सत्संग सुनने पर भी भजन में रुचि क्यों नहीं होती ? श्रीकृष्ण द्वारा शाल्व, दंतवक्र, विदूरथ का उद्धार
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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वृंदावन स्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मृत मकरंद रसो पूर्णम र पितम मधुपति स्मृता मुग्रॉडी परम शीतल मा श्रय परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नव निवृत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले युगल सरकार राध्य प्राण प्रिय श्री श्यामा श्याम जू समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी तरु लता श्री यमुना रस रानी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिकर के चरणों में कोटि शह प्रणाम कोटि शह नमन नमस्कार जगत की कोई भी चका चंद विषक पद प्रतिष्ठा प्रशंसा कीर्ति य हमारे हृदय को कभी आकर्षित करके प्रिया प्रीतम से दूर ना कर दे सदैव प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे नाथ आप हमें ऐसी सामर्थ्य दे कि आपकी माया के विविध आकर्षण आपको भुला ना दे कहीं मेरे हृदय में आपसे बढ़कर आप की माया का प्रभाव ना पड़ जाए मैं आपको भूल ना जाऊं मैं आपकी स्मृति से बिलग ना हो जाऊं ऐसी प्रतिदिन उपासक को प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि शिव रंच का मोह को है ब पुराण असजी अ जानी भजी माया पति भगवान जो माया ब्रह्मा शिवादी को भी मोहित कर
सकती है व अपने छुद्र जीवों को मोहित कर ले कौन सी बड़ी बात है इसलिए मायाधर के चरणारविंद का आश्रय लेकर उनसे हम प्रार्थना उनसे हम विनय करें कि नाथ आपकी इस प्रचंड माया का प्रभाव कभी हमारे हृदय में इतना ना पड़े कि हम प्रमाद स्थिति में आकर आपको भूल जाए और माया को सत्य मानने लगे ये यश कीर्ति प्रशंसा प्रतिष्ठा गौरव यह सब माया के पार्षद हैं अगर इसमें मन राजी हो जाए तो भगवान का विस्मरण हो जाता है इससे बड़ी कोई हानि नहीं है प्रभु को भूल जाना और कोई संसार के
व्यक्ति वस्तु स्थान की याद आना ये सबसे बड़ी हानि है प्रभु से बढ़कर कौन है अनंत ब्रह्मांड जिनके एक संकल्प से बनते हैं पलते हैं और लय विनाश को प्राप्त हो जाते हैं उन अनंत महिमा वाले प्रभु को छोड़कर हम प्रभु के दास कहलाने वाले किसी की तरफ आकर्षित हो यह दुर्भाग्य है यह प्रमाद है यह बहुत बड़ी हानि है उपासक को इस बात पर स्थित रहना चाहिए त्रिगुण का ऐसा प्रभाव है सतोगुण रजोगुण तमोगुण का ना चाहते हुए भी वह हमारे समय को भगवान से विमुख कर देती है चतुर उपासक
वही है जो हर समय भगवान का स्मरण करता है कोई भी वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना प्रभु को भूल जाए ऐसी प्रभाव ना डाल पावे यही सबसे बड़ी कसौटी है भारी से भारी विपत्ति संपत्ति निंदा स्तुति मान अपमान इन द्वों में हम फंसकर अपने प्राण प्यारे प्रभु का विस्मरण कर दे ये बहुत बड़ी हानि होगी इसलिए स्मरण परायण रहे जहां ऐसा लगता है कि आकर्षण हो जाएगा वहां प्रभु से प्रार्थना कीजिए वही ऐसी सामर्थ्य देंगे कि आकर्षण कब जानेंगे कि आपके ऊपर आकर्षण हो गया जब प्रभु से हटकर कोई और रूप ध्यान में आने लगे प्रभु से हटकर कोई और बात अच्छी लगने लगे जान लो कि हमारा आकर्षण माया का हो गया बचो नहीं जन्म के जन्म बर्बाद कर देने वाली य भगवान की प्रचंड माया है नाम जब छूटा बड़ी भारी हानि हो गई नाम जब चल रहा है किसी का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा विषय पुरुष संसार की माता रखते हैं भागवती पुरुष भगवान की मत्ता रखते हैं भगवान की मत्ता आपके हृदय में है यह तभी मानी जाएगी जब किसी भी स्थिति परिस्थिति में भगवान का विस्मरण ना हो हर समय मधुर
मधुर प्रभु का नाम चल रहा है और यह सब जादू का तमाशा है यह जितना कुछ देख रहे हैं यह भगवान की जादूगिरी है ऐसी जादूगिरी है कि इसे समझा नहीं जा रहा और इसी में फसते चले जा रहे हैं एक तरफ भगवान की विशुद्ध प्रेम लक्षणा भक्ति और एक तरफ भगवान की मलिन माया जो जीव को फसाकर भगवत विमुख करके काम क्रोध आदि में अहंकार आदि में लिप्त कर देती है इसलिए उपासक बहुत सावधान रहे जन्म जन्म त से भटकते हो गए अब हमें अवसर मिला है संसार से निकलने का ना कि फसने का जिसका जितनी ऊंचाई का भजन होता है उतनी ही ऊंचाई की फसाओ वृतिया माया भेजती है इसलिए कभी नहीं प्रभु के सिवा हमें कहीं नहीं राजी होना भगवान के सिवा हमें कहीं समझौता नहीं करना कहीं हमें मनोरंजन नहीं करना हमें जन मनोरंजन प्रभु से ही आनंद प्राप्त करना है बने तो रघु भते बने बिगरे तो भरपूर तुलसी और अंते बने ता बनवे पे धूर जो औरों से बनता है वह मुझे नहीं चाहिए जो प्रभु से बनता है हमें वही चाहिए यह जरूर जीवन में साधक ध्यान रखे अन्य आश्रय ना होने पावे अन्य चिंतन ना होने
पावे आश्रय और चिंतन यदि प्रभु का तो भगवत प्राप्ति निश्चित श्रीपाद प्रबोधा अंद जी महाराज कह रहे हैं यदि आपने वृंदावन का आश्रय ले लिया जो त्रिगुण माया से विजय प्रदान कराने वाला है विदू त्रिगुण दथ विमल विद्याम पर महा नंदे वृंदावन भु सुकंद रस तरो अ मर्यादा राधा चरण परिचर्या रस महा महो दि द्वंदवा हद परम धन्या स् फुरत जो वृंदावन वास करता है वह त्रिगुण माया के प्रभाव से पार हो जाता है क्योंकि वृंदावन त्रिगुणा त है इस गुणात वृंदावन का आश्रय और वास आपको गुणात बना देगा यह वृंदावन धाम त्रिगुण मय माया का रचा हुआ नहीं है बहुत द माया से ये चिदानंद मय धाम है यह मानो रस का वृक्ष है वृंदावन रस का वृक्ष है और इसके फल है श्री श्यामा श्याम यदि हम वृंदा वृंदावन रूपी वृक्ष का सेवन करेंगे तो हमें श्यामा श्याम रूपी रस का रसास्वादन करने को मिलेगा जब वृंदावन का एक मात्र आश्रय ले लिया जाता है भले शरीर से वासना हो कहीं दूर रह रहे हो लेकिन आश्रय वृंदावन का है भरोसा वृंदावन का है तो वृंदावन अमर्या राधा चरण परिचर्या
रस महा वेदा तीत गोरे चरणारविंद गौरांग प्रिया के जो हैं इनकी दासता प्रदान कर देता है आगम निगम पुराण इनसे परे जो तत्व है प्रेम रस तत्व स्वरूपा श्री स्वामिनी जू स्वामिनी जू के चरणों में केवल केवल वृंदावन की रज रानी से प्रेम होता है जो अनन्य निष्ठा आती है व वृंदावन रज का सेवन वृंदावन के सेवन से आती है राहु को काहो मन दिए मेरे प्राणनाथ श्री श्यामा शपथ करो त छ इसमें आखिरी पंक्ति में महाप्रभु हरिवंश चंद्र ज कहते हैं जय शहित हरिवंश अनत सच नाही बनया रज लिए बिना वृंदावन रज उप सेवी हुए आप प्रिया प्रीतम में आसक्त नहीं हो सकते और बिना आसक्ति के लीला में प्रवेश नहीं स्वरूप बोध नहीं अगर यह दोनों नहीं हुए तो जीवन शून्य ही तो रहा ना तत्व बोध है ना चरण में प्रेम है ना देहा ध्यास छूटा तो फिर क्या मिला हमें हमारे मानव जीवन की साधना में इसलिए उपासक माया पर विजय प्राप्त करना बहुत कठिन है त्रिगुण मय माया से मुक्त कराने की सामर्थ्य रखने वाले वृंदावन का हम सेवन करें वृंदावन का वास वृंदावन की रज का सेवन इसके
