॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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भजन और भोजन के लिए उपासक को किन स्थानों से बचना चाहिए? / इन दोषों वाले को नरक से कोई नहीं बचा सकता

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हद दपितम मधुपते स्मरताप मुगम निर्वापय परम शीतल माश्रयाम परम शीतल माश्रया करो कृपा वृषभानु दुलारी करहु कृपा वृषभानु दुलारी मम अवगुण गुण ने सुनहरी निजु कर लाल बिहारी करहु कृपा वृषभानु दुलारी करहु कृपा वृषभानु दुलारी हे कृपामई स्वामिनी हमारे गुण अवगुण मत देखिए। माया के प्रभाव से प्रभावित होकर हम माया जनित गुण अवगुणों में सदैव रहे हैं। वही आकर्षित करके हमको अपने अधीन किए हुए हैं। स्वामिनी आप तो लालजू को अधीन किए हुए हैं।

क्या करुणामई हमारे मन को हमारी बुद्धि को जो माया अधीन किए हुए है क्या उससे आप छुड़ाकर अपने चरणों में नहीं लगा सकती कृपा करो हे लाडली जो आप अपार सामर्थ्यमई हैं लह विपिन वर बास रास रस और नहीं जिए मेरे मनन मानसिक दर से परसे तन मन संतन नेरे हे स्वामिनी जो ऐसी कृपा करो कि मुझ अधम को अखंड वृंदावन वास मिल जाए। यह रास भूमि है। बिना आपकी कृपा के यहां वास असंभव है। इसलिए स्वामिनी मुझे वृंदावन का वास दो और सर्वश्रेष्ठ नित्य विहार रस का भजन। यह भजन बिना भगवत प्रेमी संतों के संग के नहीं होता।

इसलिए तन मन संतन नेरे। मेरा तन भी संतों के समीप रहे और मेरा मन भी संतों की आज्ञा में रहे तो मेरे मन में मानसिक सेवा आपकी प्रारंभ हो जाए। ऐसी कृपा कर दो। जुति कदंब मुकुट मणि श्यामा सुख धामा श्री राधे ज रूप लाल हित शरण गए की लाज राख हरि बांधे शरण गए की लाज राखी हरि बा हे प्रियाजू समस्त ब्रज युवतियों के समूह की आप मुकुट मणि हैं। परम सुख धामा हैं। हे किशोरी जो मैं आपकी शरण में हूं। आप अपने शरणागत की लाज का निर्वाह कीजिए। मेरे गुण अवगुणों की तरफ ना देखकर आप अपनी कृपा सामर्थ्य की तरफ देखिए।

जो सामर्थ्य लालजु को अधीन किए हुए है। मेरे दूषित मन को अधीन कर लेना कौन सी बड़ी बात है? हे स्वामिनी जो आप कृपा करो। उपासक जब तन मन से संतों का संग करता है तो उसे सिद्धांतों की प्राप्ति होती है। अगर सिद्धांत से नहीं चलता है तो सत्संगी नहीं है। सत्संगी और सांसारिक में इतना ही अंतर है कि सांसारिक पुरुष की मन बुद्धि में जैसा आया वैसा कर बैठता है। और सत्संगी उसके मन बुद्धि में जब कोई बात आती है तो उसको प्रमाण खोजता है। यह गुरु आज्ञा के अंतर्गत है कि नहीं है।

यह शास्त्र आज्ञा के अंतर्गत है कि नहीं है। अगर नहीं तो वो नहीं करेगा। है तो भी करेगा। तो फिर उसका अध्यात्म में प्रवेश हो जाएगा। इसीलिए कह रहे हैं यहां सिद्धांत कि प्रथम होई हरि कृपा तब ही श्रद्धा उपजावे साधु संग में प्रीति बढ़े पुनि सद्गुण गावे। सबसे पहले हरि की कृपा हुई कि मनुष्य देह मिला। दूसरी कृपा हुई कि हमारी श्रद्धा भगवान और भगवान के भक्तों में हुई। यह भगवान की तरफ से मिली श्रद्धा है। इस श्रद्धा से जब हम संतों का संग किया भगवत प्रेमी महात्जनों का तो उनके चरणों में हमारी श्रद्धा प्रीति बढ़ी।

भगवान से भी अधिक सातों समि जग देखा मोते अधिक संत कर लेखा बड़े श्रद्धावान भाग्यवान वो महत जन है जिनके हृदय में संतों के प्रति भगवंत से भी बढ़कर आदर है। बोले जब ऐसा संतों के प्रति आदर होता है तो उसमें भागवतिक सद्गुण प्रकाशित हो जाते हैं। भागवतिक सद्गुण से ही माया पर विजय प्राप्त की जाती है। माया जनित गुणों से माया पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। भागवतिक सद्गुण भगवत प्रेमी महात्माओं के संग से आते हैं। जब किसी भगवत प्रेमी महात्मा को अपना प्रभु मान लिया जाता है।

उनकी आज्ञा पालन की जाती है तो भजन क्रिया जाने तब शब्द अर्थ पहचाने होई अनर्थ निवृत्ति ज्ञान विज्ञान बखाने जब संतों का संग किया जाता है तो भजन में प्रीति होती है। पक्का भजन ना हो संग बिनु भजन बिना नहीं प्रेम छिनहु भजन न छाणिए धरिए ध्रुवया नेम भजनांदी भगवत प्रेमी महात्माओं के संग का जब रंग चढ़ेगा तो भजन में प्रीति होने लगती है। भजन क्रिया जाने कैसे भजन होता है? निरंतर भजन करने के लिए एक प्रक्रिया बताई थी। आप लोगों को अगर याद हो कि अपनी जबान का अग्र भाग ऊपर के दांतों के जोड़ पे ऐसे लगा के बंद कर लो।

अब मंत्र चलाओ। नाम चलाओ। तुम्हारी मौन स्थिति रहने लगेगी और निरंतर मंत्राकार वृत्ति पर यह अभ्यास से होगा एक दिन में नहीं हो जाएगा। देखो ऊपर के जो दांत हैं उनके जोड़ में ऊपर मसूड़ों के पास अपनी जिभ्या का अग्र भाग मोड़ कर लगाइए और ओठ बंद कर लीजिए। फिर नाम चलाइए। हवा जो श्वास बार-बार आ जा रही उसकी ठसक में नाम मंत्र को उच्चारण कीजिए जिससे भौरा गुनगुनाता है अंदर से चल रहा है। इसको थोड़ा और जब ऊपर तालुक के कर देते तो इसे खेचरी मुद्रा कहते हैं। इससे जो रस निकलता है वो बहुत पवित्र होता है।

अंतःकरण को बहुत शीघ्र निष्पाप कर देता है। पर यह विषय पुरुष नहीं कर सकता। ऊब जाएगा थोड़ी देर में। अगर यह प्रक्रिया बनी रही तो आपको बोलने की हिम्मत नहीं रहेगी। कोई बात करेगा तो जहर जैसा लगेगा कि मंत्र छूट जाएगा अगर इससे बात करेंगे। प्रारंभिक दशा में बहुत निरंतर भजन करने के लिए ये प्रक्रिया हमारे काम आई। पूर्व में ये बहुत काम आई। तभी हमसे पूछा जाता था तुम्हारी वाणी है तुम बोल लेते हो ऐसी स्थिति में रहते थे यहां वृंदावन में जिस आश्रम में रहते थे आठ महीना हो गए होंगे किसी से राधेश्याम नहीं बोले थे तो उन्होंने एक दिन कहा महात्मा तुम बोल लेते हो तुम्हारी जबान है तो हम कहा जी यहां किसी से आप राधे-राधे नहीं करते जरूरत नहीं जब राधे से राधे-राधे हो रही तो और राधेधे क्या करना है?

अच्छा क्योंकि अब वो जो जिस स्थिति में वहीं की बात समझेगा आगे का तो समझेगा नहीं। आप अगर यह अभ्यास पकड़ ले तो निरंतर भजन करने की वृत्ति में पहला मौन और दूसरा निसंकल्प स्थिति जागरण कर देगा। और जो आपके अंदर अधिक रस अधिक मात्रा में रस निकलेगा जबान के नीचे से इस प्रक्रिया से निकलता है और ऊपर कर ले खचरी मुद्रा में तो अमृत जैसा रस निकलता है बहुत दिव्यता आती है भूख प्यास पर विजय प्राप्त करने की सामर्थ इसी रस से आती है ये योगिक क्रिया है ऐसे करके ये मुद्रा है शांत आंख खुली है बंद मंत्र चल रहा है।

देखो आप कर सकते हो। आप लोग किए मंत्र चला रहे हैं। एकांत में इस क्रिया को करके देखना। भजन क्रिया जाने तब शब्द अर्थ पहचाने। यह आप साधारण मत समझना। जो आपको नाम मिला है, मंत्र मिला है, इसका अर्थ प्रकाशित होता है। इष्ट देव। जैसे जैसे आपका मंत्र चलेगा आपके हृदय में द्रवण क्रिया होगी। उस द्रवण क्रिया में सबसे बड़ी सावधानी है कि किसी से प्रियता ना होने पावे हटा नहीं पाओगे। द्रवण क्रिया में यदि किसी से प्रियता हो गई तो छाप लग जाएगी। हृदय द्रवित होता है मंत्र जपने से।

ध्यान रखना उस समय किसी से भी अपनापन ना होने पावे। किसी से अपनापन हुआ तो इतने जोर का होगा कि उसे मिटाने के लिए फिर और डट के भजन करना पड़ेगा। हृदय में जब द्रवण क्रिया हो ऐसा बावरापन चढ़े तो उसे बिल्कुल बाहरी उदासी रखना चाहिए। किसी से प्रियता नहीं। तो सीधे इष्टाकार वृत्ति होती है। सारे अनर्थों का नाश हो जाता है। जो पाप कराने वाली प्रवृत्ति है वासना और जो पाप दोनों का बोले हो अनर्थ निवत्ति जब साधु संग हुआ तो साधु संग से गुरुजनों के प्रताप से भजन करने की पद्धति पता चली।

कैसे भजन निरंतर किया जाता है। उससे हमारे हृदय में भजन का अर्थ प्रकट हुआ। उस अर्थ से सारे अनर्थ की निवृत्ति हो गई। पाप प्रवृत्ति पाप इनका नाश हो गया। तो बोले हो अनर्थ निवृत्ति और जहां अनर्थ निवृत्ति हुई तो ज्ञान विज्ञान बखाने अंदर ज्ञान जागृत हो गया। विज्ञान जो ज्ञान हुआ उसका अनुभव हो गया। उसे थोथा ज्ञान नहीं केवल वाणी वाला अनुभव में आ गया क्योंकि भजन है ज्ञान विज्ञान बखाने फिर निष्ठा इष्ट विषय बढ़ के मन निश्चल होई छिन छिन रुचि उपजाई नेह जग के सब खोई अपने इष्ट की निष्ठा उसके हृदय में इतनी बढ़कर जागृत हो जाती जाती है।

