्षात्कार तब कोई दिव्य अनुभूतियां लगो भाई लगो अगर इसी जन्म में दिव्य हम कल्याण का तो ठेका लेते हैं एक बार श्री जी की शरण में आ गया हरिवंश शरण हो गया राधा नाम जप रहा है वृंदावन दर्शन कल्याण कल्याण वाली तो सब बातें हो गई।

अपने कल्याण के लिए थोड़ी है। अपने कल्याण करने के लिए हैं। भयमुद मंगलकारी मंगलमय नहीं मंगलकारी। मंगल करने वाले बनने के लिए ये वेश किसके लिए? मंगल करने के लिए। जगत मंगल के लिए श्रीपाद कह रहे करे शंकु प्रवेश किमपि कह रहे श्री कर श प्रवेश कितते तस दोषान बोले यदि प्रियालाल की चर्चा के सिवा प्रपंच की बातें हम कानों में सुने तो कील गढ़वा ले अपने कानों में श्रीपाद कह रहे हे अच्छा लगता है चार लोग बैठकर प्रपंच पंच की बात करते संसार की बात हंसी मजाक नारायण हरि भजन में पांचो अनुसार विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीति बहु बात अच्छा नहीं पता नहीं कैसे परमार्थ पथ के पथिक बन गए अंदर जब भूख नहीं है तो फिर भोजन क्या करेगा चाहे इतना और आप सच्ची मानो आप नहीं चाहोगे तो आपका कल्याण किसी की करने की सामर्थ्य नहीं है।

सदैव दीपक तले अंधेरा पाया गया है। समझ लीजिए और दो दीपक जल जाए तो अंधेरा खत्म हो जाए। उसका प्रकाश इसके नीचे इसका प्रकाश उसके नीचे। तो अगर शिष्य अपना दीपक प्रज्वलित नहीं किया भक्ति कर दी प्रेम कर बाती। तो गुरु का दीपक जल रहा है और पीछे नीचे जितने अंधेरे हैं वो अंधेरे में ही रहेंगे। इसलिए दीपक की तरह जलो कि किसी भी दीपक के तले अंधेराना जाए जिससे चार दीपक जल गए तो एक दूसरे के दीपक से प्रकाश अंधकार नहीं रहेगा पर पाया जाता है दीपक तले अंधेरा कहा जाता है ना वो यही अंधेला होता है देहाभिमान देह प्रियता चिकनी एकदम चमड़े तो गुस्सा आती है इसे रद्दी कागज बनाना था तो इसे सजा रहे हो माता पिता गुरु में यही अंतर है जब आप ऐसे चलोगे ना चिकने बन के तो माता आशीर्वाद देगी पिता से गुरु जलेगा कहां देहाभिमान में पुष्ट हो रहा और जब दैन्य भाव प्रशांतित एकदम नाम जब दृष्टि गई तो घूर्णित नेत्र तब गुरु का हृदय आशीर्वाद जाओ तुम्हारा मंगल हो आगे बढ़ो हमसे भी आगे बढ़ो हमारी स्थिति से भी तुम आगे बढ़ो हम तुम्हें अपने कांधों में बैठाल कर उठाते हैं देखो तुम हमारी स्थिति से भी आगे बढ़ो।

गुरु कृपा वृंदावन है। वृंदावन गुरु कृपा प्रसाद चाहते हैं कि जाते जाते ऐसा दो चार तो चमक पड़े हैं। पक्का मानो पक्का ये ना सत्संग बंद हो ना भगवत चर्चा बंद हो ना जय जयकार बंद हो श्री जी का तैयार। इसके लिए जलना पड़ेगा। आवे में तपना पड़ेगा। और यहां एसी में बैठने से तपने में दोनों में अंतर है। नहीं भाई अभी वह रंग नहीं आया जिस रंग के लिए हम तड़प रहे हैं। वह रंग ये कुछ है जो हम बार-बार कह रहे हैं। इसको पकड़ो क्योंकि ये स्थाई दुकान नहीं है सामने जो तुम देख रहे हो।

