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जो प्रभु के हो गए, उनके जीवन में कैसा अद्भुत परिवर्तन आता है ? // 14/05/2025

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हदितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वापय परम शीतल माश्रयाम निर्वापय परम शीतल माश्रया परम सच्चिदानंद घन आनंद समुद्र प्रेम समुद्र ज्ञान वैराग्य भक्ति ऐश्वर्य अनंत शक्तियों के स्वामी प्रभु श्री कृष्ण चंद्र गुरु कृपा करके ऐसे अमृतमय वचनों का उपदेश कर रहे हैं। श्रद्धा विश्वास पूर्वक यदि श्रवण किया जाए और महत्व बुद्धि रखकर मनन किया जाए और अपने आचरण में उतारा जाए तो इसी जन्म में समस्त कर्म बंधनों से मुक्त होकर भगवत प्राप्ति हो जाए।

प्रभु करुणा करके कह रहे हैं कि तपस्वीयों से भी श्रेष्ठ और ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ कर्मकांडियों से भी श्रेष्ठ योगी है। उन योगियों में सबसे श्रेष्ठ योगी मेरे मत में वह है जो केवल मेरे चरणों का आश्रय लेकर निरंतर मेरा भजन करता रहता है। मैया शक्त मना पार्थ योगम यंजन मदाश्रय ये बहुत महिमा के शब्द है। भगवान का जो समग्र रूप है ज्ञान रूप तत्व बोध प्रेम रूप महाधुर्य रस तक यह सब उस भक्त को प्रभु स्वयं हृदय में बैठकर अनुभव करा देते हैं जो प्रभु के आश्रित हो गया है।

खास बात ध्यान देने की है कि हम वर्तमान में साधन भजन कर सकते हैं। भगवत आश्रय लेकर के हमारा जन्म इसीलिए हुआ है। पर हमारे जो पूर्व संचित कर्म है वो सुरक्षित है। उनको हम नष्ट कर सके ऐसी सामर्थ्य नहीं है। हमारा साधन नष्ट कर सके ऐसी सामर्थ्य नहीं। जैसे कल महापुरुष के वचन में सुन रहे थे कि कोई भी पूर्णतया निष्पाप हो जाए ऐसी किसी भी महात्मा में सामर्थ्य नहीं। पूर्णतया निष्पाप तो भगवान श्री हरि करते हैं। अहम तम सर्व पापभ्यो सर्व शब्द पूर्व संचित पाप आगे क्रियमान में जो चूक हो जाए वो वर्तमान में जो हमसे त्रुटि हो गई हो रही उन सब का सुधार केवल प्रभु की शरणागति से होता है।

हमारी बुद्धि कितनी है? ब्रह्मा ने इन ब्रह्मांडों में अनेक जीवों की रचना की है। उनमें से एक छोटी सी खोपड़ी में एक छोटी सी बुद्धि है। उसी बुद्धि की प्रेरणा से मन, चित्त और अहंकार मैं यह कर सकता हूं। मैंने यह किया, मैं यह करूंगा। यह विमूढ़ता ढोते हुए हमें जन्म के जन्म व्यतीत हो रहे हैं। भला उस अगाध ज्ञान समुद्र को हम अपनी सीप जैसी बुद्धि से कैसे अनुभव कर सकते हैं? वो अगाध ज्ञान समुद्र कृपा करके हमारी बुद्धि में आकर विराजमान हो जाता है। हमारी बुद्धि वहां तक नहीं पहुंच सकती।

इसलिए भगवान आदेश करते हैं। यह बड़ी उनकी कृपा है जो ऐसा आदेश करते हैं। वो कह योगम यजन मदाश्रय तुम केवल मेरे आश्रित हो क्योंकि तुम मेरे हो। योगम यंजन कहते हैं कि मैं श्री भगवान का अंश हूं। पक्का इसमें किसी साधना की जरूरत नहीं है। हूं तो हूं उनका अंश हूं। इसमें किसी साधना की जरूरत नहीं। अब यह जो हम प्रभु के भाव से विलग होकर देह भाव स्वीकार कर लिया। अब गलती हो गई। हम प्रभु के अंश होते हुए भी देह भाव को स्वीकार कर लिया। मैं स्त्री, मैं पुरुष, मैं करता, मैं करूंगा, मैं ऐसा कर सकता हूं।

यह विमूढ़ता छा गई। अहंकार विमूढ़ आत्मा और परम पद भगवत साक्षात्कार उसी को प्राप्त होता है जिसकी ये मूढ़ता नष्ट हो जाए। गच्छ मूढ़ा पदम्यम तत अव्यय पद का वह अधिकारी होता है जिसकी मूढ़ता नष्ट हो जाती है। वह ज्ञान प्रभु देते हैं। जिससे हमारी मूढ़ता नष्ट होती है। प्रभु ही हमारे संचित कर्मों को भस्म करते हैं। प्रभु ही हमारे क्रमाण को निष्प्रभावित कर देते हैं। वह हमें अगले जन्म में बांध नहीं सकता। प्रारब्ध को भोगने की सामर्थ्य भी भक्त के मन में प्रभु ही दे देते हैं।

मतलब विचार करके देखा जाए तो सारा का सारा प्रभु के चरणों के आश्रय से हमारा काम बन जाता है। हमें बिल्कुल चिंता नहीं करनी। बस ये अहंकार को प्रभु के चरणों में समर्पित करना है। यह जो देहाभिमान है यही हमारी दुर्गति का कारण है। पूरा अंतःकरण इसी से प्रभावित है। अहंकार से वह जैसा प्रेरित करता है, बुद्धि वैसे निश्चय करती है। मन वैसे संकल्प करता है। इंद्रियां वैसे व्यवहार करती है। इसी अहंकार की जगह भगवत स्वरूप आचार्य गुरुदेव शास्त्र वाणी इसका अधिकार हो जाए तो पूरा अंतःकरण भागवतिक हो जाए।

भागवतिक अंतकरण निर्लेप होता है। जो ही निर्लेप हुआ ते ही स्वरूप स्थित हो गया। देह भाव खत्म हो गया। देह भाव खत्म हुआ। अब भगवत भाव में जो भाव चाहे स्वीकार कर ले। सखा भाव सखी भाव गोपी भाव कुछ भी आचार्य कृपा से जो भाव अब वो तैयार भूमि है वो भाव उसके अंदर प्रकाशित हो जाएगा। जब उपासक प्रभु की इस बात को स्वीकार करता है कि सबसे बड़ा साधन सबसे बड़ा योग है। मैया शक्त मन पार्थ योगम यजन मदाश्रया केवल मेरे आश्रित होकर केवल मेरे में मन समर्पित कर दे। इससे बड़ा कोई साधक नहीं।

इससे बड़ा कोई सिद्ध नहीं। पीछे चर्चा हुई थी कि हमारी वृत्ति बिगड़ गई, स्वभाव बिगड़ा हुआ है। बिगड़े का तात्पर्य होता है भगवत विमुख कार्यों की रुचि होना। शास्त्र विरुद्ध आचरण में सुख बुद्धि होना। इसे बिगड़ा स्वभाव कहते हैं। बिगड़ी वृत्ति है, बिगड़ा स्वभाव है। पर तुम्हें चिंता नहीं करनी। तुम भगवत आश्रित हो चुके हो। तुम्हें चिंता नहीं करनी। इसका भाव समझ रहे हैं। भाव बिगड़ गया है, वृत्ति बिगड़ गई है। पर क्रिया नहीं बिगड़ी। क्रिया बिगड़ गई तो साधक ही नहीं रहा।

भगवान यह नहीं कह रहे कि तुम भ्रष्टाचार करो, मनमानी आचरण करो। तुम मेरे भक्त हो। ध्यान से समझिए। आपकी वृत्ति बिगड़ी हुई है। एक लक्ष्य पर नहीं है। आपका भाव बिगड़ा हुआ है। आप अपने गुरुदेव प्रदत्त भाव में स्थित नहीं है। आपका स्वभाव प्राकृतिक है। चलेगा। चलेगा। क्योंकि आप आश्रित हो। एक ना एक दिन यह अहंकार चूर हो जाएगा और भगवत कृपा मार्ग पुष्ट हो जाएगा। पर क्रिया नहीं क्रिया के लिए आदेश नहीं है। भाव बिगड़ गया है। वृत्ति बिगड़ गई पर वह सह रहा है। वो कुमार्गगामी प्रवृत्तियों की प्रेरणा से कुकर्म नहीं कर रहा।

शास्त्र विरुद्ध आचरण नहीं कर रहा। यह बात समझनी होगी। भगवत आश्रित के द्वारा भूल न देह कुमारग पाऊं। काम वृत्ति आ रही है। क्रोध भी आ रहा है। लोभ भी है, विषय भोग में सुख बुद्धि भी है। पर भगवत आश्रित है। बिल्कुल निश्चिंत हो जाओ। सब संभाल लेंगे। हरि क्रिया नहीं करनी। क्रिया करिया अगर आप तो फिर भगवत आश्रित नहीं माने जाओगे। ये बात ध्यान रखना। वृत्ति खराब होना अलग बात है। खराब वृत्ति की प्रेरणा से क्रिया कर देना। यह बात गलत हो गई। यह साधना के अंतर्गत नहीं है।

पूर्व जन्म के संस्कारों से हमारी चित्तवृत्ति मलिन है। बहुत से जन्म हो गए। हो सकता है। हमारे अंदर प्रवृत्तियां विषय भोगों की बनी रहे। कोई आश्चर्य की बात नहीं। हो सकता है। ये हमारा देहा अभिमान हमको गिराने की प्रेरणा करें। ऐसा भी हो सकता है पर हम गिर जाए या भोगों में बह जाए ऐसा नहीं हो सकता उसको सहता है उपासक सहित सहित बाढ़ भगति गृह तनु गुरु हितगार अपने मन को अपने शरीर को गुरु आज्ञा में गुरु आज्ञा का घर है ये गुरुदेव के बिके हुए हम है हम ऐसे आचरण कैसे कर सकते हैं प्रेरणा हो रही मन की वृत्तियां खराब है।