प्रभाव से हमारे हृदय में लाडली जू के चरणारविंद की प्रीति उदय हो जाएगी श्रीपाद क अमर्या राधा चरण परिचर्या रस महा उस प्रीति से युक्त हृदय वाले को श्री किशोरी किशोर जू के श्री अंग की सेवा का अधिकार मिलता है परम धन्या स् फुरत धन्य है हृदय उनका परम धन्य है जिनके हृदय में गोरे चरणारविंद का आश्रय और ध्यान है ध्यान से देखो तो भाव जितना है आपका उसके अनुसार झांकी दिखाई देने लगेगी यदि संपूर्ण भाव हो जाए तो झांकी नहीं साक्षात दर्शन होते हैं वार्ता होती प्रभु
से पर उसके लिए पूर्ण अनन्य चाहिए त्रिभुवन में कहीं भी किसी से भी अपनापन ना रह जाए ना द्वेष रह जाए उसको यह रस प्राप्त होता है उसको श्री अंग सेवा का अधिकार प्राप्त होता है चाहे स्त्री हो या पुरुष बनिता पुरुष भाव मिट जाए सेव ललिता दि के भाय स्त्री पुरुष देहा अभिमानी भाव मिट जाए और मैं पियाजू की सहचर हूं यह भाव का दर्शन करते हुए आठो पैर उनकी सेवा में रहे कुमर्स चवा दिस दिश विधाया जलि पुटम स्थिता सेवो सुखद विभूति भगवत अमं नंदा मध पत मधुर वृंदावन बने सदा राधा कृष्ण स्मृति रत सारे सुकृति सुकृति कोई बड़ा पवित्र हृदय वाला पुण्यवान ही निरंतर राधा कृष्ण का स्मरण कर सकता है अगर भगवत प्रीति चाहिए तो निरंतर भजन चाहिए ऐसे काम चलाना तो बात अलग है भगवत प्रीति चाहिए तो निरंतर भजन चाहिए और भजन में बुद्धि यदि नहीं लगती तो बस प्रपंच में लगती है शास्त्र की प्रमाणित वृत्ति धारण किए बिना भजन नहीं होता शास्त्र के अनुसार चला जाता है आज लोग शरीर पुष्ट हो और भोग भोग को मिले बस दो ही आंतरिक वृत्तियां प्रबल हो रही
यही समझा जाता है कृपा शास्त्र प्रमाण जीवन महापुरुषों का संग नाम का रंग प्रीति अभंग ये दुर्लभ हो रहा है इतनी बुद्धि शरीर पुष्ट और धन के लिए भ्रष्ट हो जाती है कि यह भी समझ में नहीं आता कि शास्त्र विधान क्या है बस संसार केवल भोग भोगना चाहता है जो भोग में सुख है वह ब्रह्माम है और जो योग में सुख है वो सत्य है योग क्या है तेशाम सतत युक्ता नाम भजता प्रीति पूर्व कम ददा बुद्धि योगम तमन माम पया जो सतत भगवान का भजन करता है उसे योग प्राप्त होता है चलो संसार के भूले हुए जीव भूल जाए तो भूल जाए लेकिन तुम जिन भूलो माला धारी और भूले तो भूले भेष धारण करने वाले अगर भूल गए तो फिर क्या होगा गाइड करने वाला ही भूल जाए तो फिर हमारा रास्ता कौन होगा तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते कार्या कार्य व्यवस्थित शास्त्र प्रमाणित उपदेश होना चाहिए शास्त्र प्रमाणित आहार विहार होना चाहिए तभी हमारा धर्म बढ़ेगा कैसे कैसे उपदेश हो रहे हैं कैसे कैसे धर्म गुरु जो अपने धर्म शस्त्रों की अलना कर रहे हैं कैसे भजन होगा ऐसे ऐसे आहार बहारों का
प्रचार प्रसार किया जा रहा है जिससे हमारे धर्म का नाश होता है जिससे हमारी भजन वृत्ति नष्ट होती है कुमर सवारो दिस दिस विधाया जलि पुटम यदि धर्म से चलोगे पवित्र हार करोगे भगवान का नाम जप करोगे तो तुम्हारे हाथ में रखा जो चाहो प्राप्त कर लो जब अंततोगत्वा मृत्यु होगी ही तो ना तुम्हारा शरीर तुम्हारे साथ जाएगा ना तुम्हारा वैभव तुम्हारे साथ जाएगा आखिरकार कितने दिन जीवित रहोगे किसी के 30 वर्ष व्यतीत हो गए किसी के 40 वर्ष किसी के 50 वर्ष अब पता नहीं 50 है कि
नहीं प्लस में और जाना है यहां से कोई साथी नहीं अरे उस दिन की बात याद करो जब आपके प्राण पखेरू उड़ेंगे और कोई आपका साथी नहीं एक मात्र गोविंद साथी है ऐसा खाओ पियो कि आपकी बुद्धि शुद्ध रहे ऐसा पढ़ो लिखो ऐसा देखो कि आपकी बुद्धि शुद्ध रहे ऐसे चलो कि दूसरों का उपकार कर सको बस शोषण वृति बढ़ती चली जा रही है कैसे शरीर पुष्ट हो कैसे भोग भोगे कैसे मनमत रहे बस और अंत तो गत्वा हानि ही हानि है इसमें इसलिए धर्म अर्थ काम मोक्ष कुमर्स चवा ये चार पुरुषार्थ है जिस दिस विधाया अंजलि पुटम तुम जिधर देखोगे चारों तुम्हारे हाथ जोड़े खड़े रहेंगे धर्म अर्थ काम मोक्ष कब जब राधा राधा राधा ऐसा तुम्हारी जिव्या से निकलता रहेगा श्री राधा नाम का स्मरण पवित्र भोजन पवित्र आचरण पवित्र विचार तो धर्म अर्थ काम मोक्ष ये चारों हाथ जोड़े खड़े रहेंगे दिस दिश जिधर देखोगे उधर यह राधा नाम वृंदावन से प्राप्त होता है यह कहीं आगम निगमों में पुराणों में विशेष प्रकाशित नहीं है यह लाल जू के हृदय रूपी गुफा का अमूल्य धन है राधा नाम यह वृंदावन
से प्रकाशित होता कहीं भी विश्व में कोई राधे राधे बोलेगा या राधा राधा व वृंदावन से ही बीज बोया गया है उसके श्रवण इद्री में तभी वह राधा राधा बोल रहा है स्मरण कांच सेवा मखल जन संग परिहर सदा राधा राधे तमल सुकृति कोप जयती जो सदा अपनी जिव्या से राधा राधा राधा राधा ऐसा बोलता रहता है व महान सुकृत शली महान पुण्य आत्मा होता है और उसे प्रियालाल की सेवा प्राप्त होती है प्रियालाल की सेवा का मतलब है मोक्ष सुख भी कडुआ लगने लगे ऐसा महा सुख है प्रियालाल की सेवा में स्मरण कां चित कोई विरला भाग्यवान ऐसा है जो राधा राधा स्मरण करता हो जैसे हम आते हैं सुबह दो बजे जब तो तुम्हें कैसे बताए हृदय में कितनी उफान होती है आनंद की जिधर देखो राधा राधा राधा राधा 50 50 100 100 के गुट बैठ कर के राधा नाम का कीर्तन कर रहे कोई मजीरा ले कोई ऐसे नाम में और मार्ग कटता है दो किलोमीटर पचास हजार लोग खड़े भगवन नाम तो लगता है प्रभु कितने कृपाल हो आप इन सबके ऊपर कितने कृपाल हो कि रात्रि का समय है ठंडी का समय है कोई परवाह ना करके यह
रास्ते में खड़े होकर राधा राधा राधा राधा रट रहे हैं इंतजार कर रहे हैं कि कब राधा नाम दाता के दर्शन हो एक ही उद्देश्य है कब राधा नाम दाता के दर्शन हो और राधा राधा राधा राधा यह सुकृति जन है पता नहीं कौन सी कृपा की हवा चली कि जो पापा आत्मा जीव एक बार भी भगवान नाम नहीं स्मरण कर सकते उनको निरंतर जपने की भावना आ रही है यह बहुत दुर्लभ बात है स्मरण कांच कोई कोई सेवा मखल जन संगम परिहर ऐसे जन समुदाय का त्याग करके जो भगवत विमुख समय काटते हैं अब एक है पूरी रात क्लब में बिताते हैं और एक है वृंदावन की पावन भूमि में खड़े-खड़े दो घंटे तीन घंटे राधा नाम स्मरण करते हुए बिता रहे हैं कि भगवान का शरणागत एक आएगा हम उसके दर्शन करेंगे इनका जीवन सार्थक हो गया अगर भाव से देखो तो एक है अचल प्रयागराज जहां चल कर के गए और संगम का गान हुआ और एक है चल प्रयागराज मुद मंगल में संत समाज जो जग जंगम तीर्थ राजु जंग माने चलते फिरते चलते फिरते प्रयागराज भगवान के प्रेमी महात्मा जन है इनका दर्शन संभाषण मात्र परम पावन कर देता है