ये कभी भी राधेश्याम इसका तो हमें लगता है कि जल्दी से जल्दी जो हम देना चाहते हैं वो पकड़ो। उसको पकड़ लो। पर वो हम तभी दे सकते हैं जब आप रहने में रहोगे। बिना रहने के हमारी सामर्थ्य नहीं कि हम आपको दे सके और रहने में रहोगे तो हमारी सामर्थ्य नहीं कि हम रोक सके पहुंच जाएगा आपके पास जैसा नहीं कहते कि यार बढ़िया तो सब है लेकिन मजा नहीं आया बस वैसे ही हमारा मन कह रहा है कि अभी मजा नहीं आया मजा जिधर दृष्टि जाए उधर भगवनंद में घित नेत्र तपस्या से परिपूर्ण जीवन जिद प्रमादा यदि वति समुत चेत मैं श्री धाम वृंदावन के उस महामहिम महातम को प्राप्त करना चाहता हूं जिसे रसिकों ने प्राप्त किया है।

ऐसे हमको नियम लेने होंगे। अपनी जुबान को मौन आहार पर बिल्कुल संयम ले आओ। ज्यादा तुम्हें नहीं करना है। मान लो हमारी बात आपकी आध्यात्मिक शक्ति आहार पचाने में ही खत्म हो जाती है। पहले दूसरा आहार तैयार हो गया। शाम वाला पूज्य श्री रोटी राम बाबा ऐसे सिद्ध महापुरुष थे। कभी किसी का सम्मान नहीं करते थे। सिद्ध पुरुष थे। सीधे दृष्टि देखते ही वही बोलते थे जो उसके आचरण बना लिया भस बहुत उनसे उनके सामने जाने में डरते थे सब उनके भाई गुरु भाई थे सिद्धों के राज्य में ये भारत सिद्धों का है रोटीराम बाबा का 9 बजे का समय कुटिया में गुफा थी उसमें जाते थे रात्रि के 101 जने निज जन बैठे हुए थे कहा ए भाई आज हम जा रहे हैं अब तो लगा कि रोज कुटिया गुफा में जाते एक ऊपर झोपड़ी अंदर गुफा और और फिर निकलते थे दिन के 9:00 बजे समाधिस्त रहते थे।

बोले जा रहे हैं भाई तो सबको लगा कि गुफा में जा रहे हैं। एक थे बहुत बड़े 202 लोग राइफल ले चल पर उनका स्वभाव यही था। वो सीधे एक्सरा करके बात करते थे। जिनसे बात कर उनकी बेइज्जती हो गई। कहते हैं ऐसा कि उन्होंने ही ऐसा इतनी चिरैया उनकी काट कर ले गए थे। पर वो पहले से जानते थे। बोले ए भाई हमारे जाने का समय आ रहा है। आप सब लोग जाओ तो सबको लगा गुफा में जाने की बात कह रहे हैं। सिद्ध पुरुष हो गया। बहुत कृपालु बहुत करुणामय कोई समझ नहीं पाता। वो कड़वी बात कहते थे जीवन सुधारने के लिए।

तू क्या कर रहा है? उठ वो जो तो कहा कि साधु होकर के यह सब क्या तुझे परमात्मा पर विश्वास नहीं क्या तूने परमात्म तत्व का बोध नहीं प्राप्त किया क्या तू निर्भय तत्व में स्थित नहीं जो इन लोहा लंगड़ की तेरे को जरूरत पड़ती है ऐसे वो कट वचन तो उनके गुरु भाई थे सिसोलर वाले महाराज जी सुबह वो गंगा स्नान करके एक भक्त ने भिक्षा के लिए कहा था तो भिक्षा के लिए गए। आपको आश्चर्य होगा हमने दर्शन किए जाकर के बिल्कुल विश्वास मानना तो उनको सूचना मिली कि आपके गुरु भाई रोटीराम बाबा का परमधाम गमन हो गया।

किसी ने उनको ऐसा तो उनका अच्छा वही लेट गए। 20 वर्ष तक वैसे ही लेटे रहे करवट नहीं बदला। 20 वर्ष तक आपको आश्चर्य होगा इसलिए पहले कहा और हमें भी आश्चर्य हुआ तो हम गए थे पैदल शिशोलर गए थे पैदल और महाराज के दर्शन किए बिल्कुल जीवन मुक्त महापुरुष बस पांचप मिनट में केवल गर्दन एक बीता उठती थी ऐसे ऐसे एकदम बड़ी जोर की दृष्टि डालते और फिर ऐसे हो जाते रोज सुबह उनकी पादुका गंगाजल से भी हुई और गंगा जी की बालू और हर समय दो-400 आदमी बने रहते थे दो 400 कि भाई सुबह तड़के उनकी पादुका गंगा जी से भिजो दी गई थोड़ी बालू डाल दी गई जिस घर में गए थे घर

