निष्ठा कैसी होनी चाहिए/ नाम महिमा पर दादू दयालजी के अमृत उपदेश / मन की अशुद्धियों का अंत कैसे करें ?
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदा वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हद मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वापयत परम शीतल माशया परम शीतल माशयाजे मोहि एसो वास ब्रज माही कैसे हम ब्रज में रहे हमारी रहनी कैसी होनी चाहिए गोरी सखी श्री जी से ऐसा मांग रहे हैं दीजे मोहि वास ब्रज माही जुगल नाम को भजन निरंतर जुगल नाम को भजन निरंतर और कदम बन छाही दीजिए मोहिसो वास ब्रज माही मुझे ब्रजवास मिले पर ऐसा निरंतर मेरी जिभ्या से युगल नाम चलता चाहिए राधा वल्लभ राधा वल्लभ राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान मुख नाम अगर कहीं वृंदावन की लताओं के नीचे बैठकर के नाम कीर्तन वाणी गायन का सौभाग्य कुछ क्षण भी मिले तो वृंदावन की लताएं आशीष देती हैं।
प्रिया प्रीतम की प्रीति का आशीष देती है। जैसे कोई राधा ऐसा उच्चारण करता है तो सुनकर के हृदय में लगता है क्या दे दूं इसको कैसे सुख पहुंचाऊं यह तो एक शुद्ध थोड़ी सी प्रीति गुरु कृपा से आचार्य कृपा से नाम यत किंचित जो अपार प्रीति में डूबी हुई लताएं हैं जिनके पत्ते पत्ते से राधा राधा निकलता है। उनको जब हम नाम कीर्तन सुनाते हैं, पद महिमा जो लीला गुण से भरी हुई है तो हमें आशीष देते हैं। तुम्हारे हृदय में युगल सरकार के प्रति अपार प्रेम प्रकाशित हो। पक्का मानिए।
यह लताएं सीधे प्रेम प्रकाशित करती है हृदय में। इसीलिए वृंदावन की लता सम कोटि कल्प तरुणाह रज की तुल वैुंठ नहीं और लोक की माही करोड़ों कल्पतरु समानता नहीं कर सकते वृंदावन की लता के ब्रजवासिन के जूठन टूका अरु यमुना को पानी रसिकन की सत्संगति दीजिए सुनबो रस भरी वाणी हे प्रियाजु ऐसी कृपा करो कि मुझे वृंदावन वास मिले ब्रजवास मिले निरंतर जब तक हमारे शरीर में चेतना है हम नाम जप करते हुए अपने श्वासों को व्यतीत करें कोई भी श्वास बिना नाम के ना हे प्रियाजु वृंदावन की लताओं का सेवन सेवा करने का सौभाग्य मिले और ब्रजवासियों की जूठन पाने को मिले।
उनके टूक पाने को मिले। यह बड़ा आंतरिक रहस्य है। ब्रजवासियों का एक टूक भी प्रिया प्रीतम की तरफ आकर्षित करने में समर्थ है। हरिराम व्यास जी ने कहा है भूख लगे वो मांग खाऊं गिनो ना साझ सवेरो ब्रजवासिन के भूख टूक और घर घर छाछ महरो एसो कब कर हो मन मेरो जब भूख लगे ब्रजवासियों की टूक मांगकर उदर में डाल लिए युगल नाम जपते हुए वृंदावन की लताओं का सेवन कर रहे यमुना जी का दर्शन यमुना जी के तट पर बैठकर लीलाओं का गायन यमुना जी का आचमन ये सब प्रिया प्रीतम के प्रेम को प्रदान करने वाला है।
व्यास रसिक तेई बड़े ब्रजते अनत न जाए वृंदावन के स्वपच लो जठन मांगन खाए यदि रसिकों की सभा में बड़े रसिक जो कहे जाते हैं तो वो कौन होते हैं बोले जिन्होंने निष्ठा ले ली है कि ब्रज चौरासी कोस से बाहर नहीं जाएंगे कुछ महापुरुष पुरुष तो ऐसे हैं जो श्री वृंदावन की सीमा को पार नहीं करते। व्यास रसिक तेई बड़े ब्रजते अनत न जाए। ब्रजवासी जितने हैं उनमें जाति पक्ष नहीं देखा जाता। ये भगवत पार्षद हैं। वृंदावन के स्वपच लो जूठन मांगे खाएं। स्वपच लो। ये आदेश है। बहुत बड़े महापुरुष हैं।
