अहंकार की चाल, सहना ही साधुता/हंस रूप से सनकादिकों को उपदेश/केवल नाम जप से संपूर्ण भक्ति की प्राप्ति
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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वृंदावन स्वरी तैव पदारविंदम प्रेमा मृतक मकरंद रस पूर्णम हदर पितम मधुपति स्मर ताप मु ग्रम निर्वा पय परम शीतल मा शयाम परम शीतल मा शयाम परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नव निवृत निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाड़ले प्राणा प्राण प्रिय श्री युगल सरकार प्रिया प्रीतम जू समस्त सहचर वृंद खग मृग पशु पंछी तरु लता श्री यमुना रस रानी रज रानी समस्त ब्रजवासी परिकर के चरणों में कोटि सह प्रणाम कोटि सा नमन नमस्कार अभिमान एक ऐसा शब्द है जो पूरे संसार चक्र को बांधे हुए हैं अभिमान विद्या का अभिमान का अभिमान जाति का अभिमान कुल का अभिमान जवानी का अभिमान और भी बहुत प्रकार के धना अभिमान जना अभिमान यह अभिमान ही जन्म मरण का हेतु है संस मूल सूल प्रद नाना सकल शोख दायक अभिमाना यह कभी सुख प्रदान नहीं करता य शोक दुख भय यही प्रदान करता है पर अज्ञानी जनों को इसमें बड़ा सुख लगता है जाति का अभिमान धन का अभिमान तो एक सुख की अनुभूति उनको होती है अज्ञानी हों को इसी अभिमान वृत्ति का त्याग कर
दिया जाए तो भगवन हृदय में जो है वही स् फुरित होने लगे हमारी मांग विषन नहीं है भगवता अंद है विषयों में आनंद की खोज करना मानो जीवन को बर्बाद कर देना है पूरे जीवन को व्यर्थ कर देना पर है बड़ा कठिन सहज प्रवाह मन और इंद्रियों का प्रकृति की तरफ ही होता है परमात्मा की तरफ तो साधना के द्वारा लगाया जाता है और साधना करते हुए भी यदि अहंकार हो जाए तो भी व साधना व्यर्थ हो गई तो यह अहंकार जो है यह भगवान की जब विशुद्ध कृपा होती है तब इसका नाश होता है नाश दो प्रकार से होता है एक ज्ञान का प्रादुर्भाव होकर अहंकार का नाश करना और एक परिस्थिति ऐसी परिस्थिति प्रकट कर देना सर्वनाश की लीला उसका अहंकार चूर चूर हो जाता है अगर भक्त में कहीं थोड़ा भी अहंकार हो तो भगवान को बर्दास्त नहीं होता ताते करें कृपा निधि दूरी सेवक पर ममता ति भूरी भूरी माने बहुत बड़ी सेवक पर बहुत बड़ी ममता रखते हैं प्रभु तो जहां भक्त कोई अभिमान करता है तो उसी अभिमान का नाम ना करने की लीला करते हो बड़ी कड़वी होती है ज्ञान के द्वारा अभिमान का
नाश हो जाना थोड़ा सरल है सहज है लेकिन लीला के द्वारा परिस्थिति प्रकट करके फिर अभिमान का ना सुना है बड़ा कडुआ है इतना कडुआ है कि देव ऋषि नारद जी ने भगवान अपने इष्ट श्री हरि को साप दे दिया जाओ जैसे मैं स्त्री के वियोग में दुखी हूं वैसे तुम दुखी हो जो तुमने हमें बंदर का स्वरूप दिया वही तुम्हारी सहायता करें देखो कितना अभिमान गिरा दिया कि अपने इष्ट को साप दे दिया हम जिनकी चरण रज की आराधना करते हैं उनको दुख देने की बात कह दी और प्रभु ने स्वीकार कर लिया
इसलिए उपासक को चाहिए अभिमान से बचे गुरु कृपा से अभिमान नष्ट हो हो जाता है जब साधक अपने आप को गुरु के चरणों में समर्पित कर देता है तो उसका धीरे-धीरे अभिमान गलित होते होते वह फिर देखता है कि भगवत कृपा से सारे कार्य हो रहे हैं मैं नहीं कर रहा हूं करता और भोगता भाव हटा कि व जीवन मुक्त अवस्था को प्राप्त हो जाता है इसीलिए श्रीपाद प्रबोधा अंद जी कह रहे हैं जाति प्राण धना आतु सुय सो रास परीक्षिता सद धर्मा विलय प्रयां सततम सर्व निर्भरता आधि व्याधि सते न जीरत व पुलु तो प्रति कात वृंदा वि पिनम तथापि न मना तुम ममा स्मति साधक को कभी शरीर संबंधी अभिमान करना ही नहीं चाहिए कि मैं अमुक जाति का हूं मेरे पास इतना धन है मैं इतना बलवान हूं बुद्धिमान हूं ज्ञानी हूं बहुत साधन परायण हूं ऐसे अभिमान को बिल्कुल कर देना चाहिए शरीर संबंधी स्मृति का त्याग ही साधना है हमको अपने शरीर की शुद्ध ना रह जाए ऐसी भगवत स्मृति एक तार चले कि इष्ट के चिंतन में इतना हम डूब जाएं कि शरीर का चिंतन ही ना हो यही साधना है मैं किस जाति
में पैदा हुआ हूं मैं कहां पैदा हुआ हूं मैं रूपवान हूं मैं जवान हूं मैं गुणवान हूं धनवान हूं बलवान हूं यही अभिमान हमें भक्ति महारानी से बहुत दूर किए हैं जैसे कोई रास्ते में जब कोई महान आता है तो फूलों के पावणे बिछाते हैं तो तुम्हारे हृदय में महान भक्ति पदार्पण करने वाली है और तुम अभिमान रूपी बड़े-बड़े कांटे बिछा दो तो तुम्हारे हृदय में कैसे आएगी विद्या रूप महत्व कुल धन जोवन अभिमान सट कंटक देखे जहां रान भक्ति निदान जहां विद्या का रूप का कुल का धन का यवन का यह सब अभिमान रूपी कांटे पड़े हैं उसके हृदय में भक्ति महारानी कैसे पधारे सट कंटक देखे जहां रान भक्ति निदान फिर रान भक्ति निदान स्वांग सब नगर नार के नगर नार कहते हैं वैश्या बस वो वैश्या की तरह जैसे वैश्या श्रृंगार करती है पर पुरुष से रमण करने के लिए ऐसे वह भक्ति का स्वांग करता है विषय पुरुषों को रिझाने के लिए भरतार भगवान श्री हरि के रिझाने का उद्देश्य हट जाता है विषय पुरुषों का भक्ति का आडंबर करके नाटक करके विषय पुरुषों को रिझाने का नहीं