खाली हो गया उनको दूसरा नया घर दिया गया वो केवल उनके दर्शन के लिए था ऐसी 20 वर्ष महात्मा उठे रहे आज भी आप शायद है कि आधुनिकता चली है तो आप सर्च करके देखना सिसोलर के महात्मा जी उनका चरित्र आ जाएगा उनके दर्शन क्या यार संतों ने प्राप्त की 20 वर्ष करवट नहीं बदली उठ के बैठे नहीं कभी खड़े होकर चले नहीं और रोज गंगा जी की रेणुका और उनकी पादुका गंगाजल से भी हुई मिलती और आश्चर्य ऊपर के बाल सफेद और नीचे से काले जग रहे थे नवीन अवस्था का प्रादुर्भाव 20 साल बादल ना खाना ना पीना आपको आश्चर्य लगेगा कोई उनकी छाती में पेड़ा रख रहा है तो कुत्ते आकर खा के चले जा रहे हैं कोई ₹000 रख रहा है तो कोई उठा खा के ले जा रहा है तो कोई ऐसे भगवान की तरह सेवा हो सिद्ध महापुरुष 20 वर्ष बाद शरीर पूरा किया सैया पर लेटे यह वो मार्ग है ये भगवत मार्ग है दिव्यता नहीं प्राप्त करोगे तो साधुता का मतलब क्या रह गया श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी महाराज कह रहे हैं वृंदावन गुण वृंदा ममंद अनुरागण छ महीने में ध्रुव जी ने परम परम पद प्राप्त

किया जो ब्रह्मा जी को भी प्राप्त नहीं है। ब्रह्मा का परमेष्ठी पद है और कहां? मथुरा में। और आप कहां है? वृंदावन में। मथुरा और वृंदावन में बहुत अंतर है। क्या अंतर है? मथुरा में भगवान की उपस्थिति मानी गई है। और वृंदावन में भगवान की सेवकाई मानी गई। प्रियाजू की उपस्थिति है। प्रेम स्वरूपा प्रियाजु यहां अधीनता जो महावर रचना कर रहे हैं श्री जी के चरणों में वहां तो भगवान का ईश्वर चतुर्भुज महामहिम भगवान और यहां प्रेम स्वरूप यहां तो सिद्ध भूमि यहां बहुत जल्दी भगवनंद की प्राप्ति हो जाए लेकिन हमसे अपराध ऐसे होते रहते हैं।

ऐसी त्रुटियां होती रहती है कि हम भगवनंद की अनुभूति नहीं कर पा रहे। यह बहुत ज्यादा समय नहीं है। फिर आगे समय ऐसा आने वाला है कि आप ना भजन कर पाएंगे, ना भगवत चर्चा सुन पाएंगे। पक्का मानिए हम चिल्ला चिल्ला के कह रहे हैं। कुछ दिन पहले महापुरुष कह गए कि देखना वृंदावन में लताएं नहीं रह जाएंगी। महल खड़े हो जाएंगे। हरिराम व्यास जी पद में वो सब दिखाई दे रहा है। लताएं अंतर्ध्य मयूर अंतर्ध्य होते चले जा रहे हैं। पशु पक्षी का कोलाहल अंतर्ध्य होता चला जा रहा है।

ये बिल्डिंग बनती चली जा रही है। ऐसे कह रहे हैं। अभी जो समय भजन का है भजन करके भगवत प्राप्ति कर लो। आगे समय आने वाला है। नहीं ये खेल कूद में मत समय नष्ट करो। यह जीवन केवल ड्रामा है, केवल नाटक है। यह कुछ दिन के लिए मिला है। कुछ दिन के लिए अगर इसमें भगवत प्राप्ति नहीं कर पाए तो किसी योनि में नहीं कर पाओगे। और अभी नहीं कर पाए तो अब ये तो समझ लो 4 लाख 32,000 वर्ष का कलयुग है। अभी 5000 वर्ष है। आगे कर ही नहीं पाओगे। क्यों? ऐसा खानपान, ऐसा व्यवहार, ऐसी सच्ची कह रहे हैं।

