“नाम” की महिमा: जीवन के समस्त संकटों से रक्षा करने वाला अचूक साधन // 29/03/2025
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदावन तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माशयाम परम शीतल माश्रया श्याम किशोर जुको दो रंग रंगित पीतांबर चुनरी तुमको को दो रंग रंगित पीतांबर चुनरी हे श्याम सुंदर आप प्रियाजू के श्री अंग के शोभा वाले पीतांबर धारण करते हैं और हे श्यामाजू आप लालजू के श्री अंग शोभा वाला नीलांबर की चुनरी धारण करती है श्याम किशोर जुको दो रंग रंगित पीतांबर चुनरी एसो रूप कहां तुम पायो अहर निश सोच उधे भूरी मनमोहन सुर ज्ञान शिरोमणि सब अंगनी अंग कोक निपुनरी श्री हरिदास के स्वामी श्यामा तुम्हारी विचित्रताई प्रेम सो पायत रस सुनरी श्यामा तुम्हारी विचित्रताई प्रेम सो पाईत रस सुनरी श्याम किशोर जो तुमको दो रंग रंगित पीतांबर चुनरी उपासक को अपने उपास्य देव में अपना अहम समर्पित कर देना जीवन की परम उपलब्धि है।
सब कुछ समर्पित होने पर भी यदि अहम समर्पित ना हो तो शरणागति पूर्ण नहीं मानी जाती। वो होती ही नहीं पूर्ण। और अहम समर्पित हो जाए तो सब अपने आप समर्पित हो जाता है। जैसे कारीगर को बंदी बना लो तो उसके यंत्र सब अपने आप आपके हो गए। ऐसे इस सृष्टि का जन्म मरण का मान अपमान के बोध का दुख सुख का लाभह हानि का यह मूल है अहंकार संस्कृति मूल शूल प्रद नाना सकल शोक दायक अभिमाना ये संस्कृति का मूल चक्र है अहंकार और यही सारे दुख प्रदान करता है। यह जब ज्ञान के द्वारा गलित होकर शुद्ध ब्रह्म रूप में स्थित हो जाता है तो मोक्ष और जब गुरु प्रसाद से अहंकार गलित होकर प्रियालाल के चरणों में समर्पित हो जाता है तो प्रेम जब तक ये अहम सुरक्षित रखता है साधक तब तक साधना होती है पर साधना का प्रकाश नहीं होता प्रकाश संपूर्ण अज्ञान दुख का नाश हो जाना एक अद्भुत अखंड प्रसन्नता अद्भुत आनंद की उत्पत्ति हो जाना यह नहीं हो पाता।
कल एक बहुत अच्छे संत पधारे थे एकांतिक में। उन्होंने बहुत ईमानदारी से प्रश्न किया कि हमारी शरीर की बहुत अवस्था हो गई। हमारा साधन भी बहुत कृपा से गुरु कृपा से चल रहा है। पर मेरा मन अभी तक वह स्थिर नहीं हुआ। अशांत है और चंचल है। यह खास बात पकड़ने को मिलती है। अहम ना समर्पित होने पर। बहुत लंबा समय निकल जाता है। साधन पवित्र साधक है वो। पवित्र साधना कर रहे। पर अहम सुरक्षित है। अहम क्यों सुरक्षित है? क्योंकि कहीं ना कहीं साधन में त्रुटि हो रही है। क्या त्रुटि?
आहार की, अर्थ संग्रह की, शरीर सुख सुविधा की कहीं ना कहीं इसलिए अहम सुरक्षित है। जहां आहार शुद्ध होकर साधना होती है। अर्थ के प्रति बिल्कुल अपेक्षा नहीं होती है। शरीर सुख के लिए बिल्कुल कोई चाहत नहीं होती है। अहम गुरु प्रसाद से अपने आप गलित हो जाता है। जिसका देहाभिमान गलित हुआ है वही अध्यात्म की ऊंचाई पर पहुंचता है। भक्ति में दैन्यता ज्ञान में निरपेक्षता इतना दन्य तणाल पिशु नीचे तण से भी अपने को नीचा मानने वाला अहंकार गलित हो चुका है। और निरपेक्ष संपूर्ण त्रिभुवन से स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर कारण शरीर तीनों शरीरों से निरपेक्ष वो ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष अहंकार रहित होता है।
इसलिए उपासक को ध्यान देना चाहिए। चाहे वह गृहस्थ उपासक हो या विरक्त अहंकार का गलित हो जाना साधना का विशुद्ध फल है। जो जितना दन्य उतना ही महान भक्त जो जितना निरपेक्ष उतना ही महान बोध संपन्न ज्ञानी महात्मा अगर यह दोष महान आध्यात्मिक सद्गुण नहीं है तो उसका ज्ञान ज्ञान नहीं है और उसकी भक्ति अभी रंग नहीं लाई है। श्रीपाद प्रबुद्धंद जी महाराज कह रहे हैं वृंदाने किमप जनता दुष्प्रवेशम प्रदेशम गत्वा प्रो निज दतयो नाम जलप्पन उद अत्यता्या विकल विकलो दिव्य मूर्त कया श्रीश्वर्याज्ञा कर मृगदशा वाक्य सुधाित श्याम आप लोग जो वृंदावन में पधारे हैं जो वृंदावन में आपको प्रवेश मिला है यह केवल मेरी श्री जी की कृपा से मिला है नहीं हमारा शास्त्र कहता है वृंदाणी किमप जनता दुष्प्रवेशम प्रदेशम यह प्रदेश वृंदावन धाम साधारण के लिए यह दुष्प्रवेश है।
यहां कोई अपने बल से नहीं आ सकता। रुपया का बल, व्यवहार का बल, संबंध का बल नहीं। जिनको वृंदा विपिन है कृपा त नहीं की होए। हरिवंश महाप्रभु कहते हैं श्री राधिका कृपा बिनु सबके मननगम। श्रीपाद कह रहे वृंदारण किम जनता दुष्प्रवेशम प्रदेशम यहां आप अपने भाग्य से नहीं आए हैं। अपने धन बल से नहीं आए हैं। अपने संकल्प बल से नहीं आए हैं। हमारी प्रिया ने आपको बुलाया है। सच्ची मानिए ये धाम कोई तीर्थों में नहीं आता। तीर्थराज प्रयाग भी जहां लौटते हैं आकर वह यह महान प्रियाजू का निज महल वृंदावन धाम है।
श्री धाम वृंदावन की समानता केवल वृंदावन ही कर सकता है। प्रिया प्रीतम के रूप माधुर्य प्रेम की समानता सिर्फ प्रिया प्रीतम ही कर सकते हैं। यद्यपि यही सब अवतारों के अवतारी हैं। यही सब धामों के धामी हैं। श्रीपाद कह रहे हैं अहो धन्यति धन्य है वह जिसको वृंदावन में थोड़ा सा भी अपनापन हो गया। मेरो वृंदावन जीवन वृंदावन यह प्रेम प्राप्ति के लिए अत्यंत अनिवार्य है। श्री उद्धव जी महाराज परम ज्ञानी महात्मा हैं। श्री भगवान के नित्य समीप रहने वाले परम प्रिय सखा और मंत्री भी हैं।
भगवान के प्रधान सलाहकार उद्धव जी हैं। देव गुरु बृहस्पति जी के बड़े प्रिय शिष्य और संपूर्ण बृहस्पति जी के द्वारा प्राप्त कलाओं और विद्याओं में ज्ञान में निपुण है। लेकिन प्रेम से अपरिचित है। भगवान मथुरा में बैठे-बैठे प्रेम का उपदेश कर सकते थे। लेकिन बिना प्रेम भूमि के केवल उपदेश मात्र से प्रेम का रंग नहीं चढ़ता है। इसीलिए श्री भगवान ने उद्धव जी को बहाने से भेजा जाओ मेरे प्रिय प्रेम में तन्मय ब्रजवासी जन है गोपी जन है तुम परम ज्ञानी हो उनको ज्ञान का उपदेश कर दो तो रोना बंद कर दें और उनका रुदन बंद हो जाए तो मेरा रुदन बंद हो जाए क्योंकि वह रोएंगे तो हमें भी रोना आएगा यथा माम प्रपदते ता भजाम यदि कोई रोरो के मुझे भजता है तो मैं रोरो के उसको पुकारता हूं यदि मेरे मिलने के लिए तड़पता है तो मैं उसके मिलने के लिए तड़पता हूं ये यथा माम प्रपद्यते ताथ भजाम्यम उद्धव जी इस प्रेम भूमि में प्रवेश किया तो संपूर्ण ज्ञान उनका धूल धूषित हो गया प्रेम भूमि के बिना प्रेम का उपदेश रंग नहीं लाता इसीलिए इसीलिए यहां भेजा था।
आप जो यहां आए हैं मेरी लाडली जो की अपार कृपा है। मानो आपके अंतिम जीवन का निर्णय हो रहा है कि अब इस दुखद संसार में आपका अंतिम जन्म है। यदि आप सुधारना चाहे तो अपने को सुधार सकते हैं। क्योंकि अहेतु की कृपा से प्रियाल जी की तरफ से हुई जो आपको वृंदावन आने को मिला। यहां की रज में बैठकर के भगवत चर्चा सत्संग सुनने को मिला। जो राधा नाम सुनने को मिला राधा नाम जपने की प्रेरणा मिली। राधा नाम जपने की इच्छा हुई। ये न जाने कैसे कृपा हो गई। हमारे रसिक शिरोमणि परम पूज्य गोस्वामी जी महाराज कृपा करके बतलाते हैं कि ये जो राधा नाम वृंदावन धाम प्रिया प्रीतम की थोड़ी भी प्रियता ये कई जन्मों से आप कहीं ना कहीं कोई ना कोई बड़ा साधन बन गया है आपसे कह रहे हैं सुनो चित लाई रसिक रस रीति दुर्लभ मानुष देह ना है हरि साधु संग में प्रीति सुनो चित लाई रसिक रस रीति पूज्य श्री रूपलाल गोस्वामी जी महाराज कह रहे हैं हे भाई मेरे प्रेम रस की रस रीति को आप श्रवण करो।
पहली कृपा तो प्रियालाल की आपके ऊपर हुई कि मनुष्य देह दिया। पर यदि मानव देह प्राप्त करके आपने सत्संग नहीं सुना, साधु संग नहीं किया और हरि चरणों में प्रीति नहीं की। यदि सत्संग होगा तो निश्चित है हरि भजन में प्रीति और हरि भजन में प्रीति तो हरि चरणों में प्रीति हो ही जाएगी क्योंकि भजन न होई संग बिनु भजन बिना नहीं प्रीति यदि भजनानंदी प्रेमी महात्मा का संग ना हो तो भजन नहीं हो सकता और भजन ना हो तो हरि चरणों में प्रीति नहीं होगी। दुर्लभ देह मनुष्य का पाकर के यदि साधु संग में रति नहीं हुई तो हरि चरणों में प्रीति कैसे हो जाएगी?