स्वभाव ठीक नहीं है। भजन में रुचि नहीं है। कोई भगवत भाव नहीं है। फिर भी हमारा कल्याण हो जाएगा। ध्यान से सुनिए। फिर भी हो जाएगा। क्यों? हम भगवत आश्रित हैं। अंदर की ये बात है। बाहर क्रियाओं में उतर गए तो फिर भगवत आश्रित कैसे रहे? बात समझनी है। ये छूट नहीं हो रही कि आप जो चाहो कर लो और भगवत आश्रित हो। नहीं नहीं ऐसा नहीं भूल ना दे कुमार्ग पाऊ यद्यपि कुमार्गगामी प्रवत्तियां है दुर्वासना मम सदा परिकर्षती वो सिद्ध नहीं हो गया है उपासक है उससे गलत प्रेरणाएं हृदय में आ सकती है लेकिन गलत प्रेरणा के अनुसार आचरण वो नहीं कर सकता क्योंकि उपासक है क्योंकि वह साधक है क्योंकि भगवत मार्ग का पथिक है ऐसा पथिक अगर कहीं उससे कोई पाप बन जाता है, असावधानी है, चूक है।

यह भगवान अंदर की बात जानते हैं। प्रियालाल अंदर की बात जानते हैं। वो हृदय की बात देखते हैं। बाहर की बातें नहीं। आपके हृदय में भगवत प्राप्ति की प्रबल लालसा है। आप अपने को बलहीन मानकर प्रभु के आश्रित हैं। अंदर से और आपसे कोई चूक हो गई। तो स्वपा मूलम भजत प्रियस त्य भावस हरि परेश विकर्म यतम कथित धनो सर्वम हद आ बड़े अमृतमय वचन है उपासक ने श्री भगवान के चरणों का सहारा ले लिया है। ये अंदर की बात है। अंदर की वाणी की बात नहीं। हृदय से उसने देख लिया। मैं किसी योग्य नहीं।

हे हरि आपके चरणों का ये अंदर की बात हे राधा वल्लभ लाल मैं नीच अधम आप तक नहीं पहुंच पाता। मेरी ऐसी वृत्त नहीं कि मैं पहुंच जाऊं ना वृत्तियां पहुंचा पाता ना मैं स्वयं पहुंच पाता नाथ आपने घसीटा है अब छोड़ मत देना और घसीट लो प्रभु ये माया प्रपंच मुझे कहीं घसीट ना ले एकमात्र प्रभु के चरणों का स्वपाद मूलम भजत प्रियस तक्तान्य भावस खास बात समझिए उसने अन्य भावों का आश्रय त्याग दिया है धन बल, तप बल, ज्ञान बल, बुद्धि बल, जन बल, महत्व यह सब कुछ छोड़कर केवल भगवत आश्रित है।

तो भगवान का प्रियस, वो भगवान का प्यारा है। यह चरणारविंद ही हमें पार कर सकते हैं। दूसरा कोई बल नहीं। अपार संसार समुद्र मध्य यह ऐसा संसार समुद्र है कि हमें लगेगा कि हम तो यहां किलोले कर रहे हैं। आनंदित हो रहे हैं। पास में ही ऐसे भयानक काम क्रोध आदि मगरमच्छ ये लील जाते हैं। इस संसार समुद्र की अपार थपीड़े तरंगे आ रही। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिष्ठा, मान ये बड़ी-बड़ी तरंगे हैं। कौन मुझे पार कर सकता है? हो दयालु शरणम ब्रजामा।

मैं ऐसा कौन दयालु है जिसकी शरण में जाऊं और मुझे बचा ले संसार समुद्र से। क्योंकि तैरने की मेरे में सामर्थ्य नहीं। मेरे में ऐसा बुद्धि बल नहीं है। मैं कैसे पार जाऊं इस संसार समुद्र के? गुरु कृपालु कृपया वदेत श्री विश्वेश्वर पादाज दीर्घ नौका सद्गुरु भगवान ने कृपा करके जो उपदेश किया विश्वेश्वर भगवान श्री हरि के चरणारविंद की आश्रयवृत्ति को स्वीकार कर लो। ऐसी सुदृढ़ नौका है ये तुम्हें पार कर देगी सुपाद मूलम भजताम प्रियस जो भगवान के चरणों का आश्रय लेकर भजन करता है माना उसकी वृत्तियां ठीक नहीं है स्वभाव ठीक नहीं है भाव ठीक नहीं है पर वो भगवत आश्रित है।

उसने नियम ले लिया है हृदय में कि प्रभु के सिवा हमें किसी का आश्रय नहीं लेना। किसी वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ, धन, तपस्या किसी का एकमात्र मेरे आश्रय दाता प्रभु है। जहां ऐसा भाव लिया अब उससे जो चूक होगी तो विकर्म विकर्म कहते हैं शास्त्र विरुद्धचरण। बोले यत पतितम कथित धन सर्वम हद सनविष्ट उसको भगवान पतित नहीं होने देते उसके हृदय में बैठकर के जैसे अर्जुन के रथ में बैठकर लगाम संभाल ली और घोड़ों को ठीक मार्ग पर ले गए ऐसे ही मन रूपी लगाम को भगवान श्री हरि संभाल लेते हैं।

इंद्रिय रूपी घोड़ों को ठीक सतमार्ग पर ले जाते हैं। अंदर से अपवित्र विचार हैं। पवित्र चेष्टाएं हैं। ये शास्त्र विरुद्ध बात है। भक्त का हृदय ऐसा होता है कि जैसे उष में कितना भी खाद पानी लगा दो उसमें अंकुरण नहीं हो सकता किसी भी वस्तु का। चाहे आप अनाज बोइए या कुछ भी ना घास उगेगी ना ऐसे उष वर्षण नहीं जामा संत हृदय जि उपज न कामा हम प्रभु के दास हैं सिंह सिंहनी का बच्चा भूखा मर सकता है घास चर के नहीं जिएगा हरि राम व्यास जी कहते ऐसे ही भगवान का दास हर कष्ट सह सकता है पर विषय भोग कर नहीं जीवित रहेगा ऐसा नहीं कि भूख से व्याकुल है तो घास च ले।

नहीं ऐसा नहीं कि उसे बहुत विकार सताते तो भोगों में उतर जाए। ऐसा नहीं वो हरिदास है। भगवान का निज जन है। उसमें अपार सामर्थ आ जाएगी। सहनशीलता आ जाएगी। क्योंकि उसने अपार सामर्थ्यशाली श्री हरि के चरणों का आश्रय लिया है। जब उपासक भगवत आश्रय लेता है तो उसके हृदय में जलन पैदा होती है। सबके सबके जो असत वृत्तियां है उसी जलन से भस्म होती है। यद्यपि अहंकार उस जलन को रोकने की कोशिश करता है। नहीं नहीं पर वो भगवत आश्रित थी इसलिए वो जलन बढ़ती चली जाएगी और उसकी असत वासना असत वृत्तियों को भस्म कर देगी यदि भगवत आश्रित है तो चैन से नहीं रह सकता जब तक भगवत प्राप्ति नहीं हो जाएगी तब तक वो जलन उसे घेरे रहती है गिरारथ जल बीत सम कहियत भिन्न न भिन्न बंदो सीताराम पद जिन परम प्रिय खिन्न वो खिन्न रहता है उदास रहता कुछ अच्छा नहीं लगता है।

जितना साधन करता है उससे असंतोष रहता है। जिसे लगता है ना कि मैं जो साधन कर रहा हूं बहुत ठीक है सब चल रहा है। ये केवल तुम्हारे अहंकार का पोषण है। बड़े-बड़े भगवत साधन करने वाले महापुरुष व्याकुल हुए हैं। उनके शब्द निकले हैं कि हे वैष्णव जन कृपा करो। मुझे भगवत प्रेम प्राप्त हो। मेरा जीवन व्यर्थ जा रहा है और हम कह रहे हैं हमारा साधन हमें संतोष प्रदान कर रहा है। नहीं भक्ति उसी की शुद्ध है जो असंतोष से युक्त हो चुका है। भजन की तरफ से और भोगों की तरफ से पूर्ण संतोष है।

क्योंकि समस्त कामनाएं संतोष से शांत होती है और समस्त भागवतिक वृत्तियां असंतोष में प्रकट होती है। उसे अपनी साधना में असंतुष्ट रहता है। नहीं नहीं अभी वो भजन कहां जो भगवत प्रेमी महात्माओं ने किया है जिस भजन में प्रिया प्रीतम के प्रति तड़पना आ जाए व्याकुलता आ जाए अहंकार नष्ट होकर उनकी आज्ञा पर चलना आ जाए क्वाहम तच्छा परम मधमा प्राण हो ग कर्मा आचार्य हरिवंश महाप्रभु कह रहे एकमात्र प्रभु के चरणों का आश्रय ऐसे उपासक के हृदय में एक बात रहती है प्रिया प्रीतम मेरे हैं और मैं प्रिया प्रीतम कहूं बस इन दोनों भावों में ऐसा दृढ़ संबंध रहता है कि बीच में और कोई जागतिक संबंध प्रवेश ही नहीं कर सकता।

माता पिता भाई बंधु रिश्ते नाते रुपया पैसा बुद्धि महत्व मान यश कीर्ति सब ये सब बह जाता है इस संबंध में मैं प्रियाल का प्रियालाल मेरे प्रभु मेरे हैं। इसलिए उनका हर विधान मुझे स्वीकार करना है। अपनी अनुकूलता की मांग नहीं करनी है। अगर अनुकूलता की मांग है तो अभी आप प्रभु को समर्पित कहां हुए क्योंकि आप अलग है ना तभी तो अनुकूलता मांग रहे हैं आप मेरा शरीर मेरी मन बुद्धि की अनुकूलता मेरे मान प्रतिष्ठा की अनुकूलता तो आप अलग है ना अभी आपका समर्पण नहीं हुआ ना बात झूठी निकल गई कि आप प्रभु के प्रभु आपके ये आप केवल वाणी से कह रहे हैं हृदय में नहीं अगर हृदय में है तो प्रभु का किया हुआ विधान विधान आपको उसमें मंगल भाव दिखाई देगा।

जय हो आपकी प्रभु। आपने जो विधान किया है मेरे योग्य है। अनुकूलता की मांग और इच्छा की पूर्ति ये दोनों बातें खत्म हो जाएंगी। जिस उपासक के हृदय में यह शरणागति उतरी कि मैं प्रियाल का प्रियाल मेरे। अपनी अनुकूलता की इच्छा जब तक रहती है, अपनी मांग जब तक रहती है, तब तक ये तनवांग मनोभल सोहम त वाश ये शरणागति नहीं होती जब तन समर्पित हमारा मन समर्पित हमारे प्राण समर्पित मेरे प्राणनाथ श्री श्यामा अब हमें चिंता क्या है अब हमें अनुकूलता की मांग क्यों? अब हमारी इच्छा का अस्तित्व क्या?