अब कोई भी लाभ हानि प्रलोभन उसको अपने इष्ट से अलग नहीं कर सकता। निष्ठा इष्ट विषय बढ़ के मन निश्चल होई मन अपने आराध्य देव के चरणों में निश्चल हो गया। हट ही नहीं सकता। फिर छिन छिन रुचि उपजाई। अपने आराध्य देव में प्रतिपल ऐसी प्रीति उमगी कि देह कुटुंब ते जाए छूट सब ही विधि नात तो नेह जग के सब खोई शरीर संबंध शरीर के भोग संबंध शरीर के और रिश्ते नाते संबंध ये सब झूठे हैं। यह अनुभव होने लगा तो होई तब आसक्ति प्राण पति नैनन झलके गदगद पुलकित अंग प्रेम रस भीनी पलक अपने प्रिया प्रीतम में अत्यंत आसक्ति प्रकट हो गई।

वो आसक्ति इतनी जोर की कि प्रिया प्रीतम नेत्रों में विराजमान हो गए। अब तो कभी वह गदगद कंठ होकर पुकारता है, कभी रोता है। सदैव कपोल उसके गीले रहते हैं। प्रेम रस भीनी पलक स्व प्रकाश निज भाव प्रकाश तन मन माही प्रेमी प्रेम निकेत प्रेम परसी पर छाही जे प्रिया प्रीतम का साक्षात्कार हुआ कि उसे अपने सहचरी वपू का दर्शन हो गया प्राप्ति हो गई स्व प्रकाश निज भाव प्रकाश तन मन सहचरी भाव का मन मिल गया सहचरी भाव का तन मिल गया सहचरी भाव मिल गया भाव देह और भाव मन दोनों की प्राप्ति हो गई ये गुरु प्रदत्त भजन के प्रकाश से प्रेम निकेतन निकुंज महल में वो पहुंच गया और प्रिया प्रीतम की परछाई की तरह उनके साथ रहने लगा शरीर रहते हुए यह है गुरु प्रदत्त भजन का प्रभाव अवतारी सब अवतारन यह नित्य बिहारी श्री राधा वल्लभ लाल प्रगट लीला विस्तारी यही से सब अवतार होते हैं।

हमारे प्रभु राधा वल्लभ लाल बिहारी बिहारी जो नित्य विहार करते रहते इन्हीं के अंश से ब्रह्मा विष्णु महेश इन्हीं से सब अवतार प्रकट होते हैं। अवतारी सब अवतारन पर यह नित्य बिहारी श्री राधा वल्लभ लाल प्रगट लीला विस्तारी वृंदावन नवनि निकुंज में सिंहासन पर विराजमान युगल सरकार इ विधि सिंहासन पर राजत कैसे राज रहे इ विधि कौन सी विधि अनशन पर भुज दिए बिलोकत इंदु बदन विर करत पान रस मत परस्पर लोचन तसित चकोर नव किशोरी नव किशोर गलवैया दी हुई एक दूसरे को देख रहे इ विधि सिंहासन पर राजत रूप निहारे गौर श्याम अभिराम कोटि मनमथ लखवारे ऐसे सुंदर हमारे प्रिया प्रीतम है कि करोड़ों काम की छवि न्योछावर है इन पर।

अब करोड़ों काम की छवि तो कह दी गई और आपने सुन ली। एक काम पूरे त्रिभुवन को बिना प्रकट हुए अपने अधीन किए हैं। अगर प्रकट हो जाए तो इतना सुंदर है कि त्रिभुवन में काम से सुंदर कोई है ही नहीं। काम और रति से बढ़कर कोई सुंदर नहीं। तभी भगवान को कोटि मनमथ मनमथा करोड़ करोड़ कामों के मन का भी मंथन करने वाला कहा गया है। तो गौर श्याम अभिराम कोटि मनमथ लखवारे ऐसी जुगल जोड़ी सिंहासन पर विराजमान परस्पर एक दूसरे के नेत्रों में चंद्र चकोर की भांति सखियां कह रही करोड़ों काम न्योछावर है।

इनकी रूप माधुरी में वह भाव देह प्राप्त महापुरुष इनका अवलोकन कर रहा है। नव किशोर सुकुमार अंग छवि कहत ना आवे कोटि शारदा थके भाव अनुभव कछु गावे। कह रहे कि अगर करोड़ों सरस्वती हो तो भी हमारे प्रिया प्रीतम की रूप माधुरी छवि शोभा का वर्णन नहीं कर सकती। वह भाव देह प्राप्त उपासक देख रहा है कि सिंहासनारूढ़ परस्पर चंद्र चकोर नेत्र भय शोभाम श्यामा श्याम विराजमान नव निकुंज अभिराम श्याम संग नीको बनो समाज जस हित हरिवंश विलास रास जुत जोरी अविचल राज अब प्रिया प्रीतम को रिझाने के लिए सखिया नृत्यति गावत पटत उघट संगीत सुनावे सहचरताल मृदंग बीन रस लीन बजावे कोई तो सुंदर नृत्य करते हुए श्री चरण और कर हाव भाव प्रकट करते हुए पटका रही कोई बड़े उच्च स्वर से आलाप लेकर संगीत से युक्त राग रागनियों की तांग छेड़ रहे

कोई सहचरी ताल मृदंग वीणा रस में लीन होकर बजा रहे प्रिया प्रीतम विराजमान है तो कोई सखी चंवर मोर छल पान दान रुमाल लिए कर लाल रूप हित प्रीति पीक दानी पाई धर सखियां कुछ नृत्य कर रही कोई संगीत बजा रही तो कोई सखी चवन कर रही तो कोई मोरछल कोई व्यजन पंखा कर रही कोई रुमाल लिए खड़ी है कि जरा भी पसीने की बूंद आए तो उसे पूछ दे रूपलाल जी महाराज कह रहे हैं कि मुझे सेवा मिली है पीक दानी की मैं पीक दानी लिए सामने अपने सहचरी स्वरूप में विराजमान हूं लाल रूप हित प्रीति पीक दानी पाई धर पट भूषण बन माल लाल ललना तन सोहे बहुत ही सौभाग्यशाली सहचरिया कोई वस्त्र बनी हुई है कोई आभूषण बनी हुई वहां कोई और वस्त्र आभूषण नहीं सखियां बनी हुई ये सौभाग्य है प्रिया प्रीतम के श्री अंग का स्पर्श पट आभूषण के रूप में सहचरिया प्राप्त करती वहां कोई लौकिक की स्वर्ण चांदी आदि आभूषण नहीं कोई और रत्न नहीं है।

ये सब नित्य भजनंदी महापुरुषी प्रिया प्रीतम की पोशाक बनते हैं। प्रिया प्रीतम के आभूषण बनते हैं। पट भूषण वनमाल लाल ललना तन सोहे शीश चंद्रिका मुकुट लटक त्रिभुवन मन मोहे प्यारी जु प्यारे जु एक दूसरे के प्रेम में ऐसे रंगे हुए हैं कि प्यारी जु के श्री अंग की पोशाक प्यारे जु के रंग की और प्यारे जु के श्री अंग की पोशाक प्यारी जु के श्री अंग के रंग के प्यारे जो मोर मुकुट धारण किए हुए झुका हुआ है प्रियाजू की तरफ और प्रियाजु की चंद्रिका मोर मुकुट का स्पर्श कर रही है त्रिभुवन मन मोहन ऐसे युगल सरकार को सखियां रिझा रही वो भाव युक्त उपासक देख रहा है अद्भुत अमित अपार सकल श्रृंगार विराजे भूषण भूषित अंग अंग अंग लख मन मथ लाजे ऐसे हमारे जुगल किशोर है उनकी श्री अंग की शोभा देखकर करोड़ों काम लज्जा युक्त हो जाते हैं।

हाव भाव लावण्य सिंधु रस कहत नावे शेष सुरेश महेश निरंतर गुणगन गावे भगवान शंकर देवराज इंद्र ब्रह्मा जी और अनंत महिमाशाली भगवान शेष ये सब बड़े-बड़े हमारे प्रभु की प्रभुता का गान करते रहते हैं पर पार नहीं पाते। वही हमारे प्रियाल का जो हाव भाव लावण्य प्रेम रस ये वाणी की सामर्थ्य नहीं कि इसका गान किया जा सके। ऐसे प्रभु की सात भोग त पांच आरती करत अलीगन सात बार भोग लगता है हमारे प्रियाल का और पांच बार आरती होती है। प्रेम पुंज अनुराग भाग झलके तिनके तन कौन-कौन से सात भोग होते हैं?

प्रियाल का मंगला भोग फिर श्रृंगार भोग फिर राज भोग उत्थापन भोग फिर संध्या भोग और फिर शयन भोग और फिर एक निशीत भोग जो रात्रि के 12 बजे का सात भोग लगते हैं। मंगल आरती, श्रृंगार आरती, राजभोग आरती और संध्या आरती और शयन आरती ये पांच आरती होती है और दो धूप आरती होती है। दो धूप आरती होती है। श्रृंगार के समय पहले और उत्थापन के समय धूप के द्वारा ही आरती की जाती है। तो आरती पांच भोग सात सात भोग त पांच आरती करत अलीगन प्रेम पुंज अनुराग भाग झलके तिनके तन मानो प्रेम के समूह है ऐसी सहचरिया प्रेम वपू धारण किए हुए प्रियाल को सात बार भोग लगाती पांच बार आरती करती है और उनके तन की शोभा प्रेम प्रदान करने वाली सहचरियों के तन की शोभा प्रेम प्रदान करने वाली लीला विविध विहार नित्यनय नैतिक झलके अंतरंग बहिरंग दगन जो खोलह पलक प्रियाल की नित्य नैमितिक लीलाएं परिचर्या और रसमय वन विहार रसमय सैया विहार जल विहार बहुत प्रकार की लीलाएं सखियां अपलक नेत्रों से इस रस का पान करती हैं।