और प्रयागराज से भी बढ़कर है क्योंकि प्रयागराज महाराज धर्म अर्थ काम मक्ष चारों देने में सर्व समर्थ है सर्व समर्थ है लेकिन प्रेम प्रे इसलिए तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरी तुला कंग तुलन ताय सकल मिल जो सुख लव सत्संग लव मात्र क्षण मात्र अगर भगवत प्र प्र महात्मा का दर्शन संभाषण तो सीधे भगवत प्रेम की प्राप्ति होती है इसीलिए ना स्वर्ग ना अपवर्ग य नहीं रखा गया संत समागम के सामने संत समागम वहां तो स्नान करना पड़ेगा और भगवत प्रेमी महात्मा का दर्शन दर्शन मात्र से
निष्पाप हो जाना गंगा पापम शशि तापम दैन्यं कल्प तरस तथा पापम तापम तथा दैन्य हरत साधु समागम गंगा जी केवल पाप का नाश करती चंद्रमा शीतलता प्रदान करके ताप का नाश करता है कल्प तरु दरिद्रता विनाश करके धनी बनाता है कामना की पूर्ति करता है लेकिन पाप ताप और दरिद्रता तीनों का नाश संत समागम में एक साथ हो जाता है बिना स्नान के दर्शन मात्र से समस्त पापों का नाश करने वाले ये चलते फिरते तीर्थराज भगवान के प्रेमी महात्मा जन है स्मरण कांच सेवा मखल जन संगम परिहरम ऐसे जन समुदाय का त्याग कर दो जो भगवान से विमुख समय काटते हैं स्मरण करो ऐसे जनों का जिनके दर्शन संभाषण से राधा नाम की प्रीति हो जाए सदा राधा राधे तमल सुकृति कोप जयति कोई विरला ऐसा है जो इस राधा नाम को अपना जीवन मान ले तो जयत वो जीत जाएगा व मा पर विजय प्राप्त कर लेगा काम क्रोध लोभ मोह मद पर विजय प्राप्त कर लेगा बस राधा राधा राधा राधा कोई महान सुकृति जिसकी जिव्या में राधा नाम स् फुरित हो महान सुकृति साधारण जीव नहीं वह महान है पूरे त्रिभुवन में जिसकी
जिव्या से राधा राधा राधा ऐसा नाम उच्चरण होता है पूज्य पाद श उड़िया बाबा जी महाराज महापुरुषों के वचन स्वार्थ और परमार्थ दोनों को परम पवित्र कर देते हैं दोनों में पुष्ट कर देते हैं बाबा सत्संग करते हैं पर भजन नहीं करते भजन में रुचि नहीं होती ऐसा क्यों क्योंकि पाप आचरण बंद नहीं करते हैं उत्तर सत्संग करने पर भजन में बहुत बड़ी रुचि होती है लेकिन सत्संग हो रहा है भजन में रुचि नहीं हो रही इसका कारण क्या है बोले पाप की अधिकता इसका कारण है पाप की अधिकता होने के कारण उस सत्संग के वचनों को धारण नहीं कर पा रहा है पाप आचरण साथ में हो रहे हैं अगर पाप आचरण बंद कर दिए जाए और सत्संग किया जाए तो बहुत जल्दी सत्संग का प्रभाव होता है पाप आचरण बंद कर दिए जाए तो और कुछ साधन बने ना बने सत्संग के प्रभाव से ही भगवत प्राप्ति हो जाए बड़े भाग पाइव सत संगा बिन ही प्रयास होई भव भंगा बिना अन्य साधन के सत्संग श्रवण मात्र से भगवत प्राप्ति बस पापा चरण बंद कर दिए जाए श्रद्धा बढ़ाते चले जाओ सत्संग में और जो बात कही जाए
सत्संग में उसे आचरण में उतारते चले जाओ बस सत्संग मात्र से भगवत प्राप्ति हो जाएगी बाबा कभी-कभी तो स्वाभाविक भजन में रुचि होती है और कभी चेष्टा करने पर भी भजन नहीं होता इसमें क्या हेतु है ऐसा क्यों होता है उत्तर इसमें हे तो होता है माया के तीन गुणों का प्रभाव सतोगुण रजोगुण और तमोगुण जब नियम पूर्वक बिना सुख लिए हट पूर्वक भजन किया जाता है तो तीन गुणों का प्रभाव निरस्त हो जाता है मिले सुख ना मिले राधा राधा राधा राधा राधा नियम पूर्वक हट पूर्वक एक संत जी एकांतिक में सब चले जाने के बाद उन्होंने कहा कि मैं बहुत प्रयास करता हूं पर मेरा भजन नहीं हो पा रहा बहुत समय हमारा व्यर्थ जा रहा है अच्छा है साधक है वह अपने हृदय की जांच कर रहे हैं तो उनको हमने यही सूत्र कहा पा मिनट में एक बार राधा बोल दो हर पाच मिनट में एक बार राधा बोल दो फिर आप देख लो व मुस्कुरा दि है बोले यही तो नहीं होता है पा मिनट में एक बार राधा बोलना है यार देखो एक बार पाच मिनट में राधा राधा पा मिनट की छुट्टी फिर अगले पाच मिनट में राधा
हम राधा बोला इस पा मिनट की प्रथम सोपान पर और आखिरी में बोल दिया नवे मिनट पर राधा तो 10 मिनट में दो बार हो गया पर ऐसा नहीं करना कि राधा राधा बोल दिया 10 मिनट भूल गए नहीं 10 मिनट में दो बार बोलना है आप देख लेना अगर 24 घंटे भजन चलने लगे तो कहना आप पकड़ो तो कोई सिद्धांत पकड़ लो पाच मिनट में एक बार राधा नाम ज्यादा जपो तुम्हारे सौभा लेकिन एक बार हम मांग रहे हैं हर पाच मिनट में एक बार बोल दो श्री राधा परिणाम देख लेना जिनको लगता है मैं अभ्यास करते हुए हार गया लेकिन भजन नहीं बन रहा हमारी वह बात सुन ले पाच मिनट में एक बार राधा बोलो फिर हमें बताना कुछ समय बाद कि आपकी स्थिति क्या है सतोगुण रजोगुण तमोगुण का चक्र हृदय में चलता है जब तमोगुण आएगा तो निद्रा आलस्य प्रमाद क्र हिंसा ये वृति आए जब रजोगुण आएगा तो भोग वासना रुपया पैसा मान प्रतिष्ठा यह सब जब सतोगुण आएगा तब आएगा भजन करते हैं पाठ करते हैं चलो सत्संग सुनते हैं ऐसी वृति आएगी तो इन तीनों गुणों के चक्र को मिटाने के लिए बाबा कह रहे हट पूर्वक भजन
करना पड़ेगा मन नहीं लग रहा प्रमाद स्थिति आ रही तमोगुण आ चुका है लेकिन हम राधा राधा राधा अपने आप ठीक हो जाएगा नियम पूर्वक हट पूर्वक बिना सुख मिले भी यदि हम निरंतर नाम जप करने का अभ्यास करें तो हम त्रिगुण माया पर विजय प्राप्त कर लेंगे भजन करने से ही तमोगुण और रजोगुण की वृति निवृत हो जाती है तो भजन ऐसे बाबा तुम बताओ किसका करना चाहिए भजन जो सबसे बड़ा हो उसका करना चाहिए जो शुद्ध ब्रह्म है उसका करना चाहिए जो सबल ब्रह्म है उसका करना चाहिए अवतारी भगवान श्री हरि का करना चाहिए सब इन्ही के अंश से है सबल ब्रह्म शुद्ध ब्रह्म पूर्ण ब्रह्म परमात्मा योगियों के ब्रह्म ज्ञानियों के भगवान भक्तों के और लाड़ले प्रेमियों के इन्हीं का भजन करना चाहिए श्री हरि का भजन करना चाहिए भगवन भगवान में प्रेम और शरीर संसार से वैराग्य कैसे हो हम तो यह कहते हैं कि तुम वैराग्य के लिए प्रयास मत करो बहुत सुंदर बात है तुम भजन का करो तो भगवान से प्रेम हो जाएगा संसार से वैराग्य हो जाएगा अपने आप चिंता मत करो बाबा कह रहे हैं हम तो