रिवन भतार के इसलिए उपासक इससे डरे शरीर चिंतन इंद्रिय मन के द्वारा भोग चिंतन गर्व घमंड अभिमान यह बहुत भक्ति में बाधक है तो श्रीपाद कह रहे हैं कि श्री धाम वृंदावन में मुझे अखंड वास करना है अब जाति पक्ष को मिटा देना है हमें यह नहीं देखना कि हम किस जाति के हैं य जाति पाति कुल कर्म धर्म व्रत संसृति हेतु अविद्या नासी सेवक जी महाराज क सब अविद्या है ये यह कोई सत्य विषय नहीं है पीछे हम सुवर रहे इस जन्म में मनुष्य बन गए फिर आगे जाकर के बिगड़ जाएगी तो नाली के कीड़ा बन जाएंगे भूत प्रेत बन जाएंगे बढ़िया पुण्य बन गया तो देवता बन जाएंगे और भजन बन गया तो भगवान को प्राप्त हो जाएंगे तो कपड़े बदलते रहते हैं आत्मा तो वही रहती तो कपड़ों की क्या जाती इसलिए जाति पक्ष को साधन भाव में नहीं लाना चाहिए और चाहे प्राण चले जाएं अब अपने आराध्य देव की आराधना नहीं छोड़नी प्राणों का मोह भी छोड़ देना चाहिए प्राण के मोह में भूख प्यास जीने की आशा इनका त्याग कर दे चाहे आज हमें बुला लो चाहे 50 वर्ष बाद बुलाना जाना तो हमें
आपके पास ही है हम तो आज ही तैयार हैं अब आप देख लो कब बुलाना है और रही प्राणों के पोषण की बात तो जो आप व्यवस्था कर देंगे उसी में हम राजी रहेंगे तो जाति प्राण और धनानी धन आदि इसमें सब विषय आ जाते हैं हमको वही विषय चाहिए जो प्रभु देते हैं हमें किसी विषय पुरुषों की चाटुकारिता करके धनी मानियो के पीछे डोल करके उनसे भोग सामग्री एकत्रित करना यह तो नरक का रास्ता है बने तो रघुवर ते बने बिगरे तो भरपूर तुलसी औरन ते बने ता बन बे पे धूर अगर बने तो हमारे इष्ट देव से इष्ट देव कह रहे योगक्षेमं वामम मैं तुम्हारे योग क्षेम का वहन करूंगा तुम तो निश्चिंत होकर केवल मेरा अनन्य चिंतन करो अनन्य चिंत तो माम लाखों बार यह बात सुन चुके हैं अनन्य चिंत तो माम क्या ऐसी स्थिति आ रही हृदय में कि अपने श्यामा श्याम के सिवा हम और कुछ सुनना ना चाहे देखना ना चाहे और किसी से कुछ पाना ना चाहे दे तो श्यामा श्याम दे कैसे जानेंगे कि श्यामा श्याम दे रहा है कैसे जानेंगे मेरा प्रभु दे रहा है जब हम कोई कामना ना करें और अयाचक वृत्ति
से अपरिचित व्यक्ति के द्वारा हमारी सेवा हो तब समझना चाहिए भगवान से प्रेरित होकर कर रहा है जथा लाभ संतोष सदा काहु सो कछु न चाहो इससे धन का अभिमान धन की प्रियता नष्ट हो जाएगी जाति की प्रियता प्राणों की प्रियता और धनानी धन आदि की प्रियता का नाश जथा लाभ संतोष सदा काहु सो कछु न चाह यां सुसो राश परीक्षिता अभ इस शरीर का बड़ा यश हो रहा है बड़ी प्रतिष्ठा हो रही है बड़ा मान है स्वीकार मत करो अगर यश प्रतिष्ठा मान स्वीकार करोगे तो देहा भिमान पुष्ट हो जाएगा और भगवान की भक्ति या शुद्ध ज्ञान प्राप्त होना कठिन हो जाएगा सम्मान कल्या घोर गलम यह सम्मान बड़ा जहर है मीठा जहर है इसे मांग कर पिया जाता है सम्मान की प्रियता प्रतिष्ठा इतनी जोर की हो जाती है कि बड़े-बड़े अच्छे साधकों में भी ईर्ष्या मत सरता और मान प्रियता यह भगवान से दूर कर देती है कंचन तजना सहज है सहज तिया का ने मान बड़ा ईर्ष्या दुर्लभ तज नाए बड़े-बड़े अच्छे संतों साधकों में भी जब दूसरे की यस कीर्ति होती है तो अपने हृदय में जलन होने लगती है उसी
जलन का नाम ईर्ष्या है मत सरता है महापुरुष जन कहते इसे त्यागना बड़ा कठिन है क्योंकि अपनी मान प्रतिष्ठा का जब भोग होता है तब ये रोग पैदा हो जाता है ईर्ष्या और मा सरता मेरे से आगे बढ़ा जा रहा है मान प्रतिष्ठा को भी धूल धू सरित कर दे ना स्वीकार करें वह चाल चले जिससे मान प्रतिष्ठा ना हो जिससे लोग सयस करके भीड़ लगा कर के भजन की वृत्ति हटाते हैं तो ऐसी चाल साधक को चलना चाहिए कि कोई उसके पीछे ना पड़े मान प्रतिष्ठा से दूर रहने के लिए सिद्ध महापुरुषों ने पागलों का सा नाटक किया है जड़ बहरे गूंगे विक्षिप्त ऐसा स्वांग किया कि विक्षिप्त है यह पागल है यह बहरा है यह गूंगा है ऐसा क्योंकि बोलेंगे तो विद्वता प्रकट हो जाएगी सुनकर उत्तर देंगे तो लोग पीछे पड़ जाएंगे और अगर प्रवीणता दिखाएंगे तो फिर प्रतिष्ठा पुष्ट होती चली जाएगी इसीलिए वो जड़ दिखाई देते हैं पा जैसे मुख बहरे यह भगवान की प्राप्ति के लिए कान होते हुए भी बहरे बन गए जवान होते हुए भी मौन हो गए और विद्वान होते हुए भी विक्षिप्त पागल का सावर रोल करते
हैं इसलिए श्रीपाद कह रहे हैं सयस राशि परीक्षिता सयस हमारा क्षीण हो जाए सद धर्मा विलय प्रयां अगर हम प्रेम धर्म के पालन करने वाले हैं तो अन्य धर्मों का त्याग हो ही जाता है भगवान कह रहे हैं तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा माता-पिता बंधु परिवार नाना प्रकार के कितने लोक धर्म है यदि आप विरक्त है भगवत मार्ग के पथिक है तो ऐसे सत धर्मों का भी त्याग कर देना चाहिए सर्व धर्मामम एकम शरणम ब्रज अहम तवाम सर्व पापे मोक्ष स्याम मा सुच मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त करके परम पवित्र कर दूंगा केवल तुम मेरी शरण में हो जाओ सब धर्मों का त्याग करके तो सद धर्मा विलय प्रयां सततम और सर्व निर्भरता बहुत लोग तिरस्कार करते हैं जिनमें आसुरी प्रवृति हो होती है वह संतों की भागवत चेष्टा हों का विरोध करते हैं स्वाभाविक संतों का तो किसी से विरोध नहीं होता स्वाभाविक विरोध उनके हृदय में प्रकट होता है यह उनका स्वभाव होता है जहां तनिक भी आसुरी प्रवृत्ति होगी तो संतों की मंगलमय चेष्टा होती है नाम कीर्तन करना भगवत कथा वार्ता करना तो