परमधाम यह नित्य वस्तु यहां दुर्लभ जानो बभागी सुकृति जन संत वेग पहचानो ये परमधाम वृंदावन है यह नित्य प्रेम प्रिया प्रीतम का अत्यंत दुर्लभ वस्तु है बभागी सुकृति जन वही है जिसको संत संग मिल गया अब दुर्लभ नहीं रहेगा प्रेम पर महा संग तो दुर्लभ हो अगम्यों अमोघस तीन बातें देवर्षि नारद जी ने महापुरुषों का संग बड़ा दुर्लभ है अगर मिल जाए तो निर्वाह करना कठिन है क्योंकि अहम और मनमानी आचरण ये हमको उनकी आज्ञा में टिकने नहीं देते अगर निर्वाह कर ले जाए उनकी आज्ञा का अमोघस दुर्लभ प्रेम वस्तु प्राप्त हो जाए परमधाम यह नित्य वस्तु अति दुर्लभ जानो बभागी सुकृति जन वही बभागी वही तपस्वी वही पुण्य आत्मा संत वेग पहचानो जिसको संतों ने पहचान में ले लिया ये मेरा जन है आओ आओ बहुत दिनों के बाद दर्शन हुआ अपना जन कहकर जिसे संतों ने पहचान बना ली तो प्रिया प्रीतम से पहचान हो गई छर साधक की देह लखे अक्षर ओंकारा ताऊ ऊपर ये धाम अक्षरातीत बिहारा ऐसा कोई ना समझे कि वृंदावन के रसिक जन सिद्धांत को ब्रह्म ज्ञान को नहीं जानते

पक्का समझिए इसके रास्ते में ब्रह्म बोध हो जाता है बोले क्षर जितना है देह से लेकर जहां तक दृष्टि जा रही है सब क्षर माने विनाशी बोले अक्षर जो है ओम प्रणव है अक्षर अविनाशी उस अक्षर अविनाशी के ऊपर अक्षरातीत नित्य विहार रस है छर साधक की देह लखे अक्षर ओंकारा ता ऊपर यह धाम अक्षरातीत बिहारा ये अक्षर ओम से भी ऊंचे है अक्षरातीत नित्य विहार प्रिया प्रीतम का यह जो मोक्ष पद भी आत्म स्वरूप के तेज में लीन हो जाते हैं जन और कोई नहीं। हमारे प्रियाजु के श्री चरणों की नख कांत है।

उस तेज को वेध कर चरणों तक पहुंचाना केवल सहचरियों के द्वारा प्राप्त मंत्र से होता है और नहीं वही तेज में मुक्त हो जाते हैं। ध्रुवदास जी कह रहे हैं ब्रह्म तेज को ज्योति जहां योगेश्वर धरे ध्यान ताही को आवरण तहां नहीं पावे को जान आ उ मा ओम ये प्रियाजू के नपुरू की झनकार से निकलता है इसी से ब्रह्मा विष्णु महेश ये प्रणोद इन तीनों का जनक है | इसी से सब पूरी सृष्टि प्रकट हुई है याते अगम अपार रसिक अनुभव में देख जीवन मुक्त स्वरूप प्राण पति हित लेख है रसिक जन अक्षरातीत स्थिति में प्रणवों के भी ऊपर अक्षरातीत प्रेम रस धाम बोले वो जीवन मुक्त महापुरुष अपने प्राण पति के रूप में युगल सरकार का अनुभव करते हैं।

अक्षर मध्य आकार आ ये विष्णु है प्रगट दिखायो ये भगवान विष्णु का स्वरूप जो है वह आ से प्रकट हुआ प्रथम उपासना करे तते और न पायो सबसे पहले उपासना इनहीं की प्रारंभ होती है। जो प्रगट जगत में पालन करने वाले भगवान विष्णु नारायण हरि के नाम से संबोधन किए गए। शिव विधि सुख सनकाद आदि ऋषि नारद जानो आचारज भय प्रगट दियो त्रिभुवन पहचानो भगवान शंकर इसी प्रणों से सुनका आदि आदि जितने भी ऋषि है भगवत स्वरूप है इन्होंने यही अनुभव किया है प्रथम एक ओमकार अकार तहा निज सेव कोई समझता हो ये प्रेमी जन वृंदावन के क्या जाने ओमकार अकाल पुरुष को नहीं सत्य में जब चित्त जुड़ता है तो पूरा का पूरा अनुभव होता है हर वेदांत का सूत्र अनुभव होता है भले वो ना बोल पावे लेकिन उनको अनुभव होता है।

यह मार्ग ही यही है। प्रथम एक ओमकार जो परम तत्व त्रिभुवन को प्रकाशित करने वाला प्रणव जिससे निराकार स्थिति प्राप्त की जाती है। प्रेमी जन उसको क्रॉस करके आगे बढ़ते हैं। नित्य विहार रस उसके ऊपर द्विदल कमल रसिकंचित भव दो कमल विराजमान है। एक नीलकमल और एक कंचन कमल प्रियाल इन्हीं से अवतार जितने अवतार होते हैं इनके मूल श्री लाल जो महाराज इनहीं के अंश से सब प्रकट होते हैं। जो यह विधि सो करे चिंतवन मन तन माही जीवन मुक्त स्वरूप प्रेम परसे परछाही देखो श्री जी की कृपा से अपने को प्रणवों का भी चिंतन करने का अवसर मिला।

वेदांत का भी चिंतन का तब बाद में जो राधा राधा चिल्ला रहे हैं ना ये कोई हम कई बार कह चुके हैं कि केवल कोई अंधविश्वास या कोरी भावना से नहीं करते। ये तत्व की बात कह रहे हैं। ये परम परा विद्या है राधा नाम। पीछे आज के ही दिन एक संगीत बजाने आए थे। इसमें मंगला में प्रातः कालीन में तो आज उनको आना था उनमें से एक पधार गए कहा गए नरक नहीं जाएंगे महाराज जी क्यों उसको तो कोई भजन से मतलब नहीं वो तो पैसा ले आया था लेकिन कहां आया था वृंदावन बार-बार मुख करके बजा रहा था हमारी तरफ सुनाई क्या दे रहा था पीछे चलता रहता है राधा राधा आगे गूंज ता रहता है राधा राधा राधा काफी है कल्याण के लिए काफी है पैसा कोई कीमत नहीं एक राधा नाम की कीमत में पूरा त्रिभुवन नहीं है तो कुछ चंद रुपए क्या होते हैं हो गया काम इसीलिए कहते हैं भाई भगवान न जाने कौन से गुण पर दयानिधि ऋ जाते हैं हवा चली हवा जिसके लगेगी जीवन मुक्त हो जाएगा पक्का समझ लो हवा चली बस इसमें नकारात्मक सोच ना आ जाए, दोष दर्शन की भावना ना आ जाए।

तो इतनी हवा लग जाने पर ही ये जीवन मुक्त अवस्था को प्रदान ये वृंदावन है। ये राधा नाम है। ये राधा दासों का उत्सव है। भाव उत्सव है। परम मंगल। कैसे भगवान कृपा करते जब सुना तो लगता भगवान कैसे कृपा एक हफ्ते में काम तो बोले यह विधि सो जो करे चिंतवन मन तन माही जीवन मुक्त स्वरूप प्रेम पर से परछाही देश काल गृह बन तीर्थ को नहीं बिचारा जाति पाति कुल कर्म धर्म बंधन ना आचारा हमारे प्रिया जी के प्रेम रस उपासना में बस प्रेमी रसिक महापुरुषों को तन मन समर्पित कर दो तन उनकी आज्ञा से कर्म करे मन उनकी आज्ञा से संकल्प विकल्प का त्याग करके उनकी आज्ञा से चले तो वो जीवन मुक्त हो जाएगा बोले इस किस देश के हो तुम इससे मतलब नहीं किस समय तुम्हारा जन्म हुआ कहां जन्म हुआ किस योन में मतलब किस किस कुल में किस इससे हमारा कोई मतलब नहीं।

देखो यहां कभी नहीं पूछा जाता तुम्हारा नाम क्या है? तुम कहां से? आज तक हम नहीं जानते। सही बात अगर हमसे पूछा जाए तो लोग हमको झूठा मानेंगे। सच्ची कहते हैं इन बच्चों में से सब संत जो विराजमान है एक दो के तो जानते हैं। जो पहले हित धाम में शुरुआत में बताया। बका किसी से अपनी तरफ से हम ये नहीं जानते ये कहां के हैं और ये किस कुल में जन्मे हैं ये हम नहीं जानते। हमारे पास रहते हुए 10 10 आठआ वर्ष हो गए। हम ये नहीं जानते क्योंकि हम सिर्फ भगवत भाव से आप हमारी श्री जी के बस कहां से हो कौन हो?

क्या नाम है? क्या ये हमें कोई मतलब किस कुल के हो हमें कोई मतलब नहीं। हमारी प्रियाजु की शरणागति में किस देश के हो? किस समय जन्म हुआ? किस कुल में जन्म हुआ? तुम तीर्थ किए हो कि नहीं किए? कोई कर्म धर्म किए हो कि नहीं किए? कोई मतलब नहीं। बस जो हो जैसे हो श्री जी की शरण में हुए परम मंगल हो गया जाति पात कुल कर्म धर्म संस्कृत हेतु अविद्या नाशी कोई ये जाति किसकी पात किसकी कुल किसका कपड़े का नहीं आपकी जाति हम तो परमेश्वर जाति के हैं परमेश्वर है हमारी जाति पर ब्रह्म परमात्मा तत्व का अंश हूं तो किसका हूं वो कह रहे ममवा श्री कृष्ण चंद्र जो उन्हीं का तो हूं मैं परमेश्वर का अंश हूं नहीं ये जाति किसकी है कपड़े की शरीर की इसलिए इसकी मान्यता नहीं हमारे यहां वृंदावन नित्य विहार रस में जाति पात कुल कर्म धर्म वत संस्कृति हेतु अविद्या नासी ये अविद्या है जाति पात कुल कर्म धर्म ये सब अविद्या कृत है यही तो समझना है इसीलिए तो वेदाती उपासना है वेदान सन केवलम अव छिन्न अनुरागम लभते जो वेद का भी पूर्ण त्याग कर देता है अखंड प्रेम को प्राप्त होता है।

बोले जाति पात कुल कर्म धर्म बंधन ना आचारा यहां इसका कोई महत्व नहीं है। तुम कैसे आचार वाले हो? किस कुल वाले हो? क्या एक प्रेम रस मत करे सद्गुरु की सेवा तब पावे ये रस रीति सुख संपत्ति मेवा। इसमें एक ही बात केवल है कि अपने सद्गुरु का अनन्य होकर उनकी आज्ञा में चले। उनकी सेवा में रहे। एक प्रेम रस मत करे सद्गुरु की सेवा। जो सद्गुरु की सेवा में प्रेम रस मत हो जाएगा। यही समझ में नहीं आता कि शास्त्र कह रहा है यहां है खजाना। वो भटक रहा है। खजाने को ठुकरा के भटक रहा है।