हे भाई बहुत ध्यान से सुनना। ये महाप्रभु हित का ही स्वरूप है। श्री रूप लाल गोस्वामी जी महाराज बड़े सिद्ध रस में डूबे हुए महापुरुष जब ये बाल्यावस्था में ही थे। तभी पद रचना शुरू कर दी थी श्री जी की। मेरी बारी को भवरवा पहला पद है। मुझसे कहूं अनत न जाए। बहुत उच्च कोटि का इसमें भाव छुपा हुआ है। पूरा निज मंत्र का भाव उसी में छुपा हुआ है। कह रहे हैं जन्म सहस्त्रन जो कर हारे तप और ध्यान समाधि छीन पापवति शुद्ध हृदय मधि उपजेय भक्ति अबाध जिसने पूर्व में हजारों बार भगवत कृपा से मनुष्य शरीर प्राप्त किया है और उस साधना करता रहा तपस्या किया ध्यान किया अष्टांग योग समाधि आदि उसके पाप शुद्ध हुए तो हरि भक्ति उसके हृदय में अबाध अबाध कोई भी विषय जिसकी भक्ति को बाधित ना करे उसे अबाद भक्ति कहते हैं।
हजारों जन्म की तपस्या और साधना का फल हुआ कि हरि चरणों में अबाद भक्ति प्रकट हुई। अब साधन भक्ति करत बहुजन मन होत जो ब्रज अनुराग ताहु को फल विपिन उपासन प्रेम प्रीति ब भाग जो अबाद हरि भक्ति प्रकट हुई हजारों जन्म की साधना तपस्या से तो वो जब भक्ति अबाद अखंड भाव से करता है तब उसका फल प्रकट होता है कि ब्रज 84 को भूमि में वास करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। ब्रज चौरासी कोष में जब ब्रज चौरासी कोष के अंतर्गत कोई बहुत साधन भक्ति करता है। साधन भक्ति करत बहुजन मनन होत जो ब्रज अनुराग ताहु को फल विपिन उपासन प्रेम प्रीति ब भाग उसका फल होता है कि वृंदावन मेरो वृंदावन प्राण वृंदावन जीवन वृंदावन ये उसके हृदय में आने लगता है।
अब याहु ते निज तत्व जुगल रस नित्य निकुंज बिहारा हित अल रूप अनूप हृदय दृढ़ कुंवर कृपा को सारा श्री लाडली जी की अपार कृपा से जुगल तत्व की उपासना और हर समय उसके हृदय में राधा राधा राधा और वृंदावन की रज का सेवन कितना दुर्लभ ये वृंदावन का भाव प्राप्त हुआ। हजारों जन्म साधना भक्ति की। आपको क्या पता कि आपके कितने जन्म हुए, कौन-कौन सा तप बन गया, कौन-कौन सा साधन बन गया। यह क्रम है और एक है सीधे कृपा। कोई प्रियाल का निज प्रेमी आपकी तरफ करुणामय दृष्टि से देखा और भाव बना दिया।
तो इसी जन्म में जो हजारों जन्म की साधनाओं से अबाद भक्ति अबाद भक्ति करने पर ब्रज 84 कोष का वास ब्रज 84 कोष के वास का फल वृंदावन का प्रेम वृंदावन का आश्रय इसका फल श्री प्रिया प्रीतम के चरणारविंद में अली रूप से सहचरी रूप से सेवा का सीधे प्राप्त हो गया। इसीलिए कहा गया है तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरी तुला कंग तूल न ता सकल मिल जो सुख लव सत्संग जिसकी जिभ्या से हर समय राधा राधा राधा ऐसा निकलने लगा ना आप विश्वास मानिए काम हो गया उसका बहुत कृपालु हमारी लाडली जो है भक्त माल में लिखा हुआ है कि अगर कोई शास्त्रों बार हरि हरि कहे और एक बार किसी हरि भक्त का नाम ले तो बराबर हो जाता है।
हरि इतने प्रसन्न हो जाते हैं कि अपने सहस्त्र नाम में जितना खुश नहीं हुए एक भक्त के नाम में और अगर प्रियाजु का नाम ले ले राधा तो बोले जो को श्री राधा यशस गावे अति आसक्त रूप लोभी श्याम तहां उठ धावे जो को श्री राधा यश गावे जे ही कोई कहता है राधा राधा राधा या देखो माई सुंदरता की सीमा हमारे माई श्यामा जी को राज मेरी महारानी श्री राधा रानी तो लालजू अति आसक्त होकर उसकी तरफ जब आप यहां राधा गाते हैं ना तो लालजू को कैसा लगता है तो वो जाने लेकिन इस छाती को कैसा लगता है सर्वस्व बलिहार करने का मन होता है।
आपके चरण छुए। ऐसा लगता है जाकर साष्टांग दंडवत करें इनको जो प्यारी जी का नाम गा रहे हैं। ऐसा लगता है मुझ भिक्षुक के पास क्या है जो इनको दे दूं। प्यारी जो के नाम के बदले में जो नाम सुना रहे हैं जो हरिवंश को नाम सुनावे तन मन प्राण तास बलिहारी ये शरीर ये प्राण ये जीवन बलिहार है उसके ऊपर जो राधा नाम उच्चारण करता है ये तो राधा नाम के स्वादी रसिकों की कृपा से किनका की बात है राधा नाम का संपूर्ण महत्व और स्वाद तो लाल जो महाराज जानते हरि रसना राधा राधा रट स्वयं हरि की रसि राधा राधा वो बंशीष राधा राधा राधा प्रफुल्लित कमल कुसुम पर जैसे भ्रमर आन मरावे त्यों ही राधा नाम उचारत विवस कृष्ण चली आवे विवश कृष्ण चली आवे वे त्यों ही राधा नाम उच्चारत जब किसी पर विशेष कृपा होती है श्री कृष्ण की लाल रंगीलो गाइए ताते प्रीति रंगीली पाई विशुद्ध कृपा जब होती है तब ये राधा नाम सुनने को मिलता है तब राधा नाम जप में रति होती है कह रहे जैसे कमल है उसको भवरे को बुलाना नहीं पड़ता।
भवरा स्वयं आकर पराग का पान करने के लिए लुब्ध होकर बंदी बन जाता है। इतनी सामर्थ्य है कोरे काठ में छेद कर दे लेकिन कोमल कमल की पंखुड़ी को नहीं छेद सकता। यह अनुराग। ऐसे ही जो राधा उच्चारण किया तो श्री कृष्ण विवश होकर के उसके समीप हर समय रहते हैं। राधा बोल रहे हैं लाल जी महाराज समीप है। राधा राधा राधा केवल इतना ही नहीं। एक दिन आएगा राधा राधा बोलते रहो। सामने तुम्हें दिखाई देंगे श्याम सुंदर बंसी बजाते हुए ये केवल हम भावुकता वश नहीं बोल रहे हैं ये जीवन भावुकता वाला नहीं सन्यास का जीवन रहा है जो तर्क प्रधान रहा है केवल भावुकता वाला नहीं कि सुना और आपको सुना रहे राधा नाम लेतता आगे मोहन बेणु बजावे प्रेम बंध्यो संग ही संग डोले ता पर नेह जनावे बिके हुए उसके पीछे रहते हैं प्रेम बंध्यो संग ही संग डोले अमरीश जी को पता नहीं था कि मेरे पीछे भगवान ने सुदर्शन चक्र सुरक्षा में लगा दिया जब दुर्वासा जी ने अपने तप बल का प्रयोग भक्त को धमकाने मिटाने के लिए प्रयोग किया तो सुदर्शन चक्र प्रकाशित हो गए।
ऐसे जो राधा राधा बोलता है सर्व सामर्थशाली भगवान उसके पीछे डोलते हैं। प्रेम बंधो संग ही संग डोले ता पर नेह जनावे सर्वाचर्यमय भगवान है। इसीलिए उसका जीवन सर्वाय हो जाता है। जो राधा नाम जपता है। राधा नाम लेतता आगे मोहन बेणु बजावे अगर राधा राधा चल रहा है तो भगवत साक्षात्कार दुर्लभ नहीं है जबरदस्ती आपको प्रभु बिना बुलाए आपको दर्शन देंगे आप केवल जप कर देखिए राधा नाम उपासक को हरि आपुन ऋणी कहावे वे जब कोई राधा राधा राधा ऐसा नाम जप करता है तो हरि अपने को ऋणी मानते हैं कि आपने मुझे राधा नाम सुना दिया ताही हेत किशोरी हित सो कर गह विपिन बसावे कहीं भी रहो यदि राधा राधा नाम उच्चारण करते हो और पापाचरण से बचते हो तो इसी जन्म में आप देख लेना आपकी लौकिक और पारलौकिक उन्नति कैसी होती है और जीवन की शाम होते होते धाम में प्रीति और शरीर छूट कर इसी नित्य धाम किशोरी किशोर के समीप निश्चित वास मिलेगा क्योंकि ये वाणी सिद्ध महापुरुषों की है जो वेद नेति नेति करके वर्णन करते हैं।