उनका जलता है और उस जलन में वह संतों का विरोध करते हैं संतों का तिरस्कार करते हैं जो आसुरी प्रवृत्ति होती है उसको विरोध अच्छा लगता है श्रीपाद कह रहे हैं सततम सर्वस्य निर्भरता तो यदि कोई अपमान करे तिरस्कार करे तो उसे सहना झुक जाना हार जाना यह हमारा धर्म है भ्रष्टाचारा सब संसारा धर्म सुने नहीं काना कलिकाल बिहाल किए मनुजा नहीं माने को अनुजा तनुजा अभी समय आएगा आगे देख लो अभी कल्याण कर लो अपना भजन करके नहीं आगे ना सत्संग मिलेगा और ना भगवत चर्चा मिलेगी व्यापार सत्संग बना लिया गया उपदेश व्यापार बना लिया गया जो जो जो जो धीरे-धीरे सत्य वस्तु का अपहरण होता चला जा रहा और जहा सत्य वस्तु होती उसका विरोध होता है उनके द्वारा किए हुए अपमान और प्रतिकूलता को आनंद पूर्वक सह लेना इस श्रीपाद प्रभु नंद जी कहते हैं सर्व चर भरता सब लोग मिलकर के यदि निंदा करें सब लोग मिलकर तिरस्कार करें तो भी अपने मार्ग में स्थित रहे कभी विचलित ना हो आधि बाहर दवी प्रकृति के द्वारा जो कष्ट मिलता है उसे आदि कहते हैं सर्दी है गर्मी
है प्रतिकूलता है तिरस्कार है निंदा है य सब आदि के अंतर्गत आते हैं और व्याधि शरीर के रोग के अंतर्गत आते हैं इस मार्ग के उपासक को बहुत परिपक्व रहना चाहिए जाति का अभिमान नहीं प्राणों का मोह नहीं धन सुख की आशा नहीं सुय प्रतिष्ठा इसको मिटा दे और क रहे सद धर्मों का त्याग करके सत धर्मों का त्याग करके भागवत धर्म प्रेम धर्म स्वीकार करें और कोई अपमान करे तिरस्कार करे सब मिलकर निंदा करें तो भी विचलित ना हो अपने मार्ग में चले और आधि दैवी आपदा सर्दी बरसात प्रतिकूलता तिरस्कार यह जब मिले तो इनको चुपचाप सहो और व्याधि शरीर के रोग आदि जब आवे तो भी इनको यह परमार्थ बहुत कठोर है बहुत कठोर है तब हृदय द्रवित होकर प्रियालाल की तरफ बहता पहले इन कठोर नियमों का पालन करें व्याधि सतन सैकड़ों रोग हो जाए तो चुपचाप उनको सहे रयत वपु लुप्त प्रतिकार ता कोई प्रतिकार ना करे इनका विरोध ना करे तुम्हारा विरोध हो रहा है उसे सह जाओ शरीर में है उसको सह जाओ बाहर से आपदा र उसको सह जाओ कोई अपमान निंदा तिरस्कार चुपचाप सह जाओ और
सहना बहुत कठिन है सहाय स साधु ऐसे सामर्थ शली महात्मा रहे हैं पर पिट गए हैं पंडित राम कृष्ण बाबा के माथे पर डंडा मारा कि हलवा खवा बोले नहीं है तो माथे पर सह गए सहना बहुत जरूरी है इस मार्ग में प्रेम मार्ग में तो सहना बहुत जरूरी है अगर जो जितना सह गया उतना ही वह महान प्रियालाल का कृपा पात्र बन जाएगा इसीलिए कह रहे जाति को मिटा दो प्राणों का मोह मिटा दो धन के द्वारा प्राप्त सुखों का त्याग कर दो मान प्रतिष्ठा का त्याग कर दो सद धर्मों का त्याग कर इष्ट में पूर्ण अनन्य हो जाओ यदि सब लोग मिलकर तुम्हारी निंदा करें अपमान करें तो उसे सह जाओ आधि को सह जाओ व्याधि को सह जाओ और पूरे जीवन किसी का प्रतिकार मत करो ऐसी व्यवस्था मत करो अपने बल का प्रयोग मत करो कि जिससे तुम्हारा विरोध बंद हो जाए नहीं और विरोध होने दो और उसको सहो जितना स होगे उतने महान बनते चले जाओगे रक्षति संसार भया सदोष मप शेष देह भद वंदम वृंदावन मिति तेन प्रणम तनो म काननम कि मप चाहे जितना दोष युक्त प्राणी हो एक अपराध से बच जाए केवल वैष्णव
अपराध से तो श्री धाम वृंदावन उसे प्रिया प्रीतम की प्राप्ति करा देता है रक्षत संसार भया सदोष दोष युक्त है वृंदावन वास करता है पर वैष्णव संत जनों के चरणों में कोई अपराध नहीं करता बस एक अपराध संत जनों का कोई अपराध नहीं करता तो श्री धाम वृंदावन उसे निश्चित प्रिया प्रीतम की प्राप्ति करा देगा वृंदावन मिति तेन प्रितम तनम कानम किम जो वृंदावन का आश्रय लिए है प्रत है तो श्री धाम वृंदावन चाहे जितना वह दोषी हो उसे परमानंद की प्राप्ति करा देगा यदि एक अपराध ना
बने कभी वैष्णव अपराध ना बने संत अपराध ना बने श्री सीताराम ओमकार नाथ जी महाराज बहुत सुंदर नाम प्रेमी महात्मा नाम ही वह साधन है केवल नाम को पकड़ ले तो संपूर्ण भक्ति हृदय में प्रकाशित हो जाए मान लो कलयुग है और कोई साधना चलने वाली नहीं है 10 पाच दिन भले कुछ चला इसके बाद फिर वही आ जाओगे अगर आपको उन्नति प्राप्त करनी अध्यात्म उन्नति तो नाम को पकड़ लो जो गुरु प्रदत नाम है बार-बार नाम जप करो उसी से सब हो जाएगा सीताराम दास जी महाराज कह रहे नाम ही वह साधन है जिसे पकड़ लेने से संपूर्ण भक्ति प्राप्त होती है सिर्फ सिर्फ नाम लेने से कल पीड़ित जीवों को मुक्ति मिल जाती है केवल इसी कारण वस सभी लोग कलयुग को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं कि जो बड़ी-बड़ी साधं से पदवी प्राप्त नहीं होती कलयुग में केवल नाम जप से प्राप्त हो जाती है अन्य युग के बड़े-बड़े महापुरुष कलयुग में जन्म लेने की इच्छा रखते हैं जो लोग नाम का आश्रय लेते हैं भगवान को नैवेद्य लगाकर पाते हैं और अपने आचरण ठीक रखते हैं वह बहुत जल्दी जीवन मुक्त हो जाते