सत्य मार्ग किनहीं किन्ही के दिमाग में है नहीं सब गायब होता चला जा रहा है। भगवत तत्व की तरफ से तो बिल्कुल उदासीनता होती चली जा रही है। कोई विरले महापुरुष है जो केवल भगवत प्राप्ति के लिए इस मार्ग में चल बहुत ही माया का प्रभाव बढ़ रहा है। आगे चलकर ऐसा ही हो जाएगा। अभी तो अब आप बताओ अपना वृंदावन महा प्रेम स्वरूप है। एक से एक भजनानंदी संत अंतर्ध्य होते चले गए। पकड़ में नहीं है। पूज्य चंद्रशेखर बाबा रात दिन भजन में टुकड़ा मांगकर ब्रजवासी खाते रात दिन गए।

एक एक लाख आदमी गीता जी का उपदेश सुनकर के शांति को प्राप्त होता। पूज्य श्री स्वामी राम सुखदास अंतर्ध्य जिनकी कलम से देश विदेश में लाखों भगवत प्राप्त हुए और होते रहेंगे। पूज्य भाई जी चले गए। बड़े-बड़े जो महापुरुष इस जगत के कल्याण वो सब अंतर्ध्य होते गए। आज अपने बीच में सत्संग का अभाव समझो। ये चल रहा है तो चल रहा। सत्संग का सत्संग जो सीधे भगवत प्राप्ति का नहीं मनोरंजन करना तालियां बजाना ये वो इस तरह से संसार का भोगों का संग्रह करना बहाने बाजी से कि आज ये प्रसंग है इतने ये दान करो वो दान करो आज ये कन्यादान करो आज ये दान करो लेकिन सीधे मन का भंजन करके स्वरूप बोध प्राप्त करो इसके लिए जो सत्संग में बहुत दुर्लभ बात है अभी जो आपको मिल रहा है उसका लाभ ले लो खानपान पर संयम करो सोना कम करो, बोलना बंद करो, हंसी मजाक बंद करो, नाम जप करो।

अगर आपको लगता है कि मनोरंजन के बिना जीवन नहीं चलता तो इस संसार के हीरो हीरोइनों से तुम मनोरंजन सीखना चाहते हो। प्रिया प्रीतम से मनोरंजन जहां कोटि कंदर्प दमनीय रूप है। जिनकी मंद मुस्कान के लिए बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि तड़पते हैं। उनके साथ हमारा उनका नाम है जन मन रंजन। वो अपने भक्तों का मनोरंजन करते हैं। प्रिया हमारे मन का रंजन है प्रिया प्रीतम। हमारे मन का रंजन है कीर्तन। हमारे मन का रंजन है भगवत लीला कथा। हे तुम संसारी आदमी नहीं हो। तुम भागवतिक पथ के अनुगामी हो।

इसलिए चलो। इसलिए हमारी प्रार्थना है उन्नति प्राप्त करो। अध्यात्म उन्नति प्राप्त करो। कुछ नहीं है। ये संग्रह परिग्रह भोगने की वासना का त्याग कर दो। नहीं ये रोज हमारा चिल्लाना कोई लाभ नहीं दे पाएगा। लाभ तभी होगा जब पहले तुम बदलो। जब हम तुम बदलेंगे तब हम हजारों को बदल सकते हैं। पक्का विश्वास करो। अगर हम तुम तेजोमय नहीं होंगे तो हम परास्त हो जाएंगे। ये माया परास्त कर देगी। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर एकदम घुन शून्य बनो। एकदम पागल जैसे बनो। अपनी चित्तवृत्ति को निरंतर भगवदाकार में रखो।

ये जितनी बाह्य सेवाएं इनका फल है आंतरिक भजन इनसे तृप्त मत हो शरीर पवित्र होता है बाह्य सेवा करने से मन पवित्र होता है भगवत चिंतन से और स्वयं की अनुभूति होने से सब पवित्र हो जाता है स्वयं से बढ़कर कोई तीर्थ त्रिभुवन में नहीं आत्म तीर्थ से बढ़कर कोई तीर्थ जिसे आत्म बोध हो गया वो सब परम पवित्र हो जाता है इसलिए भाई हमारी हाथ जोड़कर सबसे प्रार्थना है आज का सत्संग इसी पर केवल गया है। आप अपने कल्याण की चिंता तो छोड़ दीजिए। आपको जो ये मानव देह मिला है ये परम हित के लिए मिला है।