यही घर के अंदर तिजोरी है। और माल ढूंढ रहा है बाहर दरवाजे के कहीं नहीं मिलना भटक लो कितने तीर्थ क्या-क्या तुम्हें जो करना है कर लो जब तुम्हें परमानंद की अनुभूति होगी तो यहां होगी अंतर्मुख होने पर सर्वात्म बहिर इंद्रियाण अंतर्मुख हो जा इंद्रियों को बहिर्मुख मत कर तब पावे यह रीति प्रीति सुख संपत्ति मेवा ये जो परमानंदमय प्रेममय प्रियाल का सुख है यह तभी पाएगा जब सद्गुरु गुरु की आज्ञा उनकी सेवा में रहेगा। मनन मानसिक करे रेन दिन प्रेम अभंगा ऐसे उपासक का मन प्रियाल की मानसिक सेवा में प्रवेश पा जाता है अभंग प्रेम नित एक धर्मन संग तो रंग बढ़त नित नित सरस तो नित नित प्रेम अभंग यह जो कृपा हरिवंश की अभंग प्रेम की स्थिति मन में वो मानसिक सेवा में रत रहता है क्या स्थिति होती है रोम रोम अनुराग रंग रस रसिकन संगा प्रिया जी कृपा करती अपने रसिकों का संग देती रोम रोम अनुराग रंग से भरा उन रसिकों के संग से हृदय आनंद रंग मेंगांगा जब लगी यह तन रहे तब ही लगी भाव प्रकाश त्रिभुवन मंगल रूप त्रिगुण परसत नहीं आसे जब तक शरीर रहता है तो बाह बाहरी उसकी क्रियाएं होती रहती है लेकिन वह अपने भाव दे से स्वामिनी के संग होता है।

ये कोई बाहरी नहीं जान पाता और तन छूटे लह भाव रूप निज सेवे दंपति नित्य धाम निज नाम सहज पावे सुख संपत्ति यदि शरीर रहते तुम्हें सहचरी भाव नहीं प्राप्त हो पाया और प्रियाजु की शरण में रहे तो शरीर छूटने के बाद निश्चित सहचरी देह की प्राप्ति हो जाएगी तन छूटे लह भाव दो प्रकार के यहां उपासक बताए एक शरीर रहते सहचरी भाव प्राप्त करके के शरीर की क्रियाएं बिल्कुल ठीक व्यवहारिक वैसे ही हो रही है जैसे एक सम्यक विवेकवान साधक करता है और आंतरिक अपने भाव देश से प्रिया प्रीतम के समीप रहता है।

यदि ऐसी स्थिति नहीं आ पाई जीवन में वो सहचरी भाव को नहीं प्राप्त हो पाया तो तन छूटे लह भाव रूप निज सेवे दंपति ये पक्का है। आचार्य शरण में है, गुरु शरण में है तो शरीर छूटने के बाद सीधे उसे सहचरी देह की प्राप्ति होगी और प्रिया प्रीतम के समीप पहुंच जाएगा। नित्य धाम निज नाम सहज पावे सुख संपत्ति नित्य धाम वृंदावन में सहज सुख प्रिया प्रीतम की सेवा सुख को वो प्राप्त कर लेता है ये परम तत्व सिद्धांत निगमागम को सार श्री रूप लाल हित गुरु कृपा ते लख लिख्यो सुविचार श्री गुरुदेव की कृपा से रूपलाल गोस्वामी जी कहते हैं मैंने जो नित्य बिहार वृंदावन के सहचरी भाव का सिद्धांत अनुभव किया वही तुम्हें लिख के बता रहा हूं।

जा ही अनुभव होई सोइ रस को पावे भूले गति मति देह नेह जग के बिरावे जिसके हृदय में सहचरी भाव का जागरण होता है वो सदैव इस रस में स्थित रहता है उसको ना शरीर की चिंता रहती है ना वास की चिंता रहती है ना परिवार की चिंता रहती है गृहस्थ हो या विरक्त हो एक कल मस्ती छा जाती दी और स्वयं भगवान उसके भरण पोषण की सब जिम्मेवारी योगक्षम भाम्यम देखो यह चिंता नहीं होनी चाहिए कि आज हम यहां हैं हमारा भरण पोषण हो रहा है कल क्या होगा अगर कल की तुम्हें चिंता है तो तुम शरणागत नहीं हो शरणागत कल की चिंता नहीं करता जिसने आज दिया है अरे जब दांत न थे तब दूध दियो अब दांत दियो ताको अन्न भी दे है जल में थल में नभ में पशु पक्षिन को दे तो तो भी दे हैं काहे को मूढ़ विचार करत मतलब व्यर्थ की चिंता कर रहे हो देखो कितना बड़ा कृपालु भगवान मैया के शरीर में एक बूंद दूध नहीं होता जब बालक का जन्म होता है तो भगवान उसके रक्त को दूध में बदल देते हैं और उतना ही गम उतना ही मीठा और उतना ही पावर युक्त जितना बच्चा सह जाए कैसे कृपालु भगवान

जब दांत नहीं थे तो मां के शरीर से रक्त को दूध में परिवर्तित करके भरण अब काहे को चिंता करता है गर्भ में कौन व्यवस्था कर रहा था वही तो भरण पोषण कर रहे थे प्रभु लोग समझ नहीं रहे वैष्णव होकर भगवत दास होकर कल की चिंता करते हो तुम्हें कभी ऐसा नहीं लगता कि स्वामिनी के चरणों का भरोसा ही नहीं आया है हरे नर्क स्वर्ग अपवर्ग आस नहीं त्रास है जा राो ता रहो मान सुखरास यह जीवन प्रिया जी को दिया है नाम रूप का निरंतर चिंतन करते हुए प्रियाल जहां जैसे रखे शरणागति का बहुत बड़ा बल होता है अभी शरणागति नहीं इसीलिए बहुत सी त्रुटियां हृदय में अपना स्थान बनाए रहती है जा ही अनुभव होई सोइया रस को पावे भूले गति मति देह नेह जग के बसरावे सांसारिक संबंध फीके लगने लगते हैं ये मृत शरीर दिखाई देने लगता है मरा हुआ है बस जब तक ये चल रहा है चल रहा नहीं पहले वो मरा हुआ अनुभव में आ जाता है रसिक उपासक संग करे छिन छिन रुचि बाढ़ है ये बहुत कठिन रसिकों का संग अगर रसिक संग में छिन छिन रुचि बढ़े तो यह दशा आ जाएगी।

सुनत नाम गुण रूप पुलक गदगद तन का है। नाम सुनते ही रूप सुनते ही लीला चरित्र सुनते ही रोमांच होने लगे। मेरे प्रियाल की बात हो रही। ये रसिकों के संग से प्राप्त होता है प्रेम। रे मन रसिकन संग बिन रंच उपजे प्रेम। इस संसार में मोह रात्रि अज्ञान की ऐसी फली फैली हुई कि सब सो रहे हैं। सब स्वप्न देख रहे हैं। मेरी पत्नी मेरा पुत्र मैंने ये भोगा मैं भोग लूंगा। ये मैंने जमा कर लिया। ये जमा कर लूंगा। ये कर लिया वो कर लूंगा। ये स्वप्न चल रहा है निशा तिमिर अज्ञान मध्य कोई एक जागे अरबों खरबों सब मनुष्य शरीर है सब सो रहे हैं मोह निशा सब सोव निहारा देख स्वप्न अनेक प्रकारा ये अनेक प्रकार का स्वप्न देख कोई बिरला एक जगता है क्या जगता है यह जन्म अब भगवत प्राप्ति के लिए अब मनमानी आचरण नहीं करूंगा अब शास्त्र और गुरु की आज्ञा के अनुसार चलूंगा तो विरह उपास विशास प्राण पति सो अनुराग उसके अंदर विरह उपासना का फल क्या है विरहाग जग जाना प्रियाजू के मिलन की प्रियालाल के मिलन की प्राणपति श्री जुगल सरकार के मिलन की विरहाग जल जाना कैसे मिलेंगे?

कैसे उनको देख पाऊं? वो देख पावे या ना देख पावे हर समय विकल रहता है। कैसे देखूं? कब मिली है प्रिय प्राणनाथ मन मोहन प्यारो ये वेदना देखो ना। हृदय में क्या तुम्हारे चल रहा है। ये वेदना चलती है। कब मिली है प्रिय प्राणनाथ मनमोहन प्यारो। ललित त्रिभंगी रंगी प्यारो गुणगन गारो कब मुझे लाल जो मिलेंगे जो ललित त्रिभंगी समस्त गुणों के समुद्र है बड़े प्यारे हैं अद्भुत लावण्य है कब मिलेंगे हमारी प्यारी जो कब मिलेंगे ये कभी अंदर की बात अंदर चले तो छिन छिन जुगल किशोर रूप अनुभव अवगाहे चाह विरह उपजाए कामना मन की दाह सारी कामनाएं भस्म हो गई रसिकों के संग से एक ही चाह रह गई कैसे युगल सरकार मिले कैसे प्रिया प्रीतम मिले तो अनुभव में जो रूप बतायो श्री गुरु अपनो करे चिंतवन ताको जग को जाने सपनो बिल्कुल सत्य मान लीजिए स्वपनिक जगत जगत केवल हमारे समय को नष्ट कर रहा है।

यदि हम गुरु प्रदत्त नाम और रूप मंत्र का चिंतन नहीं कर रहे तो हमारा समय व्यर्थ जा रहा है। पक्का पछताओगे हाथ कुछ नहीं लगेगा। जब गुरु प्रदत्त नाम मंत्र जपा जाता है तो गुरु प्रदत्त इष्ट का रूप झलकता है तो तत सुख सेवा रीति। तब विधि सो कीजे उसके हृदय में तत सुख भाव जागता है। तत सुख भाव जागे बिना जीवन का लाभ नहीं है। ये मत सुख में स्वस सुख में तो पूरा विश्व भ्रमण कर रहा है। वो तीर्थ भी जा रहा है तो सुस सुख वासना से सत्संग भी आया तो सुख सुसुख वासना मुझे सुख मिले।

तत सुख प्रियाल को कैसे सुख दे कौन सी बात करूं कौन सा कर्म करूं कौन सी चेष्टा करूं कौन सा भाव करूं जिससे मेरे युगल सरकार मुस्कुरा दे बात तत सुख सेवा रीति तबई विदि कीजे बढ़त रहे अभिलाश नीर नैनन भर लीजे बड़ी कृपा होती है जब कोई सेवा की सौज नहीं हैं और सेवा का भाव बढ़ता है तब आंसू से सेवा होती है। जैसे मधुकरी भी नहीं मिली नहीं मिलती थी। जैसे दीपावली और त्यौहार होली को तो कभी भोजन मिलता ही नहीं था। पक्की बात दीपावली है। दोपहर को जाते थे मांगने एक दो बजे के भी ना है बाबा त्यौहार है नहीं सबकी दीपावली जल रही होती थी।