उस रस का यह करके वर्णन करने वाले यहां वेद रसिकन की वाणी यहां प्रमाण रसिक जन है कह रहे हैं राधा नाम उपासक को हरि आपुन ऋणी कहावे ताह हेत किशोरी हित सो कर गह विपिन बसावे जो राधा नाम का आराधन करता है सिंहासन में विराजमान कर जो राधा नाम का जप करता है जो राधा नाम का कीर्तन करता है हरि उसके ऋणी हो जाते हैं और उसका अंतिम विश्राम हाथ पकड़ कर स्वयं हरि उसे वृंदावन धाम में देते हैं। प्रगट या चिदानंद वृंदावन धाम इसलिए हमारे जीवन राधा नाम बैठा लो इसे में भटकने की आवश्यकता नहीं।
यदि इस जन्म में आपने राधा नाम की अनन्यता स्वीकार कर ली तो समझ लो हजारों जन्म तुम्हारे जो नाना प्रकार के शुभ और अशुभ कर्म किए हैं करोड़ों जन्म तुम्हारे जो व्यर्थ गए वो सब सार्थक हो जाएंगे। सब अशुभ कर्म शुभ कर्म भस्म हो जाएंगे। शुभ अशुभ दोनों हमारे बंधन कारक हैं। शरण निरापक पद रमित सकल अशुभ शुभ नश देत सहज निश्चल भगत सु जय जय श्री हरिवंश राधा हमारे जीवन राधा नाम जीवन बना लो शस शस में राधा राधा राधा राधा हे अमृत है पियो अब अमृत करोड़ों साधना इसकी समानता नहीं कर सकती।
राधा नामव कार्यम मिलितम साधना घस कोटि करोड़ों साधनाओं का जो फल है वो राधा नाम जापक को जो फल मिलेगा उसकी समानता नहीं कर सकता। फिर हम कह रहे हैं आपके विश्वास के लिए बार-बार कि केवल हम भावुकतावश नहीं कह रहे हैं। नहीं वेदांत मार्ग के पथिक सन्यास मार्ग का इसका मतलब है सब साधनों का जो सांगोपांग सनातन मर्यादा के अनुसार है उनका अनुष्ठान करते हुए जब लाडली जो की अहतु की कृपा हुई तब ये प्रसाद जो आपको मिल रहा है ये राधा नाम का प्रसाद है ये केवल कोई भावुकता वश नहीं है आप देख लीजिएगा आप देख लीजिएगा खुद देख लीजिएगा गा बस आप पकड़ लीजिएगा हमारी प्रार्थना मान लीजिएगा एक भेंट दे दीजिएगा कि अपनी स्वास खाली नहीं जाने देंगे राधा राधा राधा फिर आप देख लेना हमारे जीवन राधा
नाम जीवन बना लीजिए राधा नाम कुछ बातें ऐसी है ना शब्द है कि उसे बोल सकते हैं और ना बोलने की सामर्थ्य है बस इतना कहते हैं देख लीजिएगा आप अगर राधा राधा जपते हैं तो धैर्य पूर्वक रहिएगा किसी प्रलोभन में ना छोड़िएगा और किसी दुख विपत्ति में मत छोड़िएगा ये मत सोचिए कि राधा नाम का फल प्रकाशित नहीं हुआ नहीं वो ऐसा फल तैयार हो रहा है जिसमें सुधा अमृत भरा हुआ है निहाल हो जाओगे बस पकड़ लीजिए श्री वृषभानु नंदनी श्यामा सुमिर ब विश्राम हमारे जीवन राधा नाम बहुत कृपा श्री जी की होती तब राधा नाम में प्रीति होती बहुत अपार कृपा गुरुजनों की होती है महादेव जी की हुई तब यह यदि आपको श्री जी के नाम रटने का स्वभाव बन जाए।
बस फिर आप देख लेना। यह परम धन है। परम ज्ञान है। परम अमृत है। इसीलिए बार-बार कहता हूं यह परम ज्ञान है। उस शुद्ध ज्ञान के मार्ग को महादेव जी की कृपा से फिर इस प्रेम के मार्ग को हिताचारी की कृपा से। तब ये जो बात बोल रहे हैं रसिकों की उसको पकड़ो। इसमें अपार सुख अपार करुणा खास बात हम अपराधी जीव हैं। हमसे सैकड़ों अपराध बने। सैकड़ों गलतियां बने। बन रहे हैं। हो सकता है आगे भी बन जाए। हमारी स्वामिनी का एक स्वभाव है नेक हो न रिस कहूं भूली को न होत सखी रहत प्रसन्न सदा ही मुख हास है हरि को कभी-कभी रोष आ जाता है इसको उपदेश किया इस पर इतनी कृपा की इसको इतना संभालने की वृत्ति दी लेकिन फिर यह दुष्टता करता है तो अब तिनकर काल रूप में भ्राता अब इसको दंड के द्वारा सुधारा जाएगा साम दाम और दंड भेद से सीधे रास्ते लाऊं अब इसको दिखाऊंगा कि कैसे तुझे चलना है फिर उसे मान अपमान दुख सुख लाभान जन्म मृत्यु से उठाने के लिए भगवान कठोर विधान करते हैं।
लेकिन लाडली सहज स्वभाव परो नवल किशोरी जुको मृदुता दयालुता कृपालुता की रास है नेक हो न रिस कहूं भूली हो न होत सखी रहत प्रसन्न सदा ही मुख हास है ऐसी सुकुमारी प्यारे लाल जू की प्राण प्यारी लाल जू की प्राण प्यारी धन्य धन्य धन्य ते जे इनके उपास हैं हित ध्रुव और सुख देखियत जहां लगी सुनियत तहां लगी सब दुख पास है नेक नको वही रक्त सिंधुर अनुराग रसिक सिंधुर रस की सिंधु कृपा की सिंधु कहीं तनिक भी नाराज नहीं बोले बड़े गुणवानों पर ऐसा होता होगा नहीं अवगुण करे समुद्र समम वर्तमान में उससे अगर समुद्र की तरह अपराध बन जाए मेरी अलबेली सरकार महारानी जो नाराज नहीं होती खास बातें अवगुण करे समुद्र सम गणत न अपनो जानी राई के सम भजन को मानत मेरु समान राई छोटा दाना थोड़ा भजन कर दे सेवा कर दे तो लाडली जो मानती है सुमेरु पर्वत की तरह और समुद्रवत अपराध कर दे तो मानती ही नहीं कि अपराध हो जब यह नहीं मानती तो लाल जो की सामर्थ्य नहीं कि उसके ऊपर दंड विधान कर सके।
इसीलिए जो बोला राधा तो अनुता मधुपति महा प्रेमा तो परम दे विमति तवम श्री राधे नाम रस महिमा कामास दास लाडली जब कोई बोला राधा तो महाराज अनंत ब्रह्मांडों के न्यायाधीश स्वामी है तत्काल उसके रजिस्टर को ही हटा देते आगे लिखेंगे ही नहीं अगर कहीं वो आपकी चरण दासता में लग चुका है तो उसकी महिमा का फिर क्या वर्णन हमारे जीवन राधा नाम अखंड भगवत सुमिरन में डूबे हुए ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष पूज्य राधा बाबा सब वेदांत धूल धसित हो गया और अंतिम लीला राधा राधा राधा राधा राधा गीता वाटिका में ही संपूर्ण जीवन राधा नाम में समर्पित कर ऐसे कितने महान ज्ञानी महात्मा योगी महात्मा जो संपूर्ण साधनों का सार फल पाया राधा नाम और जीवन समर्पित कर दिया हम आप क्या है हमारे आपके ऊपर तो अहेतु की कृपा है कोई साधन नहीं कोई बल नहीं कृपा से केवल हम राधा नाम सुन रहे हैं राधा नाम जप रहे कीति कुंवरी जाप बिनु मेरे और ना को काम ललित लड़ती रंग रंगीली राधा राधा राधा राधा राधा ललित लती रंग रंगीली रटत रहो निश जा हमारे जीवन राधा नाम सर्वस
आस वृंदावन वृंदावन वृंदावन सर्वस आस वृंदावन ये मेरी प्यारी को निज धाम अली किशोरी पिय गोरी को शरण गयो अभिराम जिसकी जिभ्या से राधा राधा राधा उसे नित्य किशोरी किशोर का सानिध्य वृंदावन धाम का चिदानंदमय स्वरूप और उसमें वास यह अवश्य प्राप्त होता है। जिसकी जिभ्या पे राधा नाम विश्वास कर लीजिए। राधा राधा राधा मानो आप संपूर्ण माया पर विजय प्राप्त कर लिए। ये ऐसी फिसलन वाली माया है कि बड़े-बड़े फिसल जाते हैं। और साधना में फिसल गया। फिर साधना का जो प्रकाश होता है वह नहीं होता लेकिन शरण में है शरणागत है राधा राधा उच्चारण कर रहा है तो फिसल गया भी तो गोद में रहता है विश्वास कीजिए फिसल गया भी तो नामे भक्ता प्रणसति उसका पतन या नाश नहीं हो जाएगा बड़ी कृपा महारानी जी की अलबेली सरकार की बड़ी कृपा जो बात समझ में आ जाए।
