॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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इस सिद्धांत को समझ लिया तो आपको कभी विक्षेप नहीं होगा // 30/05/2025

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

श्री वृंदावन धाम की जय वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वाय परम शीतल माया परम शी तल माश्रया इस संसार का बंधन का कारण है अज्ञान। अज्ञान का कारण क्या है? संसार में आवागमन का जन्म मृत्यु का कारण है अज्ञान। तो अज्ञान का कारण क्या है? इस शरीर को मैं मानना संसार के प्राणी पदार्थ को सत्य मानकर ममता करना आसक्ति पूर्वक भोगों को भोगना और उनमें सुख बुद्धि रखना इसे ही अज्ञान कहते हैं। अपने को केवल प्रवचन कर लेने मात्र से कोई ज्ञानी नहीं कह सकता।

अज्ञान क्या है? जब तक इस शरीर को मैं मान रहे हो तब तक अज्ञानी हो। जब तक संसार का प्राणी पदार्थ तुम्हें सत्य दिखाई दे रहा है तब तक तुम अज्ञानी हो। जब तक आसक्ति पूर्वक भोग भोग रहे हो तब तक अज्ञानी हो। जब तक तुम्हें इस संसार में कहीं भी सुख लग रहा है तब तक अज्ञानी हो। इस शरीर को मैं मानना और इस शरीर के नाम को इस शरीर के संबंध को अपना मानना यही अज्ञान है। अब देखो थर्मामीटर लगा के ज्ञानी कौन है? आसक्ति पूर्वक भोग भोगना। संसार के प्राणी पदार्थ को सत्य मानना।

शरीर और शरीर के नाम को अपना मानना, सत्य मानना यही अज्ञान है। अज्ञान की निवृत्ति कैसे होती है? इस अज्ञान की निवृत्ति भगवान के परम प्रेमी महा भागवतों का संग, भगवन नाम जप, शास्त्र स्वाध्याय और सबकी सेवा मैं सेवक सचराचर रूप स्वामी भगवंत इस पूरे संसार में मैं सेवक हूं और सब हमारे स्वामी विराजमान हैं। जब जहां जिसकी सेवा का अवसर आवे दास बन के सेवा कर दो अज्ञान नष्ट हो जाएगा। नाम जप करो अज्ञान नष्ट हो जाएगा। शास्त्र स्वाध्याय करो अज्ञान नष्ट हो जाएगा। सत्संग सुनो अज्ञान नष्ट हो जाएगा।

तो जीवन मुक्त पुरुष किसे कहते हैं? जिसमें ब्रह्म विचार हर समय चलता रहता है। विचार तो सबके चलते हैं। लेकिन भोग विचार, जगत विचार, राग द्वेष के विचार, काम, क्रोध के विचार ये सबके चलते हैं। लेकिन जीवन मुक्त कौन है? जिसके ब्रह्म विचार चलते रहते हैं। भगवत विचार चलते रहते हैं। संपूर्ण संसार से वैराग्य है जिसे और जिसके पास सट संपत्ति है। छह प्रकार की संपत्ति लोक परलोक के भोगों से वैराग्य सत असत का निर्णय करने वाला विवेक शम दम उपरति ततीक्षा श्रद्धा समाधान ये छह संपत्ति जिसके अंदर है सम दम उपरति ततीक्षा श्रद्धा समाधान और ये चार साधन जिसके हैं सत असत का विवेक लोक परलोक के भोगों से वैराग्य और ये सत संपत्ति और मुमुक्षता ये चार साधन चार साधनों में तीसरे साधन में सत संपत्ति आ जाती है।

जब सत असत का विवेक होगा और लोक परलोक के भोगों से वैराग्य होगा तो शम इंद्रियां अपने अधीन हो जाएंगी। दम मन अपने अधीन हो जाएगा। उपरति भोगों से त्याग वैराग्य के बाद उपरति होती है। भोगों की सत्ता ही नहीं है। ऐसा ज्ञान हो जाएगा। सम दम उपति ततीक्षा बहुत सहनशील हर कष्ट को हर विपत्ति को आनंद पूर्वक सह जाना ये ततीक्षा कहा जाता है श्रद्धा शास्त्र गुरु के वाक्यों में यथावत बुद्धि जैसा बोल रहे हैं बिल्कुल वैसे ही चलना इसे श्रद्धा कहते हैं। समाधान चित्त का परमात्मा में स्थित हो जाना सत संपत्ति मुमुक्षत्व इन साधन के बिना कोई सिद्ध पुरुष नहीं कहा जा सकता सत असत का विचार ब्रह्म विचार लोक परलोक के भोगों से वैराग्य सम दम उपति ततीक्षा श्रद्धा समाधान और मुमुक्षता साधन चतुष्टय भी हो गया और सत संपत्ति भी हो गई।

इसी से जीवन मुक्त होता है। अगर इनमें से एक भी नहीं है तो जीवन मुक्त नहीं है। जब शास्त्र गुरु और भगवत कृपा शास्त्र कृपा गुरु कृपा भगवत कृपा एक साथ जुटती है तब कोई जीवन मुक्त होता है। शास्त्र के अनुसार गुरु के अनुसार भगवत कृपा बल से बिल्कुल चल रहा है। कहीं इधरउधर डगमगाया नहीं तो पार हो गया माया के जो जीवन मुक्त महापुरुष है उसकी बाह्य पहचान नहीं हो सकती वो अंतर स्थिति होती है। बाह्य तो सांसारिक कार्य करते हुए भी दिखाई दे सकता है। बाह्य कोई नहीं पहचान सकता।