हमारी कुटिया अंधेरे में होती थी। सब हर्षोल्लास मनाते होते हम भूख सहते हुए नाम जप करते थे। दीपक जलाने के लिए व्यवस्था यही बलराम कुछ मीठा कभी ले आवे तो ले। तो जब सब हर्षोल्लास में होते तब अपनी श्री जी के पास बैठ के मिश्री का टुकड़ा ऐसे रख के और एक जल रख के भावना करते छप्पन भोगों में जो जो याद आता हो भाव फिर रोना आता प्रिया मुझे किंचन गरीब के पास केवल आप ही धन हो यह वस्तुएं तो है नहीं कि हम आपको दुलार कर सके बस भाव ही हमारा है यह रोना तब आता है जब कोई अपना नहीं होता कुछ अपना नहीं बिल्कुल प्रियाल के सिवा कुछ नहीं तब ये शयन में जो सुख मिलता था प्रियाल को कराने में बिहारी जी के सामने डलिया लगती है

दर्शन करके शयन के समय ऐसे जब तो कोई दो फूल गुलाब के कोई चार राय बेल के ऐसे डाल देते कोई कोई एक कमल का डाल देते वो ले आते और उनकी सैया बनाते ऐसे और जब भावना करते कि प्रियाल सेनकर कर रहे हम चरण चाप रहे तो आपको कैसे बताएं चिल्ला चिल्ला के रोने का मन होता आनंद समुद्र है हमारे प्रभु वो केवल भावत्सवेन भजता भाव का भूखा हूं मैं और भाव ही एक सार है भाव से मुझको भजे तो भाव से बेड़ा पार है भाव बिन सुनी पुकारे मैं कभी सुनता नहीं भाव पूरित टेरर ही करती मुझे लाचार है वो भाव तत सुख सेवा रीति तबह विदि कीजे बड़त रहे अभिलाश नीर नैनन भर लीज कभी हमने अपनी प्रियाल की पोशाक नहीं पहना पाए कभी ऐसे ही विराजमान ऐसे ही रज के पात्र में जो माधुकरी मिली दिखा दिया उस समय जो भाव आता रुदन का कि अपने प्रभु को मैं कुछ भोग नहीं लगा सकता अपने प्रभु का कोई श्रृंगार नहीं कर सकता हर चीज पैसे से इत्र है, चंदन है, सब पैसे और पैसा विषय पुरुषों के संग से और विषय पुरुषों को रिझाने की कला अलग होती है।

अपने पास वो नहीं है। अपने पास तो प्रियाल के रिझाने की कला है तो फिर वो ठसक बनी रहती है। उसमें चाटुकारिता नहीं होती विषय पुरुषों की। कब देखो इन नैन प्राण पति प्यारी संगा लगी रहे चित चाह प्रेम पुलकित अंग अंगा ये हृदय में स्थिति प्राप्त होती है कब देखो इन नैन प्राणपति प्यारी संगा प्यारी के साथ प्यारी के प्राण पति श्री लाल कब प्रिया लाल को देखो उस हृदय कि क्या महान स्थिति होगी जिसकी सब चाह मिट गई एक चाह रह गई कब मैं भरकर नेत्र अपने प्रियाल को देखो नेत्र भरकर कब देखूं लगी रहे चित चाह प्रेम पुलकित अंगा पुलकित अंगों से हर समय एक ही चाह अपने प्रभु को देखो स्व प्रकाश उसी समय बस चाह की जरूरत है ये हमने बड़े महापुरुषों से पूछा कि भगवत प्राप्ति कब होती है तो उन्होंने कहा जब प्रबल चाह जागृत हो जाती है रुद सुशम राजन कृष्ण दर्शन लालसा लाडली कुंज में गुरुदेव भगवान जब विराजमान तो उस समय एकांत में पूछा तो महाराज जी श्री जी कब दर्शन देती है तो कहा जब श्री जी के सिवा और कोई चाह ना रह जाए और वो चाह भी सही ना जाए कि अब रहा नहीं जा रहा अगर श्री जी ना मिली तो प्राण प्राण निकल जाएंगे।

बोले उसी समय श्री जी मिल जाएंगे। उसी समय चाह जे कब देखो नैन प्राणपति प्यारी संगा और ऐसी विराग जली तो बोले स्व प्रकाश श्री वृंदावन निज धाम विराजे सर्वोपरि सब मध्य प्रकट प्रकट हो गए युगल सरकार कहां बोले स्व प्रकाश इसी आत्म स्वरूप ने वृंदावन का रूप धारण कर लिया और इसी के मध्य में कुंज निकुंजों में खेलते हुए युगल सरकार यही दर्शन दे दिए। यह है उपासना स्व प्रकाश जो स्वरूप उसी से प्रकाश प्रकट हुआ। वही वृंदावन बन गया और उसी वृंदावन नवनि निकुंज में प्रियाल यही हृदय में पूर्ण प्रेम पूर्ण ऐश्वर्य यह सब तहा प्रकाश है यही पूर्ण प्रेम यही पूर्ण वैभव हृदय में प्रकाशित हो गया यह अवतारी सबको या निश्चल विविध विलास समस्त अवतारों के अवतारी श्री राधा वल्लभ लाल हृदय निकुंज में प्रकाश ित हो गए रूपशील गुणव समान सहचरी सेवे जैसे प्रियाजु की रूप कांत वैसे ही प्रतिबिंब स्वरूप सहचरी रूप वैसे ही गुण वैसे ही अवस्था वैसे ही समान श्रींग माधुरी सहचरी होकर के अलक लड़ी लड़कान जान हित सो हित भव वो प्रियाल के रहस्य को जानकर उनको सुख पहुंचाती है।

इसलिए बहुत कृपा से हमें श्री धाम वृंदावन श्री प्रिया प्रीतम की उपासना मिली है। तो चाहे जैसी स्थिति हो चाहे जैसी परिस्थिति हो बस एक प्रार्थना है नाम ना छोड़ना नहीं तो हार जाओगे। नाम अगर पकड़े रहे राधा राधा राधा ये कलयुग में राधा नाम करुणा समुद्रम में है। आप ये समझ लो ये आगम निगम पुराणों में अगोचर है। ये वृंदावन की भूमि से प्रकाशित है। ये परा विद्या है। बड़े भाग्यशाली होंगे जो इस राधा नाम का आश्रय ले लेंगे। शरीरम श्री वृंदावन भू सदा स्थाप मन अगर शरीर वृंदावन में नहीं रख सकते तो वृंदावन की रज तो शरीर में लगा सकते हो देख लो अगर हमारी प्रार्थना आपके कान तक पहुंच रही हो आप स्वीकार कर ले गिरिराज जी की परिक्रमा की रज वृंदावन की कहीं भी रज लेकर उसको चाल के एक पात्र में रख लो जैसे पाउडर लगाते हो थोड़ी ऐसे रज लिया पूरे शरीर में स्नान के बाद लगा लिया।

देख लेना शरीर में रज लगी है तो तुम्हें वृंदावन धाम निश्चय प्राप्त होगा। निश्चय निश्चित हमारे वचन मान लो तुम्हें वृंदावन की प्राप्ति होगी। शरीर छूटने पर तुम नित्य धाम वृंदावन जाओगे। कभी नारकी गतियों को प्राप्त नहीं होगी। और अगर शरीर वृंदावन वास कर रहा है तो तो बहुत ही मंगल बात है। बस सावधानी रखें। रहनी से रहे। क्योंकि आगे कह रहे शरीरम श्री वृंदावन भू सदा स्थाप मन मन भी वृंदावन में स्थापित करो। तन तो स्थापित किया भी। एक हमसे प्रश्न किए कि मैं वृंदावन जब आता हूं, वृंदावन दो चार 10 दिन रहता हूं तो मेरे मन में दोष दर्शन होने लगता है।

बाहर रहता हूं तो रोना आता है वृंदावन के लिए। अब मैं करूं तो क्या करूं? तुम कहा बाहर रहो यहां मत रहो आओ एक दिन दर्शन करो भाग जाओ यहां से क्योंकि तुम्हारे अंदर अभी क्षमता नहीं भाव बिगड़ जाता है तो यहां रहकर भाव बिगाड़ोगे तो सब बिगड़ जाएगा बाहर रहकर अगर वृंदावन का चिंतन करके आंसू बहते हैं तो धन्य भाग है श्री वृंदावन को चिंतवन यह दीप उबारी कोटि जन्म के अगतमह काट करे उजिया तैयार कभी-कभी आ गए दर्शन कर गए सत्संग सुन गए और रोज मोबाइल से सत्संग सुना नाम जप किया और वृंदावन का चिंतन करके अगर रोना आ जाए फिर क्या कहना है यह उत्तम है वृंदावन में रहकर तुम दोष दर्शन करो एक दूसरे के प्रति निंदा अपराध करो तो मुझे लगता है यहां भाव घटे इससे अच्छा है तुम दूर रहकर अपने भाव बढ़ाओ स्थाप मनः वृंदावन में ही मन स्थापित करो अब वृंदावन में दोष दर्शन करोगे, अपराध करोगे, वैष्णव द्रोह करोगे, ठीक बात नहीं है।

वो कह रहा था मेरा भाव बाहर से बहुत बढ़िया बनता है। भाव भजता अगर भाव बढ़िया बनता है तो भाव बनाओ। जब भाव ठीक हो जाएगा तो धाम आओगे तो यहां कुछ दोष दर्शन नहीं। ये सब भगवत लाडले हैं यहां। ब्रज में ये सब प्रियालाल के लाडले हैं। जो ज्यादा दुलारे होते हैं तो थोड़ा तो वो बात तुम देखो कि लाडली जी के दुलारे हैं। ये लाडले हैं। हमारा अधिकार इन पर दोष दर्शन करने का नहीं। सदा पारसे वृंदावन रसिकयो नस भजने वचत केली नाम नवरत गाने रमत कथा पिय साद श्रवण युगलम प्रीति विकलम यदि तुम श्रीमद् चतुराशी जी 42 लीला श्रीमद् राधा सुदानिधि इनका गान करो बहुत महिमा है जिसमें प्रियाजू का यश गान तो लाल जूस सुनकर के अपने आप को न्योछावर कर देते हैं।

यदि लीला गायन में तुम्हारी रुचि हो जाए, नाम जपने में तुम्हारी रुचि हो जाए और लीला सत्संग सुनने में तुम्हारी रुचि हो जाए तो श्रीपाद कह रहे अब तुम निश्चिंत हो जाओ प्रीति विकलम के लिए अब प्रियालाल का प्रेम तुम्हें प्राप्त होगा। प्रियाल की निश्चित प्राप्ति हो जाएगी। श्री भगवत रसिक जी महाराज कृपा करके कह रहे हैं कि जीभ जुगल नाम ही जपे द्रग बिलोक रूप उदर भरे अवत सो छण स्ान मृग भूप बोले निश्चित उस विरक्त महा भागवत को भगवत प्राप्ति हो जाती है जो ऐसी रहने से रहता है कैसे बोले जीव से युगल नाम जप कर रहा है और नेत्रों से जिधर दृष्टि जाती सब में भगवत भाव कर रहा है और पेट भरता है अलिवत्त छाड़ स्ान मृग भूप कुत्ते की और सिंह की वृत्ति का त्याग करके अलिवत्त अली कहते मधुकर मधुकर भौरा उदर भरे अलिवत्त सो छाड़ स्ान मृग भूप स्वान वृत्ति से पेट भरना क्या है?