यदि राधा नाम जब चल रहा है तो आप ये समझ लो किसी का साप आपके ऊपर लागू नहीं होगा। दैहिक दैविक भौतिक ताप आपको ताप नहीं पहुंचा सकते। कोई भयानक पाप आपको दंड नहीं दे सकता। शाप ताप रोग शोक दारुण दुख हारी लाल इष्ट दुष्ट दलन कुंज भवन चारी कोई भी साप ताप रोग दुख दोष ये आपको परास्त नहीं कर पाएंगे यदि राधा नाम चल रहा बिल्कुल सत्य मान लीजिए बड़े-बड़े साधनों का अनुष्ठान करने पर भीित की वो स्थिति नहीं होती जो शरण में आ जाकर राधा राधा पुकारने पर होती है। अहो भाग्य जिनके हृदय में प्यारी जो की शरणागति प्रकट हो गई।
यह वृंदावन धाम की कृपा से होती इसीलिए श्रीपाद वृंदावन वृंदावन बार-बार मांग रहे हैं क्योंकि जिनु वृंदावन शरण गही हरिता की सब पूरी आशा कल्पतरु कामधेनु चिंतामणि यह वृंदावन धाम है। समस्त आशाओं की पूर्णता एक कृपा कोर में हो जाएगी। आप परेशान मत होइए। हरिता की सब पूरी आशा अपनायो स्वामिनी सही अपना स्वामिनी सही जिन वृंदावन शरण गए शिव ब्रह्मादिक सनकादिक सोरज दुर्लभ ये जो आप रज में बैठे हैं। आपको बहुत सहज लग रहा है। असीम कृपा हुई है तब आप यहां बैठे हैं। नहीं यहां सोच नहीं सकता कोई वृंदावन वृंदावन आ नहीं सकता वृंदावन फिर आप यहां बैठे हैं निश्चित मेरे लाडली की अपार कृपा आपके ऊपर हुई है जो रज शिव ब्रह्मादिक सनकादिक ये याचना करते हैं लाडली जो हमें अपने श्री धाम वृंदावन में आज भी गोपीश्वर बने में महादेव जी विराजमान है।
दुर्लभ सोज कृपा ते सुलभ ल जैसे कोई अरबपति असंखपति है हम फुटपाथ में भीख मांगने वाले और वह हमें गोद में ले ले तो तत्काल खरबपति बन गए। ऐसे ही कृपा ने हमें स्वीकार कर लिया। जो बड़े बड़ों के लिए दुर्लभ है। कृपा से हमें सुलभ हो गया। कभी एकांत में बैठकर अपने ऊपर जो कृपा है उसको सोचकर रोना आया? नहीं बस अपने लिए रोना आया। अपनी कामनाओं की पूर्ति, अपने दुख, अपने सुख इसी के लिए कभी एक बार सोचा प्रभु ने आप पर कितनी कृपा की है। आप सोचिए कितनी कृपा है। आप सत्संग में बैठे हैं।
कहां बैठे? श्री धाम वृंदावन में बैठे। पावन यमुना की पुलिन की रेती में बैठे। यहीं से यमुना प्रवाहित होती थी। इधर से अब वो इधर हो गई है। समय के अनुसार कितनी कृपा हम पर है। बड़े-बड़े महात्मा ऋषि मुनि जिस तप के द्वारा हरि को प्रसन्न करना चाहते हैं। वो हरि बिना किसी चाह के आपके पीछे डुलेंगे। यदि राधा नाम आपकी जिभ्या पे चल रहा है। मजन पान कलिंद नंदिनी युगल रहस रसना जुक धन धन भयो जगत यह जीवन अंत अमित निधि दगन चही धन्य हो गया धन्य हो गया जन्म लेना धन्य हो गया क्यों क्यों धन्य हो गया एक बार वृंदावन आ गए हो फिर संसार में लौट गए हो राधा राधा जब कभी सुमिरन कर लिया है पक्का यमराज जी की ताकत नहीं कि आपके सामने यमदूतों को भेज दें।
श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी ने वृंदावन महिमामृत में वर्णन किया है। एक पुष्प वृंदावन का सूंघ लिया है। एक बार वृंदावन की रज में आ गए हैं। भले आपके अंदर कोई श्रद्धा विश्वास नहीं है। एक बार यमुना के पावन जल का स्पर्श करते हुए वायु वृंदावन की रज को लेकर आपके ऊपर पड़ गई। अब आप कभी नर्क नहीं जाएंगे। रज तो उड़ी लागे तने पीवे जमुना तोए। नहीं तुम्हारी श्रद्धा है तो भी अग्नि में श्रद्धा करो ना करो उसमें दाहिका शक्ति है जला देगी विष में मारण शक्ति है श्रद्धा अश्रद्धा कैसे भी पी जाओ मार देगी अमृत में अमृत्व है वो चाहे श्रद्धा से पियो चाहे श्रद्धा से अमर कर देगा ऐसे ही वृंदावन में तारण शक्ति है।
राधा नाम में प्रेम शक्ति है। हरि को अधीन करने की शक्ति है। श्रद्धा हो या ना हो आप रटो राधा राधा आप वृंदावन की रज का सेवन करो फिर देखो इसकी अपार महिमा जो बड़ी-बड़ी साधनाओं से नहीं पूर्ण होती श्रीपाद कह रहे हैं जो वृंदावन जन साधारण के लिए दुष्प्रवेश प्रदेशम है इसमें गत्वा प्रोच निज दतयो नाम जलपन दसहु आहा वृंदावन में आ गए। थोड़ा ऐसी जगह एकांत हुए जहां कोई दिखाई नहीं दे रहा। और चिल्ला कर रोए। राधा राधा लाडली श्यामा जो राधा राधा गत्वा प्रो निज द योर नाम जलपन दश अशु प्रवाह करते हुए एकांत देश में चिल्ला चिल्ला के भोरी सखी जी ऐसा ही करती थी।
यमुना में के उस प्रांत में जहां कोई स्नान आदि करने नहीं जाते थे वहां बैठ जाते। चिल्ला चिल्ला के रोती लाडली यह प्रेम की पीर उनकी पूरे हृदय की बातें हैं। उसमें रोरो करके प्रियाजु से प्रार्थना करते हैं। अत्यंत विकल विकलो दिव्य मूर्त कयापी आहा उच्च स्वर से राधा राधा राधा ऐसा कह के अश्रु बहा रहा है। और इतनी आनंद प्रेम की विकलता हुई। कि वो विभल होकर लौट रहा है रज में तो क्या हुआ जब विकल विकलो तो दिव्य मूर्ता कयाप श्रीश्वर्याज्ञा कर मृग दशा वाक्य सुधा स्वास्थ्या उठ तू क्यों विकल होकर रो रहा है दिव्य सौंदर्य की सीमा लाडली जो प्रकट हो गई आ जो श्री हरि की ईश्वरी है वृंदावनाधीश्वरी वो दिव्य स्वरूप मृग नैनी श्री राधा प्रकट हो गई दिव्या मूर्त कया्री स्वरज्ञा कर मृग दृष वाक्य सुधा उठ क्यों विकल हो रहा है मैं आ गई ऐसा अमृतमय शब्द कब मैं सुनूंगी ऐसा आश्वासन कब मैं पाऊंगी श्रीपाद प्रार्थना कर रहे ऐसा हो कि वृंदावन जो सबके लिए दुष्प्रवेश है श्री जी की कृपा से यहां आना हो और यहां एकांत में जाकर राधा राधा पुकार कर रोना हो ऐसी विकलता आ जाए कि रज में लौटूं और पुकारू इतने में देखा कि श्री जी आ गई और वो कह रही है उठ देख मैं आ क्यों तू विकल हो रहा है क्या कभी ऐसा मेरे साथ होगा?
श्री बात कह रहे हैं यत्रवासम विहरते मत प्रस्तुयं भक्ति महसोत्सवम यत्र निशते यत्रव प्रविती न निगम श्रेणी गिरा भंग तस्मिन मात प्रणयनी वृंदावने पावने अद्भुत महिमा जहां की रज लगाने से जहां रसिकों का संग करने से युगल सरकार की प्रेम उन्मत्तता प्रकाशित होती है। देखो इतना तो गांठ बांध लो कि बिना भगवत प्रेमी महात्माओं की चरण रज के उष्ट के वचन के कृपा के प्रियालाल का प्रेम साधनों से नहीं होता है या गुण साधन ते नहीं तुम्हरी कृपा पाव कोई कोई कौन जो रसिक चरण अनुरागी हैं जो रसिक चरण रज सेवी है जो रसिक चरणामृत पान करने वाले जो रस कुष्टामृत का पान करने वाले हैं तो उनको यत्र वास मदम विहरते मत प्रस्तु द्वयं वस्तु द्वयं श्री श्यामा श्याम की प्रेमता यहां घूमते घूमते रसिकों के संग में रे मन रसिकन संग बिन रंच उपजे प्रेम तो क्या कहो कृपा उपजे के भांति रसिकन संग फिरो दिन राती क्या होगा?