अध्यात्म की दिव्य अनुभूतियों के लिए मिला है। कल्याण बहुत छोटी चीज है। आप उसको ना गौर कीजिए। कल्याण तो हो गया। जीवन भर वैश्यागामी रहा। जीवन भर वैश्यागामी रहा। एक बार पुत्र के बहाने बुलाया नारायण तो उसका कल्याण हो गया। तुम जानबूझ के राधा बोलते हो तुम्हारा कल्याण नहीं हो जाएगा लेकिन हमें इस पर नहीं टिके रहना हमें खुद अनुभूतियां चाहिए दिव्यानुभूति जैसे ये महापुरुष दिव्य लीला देख रहे हैं बड़े-बड़े रसिक जन दिव्य लीला तो हम क्यों नहीं देख सकते हम क्यों नहीं दिव्य लीला में प्रवेश हम कल्याण को ले बैठे रहे हम दिव्याभूति हम क्यों नहीं काम विजय हो सकते हम क्यों नहीं क्रोध विजय हो सकते हम क्यों नहीं अहम विजय हो सकते हमको यह देखना है कल्याण तो हो गया है कल्याण के विषय में

तो हम वादा करते हैं राधा आधा बोलते हो कल्याण पक्का है लेकिन इतने से हमें नहीं टिक जाना हमें दिव्यानुभूतियों में जिसमें हमारे गुरुजन जिसमें महापुरुष वहां तक पहुंचना है तो हमें साथ दीजिए आप लोग तैयार होइए ये शरीर पोषण हमारा लक्ष्य नहीं है हमारा लक्ष्य स्वरूप में स्थित होना हमारा लक्ष्य भगवत आनंद बहुत धोखा है बहुत धोखा जो अपने शरीर के पोषण में रहकर केवल आनंदित है कि बढ़िया खाने पीने को मिलता है रहने को मिलता है चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त बढ़िया दुल्हन मिल भैया बढ़िया लड़का बच्चा हो रहे हैं।

ये कोई खास बात नहीं है। बहुत बार दुल्हन मिल चुकी है। बहुत बार संसार का खेल हो चुका है। एक बार नित्य दूल्हा दुल्हन मिले। प्रिया प्रीतम एक बार इनको देखना है। ऐसे देखना जैसे हम आपको देख रहे हैं। ऐसे मिलते हैं ऐसे। ऐसे नहीं मिलते ध्यान में केवल मिल गए। ऐसे मिलते हैं। हम इसे ही मिलन समझते हैं और छूते हैं, स्पर्श करते हैं, गले लगाते हैं, बात करते हैं, संभाषण करते हैं। हमें ऐसा भगवत साक्षात्कार चाहिए। कल्याण तो हो गया। हिसाब में तो कोई कमी नहीं होगी। तुम एक बार राधा वृंदावन में बोल दिए हो, एक बार वृंदावन आ गए हो, तुम्हारी दुर्गति नहीं होगी।

लेकिन इतने से हमें क्या होना है? हमारा लक्ष्य है प्रिया प्रीतम का साक्षात्कार करना। ऐसे साक्षात्कार करना। खूब नाम जप करो, भगवत आश्रित रहो, आहार कम करो, सोना कम करो, बोलना बंद करो। अगर परमार्थ के मार्ग में चलना है तो प्रपंच की बातें सुनना बंद करो। श्री प्रभुंद पाद भगवत ऋषिक जी गुरुजन बड़े बड़े महापुरुष आचार्य चरण इनहीं बातों पर ज्यादा जोर दे रहे रसना कटो जो अनरटो निरख अन फूटो नैन श्रवण फूटो जो अन सुनो श्री राधा जस बैन हमें थोड़ी तो यार निष्ठा धारण करनी चाहिए जो मिला खा लिया जो मिला सुन लिया जो मिला देख लिया जो मिला भोग लिया यार ये प्रपंच नहीं ये सब दिखावा ऐसे कुछ नहीं होने वाला कल जैसे से एक प्रश्न्ता ने कहा वो कोई चौपाई बताओ कोई मंत्र बताओ कोई नाम बताओ दुख मिट जाए धोखे में रहना बिल्कुल नहीं है क्यों तुम कितनी चौपाई जपोगे कितना मंत्र जपोगे यहां बचपन से लगे किडनी फेल हो गई है कितना तुम हम धोखे में तुम्हें नहीं डालना चाहते भगवान के बाप को दुख भोगना पड़ा है वासुदेव जी ऐसे बंधे हैं देवकी जी ऐसे बंधे है और आ कौन रहा है जगत उद्धार करने वाला हे इसका नाम दुखालय है।