धनियों के पीछे डोलना, चाटुकारिता करना, उनके द्वारा दिए गए धन की विलासिता भोगना। एक कुत्ते की वृत्ति से जीवन यापन करना है। और सिंह वृत्ति क्या है? अपनी तपस्या अपना उसका दिखा के और फिर नहीं अलवत्त से कहा है उधर भरे अलिवत्त सो अलिवत्त कहते हैं मधुकर वृत्त चार घरों में टुकड़े मांग लिए उससे पेट भरा और या आकाश वृत्त परमहंसों ने सदैव आकाश वृत्ति स्वीकार की साधकों ने सदैव मधुकरी वृत्ति कहा लेकिन जो आगे आगे बढ़े हुए परमहंस उसको भी छोड़ दिया। आकाश वृत्त जो स्वयं भगवान भेजें बिना चाहे बिना मांगे जो सामने आ गया उसी से उदर पोषण करना आकाश वृत्ति है और अपनी तपस्या और अपने त्याग को दिखावा करके फिर जो भोगा गया वो मानो सिंह वृत्त है और धनियों के पीछे चाटुकारिता करके फिर जो धन प्राप्त करके भोगा गया उधर पोषण किया गया वो कुत्ते की वृत्ति कह गई तो स्वान और सिंह की वृत्ति का त्याग कर अल वृत्ति मधुकर वृत्ति या आकाश वृत्त से जो अपना जीवन यापन करते हुए सदैव प्रिया लाल का नाम जप करता है और सब में भगवत भाव करता है वो निश्चित भगवत प्राप्त हो जाता है।

उपासक को चाहिए जो वैष्णव दीक्षा ले चुका है कि ब्याह कनागत कारटो राजदान गृह दान भगवत जन इनको गए तो होए भजन की हानि ब्यास आदियों में भोजन नहीं पाना चाहिए तो आप कहेंगे तो व्यवहार ही नहीं चल पाएगा फिर हमारे व्यवहार में कौन आएगा कोशिश करो जहां तक हो सके कौन तुम्हें वहां वीडियो में बना खड़ा है कि तुमने पाया कि नहीं पाया। सब अपवित्रता का राज्य होता है। अगर आप वैष्णव हो तो भगवत समर्पित भोजन पाओगे। एक वो सिस्टम होता है जिसमें ऐसे भर के सब रख दिए और सब ले ले के पा रहे।

इसमें क्या पवित्रता है? आप मतलब ऐसा तो है कि एक बार लेकर के फिर आप ले सकते हैं। कोई भी ले सकता है। देने वाला कोई नहीं। अपने आप से उठाओ और खाओ। वाह। तो सब अपवित्र हो गया कि नहीं हो गया? उसी झूठे हाथ से आप लिए उसी झूठे हाथ से वो लिए उसे कहां वैष्णव सिद्धांत रह गया? पहले गांव में तो ऐसे पवाया जाता था। सबके पैर धुले जाते थे। पट्टी बिछाई जाती थी। बैठाला गया सुंदर पत्ते के वो पत्तल धोने और फिर रज के कुल्हण आदि पात्रों बढ़िया और परोस करके फिर जय जयकार हो।

गांव में भी जय जयकारा लगता था और फिर ऐसे और जो पूज्य जन होते थे उनको भेंट देकर पैर छुआ ऐसे सम्मान अब ये जूता पहने और सब अपवित्र भोजन तो इसीलिए मना कर रहे हैं ब्याह का भोजन नहीं लेना चाहिए विरक्त को तो बिल्कुल नहीं लेना चाहिए गृहस्ती में अपना देख लो काम चला लो उस दिन पेट दर्द कर रहा है ऐसा कह दो नहीं अपना बोल दे कि भाई आज हमारा पेट खराब है उल्टी जैसा लग रहा है अगर इतना भी पाया तो उल्टी हो जाएगी अगर आप चाहो तो नींबू पानी ले सकते हैं। ऐसे काम चलाना चाहिए।

अपनी वैष्णवता पवित्र अब उनहीं में लोग मदिरा प्रिय उसी से ले रहे हैं। उसी से आप लोगे झूठा कैसे भजन बनेगा। और दूसरा कह रहे हैं कनागत पितरों का जो पक्ष आता है उसमें जो भिक्ष पितर श्राद्ध का ये निषेध किया गया। ये नहीं वैसे ब्रजवासी जन देते भी नहीं मना कर देते बाबा हमारे यहां श्राद्ध है और वैसे लेना भी नहीं चाहिए नहीं तो भजन का नाश होता है ब्याह का भोजन नहीं लेना चाहिए कनागत पितर श्राद्ध का भोजन नहीं लेना चाहिए और कारटो वो जो तेही जो शरीर छूटने के बाद वो भंडारा होता है वो वैष्णव जनों को नहीं पाना चाहिए।

अब अपने घर में है तो बात अलग है लेकिन निमंत्रण का नहीं पाना चाहिए और विरक्त को तो पाना ही नहीं चाहिए ब्याह का नहीं पाना चाहिए पितृ श्राद्ध का नहीं पाना चाहिए और कारटो कहते ही जो तेरा वहां शरीर पूरा होने के बाद वो नहीं पाना चाहिए और कह रहे हैं राजदान राजा का भोजन नहीं पाना चाहिए बड़े राज पदों पर विराजमान उनका प्रतिग्रह नहीं लेना चाहिए। और यहां प्राय हम प्रार्थना करते हैं अपने जनों से कि कभी ऐसा ना स्वीकार किया जाए। जो साधारण नौकरी करते हैं किसान है वह 100 50 दे दे तो ले ले उससे नमक दाल रोटी खाओगे तो भजन बढ़ेगा और जो ऊंची गड्डी के चक्कर में पड़ोगे तो फिर भाव बिगड़ जाएगा।

भजन नहीं होगा। राज अन्न निषेध किया गया है। राज अन्न राज प्रतिग्रह बहुत हानिकारक होता है। यहां तक कि राज दर्शन निषेध किया गया। जब महाप्रभु चैतन्य देव से कहा गया कि जगन्नाथ पुरी के परम महा भागवत राजा रुद्र प्रताप जी आपके दर्शन करना चाहते तो उन्होंने कहा हां यही करोगे ना हमारा सन्यास धर्म नष्ट करोगे। अब राज दर्शन हम करें। यहां तक कि वो राजश से छुप करके और गोपी गीत कंठस्थ करके जब महाप्रभु को दूर से सुनाया तो कहा कौन महा भागवत अमृत रस बरसा रहा है महाप्रभु ने आलिंगन किया राज दर्शन राज अन्न राज प्रतिग्रह ये इसलिए कि इससे बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है भजन में रुचि नहीं होती और आगे कह रहे ग्रह दान ग्रहों का दान हम एक हम गृहस्थ को देखा जब उनके लड़का बच्चा बीमार होते थे तो खीर हलवा और भेंट उसको गोद में लाते और ऐसे सामने उतारते कहते ले बाबा एक बार गुरु जी से पूछा कि भिक्षा में

जैसे अरे बोले ले मत लेना उसमें नहीं कभी ऐसा देखो लोग संत महात्माओं को क्या समझते हैं ऐसे पवाया जाता है जैसे अपने पुत्र को पवाओ तो किस भाव से पवाते हो बस पुत्र ने पा लिया यही सौभाग्य संत ने पा लिया सारे अमंगल नष्ट हो गए इसीलिए बहुत संभल के खानपान करना जैसे कोई बीमार है उतार के और ऐसे या ग्रह नक्षत्रों का दान बोले होए भजन की हानि पक्का ब्याह का श्राद्ध का पितृ पक्ष का एकादश श्राद्ध का तेवी का राजन का और ग्रहों का दान भगवत जन इनको गाय तो होए भजन के हान पक्का भजन नास जो ग्रह नक्षत्रों आदि नहीं दान पुण्य करते बहुत होश में घाट बाट चौपार चुरी देवल हाट मशान भगवत बस नस सराय में भजन भड़ाई निदान इतने जगह का भोजन नहीं लेना चाहिए ऐसी जगह बैठ के भजन नहीं करना चाहिए बोले घाट में जहां स्त्री पुरुष स्नान कर रहे हो वहां बैठकर भजन नहीं करना चाहिए भजन नहीं होगा उपद्रव करेगा नेत्र चंचल होंगे होंगे।

जहां स्त्री पुरुष की भीड़ लगी हो, लोग स्नान करते हो, ऐसे स्थानों पर उपासक को नहीं बैठना चाहिए। भजन के लिए जहां से लोग रास्ता बनाए हो, वहां नहीं बैठना चाहिए। घाट बाट और चौपार चौराहे पर नहीं और देवल मंदिर में बैठकर नहीं और हाट बाजार में बैठकर के नहीं और स्मशान में बैठकर नहीं भगवत रसिक सराय सराय आद में जहां बहुत लोग बैठकर संगोष्ठी करते हो वहां नहीं इससे भाव दूषित हो जाएगा तुम्हारा भजन नहीं बनेगा घाट बाट चौपाल चुरदेव केवल हट मशान नदी के किनारे जहां बहुत लोग स्नान कर रहे हो घाट के और रास्ते में और चौपाल में चौराहे में मंदिर में बाजार में स्मशान में सराया आदि में बैठकर भजन नहीं करना चाहिए क्योंकि भजन भाव इससे दूषित हो जाता है बिगड़ जाता है तो भजन कहां करें फिर नदी किनारे गिर शिखर बाग इको सो देख भगवत जन बिलमो तहा बाढ़ भजन अभिषेक कोई नहीं है।