तो बोले विहरते मत प्रष् वस्तु द्वयम उनका संग करके इस वृंदावन में विहरते अचानक एक दिन घटना घटेगी और प्रिया प्रीतम के दर्शन हो जाएंगे। पक्का बिल्कुल इसमें कोई कल्पना या संशय या तर्क की जरूरत नहीं है। नहीं है। यह उसी समय होगा जब आपका अहम श्री जी के चरणों में समर्पित हो जाएगा। और यह होता ही रसिकों के संग से तिनकी संगति रहत जाति कुल मद सब ननस अहम गलित हो जाए अगर ये तो वृंदावन प्रेम की बात है। कहीं भी नाम में प्रेम, श्री कृष्ण रूप में प्रेम, श्री कृष्ण लीला में प्रेम इन तीन की बड़ी महिमा गाई गई है।
भक्त चरण रज, भक्त चरणामृत और भक्त उच्छिष्ट। यह नहीं देखा गया कि भक्त किस कुल का है, किस जाति का है, यह सब वो प्रभु का भक्त है। उसका उिष्ट मिला और अनुराग बढ़ गया हृदय में। एक प्रसंग आता है एक कालिदास नाम के महान भागवत का। जो भगवत प्रेमी महात्मा जन होते हैं। उनकी जाति पर दृष्टि रख लेने से अपराध लगता है। यह ध्यान रखने का विषय है। कभी भक्तों की जाति पर वैसे प्राय बहिर्मुख लोग इस बात पर ध्यान देते हैं। वो कौन वो अमुक कुल के उच्च कुल यादम भाई देखो जंगहे लोहा में कोई भी ऐसी ताकत नहीं कि मुकुट बनके चमके पारस मणि छू गया अब आप उसे जंग लोहा नहीं कह सकते वो लोहा स्वर्ण बन जाता है और वो मुकुट आदि प्रभु के आभूषणों के काम में आता है।
ऐसे हम सब जंगहे लोहा है। चाहे जहां के हो चाहे जो हो कोई हो हमारी गति मना कष्टान इंद्रण प्रकृति स्थान करति ये संत महापुरुषों का स्पर्श संभाषण उनका संग हमें कीमती बना दिया हमें जगत मंगल करने वाला बना दिया जगत मंगल करने वाला देव भयमुद मंगलकारी वो मंगलकारी जैसे सहचरी भाव ही की प्राप्ति की बात नहीं सहचरी भाव प्राप्त कराने वाली सामर्थ्य आ जाती है चतुरासी जी गाने वाले को सखी सुख के अधिकारी सखी अधिकारी कहते जैसे भंडार के अधिकारी बोले भंडार के अधिकारी जी हैं वो दे सकते हैं किसी
को कुछ भी ऐसे सखी सुख के वो अधिकारी हो जाते हैं जो नाम जापक है जो रसिक संग है जो चतुरासी जी का गायन जो वृंदावन का सेवन उनके प्रति ये देख लेना देखो सही मायने में देखो तो हमारी जो वाणी जी कहती है जहां वेद नेति नेति कहते हैं उसके आगे की वाणी जी है कह रही जाति पात कुल कर्म धर्म वत संसति हेतु अविद्या नासी है अविद्या ही ये अविद्या ही है कोई शुद्ध ज्ञान नहीं है ये सेवक जी महाराज कह रहे हैं ये ये जन्म मरण के चक्र में ही फंसाने वाली अविद्या है जाति पात कुल कर्म धर्म व्रत संस्कृति हेतु हेतु संस्कृति आवागमन का हेतु है।
जब इसके धर्मानुसार चले तो यह इससे वैराग्य दिला देता है। यही इसका फल है। अगर यही अहंकार बना रहा मैं अमुक मैं अमुक कुछ नहीं हाथ लगता। कुछ नहीं हाथ लगता। वाणी से पता चलता है अहम की धरा से हो रही है। वाणी निकल रही है या स्थिति से निकल रही। स्थिति में हम सब एक हैं। परमात्मंस है। कोई भी महात्मा इसको काट नहीं सकता। शास्त्र बात है भगवान की बात है ममई वंसो जीव लोके जीव भूता सनातना सनातन सब मेरे अंश हो अंश में कोई भी कमी नहीं है चींटी के अंदर भी वही जो भगवान शंकर के अंदर जो इसके अंदर वही आपके अंदर कोई अंतर नहीं है सब जगह समान रूप से समूहम भगवान की वाणी समोहम सर्वभूतेशु समस्त स्त प्राणियों में मैं समान रूप से विराजमान हूं।
अब बचे पंचभूत जिनसे ढांचा रचा हुआ है। कोई कमी नहीं। छित जल पावक गगन समीरा ये पांचो बराबर सबके रचे। तो फिर ये मेड किस बात की है? भगवान कह रहे हैं कि मैं इसलिए इसके रचना की हूं कि धर्मानुसार चलो और परम धर्म को प्राप्त हो जाओ। तो जो परम धर्म में भक्ति में है भगवत मार्ग में उनमें यह नहीं देखना चाहिए। भक्त पद भक्त चरणामृत और भक्त उच्छिष्ट ये बड़े भाग्यशाली को मिलते हैं। त्रिभुवन में सबसे बड़ा भाग्यशाली कौन है? जिसे भक्तों का संग मिले। सुत दारा धन लक्ष्मी पापियों के घर होए।
संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दो बड़े भाग्यशाली जिनको संत चरण रज मिलती है और संत उच्चिष्ट मिलता है और संत चरणामृत मिलता है उनके भाग्य की क्या सराहना पर वो समझे भगवत कृपा को समझे तो बहुत जल्दी लाभ मिल जाए इन तीनों का बहुत बड़ा महत्व है कैसा भी नीच स्वभाव वाला क्यों ना हो यदि ये तीनों प्राप्त हो जाए तो तीनों गुणों पर विजय प्राप्त कर कर ले। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ले। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर जो तीनों लोकों को परा प्राप्त कर रहे हैं।
भक्त चरण रज से भी, भक्त चरणामृत पान करने वाला और भक्त उिष्ट पाने वाला इन तीनों पर विजय प्राप्त कर लेता है। इसमें साधन बल काम नहीं करता। तीनों गुणों पर विजय प्राप्त करने के लिए कृपा काम कर। इसीलिए मोक्ष मूलम गुरु कृपा सचमुच सचमुच वो हरि के बड़े कृपा पात्र हैं जिनको इन तीनों में श्रद्धा हो गई और तीनों ये जिनको प्राप्त होते हैं। जिनकी बुद्धि में संतों के प्रति हे भाव है। उनकी चरण रज में भाव नहीं। उनके उच्छिष्ट में भाव नहीं। उनके चरणामृत में भाव नहीं।
उनकी तो यहां चर्चा ही नहीं है। भगवत स्वरूप भगवत भक्तों की पद धली उनके चिन्हों से उठाकर मस्तक पर जिसने लगा लिया उसको वो प्रेम वो सामर्थ्य प्राप्त होती है जो किसी साधन से नहीं मिलती है। जब हिरण्यकश्यप बहुत क्रुद्ध होकर के प्रह्लाद जी को पटक दिया और कहा तेरी बुद्धि किसने की ऐसी तो प्रह्लाद जी ने जो उत्तर दिया बहुत सुन समझने लायक है उन्होंने कहा नमस्ता दुरुंग सत्य अनपगमो यद महपाद रजो अभिषेकम निष्िंन नाम नणी तयावत दैत्यराज कितनी हिम्मत है पांच वर्ष के बालक में त्रिभुवन पति पिता हिरण्यकश्यप को कह दैत्यराज जिन्होंने सब कुछ श्री हरि के चरणों में समर्पित कर दिया है।
अकिंचन है हरि के सिवा जिनके हृदय में कहीं कोई आश्रय बल भरोसा नहीं है। ऐसे भक्त जनों की चरण रज सेवन करने से ऐसी मति होती है। ऐसी मति किसी के सिखाने पढ़ाने से नहीं होती। किसी साधना से नहीं होती। जो मेरी मति हुई है। ये महसा पाद रजो अभिषेकम निष्किंना नाम नयावत अकिंचन उन्हें कहते हैं चाहे वो चक्रवर्ती सम्राट ही क्यों ना हो। भगवान के सिवा जिसका कोई आस बल भरोसा नहीं वो अकिंचन कहा जाता है और अगर अपने एक लंगोटी और कमंडल में भी आ सकती है तो अकिंचन नहीं कहा जाएगा केवल एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास उसी को अकिंचन कहते हैं जो केवल प्रभु में ऐसे महापुरुषों की चरण रज से ऐसी मति होती है किसी के सिखाने पढ़ाने से नहीं होती नसा मस्त्र इस पर सत्य अनगोदथा जब तक ऐसे महापुरुषों के चरण रज का स्पर्श नहीं होता तब तक ऐसी जैसी मेरी मति है।
प्रह्लाद जी कह रहे ऐसी नहीं होती। तो जो भगवत स्वरूप समझ के भक्तों की पद धली को अपने शरीर पर लगाता है। यह बड़े सौभाग्य का विषय होता है। ये वृंदावन सब भक्तों की चरण धली है। अनंत भक्त हो गए गोपी जनों से लेकर सब बड़े भाग्यशाली है जो रज का सेवन करते हैं। और जो भक्त का चरणामृत पीते हैं। कहां ढूंढोगे भक्त का चरणामृत? राधा कुंड, मानसी गंगा, मानसरोवर यह सब भक्तों के अवगाहन किए हुए कुंड हैं। बहुत सनातन से हैं। इनका आचमन मतलब लाखों भक्तों का चरणामृत। इनकी समानता कोई भी तीर्थ नहीं कर सकता।
मानसी गंगा राधा कुंड वास सरोवर अप्सरा कुंड उद्धव कुंड ये जो हमारे ब्रज मंडल के कुंड है इनकी समानता बड़े-बड़े महा भागवत प्रिया लाल के प्रेम में डूबे हुए अवगाहन करते हैं और वो चरणामृत पान रख लो दो बूंद ले लो दो बूंद ले लो राधा कुंड का जल मांस ये सब संत चरण अमृत है पक्का समझ लो और उिष्टामृत कहां से ले रोज भक्ति की जूठन किसी महान सौभाग्यशाली को मिलती है। ऐसे थोड़ी मिलती तो यह जो राधा राधा बोल रहे हैं ना यह उष्टामृत है। जीवन में जो स्वाद लिया वही बोल यही है।