क्योंकि तो सब प्रभु को समर्पित है। श्यामा श्याम जैसा ठीक समझ रहे हैं वैसा विधान वो करते हैं और करते रहेंगे। हमें निश्चिंत होकर उनके गोरे सांवले चरणारविंद की ठसक हृदय में रखते हुए दैन्य भाव से आगे बढ़ना है। उपासक को चाहिए कि अपनी मर्जी को मिटिया मेट कर दे। भगवत मार्ग है। जीवित मर जाए उलटिया आप में समाए। यह दिलगिरी है। यह भगवत प्रेम का मार्ग है। आपकी मर्जी नहीं आपकी मर्जी चलेगी। जो जोई प्यारो करे सोई मोह भावे उपासक जब तक हट करके अपने आराध्य देव से अनुकूलता की मांग करता रहता है तब तक वो भगवत कृपा का परिचय नहीं प्राप्त कर पाता।

भगवत कृपा प्राप्त करने के लिए उपासक को अब उसके पास कुछ चिंता करने लायक रह ही नहीं गया यह देखना चाहिए। चिंता शरीर की होती तो तनु चिंता मन की होती सो मनु चिंता हमारी क्रियाओं की होती कि कोई असत क्रिया ना हो जाए ऐसा पूरा समर्पित तन वांग मनोभीर अमल सोहम तवाता मैं स्वयं शरीर मनवाणी सहित चेष्टा सहित हे प्रियाजु हे लालजू आपके चरणों में समर्पित हूं मतलब बिक गया हो जैसे रूप लाल हित हाथ बिका नहीं अब मेरा अधिकार नहीं अभी परमहंस हो हो जाओगे। अभी परमानंद की अनुभूति हो।

सच्ची मानिए इसके लिए समय नहीं है। इसके लिए कोई संख्या नहीं है कि इतने करोड़ नाम जप कर लो ये स्थिति आ जाएगी। बात समझ लो। यह स्थिति आपके समर्पण की है। स्वीकृति के एक सेकंड में कर सकते हो। पर हम इतना जोर से फस चुके हैं। स्वयं शरीर भाव में अंतःकरण धर्म में तदात्म ऐसे हो चुके हैं कि ये बात हमारी समझ में नहीं आती। इसीलिए लंबा समय जाता है। साधन करो। अहंकार को मिटाओ तब ये बात समझ पाओगे। यह बात अभी समझ में आ जाए तो बिना साधन के अभी आपकी स्थिति हो जाए। भागवत के एकादशी स्कंध में तितक्षु ब्राह्मण की कथा आती है।

उसको एक क्षण में स्थिति प्राप्त हुई है। कभी जीवन में कोई साधन नहीं किया था। सब उसको ठुकरा दिया। सब नष्ट हो गया। अब उसे विचार आया मेरा जीवन किस काम का? तत्काल अंतर से आया। समस्त देवता साक्षी है। जितनी स्वासे बची है ये सब मैं भगवान को समर्पित करता हूं। आज से मैं संसार का संबंध आश्रय त्याग कर एकमात्र आत्म स्वरूप भगवान में उसी क्षण उसकी स्थिति ऐसी हुई कि स्वयं जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण उसकी महिमा गान कर रहे लोगों ने उसे मारा उसे बांध लिया उस पर थूका उस पर मूता पर वो कभी किसी को पलट कर जवाब नहीं दिया और ज्ञान विज्ञान से संपन्न होकर विचार करता है नहीं नहीं यह सब भ्रम है वो अपने आत्म स्वरूप में स्थित हो गया कोई साधना नहीं की भगवान उपदेश कर रहे हैं उसको उदाहरण देकर उद्धव जी को कि कोई तुम्हें गला पकड़ के मारे पीटे बांधे थूके अपमान करे तो तुम अपनी आत्म दृष्टि से अपनी विवेक दृष्टि से अपने को बचा लेना किसी और का साथ या आश्रय मत लेना ये भगवत मार्ग है।

अपनी चिंताएं प्रभु पर छोड़ दी तो फिर चिंता क्यों करते हो? तुम्हें यह भी हठ नहीं करना कि प्रभु दर्शन दें। प्रभु हमारी स्थिति बढ़ावे। प्रभु हमें ऐसा महान बनावे कि सारा संसार कहे। जय हो महाराज। आप बड़े भजनंदी संत हो। आपकी मर्जी। आपकी मर्जी में अपनी मर्जी मिला दी। उसे बिल्कुल समिट जाना है। बिल्कुल अजात पक्षायु मातरम खगा जैसे घोंसले में बैठे हुए पक्षी के पंख ही नहीं कि उड़ सके। ये शुद्ध शरणागति अजात पक्षा केवल मां की बाट जो होता है वो ऐसे ऐसे ही केवल प्रभु की बाट जो रहा है राधा वल्लभ राधा वल्लभ राधा वल्लभ क्या स्थिति क्या दर्शन क्या प्रेम क्या लीला प्रवेश आप जानो महाराज हमको तो केवल एक बात गुरु कृपा से मिली कि आपका सुमिरन निरंतर करना है आपके चरणों के सिवा कोई भरोसा नहीं कोई आश्रय नहीं कोई बल नहीं जैसे कुम्हार मिट्टी को फावड़े से खोद के लाता है।

कुछ नहीं बोली मिट्टी। फिर लाकर अपनी मर्जी से उसे कूटता है। महीन करता है। कुछ नहीं बोली मिट्टी। जल डाल के उसे फिर पैरों से रौंदता है। कहीं इतना भी कंकड़ नहीं रहे। अगर इतना रहा तो मटकी खराब हो जाएगी। वहीं से वो लीक करने लगेगी। पूरा का पूरा एकदम कोमल मलाई जैसा। फिर वह अपनी मर्जी से चाक पर चढ़ाता है और उसकी जो मर्जी होती बनाता है। वो घड़ा बनावे, सकोरा बनावे, मटकी बनावे वो मिट्टी कुछ। फिर इसके बाद उसे आग के आवे पर रखता है। तब जाके वह द्रवित पदार्थ रखने योग्य मिट्टी बनती है।

ऐसे ही सद्गुरु का शरणागत शिष्य उनकी मर्जी में अपनी मर्जी मिला देता है। अगर अहंकार रूपी थोड़ी सी भी गांठ रही वहीं से प्रेम रस लीक कर जाएगा। जैसे मटकी में थोड़ी सी कहीं भी अगर एक महीन सरसों के बराबर भी ठोस मिट्टी रह गई तो वही फूल करके वहीं से छेद हो जाएगा। वहीं से कमजोर हो जाएगी। तो चतुर कुम्हार ऐसा नहीं होने देगा। कूट कूट के उसको महीन करेगा। उसे मलाई जैसा बनाएगा। एकदम कहीं कोमल ऐसे ही हमारा जो अहंकार से कठोर हृदय हो गया है। ये सदगुरुदेव ही कूट सकते हैं इसको दूसरा नहीं।

तुम नहीं कूट सकते। तुम तो कहोगे बहुत बढ़िया क्योंकि मनमानी चल रहा है। हमारे मन में जैसा हम साधन ही तो कर रहे हैं। श्री जी के अंश से प्रकट हुए सेवक जी महाराज है। कह रहे गुरु सेवा तज करेज बान यह अधर्म या सभान कान न रसन मेरा गुरु गोविंद न भेद कराए। क्या है गुरु सेवा? पैर दबाना कपड़ा धो देना भोजन दे देना। ये एक अंग है सेवा का। संपूर्ण सेवा का अंग है। अब जो कहे करें हम सो पर यह अहंकार ठोस चीज है। यह बर्दाश्त नहीं करेगी। यह बर्दाश्त नहीं कर सकता। और यही मिटा तो आप महात्मा हो गए।

यही मिटा तो परमानंद का मार्ग खुल गया। ऐसे ही शरणागत अपनी मर्जी बिल्कुल नहीं रखता। अपने मन की बात बिल्कुल नहीं रखता। वो निश्चिंत निर्भय हो जाता है शरण में होकर के आ उसे कृपा कूट कूट करके अनुकूल बनाती ये कूटना सहना पड़ेगा इसीलिए सहसत बागति तुम्हारे अभिमान पर जब प्रहार होगा तो फिर जैसे कोई ठोस चीज पर प्रहार हो तो देखते हो प्रहार होते छिटकता है फिर उसे गीला करके फिर रौंदते हैं आप गीला ही नहीं करने देते जो ही प्रहार हुआ छिटक गए मार से दूर हो गए। अरे यह मार और त्रिभुवन में कोई दे ही नहीं सकता तुम्हें।

तुम्हें तो माया वैसे ही मार रही थी। जहां मारना चाहिए वो वहां मार नहीं पाती। वो तुम्हें फंसाती रहती। तुम्हारे अहंकार पर मार केवल एक कर सकता है। सद्गुरु देव दूसरा नहीं। इसलिए मोक्ष मूलम गुरु कृपा वो मार्ग कृपा से खुलता है। साधन से नहीं। सब अंग गुणहीन हो ताको जतन ना कोई एक किशोरी कृपात ते जो कछु होए सो होई सो कृपा अति सुलभ नहीं सो कृपा अति सुलभ नहीं ताको कौन उपाय चरण शरण हरिवंश की सहज बने छवि विराजमान कर लो छवि आपको डांटेगी छवि आपके जीवन च्या में कमी निकालेगी क्या नहीं निकालेगी और गुरुदेव खड़ा कर देंगे सभा में खड़े हो।

तुमने ऐसा चीका क्यों? गलती मानो। अब तुम्हारा अहंकार सभा के बीच में एकांत में बोलते तो बोल देते। बड़ा सूक्ष्म विषय है। नारदानंद सरस्वती जी महाराज नैमिसारण के जहां 88,000 ऋषियों की परम तपोभूमि है। वहां सत्संग करते हैं। लाखों के सत्संग प्रेमी जन थे। तो उनके शिष्य स्वामी श्री विवेकानंद जी महाराज बड़े अच्छे ज्ञानी महात्मा वो नए कपड़ा पहनकर एकदम आए स्वामी जी के सत्संग में ही दृष्टि पड़ी निजी जन को बुलाया बोले जाओ गौशाले में गोबर जितना उसे गीला करो पानी डाल के और उनको बुलाया विवेकानंद जाओ एक छविया में वहां गोबर भरा मिलेगा उसे उठा के लाओ और यहां सत्संग में खड़े रहो जब तक सत्संग हो गोबर रख के खड़े रहो जी आज्ञा उल्लंघन नहीं हो वहां गए तो पहले पानी डाल के गोबर गीला करके छवि में रख दे उठा के सर में