हैं समझिए जो लोग नाम जप करते हैं भगवान को भोग लगा के ही प्रसाद पाते हैं इतने से ही उनके आचरण तो पवित्र हो ही जाएंगे क्योंकि आहार पवित्र और नाम जप है बोले निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी सीताराम दास जी महाराज कह रहे बिना भगवान को भोग लगाए कुछ खाओ मती शुद्ध सात्विक आहार भगवत अर्पित आहार और नाम जप इसी से हो जाएगा दो बातें शुद्ध सात्विक भगवत अर्पित आहार और नाम जप इससे आचरण भी पवित्र हो जाएंगे क्योंकि जब आहार पवित्र है और नाम जप से बुद्धि पवित्र है तो सब पवित्र हो जाता है जो व्यक्ति सदैव नाम स्मरण करता है और पराई माताओं बहनों की तरफ गंदी दृष्टि नहीं रखता पवित्र भोजन करता है उचित ब्रह्मचर्य का पालन करता है व निश्चित परमानंद स्वरूप भगवान का साक्षात्कार कर लेता है प्राण प्रयाण पाथेय संसार व्याधि भे स जम दुख शोक परित्राण श्री रामेर दवम हरि कृष्ण राधा राम ये जो दो अक्षरों का भगवान का नाम है शरीर रहते यहां सुख प्रदान करेगा और शरीर छूटने के बाद यह प्राण पाथे है जो हमारा रास्ता है शरीर छूटने के बाद
उसमें सुख प्रदान करते हुए भगवान के धाम तक पहुंचाने की महिमा नाम में है संसार रूपी रोग की अचूक औषधि है नाम जास नाम भव भेषज भव भेषज संसार रूपी रोग की अचूक औषधि और दुख शोक परित्राण दुख से शोक से रक्षा कर लेने की सामर्थ्य केवल नाम में है देखो सब दुखी है जो भगवान से विमुख है अगर दुख से बचना है शोक से बचना है तो भगवान का नाम स्वयं जपो यह जब तक अपनी जिव्या से नहीं जपोगे तब तक तुम्हारा वास्तविक शोक दूर नहीं होगा दुख दूर नहीं होगा और इसमें क्या मेहनत लगती
है राधा राधा राधा राधा शोक दुख इनसे सदैव सदैव के लिए छुटकारा सब लोग चाहते हैं कि कभी सखत ना हो कभी दुखित ना हो लेकिन ऐसा चाहते हैं कि हम कुछ ले दे के हमारी ऐसी स्थिति हो जाए कि मैं शोख और दुख से बच जाऊं तो कदापि नहीं वास्तविक शोक और दुख से बचने का उपाय कि अपनी जिव्या से नाम जप करो जब आप नाम जप करोगे तो शोक दुख परित्राण ये दो अक्षर राधा राधा ये दो अक्षर हरि हरि ये दो र कृष्ण कृष्ण ये दो अक्षर राम राम ये सब आपके दुख और शोक का नाश कर देंगे और भव समुद्र से आपकी रक्षा कर लेंगे देह त्याग के पश्चात जो नाम जप नहीं करता तो यमदूत मारते हुए ले जाते हैं मार कोड़ों की मार से अब जिसने कभी यहां पौला नहीं खोला पानी नहीं पिलाया किसी को भोजन नहीं पाया रास्त मार मार मार के व प्यास से व्याकुल है तो एक बूंद पानी नहीं मिलेगा क्योंकि तुमने कभी पिलाया ही नहीं किसी को भूख से व्याकुल है कभी भोजन नहीं पवाया धूप लग रही कभी तुमने छत्र दान नहीं किया नीचे कंकड़ कांटे और तपती हुई बालू जैसी भूमि तुमने कभी पादुका दान
नहीं किया शरीर में बड़े तीक्षण वायु लग रही कभी वस्त्र दान नहीं किया यह मनुष्य जीवन मिला है बहुत सुख प्राप्त के लिए खूब धर्म पूर्वक मेहनत करो अपनी चार रोटी में से एक रोटी किसी को दे दो वह तुम्हारे लिए बहुत बड़ा काम करेगी तो जो परलोक में महायात्रा के समय सुख प्रदान करने वाला है वह नाम है अगर यहां से नाम जप के नहीं गए तो दुर्गति पक्की और नाम जप करके गए तो बहुत सुविधा पूर्वक अगर ऐसे पाप बने हैं कि तुम्हें नरक भी जाना पड़ेगा नाम धन जपने वाला एक तो नरक
जाएगा नहीं अगर कहीं ऐसे बड़े पाप बन गए हैं तो वहां सुविधा भी मिलेगी उसको बहुत जल्दी मुक्त हो जाएगा नार की गति से एक तो जाएगा नहीं अगर वह कहीं प्रमाद वस नाम के बल से पाप करता रहा तब तो जाना पड़ेगा क्योंकि नाम जापक जो नरक जाएगा तो व वही जाएगा जो नाम के बल से पाप करता रहा है कि अरे राम राम शाम के कह लेंगे दिन भर खूब पाप करो तो नाम के बल से जो पाप किया जाता है व फिर नरक में ही धुलाई होती उसकी अबलो नसानी अबना न सयो आज तक पाप की आप नहीं करूंगा और नाम जप करो तब तो पाप तुम्हारे सब नष्ट हो जाएंगे लेकिन नाम जप भी कर रहे हो खूब पाप भी कर रहे हो तो वह पाप नरक में जाकर तुम्हें धोना पड़ेगा वहां जो दंड मिलेगा उससे तुम्हारा पाप का प्रश्चित होगा लोक में किसी भी यात्रा से पहले तु उसकी कितनी सूक्ष्म तैयारी करते हो पूरी सतर्कता से फिर शरीर छूटने के बाद यात्रा की तैयारी क्यों नहीं करते हो कहीं जाना हो तो बड़ी तैयारी करते हो रास्ते की तैयारी वहां कहां जाना है सब व्यवस्था और शरीर छूटने के बाद तुम्हें कहां
जाना है इसकी तुम्हें फिक्र नहीं शरीर छूटने के बाद यात्रा में जो आपको खानपान व्यवस्था चाहिए उसकी फिक्र नहीं तो यह नाम है पाथ शरीर टने के बाद नाम तुम्हारा साथी होगा तुम नाम ले लो आज तुम्हारी देह में प्राण है पता नहीं कल रहे कि ना रहे कल का भरोसा नहीं है आज अभी इसी क्षण भगवन नाम उच्चारण करो एक दिन ऐसा आएगा कि तुम जीवित तो रहोगे लेकिन नाम लेने लायक नहीं रहोगे अभी नाम ले लो हाथ पैर चल रहे हैं बुद्धि काम कर रही इंद्रिया काम कर रही है नहीं शिथिल बेहोश स्थिति में वर्षों व्यतीत हो जाते हैं चारपाई में पड़े भगवन नाम उच्चारण करने की हिम्मत नहीं रहती भाव नहीं रहता सामर्थ्य नहीं रहती कल का भरोसा नहीं तुम्हारे जीवन में एक दिन ऐसा आएगा कि तुम हाथ पैर नहीं हिला सकते अपनी जिव्या हिलाकर राम राम कृष्ण कृष्ण राधा राधा नहीं बोल सकते तुम्हारी दृष्टि क्षीण हो जाएगी आंखें देख नहीं पाएंगी और तुम्हारी जिव्या बोल नहीं पाएगी इसलिए अभी नाम ले लो अभी तुम बोल सकते हो अभी तुम देख सकते हो तो तुम्हारा जीवन मंगलमय हो जाए