ये भक्तों के द्वारा स्वाद लिया हुआ है। इसका पान करो वो उष्ट तो कहां सबको थोड़ी मिल रहा है। कभी ऐसा ये उच्चिष्ट सबको मिल रहा है। उस उच्चिष्ट का फल है। इस उच्चिष्ट में रति हो जाए। अगर इसमें नहीं हुई तो क्या फायदा? फायदा क्या महाप्रसाद भगवन नाम वैष्णवों में भगवत भाव श्री विग्रह में साक्षात भगवान का स्वरूप चरणामृत में भाव ये पहचान है कि आखिरी जन्म है इसका जिसके हृदय में इसकी श्रद्धा हो जाए भक्तों में भगवत भाव चरणामृत में श्रद्धा उच्छिष्ट में श्रद्धा चरण रज में श्रद्धा और श्री विग्रह में साक्षात मेरे प्रभु है तो पहचान है कि उसका हृदय अब अंतिम जन्म की तरफ जा रहा है।
उसका जन्म नहीं होगा। जिसको इस पर विश्वास है। महापुरुषों को पहचानना बड़ा कठिन है। कह रहे दूध पीने वाले बनावटी मजनू तो लाखों मिलेंगे लेकिन असली मजनू जो कटोरा भर खून दे सके वह तो बिरला ही होता है। या भाव यह है कि एक बार लैला ने सुना कि मजनू हमारे प्रेम में बावरा ना खा रहा है ना पी रहा है तो वो तो बहुत ऐश्वर्य संपन्न घर की थी तो उन्होंने पूरी बाजार में ऐलान करवा दिया मजनू जो भी खाए पिए उसको जो बाजार में पाए हमारे पास आवे सारा हिसाब हम देंगे ये ऐलान जब सुना तो लाखों मजनू तैयार हो गए कोई जलेबी पा रहा है, कोई दही पा रहा है।
तो हर दुकान से हजारों लाखों का बिल और ऐसे सैकड़ों दुकानों से वो तो आदेश कर दिया था सबका हिसाब हो जाता। एक दिन प्रार्थना की खजांची जी ने कि करोड़ों रुपया जा रहे हैं महीने में मंजनू की सेवा में। तो उन्होंने कहा मजनू और करोड़ों रुपया। अरे वह विरह में कुछ खा ही नहीं सकता। तो कैसे करोड़ों रुपया? बोले लाखों मजनू तैयार हो गए हैं। ठीक है। असली मजनू की पहचान कल हो जाएगी। बोले लैला मिलना चाहती है मजनू से अमुक मंच पर। अब तो जो देख भी नहीं पाते थे वो भी जो मजनू बने हुए रबड़ी रसगुल्ला वाले मजनू थे वो सब आ गए।
चाकू निकाली और कहा मेरा मजनू मेरे लिए छाती का खून दे। जितने रबड़ी रसगुल्ला वाले थे कदम पीछे सरकने लगे और जो असली मजनू था वह आया और ऐसे हाथ से चाकू ली और कहा आज मेरा जीना सार्थक हो गया क्योंकि तुम्हारे किसी काम में आ गया और जैसे मारने दिया पकड़ लिया कहा असली मजनू ये है तो वहां कह रहे हैं कि दूध और रबड़ी पीने वाले तो लाखों मजनू तैयार हो जाते हैं लेकिन असली मजनू जो एक कटोरा खून दे सके वो तो बिरला ही होता है ऐसे ही कह कह रहे कि रबड़ी रसगुल्ला खाना प्रणाम नमस्कार करना भेंट लेना लाखों भगत लेकिन भगवान के लिए जीवन अर्पित करने वाला भगवान के लिए तड़पने वाला भगवान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाला ऐसा तो कोई बिरला ही प्रेमी होता है।
ऐसा भक्त ईश्वर के से भी बढ़कर है। सातों सम मोहिमे जग देखा और मोते अधिक संत कर लेखा। एक भक्त प्रवर कालिदास जी हुए हैं जो इसी कोटि के महापुरुष थे। अद्वितीय भक्त निष्ठा उनकी थी। भगवत निष्ठा अद्वती उसी की मानी जाती है जो भक्त निष्ठा होती है। भक्त निष्ठा वाला भगवन निष्ठ जरूर होगा और भगवत निष्ठा वाला भक्त निष्ठ जरूर होगा। कालिदास जी श्री रघुनाथ दास गोस्वामी के गांव से डेढ़ कोस दूर रहते थे। उसी कुल के थे और ठीक वैसे ही भक्ति थी जैसे पूज्य रघुनाथ दास गोस्वामी की भगवन नाम में इनकी इतनी निष्ठा थी कालिदास जी की उठते बैठते सोते जागते खेलते हंसते बात करते हर समय इनकी जिभ्या पे नाम चलता रहता अगर ये कुछ बोलते तो पहले नाम बोलते फिर चर्चा करते देखो प्रया सत्संग में कहा है कि अगर आप नाम जापक उपासक हो तो चिंता मत करो पर आपको जब बात करनी है तो पहले धीरे से बोलो राधा फिर बात करो बीच में फिर बोलो राधा फिर जब बात का विश्राम करो राधा अगर इतनी सावधानी रखोगे तो पूरी बात जो आपने की वो भजन हो जाएगा आपका कोई कार्य प्रारंभ कर रहे राधा कार्य के बीच में बोलो राधा राधा कार्य के समापन में बोलो राधा और वो कार्य समर्पित वो भगवत प्राप्ति करा देगा आप बात को पकड़िए।
वह किसी बात को बोलने के पहले नाम बोलते थे। वह भगवत नाम के बिना तो बोल ही नहीं सकते थे। पहले बोलते थे राधा। ये भक्ति की पहचान है। विभीषण जी जब उठे तो राम राम राम। हनुमान जी ने राम नाम ते सुमिरन कीना हृदय हरस कप सज्जन चीना ये सनहट कर हो पहचानी साधते हो ये संत है क्योंकि सो के एकदम उठते हुए बोला राम राम ये भक्त का लक्षण है ऐसा सबको करना चाहिए नींद खुले तो पहले भगवन नाम उच्चारण करते हुए ही पृथ्वी को प्रणाम करके पैर रखना चाहिए अद्भुत नाम निष्ठा थी कालिदास जी की।
बिना नाम के वो बात ही नहीं करते थे। पहले नाम उच्चारण और यह नाम उच्चारण नाम में प्रीति कहां से प्राप्त हुई? बहुत सूक्ष्म बात है। इनकी भक्तों में बहुत बड़ी प्रीति थी। इसी से इनको नाम में इतनी प्रीति हुई। अब आजकल कोई बिरला ही ऐसा होता है जिसको किसी भक्त की प्रशंसा सुन के ईर्ष्या ना होती हो। जबकि हमारी भक्ति का स्वरूप यह है कि किसी को सुने कि वो नाम जप कर रहा है। उसका बड़ा यश हो रहा है। वो ऐसा है तो हमारे अंदर लालसा होनी चाहिए कि इनकी चरण रज माथे पर लगावे।
कभी इनका जूठन मिल जाए। कभी इनका चरणामृत मिल जाए। ये भक्तों की बात थी। हमारे अंदर क्या होता है? अहम प्रधान होता है तो लगता क्या है इतना हुआ क्या हुआ वो उससे मात्सर ईर्ष्या प्रकट हो जाती है यह भगवत विरोधी वार्ता है अंदर यह बात नहीं आनी चाहिए जहां वो सुनते कि अमुक जगह भक्त बहुत नाम जापक है तो बहुत धनी थे पर साधारण भष में छुप करके जाते कि बिल्कुल ऐसे दीन गरीब बनकर के और उनकी सेवा करते भक्तों को अच्छे-अच्छे पदार्थ खिलाने में उन्हें परमानंद का अनुभव प्राप्त होता है।
और ऐसा सिद्धांत भी है कि जैसे गर्भवती मां को भोजन पवाओ तो बच्चे को अपने आप पहुंच जाता है। ऐसे हृदय में हृदयस्थ विराजमान भक्तों के प्रभु हैं तो भक्तों को पवाओ तो प्रभु का अपने आप भोग लग जाता है। भक्तों के मुख से प्रभु बहुत आनंद पूर्वक पाते हैं। भक्तों को जब श्रद्धा पूर्वक सुस्वाद प्रसाद पवाया जाता है तो उसके स्वाद का अनुभव स्वयं भगवान श्री कृष्ण करते हैं। भक्तों को जब पवाया जाता है भगवान को अपने भोग लगाने से इतनी प्रसन्नता नहीं होती जितना संतो के भोग लगाने से होती है।
इसी बात को एक भक्त ने पकड़ लिया और संतों को पवाना शुरू किया श्रद्धा से। अब उनके पास एक सीमित अर्थव्यवस्था थी। अगर संतों को पता है कि बहुत श्रद्धा पूर्वक यहां प्रसाद पवाया जाता है तो बिना बुलाए भी कृपा करके आने लगते हैं। वहां खूब संतों का आगमन होता और बनवा के पवाते। धीरे-धीरे संपत्ति राधेश्याम अष्ट धातु के ठाकुर जी थे। तो ठाकुर जी की जितनी सेवा पात्र थे स्वर्ण चांदी के जो थे सब बेचकर संत को पवा दिया। ठाकुर जी से कहा कल अगर संत आए व्यवस्था नहीं हुई तो सरकार आपको बाजार में ले जाएंगे हम वो आपको बेच देंगे क्योंकि संत भूखे नहीं जाएंगे।
आप ही रह गए हो हमारी संपत्ति। भगवान ने कहा कि हमारे संबंध से तो संतों को बस आप संतों के पाने से प्रसन्न होते हैं। यह मैंने सुना है। आप अपने भोग लगाने से उतना प्रसन्न नहीं होते। तो अब कल संत आएंगे। अगर उनके भोग की व्यवस्था नहीं हुई तो तैयार रहना। हम आपको बाजार में बेच देंगे। भगवान हंस दिए और कहा जो संतों की सेवा करता है उसके यहां ऐश्वर्य की कमी नहीं रहती। और जरा सा उनका कृपा कटाक्ष कुल परंपरागत लक्ष्मी जी उनकी सेवा में उपस्थित हो गई। तो जो श्रद्धा पूर्वक भक्तों को सुस्वाद पदार्थ प्रसाद पवाते हैं।