ऐसे सत्संग के बगल में टप टप टप उनके जितने नए कपड़े पहन के आए थे सब सब शांत सत्संग जाओ वही आखरी में वहां के महंत बने महाराज जी की जो गादी थी उसी का संचालन कर अहंकार का मेटिया मेट गुरुजनों की दृष्टि अहंकार पे होती है साधन पे नहीं होती साधन तो उनका दिया हुआ खुद जान रहे हैं ना तुम्हें जो दूध पिला रहे तो पता ही ना उनको तुम्हें बताने की जरूरत नहीं पर वो जो तुम्हारा परमार्थ मार्ग का विरोधी शत्रु तुम्हारे हृदय में बैठा हुआ उसको तुम नहीं रौंद पाओगे उसको रदने के लिए भगवान गुरुदेव रूप में आते हैं गुरु गोविंद है गोविंद ही गुरु है वो कृपा करते हैं।

इस अहंकार को मिटाने की केवल एक ही दवा है। भगवत प्रेमी महात्माओं के चरणों में अपनी मर्जी को मिला देना। भगवान के रहते हुए आज तक हमारा उद्धार नहीं हुआ। अनंत जन्म हो गए। लेकिन जब संत का मिलन हुआ तब उद्धार निश्चित हो गया। इसीलिए मोरे मन प्रभु विश्वासा राम ते अधिक राम कर दासा। भगवत कृपा उतना ही अधिक आपके ऊपर उतरती चली जाएगी जितना आप अहंकार समर्पित कर दिए। जो थोड़ा भी अपना बल मानता है तो आती हुई भगवत कृपा इंतजार करती है उसका समय लगेगा बहुत क्योंकि आश्रित है नष्ट नहीं होगा ना भक्ता प्रणसति भाग ले बहुत बड़ा मैदान है भाग कब तब भागेगा जब थक जाएगा तो फिर लौट के देखेगा और जब लौट के देखेगा तो वहां अकपा नहीं मिलेगी यही हमारे प्रभु का स्वभाव है।

विमुख भए निमिश न अकृपा जब चित तब वैसे बलिहार है जब चित तब पर इतना समय तो बर्बाद हो रहा है ना उनको वो तो अगाध ज्ञान समुद्र है उनकी तरफ थोड़ी ये होगा कि अब वो रोष नहीं जब चित तब वैसे विमुख भय निमिश ना अकपा जब चित वो इंतजार करेगी कृपा तुम्हारे मनमानी आचरण जब बंद हो जाएंगे जाएंगे आश्रित हो जाओगे हार जाओगे फिर उठा देगी ना भक्ता प्रसति समय लग सकता है जन्म के जन्म व्यतीत हो सकते हैं पर अब दुर्गति नहीं होगी शरण में हो चुके एक बार शरण में हो गए दुर्गति नहीं होगी लेकिन प्रमाद स्थिति में समय नष्ट करना ये बुद्धिमानी नहीं होगी शरणागत होने पर बड़ी विलक्षण चित्तवृत्ति हो जाती है आ अखंड अटूट कृपा उसे डुबो देती है तो आप अपने अहंकार को बीच में लाकर कृपा की उस आती हुई धारा को मोड़िए मत।

आप केवल आश्रित रहिए। देखो धीवर मछुआरा मछलियों को पकड़ने के लिए जाल फेंकता है नदी में। जितनी जाल के अंतर्गत आएंगे सब मछलियां फसेंग। लेकिन जो धीवर के चरणों की तरफ बढ़ गई जाल उसे नहीं फंसा पाएगा। जाल सामने फंसाता है। यह जाल है अहमता ममता का माया का जाल। यह ऐसा फैला हुआ है। हर जीव इसी में फंसा हुआ है। एक अहमता ममता ये जग में है दुखदाई। पर इस जाल को डालने वाला कौन है? मायापति श्री हरि। आ जाओ इनके चरणों में। संसार समुद्र से इनके चरणों की तरफ आओ। जाल नहीं फंसा पाएगा।

जैसे चक्की चलती है हर दाना पिस जाता है पर जो कील के पास आ गया दाना वह सुरक्षित रह जाता है ऐसे भगवान कहते हैं मामे प्रपद्यते माया मेंताम तर एकमात्र उपाय आजा मेरी शरण में कहां से आजा हृदय के अहंकार से हटकर आजा दो ही क्षेत्र है एक भगवान और एक अहंकार सारा का सारा सृष्टि का खेल इसी आम से चल रहा है यही आम तीन रूपों में शतह रजहम और तमहम इसी से राक्षस देवता पशु पक्षी मनुष्य सब इसी से सृजन हुआ है। महात तत्व के बाद सीधे अहंकार है। अहंकार से ही सारी सृष्टि हुई है।

ब्रह्म मूल प्रकृति और त्रिगुणात्मिका ये प्रकृति अहम से युक्त इसी से संपूर्ण सृष्टि का सृजन हुआ है। इसका लय होने के लिए बुद्धि का निश्चय महातत्व बुद्धि का निश्चय भगवत चरणारविंद में बस सीधे पहुंच गए ब्रह्म के समीप बहुत नजदीक ये बंधन बहुत बड़ा है संस्कृति मूल शूल प्रद नाना सकल सुख ये बड़ा सूक्ष्म अहंकार है जब अहंकार होगा और आप ये बात सुनेंगे तो आपको जलन शुरू हो जाएगी। हम आपको पहचान बता रहे हैं और अंदर आपके आएगा मैं कहां अहंकारी हूं। मैं क्या अहंकार करता हूं?

किस बात का अहंकार वो अहंकार ही आपको सावधान कर रहा है कि मैं हूं चिंता मत करो मैं हूं। और जब आपके अंदर यह बात ना आवे और आपको रोना आ जाए कि वास्तविक भ्रम हो गया तो आप समझ लेना कि सही मार्ग पर आप चल रहे हैं। आपका मार्ग सही जब आपको रोना आवे भगवत बातें सुनकर कब मेरी ऐसी स्थिति होगी? कब मैं अहंकार रहित होऊंगा नाथ में अपने आप सुधार शुरू हो जाएगा। संसार और प्रभु के चरणारविंद यह दो क्षेत्र है। संसार के जो सन्मुख है वो प्रभु की बातें कर सकता है पर स्थिति नहीं आएगी और संसार से विमुख होकर प्रभु के जो सन्मुख है वो बोले ना बोले स्थिति प्रज्ञ हो जाएगा।

यही खास बात होती है। बोलना, सुनना, सुनाना यह सहज है। लेकिन स्थिति आना यह बहुत कठिन बात है। स्थिति आती है समर्पण से समर्पण से। जब आप समर्पण की बात नहीं समझ पाते तब साधन की बात कही। ऐसा करो, ऐसा करो, ऐसा करो। तो करते करते तुम हार जाओगे। जब हार जाओगे तो भक्ति का आखिरी स्वरूप है आत्म समर्पण। अब यहां से प्रारंभ होगी। पाई रस भक्ति ग जुग जुग जग दुर्लभ भव इंद्राद विधिम कैसे पाई आत्म समर्पण से आत्म समर्पण कैसे हुआ साधन से चलो इस साधन में चलो खास बात है आत्म समर्पण यदि अभी विवेक काम कर जाए आप आत्म समर्पण तो अभी रस भक्ति का प्रादुर्भाव हो जाए खास बात ये अहंकार आत्म समर्पण नहीं होने देता संसार और प्रभु दो प्रगट में मार्ग रखे हुए हैं।

संबंध घोर संसार से हमारा लग गया। देख लो अंदर की वृत्ति देख लो। हमें क्या कमी किसी के आश्रय की जरूरत है। हमारे पास रुपया है, व्यवस्था है, मकान है, लोग हैं सब क्या हमें? संबंध किसका है तुम्हारे हृदय में? इस रस को वही प्राप्त कर सकता है। चक्रवर्ती सम्राट अंबेरीश जी है लेकिन संबंध केवल भगवान का है। ना अपने भजन का है ना अपनी पवित्रता का ना अपने राजपने का है। एक महात्मा अपने तप का बल दिखाकर उनको भयभीत करना चाहता है। दुर्वासा जी एक कदम पीछे नहीं हटे। ऐसे हाथ जोड़े खड़े रहे वैसे ही और उनका प्रभाव श्री हरि का संबंध है।

तो संबंध ने संबंधी की रक्षा कर ली। सुदर्शन चक्र उनको पता भी नहीं है। ये संबंध भक्ति का खास विषय है। संसार का संबंध तुमने माना है। प्रभु का संबंध है। मानो या ना मानो हम उनके हैं। मान लोगे तो संसार का माना हुआ संबंध हट जाएगा। नहीं मानोगे तो भी वो आपके हैं। जब आपको समझ में आवे तब मान लेना। किसी बात को लेकर के अपने में कुछ जो विशेषता दिखती है उसी का नाम अहंकार है। यदि तुम्हें विद्या का, बुद्धि का, धन संपत्ति का, जन का, त्याग का, वैराग्य का, भजन का इनका अभिमान है तो आप अभी पराधीन हैं।

अभी आप में बल वो भागवतिक जागृत नहीं हुआ क्योंकि आपकी शुद्ध शरणागति नहीं। काू के बल भजन को काू के आचार यह शरणागति व्यास भरोसे कुंवर के केवल केवल हमारे माई श्यामा जीू को राज रात दिन उन्हीं का चिंतन है पर बल उनका है। यह चिंतन उन्हीं की कृपा से हो रहा है। धन को लेकर अगर विशेषता हुई तो धन की दासताएं प्रभु की नहीं। संसार के किसी भी जन व्यक्ति वस्तु पदार्थ की संबंध वृत्ति उसकी दासता है। यह तुम्हारी हेता है। तुम अपने परम पद से दलित हो चुके हो। परंतु जो भगवान पर निर्भर है।

प्रभु पर निर्भर है। यह स्वतंत्र परम पद है। शास्त्र सद्गुरु भगवत वाणी की पराधीनता स्वतंत्र परम पद है। माया मुक्त करने का है। प्रभु चाहे उसको अपना मुकुट मणि बना ले मालिक बना ले या उसको सबसे नीच घोषित कर दे उसको कोई फर्क नहीं पड़ता जो प्रभु को समर्पित है हां देखो बड़े-बड़े सिद्धों को पिटवा दिया ठाकुर जी ने पहले तो भेजते हैं सुंदर भोग की थाल खा पी के थाल लगा देते बाहर धो के रख देते समुद्र के फिर भेजते हैं अपने पास। ओ तुमने थाल चुराई पिटवा दिया। दोनों में समान है।