अंतर स्थिति में पहचाना जा सकता है। क्या ज्ञानी भक्त या सिद्ध योगी सिद्ध ज्ञानी जीवन मुक्त महापुरुष सिद्ध भक्त भगवत प्रेमी सिद्ध योगी क्या सृष्टि का सृजन पालन संार कर सकता है जब वो जीवन मुक्त हो गया तो भगवान स्वरूप हो गया ब्रह्म विद ब्रह्म भवती क्या कर सकता है जीवन मुक्त महापुरुष परमार्थ दृष्टि में ब्रह्म में एक हो गया है। आनंदमय बन गया है। परंतु मायाधीश नहीं हो गया है। चाहे वो सिद्ध भक्त हो, चाहे सिद्ध योगी हो, चाहे सिद्ध ज्ञानी हो, वो भगवान में एकत्व को प्राप्त हो गया है।

आनंदमय हो गया है। पर मायाधीश नहीं हो सकता। वह सृष्टि का सृजन पालन या संार करने की सामर्थ्य नहीं रखता है। यह केवल एकमात्र भगवान में है। भगवान का चिंतन करके भगवत में हो जाओ लेकिन भगवान नहीं बन सकते। साक्षात भगवान तो भगवान ही है। सृष्टि का सृजन पालन और संहार ये किसी भी सिद्ध में ताकत नहीं। चाहे वो भक्त सिद्ध हो, चाहे वो ज्ञान सिद्ध हो, चाहे वो योग सिद्ध हो। सूक्ष्म शरीर किसे कहते हैं? स्थूल शरीर तो है जिसे बताया गया मैं पन से हम बोध करते हैं जिसका नाम लिया जाता है।

ये स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर किसे कहते हैं? मन अंतःकरण चतुष्टय बुद्धि अहंकार और पांच प्राण प्राण अपान ज्ञान उदान समान और पांच ज्ञानेंद्रियां पांच कर्मेंद्रियां यह सूक्ष्म शरीर कहलाता है। 10 इंद्रियां, पांच प्राण अंतःकरण चतुष्टय यह सूक्ष्म शरीर कहलाता है। ये स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर को संचालित करता है। जैसे हाथ ये चल रहा है तो कर्मेंद्रिय है। लेकिन इसे ज्ञानेंद्रिय संचालन कर रही है। अंदर से बुद्धि इसे घुमाओ। मन संकल्प किया और त्वगेंद्र ज्ञानेंद्रिय है।

शुरू हो गया। ज्ञानेंद्रिय के द्वारा कर्मेंद्र क्रियान्वित होती है। बुद्धि के और मन के द्वारा इंद्रियां क्रियान्वित होती है। बुद्धि मन को और मन इंद्रियों को। तो सूक्ष्म शरीर से स्थूल शरीर संचालित होता है। इस शरीर के भीतर है सूक्ष्म शरीर। चार अंतःकरण चतुष्टय मन बुद्धि चित्तंकार पांच प्राण व्यान उदान समान जो प्राण है पांच और इसका दर्शन होता है स्वप्न में सूक्ष्म शरीर का दर्शन स्वप्न में होता है स्थूल शरीर का दर्शन जागृत में होता है कारण शरीर का अनुभव सुशुप्त में होता है।

कारण शरीर क्या है? सूक्ष्म शरीर तो समझ में आ गया। अंतःकरण चतुष्टय पंच प्राण सूक्ष्म इंद्रियां। कारण शरीर क्या है? भगवान का विस्मरण अपने स्वरूप का विस्मरण कराने वाला घोर अज्ञान जीव का स्वभाव ये कारण शरीर है जो हम आत्म स्वरूप है इसका विस्मरण या श्री भगवान का विस्मरण जो भगवान से अपनापन है उसे हटा के इन शरीरों पे अपना तभी कारण बना वह अज्ञान सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण तीनों प्रकृति से मिलकर के जो जीव का स्वभाव बना वो अज्ञान कारण शरीर है। ये मन क्या है? ये बुद्धि क्या है?

ये आत्मा क्या है? अंतःकरण में जो करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? यह कर लेते हैं, यह नहीं करते हैं। जो संकल्प विकल्प होते हैं, उसे मन कहते हैं। थोड़ा सा एकाग्र होने पर इसका परिचय मिलने लगता है। आज हमारा मन वहां गया था। आज हमारा मन वहां सांसारिक आदमी तो इतना आज हमारा मन कह रहा है ये खा ले, ये पी ले, ये देख ले, ये सूंघ ले। ऐसा जो मनन करता है संकल्प विकल्प करता है। हृदय की उस वृत्ति का नाम मन है। हृदय एक है। संकल्प विकल्प मनन करने वाली वृत्ति का नाम मन है।

और ये बड़ा संशयात्मक होता है। ये संकल्प और विकल्प करता रहता है। ऐसा करें नहीं ऐसा कर लेते हैं। नहीं ऐसा नहीं होगा। वो चलता रहता है। इस पर जो निश्चय करता है हां ये कर लो उसका नाम बुद्धि है। हृदय की वो वृत्ति जो मन के संकल्प विकल्प पर निश्चय कर देती है। हां ये कर लो। आज चलो ये खाते हैं। जो निश्चय होकर लाए उस वृत्ति का नाम चार है नहीं। एक ही है हृदय। उस वृत्ति का नाम बुद्धि है। जो संकल्प विकल्प संशयात्मक मनन वो मन उसका जो निश्चय करा दे उसे बुद्धि कहते हैं।