इसका नाम मृत्यु लोक है। संपूर्ण दुख की जड़ को ही मार दो कि दोबारा जन्म ना हो इसके लिए भजन करो। इसके लिए भजन ये ना सोचो कि तुम्हें कोई चौपाई मिल जाए, कोई दोहा मिल जाए, कोई यह मिल जाए कि तुम उसको 10 20 बार जप लोगे दुखों से मुक्त हो जाओगे। तुम दो चार चौपाई दोहा की बात करते हो। यहां बाल्यावस्था में जब निकले थे ना तो सुबह तड़के से बैठ जाते थे दीपक जला के और 12 एक बजे तक बालकांड अयोध्या कांड एक साथ पूरा समझते हो सुबह से जब गायत्री अनुष्ठान मिला 108 मुट्ठा कुसाकी कुशा की यहां कुशाकी पैती ब्राह्मण के घर जन्म हुआ था मूछ की मेखला और खड़े होकर गायत्री दोनों किडनी फेल है कर्मों का भोग अवश्य भोक्तव्यम कृतम कर्म सुभा शुभम ये भजन होता है।

साधना होती है जड़ मिटाने के लिए। अब अगला जन्म नहीं होगा। अनंत जन्मों का हिसाब किताब बराबर अब जा रहे हैं श्री जी के पास। श्री जी के पास जाना है। इसके लिए हमारे पास प्रश्न करो। हमारे पास प्रश्न ना करना कि हमारा जुखाम कैसे खत्म हो जाए? हमारा दुख कैसे खत्म हो जाए? नहीं खत्म होगा। भगवान अवतरित हुए। सुबह राज तिलक होना है। और सामय के 14 वर्ष का वनवास निश्चित हो गया। नंगे पैर विशेष उदासी भष तुम क्या चीज हो तुम क्या चीज हो भगवान का सुबह राज्य अभिषेक होना महान विपत्ति दशरथ जी का मरण महान सौभाग्यवती कौशल्या जी का सौभाग्य उजड़ जाना अखिल लोक चूड़ामणि को नंगे पैर वनवास में विचरण तुम क्या हो तुम तो जीव हो कर्म के अधीन हो वो परमात्मा आया है अगर छुप के बाण बाली को मारा तो कृष्णा अवतार में अपने श्री चरण में बाण मरवाया और फिर अंतर्ध्य अवश्य भोव्यम कृतम कर्म सुभास नहीं बचोगे दुखों से दुखों से ऊंचाई पर उठ जाओ क्या भजन

करके अध्यात्म की ऐसी ऊंचाई कि शरीर में दुख है और आप भगवत आनंद में मगन हो ये पुट दो चार चौपाइ दो चार माला से माया पर विजय नहीं प्राप्त कर लोगे रात दिन निरंतर भजन करो उसका फल मांगो कि हमें भगवत साक्षात्कार हो जाए तब दुख की जड़ नष्ट हो जाएगी दुख की जड़ है आवागमन दुख की जड़ है अविद्या विद्या दुख की जड़ है शरीराभिमान इसका नाश हो जाए हमारे पास कोई औषधि नहीं है भाई तुम्हारे पुट वाली औषधि नहीं सीधे औषधि है जड़ से वृक्ष को उखाड़ के फेंक दो इस संसार वृक्ष को तुम्हें कभी दुख स्वप्न में नहीं आएगा तुम्हारे शरीर में इस जन्म में दुख आएगा लेकिन तुम ऊपर उठ जाओगे दुख तुम्हें छू नहीं पाएगा इसकी दवा है इसकी दवा नहीं इसीलिए हम एक दिन का सुना होगा सत्संग यहां बोले थे कि है कोई तुम लोगों को बहुत ड्रामे पर और नौटंकी नाटक पर विश्वास है कि वो कलावा बांध दे वो जंतुर बांध दे छूछा कर दे करे आके छूछा है त्रिभुवन में कोई आओ हमारे प्रिया लाल से बढ़कर हो तुम जिनकी हम शरण में है उन्होंने विधान किया है तो तुम विधान मिटा