क्योंकि दोनों में प्रभु की मधुर लीला देखते हैं। प्रभु का हमारा संबंध जो दृढ़ है उसमें अनुकूलता प्रतिकूलता का प्रश्न ही नहीं उठता। अगर अपने में भक्ति की भी विशेषता दिख रही है तो ये अभिमान ही है आपको। क्योंकि जिनमें विशेष भक्ति जागृत हुई वो दैन्यता की मूर्ति हुए। तुमको कैसे अनुभव हो रहा है कि तुम विशेष भक्त हो? जो विशेष भक्त है वह अपने को कैसे बोल रहे हम तच्छा परम मधमा भक्त में जो विलक्षणता उतरती वो इस तरह उतरती है कि उसका शरीर इंद्रियां मन बुद्धि सब भगवत स्वरूप है पर वो सदैव इस बात से गलित रहता है हृदय कि मैं नीच धम किसी योग्य नहीं वो भगवत स्वरूप स्थिति है।

फिर उनके शरीर में और उनके स्वरूप में अंतर नहीं रह जाता। शरीर को पांच भौतिक कहा गया। स्वरूप को चिदानंद कहा गया तो उनका शरीर भी चिदानंद हो जाता है। ज्ञानी का शरीर चिदानंद नहीं होता। क्योंकि मिथ्या भाव करके ब्रह्म सत्य में स्थित हुआ है। लेकिन भक्त का शरीर चिदानंद हो जाता है। साक्षात विमान में सदैव परमधाम श्री तुकाराम जी गए। परम भक्ता श्री मीराबाई जी सदैव प्रभु में लीन हो गई। श्री महाप्रभु चैतन्य देव सदैव जगन्नाथ जी में लीन हो गए। कितने से भक्तों के चरित्र आते हैं।

ज्ञान मार्ग में शरीर चिन्मय नहीं होता। क्योंकि ज्ञानी असत से संबंध विच्छेद करके सत में स्थित होता है। परंतु जब भक्त प्रभु के आश्रित हो जाता है तो उसका शरीर भी इंद्रियां भी मन भी प्राण भी सभी भगवत स्वरूप हो जाते हैं। इसलिए केवल प्रभु की शरणागति ही हमें। एक बार प्रज्ञा चक्षु संत श्री मानव सेवा आश्रम के स्वामी जी का शरणानंद जी महाराज आगरे जा रहे थे यमुना जी के किनारे किनारे तो थे नहीं बाहर के तो आंतरिक नेत्र तो खुले खुले हुए ही थे उनको पता नहीं चला मार्ग से लाठी से और प्रज्ञा चक्ष जनों को कुछ भागवती ऐसी दृष्टि होती है कि हमने देखा है कि आगे गाय है और वह घूम के निकल रहे तो फिर बताया कि बाबा देखो ये बट वृक्ष आ गए ना मोड़ वाले आ गए ना ब व बट वृक्ष इनकी भी परिक्रमा करनी कहा आप सच्ची बताओ तो वृंदावन में तुम्हें दिखाई देता है कि नहीं तो कहा बाबा बिल्कुल नहीं हमारी तो आंखें वो तो कहा तुम्हें पता कैसे चला बोले हमें एक-एक पग से पता है कि इस समय हम यहां आ चुके हैं एक-एक पग मतलब अंदर ऐसे ही वो आगरे जा रहे थे।

अकेले थे। लाठी लिए हुए लाठी के सारे एकदम दरार फट गई और यमुना जी में गिर गए। गिरने से लाठी भी छूट गई। अच्छा प्रगट में आंख हो तो पता हो कि हम कहां है किधर हैं। जल में है केवल और तो अब हाथ पैर मारे तो कुछ समझ में नहीं कि किधर को मारे। भाई पता हो कि इधर किनारा है तो कुछ हाथ पैर लाठी दिखाई नहीं दे रही थी। अब एक बात केवल आई कि भगवान ही सहारा है। छोड़ दिया अपने को। अगर मृत्यु का समय आ गया तो शरीर छूट जाएगा। अगर भगवान को बचाना है तो वही बचा सकते हैं। तो बस हे प्रभु हे हरि हम आपकी शरण में है।

अंतिम में एकदम भगवत स्मरण ऐसी ऐसी एक लहर सी आई जैसे किसी ने हाथ पकड़ कर घसीटा हो और लाठी बिल्कुल नजदीक आ गई। लाठी पकड़ा एकदम किनारे आ गए। उसी दिन से उन्होंने अपना नाम शरणंद रखा। अरे प्रभु ने यह तो बात सुनने में सरल लगी लेकिन उनकी बात थी उनकी हृदय की कि अब तो प्राण जा रहे हैं। तैरना आता नहीं है और किधर हाथ पैर मारे कुछ दिखाई नहीं दे रहा। किनारा किधर है पता ही नहीं है। और जो लाठी एक सहारा था वो भी छूट गई। अब उनका हृदय भाव में प्रभु ओ ओ ये चमत्कार प्रभु ने कृपा की।

लाठी स्वयं आ गई नजदीक। स्वयं क्या हो गया? हाथ पकड़ कर निकाल लिए। वो सर्व सामर्थ्यशाली है। पर छोड़ दो। हाथ पैर मारना छोड़ दो। तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा कि तुम बहुत समुद्र से किधर जाओगे। किनारा कहां है? हाथ पैर मारना। अहंकार छोड़ो। ऐसे आश्रित हो जाओ। तो पकड़ करके लाठी दे दी। साधन दे दिया। लाठी क्या है? साधन। ये पकड़ साधन। चल इस साधन से चल। और ये किनारा है। तैरने की जरूरत नहीं। ये किनारा है। और ये चल। यह भगवत कृपा से प्राप्त हम लोग अंधे हैं। हमें पता नहीं कि हमारा क्या साधन होना चाहिए जिससे हम भगवत प्राप्त हो सकते हैं।

वो प्रभु ही साधन देते हैं। प्रभु ही हमें संसार किनारे ले आए। देखो ना श्री धाम में आ गए हो। शरणागत हो गए हो। किनारे लग गए हो। हां लाठी मिल गई। साधन चलो अब इसी के सहारे चलो आप पहुंच जाओगे। अपने भवन तक पहुंच जाओगे। स्वामिनी जो बड़ी कृपालु है। हमारी केवल भगवत चरणारविंद की निष्ठा जागृत हो जाए। अहम शून्य। इसमें संत जन उदाहरण देते हैं कि एक बकरी चराने वाला बकरी चरा रहा था। तो एक बकरी हरी हरी पत्तियां चुनने में खूब मगन थी। और संध्या काल हुआ तो सब बकरियों को लेकर चला गया।

ना उस चराने वाले को होश रहा उसका और ना चरने वाली बकरी को होश रहा। अब संध्या अंधेरा हो गया तब उसे चेतना आई। देखा आसपास कोई नहीं। अब वो डर गई। अब वो चली तो सामने एक जलाशय दिखाई दिया तो सोचा अब जो होगा प्यास लगी पानी पी लेते हैं। अब जो होगा पानी पीने गई तो पानी पीते ही उसको वहां गीले में ऐसे पंजे दिखाई दिए। तो किसी बलवान का पंजा है। देखती हैं प्रयोग करके बैठ गए। वही भेड़ आया तो उसकी दुलार टपकने लगी। बकरी है खाने को अच्छा मिलेगा। बकरी ने कहा ए ये पंजा देख रहे हो हम इसके सहारे सिंह का पंजा भाग गया भेड़िया कि अरे अगर सिंह ने इसकी रक्षा तो वो हमें मार डालेगा।

भाग अब उसको और विश्वास हो गया। अनुभूतियां भगवत चरणारविंद की समर्पण वृत्त को और बढ़ाती है। उसको और विश्वास रे बचा लिया मुझे। ऐसे जो भी जीव आता और उसकी तरफ गुराता तो बड़े ठसक में कहते ए ये पंजा देख रहे हो ओ ये तो सिंह की परिचय भाग जाते। सिंह आया और दहाड़ मारी। ए शाम के अंधेरे से लेकर अभी तक इसी पंजे के सहारे में बचती रही हूं। इस पंजे को देख लो। ने कहा अच्छा यह तो मेरा ही पंजा है। बोले अब हम तो इस पंजे के सहारे से अभी तक बचती रहे। अब उन्होंने कहा फिर तुम चिंता मत करो।

पंजा तो हमारा ही है। हाथी को कहा कि अगर हमसे विरुद्ध चलोगे तो हम तुम्हें नष्ट कर देंगे। झुको सूंड से उठाओ इसको। अपनी पीठ पर बैठा लो। और पूरे जंगल की कोमल कोमल पत्तियां इसको चराओ और अपनी पीठ पर रखना। कोई भी इसको छेड़ ना सके। समझे इसका आशय? संसार वन में हम भोगों की विषय चाट में भूल गए। और जो काल रूपी चरवाहा है वो हमको चरा रहा था। विषयों में हमारे समय को नष्ट कर रहा है। अब चरते हुए हम भूल गए। अपनी मददाता में, अपने स्वाद में हम भूल गए। अब ध्यान आया कि अरे यह तो रात्रि का समय है।

अब तो मृत्यु का समय आएगा। मुझे कौन बचा सकता है? एकमात्र है गहरे पंजे जिनके हैं। श्री हरि चरणारविंद आश्रय ले लिया तो जिए काल बस ना परे जो इन चरणों का आश्रय समझ जाए आए शरण ते डरत ना काल डर। फिर लोग कहते हैं कि महात्मा लोग तो बड़ी मौज ले रहे हैं यार। ये सिंह की शरण में हुए। उसका हुकुम हुआ कि कोमल कोमल पूरे जंगल की पत्तियां लाकर इसको पो। क्यों? क्योंकि मेरी शरण में है। मेरी शरण में विश्व ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियां समस्त संपत्तियां उसके चरणों में लुटती है जो भगवत आश्रित हो जाता है।