और उसी का जो चिंतन करने लगे उस वृत्ति का नाम चित्त है और उसी की क्रिया को जो स्वीकार करे मैंने खाया मैं खाऊंगा मैंने किया मैं ऐसा करूंगा उसे अहंकार कहते हैं। एक हृदय में ये चार वृत्तियां होने के कारण उसे अंतःकरण चतुष्टय कहते हैं। आत्मा इन सबका साक्षी है। जो आत्मा है वो इनका साक्षी है। वो इनका दृष्टा है। वो तटस्थ रहता है। हां ना ये सब अंतःकरण में हो रहा है। और पावर उसी आत्म तत्व का है। वो तटस्थ रहता है और वह आत्मा मैं हूं। हम तटस्थ ना रहकर अंतःकरण में लिप्त हो गए।

यही बंधन है। जो ज्ञानी पुरुष है वह तटस्थ रहता है। मन बुद्धि के कार्यों को तटस्थ होकर जो साक्षी भाव से देखता है वो आत्मा है। जो मन संकल्प विकल्प मनन करता है जो बुद्धि निश्चय करती है जो चित्त चिंतन करता है जो अहंकार क्रिया स्वीकार करता है आत्मा उसका दृष्टा है साक्षी है और वह आत्मा है आप लेकिन ऐसा कहां ज्ञान मैं मैं देख लूं मन ने ज्ञानेंद्र नेत्र इंद्री के साथ मिलकर कहा अहंकार इसमें मिला हुआ है। अंतःकरण का अहंकार इसमें मिलके मन के साथ नेत इंद्री को लेकर दृश्य को देखना चाहता है।

बुद्धि ने निश्चय कर दिया हां देख लो। अब वो देख रहा है। बोले मैंने यह देखा ये अंतःकरण का अहम बोल रहा है ना कि आत्मा। आत्मा साक्षी है। अब जो उस साक्षी में है वो देखता हुआ भी नहीं देखा। क्योंकि जो देखने का पावर है वो उसी से मिला है। वो करता हुआ भी नहीं करता। वो खाता हुआ भी नहीं खाता। पीता हुआ भी नहीं पीता। चलता हुआ भी नहीं चलता। जो पांचव अध्याय में गीता जी के लिखा हुआ है स्पसन शसन गच्छन हृदय क्या है यही अंतःकरण चतुष्टय को हृदय कहा गया है मन बुद्धि चित्त अहंकार जहां ये चार वृत्तियां उदय होती है उसको हृदय कहते हैं।

हृदय कोई अलग नहीं है। अंतःकरण चतुष्टय जहां चार वृत्तियां उदय होती उसे हृदय कहा गया है। तो अंतःकरण के कितने दोष हैं और उनके हटाने का उपाय क्या है? अंतःकरण के तीन दोष हैं। मल, विक्षेप, आवरण। जब हम गुरु आज्ञा से शास्त्रोक्त कर्म करते हैं। गुरु आज्ञा से शास्त्रोक्त कर्म करते हैं। भगवन नाम जप करते हैं। इससे मल नामक दोष का नाश होता है। पाप शास्त्र आज्ञा से चलने से नए पाप बनेंगे नहीं और भगवन नाम जप करने से जो पुराने सब भस्म हो जाएंगे। तो मल का नाम मल का नाश होता है नाम जप और शास्त्रोक्त आचरण से अंतःकरण निर्मल हुए बिना भगवत प्राप्ति नहीं होती और ये तीन दोष है अंतकरण में मल विक्षेप आवरण तो मल का नाश मुख्यतया नाम जप और शास्त्रोक्त आचरण से आगे पाप बनेगा नहीं इसलिए पीछे के सारे मल का नाश नाम जप से होता नाम जप और बार-बार ध्यान पूर्वक जप करने से विक्षेप दूर हो जाता है।

विक्षेप कहते हैं जो भोगों की तरफ हमारी वृत्तियां जाती हैं उनको भोगों से हटा के बार-बार नाम में लगाए भगवान के रूप में लगाए अपने लक्ष्य में लगाए। बार-बार वृत्तियों को जो जा रहे हैं व्यक्ति वस्तु स्थान में वहां से हटा के लक्ष्य में लगाने से विक्षेप दूर हो जाता है। और आवरण महापुरुषों का संग करने से आवरण अहंकार है। जो आवरण है उसकी निवृत्ति महापुरुषों के सत्संग से होती है। जब सत्संग से पता चला कि मैं कोई अहंकार थोड़ी हूं। देहाभिमान का अहंकार जो था वह सत्संग से जब गलित होता है।

अच्छा मल विक्षेप शांत हुआ तो आप में पावर आ जाएगा अहंकार त्याग का जो अंतःकरण धर्म में अहंकार है वही जन्म मरण का हेतु है। जहां उससे हटकर के आप साक्षी भाव में हुए तो आपका आवरण नष्ट हो गया। आवरण ही जन्म मरण का कारण है। अहंकार संस्कृति मूल शूल प्रद नाना सकल शोकदायक अभिन संस्कृति का मूल और कष्ट का मूल ये अहंकार ही है। ये अहंकार क्या है? ये भगवान की अष्टधा प्रकृति है। आकाश वायु अग्नि जल पृथ्वी मन बुद्धि चित अहंकार ये जो मन है उसी में चित्त को समाहित कर लिया गया है इसलिए मन बुद्धि अहंकार कह दिया गया तो पांच और तीन आठ और अष्टधा प्रकृति में अहंकार आता है।

अहंकार बड़ा विचित्र है। इसके नाश का उपाय क्या है? इसमें जो गौरव है, बड़प्पन है, अपने में श्रेष्ठता है, यह गुरुजनों की सेवा से नष्ट हो जाता है। जब बड़े महापुरुषों की सेवा मिलती है, भगवत प्राप्त संतों की सेवा मिलती है, तो अहंकार नष्ट हो जाता है। सेवक साधक में कभी अहंकार नहीं होता। मैं इतनी सेवा करता हूं, मैं इतना जप करता हूं, मैं इतना उसमें सब नहीं होता। वो तो देखता है हम तो यंत्र की तरह चल रहे हैं। गुरु जी हमें चला रहे हैं। जैसे वैसे चल रहे हैं। तो गुरुजनों की सेवा, महापुरुषों की सेवा, सम्मान का त्याग, बड़प्पन का त्याग, गौरवपन का त्याग इसी से अहंकार क्षीण हो जाता है।