भगवान भक्तों की जिभ्या से पान करते हैं। भगवान को स्वयं भोग लगाने से इतनी प्रसन्नता नहीं होती जितना संत और भक्तों को पावाने से होती है। भक्तों को खिलाकर और उनका किसी भी तरह से उष्ट पाना ये इनका स्वभाव था कालिदास जी का। इसीलिए इनके निरंतर नाम चलता था। अब जैसे कोई भक्त उच्छिष्ट देने के लिए तैयार नहीं होते। वह तो बड़े कृपा करते हैं तब उष्ट देते हैं। तो वो सावधानी रखते थे। कहीं भी तो पात्र धोकर फेंकेंगे। वहां से जल ले लेना। अगर चूक हो गई तो पात्र में ऐसे हाथ करके बस कर लेना।
वो अपने पात्र ले गए चाट लेना। उच्चिष्ट का भाव निरंतर नाम जापक भक्त चरणामृत भक्त पद धूल तो लगाते ही और उच्छिष्ट पाने के लिए भक्त सेवा करते हैं। इनका और बड़े-बड़े महापुरुषों का कथन है कि योग से, यज्ञ से, तप से, पाठ से, अध्ययन से और साधना अभ्यास से प्रेम प्रकट नहीं होता। वह प्रेम प्रकट होता ही है। भक्त चरण रज, भक्त चरणामृत भक्त उच्छिष्ट से। अब इनको पता चला कि एक झा नाम के चतुर वर्ण के भक्त हैं जो एकांत में रहते खूब नाम जप करते हैं। पति पत्नी दोनों नाम कीर्तन करते हैं और गांव में सेवा करके एक एक रोटी जो मिलती है उससे अपना अब इनको लालच लगा।
यह प्रभु से प्रार्थना की कि ऐसे भक्त का उिष्ट प्रभु कैसे मिले हमें उपाय बताओ क्योंकि हम जाएंगे तो तत्काल सम्मान प्रदर्शित करेंगे और सम्मान प्रदर्शित करेंगे तो उष्ट नहीं मिल पाएगा उनका भगवान से प्रार्थना की तत्काल युक्ति आई साधारण वेश में और उस समय आम का समय था तो बड़े-बड़े आम लेकर करके घर गए। प्रतिष्ठित कुलोभूत कालिदास को देखकर अपनी टूटी फूटी झोपड़ी में वो दंपत्ति तो आश्चर्यचकित हो गए। हाथ जोड़कर कांपते हुए कि भगवन आपके लायक हमारे घर में बैठने योग्य जगह भी नहीं है।
हाथ जोड़कर अभ्यर्थना करने लगे। उन्होंने कहा नहीं नहीं इसकी जरूरत नहीं है। हम तो बस आपसे ऐसे मिलने बात करने आए हैं। एक फटा सा बोरा पड़ा था। उसी में कालिदास जो महान भागवत वो बैठ गए। वो हाथ जोड़े प्रभु आप यहां ये स्थान आपके बैठने लायक भी नहीं। और जहां भक्त उनको कहते थे आपने बड़ी कृपा की। कि आप यहां आए लेकिन ये आपके योग्य नहीं। आप इतने महान मैं इतना नीच आप जैसे श्रेष्ठ पुर हम जैसे नीचों के यहां आएंगे तो आपका उपहास होगा। प्रभु आपको पता नहीं मैं नीच हूं।
धनहीन हूं। प्रभु आपको यहां बैठना ठीक नहीं। कोई देख लेगा तो आपकी निंदा करेगा। कालिदास जी ने कहा कि आपको पता है आपके शुभ दर्शनों से हमें श्री कृष्ण का दर्शन प्राप्त हो रहा है। देखिएगा और आज मैं आपको उस भाव से देख रहा हूं कि त्रिभुवन में आप जैसा कोई सत्कार पाने योग्य नहीं है। जिसकी जिभ्या भग नाम और इतनी दन्यता अहो पचो गर्याते नाम्यम यदि आप हमारा कुछ भी सम्मान करना चाहते हैं तो अब आप हाथ जोड़ना बंद कर दें। हमारे सामने हाथ मत जोड़े और आप एक कृपा करें।
आप दोनों अपने चरण धोए। हमें चरणामृत दे दे क्योंकि हमें धोने तो देंगे नहीं। और उन्होंने कहा कृष्ण कृष्ण कृष्ण आप ये क्या बोल रहे हैं महाराज? आप गिड़गिड़ाते हुए झा भक्त ने कहा प्रभु ये कैसी भूली भूली सी बातें कर रहे आपको पता है मैं कौन हूं मैं सब तरह से हीन हूं मेरा दर्शन और स्पर्श भी अमंगलमय है धन्य है यही यही दरबार दीन को आदर रीति सदा चली आई और उनके चरणों में गिरने लगे कालिदास जी ने अपने चरण समेटे और कहा देखो को अतिथि का सत्कार करना चाहिए। इतना आपको पता है?
उन्होंने कहा हां प्रभु पता है। तो फिर एक बात करो। मैं आ रहा था रास्ते में आम देखा। आप ठाकुर जी को अपने भोग लगाओ आम का। और आप दोनों पाओ और मैं ये देखूं। यह मेरा सबसे बड़ा सत्कार हो जाएगा। भक्त ने कहा मालिक आप कैसी बात करते? मैं पाऊं और आप बैठे हैं। आप हमारे यहां आए हैं। उन्होंने कहा देखो यदि आप मुझे बड़ा मानते हैं और पूजनीय मानते हैं तो आप मेरी बात भी तो मानिए किसी भी तरह से देखो अगर थोड़ी भी प्रीति आपकी हम में है तो मेरी ये बात मान लो। वह भक्त बहुत दन्य हो रहे हैं।
यहां कालिदास जी कह रहे हैं जो अपने भक्ति का विज्ञापन करता है। जो भक्ति की दुकानदारी करता है। भक्ति के नाम पर पूजा प्रतिष्ठा और अर्थ की प्राप्ति करता है। वह आप जैसे अकिंचन भक्तों को कैसे जान पाएगा? अहंकार रहित साधना के बल से रहित केवल प्रभु के नाम और प्रभु के आश्रित आप जैसे निर्मल भक्तों का संग तो केवल अहेतु की कृपा से होता है। आप सच्ची मानिए त्रिभुवन को पावन करने वाले हैं। आप अपने को नीच मत कहिए। जब कालिदास जी दन्य होकर ऐसी बात करने लगे तो भक्त ने आम ले लिए प्रणाम किया और कहा मैं आपके सामने पा तो नहीं सकता पक्का वचन है कि आपके जाते ही मैं भोग लगाऊंगा पर आपके सामने नहीं पाऊंगा क्योंकि आप बैठे हमारे घर में आकर और हम पा ले कालिदास जी ने विचार क्या सब किया करा माटी हो रहा है हमको उष्ट तो इनका मिलेगा नहीं झूठन फिर विचार किया कि अभी से ले शाम तक फेंकेंगे ही ना पाके हम मैं पेड़ की आड़ में बैठा रहूंगा जब फेंकेंगे तब मैं निकल लूंगा प्रसाद लेके कैसी उच्चिष्ठा मृत के प्रति निष्ठा 10 20 कदम घर के बाहर तक छोड़ा।
कालिदास जी ही अपने घर गए सो लौट पड़े और दरवाजे के पास एक वृक्ष था उसकी ओठ में छुप के बैठ गए। अब वो दोनों जो 10 कदम चल के आए थे उनके जो चरण चिन्ह थे अपने अचला में चरण रज बांधे। यह है कीमती अमोग वस्तु। कोई भाग्यशाली ही इस अमोग वस्तु का सेवन कर पाता है। चरण रज बांधे एक चीज तो मिली भक्तों की चरण रज। संपूर्ण धूल उठाकर फिर अपने शरीर पर लगाई। अब वो अपनी पत्नी से बात कर रहे कि देखो इतने महा भागवत कालिदास जी अमनिया लाए हैं आम का। चलो ठाकुर जी को भोग लगाओ प्रसाद पाओ।
उनकी आज्ञा का पालन करो। यह श्री कृष्ण प्रेम की प्राप्ति कराएंगे आम क्योंकि इतने बड़े महा भागवत चलकर लाए हैं। पति की आज्ञा हुई। पत्नी ने आम को उठाया। अमनिया के अधो करके ठाकुर जी को भोग लगाया। और वो एक-एक गुठली चूसचूस के पा रहे। भगवान को अर्पित की हुई भक्त के द्वारा लाई हुई पाया। पत्नी ने फिर वो आम के छिलके और वो चूसी हुई गुठली। बाहर जाकर के पेड़ के पास ही फेंको। तो वो छुपे बैठे थे। भगवान वैसा ही भक्त के जीवन में करते जैसी उसकी चाह होती है। फेंक के चले गए।
कालिदास जी बहुत प्रसन्न है। ओो हरि की अपार कृपा एक एक छिलका चाट रहे हैं। एक एक गुठली चाट रहे हैं। आप विचार कीजिए एक उच्च कुल का एक महा भागवत एक ऐसे दैन्य महा भागवत की गुठली चाट रहा है। किसलिए इनका उष्ट मुझे नाम में प्रीति करा देगा। और नाम के प्रेमी हैं। जैसे जैसे वह उष्ट पा रहे हैं वैसे वैसे उनको रोमांच हो रहा है। वैसे वैसे भगवान का नाम जैसे मशीन में चलाया जाए ऐसे चल रहा है नाम अशुभ प्रवाह हो रहा है। यहां वर्णन कर रहे हैं कि जो भक्त चरण रज का सेवन भक्त उच्छिष्टामृत का सेवन और भक्त चरणामृत का सेवन करता है उसका अहंकार गलित हो जाता है।
सत्संग का प्रारंभ इसी बात से हुआ था कि अहंकार जब तक गलित नहीं होगा तब तक हमारी साधना रंग नहीं लाएगी। इसलिए हमें नाम में प्रीति हो जाए। नाम हमें प्राणों से प्यारा लगने लगे। बड़े-बड़े महापुरुषों ने नाम को दुलराया गाया। कह रहे हैं कि मर जावेगा मूर्खा क्यों ना भजे भगवान ये झूठी संपत्ति माया जगत की इसका मत करना अभिमान यहां से जब जीव जाता है तो साथ कुछ नहीं ले जाता पाप कर्म और पुण्य कर्म ले जाता है पाप और पुण्य कर्म पाप अधिक हुए नरक भोगो पुण्य कर्म स्वर्ग भोगो फिर मृत्यु लोक में आओ मत करना अभिमान वेद शास्त्र कहवे तज ममता भज नाम तो अमर होए रहवे अगर नाम चल रहा है सच्ची मानिए तो वैसे ही आप अविनाशी हैं आप मृत्यु से बच जाएंगे आपको ऐसा ज्ञान हो जाएगा कि शरीर छूटेगा ऐसे जैसे सांप की केचुल कोई कष्ट नहीं जो जन्मत मरत दुसा दुख होई नाम जापक को नहीं होता कष्ट कष्ट वैसे शरीर छोड़ता है जैसे सांप अपनी केचुल पुरानी छोड़ देता है।