एकमात्र भगवान का वैभव है सब अनंत ब्रह्मांड और उन्हीं वैभव पति की शरण में अब उसके लिए क्या कमी जाके राम धनी वाक्य कौन कमी? हम प्रभु के चरणों का आश्रय ले लेंगे तो वह हमें जना देंगे कि मैं कौन हूं। हमें पता नहीं कौन प्रभु हैं। रोज वो देखते हैं हमसे मिलते हैं। रोज आते हैं हमारे पास हमसे मिलते हैं। पर कौन से रूप में आते हैं ये हम पहचान नहीं पाते। पर वो जब रोज देखेंगे ना कि तुम उसी पंजे के सहारे बैठे हो। तो एक दिन बता देंगे कि यह मेरा ही पंजा है और अब देख मेरा समग्र ऐश्वर्य समग्र ज्ञान समस्त समग्र प्रेम मैं तुझे पूर्ण कर देता हूं।

अब किसी अन्य की जरूरत नहीं। इसलिए भगवान कह रहे हैं ज्ञानम तेहम सवि्ञानदम वक्षाम्य शेषता यज ज्ञात्वा ने भू यज ज्ञातव्य मशिष्यते हे पार्थ तेरे लिए अब मैं ज्ञान का वर्णन करूंगा विज्ञान सहित अशेषता संपूर्णतया ज्ञान का वर्णन करूंगा यह ज्ञान ऐसा है जिसके जान लेने के बाद तुझे कुछ जानना बाकी भी नहीं रहेगा। अन्य कुछ भी शेष नहीं रहेगा। सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। और मैं स्वयं इस ज्ञान को तुम्हें प्रदान करता हूं। ज्ञानम तेहम सवि्ञान विद भक्षाम्य शेषता भगवान कहते हैं हे अर्जुन यद्यपि यह ज्ञान मैंने महात्माओं को भी दिया है।

उनके जो अनुभव में आया वो वाणी में नहीं आया। क्योंकि वाणी अलग है अनुभव अलग है। जहां अनुभव हुआ वहां वाणी नहीं है और जो वाणी है वह अनुभव में नहीं है। आभास मात्र बोलती है और प्रभु और प्रभु की वाणी और अनुभव तीनों एक है। हमारा शरीर, हमारा अनुभव, हमारी वाणी तीनों में अंतराय है। हमारा स्वरूप अलग है, शरीर अलग है। वाणी से जो निकल रहा है वह अनुभव की केवल आभास वृत्ति है। वह बोला ही नहीं जा सकता। अनिर्वचनीयम ब्रह्म स्वरूपम प्रेम स्वरूपम अनिर्वचनीयम वो अनिर्वचनी है लेकिन जब ब्रह्म ही बोले तो उसके लिए अनिर्वचनी नहीं है क्योंकि उसकी वाणी भी ब्रह्म है उसका स्वरूप भी ब्रह्म है उसका अनुभव भी ब्रह्म साक्षात ब्रह्म बोल रहा है तो प्रभु इसीलिए कह रहे हैं ज्ञानम ते अहम सवि्ञानदम भक्षाम शेषता अशेषता बाकी नहीं रहेगा जो मैं बोल रहा हूं सुनो और और कोई बोलेगा तो बाकी रह सकता है क्योंकि जो अनुभव में आ रहा है वो वाणी में नहीं आ रहा।

जिन नेत्रों जैसे ध्रुवदास जी कहते हैं जिन नेत्रों ने देखा उनमें वाणी नहीं है। जो वाणी बोल रही उसने देखा नहीं। अंतराय इसी में हो गया। तो जो अनुभव में आ रहा है वो वाणी में नहीं आ रहा है। लेकिन प्रभु का ऐसा भेद नहीं है। उनकी वाणी भी श्री कृष्ण ही है। एक रोम भी श्री कृष्ण ही है। श्री कृष्ण का एक रोम भी श्री कृष्ण है। सच्चिदानंदमय है। वो कह रहे मैं ते अहम मैं स्वयं सविज्ञान मिदम विज्ञान के सहित अनुभव के सहित तुम्हें ज्ञान का वर्णन कर रहा हूं। अषता कुछ बाकी नहीं रहेगा और जानना बाकी नहीं रहेगा।

तुम्हें कहूंगा मैं खुद कहूंगा संपूर्णता से कहूंगा वैसे तो बहुत महात्माओं ने भी वर्णन किया है मेरे स्वरूप का क्योंकि उनके अनुभव में मैं ही आया हूं और उससे वही अनुभव लाभ भी होता है परंतु इस समय मैं स्वयं कह रहा हूं स्वयं कौन समग्र परमात्मा वो मैं स्वयं तेरे लिए वर्णन कर रहा हूं जैसा मैं अनुभव करके वर्णन कर रहा हूं वैसा दूसरा नहीं कर सकता पक्की बात है भगवान कह रहे। अब जितने भी बोलते हैं तो उस अनुभव को बुद्धि से विचार करके शब्द में लाते हैं। तो शब्द की एक सीमा होती है।

लेकिन प्रभु की बुद्धि भी प्रभु है। प्रभु की वाणी भी प्रभु है। प्रभु का अनुभव भी प्रभु और स्वयं प्रभु बोल रहे हैं। अब वहां भेद नहीं हो सकता। जैसे इधर भेद है प्राकृतिक और अप्राकृतिक का। प्रभु की बुद्धि समष्ट बुद्धि का स्वरूप है। और किसी भी महात्मा की बुद्धि समष्ट बुद्धि का एकांश है। वह कितना जान सकता है? उसकी बुद्धि कितना जान सकती है? जितना प्रभु जला दिए। लेकिन प्रभु कितने हैं? बोले ना नेति इसलिए वेद भी नेति नेति कह के वर्णन करते हैं। पर मैं सदा ही पूर्ण हूं।

इसलिए मेरा ज्ञान पूर्ण है। जान था अब मुझे ज्ञान हुआ है। अनजान को जो ज्ञान होता है जितना दिया गया उतना ही है। लेकिन प्रभु ज्ञान समुद्र है। इसलिए ध्यान पूर्वक तू सुन। प्रभु का जो सगुण स्वरूप है निर्गुण स्वरूप जानना सरल है सगुण स्वरूप जानना कठिन है निर्गुण रूप सुलभ अति सगुण जान नहीं कोई सुगम अगम नाना चरित सुन मुनि मन भ्रम होई वैसे प्राय कहा जाता है कि निर्गुण निराकार की अनुभूति करना बड़ा कठिन है लेकिन वहां कह रहे हैं कि सगुण साकार की कठिन है। निर्गुण निराकार की नहीं।

प्रभु का जो रूप है, ऐश्वर्य है, प्रेम है, महिमा है। वो निर्गुण में आसक्त जनों को भी आसक्त कर लिया। ऐसा देखा गया। जनक जी महाराज निर्गुण निराकार ज्ञान के सिद्ध महापुरुष है। राजा होते हुए भी बड़ा आश्चर्य है। राजा होते हुए भी भोग ईश्वर संपन्न महलों में रहते हुए भी जिनके शरीर में लंगोटी भी नहीं है। ऐसे विरक्त जो जन्म सिद्ध वैरागी हैं। ऐसे महापुरुष श्री सुखदेव जी के गुरु हैं। कौन? महाराज जनक जी राजा पदवी पे हैं। रानियां हैं। भोगेश्वर्य संपन्न है। और इनके चेला कौन है?

श्री सुखदेव जी महाराज निर्गुण निराकार की अनुभूति से तृप्त महापुरुष है जनक जी जब राम जी को देखते हैं तो उनका ब्रह्माकार मन आसक्त हो जाता है राम जी में निर्गुण निराकार में वही सिद्धि प्राप्त करता है जो शब्द स्पर्श रूप रस गंध का विजेता होता है। कोई भी त्रिभुवन का शब्द या रूप या रस या गंध आकर्षित नहीं कर सकता। इसीलिए ज्ञान के पंथ कृपाण के धारा है। जो निर्विघ्न पंथ निर्ही सो कैवल्य परम पद लाई। और यह तो सिद्ध ज्ञान की मूर्तिमान स्वरूप है विदेहराज जनक। जब राम जी को देखा तो ऐसे लुभायमान हुए कि बार-बार अपने ज्ञान की वृत्ति को संभाल रहे हैं।

नहीं संभल पा रहे। तब विश्वामित्र महामुनि ज्ञानी अपनी बात को अपनी स्थिति को विश्वामित्र जी से नेत्रों ही नेत्रों में पूछा। मानो वो कह रहे हो कि सहज विराग रूप मन मोरा मेरा मन तो सहज बैरागी पर इनके रूप को देखकर जैसे चकोर चंद्रमा में आसक्त हो जाता है। ऐसी स्थिति हो रही इन विलोकत अति अनुरागा बरबस ब्रह्म सुख मन त्यागा निराकार ब्रह्माकार वृत्ति में आनंद रहने वाला मन आज राम रूप का गुलाम होता जा रहा है। जबरदस्ती इस रूप ने निराकार ब्रह्म की अनुभूति में छके हुए मन को आसक्त कर लिया।

ये क्या हो रहा है? ये क्या हो रहा है? महामुनि ज्ञानी विश्वामित्र जी से परम विदेहराज जनक जी महाराज प्रश्न करते हैं। विलोकत अति अनुरागा बरवस ब्रह्म सुख यह ब्रह्म सुख से भी श्रेष्ठ सुख है प्रभु के साकार रूप की उपासना प्रभु के और इस साकार अवतार लीला से भी महा श्रेष्ठ प्रभु श्री कृष्ण की ये प्रेम लीला ब्रज लीला और इस लीला को प्रकट करने के लिए निकुंजेश्वरी निकुंजेश्वर जो पधारे तो जो निकुंज में अनादि काल से अनंत काल तक वो रूप वो सौंदर्य वो प्रेम यह अत्यंत दुर्लभ बात है।

भगवान के ज्ञान रूप को तत्व रूप को जानकर सब मुक्त हो गए। भगवान की भक्ति करके साज स्वामी प्रसारू आदि या भगवान के ईश्वर सेवा में पहुंच गए। पर नौ निकुंज बिहारणी श्री श्यामा जी के चरण भावना में मगन होकर प्रीतम श्री लाल जो सहित वृंदावन रंग में रंगना यह समग्र रूप प्रभु का है। इसे समझ पाना अत्यंत कठिन है। नहीं तो फिर यह शब्द नाता संभाव्य विंच नारद शिव स्वयंभया इन बड़े-बड़े महापुरुषों की भी संभावना नहीं कि श्री जी के चरणों में महावर लगाने की सोच सके। इसीलिए यह हमारी बुद्धि के बाहर की बात है।