जो भगवत प्राप्त हो जाता है, उसका व्यवहार कैसा होता है? बहुत सुलझा हुआ व्यवहार होता है। वह शास्त्र दृष्टि से व्यवहार करता है। पिता को पिता की तरह, माता को माता की तरह, पति को, पति की तरह, पत्नी को, पत्नी की तरह व्यवहार करेगा। पर शास्त्र दृष्टि के अनुसार जो सिद्ध पुरुष होगा। पिता के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? शास्त्र कहता है। पत्नी के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? शास्त्र कहता है। जो शास्त्र कहता है उसके अनुसार व्यवहार होगा। मनमानी आचरण नहीं रह जाएगा।

जीवन मुक्त पुरुष के द्वारा कर्म होते हैं या नहीं? जीवन मुक्त पुरुष के द्वारा कर्म नहीं होते। कारण कि उसको ज्ञान हो जाता है कि कर्म कर्मेंद्र्रियों से होते। प्रेरणा ज्ञानेंद्र्रियों से हो रही है और ज्ञानेंद्र को मन चला रहा है। मन को बुद्धि चला रही है और उसका मैं साक्षी हूं। इसलिए मेरे द्वारा कुछ नहीं हो रहा है। कोई कर्म बंधन नहीं। सिद्ध महापुरुष का। यह काम क्रोध अंतःकरण में रहते हैं। तो जो जीवन मुक्त पुरुष हो गए उनके भी काम क्रोध रहते हैं। अंतःकरण में ही काम क्रोध का आवेश होता है।

तो जो जीवन मुक्त हो गया जो भगवत प्राप्त हो गया क्या उसमें काम क्रोध होते हैं? जीवन मुक्त भगवत प्राप्त पुरुष के अंतःकरण में काम क्रोध आदि की तो बात जाने दो। छोटा सा भी कोई दोष नहीं रह जाता। निर्दोष ब्रह्म को निर्दोष ही प्राप्त होता है। परमात्मा की प्राप्ति के पूर्व ही उनके अंतःकरण की ऐसी शुद्धि हो जाती है कि उसमें किंचितिन मात्र कोई भी दोष नहीं रहते। कोई भी दोष नहीं रहते। जैसे सूर्य उदय होने के पहले ही अंधकार नष्ट हो जाता है। ऐसे भगवत प्राप्ति के पूर्व ही वह निर्दोष हो जाता है।

उसमें कोई दोष नहीं रहता। तो सिद्ध महापुरुष में काम क्रोधा आदि दोष नहीं रहते। जो अपने को काम क्रोध आदि दोषों में लिप्त मान रहे हैं और सिद्ध भी मान रहे हैं। वो दंभ कर रहे हैं। पाखंड कर रहे हैं। काम, क्रोध, लोभ आदि मन, बुद्धि के स्वभाव हैं। या विकार है। अगर स्वभाव होता तो कभी नहीं छूटता। स्वभाव नहीं है। विकार है। काम, क्रोध, लोभा आदि ये स्वभाव में नहीं है। ये अंतःकरण में विकार में है। स्वभाव होता तो छोड़ना कठिन होता। और जब उसे स्वीकार कर लिया जाता है तो उनका प्रभाव स्वभाव में भी पड़ जाता है।

जैसे बहुत कामी स्वभाव का आदमी है। ये बहुत क्रोधी स्वभाव का आदमी है। ये बहुत लोभी स्वभाव का आदमी है। उसका स्वभाव पर प्रभाव पड़ता है। लेकिन वो स्वभाव होता नहीं है। जो अधिक लिप्त विकारों में हो जाता है। उसका प्रभाव स्वभाव पर पड़ता है। पर वो स्वभाव होता नहीं है। स्वभाव हो तो मिटाया नहीं जा सकता। वो विकार है। विकारी स्वभाव स्वभाव जो है वो शुद्ध है। पर उस विकार से लिप्त होने के कारण कामी कहा गया। क्रोधी कहा गया तो काम नष्ट हुआ तो स्वभाव तो शुद्ध था ही।

स्वभाव जो स्वभाव है वह कभी विकारी नहीं होता। पर विकारी कहा जाता है। जैसे रिक्शा कभी रिक्शा चालक नहीं बन सकता लेकिन रिक्शा कहने से खड़ा हो जाता है। ऐसे ही अधिक काम में लिप्त होने के कारण वो कहा जाता है कामी स्वभाव का है। ये क्रोधी स्वभाव का है। ये लोभी स्वभाव का है। जिस घड़ी तुम भजन में चित्त को जोड़ोगे तुम्हारा स्वभाव भजन का बन जाएगा। तो ये विकार हैं। ये घड़ी भर में सब नष्ट हो जाएंगे। ये सब तुम्हारे गुलाम बन जाएंगे। ये सब भाग जाएंगे डर कर। कब? जब खूब भजन करोगे।