कोई स्नान करने नहीं आता। ऐसे घाट से अलग स्थान पर माताएं बहने ना बैठे। ये विरक्त संतों की बात कही माताएं बहने समाज का ही सेवन करें। ऐसी जगह बैठे जहां लोग आ जा रहे हैं। ऐसी जगह बैठे जहां चार लोग बैठे हुए हैं। एकांत ऐसे स्थानों में ना ये सूत्र स्वीकार करें। नदी किनारे बहुत दूर एकांत में जहां जनसाधारण लोग ना जाते हो। गिरि शिखर पहाड़ के किसी एकांतिक चोटी पर बैठकर या किसी एकांतिक बाग में या किसी एकांत स्थान में जहां लोगों का ठहरना बैठना आना जाना नहीं है।

ऐसे स्थान पर बैठकर चित्त को प्रभु में लगाए तो भजन विशेष बढ़ता है। नदी किनारे गिर शिखर बाग को सो देख भगवत जन बिलमो तहा बाढ़ भजन अभिषेक। श्री भगवत ऋषिक जी महाराज कह रहे हैं ऐसी जगह भजन बढ़ता है। और सबसे ज्यादा भजन की वृत्ति आती है भगवान के प्रेमी जनों के संग में बैठकर। एक बार कि गौशाला में भजन करें तो इतना आप संगम में करें। फिर लिखा था गुरु चरणों के समीप भजन करें तो अनंत गुना फल मिलता है। तो गुरु चरणों की समीपता का क्या मतलब है? अपने गुरुदेव की पादुका।

अपने गुरुदेव की पाद आपने श्री सीताराम ओंकारनाथ जी को देखा छाती में बांधे थे अपने गुरु जी की पादुका यह निरंतर गुरु का सानिध्य गुरु चरण पादुका साक्षात गुरु जी जब भरत जी ने कहा कि प्रभु हम सब तो आए हैं आपका अभिषेक करने के लिए आप जैसी आज्ञा करें तो भगवान ने कहा भरत जैसा तुम कह दोगे जब सारा भार भरत जी के ऊपर डाल दिया तो भरत जी ने कहा जे विधि प्रभु प्रसन्न मन होई करुणा सागर कीजे सोई प्रभु जिस प्रकार आपका मन प्रसन्न हो वही कीजिए ऐसा नहीं आपका मन जिस प्रकार तो भगवान ने कहा हम तो यही चाहते अपने पिता की आज्ञा का पालन करो तो बोले प्रभु जीने का सहारा दे दीजिए तो भगवान ने पादुका 14 वर्ष तक पादुका को सिंहासन में विराजमान कर पूर्ण राज शासन आज्ञा मांगकर करते थे ऐसे गुरु चरण चिन्ह गुरु चरण पादुका का सानिध्य और निरंतर भजन तो अनंत गुना फल प्रदान करता है।

जो उपासक अपने गुरुदेव या भगवत भक्तों को सबसे बड़ा मानता है त्रिभुवन में उसी का भजन सिद्ध होता है। यह भी बात समझ लो। भजन ना करने वाले के ही हृदय में दुनिया का प्रपंच आता है। नहीं तो गुरु जब मत परतरम ना किंचित धनंजय मेरे सिवा कोई है ही नहीं तो गुरु तो साक्षात परबह्म है ही। को कहे अवनी बड़ी भगवत ऋषि जी कह रहे कोई कहता है कि संसार में सबसे बड़ी भूमि है पृथ्वी सबसे बड़ी है तो कोई कहता है नहीं पृथ्वी से बड़ा तास दोनों समुद्र पुनी पृथ्वी से बड़ी समुद्र है पृथ्वी से बड़ा क्योंकि पृथ्वी से कई गुना बढ़कर जल है तो समुद्र बड़ा है तो बोले सो अंजुल भर लियो ताई सोख्यो अगस्त मुनि बोले समुद्र से बढ़कर अगस्त मुनि क्योंकि अंजुली में रख के समुद्र को पी गए तो बोले अगस्त भी तो आकाश में एक तारे की जगह है नव अगस्त को बास छिप उद्योत भानु के जब सूर्य प्रकट होता है तो उनका टिमटिमाना भी नहीं दिखाई देता आकाश में विराजमान है अगस्त पृथ्वी से बड़ा समुद्र समुद्र से बड़े अगस्त जी क्योंकि अंजुली में पी लिया अगस्त जी आकाश में तारे की तरह चमक रहे लेकिन जब सूर्य प्रकट होता है तो अगस्त का तेज छुप जाता है और वेदों में कहे हुए सूत्र है कि जो सूर्य है भानु वेदों कहा चक्षु है चक्रपान के सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्री हरि के नेत्र के प्रकाश से सूर्य प्रकाशित है।

तो भगवान के नेत्र सूर्य से बढ़कर प्रकाशवान हुए और ऐसे भगवान चक्रपाण हरिजन के हृदय कमल कीनो निवास भगवान कहते हैं मुझे भक्तों ने अधीन कर लिया है। अहम भक्त पराधीनो असुतंत्र ऐसे भगवान भक्त के अधीन है तो सबसे बड़े हुए भक्त पृथ्वी से बड़ा समुद्र समुद्र से बड़े अगस्त जी अगस्त जी आकाश में और अगस्त जी भी भानु के तेज से मंद पड़ जाते हैं और भानु का तेज भी भगवान के नेत्र से प्रकाशित भगवान श्री हरि भक्तों के अधीन है। भक्तों के हृदय में रहते हैं। सर्वश्रेष्ठ भक्त जो भक्तों को सर्वश्रेष्ठ मानता है, गुरु को सर्वश्रेष्ठ मानता है, उसके हृदय के सारे दोष नष्ट हो जाते हैं और निश्चित भगवत प्राप्त हो जाता है।

संतों ने कृपा करके हमें भगवत उपदेश किए हैं जिससे हमारे सारे दोष नष्ट हो जाए। कह रहे हैं कि इस संसार में कैसे जाना जाए कि आदमी नरक जाएगा। अपने को कैसे जाना जाए कि हम नरक जाएंगे। बोले विश्वास घातिनु ये कृत वत लोपिन दज देव विष्ते धरा जिसने किसी को विश्वास दिलाया और विश्वासघात कर दिया उसको नरक की प्राप्ति होगी। विश्वासघाती महापापी माना जाता है। कभी विश्वासघात ना करे। कोई शरण में आ जाए या किसी को वचन दे दे या किसी को विश्वास दे दे फिर विश्वासघात करे उसको नरक की प्राप्ति होती है।

दूसरा कृतज्ञ तुम्हारे साथ उपकार किया। तुमने उपकार नहीं माना उसका अमंगल किया नरक की प्राप्ति होगी। तीसरा आज से मैं यह करूंगा ऐसा व्रत लिया और व्रत तोड़ दिया बीच में उसको नरक की प्राप्ति होगी। ये खिलवाड़ नहीं है कि मैं यह व्रत लूंगा, ये ऐसा करूंगा, मैं ऐसा धाम जाऊंगा, ये इतने लोगों को भोजन कराऊंगा। ये कई लोग ऐसे होते हैं जो बड़ी-बड़ी बातें कह देते हैं। उनको पता नहीं कि यह खिलवाड़ नहीं है। ऐसा कर दूंगा, ऐसा कर दूंगा, ऐसा कर दूंगा और किया कुछ नहीं। पहुंच गए नरक।

व्रत का उल्लंघन करने वाले, प्रतिज्ञा का उल्लंघन करने वाले, नियम का उल्लंघन करने वाले नरक को प्राप्त होते हैं। मैं इतनी परिक्रमा करूंगा, मैं ऐसा करूं, कुछ भी नहीं। कोई नियम को ऐसे मत लो कि मैं यह करूंगा। हे प्रभु की इच्छा होगी। समय रहा जीवन रहा तो हो जाएगा। नहीं रहा। अब सामय के मर गए तो यह बात ध्यान रखिए। आगे चलकर मैं सन्यास लूंगा। विरक्त होकर वृंदावन वास कर। नरक जाओगे। अगर नहीं विरक्त हुए तो मैं इतना यहां मंदिर बनवा दूंगा। नहीं बनवाया नरक जाओगे। वचन संभाल के बोलो।

आज से मैं कुछ दिन व्रत रहूंगा। बकवास करना बंद कर दे तो जीवन उन्नति में हो जाता है। शाम का भोजन नहीं करूंगा। एकांत भजन करूंगा। नहीं भोजन मत करना लेकिन सेवा करो भजन करो। समझे नहीं? वाणी को ऐसे बिखेरते चले जाते हैं। व्रत का उल्लंघन करने वाला नारकी गति को प्राप्त होता है। संतों से द्वेष करने वाला, गुरु से द्वेष करने वाला यह नरक को प्राप्त होते हैं। और ध्यान से सुनो। जो माता-पिता को दंडित करता है, गाली देता है, अपमान करता है, उसे सीधे नरक की प्राप्ति होती है।

बिल्कुल पक्का समझ लो। माता-पिता भगवान का स्वरूप है। मातृ देवो भव पितृ देवो भव हे बिल्कुल बुद्धि खराब मत करो कलयुग बुद्धि भ्रष्ट कर रहा है माने मात पिता नहीं देवा साधु ते करवे सेवा जिनके आचरण भवानी ते निश्चर समझान वो राक्षस है और ऐसे राक्षस अब पुत्र रूप में ज्यादा पैदा हो रहे हैं। एक देखा हम कि माता को बाल पकड़ के घसीट रहा है। लात से पेट में प्रहार कर रहा है। पिता को थप्पड़ और सीधे छाती पर लात वाह इस पुत्र की जानते हो क्या गति होगी सीधे रो नर्क फिर वहां जो दंड मिलता है वहां मरना तो है नहीं प्यारे ना बेहोश हो सकते हो ना मर सकते होश में रहकर दंड भोगना है नरक की ये खासियत है 100 बार काटे जाओगे 100 बार जिंदा रहोगे उसे यातना देह कहते हैं होश में ये मत मानना कि नरक वर्क नहीं है जैसे लोग कहते अरे कौन नरक सरग बोल लो बोल लो जब फंसते हो ना बोले यही सब मिलता है यही नहीं मिलता है जब चोरी करोगे तो पहले घर से ले

थाने तक डंडा चलेगा फिर थाने में स्पेशल पिटाई होगी फिर कपड़ेपड़े संभाल के तुम्हारे हथकड़ी लगा के जज के सामने फिर वहां तुम्हारी चोरी का न्याय होगा यह ब्याज में मिला है ये ब्याज में घर से लेकर पकड़ने तक और थाने तक जो पिटाई हुई है यह ब्याज है मूल मूल तो न्यायाधीश करेगा कि 20 साल की सजा या अमुक से इतना इतना दंड ऐसे ही कर लो मनमानी पाप यहां जो ठोकर रोग है ये तो ब्याज है मूल तो नरक में भोगना पड़ेगा जो माता-पिता का त्याग कर देता है उसे नरक की प्राप्ति होती है जो माता-पिता को दंड देता है जो माता-पिता को गाली देता है और जो अपनी पानी ग्रहण की हुई स्त्री को निर्दोष स्त्री हो नाना प्रकार के दोषारोपण करके दंड देता रहता है, कलह मचाता रहता है।