इसलिए भगवान का नाम जप करो भगवान के नाम में अपार सामर्थ्य है जैसे शब्द उच्चारण किया राधा यह सीधे गया और भगवान के पास जमा हो गया अब एक बार नाम लिया है तो जब रजिस्टर खोला जाएगा तो एक बार नाम है इसका कितना पुण्य है कितना लाभ है कितना महिमा है कि आप नरक नहीं जाओगे एक बार नाम से एक बार जिन नाम ली हित सो होय अति दीन ता को संग न छाण ही ध्रुव अपनो कर लीन प्राण तुम्हारी देह को छोड़कर जब जाएगा तो प्राण हीन देह को तो यही भस्म कर दिया जाता है या फेंक दिया जाए
तो शगा कुत्ते खा जाते हैं गाड़ दिया जाए तो कीड़े बन जाते हैं पर प्राण प्राण तो गए अब पंचभूत देह तो यहां नष्ट हो गई और प्राण के जाने के लिए तुमने कोई तैयारी नहीं की तो बड़ा कष्ट पाते हैं प्राण प्राणों की तैयारी कर लो जब प्राण छूटे उसके बाद की तैयारी कर ले तो उसे मरने का भय नहीं रह जाता हर शवास प्राणों का काम है शवास का आना और जा ना स्वासो छ वास कहते इसे हर स्वास में आने जाने में यदि नाम जप कर रहे हो प्रतिपल प्रतिक्षण प्रतिदिन तो तुम समझ लो अपनी महायात्रा के लिए सब सुविधा जमा कर रहे हो यदि तुम हर स्वास नाम जप कर रहे हो तो महायात्रा जब शरीर छूटेगा तो उसके लिए तुम सुविधा कर रहे हो अब अधिक समय नहीं बचा आज से ही अपनी हर स्वास में हरि हरि राधा राधा यह प्राण प्रयाण का समय उत्तम पाथे है नाम इकट्ठा कर लो लेकिन समझ में नहीं आता जो साथ नहीं जाना जो आगे सुख नहीं मिलेगा तुम्हारी इस कमाई का यही रह जाएगा उसमें तो जी जान लगाए हुए हो लेकिन जो तुम्हें आखिरी में सुख प्रदान करेगा उसके लिए तुम शांत हो उसके
लिए कोई उपाय नहीं कर रहे यह तुम्हारा सब सामान तुम्हारे स्वजन संबंधी तुम्हारे स्त्री पुत्र तुम्हारा घर द्वार यह कुछ भी अंतिम समय काम नहीं आएगा भगवत नाम अंतिम श्वास के बाद तुम्हारा काम शुरू करेगा भगवन नाम महा सुख प्रदान करेगा यात्रा बड़ी सुखमय होगी और लक्ष्य भगवत प्राप्ति निश्चित प्राप्त हो जाएगा यदि नाम जप कर रहे हो शरीर छूटने के बाद तुम्हारा कोई साथी नहीं कोई संपत्ति नहीं कोई घर नहीं कोई मित्र नहीं केवल नाम ही तुम्हारा मित्र होगा अब यार मेरी बात मान जाओ चुप मत बैठो नाम ले लो हम तुम्हें पुराण सांख्य उपनिषद वेद वेदांत सब शास्त्रों से पुष्टि करके बताया बाबा कह रहे हैं सीताराम दास जी महाराज अब तो नाम जप कर लो यार अब तो नाम को पकड़ लो एक रास्ता पकड़ लो कि आज से मुझे केवल नाम जप करना है बहुत शास्त्रों का ज्ञान है नाम जप नहीं तो बेकार है बहुत सत्संग सुन रहे हो भजन में प्रीति नहीं हो तो सत्संग का लाभ क्या मिल रहा है शास्त्र अनंत है कहां तक पढ़ोगे मार्ग अनंत है कितना जानकारी लोगे अब चुपचाप बैठ
जाओ बहुत जान सब शास्त्रों का सार और सब साधना हों का सार नाम जप है खूब नाम जप करो जो तत्व ज्ञान है व इसी नाम जप से प्राप्त हो जाएगा जो कलयुग की कुचालक तुम्हें बचा लेगा किम करिश्य सांखे किम योग नर नायक मुक्ति मिच्छा स राजेंद्र कुरु गोविंद कीर्तनम सांख्य शास्त्र को खूब ज्ञाता हो उससे क्या हो जाएगा किम प्रयोजनमूलक की करो मुक्ति प्रार्थना करके तुम्हें वर्ण करना चाहेगी हाथ जोड़कर मुक्ति आ जाएगी यदि नाम जप कर रहे हो यदि तुमने सगुण दर्शन की इच्छा की तो नाम जप करो प्राण छूटने के समय तक भगवान के दर्शन हो जाएंगे उबो मत खूब नाम जप करो प्राण छूटते छूटते भगवान का साक्षात्कार हो जाएगा नाम इस कलयुग में सर्वश्रेष्ठ साधन है यह तो मैंने कई बार बताया देखो तत्क्षण मैंने नाम लेना प्रारंभ कर दिया तो हमारा उपदेश करना सार्थक हो जाएगा आज से तुमने नाम महिमा सुनी आज से खूब नाम जप करो हर क्षण नाम जप करो तो हमारा सत्संग करना सफल हो जाएगा संसार को अगर कोई उद्धार कर सकता है प्रकाशित कर सकता है तो भगवान का नाम हे
प्रीतम संसार में रोग शोक दुख नाना प्रकार के सब प्रपंच भरा हुआ है तुम केवल उरण करो भगवान का नाम इस सबसे दूर हो जाओगे संसार ऐसा नहीं जैसा तुम देख रहे हो संसार बहुत सुंदर है भगवान का स्वरूप है लेकिन नाम जप करोगे तब य अनुभव में आएगा भोगी निरंतर नाम जप करने का प्रयास करें तो रोग से मुक्त हो जाए प्रलाप करने से कुछ नहीं होना कि मैं दुखी हूं मैं बहुत परेशान हूं मैं ऐसा बस मेरी आखरी प्रार्थना है रुपया मान सम्मान सफलता विजय स्वास्थ और आज्ञाकारी नौकर सब कुछ
मिल गया है तुम्हें पर नाम जप नहीं तो सब बेकार हो जाएगा तुम्हारा इसलिए तुम नाम जप करो चाहे राम बोलो चाहे हरि बोलो चाहे कृष्ण बोलो चाहे काली बोलो चाहे दुर्गा बोलो चाहे राधा बोलो जो तुम्हें प्रिय होए खूब नाम जप करो चतुरा पंचानन सनातन व्यास वाल्मीकि नारद इन सबके द्वारा निर्णय किया गया है कि नाम एक औषधि है जो तुम्हें संसार रोग से बचा लेगी ब्रह्मा जी चार मुखो से नाम जप करते हैं भगवान शिव पांच मुखो से नाम जप करते हैं भगवान शेष 2000 जिव्या से नाम जप करते