ये दो चार माला घुमाने से नहीं। अरे भजन की अलग-अलग वृत्तियां। राधा राधा राधा राधा एक भजन हो रहा है। एक उपांश हो रहा है। एक मानसिक हो रहा है। और एक गाढ़ भजन हो रहा है। केवल भजन वही मंत्र दिखाई दे रहा। वही सुनाई हिम्मत नहीं पूरे शरीर की कि झेल पावे। थोड़ी देर में इतनी ऊर्जा पैदा होती कि शरीर विलक्षण होने लगता है। शरीर विलक्षण होने लगता है। मतलब खुद समझ में नहीं आता कैसे कंट्रोल करें। ऐसी महान ऊर्जा शक्ति यह नाम आप खिलवाड़ समझते हो आप भजन करके तो देखो पहुंचो तो भजन की जगह पे नाम जप जैसे राधा राधा कर रहे फिर उपांशु फिर मानसिक ये भजन का अभ्यास है अभी भजन नहीं हो रहा है भजन का अभ्यास हो रहा है और जब भजन होगा तब देखना आप जो वास्तविक भजन की बात है क्षमता नहीं है कि शरीर सह जाए।

हर नस नाड़ी मतलब एक अलौकिक ऊर्जा प्रकट होती है। जप से भजन से एक अलौकिक ऊर्जा आप लगे रहो। अभी ऐसा मत मानो आप भजनानंदी बन गए। माला जब माला और काउंटर ये सब धर जाए। हाय हाय मच जाए अंदर से। मतलब एक पूछा कल किसी ने कि कैसा लग रहा है इस समय आपको हम कहा कैसे बताएं ना खट्टा ना मीठा ना कड़वा कैसे बताएं अब हम कहे कि आनंद आ रहा है कि क्या कहे हम कुछ कह नहीं सकते कि कैसा लग रहा है बस हो रहा है भजन जब ऐसे होने लगता है तो स्वभाव बन जाता है भजन का सारे विकार अपने आप नष्ट हो जाते हैं।

लगे रहो। बस हम यह कह रहे लगे रहो। तेरी बनत बनत बन जाए रे। हरि सो लगा रहो भाई रे तेरी बनत बनत बन जाए रे। हरि से लगा रहो भाई रे। तेरी बनत बनत बन जाए। तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार। उदासी मन काहे को करे लहर लहर हरि आप संभाले हरि आप ही उतारे तेरा भार उदासी मन ये लहर लहर करके वही समुद्र में पहुंच जाएंगे समुद्र की लहरों का एक स्वभाव होता है वो दिखाई देती है उछलती हुई बाहर के लिए लेकिन वो घसीटती है अंदर के लिए उसका दो स्वरूप होता है ऐसी उछाल तो लगता है कि ये बाहर फेंक देगी लेकिन वो वो उसकी फस में आ जाओ तो घसीट ले जाएगी अंदर।

ऐसे ही भजन की लहर है। मन बाहर भागता है। विषयों की तरफ भागता है। लेकिन जितना भागेगा उतना घसीट जाएगा। भजन ना छोड़ो। पर भजन में लगे रहो। उबो मत। मंगल ही मंगल है। आगे चलकर जब भजन होगा अभी भजनंदी नहीं हो। अभी भजन मत मानो। क्योंकि हम बताते हैं भजन की एक स्थिति होती है। मतलब कैसे वर्णन करें? कोई शब्द ही नहीं हमें कि हम वर्णन करें। जैसे मशीन रख दी गई हो ना खोपड़ी में वो एक मतलब अजीब स्थिति है। जैसे हम वर्णन कर रहे हैं तो उसका आभास केवल हो रहा है उस समय का।

वो स्थिति नहीं है। उस स्थिति में वर्णन नहीं कर सकते। केवल बस ऐसे बैठे बस ऐसे हो रहा है चल रहा है मतलब उसमें कोई जप नहीं कि हम जप कर रहे हैं एक अलौकिक स्थिति भजन करते करते तभी कहा गया कि महापुरुष जन जो पांच मिनट में कर लेंगे वो तुम 24 घंटे में नहीं कर पाओगे पांच मिनट में एक क्षण में उनका जो चिंतन बना वो वही पहुंचना है ये विकार है ये नष्ट हो जाएंगे यह स्वभाव नहीं है। विकारों का अत्यधिक प्रभाव होने के कारण हम लांछन स्वभाव पर लगा देते हैं कि कामी स्वभाव का ये क्रोधी स्वभाव उसका स्वभाव नहीं कामी है।

काम विकार है। जो बढ़ चुका है वो हम आरोप कर देते हैं। तो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर ये स्वभाव नहीं होते। यह विकार होते हैं। स्वभाव होता तो मिटाना कठिन था। विकार है इसलिए सहज में मिट जाएंगे। अंतःकरण की शुद्धि का क्या उपाय है? अंतःकरण जब शुद्ध होने लगेगा तो अध्यात्म ज्ञान आपके अंदर अपने आप स्पुरित होने लगेगा। अंतःकरण जब शुद्ध होगा तो आपकी शारीरिक मानसिक क्रियाएं सब भागवतिक होने लगेंग। इसके शुद्ध करने का उपाय जितना भगवान नाम जप करोगे उतना ही अधिक होगा।

और जितना दूसरों की सेवा करोगे उतना अधिक होगा। दो बातें बताई सेवा और नाम जप अंतःकरण को शुद्ध करने के लिए सेवा अत्यंत अनिवार्य है। चाहे पशु पक्षी, मनुष्य, साधु, महात्मा किसी की भी हो सेवा जरूर करनी चाहिए। सेवा होनी चाहिए। एक बार गुरु जी से कहा कि जैसी होनी चाहिए वैसी आत्म उन्नति नहीं हो रही। 202 वर्ष पहले और कहो 25 वर्ष हो गए हो। तो गुरु जी ने कहा किसी साधु की लंगोटी नहीं धोई अभी कुछ ऐसी सेवाएं तो मिलती नहीं ऐसी निरंतर तो मिली नहीं बोले भगवान से मांगो मन में आया कि हमारे भगवान तो आप ही हो आप ही विधान कर दो ही चार दिन में विधान बन गया श्रीधर बाबा की सेवा का जो कालीद में श्रीधर बाबा भयो वृद्ध बस सेवा से और सुमिरन से अंतःकरण बहुत जल्दी शुद्ध होता है।