कह रहे कि तुम वैराग्य का प्रयास मत करो यह प्रयास से सफल नहीं होता प्रयास करो भजन करने का भजन करते करते आपकी वृत्ति ही ऐसी हो जाएगी कि ब्रह्मादेवी की लगन से जो भजन किया जाता है उसका ऐसा प्रभाव हुआ कि मृत्यु लोक के भोग की तो बात जाने दो ब्रह्म लोक तक के भोगों से वैराग्य हो गया ब्रह्मादेवी है जाय जो ब्रज चंद भगवान की प्राप्ति की लगन में भजन करता है संसार से वैराग्य और भगवान से प्रेम स्वतः होने लगेगा यदि एक एक नाम जप करोगे जैसे एक एक कवल भोजन पाने से
तुष्टि पुष्टि निवृत्ति एक साथ होती है ऐसे ही एक एक नाम जप करने से संसार से वैराग्य अपने स्वरूप का ज्ञान और भगवान से प्रेम स्वाभाविक हो जाएगा नव योगेश्वर ने एकादश स्कंध में वर्णन किया है भाग संसार से वैराग्य स्वरूप का बोध और भगवान से प्रेम ये तीनों बातें एक एकक नाम जब जितना करते जाते होता जाता है पर जैसे आधा पेट होने पर अपने को तसल्ली होती है ऐसे ही जब 12 घंटे भजन हो एक तार तब हमारी समझ में आएगा कि क्या संसार से वैराग्य क्या स्वरूप का ज्ञान क्या भगवत प्रेम प्रयत्न करो वैराग्य के लिए नहीं भजन के लिए खूब डट के भजन करो जितना तुम भजन करोगे भगवान का बार-बार उच्चारण कर कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधा राधा राधा राधा राधा यही संसार से वैराग्य स्वरूप का ज्ञान और भगवत प्रेम जो महर्षि वाल्मीकि जी के द्वारा रची हुई वाल्मीकि रामायण है संपूर्ण ज्ञान उसमें है संपूर्ण और कहते हैं यह महापुरुष मरा मरा ममा इतनी उच्च कोटि की स्थिति नाम ने प्रदान की भगवान की समस्त मंगलमय गुप्त लीलाओं का भी वर्णन किया जो
गोस्वामी तुलसीदास जी के रूप में उन्होंने इशारे से वर्णन किया वही वहां खोलकर वर्णन किया वाल्मीकी रामायण में भगवान की एकांतिक लीलाओं का दर्शन उनका गायन और इसकी योग्यता य सब नाम ने प्रदान कर दी यदि आप नाम जप करोगे तो भगवान की कोई भी ऐसी लीला नहीं कोई भी ऐसी पदवी नहीं कोई भी ऐसी अध्यात्म की भूमिका नहीं जो आप में जागत ना हो जाए तो क्या रूप का भी साथ-साथ चिंतन करें नाम के साथ भगवान का नाम जिव्या से लेते रहे और रूप का ध्यान करते रहे हां अवश्य पर प्रारंभ
में रूप नहीं आता मलिन हृदय होने के कारण आराध्य देव का रूप प्रारंभ में हमारे ध्यान पटल पर नहीं आता तो हमको नाम का ही ध्यान करना चाहिए नाम का ही श्रवण करना चाहिए नाम का ही हमें कीर्तन करना चाहिए इसके प्रभाव से देखि रूप नाम आधीन नाम के प्रभाव से जब रूप झलके तो सच्ची कहते हैं रूप पड़ोगे इतना आनंद है उस रूप में प्रियालाल के रूप का दर्शन करते ही सब संसार कलुआ लगने लगता है किंतु स्मरण कोई साधारण बात नहीं बराबर नाम स्मरण आप लोग देख लीजिए बहुत कठिन है पर जिसने हट कर लिया व विजय प्राप्त कर लिया कोई भी माया का विघ्न उसके भजन में बाधा नहीं डाल सकता जो हठी स्वभाव का है मुझे करना हारना हमको जीवन में हर किसी को पसंद नहीं हारना हमको पसंद नहीं चाहे ठंडी हो गर्मी हो गाली हो अपमान हो भूख हो प्यास हो दुख हो निंदा हो इनमें निराश होना हार जाना यह हमारे स्वभाव में नहीं था जहां भय लगा जहां कटुता लगी जहां दुख लगा वहीं खड़े होकर उसको पुष्ट करना हारना नहीं सीखा इस विषय में हारना नहीं सीखा कि कोई निंदा कर दे तो
हमारा उत्साह खत्म हो गया भजन का ठंडी लग रही है भूख लग रही अपमान मिल रहा तो भगवत प्राप्ति का उत्साह कम हो गया नहीं हारना नहीं सीखा सर्दी में अगर कोई साल या कंबल या स्वेटर ऐसे तो चिरचिरा स्वभाव होता नहीं तुम आज हमको पहना दोगे और कल कल हमको कमजोर होना पड़ेगा बिना साल के हम नहीं रह सकते बिना कंबल के नहीं रह सकते बिना स्वेटर के नहीं रह सकते वही जो हम 12 महीना व हम रहना चाहते हैं हम कोई ऋतु परिवर्तन में अपने शरीर का परिवर्तन नहीं करना चाहते कि शरीर में
हमको य सुविधा चाहिए नहीं हर कष्ट को सह करके हम निरंतर भजन करना चाहे तभी बात बनेगी पहले पहल सर्दी व्याप्ती है शरीर ही तो है फिर अभ्यास पुष्ट कर लो देखो सबके चेहरे में देखो यहां कौन सा स्वेटर यहां कौन सा कंबल आप आराम से सह रहे हो ना अभ्यास हो गया बचपन से हमको यहां कोई कपड़ा नहीं पहनाया गया तो हमारा अभ्यास पुष्ट हो गया ऐसे ही अभ्यास पुष्ट जैसे गर्मी में बने आए वैसे सर्दी में बने आए वैसे ही चल रहा है कौन सा हमारा रोम कूप खड़ा है कि कांप रहे हैं किस ऐसे अभ्यास योग युक्ति चेत साना निगाना सर्दी कितनी भी पड़े हारना नहीं भूख प्यास निंदा अपमान दुख सुख य सब आएंगे जीवन में सबको सहते हुए राधा राधा राधा स्मरण करना भगवन नाम जप करना कोई साधारण बात नहीं है इसलिए हट पूर्वक जप करना होगा जिद्दी स्वभाव रखना होगा जैसे प्रारंभ में अधिक ठंडी का अनुभव दो बजे से लेकर के 6 बजे के बीच में होता है अधिक ठंडी का इस समय किसी को भी नींद आ सकती है जहां हमको रात्रि में इस समय ठंडी लगती जाकर गंगा जी में खड़े हो जाते
जिद्दी सुभा मंत्र जप निरंतर मंत्रा का वृति स्वाभाविक बनी रहती है अंधेरा छाया हुआ है गंगाजल भीषण ठंडा गंगाजल बस नाम अब जरा जरा सी बातों में सुख दुख का अनुभव करेगा मन भजन में कैसे लगेगा थोड़ा कठोर बनो इस बात के लिए अपने लिए अपने सुख सुविधा का त्याग करके भजन में स्थित करना यह थोड़ी कि सुविधा है तो उसको भोगो नहीं जितनी आवश्यकता है शरीर की उतनी बस उसके अलावा नहीं हम उतनी खोलते जितने पानी की आवश्यकता है क्यों बताते हैं आप भी प्रकृति का उतना ही प्रयोग कीजिए जितनी आवश्यकता है व्यर्थ में बल्ब नहीं जल ना व्यर्थ में पानी नहीं प्रयोग करना व्यर्थ में वस्त्र नहीं रखना जितना हमें आवश्यक है उतना प्रयोग भाई तो पूरे विश्व के लिए है जिसको आवश्यकता उसको दो मुझे आवश्यकता नहीं साधु को चाहिए कि उतना ही वस्त्र रखे जितने से काम चल बोले नहीं ये अचला रख लो किसके लिए नहीं आगे काम आएगा तो आगे भगवान नहीं है क्या जिसने आथ दिया वो आगे देगा हटाओ दो लंगोटी दो मार्किंग दो उड़ने के अचले इसके सिवा कुछ नहीं होना चाहिए आप
जिनके शरीर की कमजोरी है तो भाई स्वेटर और तो कठोरता भजन में करनी पड़ेगी कठोरता पेट में भोजन नहीं ऊपर से सर्दी है ऊपर से लोग गालियां दे रहे हैं फिर भगवत प्राप्ति करनी है कितना कठिन है और इसी कठिन में जो भजन होता है वह ऊंचाई में पहुंचाता है ऊंचाई में पहुंचाता है स्मरण करते समय क्या भगवान से मांगना चाहिए कि हे भगवान आप मुझे दर्शन दे दो मेरी सलाह तो है नहीं मांगना चाहिए मेरी सलाह है पूज उड़िया बाबा क मेरी सलाह है कि नहीं मांगना चाहिए हमें भगवान से केवल इतना मांगना चाहिए कि कभी हमारा भजन ना रुके बस यही खास बात है ये हमारे पूरे बचपन से लेकर अभी तक की हमारी गाइड है जीवन गाइड ये हमारे ऐसे गाइड करता है कि आज तक दूर नहीं हो पाए नैटक ब्रह्मचर्य से लेकर आज वैष्णव धर्म में प्रिया प्रीतम की उपासना में आज तक नहीं दूर हो क्योंकि एक एक शब्द पूरे जीवन को सही मार्ग पर प्रशस्त करके चलाने वाला बाबा कहते हैं खूब नाम जप करो तो रूप दिखाई देने लगता है हम तो नाम जप कर रहे हैं हमें रूप नहीं दिखाई दे रहा क्यों