दोगे आओ बोलो छू जाओ नीचे करो आओ डायलिसिस खत्म बढ़िया है करो आओ भाई हमारी प्रार्थना है अवश्य भोगव्यम कृतम कर्म सुभा शुभम तैयार हो जाओ अपने पाप कर्म को भोगने के लिए तो बोले तुम फिर भजन किस बात का करवाते हो तुम्हारे को आग लगेगी लेकिन छुएगी नहीं आग चंदन से भी शीतल हो जाएगी इसके लिए भजन करवा रहे इसके लिए नहीं करवा रहे कि तुम्हारी आग नहीं लगेगी तुमने आग लगाई है तो तुम्हारे आग तो लगेगी पर अब तुम्हें हम ऐसी ऊंचाई पर पहुंचाएंगे कि आंच नहीं लगेगी यह वादा है तुम्हारा तुम्हारा पाप कर्म तुम्हारे शरीर को बाधित करेगा।

लेकिन तुम नाम जप के आनंद में ऐसे ऊपर उठ जाओगे कि तुम्हें वो क्लेश नहीं दे पाएगा। सच्चाई का मार्ग सुन लो ना कोई पैदा हुआ है ना कोई पैदा होगा कि तुम्हारे दुखों को मिटा दे। कान खोल के सुन लो। डरो इसीलिए पाप कर्म से। अवश्य भोक्तव्यम भोगना पड़ेगा शरीर से। तो ये भजन साधना किस काम की है? यह तुम्हें दुख से ऊपर उठाने के लिए है कि दुख तुम्हें छू नहीं पाएगा पर आएगा नहीं तो रामकृष्ण परमहंस जी के गले में कैंसर था और सिद्ध माता काली से बात करते थे संपूर्ण शक्तियां उनके चरणों में लौटती थी सिद्धियां कौन-कौन से हम तुम्हें सिद्ध महापुरुष की बात बताएं इसलिए धोखे में ना रहना कि किसी संत के पास जाएंगे वो छू कर देगा वो जंतुर बांध देगा वो आशीर्वाद दे देगा यही आशीर्वाद खूब नाम जप करो और इस जन्म के बाद अगला जन्म ना हो।

ऐसे आचरण कर लो। ऐसी भक्ति कर लो कि तुम्हारे शरीर में दुख आवे तुम ऊपर उठ जाओ। तुम्हें छू ना पावे। तुम्हें सच्चाई की बात बता रहे हैं। शब्दवेदी बाण से श्रवण कुमार मरा तो उनके पिता ने कहा जैसे मैं पुत्र वियोग में तड़प के मर रहा हूं। वैसे मरे गए। तो महाराज दशरथ जी वैसे ही मरे। राम जी गए तो हा राम हा राम पर पुत्र राम थे इसलिए परम पद के अधिकारी हुए बात हम तुम्हें खोल खोल के इसलिए बता रहे कि आप इस रहस्य को समझो झूठ तमाशा नौटंकी नाटक में मत फसो भगवान के लिए तुम्हारा जीवन हुआ है इसका नाम दुखालय है मृत्यु लोक है यहां दुख और मृत्यु के सिवा कुछ नहीं भजन करके भगवत प्राप्ति कर लो यही सार्थक बात है आज केवल आप ये दान कर दो तो तुम्हारे सारे सारे दुख मिट जाएंगे।

आओ हमारे पास। बोलो कौन सा दान करें? मिटाओ दुख हमारा। अगर दान से मिटता है तो तुम वस्तुओं के दान की बात करते हो। जीवन दान है। है हम इसीलिए धज्जियां नाटक की उड़ाते हैं। इसलिए पाखंड की धज्जियां उड़ाते हैं क्योंकि पूरा जीवन उसी में चले। है बोले तुम मिटा लेते अपना। तुम्हारा भजन था इसका। तो इसके मिटाने के लिए भजन नहीं था। जिसके मिटाने के लिए भजन था वो मिट चुका है और उसी के बल से हम गर्जना कर रहे हैं। ये बनी है एक साइड में कोई इनसे फर्क नहीं। वही हम सिखाना चाहते हैं।