अगर सेवा सुमिरन दोनों जिसको सही ढंग से ना मिल पा रहे हो तो वृंदावन की रज लगाओ पूरे शरीर में बहुत जल्दी शुद्ध हो जाएगा अंतःकरण। वृंदावन की रज का सेवन करो। पूरे शरीर में पाउडर की तरह लपेटो। बार-बार कहते मान लो इस शरीर से प्यार मत करो। शरीर तुम नहीं हो। शरीर का वास्तविक प्यार यही होगा कि रज इसमें लगी रहे। स्नान के बाद शरीर हल्का गीला रहता है। और जब रज लगाओ तो पूरे शरीर में रज लग जाती है। रोज लगाते हो। रज लगी है और शरीर छूट जाएगा तो श्री जी की प्राप्ति हो जाएगी।

ये पूज्य राधा बाबा ने अपनी वाणी में लिखा कि यदि वृंदावन की रज शरीर में लगी हुई है और शरीर छूट जाए तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी। या नाम सुमिरन नहीं बन रहा। किसी की सेवा नहीं कर पाए तो इतना तो कि खूब रज लपेटे और गीली करके तिलक रूप में ऐसे लगा लो और सूखी पूरे शरीर में लगा लो। हमें कब ब्राह्मी स्थिति थी प्राप्त होगी? भगवदाकार स्थिति वैसे वही बिल्कुल चाह नहीं होती कि हम कोई भजन का उपाय कर रहे एकदम जैसे पैर रपट गया अब गए ऐसा होता है जैसे पैर रपट गए एकदम गए एकदम अब उस समय फिर कोई है कि नहीं है उससे कोई मतलब नहीं शुरू हो गया अपना स्वभाव और प्रभाव शुरू हो जाता है बोले ब्राह्मी स्थिति हमें कब प्राप्त होगी जो मृत्यु जनित कष्ट का वरण करता है वही ब्राह्मणी स्थिति को प्राप्त होता है।

हर कष्ट को गले लगाता है। अब चाहे मरना पड़े लेकिन भजन नहीं छूटेगा। कुछ भी हो जाए वो ब्राह्मणी स्थिति जिद्दी स्वभाव और कष्ट कहां तक? बोले मृत्यु तक। मृत्यु तक का जो वरण करने के लिए तैयार 10 मिनट बैठे बोले पैर में पीड़ा हो रही दो दिन बैठे तीसरे दिन बैठे ले खत्म हो गया हो गई साधना नहीं पीछे अगर ध्यान से सुना हो कि अगर संत सेवा का क्या स्वरूप है संत सेवा को तो उसी को गुरु सेवा मान लेते हैं गुरु सेवा संत सेवा एक ही उसका स्वरूप क्या है तो बोले उनकी आज्ञा के अनुसार चलना उनके आदेश उपदेशों का पालन करना।

इसी से अहंकार नष्ट हो जाएगा। संतों की सेवा मतलब अहोभाग्य है जो गुरुजनों की शरीर सेवा में है। जैसे हमारे गुरु जी की सेवा में जो है ना वो जब सामने से निकलते हैं तो उनके चरणों को देखकर बार-बार प्रणाम करते हैं। शुरू से भाव रहा है कि जो गुरुजनों की सेवा में है वह हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है। हम उनकी बराबरी आज्ञा पालन करके भी नहीं कर सकते। देखो भाव का विषय है। शास्त्र आज्ञा करता है कि गुरु और संत की आज्ञा का पालन करना ही सबसे बड़ी सेवा है। लेकिन जो गुरु जी की लंगोटी धो रहे हैं।

जो गुरु जी को स्नान करा रहे हैं। जो गुरु जी के झूठे पात्र मार्जन कर रहे हैं। जो गुरु जी को बना के पवा रहे हैं। और हम यहां माला चला के तो हमारा सर उनके आगे झुका रहेगा। हम सदैव उनकी चरण वंदना करेंगे कि आपको जो सौभाग्य मिला है जो आप हमारे गुरु जी को सुख पहुंचाते हैं इसलिए मैं आपका दास हूं। दास दास हम जब वह सामने निकलेगा तो हम पहले उसके चरणों को गौर से दर्शन करते हैं और उनको प्रणाम करते हैं कि जिसके हाथों से हमारे गुरु सेवा बन रही है वो हमारे लिए गुरु जी के समान पूज्य है।

उसकी बराबरी तो नहीं कर सकते। हम तपस्या करके या तीर्थगाहन करके या जो भी उसकी बराबरी नहीं कर सकते। वह तो रहेगा ही। जो गुरु जी की चरण सेवा में है। रात दिन उनके हुकुम पर खड़ा है। उनकी सेवा में तो आप देखो आप भजन कर रहे हो लेकिन अपने लिए कर रहे हो। हमारी बात को समझना। गुरु आज्ञा का पालन कर रहे हो लेकिन अपने लिए। आप गुरु जी को प्रणाम कर रहे हो अपने लिए। प्रणाम कर रहे हो गुरु जी को। गुरु जी के लिए नहीं अपने लिए। हमारा मंगल होगा। आप गुरु जी को कुछ दे रहे हो अपने लिए लेकिन वह जो भी कर रहा है गुरु जी के लिए कर रहा है उसको प्रणाम नमस्कार से मतलब नहीं है गुरु जी को प्यास लगी है पानी पिलाना गुरु जी को भोजन गुरु जी की आरती करने का जो समय है वो स्वयं आरती कर रहा है गुरु जी खड़े हैं या बैठे हैं आराम मिल रही ना गुरु जी को आराम मिल रही है ना गुरु जी को सुख पहुंच रहा है ना बहुत सूक्ष्म क्षमता से हमारे इस विषय को समझना अन्यथा मत ले जाना।