क्योंकि अभी पाप नष्ट नहीं हुए संपूर्ण जन्म जन्मांतर के अभी पाप जहां पाप नष्ट हुए देखो पाप का प्रभाव होता है भगवान के दर्शन ना होना पाप का प्रभाव होता है भगवान के भजन में मन ना लगना पाप का प्रभाव होता है संत समागम न रचना जोप दुष्ट हृदय सोई होई मोरे सन्मुख आव कि सोई पाप वंत कर सहज स्वभाव भजन मोर्ते भावना का खूब डट के भजन करो चिंता ना करो दर्शन की चिंतन करो भजन का सब बात बन जाएगी नहीं महाराज जी प्रभु के दर्शन के जाओ वृंदावन वृंदावन में बिहारी जी के दर्शन करो राधा वल्लभ जी के क्या प्रभु नहीं विराजमान है लेकिन भजन नहीं किए तो तुम्हारे नेत्र नहीं तो तुम्हें मूर्ति ऐसे नजर आएंगे साक्षात विराजमान है महाराज जी कहने की बात अलग है लेकिन निरंतर भजन करना बहुत कठिन है सही बात है बहुत कठिन है अभी तुम समझ नहीं पा रहे हो पूज पा दनियावा शरीर का निरंतर भजन करते हो कि नहीं एक क्षण के लिए भी शरीर को भूलते हो तो हमें बताओ कभी नहीं चिंतन कर और कभी भूलते भी नहीं क्यों क्योंकि इससे हमारा राग हो गया है इससे
अपनापन हो गया है यदि भगवान से अपनापन हो जाए तो ऐसे ही भजन होता है भगवान भी तो अपनी आत्मा है धिक्कार है कि उनका चिंतन करना पड़ता है और शरीर का चिंतन होता है जो शरीर अपना नहीं है चलो पहले प्रारंभ करो करने से फिर होने लगेगा ऐसे भजन होता है सिद्धों का जैसे आपका शरीर का होता है सो के उठे तो जानना थोड़ी कि हम स्त्री है कि पुरुष है हम कौन है अपने आप पूरी चेतना है उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते सोते जागते हर समय शरीर में स्थिति रहती है ऐसे ही सिद्ध की हर समय भगवान में स्थिति रहती है तो अभ्यास करो निरंतर भजन का आरंभ में अभ्यास अच्छा नहीं लगता भजन का रुचि नहीं लगती तो सत्संग करो साधु संग करो सत्संग करो इससे भजन में रुचि हो जाएगी गुरुदेव जैसी आज्ञा करें आंख मूंद कर वैसे चल दो ज्यादा उसमें क्यों म मत करो आरंभ में ज्यादा विचार करने की जरूरत नहीं है गुरु के वानी बिन विचार करी शुभ जानी जो बुजुर्ग जन है जो अनुभवी जन है जो ज्ञान वृद्ध है इनकी बात मान लो चुपचाप चल दो आंख मंद करर पार हो जाओगे माया से सही
सत्संग भी तो नहीं मिलता बाबा हां यह भी बात है तो भगवान से प्रार्थना करो कि तुम्हें सही सत्संग की प्राप्ति हो सत्संग भगवान की कृपा से प्राप्त होता है और संत कृपा से भजन होता है नहीं महात्माओं की कृपा कैसे होती है महात्माओं की कृपा होती महात्मा में अनुराग कर लेने पर प्रीति कर लेने पर परंतु उनमें अनुराग होता नहीं है संतो में प्यार नहीं होता कोई बिरला है जो संत को प्यार करता हो य संतों से प्यार नहीं होता यह मानकर के भगवान के प्रेमी महा भागवत है हमारे
अहो भाग्य के हमारे गुरुदेव हैं या हमारे प्राण प्र प्रीतम है ऐसा भवाना किसी बरले के हृदय में होता है कानपुर में एक महात्मा मिले थे उन्होंने एक दृष्टांत में कहा कि जिस प्रकार सूर्य सर्वत्र समान रूप से प्रकाश करता है उसी प्रकार महात्माओं की सब पर समान कृपा होती है पर एक शीशा होता है जो सूर्य की किरणों का तेज समेट कर के आग पैदा कर दे तो वहां तो किरणें समान पड़ रहे लेकिन जब शीशे पर पड़ेगी तो वह उस शक्ति को कवर करके आग भी लगा सकता है ऐसे ही कोई शरणागत समर्पित चित्त वाला महात्मा की शक्ति को कवर करके व अपने अंदर ज्ञाना अग्नि और प्रेमा अग्नि पैदा कर लेता है ये श्रद्धा और विश्वास और समर्पण शिष्य का होता है सूर्य तो समान रूप से प्रकाश दे एक शीशा होता है जो ऐसे करो तो सूर्य की किरणों को एकत्रित करके नीचे अगर कागज रख दो तो उसमें आग पैदा कर देगा सूर्य तो समान है लेकिन उनकी किरणों की शक्ति घसीटना ये श्रद्धावन का कार्य है ऐसे संत की कृपा तो बराबर है लेकिन शरणागत भाव हमारी श्रद्धा हमारा अपनापन उनकी शक्ति
को एकत्रित करके ज्ञाना प्रकट करके पाप को भस्म करके निर्विकार कर देता है अब जैसे सूर्य में बादल आ जाए तो प्रकाश उपलब्धि नहीं होगी ऐसे ही यदि मनुष्य संत समागम भी करता पाप भी करता है उसके हृदय में ज्ञान का प्रकाश नहीं होगा चलते हैं श्रीमद् भागवत महा पुराण प्रसंग चल रहा है भगवान श्री कृष्ण चंद्र जो राजवी यज्ञ कराक द्वारिका लौट आए हैं श्री सुखदेव जी कहते हैं द्वारिका जब लौट कर के आए तो एक साल्व का नाम सुना होगा पहले अंबा से इसकी दोस्ती थी काशी नरेश कि
तीन पुत्रियों का जो अपहरण किया था भीष्म जी ने उनमें सबसे बड़ी थी अंबा अंबा का इसी साल्व से मित्रता थी जब साल्व ने सुना कि हमारे मित्र शिशुपाल को द्वारिकाधीश श्री कृष्ण ने मार डाला है तो उसने सब राजाओं को एकत्रित किया और कहा मैं पृथ्वी से अद वंश को मिटा दूंगा बड़ा बलशाली था सब लोग मेरा पौरुष देखना अब मैं पृथ्वी से अधु वंश को मिटा दूंगा क्योंकि मेरे मित्र जरास शिशपाल को श्री कृष्ण चंद्र ज ने मारा परीक्षित मूल साल्व ने इस प्रकार प्रतिज्ञा करके देवाधि देव भगवान शंकर की आराधना प्रारंभ की वो दिन में केवल एक बार मुट्ठी भर राख फाक लेता था राख बस यूं तो पार्वती पति भगवान शंकर आसुतोष है और ढर दनी है फिर भी साल्व का घोर संकल्प जानकर एक वर्ष तक उसकी साधना देखी एक वर्ष तक एक मुट्ठी राख फाक लेता बस निरंतर मंत्र जपता भगवान देवाधि देव शंकर का अब प्रकट होना पड़ा भगवान शंकर को भगवान शंकर ने कहा वरदान मांगो शाल्व ने कहा मुझे एक ऐसा विमान दीजिए जो देवता असुर मनुष्य गंधर्व नाग राक्षस किनी के अस्त्र
शस्त्रों से नष्ट ना किया जा सके जहां इच्छा हो इच्छा करते ही वहीं पहुंच जाए और खास करके यदुवंशियों के लिए बड़ा भयंकर हो भगवान शंकर ने तथास्तु कहा उसी समय मैदानों की रचना से प्रकट हुआ शभ नामक विमान ना सारथी की जरूरत है और ना पेट्रोल की जरूरत है ना ड्राइवर की जरूरत है ना पेट्रोल की उस पर बैठो और द्वारिकापुरी पहुंच गए द्वारिका सर से एकदम पहुंचा दिया मन के वेग के समान और कितना बड़ा एक महानगर की तरह य नहीं कि 100 आदमी विमान में केवल आएंगे महानगर की तरह