परंतु जो प्रभु के चरणों का इस रस के दाता श्री कृष्ण ही है। ध्रुवदास जी ने लिखा लाल रंगीलो गाइए ताते प्रीति रंगीली पाई। मतलब अपने लोगों के ऊपर श्री हरि की कृपा बरस गई। क्योंकि उन्होंने अपने हृदय के अगाध प्रेम का द्वार खोल दिया। हृदय का अगाद प्रेम श्री लाडली जो श्यामा जो है लाडली जो कौन है श्री हरि के हृदय का अगाद प्रेम समुद्र का सार रूप प्रीति मूर्ति मती रस सिंधुर सार संपद विमला अब इनको सुगमता से समझ पाना बहुत कठिन है। इसीलिए भागवत गीता शास्त्रों का स्वाध्याय करा के सिद्धांत में स्थित करके उसके राग अहंकार का नाश करके उसका हृदय द्रवित करके सरस भक्ति के मार्ग में गुरुजन रसिक जन खड़ा करके फिर उसको देखते हैं।

हां अब इसका देह भाव गलित हो जाए। बनिता पुरुष भाव मिट जाए सेवे ललिता आदिक के भाए तब उसका प्रवेश होता है। ये किसी अन्य साधन से नहीं होता है। अन्य साधन से तो शिव विरंच जैसी साधना कौन कर सकता है? यह नारदा सुगम्यम इनसे बढ़कर कोई साधक हो सकता है क्या तो कैसे आया यह हारे मन रस संग बिन रंच उपजे प्रेम रसिक महापुरुषों की कृपा से रसिक महापुरुष कब मिलते हैं जब लाल जी महाराज बहुत कृपाल हो जाते हैं तब अपनी श्री जी की निज दासियों का संग दे देते हैं। जैसे स्वामी श्री हरिदास जी महाराज महाप्रभु हरिवंश चंद्र जो हरिराम व्यास जी जो ये सब श्री जी की चरण दासियां हैं।

ये आई हैं उस रस का अनुभव कराने के लिए जो आगम निगम पुराण अगोचर है। यह वेदों में भी नहीं देखा गया। यह स्वरूप वेदों में भी नहीं है। वेद है राज सिद्धांत कानून। राज सिद्धांत कानून और यह है निज महल का रस। यहां वेदों की भी पहुंच नहीं है। जो रस नेति नेत श्रुति भाको ते अध सुधार रस चाक्यो अलक्षम राधाम निखिल निगम रपत राम समझो कहां तुम्हारा सर झुका हुआ है समझो ऐसी जगह जहां सब उपासनाओं के केंद्र श्री हरि है और श्री हरि भी जहां वहां तुम्हें अवसर मिल गया है। अब अन्य आश्रय नहीं किसी साधन बल का भी आश्रय नहीं एकमात्र लाडली जी के चरणारविंद का आश्रय भरोसा वृंदावन की रज का सेवन तो प्रभु कहते मैं तुम्हारे हृदय में बैठकर सब परिचय दे दूंगा तुम्हें चिंता नहीं करनी वही तो गुरु है वही तो आचार्य है वही तो रस समुद्र है वही तो रस है वही तो रसिक है भेद समझो वही रस है वही रसिक है जैसे हरिवंश रसिक नवरंग पिय कौन है यह प्रीतम रसिक नवरंग पिय ये रसिक भी है और रसभन मोहन मूर्ति भी है यही रस है यही रसिक है यही गुरुदेव है यही आचार्य है बस बात मान लो इनके चरणों का दृढ़ता पूर्वक आश्रय ले लो जैसे सोने के गहने हैं।

परंतु उन सब में एक ही तत्व है सोना जो यह जान जाता है कि सोने का है तो उसके बनने बिगड़ने पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता ध्यान देना अब सोना पहले था जो आकार नहीं लिए हुए था तो सोना था आकार लिया तो सोना और आकार बिगड़ जाएगा तो क्या होगा सोना ही तो रहेगा उसकी कीमत में कोई कमी आ जाएगी क्या ऐसे ही जब तुम प्रभु को जान जाओगे तो तुम इन आकारों के चक्कर में नहीं पड़ोगे। यह प्रकृति जन्य जब तक हमारा इन आकारों में आकर्षण है तब तक हमारा तत्व में आकर्षण नहीं। जैसे कंगन कड़ा बनने के पहले सोना था।

कंगन कड़ा आकार बिगड़ने के बाद भी सोना रहेगा। इसमें कोई फर्क नहीं पड़ता। कीमत वही रहेगी। उसकी कीमत पहले भी वही थी। बीच में भी वही बाद में भी वही क्योंकि सोने की कीमत है। आकार की नहीं। ऐसे ही इस संपूर्ण प्रपंच को तुम साक्षात भगवान का स्वरूप समझो। अब खत्म प्रपंच पहले समझो इस बात। अब जहां यह समझा सर्वानस्त निरीक्ष परम स्वराध्य बुद्धिमम देहाभिमान खत्म हो गया। देहाभिमान प्रकृति में मात बुद्धि करके उसको अपने में धारण करना यह पुष्ट होना है। जैसे प्रकृति जन्य विद्या प्रकृति जन्य धन प्रकृति जन्य शरीर प्रकृति जन्य रूप प्रकृति जन्य प्रतिष्ठा मान ये सब इस आकार को स्वीकार ना करो।

इस आकार में जो विराजमान तत्व है वह हमारे राधा वल्लभ लाल है। एकमात्र दूसरा नहीं खत्म पूरी सृष्टि खत्म एक सूत्र से हटाओ सब जैसे आभूषण बनने के पहले सोना था आभूषण बिगड़ने के बाद सोना रह गया तो बीच में क्या है सोना ही तो है ना उसके आकार का महत्व नहीं है। वो स्वर्ण कहा है। वो स्वर्ण ही है। ऐसे जितने आकार इनका महत्व नहीं है। इनमें विराजमान जो कीमती वस्तु है वह श्री हरि है। प्रभु है। इतना आपको जानना पड़ेगा। इतनी आपकी अनुभूति होनी पड़ेगी। यह नहीं करोगे तो आगे नहीं बढ़ पाओगे।

चाहे क्रूर हो, पापी हो, दुष्ट हो, नीच हो। वो मेरे प्रभु राधा वल्लभ लाल हैं। यह अनुभव करो। हजारों बार ये चर्चा हुई, सुनी लेकिन आपने अनुभव किया। नहीं वही राग, द्वेष, छोटा, बड़ा, उत्तम, अधम, मैं तू इसी में तो भ्रमित हो रहे हो। साधक किस बात के हो? गुण दोषों को लेकर विचर रहे हो। तत्व को लेकर विचर रहे हो। आकार को लेकर विचर रहे हो। ये अच्छा ये बुरा ये उत्तम ये नीच कोई बुरा उत्तम नीच नहीं। समझो पहले वो एक तत्व जितना एक नाक की छोटी सी एक ऐसे आभूषण में विराज वही बहुत बड़े हार में भी विराजमान है।

ऐसे चींटी में भी वो बड़े आराम से संपूर्ण तत्व प्रभु विराजमान है। वैसे अनुम कोई दूसरा नहीं। यह अनुभव करो। यह तुम्हारा राग द्वेष, तुम्हारी उत्तम अधमता, तुम्हारी यह हमें प्रभु से नहीं मिलने देगी। इसे छोड़ो। यही है अज्ञान जिसे हम संसार में प्रयोग कर रहे हैं। नहीं आप भगवत मार्ग के पति को ज्यादा समय नहीं है। आज आपको ये बातें सुनने को मिल रही। कल और ऐसा कलिकाल बढ़ेगा कि आपको बातें सुनने को नहीं मिलेगी। जैसे अब हमारे संतों का पारा नीचे गिर गया। एक समय था एक से एक महाबली भगवत भजन के संत जिधर देखो उधर महापुरुषों की बाढ़ थी स्वामी जी महाराज हितजू महाराज हरिराम व्यास जी श्री रूप सनातन जी भीड़ लगी थी जिस प्रांत में देखो रामानंदाचार्य रामानुजाचार्य कबीर दास जी रैदास जी जिधर देखो मीरा जी महाराष्ट्र तो भरा हुआ था एक से एक सिद्ध मा भीड़ लगी थी ऐसे महापुरुषों की भीड़ लगी थी जो अनुभव और ब्रह्म शब्द से भी जिनका परिचय था।

शब्द ब्रह्म के पारगामी विद्वान और परम तत्व के अनुभूत से छके हुए महापुरुष गिर गया पारा। देखो कलयुग का प्रभाव अब ऐसे महापुरुष सखी आंख तर को आवत नहीं। केवल कोरी बातों से अनुभूतियां नहीं होती है। हां अब हमारे पास बातें बातें रह गई। वह भी शास्त्र सम्मत अनुभूति युक्त जब वचन होते हैं तब बाहरी प्रभाव पड़ता है। कहां रह गया? उद्भट महापुरुष जो रात दिन भजन में लगे। आप देखो कहां ऐसे चंद अंगुलियों में गिने जा सकते हैं। ऐसे महापुरुष कहां रह गए जो अपनी अनुभूतियों से जगत का मंगल जो है वो छुपे हुए हैं।

जो करना चाहते हैं हम अगर अनुभूति नहीं तो वो बोलना केवल एक वाणी का विलास मात्र होगा। अगर अनुभूति से छकेप हुए नहीं तो वचनों का क्या प्रभाव पड़ेगा किसी पर? नहीं पड़ेगा। आज हमारी यह दुर्भाग्य वृत्ति बढ़ रही कि बड़े-बड़े भजनानंदी अनुभूत महापुरुष अंतर्ध्य होते चले गए। अब तो नई पीढ़ी में भगवान ही जाने कैसे तैयार करेंगे वो वो तो करतुम अन्यथा करतुम है। पर बात यह है कि कलिकाल तभी बढ़ेगा जब ये महात्मा अंतर्ध्य होंगे। अगर ये बने रहे तो भगवान भी नहीं ऐसा चाहेंगे कि कलयुग बढ़ पावे।

उनकी भी सामर्थ्य नहीं क्योंकि उनसे ज्यादा सामर्थ्य नाम में है। नाम जापक उपासक नाममी को अपने अधीन रखता है। सुमिर पवन सुत पावन नाम अपने बस कर राखे रामू अगर उनका नाम कीर्तन चल रहा है। नाम की महिमा का गान हो रहा है। नाम में डूबे हुए भक्त जन है तो कलिकाल क्या भगवान भी वहां कोई विघ्न पैदा नहीं कर सकते। भगवान के सामर्थ्य से बढ़कर सामर्थ नाम में है। भगवान ने अवतार लेकर जितनों को तारा उतों को नाम ने ऐसे तार दिया। ऐसे नाम ने तार दिया। इसीलिए स्वामी नाम है सेवक नाम ही है।