आप जो भी पालन कर रहे हो गुरु आज्ञा का अपने लिए और वो जो भी कर रहा है प्रगट में गुरु जी के लिए कर रहा है। वो गुरु जी का कपड़ा धो रहा है गुरु जी के लिए। गुरु जी की लंगोटी धो रहा है। गुरु जी के लिए अपने जीवन को अर्पित किए है गुरु जी के लिए। इसलिए उसकी समानता में तो नहीं कह सकते हम कि उनके समान सब नहीं। कभी कृपा हो जाए हमारे ऊपर भी और हमको चंद दिन ही सेवा मिल जाए वह समानता गुरु जी की नहीं जो सेवा में वो वो तो मतलब जीत गया है हजार लड़के होते हैं तो हजार लड़कों में सब थोड़ी कमांडो बन जाते हैं 10 पांच निकल पाते हैं ऐसे मानो लाखों शिष्य हैं तो लाखों गुरु जी को मानने वाले लाखों में 10 पांच गुरु जी की मानने वाले हैं।

लाखों गुरु मानने वाले हैं। लाखों में 10 पांच गुरु की मानने वाले हैं। उनमें से कोई एक दो गुरु को सुख पहुंचाने वाले हैं। गुरु को सुख पहुंचाने के लिए हम तत्पर है। खड़ा है रात दिन हुकुम पे खड़ा है। जैसे गुरु जी आज्ञा करें। बस गुरु जी की सेवा उनकी समानता तो नहीं कर सकते। उनको वो तो साक्षात भगवत स्वरूप है। वो कोई साधक नहीं है। वो पूर्व जन्म में साधना से सिद्ध हुए तो साक्षात परम ब्रह्म स्वरूप गुरुदेव की परिचर्या में लगे हैं। उनकी बराबरी कैसे हो सकती है?

सोचो। हम गुरु जी की आज्ञा का पालन कर रहे हैं। लेकिन हम गुरु जी की थाल का झूठन तो नहीं पा रहे ना। पाने के बाद सरका दिया पूरा धो के वो पी रहा है। उसकी बराबरी हम कर पाएंगे। गुरु जी को छू नहीं सकते और रोज कपड़ा लंगोटी सब धोकर फैला के कैसे उसकी समानता कर सकते हैं हम चाहे जितना तप करें चाहे जितना जप करें उसकी बराबरी थोड़ी कर सकते हैं और इसके बाद डांट लगाया गुरु जी ने ऐसेसे नहीं ऐसे जी महाराज उसकी समानता कैसे कर सकते हैं हां लाभ हम गुरु सेवा का ले सकते हैं उनकी आज्ञा का पालन करके लेकिन समान समानता नहीं कर सकते।

उनकी समानता हम नहीं कर सकते। आप लोगों के अंदर भाव हो तो भले हो कि हम किसी से कम नहीं लेकिन हम उनकी समानता नहीं कर सकते जो गुरु की बालवत परिचर्या में लगे हैं। धन्य है वो साधक धन्य है वो संत जो अपने गुरुदेव को स्नान कराते हैं। गुरुदेव का चरणामृत पीते हैं। गुरुदेव को भोग पवाते हैं। बना के गुरुदेव के वस्त्र धोते हैं। गुरुदेव की परिचर्या हम उनकी समानता नहीं कर सकते। और हम यह जरूर कह सकते हैं कि भगवान उनके अधीन हो जाएंगे। जिन्होंने गुरुदेव को ऐसे रिझा लिया भगवान उनके अधीन हो जाएंगे।

भगवान जब हमारा हृदय जैसे इस समय बात कर रहा हूं तो हृदय एकदम द्रवित हो रहा है उनके प्रति। गुरु जी को पानी पिला दे। एक विचार करो। गुरु जी को उठा के बैठाल दे। गुरु जी की चरण सेवा कर दे। यह सौभाग्य कैसे मिल सकता है? जिनका हम उिष्ट कभी प्राप्त कर ले तो फले नहीं समाते वो तीनों टाइम उनका पार बचा हुआ हम कैसे समानता उनकी कर सकते हैं जो ऐसे आंख उठा के देखना सौभाग्य प्रतीत होता है वो आंख निकाल के उनको डांट रहे हैं ये सौभाग्य तो एक किसी पूर्व जन्म का भारी तप एकत्रित हुआ और किसी संत और गुरुजनों के अनुशासन में उनकी परिचर्या में निकुंज जेब में रखा हुआ है।

अगर किसी संत किसी महापुरुष की परिचर्या में आप है ना सब दुनिया के सब साधन एक तरफ और संत परिचर्या एक तरफ। किसी को संत परिचर्या मिल जाए तो कभी ये मत छोड़ना कि मुझे भजन करना है। इससे बड़ा कोई साधन नहीं। भगवान इसके अधीन हो जाते हैं। तो जो अन्य लोग नहीं प्राप्त कर पाते द्वितीय स्थिति है कि वो उनकी आज्ञा में बंधे रहे कि हमारा सौभाग्य इतना तो नहीं है कि मैं उनका वस्त्र प्रक्षालन कर सकूं। उनको स्नान करवा सकूं। उनको भोग पवा सकूं। उनकी जूठन परिचर्या में मैं रहूं।