हैं और सरस्वती जी की णा तो झन काती ही रहती भगवत महिमा और बड़े-बड़े महात्मा व्यास वाल्मीकि नारद वशिष्टा ये सब भगवन नाम प्रेमी है अमोग औषधि बताया है भगवन नाम को एकदम तुम निहाल हो जाओगे आनंदित हो जाओगे यदि नाम जप किया अनेक भौ रोग पीड़ित स्वस्थ हो गए अर्थात भव समुद्र से पार हो गए खुद नाम जप करो और चार को और करवाओ जो तुम्हारे रिश्ते नातेदार हैं पुत्र आदि हैं परिवार के जन उनको प्रेरणा करो प्यार से प्रेरणा करो शास्त्र सम्मत प्रेरणा करो कि वह भी नाम जप करें आप जप करो और दूसरों से जप कराओ तो बहुत जल्दी तुम्हारा मंगल हो जाएगा चलते हैं श्रीमद् भागवत महापुराण भगवान श्री कृष्ण चंद्र जुग से उद्धव जी प्रश्न करते हैं और भगवान उपदेश देते हैं भगवान श्री कृष्ण चंद जू कहते हैं प्रिय उद्धव सतोगुण रजोगुण तमोगुण ये तीनों प्रकृति के गुण है आत्मा के नहीं सतोगुण के द्वारा रज और तम इन दो गुणों पर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिए तदनंतर सतोगुण की शांत वृत्ति के द्वारा उसकी दया आधि वृत्तियों को भी शांत कर देना चाहिए जब
सतोगुण की वृद्धि होती है तभी जीव को मेरे भक्ति रूप स्वधर्म की प्राप्ति होती है निरंतर सतोगुण वस्तुओं का सेवन करने से सतोगुण की वृद्धि होती है सतोगुण के द्वारा रजोगुण तमोगुण को नाश कर दो सतोगुण से ही भगवान की भक्ति होती है और सतोगुण वस्तुओं का सेवन करने से सतोगुण होता है भोजन अल्पाहार और ज्यादा पकवान और यह सब रजोगुण भोजन हो जाएगा थोड़ा भोजन पाओ सात्विक भोजन सात्विक जल सात्त्विक ग्रंथ सात्विक चिंतन सात्विक संग तो सतोगुण बढ़ेगा अगर राजसिक तामसिक है तो रजोगुण तमोगुण बढ़ेगा जब सतोगुण बढ़ता है तो मेरे भक्ति रूप स्वधर्म में प्रवृत्ति होने लगती है जिस धर्म के पालन से सतोगुण की वृद्धि हो वही सबसे श्रेष्ठ है धर्म रजोगुण और तमोगुण को जो नष्ट कर दे और जब तमोगुण रजोगुण नष्ट हो जाता है तो अधर्म उसके शरीर से नहीं होता अधर्म होता है रजोगुण तमोगुण से सतोगुण महापुरुषों के शरीर से कभी अधर्म पापा आचरण नहीं होता शास्त्र जल आसपास का वातावरण समय देश कर्म जन्म ध्यान मंत्र संस्कार ये अगर सात्विक हो तो बहुत जल्दी
सतोगुण आ जाए शास्त्र सात्विक हो पे पदार्थ सात्विक हो आसपास का वातावरण सात्विक हो हम जिस देश में रह रहे व सात्विक हो समय सात्विक हो कर्म सात्विक हो जन्म सात्विक हो ध्यान सात्विक हो मंत्र सात्विक हो संस्कार तो फिर सतोगुण आ जाएगा अगर रजोगुण है तो फिर भोग वासना तमोगुण है तो निद्रा आलस्य प्रमाण इनमें से शास्त्रज्ञ महात्मा जिनकी प्रशंसा सात्विक है महात्मा जन जिनको रोकते हैं वे राजसिक तामसिक है जब तक अपनी आत्मा का साक्षात्कार ना हो जाए स्थूल सूक्ष्म कारण शरीर से वैराग्य ना हो जाए तब तक उपासक को चाहिए कि सतोगुण वृद्धि के लिए सात्विक शास्त्र भोजन आदि का सेवन करें क्योंकि उससे धर्म की वृद्धि होती है और धर्म की वृद्धि से अंत शुद्ध होता है और अंतःकरण शुद्ध होने से आत्म ज्ञान होता है जैसे वासों की रगड़ से आग पैदा होती है और सारे वन को जलाकर शांत हो जाती है वैसे ही यह शरीर गुणों के वैषम्य से उत्पन्न हुआ है विचार द्वारा मंथन करने पर इसमें ज्ञानगंज है उद्धव जी ने कहा भगवन प्राया मनुष्य जितने भी वह इस
बात को जानते हैं कि विषय भोग विपत्तियों का घर है फिर भी वे कुत्ते गधे और बकरे के समान दुख सहन करके भी उन्हीं विषयों को भोगते रहते इसका क्या कारण है भगवान श्री कृष्ण ने कहा प्रिय उद्धव यह भोग इसलिए होता है क् अज्ञान वश अपने को जीव मान लिया अपने को शरीर मान लिया इसलिए जीव जब अज्ञान वस अपने स्वरूप को भूलकर हृदय से सूक्ष्म स्थूल आदि शरीरों में अहंकार कर बैठता है जो कि सर्वथा भ्रम है तब उसका सत्व प्रधान मन घोर रजोगुण की ओर झुक जाता है उससे व्याप्त हो जाता है बस जहां मन में रजोगुण की प्रधानता हुई कि उसमें संकल्प विकल्प का ताता बंध जाता है अब वो विषयों का चिंतन करने लगता है और अपनी दुर्बुद्धि के कारण काम के फंदे में फस जाता है जिससे फिर छुटकारा होना बहुत कठिन होता है य काम वासना इतनी बुरी है कि आदमी को एक बार फसा ले तो फिर निकल पाना बहुत कठिन होता है अब वह जो कर्म करता है वो कामना के वशीभूत होकर करता है इंद्रियों के अधीन हो गया जबकि यह जानता है कि मैं जो कर्म कर रहा हूं उसका फल दुख मिलेगा
क्योंकि पापा आचरण का फल दुख है पर वह रजोगुण से इतना मोहित होता है कि वह जानबूझ कर के भी अपने को नहीं बचा पाता और काम क्रीड़ा में काम की वेदना से युक्त होकर व पापा आचरण करता है यद्यपि यह बात तो कभी-कभी विवेकी पुरुषों में भी जागृत हो जाती है काम आदि की भावना पर वह रजोगुण और तमोगुण के वेग से विक्षिप्त नहीं होते उनकी दोष दृष्टि बनी रहती है इसलिए बड़ी सावधानी से अपने चित्त को एकाग्र करके अपने को बचा लेते हैं कामा आदि की भावना तो विवेकी पुरुषों के अंदर