विमान और इतना तेजोमय और ऐसा चमत्कारिक कि व दिखाना चाहे तो दिखाई देगा नहीं दिखाना चाहे तो नहीं दिखाई देगा निकल गया विमान चलाने वाला उसे जहां ले जाना चाहता वही उसकी इच्छा अनुसार चलता भगवान शंकर की कृपा से शोभ नामक विमान साल्व को प्राप्त हुआ अब वो द्वारिका पर चढ़ाई कर दी साल्व ने अपनी बहुत बड़ी सेना से द्वारिका को चारों ओर से घेर लिया अब द्वारिका को उजाड़ने लगा फूल फल से लदे हुए उपवन उद्यानों को नगर द्वारों को फाट कों को राज महलों को अटार हों को दीवार हों को नागरिकों के जितने सुख सुविधा के स्थान थे सबको वि वंश करने लगा वो सौभ नामक विमान पर अपने सैनिकों के साथ चढ़कर बाणों की झड़ी लगा दी द्वारिका में कभी बाण कभी वृक्ष कभी सर्प कभी पर्वत के टुकड़े ऐसे बरसाने लगा सौभ विमान से कभी चारों धूल ही धूल द्वारिका में जैसे पूर्व में त्रिपुरासुर ने विमान पर बैठकर आतंक मचा दिया था ऐसे ही सालब ने शोभ नामक विमान पर बैठकर द्वारिकापुरी में अत्यंत प्रहार किए सब द्वारिका में अशांति फैल गई परम यशस्वी वीर
भगवान प्रद्युमन ने देखा हमारी प्रजा को बड़ा कष्ट हो रहा है तब उन्होंने रथ पर सवा होकर सबको डास बधा और कहा डरो मत प्रद्युमन जी उनके पीछे सात की चारु देशम भाइयों के साथ अक्रूर कृतवर्मा भानु विंद गद सुख सारण यह बहुत से वीर बड़े-बड़े धनुष धारण करके निकले सब के सब महारथी थे सबने कवच पहन रखा था सबकी रक्षा के लिए बहुत से रथ हाथी घोड़े पैदल सेना साथ-साथ चल रही थी प्राचीन काल में जैसे देवताओं के साथ असुरों का घमासान युद्ध हुआ वैसे ही साल्व के सैनिकों और यदुवंशियों का युद्ध होने लगा उसे देख कर के देखने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते प्रदुमन जी ने अपने दिव्यास्त्र से क्षण भर में सौभ पति साल्व की सारी माया काट डाली ठीक वैसे ही जैसे सूर्य अपनी प्रखर किरणों से रात्रि का अंधकार मिटा देते हैं प्रद्युमन जी के बाणों में सोने के पंख लोहे के फल लगे हुए थे उनकी गांठे जान पड़ती थी उन्होंने ऐसे 25 बाण मारे श विमान पति साल्व को उनके सेनापति को स बार एक साथ संधान किए जितने सैनिक थे 10 द वाहनों को तीन-तीन घोड़ों
को हाथियों को ऐसे बाणों की झड़ी लगा दी भगवान प्रद्युमन जी ने अद्भुत पराक्रम देखकर साल्व भी प्रशंसा करने लगा प्रदुमन जी की परीक्षित दानव का बनाया हुआ व स विमान अत्यंत मायाम था इतना विचित्र था कि कभी लगता कि अनेक विमान है कभी एक और कभी एक भी ना दिखाई देता तो वीरों को पता ही नहीं चलता कि 100 विमान है कहां कभी यहां दिखाई कभी वहां दिखाई दिया कभी बिल्कुल अंतर ध्यान हो गया कभी पृथ्वी पर कभी आकाश में कभी पहाड़ की चोटी पर कभी जल में अला चक्र की तरह विमान घूम रहा था शाल्व ने विमान पर छुपे छुपे यदुवंशियों पर बाणों की वर्षा कर दी यदुवंशियों के बाणों से साल्व के सैनिक साल्व के बाणों से यदुवंशी ऐसा घोर युद्ध हुआ साल्व के सेनापतियों ने यदुवंशियों पर खूब शस्त्रों की वर्षा की यदुवंशी बहुत पीड़ित हो गए परंतु पीड़ित होने पर मोर्चा नहीं छोड़ा वे सोचते थे कि मरेंगे तो परलोक बनेगा जीतेंगे तो विजय की प्राप्ति होगी साल्व के मंत्री का नाम था दमान जिसे पहले प्रदुमन जी ने 25 बाण मारे थे व बहुत बली था उसने झपट करके
प्रद्युमन जी पर अपनी फौलादी गदा से बड़े जोर से प्रहार किया और कहा मार दिया मार दिया गदा की चोट से प्रदुमन जी का वक्षा स्थल फट गया दारू का पुत्र उनका रस हाक रहा था व सारथी धर्म के अनुसार उन्हें रणभूमि से हटा ले गया दो घड़ी में प्रदुमन जी की मूर्छा टूटी तब उन्होंने सारथी से कहा सारथी तूने बहुत बुरा किया आज तक कोई यदुवंशी रण भूमि से भागा हो मैंने सुना नहीं तूने मुझे क्यों हटा दिया सूत ने कहा हमारा धर्म है रथी की रक्षा करना उस समय आप पीड़ा से युक्त थे तो मैंने अपने धर्म का पालन किया नहीं सूत तू कायर है तूने रणभूमि से मुझे क्यों हटाया बतला प्रदुमन जी ने कहा मैं अपने ताऊ बलराम जी को क्या उत्तर दूं अपने पिता श्री कृष्ण के सामने जाकर क्या कहूंगा कि साल्व ने युद्ध में मुझे मारकर भगा दिया तुमने मुझे नीचा दिखा दिया त रण भूमि से भगाकर अछम में अपराध किया सारथी ने कहा नाराज मत होए सारथी धर्म की शिक्षा के समय मुझे शिक्षा दी जाती है कि रथी की रक्षा हर तरह से करनी है मैंने अपने स्वामी की रक्षा की है
रणभूमि से भगाया नहीं है मेरे सारथी धर्म में अगर तनिक भी त्रुटि हो तो आप बताइए शत्रु ने आप पर गदा का प्रहार किया आप मूर्चित हो गए थे अब बोलिए उस समय मेरा धर्म क्या कहता है मैं वहां खड़ा रहूं जब प्रदुमन जी सूत के मुख से ऐसा वचन सुने तो फिर हा मु धोए कवच धारण किया सारथी से कहा ले चलो पुनः मुझे वही ले चलो दमान के पास जो साल्व का सेनापति है उस समय दमान यादव सेना को तहस नहस कर रहा था प्रदुमन जी उसके पास पहुंचकर उसे ऐसा करने से रोक दिया और आठ बाण मारे दमान को चार बाण उसके चार घोड़े एक एक बाण सारथी ध्वजा धनुष उसका सिर काट डाला जो साल्व का सेनापति दमान था जिसने गदा मारी थी प्रदु जी का हृदय फट गया था गद सात्विक शाम बाद यदुवंशी वीर साल्व की सेना का संघार करने लगे अब सौ विमान पर जितने सैनिक थे उनकी गर्दन कटकट नीचे गिरने लगी बड़ा घमासान युद्ध हुआ 27 दिनों तक लगातार स विमान प्रति साल से युद्ध यदुवंशी करते रहे भगवान श्री कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर य राज शवी यज्ञ का आनंद शिशुपाल की मृत्यु हो चुकी थी भगवान
ने पांडवों से अनुमति लेकर के बलराम जी के साथ जब द्वारिकापुरी आए तो वहां देखा कि स पति साल बड़ा आतंक फैलाए हुए हैं दारुक से कहा सीधे मेरा रथ साल के पास ले चलो साल बड़ा मायावी है तुम सावधान रहना दारुक से कहा भगवान की ऐसी आज्ञा पाकर दारुक साल्व की ओर रथ ले चला भगवान के रथ की ध्वजा गरुण चिन्ह से चिन्हित उसे देखकर यदुवंशियों में अपार बल आ गया कि आ गए भगवान साल्व की सेना के लोगों ने यद भूमि में प्रवेश करते ही पहचान लिया कि द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण पधार रहे यदुवंशियों ने साल्व की सेना तो नष्ट कर दी थी भगवान श्री कृष्ण को देखते ही साल्व ने दारुक पर एक बड़ी भयानक शक्ति चलाई वह शक्ति बड़ा भयंकर शब्द करती हुई आकाश में बड़े वेग से चली दिशाएं चमक उठी भगवान ने देखा मेरे सारथी दारु की ओय शक्ति प्रहार किया है तो अपने बाणों से उस शक्ति के सैकड़ों टुकड़े कर दिए इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने साल्व को 16 बाण मारे और उसके विमान को जो आकाश में घूम रहा था चलनी कर दिया बाणों से मारकर शाल्व ने भगवान श्री