ऐसे पुरुष को नरक की प्राप्ति और जो अपने सज्जन पति का त्याग कर पर पुरुष का अनुसरण करती है। ऐसी स्त्री को नरक की प्राप्ति होती है। जो गुरुजनों को कठोर वचन बोलते हैं। जो गुरुजनों का आदेश का पालन नहीं करते। उनका पोषण नहीं करते। जो देवता ब्राह्मण और निर्बलों का धन का अपहरण कर लेते हैं। ऐसे मनुष्यों को नर्क की प्राप्ति होती है। जो मदिरा पान करते हैं। सुन लीजिए ये मध्यता पापा द्वत कर्म रता तथा हमारा शास्त्र कहता है भारतवासी हो विदेशी नहीं हो तुम। इस भूमि में जन्मे हो यदि मदिरा पियोगे तो नरक का रास्ता पक्का कर रहे हो।

बोले इसमें तो कोई हिंसा नहीं लेकिन शास्त्र निषेध है ये मध्यता पापा द्वत कर्मता तथा जो जुआ खेलते हैं मदिरा पीते हैं और जो साधु भष रख के पाखंड करते हैं इनको सीधे नरक की प्राप्ति होती है यहां जो वर्णन हो रहा है वो बीच में विश्राम नहीं सीधे नरक बिना रोक टोक के जो माता पिता को दंड देते हैं जो निर्बलों का धन अपहरण करते हैं जो देवताओं का धन अपहरण करते देव मंदिरों का जो पापी मदिरा पीता है जुआ खेलता है जो पाखंड करता है साधु भष में इन सबको नरक की प्राप्ति होती है ऐसा थोड़ी कि तुम साधु भष रख लिए तो तुम चक्रवर्ती हो जो चाहो सो कर सको नहीं देखो अगर साधु भष धर कर गलती हो जाए तो भगवान क्षमा करते चूक लेकिन पाखंड का मतलब जानबूझ के वही करते रहना।

महापात की अतिपात की इन सबको और जो दूसरे जीव जंतुओं को पका के खाते हैं। जो जीवों को पका के ये भारत है। भारत धर्मात्माओं का देश है। महात्माओं का देश है। यति और सतियों का देश है। यहां एक कबूतर के लिए अपने शरीर को काट के तराजू पर रख दिया। ये वो राजाओं का देश है। वो प्रजा का देश है जो शरणागतों के लिए जीवन अर्पित कर दे। यहां जो जीव जंतुओं को पका के खाते हैं ए भैया सुन लो ये जो मांस मछली अंडा खाने वाले बोले और तो कुछ हम नहीं खाते। मछरी खाते हैं तो मछली में जीव नहीं बोले नहीं ये पानी की तरोई है हां हां हमसे बोले एक तरोई जो होती है वो जमीन में छैलती है ये पानी की तरोई है मछली पानी की तरोई है वो बनोगे तुम भी पानी की तरोई तैयार हो जाओ फिर तुमको सीधे मिर्ची की तरह तल के कढ़ाई में जिंदा फिर खाएंगे वो काल स्वरूप भगवान है अर्जुन को दिखाया कि देखो भीष्म द्रोणाचार्य लौंगी लाई की तरह फंसे हमारी दाढ़ों में होश में रहो शास्त्र आज्ञा है जो दूसरे जीव जंतुओं को मार के उबाल के बोले हम तो नहीं ऐसे पर खरीद के लाते हैं वैसे ही भोग मिलेगा दंड मिलेगा और सुनो जो सत्कर्म का संकल्प करके सत्कर्म नहीं करते सत्कर्म का संकल्प लेके सत्कर्म का ये करूंगा ये दूंगा ये ऐसा कभी मत बोलो जुबान से कर दो कर दिया जबान से बोल लिया और किया नहीं तो नरक जाओगे।

जो दूसरों को सदैव कष्ट ही देता रहता है। जो शास्त्र और धर्म के विरुद्ध चलता है। शास्त्र के अनुसार चलने वालों का उपहास करता है। जो दूसरे की जीविका छीन लेता है। जो द्वेष वश महामहिम गुरुजनों की निंदा में प्रवत्त होता है। वे सब नरक जाते हैं। जो दाता दान दे रहा है और वह जाकर उसको भड़का के रोक देते हैं नरक जाएंगे। दाता भी और भड़काने वाला भी। जो पाप कर्म के लिए प्रेरणा देता है। जो अनाथ उनको पीड़ा पहुंचाता है। इन भूतल पर ऐसे लोगों को नर्क की प्राप्ति होती है।

और यह पाप उनको घोर दुख में नरको में धकेलते हैं। ब्रहण्यम पुण्यज लोभ मोहिता कुकर्मजी तेव निर्या गामिना निरगामिना नरक गामी ध्यान से सुनना जो ऊंचे कुलों में जन्म लेकर के निम्न आचरण करते हैं ना संध्या है ना बंधन है ना अर्घ देना है बस मनमानी पापाचरण सीधे नरक खिलवाड़ नहीं है। तभी कलयुग ने ब्रह्मा जी से कहा था चिंता मत करो। जैसे बड़े भैया ने सतयुग ने कहा हमारे राज्य में कोई नरक नहीं जाएगा। फिर छोटे भैया त्रेता जी ने कहा कि हमारे राज्य में भी जैसे बड़े भैया का राज्य वैसे ही रहेगा।

द्वापर ने कहा आज्ञा पालन की कोशिश करेंगे। तो कलयुग ने कहा ब्रह्मा जी से वचन देते हैं भूल चूक से कोई स्वर्ग या परम पद चला जाए ले सीधे नरक भेजेंगे हाउसफुल नरक हाउसफुल रहेगा देख लो ना यही लक्षण है जो लक्षण है उनको देखो प्रया जो लोभ से मोहित होकर परम पवित्र कुलों में जन्म कर होकर के अपने कुल धर्म का त्याग करके पापाचरण करते हैं ऐो को नरक की प्राप्ति होती है जो भगवान को गालियां देते हैं नास्तिक है इनको नरक की प्राप्ति होती है। जो धर्म की मर्यादा को भंग करते हैं उनको नरक की प्राप्ति होती है।

जो कामी पुरुष दूसरे की स्त्रियों के साथ या कामी दूसरे पुरुषों के साथ उनको नरक की प्राप्ति होती है। ध्यान दे दे भारत है। धर्म विधान है। अब आप कह दो कि नहीं कानून नहीं ये कान ये भागवतिक कानून है। भगवान का बनाया हुआ है। तुम्हें भोगना पड़ेगा। होश में सत्संग सुनाने के लिए यह बड़े-बड़े शास्त्रों से महर्षियों से इसीलिए चयन करते हैं कि तुम्हारे और हमारे होश ठीक रहे यह भारत है ये धर्म भूमि है यहां मनमानी आचरण नहीं कि पतिवंचक परपति रति कर गोस्वामी तुलसीदास जी रौ नरक कल्प सत पर ऐसे पुरुष के लिए भी है जो दंभ करता है जो किसी को दान देने की बात कह के पलट जाता है उसे नरक की प्राप्ति होती है।

जो दूसरों की चुगली करता है जो अभिमान में भर करके दैन्य पुरुषों को सताता है ऐसे लोग होते हैं। जो झूठ बोलता है बात बातबात पे उनको नरक की प्राप्ति होती है। जो अपनी बात कह के सीधे पलट जाता है। जो दूसरों का धन हड़प लेता है। जो दूसरों को निष्कलंक होने पर भी कलंक लगाता है। ऐसे लोगों को नरक की प्राप्ति होती है। जो पराए सुख और संपत्ति को देखकर जलते हैं। जो प्राणियों के प्राण लेने में बड़े सुख का अनुभव करते हैं। तलछा तलछा कर मारते हैं। बहुत निर्दयी लोग हैं।

बहुत निर्दयी लोग। ये जलाते हैं पशुओं को। ऐसे पैर बांध दिए। ऊपर ऐसे सरिया डाल के उसमें पैरों में और नीचे आग लगा दी धीरे-धीरे घंटों में तड़प अब मुंह बंधा है आवाज नहीं निकल तड़प तड़प कर वो मर रहे हैं और वो चार 10 बैठे हंसी मजाक कर रहे करो करो मजाक करो यमदूत ऐसे ही बांधेंगे बिल्कुल ऐसे ही और वहां यहां एक दिन तुम ऐसा पाप करोगे वहां सैकड़ों वर्ष उसका भोगना पड़ेगा जैसे 15 20 मिनट पाप कर लो कत्ल कर लेचार विचार कर लो पूरे जीवन जेल में रहना पड़ेगा। फांसी भी हो सकती है।

ऐसे ही यहां एक पशु को तुमने जलाया आनंद लिया। वहां हो सकता है कि एक कल्प तक तुमको जलाया जाए। जैसे यहां एक 15 मिनट का अपराध आजीवन कारावास होश में यह नहीं मानना कि यह नरक स्वर्ग सब व्यर्थ है। जो लोग पराई स्त्री को फुसला के फंसा के दुराचार करते हैं मार देते हैं। जो लोग कुआं बगीचा पोखरा पौशाला इन स्थानों को अपवित्र करते हैं। विचार के द्वारा मलमूत्र त्याग के मान लो पानी है पानी में मलमूत्र करना पानी में विभचार करना पानी ऐो को सीधे नरक मिलता है सीधे नरक पोखरे में कुएं में बगीचे में जो अपवित्र आचरण करते हैं उनको नरक की प्राप्ति होती है जो देव स्थानों में दी गई जमीन संपत्ति को हड़प लेते हैं जो बच्चों को चुरा लेते हैं शिशु बच्चों को चुराकर बेचना या जो अतिथि को भोजन दिए बिना स्वयं भोजन कर लेते हैं।

ऐसे लोगों को नरक की प्राप्ति होती है। जो सन्यास का संकल्प लेकर फिर सन्यास आश्रम को कलंकित करते हैं। जो मित्र भाव करके दगा दे देते हैं। ऐसे जितने पुरुष बताए गए ये सब के सब नरकगामी होते हैं। इसलिए हम श्री भगवान का आश्रय लेकर नाम जप करते हुए सुधार करें। हमको नरक ना जाना पड़े। इसी जन्म में हमारी भगवत प्राप्ति हो जाए। निश्चित हो जाएगी नाम जप से और यह संकल्प लो अब लो नसानी अब ना न सही हो तो भगवान कृपा करके माफ कर देंगे। आम तो सर्व पापभ्य मोक्ष्या मासचा श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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