जैसे कोई पुराना वस्त्र उतार के फेंक देता है। जैसे गजराज के गले से फूलों की माला गिर जाए उसे पता ना चले ऐसे भक्तों का शरीर छूटता है। यदि नाम जप चल रहा है तो भारी दुख से बच जाओगे और अगला जन्म नहीं होगा। तज ममता भज नाम तो अमर रहवे कहत दीन दरवेश फिर अवसर कब आवे भज्या नहीं भगवान रे मूर्ख मर जावे कभी किसी भी क्षण शरीर तुम्हारा छूट सकता है ताक मनवा धिक है साहिब सुमरा ना अलग पुरुष नहीं ओ लख्यो पड़ो मोह के माही पड़ो मोह के मा समझ ले मनवा मेरा ब पुतला जान होएगा सुना डेरा कहत दीन दरवेश ज्ञान लगी ना धाकू साहब सुमरा ना धिक कहे मनवा को यदि साहब श्री हरि का नाम जप नहीं किया प्रभु का नाम जप नहीं किया तो ये तेरा शरीर तेरा सब साम्राज्य यही पड़ा रहेगा कोई तेरे साथ नहीं जाएगा अगर नाम जप कर लेगा तो शुद्ध ज्ञान हो जाएगा शरीर राग छूट छूट जाएगा।
शरीर संबंधियों का मोह छूट जाएगा। इसलिए सुमिरो निरंतर नाम सुमिरो रग रग नाम रमयो रहे तो निर्गुण अगुण के रूप जो तुम्हें चाहिए निर्गुण निराकार सगुण साकार सबका साक्षात्कार इसी नाम से हो जाएगा। रग रग नाम रमयो रहे। ये रग रग नाम कब चलता है? बोरी सखी जी कहती है जब नाम स्वास स्वास ही नाम स्वास को भेद मिटावे तब रोम रोम और रग रग बोले तब स्वाद नाम को पावे हर स्वास में अधिक से अधिक नाम जप करो धीरेधीरे उतरेगा तो बोले रग रग नाम रमयो रहे निर्गुण अगुण के रूप जो तुम्हें चाहिए निर्गुण निराकार सगुण साकार सब भगवान का साक्षात्कार ज्ञान का हो जाएगा राम श्याम रवि एक है सुंदर शगुन स्वरूप चाहे राम रूप देखना चाहो चाहे श्याम रूप देखना चाहो रसना नाम संभारिए श्रवण सुनिए नाम नैने निरखो नाम को रविदास है काम रात दिन नाम जप करो ऐसे नेत्रों में नाम लिखा दिखाई दे कानों में वही नाम सुनाई दे और हृदय से वही नाम उच्चारण हो जो चाहोगे राम रूप श्याम रूप निर्गुण निराकार सगुण साकार जो चाहोगे सब प्राप्त हो जाएगा।
संत अनेकन जे भय किन नाम पुकार रविदास सब छोड़ के नाम ही नाम उच्चार सब छोड़ो बस नाम उच्चारण करो देख लो बड़े बड़े संत हुए हमें कल बहुत अच्छा लगा सब साधन है पर नाम नहीं था तो उन्होंने बताया मेरा मन अशांत है साधन बताए बहुत अच्छे साधन चल रहे हैं तब उनसे एक बात कही कि आपका चित्त नाम में है माला तो चला लेते कभी-कभी ऐसे निरंतर नाम नहीं आपको नाम दिखाई दे रहा है नहीं आप नाम लिखते हैं नहीं आप नाम अंदर सुनते हैं नहीं बस ऐसे जप होता है तो मन को कहां से लगा पाओगे बाहर बाहर के साधन से मन अंतर्मुख नहीं लगता।
ये बात अच्छी पकड़ लेना। बाहर के साधन को जब अंतर में ले जाते हैं तो अंतर की गुफा का अंधकार नष्ट होता है। हृदय गुफा वो क्या होता है? राधा राधा देख रहे हैं। राधा आप सुन रहे हैं। नाम लिखा राधा वही उच्चारण राधा। राधा देख लीजिएगा। परिणाम में देख लीजिएगा। ये बहुत अच्छा लगा ये सुनकर साफ साधन है लेकिन नाम का निरंतर चिंतन नहीं बोले वेदांत अनुशीलन करता हूं वेदांत का तुमको पता है उसी मार्ग से आए संत अनेकन जे भय किन नाम पुकार रविदास सब छोड़ के नाम ही नाम उंच विचार राधा राधा राधा अगर नाम नहीं है तो बहुत ये बहुत अनुभव की बात है बहुत अनुभव की बात जीवन का अधूरापन नहीं पूरा होता साधना अधूरी ही बनी रहती है क्योंकि मन का विश्राम तभी होगा जब बार-बार उसी में सुनो उसी को देखो उसी को चलाओ फिर प्रश्न होता है कि हम ज्यादा देर इसमें टिक नहीं पाते तो आप इतना समझ लीजिए कि एक बार आप ऐसे लिखें राधा यही शरणागत मंत्र निज मंत्र जो मंत्र गुरु मंत्र मिला है एक बार लिख 1000 बार का फल है उसका यदि आप एक माला कर लिए तो सहस्त्र मालाओं के बराबर हो गया ऐसे लिख के राधा थोड़ी सा लोभ बढ़ाओ थोड़ी सी एकाग्रता करो थोड़ा मन को रोकने की चेष्टा करो अगर दो मिनट रोकना सीख गए तो अनेकों वो जन्मों का बिगड़े मन आपके अधीन होने लगा।
दो मिनट अधीन हुआ। चिंता मत करो कि हमसे तो अगर ऐसे करते हैं तो बहुत कम भजन होता है। वो कम भजन बहुत बड़ा लाभ देने वाला है। आप मान लीजिए जो आप लिख रहे हैं वही आप देख रहे हैं वही आप सुन रहे हैं वही आप उच्चारण कर रहे बाजी जीत जाएगी। संत अनेक जे भय जितने बड़े बड़े महापुरुष हुए सब नाम प्रेमी हुए नाम का सबने रसास्वादन किया कह रहे हैं कि यदि आपने नाम जप नहीं किया तो आप चाहे जो शरीर से साधन कर ले चाहे जो और साधन कर ले उतनी उन्नति प्राप्त होने वाली नहीं। जब नाम के अंदर रूप प्रकाशित हो जाता है तो सर्वस्व त्याग हो जाता है।
जो त्याग वैराग्य के लिए लोग प्रयासरत रहते हैं। पूरा प्रयास नहीं हो पाता। तो कह रहे हैं मेरे भाव में ज्ञान और वैराग्य ज्ञानेश्वर जी महाराज का बात बहुत बड़े महापुरुष है। इनसे बड़ा तो ज्ञान और वैरागी और योगी ज्ञानेश्वर जी इनहीं के सामने तो गए थे वो 1400 वर्ष के चांगदेव जी ज्ञानदेव जी के सामने गए थे वो अपना तप दिखा रहे कि मैं 1400 वर्ष का हूं सिंह को वश में करके सांप की चाबुक तो चबूतरे पर बैठे थे तो जड़ चबूतरे से कहा चलो चल क्यों चैतन्य घन परमात्मा बुद्धि संकल्प किया वैसे हो गया ऐसे महापुरुष पुरुष कह रहे जो भी ज्ञान है, जो भी वैराग्य है, बिठोबा की कृपा है, विट्ठल भगवान की जो कृपा है, वो नाम से जागृत होती है।
बड़े-बड़े महापुरुषों के नाम जितना उपासक नाम जपेगा उतना ही उसको भगवत साक्षात्कार के नजदीक एक एक नाम ले जा रहा है। अपने आराध्य का साक्षात्कार सब में होने लगेगा जिस समय आपका निरंतर नाम चलने लगेगा। नाम के बिना क्षण भर भी जो चैन से ना रह पावे तो समझ लेना प्रेम की पराकाष्ठा प्रकट होने वाली है। जो प्रभु का भजन करते हैं उनको किसी और की तरफ देखने की जरूरत नहीं कि कौन सा क्या साधन संसार में कर रहे हैं। हमको सिर्फ नाम पकड़ना है। संसार की समस्त कठिनाइयां ये बड़े महापुरुषों के वचन है।
समस्त विपत्तियां समस्त दुखों का नाश करने में समर्थ है नाम। अगाध ज्ञान वैभव का समुद्र है नाम। अपार दुर्गम गति प्रदान करने वाला है नाम। बस ग्रहण करने योग्य है तो एक नाम तत गहन को नाम है। भज लीजे सोई। लीला सिंधु अगाध है। गति लखे न कोई नाम अगाध लीलाओं में प्रवेश करा देने वाला। तत्व का गहन रूप नाम है। अगर नाम जप हो रहा है तो तुम्हें और फिर कोई साधन की जरूरत नहीं है। ऐसा नाम अपनी जीभ पर रख लो। तुम सबसे बड़े दानी माने जाओगे और जरा मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लोगे।
कंचन मेरु सुमेरु है गज दीज दाना। कोटि गऊ जो दान दे नहीं नाम समाना। एक जप रहा है राधा राधा एक करोड़ों गाय ये सब दान कर रहा है जितने दान करने की सामग्री है कंचन भूमि भूमि दान स्वर्ण दान हाय दान गज दान गौ दान अन्नदान कन्यादान विविध दान और एक नाम जप कर रहा है राधा राधा राधा तो बोले नहीं नाम समाना नाम वाले की समानता ये दान नहीं कर सकते अस मन लाव नाम रसना तेरो बर न होई जरा मरना ऐसा ऐसा भाव करो कि नाम चलने लगे तो तेरा दोबारा जन्म नहीं होगा। तुझे मृत्यु का दुख नहीं होगा।
एक मन एक दशा एक व्रत धरिए नाम देव नाम जहाज है भवसागर तरिए। बस एक साधन पकड़ लो। एक ही इष्ट बना लो। एक ही अपनी दशा बना लो। राधा राधा राधा राधा राधा इससे भव समुद्र से तर जाओगे। भगवत प्राप्ति हो जाएगी। शेष चर्चा आगे। श्री राधा वल्लभ लाल
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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