कृष्ण की बाई भुजा पर जिसमें सारंग धनुष शोभायमान था बाण मारा इससे सारंग धनुष भगवान के हाथ से छूट गया यह देख कर के देवता घबरा गए साल ने गरज कर भगवान श्री कृष्ण ने कहा तूने हमारे भाई जैसे सखा शिशपाल की पत्नी को हर लिया जबकि हमारा शिशुपाल असावधानी को अजय मानते हो मेरे सामने ठहर जाओ तो मैं तुम्हें वीर समझू भगवान श्री कृष्ण ने कहा अरे मूर्ख व्यर्थ में बहक रहा है तुझे पता नहीं है कि तेरे सिर पर मृत्यु सवार है सूर्यवीर व्यर्थ की बकवास नहीं करते वह वीरता दिखाया करते हैं भगवान श्री कृष्ण ने क्रोधित होकर अपनी अत्यंत वेगवुड करके भगवान के हाथ में लौट आई लवने माया किया अंतरध्यान हो गया माया पति से माया कर रहा है दो घड़ी बाद भगवान देख रहे किधर साल्व है एक मनुष्य आया और भगवान को प्रणाम करते हुए बोला माता देवकी ने आपके पास सूचना भिजवाई उन्होंने कहा है कि अपने पिता के प्रति अत्यंत प्रेम रखने वाले महाबाहु साल तुम्हारे पिता को बा कर ले गया है जैसे कोई कसाई पशु को बांध ले भगवान सोचने लगे ऐसा कैसे हो सकता है
मेरे बड़े भाई बलराम जी को बड़ा सा बड़ा लोकपाल देवता भी कोई असुर भी नहीं जीत सकता फि तुच्छ मायावी सालो कैसे जीत सकता है पिताजी को बांध कर ले गया क्या प्रारब्ध बलवान है ऐसा कि शाल हमारे पिता को बांध ले भगवान श्री कृष्ण इसी प्रकार कह रहे थे कि साल्व वसुदेव जी को लेकर आ गया और ये असली वसुदेव नहीं है ये माया रचित वसुदेव है और भगवान श्री कृष्ण से कहा मूर्ख देख यही तुझे पैदा करने वाला तेरा पिता है ना जिसके लिए तू जी रहा है देख मैं अभी तेरे बल पौरुष की निंदा करते हुए तेरे सामने तेरे पिता की गर्दन काटता हूं और उसने तलवार निकाली और वसुदेव जी का गला काट दिया वसुदेव जी नहीं है माया रचित है भगवान श्री कृष्ण स्वयं सिद्ध ज्ञान स्वरूप है भगवान ने देखा कि ऐसा कैसे हो सकता है जान गए कि यह वसुदेव जी नहीं य तो माया के द्वारा रचित वसुदेव है य आसुरी माया है जो इसको मैदानों ने सिखाई है भगवान ज सचेत हुए तो ना व दूत ना पिता का सर कहीं कुछ नहीं केवल माया थी और साल विमान पर चढ़कर आकाश में बाण वर्षा कर रहा था
भगवान ने कहा कि अब इसको ज्यादा जिलाना ठीक नहीं है क्योंकि बड़े-बड़े ऋषि मुनि भगवान श्री कृष्ण चरणारविंद की आराधना करके आत्म विद्या का भली भात संपादन करते हैं ऐसे भगवान को कोई माया मोहित कर सके ऐसा असंभव जब साल्व बाणों की वर्षा भगवान पर कर रहा था अमोक शक्ति भगवान श्री कृष्ण ने सारंग धनुष पर बाण चढ़ाए और साल्व पर प्रहार किया उसका कवच छिन्न भिन्न कर दिया धनुष काट दिया और सिर की मणि छिन्न भिन्न कर दी और साथ में कोमोद की गदा को आदेश किया विमान को नष्ट
कर दो कोमोद की गदा ने सौभ नामक दिव्य विमान को नष्ट कर दिया चूर चूर होकर विमान समुद्र में गिर पड़ा गिरने के पहले ही घायल साल हाथ में गधा लेकर धरती पर कूद पड़ा और भगवान श्री कृष्ण की ओर झपटा साल्व को आक्रमण करते देख भगवान ने भाले से गधा के साथ उसका हाथ काट गिराया फिर उसे मार डालने के लिए प्रलय कालीन सूर्य के समान तेजस्वी अत्यंत भयंकर सुदर्शन चक्र को भगवान ने धारण किया उस समय उनकी शोभा ऐसी हो रही थी मानो सूर्य के साथ उदयाचल शोभायमान हो सुदर्शन जी को
आदेश किया काट डालो इसका सर सुदर्शन जी ने मायावी साल्व का कुंडल किरीत सहित सिर धर से अलग कर दिया ठीक वैसे जैसे इंद्र ने वज्र से वृता असुर का सिर काट डाला था अब तो सब हाय हाय करने लगे साल्व के सैनिक भाग खड़े हुए विमान गदा के प्रहार से समुद्र में चूर चूर हो गया था साल्व मारा गया देवताओं ने दुंदु बिया बजाकर पुष्प द करके भगवान का सम्मान किया शिशुपाल साल्व पौंड्रक जरास य सब मारे जा चुके हैं दंत वक्त का नाम सुना होगा ये वही हिर रणा कश्यप रावण कुंभकरण शिशपाल दंत वक्त जब इसने सुना की साल मारा गया तो पैदल भागा भगवान श्री कृष्ण को मारने के लिए आग बबूला हो गया उसके हाथ में केवल एक गधा थी इतना शक्तिशाली था कि जब चल रहा था तो पृथ्वी उसके पैरों की धमक से भूकंप की तरह कांप रही थी भगवान श्री कृष्ण ने देखा दंत वक्त आ गया झटपट हाथ में गदा ली और कूद पड़े रत से जैसे समुद्र के तट की भूमि उसके ज्वार भाटे को आगे बढ़ने से रोक है वैसे भगवान ने दंत्र वक्त्र को रोक दिया घमंड के नशे में चूर करुष नरेश दंत्र वक्त ने
गदा तानकर भगवान श्री कृष्ण से कहा आज मैं अपना सौभाग्य मानता हूं कि तुम मेरी आंखों के सामने पड़ गए कृष्ण वैसे तुम मेरे सगे मामा के लड़के हो इसलिए मैं तुम्हें मारना नहीं चाहिए परंतु एक तो तुमने मेरे मित्रों को मार डाला और दूस दरे मुझे भी मारना चाहते हो इसलिए मतिमंद आज मैं तुम्हें अपने वज करकस गदा से चूर चूर कर डालूंगा देखूंगा कैसे तू बचता है मूर्ख वैसे तुम मेरे सगे संबंधी हो फिर भी शत्रु हो तो जैसे अपने ही शरीर में रहने वाला कोई रोग हो मैं अपने मित्रों से बड़ा प्रेम करता हूं मेरे मित्रों का ऋण है आज मैं हे कृष्ण तुम्हें मारकर मैं अपने मित्रों के ऋण से उऋण हो जाऊंगा दंत वक्त ने कड़वी बातों से श्री कृष्ण को चोट पहुंचाकर और बड़े वेग से सिंह के समान गर्जना की भगवान पर गदा का प्रहार किया भगवान पूरी गधा का प्रहार सहकर टस से मस नहीं हुए वैसे ही खड़े रहे अब भगवान ने कहा दंत वक्त मेरी बारी और कोमोद की गदा संभाली दंत वक्त के वक्षा स्थल पर प्रहार किया एक ही प्रहार में मुंह से खून उगलने लगा बाल
बिखर गए भुजाएं फैल गई और निप्रा होकर गिर पड़ा धरती में आश्चर्य की बात जब शिशुपाल की मृत्यु हुई थी तब उसके शरीर का तेज भगवान में समा गया था ठीक ऐसे ही दंत वक्त के मृत शरीर से एक तेज निकला और भगवान की परिक्रमा करके भगवान में समा गया क्योंकि भगवान के दिव्य पार्षद हैं अब मुक्त हुए पहला जन्म रणा रणा कश्यप दूसरा रावण कुंभकरण तीसरा शिशपाल और दंत वक्त अब सन काद के साप से मुक्त हुए दंत वक्त के भाई का नाम था विदुर वह अपने भाई की मृत्यु से अत्यंत शोकाकुल हो
गया वह क्रोध के मारे लंबी लंबी सांस लेता हुआ ढाल तलवार लेकर भगवान श्री कृष्ण को मारने की इच्छा से दौड़ आया भगवान ने देखा प्रहार करना चाहता है सुदर्शन जी को आदेश किया इसका भी हिसाब कर दो तो विदूत का भी कुंडल मंडित सर धड़ से अलग कर दिया भगवान का अवतार याया भूम का भार हरण करने के लिए साल्व उसका सौब विमान दं तवक विदुर जिनको मारना बड़े-बड़े वीरों के लिए भी असंभव था इन सबका नाश करके भगवान द्वारिकापुरी में प्रवेश किए यदुवंशी भगवान के यश का गान कर रहे हैं बलराम जी ने जब सुना कि दुर्योधन आदि कौरव पांडव के साथ युद्ध करने की तैयारी कर रहे हैं तो उन्हो कोय अच्छा नहीं लगा इसलिए वो तीर्थ आटन के लिए चल दिए मुझे ना कौरवों से मतलब ना पांडवों से व वहां से चलकर प्रभास क्षेत्र में स्नान किया तर्पण किया ब्राह्मण भोजन कराया ऋषि पितर और मनुष्यों को तृप्त किया इसके बाद बलराम जी ब्राह्मणों के साथ सरस्वती नदी जहां प्रवाहित थी उधर चल पड़े पृथु दक बिंदु सर त्रित कूप सुदर्शन तीर्थ विशाल तीर्थ ब्रह्म तीर्थ चक्र