लेकिन मैं अपने जीवन को उनको समर्पित करता हूं और उनकी आज्ञा में तो उनकी कृपा से उसका अहंकार गलित हो जाएगा और सद्गति प्राप्ति में कोई किंचित मात्र अंतर नहीं होगी लेकिन प्रेम प्राप्ति में अंतर होगा जो उसे प्रेम प्राप्त होगा गुरु चरणों का वो उसे प्रेम नहीं प्राप्त होगा नहीं सब आप देख लो जो हम कह रहे इस बात पर देखो आप प्रणाम करते हो अपने लिए आप जप करते हो अपने लिए आप गुरु बनाया है अपने लिए गुरु के लिए क्या कर रहे हो ईमानदारी से देख लो ईमानदारी से वृंदावन में बैठे हो आप अपने लिए कर रहे हो गुरु के लिए बोले मेरा जीवन गुरु का जीवन है मैंने गुरु को दे दिया अब अगर गुरु जी हमसे यहां जूता साफ करवाते हैं तो मैं गुरु उसका हो गया जीवन बस आप समझ लो मेरा जीवन गुरु के लिए है अगर वो मुझे 100 किलोमीटर दूर रखते हैं तो मेरा इसमें क्या दोष है?

अगर मुझे वो शरीर सेवा नहीं दे रहे जिसमें मेरी क्या पर मैं गुरु कहूं उनकी आज्ञा पर चलूंगा। मेरा जीवन तन मन प्राण उनका उसको वही गति प्राप्त होगी जो उनकी परिचर्या में है क्योंकि वो गुरु आज्ञा में है। तो गुरु आज्ञा में जो है वो गुरु की परिचर्या ही मानी जाए। किसी भी संत की सेवा करें हम जैसे हम पूज्य श्रीधर बाबा की सेवा तो हमारी गुरु भक्ति बढ़ी। और हमारा इष्ट प्रेम बढ़ा। उनकी सेवा से हमारे इष्ट प्रेम में विक्षेप नहीं हुआ। गुरु भक्ति में विक्षेप नहीं हुई।

पर व्यवहार नहीं है। सेवा से मतलब है केवल। जैसे किसी भी संत अब कोई बीमार संत है। किसी अन्य संप्रदाय का है। आप जाइए। आप उनकी सेवा परिचद्या कीजिए। पर श्रद्धा और विश्वास अपने गुरुदेव और इष्ट पर होना चाहिए। अगर इष्ट और गुरुदेव वाला श्रद्धा विश्वास कर लोगे तो उनके जो चल रहा है वही तुम्हारे चलेगा। तुम्हारे गुरु के जो चल रहा है वो नहीं चलेगा। यह भी बात ध्यान रखने की बात है। परिचर्या हम करेंगे लेकिन श्रद्धा और विश्वास पूर्ण अपने गुरुदेव का। मैं अपने गुरुदेव की आज्ञा से आपकी सेवा कर रहा हूं।

मैं अपने गुरुदेव की प्रसन्नता के लिए आपकी सेवा कर रहा हूं। मुझे आपसे कोई फल या कोई उपदेश या कोई सतमार्ग नहीं चाहिए। मुझे सतार्ग मिल चुका है। मुझे उपदेश मिल चुका है। मुझे फल मिल चुका है। मुझे गुरुदेव मिल चुके हैं। उनकी आज्ञा है कि अगर संत सेवा मिल जाए तो करना चाहिए। तो मैं संत सेवा मान करके कर रहा हूं। आपसे कुछ चाहिए नहीं। तो उसका कभी भी परमार्थ नहीं बिगड़ेगा। जब तक संत सेवा ना मिले तो नाम जपो। घर में ठाकुर विराजमान है। खूब भजन साधन करो लेकिन इच्छा करो कि काश कभी कोई ऐसे वयोवृद्ध बीमार शरीर की हमें सेवा करने को मिल जाए।

वृंदावन में तो सब संत ही हैं। देखो एक बीच में एक माई इतनी तपस्विनी थी। संपूर्ण वृंदावन की रोज परिक्रमा लगाना संत सेवा करना सब और यही महीनों रखकर के राधा नाम कीर्तन करके और उनका शरीर पूरा तो ऐसे भगवान दे देते हैं। कभी कोई ऐसा भजनंदी मिल गया और उसकी सेवा बन गई तो हमारा देहाभिमान पर सेवा सेवा है। जब तक सेवा ना मिले खूब नाम जप करो। खूब और आकांक्षा करो कि शरीर से कभी किसी की सेवा बन जाए। बहुत जल्दी अंतःकरण शुद्ध होता है और अहंकार रहित होता है। सेवा की बहुत बड़ी महिमा है।

जैसे सेवा भाव है। अब सब सत्संग सुन रहे हैं। अब एक रुमाल लेकर के जितने जूते चप्पल रखे हैं सबके साफ कर दिए। देखा सत्संग होकर गए। गली में सोनी लगा दी। ये सेवा नहीं सब संतों की सेवा बन गई। समय मिला कारपेट साफ कर दिया। कितने संत बैठकर के सत्संग सुन रहे हैं। यह सब संत ही तो है। चाहे सफेद हो, चाहे जो भगवान में चित्त जोड़े वो संत सेवा की कमी नहीं है। अगर हम सेवा करना चाहे तो बहुत सेवा है। सेवा की कमी नहीं है। हम इच्छा करें सेवा की। भगवान हमें सेवा का अवसर देंगे।

और खास बात सब संतों के संत हैं भगवान। तो हमने कहा है चाहे राधा नाम सेवा रख लो और चाहे जुगल सेवा रख लो तो वह भी सेवा तो है। अपने घर में ठाकुर विराजमान है। अपने घर में नाम विराजमान है। आठों पैर सेवा में है। अगर संत सेवा मिल जाए तो ठीक। नहीं संतों के संत अनंत भगवान विराजमान उनकी सेवा में रहो। सेवा से बहुत जल्दी अंतःकरण पवित्र होता है। शेष चर्चा आ गई। श्री राधा वल्लभ लाल की जय।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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