अब ऐसे नाम के धनी महापुरुष बिरले ही कोई। तो अभी आपके पास समय है। अगर आप प्रमाद में समय खत्म कर दिए तो हमें लगता है अगर अगला जन्म होगा तो ऐसा हमें संयोग मिलना कठिन होगा जैसा अभी है। जैसा आज के 40 वर्ष पहले संयोग महात्माओं का वो अंतर्ध्य होते चले। गंगा किनारे देव एक से एक ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष जिधर देखो एक से एक महा वो अंतर्ध्य होते चले आए। अब हम नई पीढ़ी के महात्मा तैयार हो रहे हैं। वो वैसे वाला मोबाइल हां जो भी हो उसको नहीं और दूसरे शब्दों में स्मार्ट फोन वाले हमारी सिद्धि गूगल ऐसे की जरूरत नहीं सर्च करो गूगल में हमारी सिद्धि लाख सवा लाख का स्मार्टफोन जेब में सिद्धियां भगवत प्राप्ति अरे भैया इससे बचने के लिए तुम बाबा जी बने थे कि कोई विक्षेप ना हो कोई चिंतन ना हो और जहां माला गुरु की छवि रहती थी ना छाती में हृदय देश से वहां हृदय देश में स्मार्ट फोन मिलेगा ऊपर से च यही ऐसे टंगा मिलेगा छाती में कु से हुआ कौन आया किसका नंबर आया जैसे हृदय में वृत्ति आती थी कि भगवनंद कौन सी वृत्ति आई लीला की आई कि रूप की आई छक रहा है उपासक वो परिचय दिखता है किसका मैसेज है गई भैया जो वृत्ति अंतर्मुख में डुबोनी थी देख लो कलयुग की चाल हर एक की जेब में मिलेगा।

बाबा जी हैं। अगर जेब में मोबाइल नहीं तो सिलेंडर कैसे मिलेगा? नहीं मिलेगा सिलेंडर। उसमें आधार कार्ड दुनिया का सुविधा है। ले फंस गए। अब वो कुन्न कुन्न करेगा और मम्मी कैसी हो? वो पापा कैसे हो? वो फूफा कैसे हैं? यही घर बैठे बात करो। और वो एक उसमें और चला सिस्टम। सीधे बात करो। हैं वीडियो कॉल। हां जो हमारा वीडियो कॉल प्रभु से होना चाहिए था कि सामने पी मूरति नैनन बसे ते रस रहा समाए ये लक्षण सुन प्रेम के और न कछु सुहाए और न कछु सुहाए फिर अपने मदम मातो अब किनके मदमाते ये लो बैठे लीला चिंतन कर रहे वहां सर्च करके बैठे नौटंकी नाटक देख रहे क्योंकि ये है स्मार्ट जमाना आज का आगे वाला आगे वाला जो आएगा वो माल भूल जाओगे और आगे आप देख लेना शास्त्र की बात की अवहेलना अभी हो रही फिर शास्त्र को नहीं माना जाएगा नहीं बोल सकते तुम क्यों कलिकाल का एक

स्वयं का धर्म है भ्रष्टाचारा सब संसारा धर्म सुने नहीं कान्हा उसका राज्य है नहीं तुम चला सकते वर्णाश्रम धर्म नहीं तुम चला सकते शास्त्र सम्मत शासन आज का शासन अभी देख लो मनमानी आचरण मनमानी आचरण भैया कैसे भगवत प्राप्ति होगी भगवान का मिलना कैसे सरल हो सकता है अभी समय है अभी निकल चलो अभी समय है अभी आप गा सकते हो नाम आप सत्संग कर सकते हो एक समय आएगा आप बोल नहीं सकते आप सत्संग बोल नहीं सकते देख लेना एक समय आएगा आप बोल नहीं सकते आप ऐसा नहीं कह सकते कि तुम्हारा यह धर्म है तुम ऐसेसे चलो ऐसे चलो नहीं बोल सकते अभी समय है अभी शास्त्र है एक समय आएगा आपको शास्त्र ही नहीं मिलेंगे।

आएगा समय आगे तभी तो संसार में भगवत विमुखता फैलेगी। बहुत फैल रही। कौन भगवान पर विश्वास करता है? चंद बिरले लोग हैं जो ऐसे भगवत भाव में चल रहे हैं। कृपा पात्र जन इसलिए आगे के लिए मत छोड़ो कि भगवत प्राप्ति आगे हो जाएगी। अरे मन बुद्धि के विलास को छोड़ो और प्रभु के लीला विलास की तरफ आगे आओ। इनके चरणों का आश्रय ले लो। इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी। हम तुम्हें सहज सरल अनुभूत महापुरुषों की बात बता रहे हैं। भगवत प्राप्ति केवल भगवत आश्रय से होती है। भगवत आश्रय से अंदर से हार करके प्रभु के चरणों का आश्रय ले लो।

वो ज्ञान विज्ञान सब तुम्हारे अंदर आ जाएगा। क्योंकि है सब कुछ वही सब कुछ बने। वो आ गए तो बकाया क्या रह गया। अब उनको पुकारो रात दिन ये जो हम नाम जप करते हैं पुकारते हैं राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश क्योंकि हरि गुरु चरण सेवानुस शास्त्र का आदेश है तो आचार्य और इष्ट का नाम पुकार पुकार के हम उनको बुला रहे हैं आ जाओ हमारे हृदय में आ जाओ प्रभु मैं ऐसा योग्य नहीं हूं कि मैं अपने हृदय को आप में लगा सकूं मेरा मन बुद्धि इतना सामर्थशाली नहीं कि आप आप आ जाओ करुणा वो करुणा समुद्र है आ जाएंगे बस बस यह जन्म व्यर्थ नहीं जाना चाहिए।

प्रभु के चरणों का आश्रय लेकर के उनके द्वारा बताई हुई उपासना पद्धति से अपने मन को निरंतर प्रभु में लगाते रहो और ना लगे तो चिंता मत करो सहारे प्रभु के हो। एक दिन चर्चा में कहा था ना कि किसी भी काम वाले को यदि हम लाते हैं भैया कितने लोग आठ घंटा? बोले 500 चलो और हम लिवा के ले आए और काम नहीं करवाया तो 5:00 बजे वो कहेगा कि भैया हमें ₹500 दो तो हम किस काम के रुपए तुमने तो काम किया नहीं बोले तुम्हारा विषय था करवाया कि नहीं करवाया हमें 500 दो उसे सरकारी न्याय से ₹500 देना होगा ऐसे ही हम लोगों को लाई है श्री जी चलो भजन करो और निकुंज चलो अब हमें चलना नहीं आता ना निकुंज की तरफ भजन करना आता है तो करवा लो पर और कुछ करना नहीं आना चाहिए बैठ जाओ श्री जी आ जाओ तो आपको पेमेंट मिलेगी जीवन की शाम होते ही आपको ऐसी करुणा वरुणालय सरकार है आ जाएंगे चल ले जाएंगे विश्वास करो गुरु जी ने शबरी जी को कहा था भगवान आएंगे मिलेंगे रोज सोहनी लगाना पुष्पों से पावड़े बिछाना हजार वर्ष तक उनकी अश्रद्धा नहीं हुई गुरु वचन पे कि हमें लगता है फसलाने के लिए तो नहीं कह दिया इतना लंबा समय हो गया भगवान नहीं आए।

विश्वास में कमी नहीं हुई। तो एक दिन देखा कि भगवान आए और सबरी को निहाल दिया। तुम विश्वास करो प्रभु का आश्रय लेकर केवल आश्रय से भगवत प्राप्ति होती है। वो ये नहीं देखती तुम कौन हो। उनको कभी गुस्सा नहीं आता। बड़ी उदार है। हम लोगों को ये सोचना है कि हमें श्री जी ने बुलाया। हम क्या जाने हम क्या जाने श्री जी सहचरी भाव वृंदावन नित्य विहारस और अभी क्या जाल गए क्या नहीं वो घसीटते चले जा रहे पता नहीं कैसे घसीट रहे हैं वो श्री जी जाने तो बोले हम में तो कोई योग्यता नहीं भैया ना पहले योग्यता था नहीं अभी है तो क्या हमें श्री जी मिलेंगे तो बुलाया काहे को है अरे हम लगे थे संसार के भोगों में प्रपंच में वही फंसे रहने देते जब इधर बुलाया तो बीच में छोड़ देंगे क्या ऐसी कृपालु है वो ऐसे छोड़ हमें पेमेंट मिलेगी काम करवावे या ना

करवावे भजन करवावे तो उनका और ना करवावे तो हम उनके तो हमें पेमेंट क्या मिलेगी हां कुंज महल की टहल सुख दंपति संप भरोसे पर बैठे रहो मान लो हमारी बात हम बार-बार इस बात को इसलिए कहते हैं कि हम लोग कलयुगी है फिसड्डी स्वभाव है क्षण में किसी भी विषय में फिसल जाते हैं भगवत प्राप्ति बहुत कठिन है तो क्या करें अगर हम फिसल के भी जा रहे तो राधा राधा बोले भरोसा ना छोड़ना उनका नाम ना छोड़ना और वचन पर विश्वास रखना श्री जी मिलेंगे बस भरोसा और का ना होने पावे ना अपना ना किसी और का भरोसा केवल लाडली का और जितना बने खूब नाम जप करो छोड़ो ये सब झंझट मन की ये सब भागा दौड़ छोड़ो राधा राधा राधा लाडली के भरोसे और सुख पूर्वक रहो आनंद पूर्वक मस्त रहो ये मनुष्य जीवन ये अशांति क्लेश चिंता दुख इसके लिए नहीं मिला है अरे इतने बड़े के हो यार मस्त स्त रहो राधा राधा राधा राधा मन की कुमार्गगामी प्रवृत्तियों को बिल्कुल आदर मत दो और राधा राधा राधा अभी काम बन गया ये जो काम नहीं बन रहा ना हमारा ये हमारी सोच से हमारी सोच बहुत

छोटी है इतनी कुप मंडूक इसमें दम नहीं उनकी उनके सहारे हो जाओ राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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