तीर्थ पूर्व वाहिनी सरस्वती तीर्थों में गए इन सब में अवगाहन किया फिर यमुना तट और गंगा तट इनके प्रधान प्रधान तीर्थों में बलराम जी गए फिर न सारण पहुंचे नमी सारण्य में एक बहुत बड़ा उत्सव हो रहा था सत्संग रूप सत्र 88000 ऋषि सोनक जी को मुखिया बनाकर सूत जी से सत्संग सुन रहे थे और य बहुत लंबे समय तक का सत्संग था देखा बलराम जी आए तो सब ऋषि खड़े हो गए आसनों से उठकर स्वागत सत्कार किया प्रणाम किया कुछ ऋषियों ने बल जी को आशीर्वाद दिया बलराम जी को आसन दिया गया
आसन में बैठ गए उन्होंने देखा कि सूत जी ना तो खड़े हुए ना प्रणाम मुद्रा ना कुछ सिंहासन पर बैठे हैं रोम हर्षण जी रोम हर्षण व्यास गद्दी पर बैठे हैं सब ऋषि खड़े हो गए सबने पूजन किया सबने प्रणाम किया सूत जी व्यास गद्दी पर बैठे थे उन्होंने ना प्र किया ना हाथ जोड़ा ना कोई अभ्यर्थना की बलराम जी ने देखा कि रोम हर्षण जी सूत कुल में उत्पन्न होने पर भी श्रेष्ठ ब्रह्म ऋषियों के ऊंचे आसन पर बैठे हैं और श्रेष्ठ महापुरुषों के आने पर ना तो प्रणाम करते हैं ना हाथ जोड़ते हैं ना आसन से उठकर खड़े होते इतना तो हो ही जाना चाहिए आसन छोड़ देना चाहिए क्योंकि महा पूजनीय भगवान बलराम जी पधारे जब 88000 ऋषि खड़े हो गए तो आपको भी खड़े हो जाना चाहिए ना हाथ जोड़ा ना प्रणाम किया ना आसन छोड़ा बलराम जी ने कहा रोम हर्षण ब्रह्म ऋषियों का सम्मान करना नहीं जानता प्रवचन करता बनता है ऊंचे आसन पर बैठा है हम लोग धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिए हैं दुर्बुद्धि जो उपदेशक होकर के आचरण उपदेश से बिलक करता मुसे मृत्यु दंड देते हैं बलराम जी
ने कहा बहुत जल्दी गुस्सा आ जाती बलराम जी को शेष अवतार है तू व्यास देव भगवान का शिष्य है इतिहास पुराण धर्मशास्त्र समस्त शास्त्रों का तुमने अध्ययन किया परंतु तुम्हारा अभी मन पर संयम नहीं तुम विनय नहीं हुए उद्दंड हो गए अजिता आत्मा झूठ मूठ अपने को पंडित मानता है जैसे नट की सारी चेष्टा अभिनय मा ती वैसे ही सारा अध्ययन तेरा स्वांग मात्र रहा क्योंकि तूने ऋषियों का महर्षि हों का बड़े जनों का सम्मान करना नहीं सीखा ध्यान देकर सुन ले जो लोग धर्म का चिन्ह धारण करते हैं धर्म का पालन नहीं करते वो अधिक पापी होते हैं और मेरे द्वारा वो दंड के पात्र है मैं उनका वध करता हूं बलराम जी ने कहा यद्यपि मैं तीर्थ यात्रा के लिए निकला था किसी का बध नहीं करूंगा सोचकर फिर भी मैं तेरा बध करूंगा इतनी गुस्सा आ गई बलराम जी को और एक कुसा उठाई उसकी नोक ऐसे ली और संकल्प करके मारा सूत जी महाराज पधार गए और जबक ऋषियों ने मंत्रों के द्वारा सूत जी को मृत्यु भी नहीं छू सकती जब तक हमारा सत्संग कथा रूपी उत्सव चलेगा अब सब ऋषि मुनि
आया करने लगे कथा प्रवक्ता कोई मार दिया बलराम जी ने देख लो सावधान रहना बलराम जी कहते हैं कि जो भेष धारण करता धर्मात्मा का और धर्म विरुद्ध आचरण करता मैं उनका वध करता हूं सूत जी के मरते ही सब ऋषि मुनि हाय हाय करने लगे और कहा बलराम जी से प्रभु देख लो भगवान कर तुम कर तुम अन्यथा कर तुम है ऋषियों ने कहा सुनो ऋषियों ने कहा बलराम जी आपके द्वारा बड़ा अधर्म हो गया हम लोगों ने जब तक इनका सत्र समाप्त नहीं होता तब तक इनको शरीर में कोई कष्ट नहीं हो सकता इनकी आयु नष्ट नहीं हो सकती इनकी मृत्यु नहीं हो सकती ऐसा वरदान दिया था आपने सारे वरदान झूठे करके क्षण में मार दिया महाराज हमें लगता है आपसे अपराध बन गया ऋषियों ने बलराम जी से कहा मानते हैं आप योगेश्वर है वेद का शासन भी आप पर नहीं है फिर मेरी प्रार्थना है कि आपका अवतार लोगों को पवित्र करने के लिए हुआ है यदि आप किसी की प्रेरणा बिना स्वयं इस अपराध को प्रात रूप करके क्षमा करें तो हम सबको शिक्षा मिलेगी बलराम जी ने कहा ठीक है अगर आप ऐसा कहते हैं तो बताइए
क्या प्र जो प्रथम श्रेणी का प्रश्चित हो मैं उसे कर सकता हूं ऋषियों ने कहा मैंने तो कथा सुनने के लिए सूत जी को लंबी आयु दी थी मृत्यु भी नहीं छू सकती अब कथा कैसे सुनेंगे तो कहा कहो अभी जिला देता हूं सूत जी को योग बल से सब कुछ संपन्न कर देता हूं इनको वैसे ही सब ध्यान रहेगा पूरी कथा करेंगे कोई पर नहीं ऋषियों नेने कहा नहीं नहीं आपका प्रहार करना भी व्यर्थ ना जाए और हमारे वरदान भी व्यर्थ ना जाए ऐसा बीच का उपाय निकाल लो तो बलराम जी ने कहा बीच का उपाय है कि रोमर्स जी के पुत्र उग्र शवा और पिता ही पुत्र के रूप में होता है इसलिए रोमर्स के स्थान पर आज से कथा सुनाएंगे उग्र स्वादी मैं उग्र सवा को दीर्घायु देता हूं इंद्रिय शक्ति देता हूं बल देता हूं बिना पढ़े सब ग्रंथ आ जाएंगे उनके हृदय में और क्या चाहते हो बताओ अगर अपराध मानते हो सूत जी का माना कि मारना तो उसका प्रश्चित बताओ ऋषियों से कहा ऋषियों ने कहा कि इवल का पुत्र बलवल नाम का एक बड़ा भयंकर दानव है वो हम ऋषियों को परेशान करता रहता है जब हम यज्ञ करते
हैं तो खून पीव मूत्र इसकी वर्षा करता है तो उस पापी को मार डालो यही प्रशित हो जाएगा बलराम जी ने कहा अच्छा और बोले भारत के पूरे तीर्थों में 12 महीनों तक परिक्रमा कीजिए तो आपकी शुद्धि हो जाएगी बलराम जी ने दोनों बातें स्वीकार की बलवल का वध और 12 महीनों तक भ की परिक्रमा य ऐसा महान देश है कि भगवान को भी प्रश्चित के लिए भारत की परिक्रमा बताई गई देखो यहां इस प्रसंग में शिक्षा मिलती है कि चाहे जितने ऊंचे पद में बैठे हो यदि कोई ब्रह्म ऋषि पधारे या गुरुजन पधारे या श्रेष्ठ महापुरुष पधारे तो उठकर खड़े हो जाना चाहिए नहीं अपराध लगता है इतना बड़ा अपराध कि बलराम जी ने तो मृत्यु ही कर दी सूत जी की और दूसरी बात है जब अपने से श्रे श पुरुष पधार होता यदि नहीं खड़ा होता तो आयु श्री कीर्ति प्राण कमजोर हो जाते हैं खड़े हो जाना चाहिए अपने से श्रेष्ठ पुरुषों को देखकर जिससे प्राण पुष्ट होते हैं आयु बढ़ती है श्री कीर्ति यश बढ़ता है अब बलराम जी कैसे बलवल का उद्धार करते हैं कौन-कौन से तीर्थों में जाते हैं आगे की
चर्चा श्री राधा वल्लभ लाल की जय
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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