भी आ जाती है पर उनकी दोष दृष्टि बनी रहती है इसलिए विवेक के द्वारा अपने आप को बचा लेते हैं साधक को चाहिए आसन पर बैठने का अभ्यास जरूर करें बहुत जरूरी है आसनों पर बैठना इससे इंद्रिय और मन निग्रह में बड़ी सहायता मिलती है जिनका शरीर स्वस्थ है जवान है आसन में बैठना सीखो मे दंड सीधी जवान हो ब्रह्मचारी हो साधक हो बिल्कुल सीधे सुखासन में बैठो तो सीधे पद्मासन और सिद्धासन में तो सीधे ही बैठा जाता है भगवान आदेश कर रहे हैं कि काम विजय प्रा प्राप्त करने के लिए
साधक को आसन पर बैठना चाहिए कुछ घंटों का तो नियम ले लेना चाहिए कि आसन पर व्यतीत करेंगे नाम जप मंत्र जप करते हुए चाहे पद्मासन लगाओ चाहे सिद्धासन लगाओ चाहे सुखासन और प्राण वायु पर विजय प्राप्त करें अल्पाहार और प्राण संयम दो तीन प्राणायाम तो बताए ही थे बाह्य कुंभक आंतरिक कुंभक रेचक पूरा कुंभक साधक को चाहिए कि आसन पर बैठना सीधी मेरुदंड से और वायु को जीते प्राण वा इससे बहुत लाभ मिलता है एक नशा चढ़ता है मंत्र जप का 9090 प्राणायाम करते थे 90 पसीना पसीना ऐसी सर्दी में हो जाते थे और एकदम साय मचता था दिमाग में मंत्र की एकदम धूम मचती थी उसे करना चाहिए 15 20 मिनट प्राणायाम हम तो लल चाते हैं बैठने को ही नहीं मिलता किडनी के कारण बहुत देर नहीं बैठ सकते 10 मिनट बैठो फिर थोड़ा टहल फिर बैठो फिर लेटो ऐसे तुम्हारा सौभाग्य कि तुम दो घंटे तीन घंटे एक आसन पर बैठ सकते हो अपनी प्राण वायु का संशोधन कर सकते हो बड़ी सावधानी से आसन में बैठकर प्राण वायु पर विजय प्राप्त करके अपना मन धीरे-धीरे मुझ में लगा गावे बहुत
ध्यान से सुनो यदि असफलता दिखाई दे तो अभ्यास ना छोड़े असफलता देखकर तनी कुबे नहीं बल्कि और उत्साह के साथ अभ्यास बढ़ावे प्रिय उद्धव मेरे शिष्य सनका परम ऋषियों ने योग का यही स्वरूप बताया है कि साधक अपने मन को सब ओर से खींचकर विराट आद में नहीं साक्षा मुझ में ही पूर्ण रूप से लगा दे तो उद्धव जी ने कहा कि हे श्री कृष्ण आपने जिस समय जिस रूप से सन काद परम ऋषियों को योग का उपदेश किया था उस रूप को मैं जानना चाहता हूं भगवान श्री कृष्ण ने कहा प्रिय उद्धव सनक सनन सनातन सनत कुमार ये परम ऋषि ब्रह्मा जी के मन से प्रकट हुए हैं मानस पुत्र है सनक सनन सनातन सनत कुमार उन्होंने एक बार अपने पिता ब्रह्मा जी से पूछा योग की सूक्ष्म और अंतिम सीमा क्या है योग की सूक्ष्म कम अंतिम सीमा क्या है सन काद परम ऋषियों के पूछने में ब्रह्मा जी शत बैठे फिर स काद ने कहा प्रभु चित्त गुणों में विषयों में ही लगा रहता है बहुत सुंदर बात है पर अध्यात्म की है हमारा चित्त सदैव माया के गुणों से प्रभावित है सतोगुण रजोगुण तमोगुण से और ये
विषयों का चिंतन करता रहता है छोड़ दो देखो अभी विषय चिंतन करेगा यह तीनों गुण और विषय चिंतन चित्त की एक एकक वृत्ति में समा गए हैं चित्त और गुण आपस में मिले जुले ही रहते हैं ऐसी स्थिति में जो पुरुष इस संसार सागर से पार होकर मुक्ति पद प्राप्त करना चाहता है वह चित्त को विषयों से कैसे अलग करें भगवान श्री कृष्ण ने कहा प्रिय उद्धव यद्यपि ब्रह्मा जी सब देवताओं के शिरोमणि है स्वयंभू है और प्राणियों के जन्मदाता है फिर भी सन काद परम ऋषियों के इस प्रकार पूछने
पर वह बहुत ध्यान करते रहे लेकिन लक्ष्य नहीं जान पाए कि योग का सूक्ष्म और अंतिम स्वरूप क्या है चित्त विषय में घुसे रहते हैं विषय ऐसा लगता है कि हटेंगे ही नहीं तो कोई उपाय है कि चित्त को से हटाया जा सके दो प्रश्न है योग की सूक्ष्म कम और अंतिम अवस्था क्या है और विषय चित्त में ऐसे घुसे हैं कि एक एक वृत्ति विषय मेंही है तो कैसे चित्त को निर्विक करें ब्रह्मा जी ने बड़ा ध्यान किया लेकिन वह प्रश्न नहीं समझ पाए उत्तर की तो बात जाने दो प्रश्न नहीं समझ पाए क्यों क्योंकि उनकी बुद्धि संसार में प्रवत थी कर्म प्रवत थी कर्म प्रवत होने के कारण व प्रश्न ही नहीं समझ पाए जब ब्रह्मा जी प्रश्न का भाव नहीं समझे उत्तर नहीं दिए तब ब्रह्मा जी ने भगवान का चिंतन किया भगवान का चिंतन किया कि हे भगवान मेरे इन पुत्रों को प्रश्न का उत्तर आप दीजिए तो उसी समय सभा में देखा एक हंस प्रकट हुआ श्री भगवान ही थे हंस का रूप धारण करके सामने प्रकट हुए मुझे देखकर सनका ब्रह्मा जी को आगे करके मुझ हंस स्वरूप के पास आए भगवान श्री कृष्ण
उद्धव जी से कह रहे मेरे चरणों की वंदना की फिर हाथ जोड़कर ब्रह्मा जी और सनका ने पूछा कि आप कौन है प्रिय उद्धव सन काद परमार्थ तत्व के जिज्ञासु थे जब उन्होंने पूछा कि आप कौन है तो भगवान ने उत्तर दिया भगवान ने कहा ब्रह्म ऋषियों यदि परमार्थ रूप वस्तु नानाव से रहित है परमार्थ वस्तु में नानाव नहीं एक ब्रह्म वही आत्मा है तो फिर आपका प्रश्न कैसे बन सकता है कि तुम कौन हो घोर अज्ञान की बात है अथवा मैं उत्तर देने के लिए बोलू तो किस जाति से किस गुण से किस क्रिया से किस संबंध से आपको उत्तर दूं क्योंकि देवता मनुष्य पशु पक्षी आदि सभी शरीर पंच भूतों से बने हैं तो अभिन्न है व्यवहार रूप से देखो तो अभिन्न है क्योंकि सबके शरीर पंच भूतों से बने किसी अलग से नहीं और अध्यात्म रूप से देखो तो अभिन्न क्योंकि सबके हृदय में आत्मा है तो आपका प्रश्न कैसे बनता कि आप कौन है इसका मतलब है कि यह आपका प्रश्न केवल वाणी का व्यवहार है आपने विचार पूर्वक प्रश्न नहीं किया इसलिए निरर्थक हो गया आपका प्रश्न बहुत सुंदर सब शरीर पंच