वही पवाना चाहते हैं कि वही पा लो जिसके पाने के बाद कुछ पाना बाकी नहीं। जिसके जानने के बाद कुछ जानना बाकी नहीं रहेगा। सदा सदा के लिए आनंद में निमग्न हो जाओगे। कोई दुख नहीं रहेगा। इसलिए प्यारे प्रमाद मत करो। इधरउधर मत भटको। खानपान में मत फसो। भोग विलासिता में मत फसो। प्रियाल के चरणों का आश्रय लेकर निरंतर भजन करते हुए भगवत प्राप्ति कर लो। यही जीवन का सार है। यही महा महिमा है। नहीं न जाने कितने भगवान के अवतार हो गए। आचार्यों के अवतार हो गए। हमारी दुर्गति नहीं बंद हुई।

हमारी दुर्गति नहीं बंद हुई। आज भी कितने भगवत प्राप्त महात्मा है। हमारी दुर्गति नहीं बंद हुई तो हमको भजन करना पड़ेगा। हमको अपने आचरण सुधारने पड़ेंगे। हमको भगवत चिंतन के द्वारा अपना दुख मिटाना पड़ेगा। किसी के आशीर्वाद से लौकिक भोग मिल सकते हैं। भगवान नहीं। ध्यान रखना भगवान के लिए स्वयं भजन करना पड़ेगा। हम मान लिया कि लौकिक सिद्धियों से कुछ थोड़ा भोग सामग्री मिल सकती है। जैसे दत्तात्राते भगवान ने कृपा करी तो 88 हजार वर्ष जवान रहकर भोग भोगा। शास्त्रा अर्जुन लेकिन सद्गति ब्रह्म ऋषि जमदग्न जी का विरोध काट के फेंक दिया भगवान परशुराम जी ने इसलिए हम शास्त्र के मनन करके संतों की महत्ता की बात आप सत्संग के सार बात आप सुन लीजिए आपको अपने कल्याण के लिए खुद भजन करना होगा भजन करके ऐसी स्थिति प्राप्त होनी कि हमें कोई मान अपमान दुख सुख लाभहान ये प्राप्त ना हो ये इसमें हमें कोई बाधा ना पहुंचे।

सेवक जी महाराज कह रहे शत्रु मित्र समजानी मानी मान अपमान सम दुख सुख लाभ नहानि ये है को मान मिला हर्षित हो गए अपमान मिला रो दिए प्रशंसा मिली छाती चौड़ी कर दी निंदा की ऐसे ये कोई साधु था ये कोई साधक है शत्रु मित्र समजानी मान अपमान सम दुख सुख लाभ ना ये है भजन का फल दुख सुख लाभ ना हानि ये जो कृपा हरिवंश की सत्य मार्ग बहुत प्रकाशित ित नहीं होता क्योंकि माया प्रकाश अपना करती है वह ढका रहता है गुरुजनों के वचनों से प्रकाशित होता है शास्त्र और गुरुजनों के वचनों की अभी कृपा मिल रही अपना काम बना लो दुख सुख सहते हुए भगवत प्राप्ति कर लो खूब भजन करो खूब भजन निरंतर नाम जप करो ये गाल चिकनाने से कुछ नहीं होगा ये नरक है नरक नरक है नरक भम नरक में ये नरक कीड़ा है कुछ नहीं है शरीर प्रार्थना करते हम प्रवचन नहीं कर रहे हृदय की बात कह रहे भम नरक में ये कीड़ा है नरक का मलमूत्र के बीच में पैदा हुआ गर्भ में जानते हो क्या था और मलमूत्र बनाने वाली चीजें खाकर के राजी हो रहा है और मलमूत्र के भोग में अपने को गर्भ होश

में हो जाओ नाम जप करो धर्म पूर्वक भोगों को भोगो अधर्म आचरण का त्याग करो और भगवत प्राप्ति कर लो यही सार बात है और समझ में आवे तो आवे नहीं तो हमारी समझ तो पक्की है। कोई समझे या ना समझे सबसे हमारी समझ भली और ठाकुर नंद किशोर हमारे ठाकुर वृषभान लली श्री राधा वल्लभ लाल की जय जी

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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