भूतों से बने ब्रह्मा जी ने और सनका दी ने पूछा जब भगवान हं स्वरूप के आप कौन है तो उनका पंच भूतों के कारण सब शरीर अभिन्न तो बनता नहीं पूछना व आत्मा एक है सब रूपों में प्रकाशित हो रही तो पूछना नहीं बनता आपका व्यर्थ है प्रश्न यह केवल वाणी का विकार मात्र है मन से वाणी से दृष्टि से इंद्रियों से जो कुछ ग्रहण किया जाता है इतना समझ सब मैं ही हूं मुझसे भिन्न और कुछ नहीं है यह सिद्धांत आप लोग तत्व विचार के द्वारा समझ लीजिए पुत्रों दूसरा उत्तर योग की अंतिम स्थिति क्या है पूछा तो उसका बताया क्या मैं ही मैं हूं सर्वत्र भगवान का दर्शन होना योग की अंतिम स्थिति है दूसरा उत्तर कि चित्त में विषय घुसे हुए हैं चित्त विषय हो गया है यह कैसे परम पवित्र वासुदेवा आकार हो बोले जब चिंतन हम करते हैं विषयों का तो गाढ़ चिंतन होने से वह सब विषय चिंतन चित्त में अंकित हो जाता है सत्य बात है अब आप भजन करने बैठोगे तो वही विषय चलेगा वही गंदी बातें वही संसार क्योंकि वही तुम्हारे अंदर भरा है विषय और चित्त दोनों ही मेरे
स्वरूप भूत जीव के देह है उपाधि है आत्मा का चित्त और विषय के साथ कोई संबंध नहीं है इसलिए बार-बार विषयों का सेवन करते रहने से जो चित्त विषयों में आसक्त हो जाता है वह विषय चित्त में प्रविष्ट हो जाते हैं इन दोनों का अपने वास्तविक से अभिन्न मुझ परमात्मा का साक्षात्कार करके त्याग देना चाहिए अर्थात हम भगवत आश्रित है अगर हमारा चित्त विषय चिंतन करता है तो उसे हटा हटा करके बार-बार विषयों से भगवान के नाम के रूप के लीला के गुणों के गुणगान में रखना चाहिए बहुत
सूक्ष्म विषय है भगवान का नाम गुण लीला चिंतन हो रहा है तो एक एक चित्तवृत्ति में जो विषय चिंतन है वह निकल जाए तभी भगवत प्राप्ति होगी विषय चिंतन न होने पावे शास्त्रों में हमने पढ़ा क्रिया उतनी बाधक नहीं जितना चिंतन बाधक है जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति यह तीनों अवस्थाएं सतोगुण रजोगुण तमोगुण के अनुसार होती है बुद्धि की वृतिया सच्चिदानंद का स्वभाव नहीं इन वृत्तियों का साक्षी होने के कारण जीव उन से विलक्षण है यह सिद्धांत श्रुति युक्ति और अनुभूति से युक्त है जब हमारी बुद्धि ठीक निर्णय नहीं कर पाती ऐसा लगता है संसार में सुख है तो खूब निरंतर चिंतन होता विषयों का अंदर से देखो अब हर वृति को राधा नाम से काटना है आपको राधा राधा अब वो अंदर से विषय चिंतन कर रहा है अंदर से विषय पूर्णा फेंक रहा है विषय संकल्प हर वृति काटनी जब एक एक वृत्ति भगवन में हो जाएगी उसी दिन भगवान का दर्शन हो जाएगा मुरारी पादा अर्पित चित्त वृत्ति एक एक वृति बुद्धि वृत्तियों के द्वारा होने वाला यही बंधन है आत्मा में त्रिगुण मय वृत्तियों
का दान करता हुआ जो हर अवस्था में नाम जप करता है और य अनुभव करता है एक ही आत्मा जो मेरे हृदय में वही सबके हृदय में है फिर बुद्धि के बंधन का परित्याग करके व विषय चिंतन छोड़ देता है बचा चित्त जब चित्त निर्विक हो गया बुद्धि का निर्णय हो गया कि परमात्मा में सुख है इस बात को जानकर वो घोर वैरागी हो जाता है अच्छा ही नहीं लगता संसार और वह अपने को सतोगुण रजोगुण तमोगुण से अलग तुरी अवस्था में देखता है और संसार की सारी चिंताएं छोड़ देता है भगवान के उपदेश का आशय है कि तुम्हें और कुछ समझ में आवे चाहे ना आवे हर वृत्ति को नाम से काटते रहो पवित्र भोग लगाकर भोजन पाओ और किसी माता बहन या गंदा आचरण ना करो जो भगवान हंस रूप से उपदेश कर रहे हैं वही आपके अनुभव में आ जाएगा बस अपने को बांध लो ज्यादा फैलाओ में मत फैलाओ देखो शास्त्र तो रोज सुनने को मिलेंगे नए-नए साधन मिलेंगे अपने को अन्य साधन में नहीं लगना मन बुद्धि चित्त इंद्रिया जितनी भी गंदी हो हमें चिंता नहीं करनी हमें नाम जप करना है हर नाम एक एक क्षण आपकी
चित्तवृत्ति को पवित्र कर रहा है अगर हम भगवद आशित होकर निरंतर नाम जप करें और भगवान की लीला कथा सुने लीला कथा गाएं और जो भी सामने आवे उसे भगवान का जन मानकर प्रणाम करें तो बहुत जल्दी हमारा हृदय निर्विकार हो जाएगा सतोगुण रजोगुण तमोगुण के परे त्रिगुणा स्थिति आ जाएगी जिस स्थिति में कभी भी कोई विचिता नहीं होती त्रिगुणा स्थिति में कभी कोई विचल नहीं होती कभी कोई विषय चिंतन ही नहीं होता देखो गोपी जन त्रिगुणा है तो वो कहना चाहती दही ले ले दही मुंह से निकल रहा है कोई बा ले ले कोई गोविंद ले ले कोई दामोदर ले ले इसलिए खूब नाम जप कीजिए त्रिगुण माया के पराभव से बचिए कोई भी खानपान गंदा ना कीजिए जिससे आपके हृदय में रजोगुण तमोगुण ना आवे सतोगुण बढ़ता रहे सतोगुण से भगवान की आराधना होती तत्व ज्ञान भी हो जाता है सतोगुण ही हमें सेवन करना चाहिए खानपान व्यवहार में भी शेष चर्चा की श्री राधा वल्लभ लाल की जय
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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