आचार्य हैं। कभी ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि ये अमुक वर्ण के हैं। यहां वर्ण नहीं है। यहां भगवत पार्षद है। भगवत धाम है। धाम में केवल भगवत कृपा पात्र जन ही रहते हैं। चाहे वो पशु हो, पक्षी हो, कीट हो, पतिंगा हो, लता हो, महात्मा हो, कोई गृहस्थ हो, कोई भी हो, सब कृपा पात्र कृपा पात्र में कोई वर्ण भाव नहीं देखा जाता। जाति भाव नहीं देखा जाता। जैसे लोहा तभी तक लोहा कहा जा सकता है जब तक पारस का स्पर्श नहीं हुआ। पारस का स्पर्श होते ही वह स्वर्ण हो जाता है। उसे लोहा नहीं कह सकते।
ऐसे ही परम वैष्णव धाम प्रियाजू का निज महल इसमें जो आता है उस श्री राधिका कृपा बिन सबके मनन अगम्य मन से भी नहीं सोच सकता कैसा होगा वृंदावन तो वह आ चुका है तो लाडली जी की अपार कृपा हुई है जब कृपा रूपी पारस मणि छू गई तो अब शरीर संबंधी जाति वर्ण आदि की भावना का त्याग कर देना चाहिए सब चिद स्वरूप है भगवत स्वरूप है भगवत पार पार्षद है ब्रजवासिन के जूठन टूका अरु यमुना को पानी रसिकन की सत्संगति दीजे सुनबो रस भरी बानी बड़ी कृपा भोरी सखी जो प्रियाजु से याचना कर रही है अपने को पता भी नहीं था।
मांगना भी नहीं आता था। जब महत्व जानते तब तो मांगते। बिना मांगे अन मांगे दे दिया श्री जी ने। मनुष्य शरीर में वृंदावन का आश्रय और वास और ब्रजवासियों के टूक अनमांगे दे दिया। यमुना रस रानी तो हमारी प्रिय सखी है। उनकी तो अपार कृपा है। हमारे यहां महारानी श्री लाडली जो है और रस रानी यमुना जी हैं। बाहर बोला जाता है यमुना पट रानी की जय। हमारे यहां रस रानी है। रस प्रदान करने वाली श्री जी की प्रिय सखी है। जब रसिकों की संगति मिल जाए तो समझ लेना चाहिए हमारा अंतिम जन्म है।
यदि समझ ठीक हो जाए और रसिकों की संगति पर महत्व बुद्धि हो जाए तो समझ लेना चाहिए अब हमारा आखिरी जन्म है सत्संगति संसति कर अंता गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं बड़े भाग पाई सत्संगा तो बिन प्रयास हो भव भंगा यदि सत्संग मिल गया तो संस्कृति चक्र आवागमन का अंत है। इसीलिए संत का संग मिल गया। रसिकन की सत्संगति दीजिए सुनबो रस भरी वाणी। क्योंकि उनकी रस भरी वाणी सुनने से हमारा जो मलिन मन है वह स्वाभाविक निर्मल होने लगता है। साधना में नवीन उत्साह आने लगता है। जहां हमारी गलती होती है वहां हमको चुभते हैं।
सत्संग के वचन जलन पैदा करते हैं। बार-बार हृदय को जलाते हैं तो हमारी गलतियां भस्म हो जाती है। गलतियों का अपराध का जो पाप का दंड मिलना था वह सब नष्ट हो जाता है और पुनः गलती होने की संभावना नहीं रह जाती। ऐसा प्रायश्चित होता है सत्संग सुनने से। कुंजन को नित डोली बोजे दीजो भो बुहारी मिलबे की मा चटपटी प्रीति ही अति भारी प्रिया जो ऐसी कृपा कर दो कि हमारा देहा अभिमान गलित हो जाए रोज मैं सोहनी लेकर के सार्वजनिक स्थलों पर सोहनी लगाऊं। सार्वजनिक जहां हमारा सेवा का भाव देह भाव को गलित करता है।
परिक्रमा मार्ग है। जहां बहुत से लोग एकत्रित होते हैं। जहां बहुत से लोग आ जा रहे हैं। वहां की सफाई यह बहुत बड़ी सेवा धाम की है। सोहनी सेवा पर देहाभिमान ऐसे लाभ को नहीं लेने देता। एक आदमी करोड़ों रुपए का दान करें और एक आदमी जहां से सब लोग निकलते हैं, बैठते हैं, उठते हैं, ऐसी जगह सोहनी लगा दे उसकी समानता नहीं कर सकता। सोहनी लगाने वाले की समानता क्योंकि उसके अंदर कहीं ना कहीं रहेगा कि मैं एक करोड़ दान किया है। लेकिन जो सोहनी लगा रहा है उसको रोना आएगा।
दैन्यता आएगी। रज उड़ेगी उसके शरीर में लगेगी। सारे पाप नष्ट होंगे। यह रज ब्रह्मेश्वर आदि शुद्ध रूप पदारविंद की है। प्रियाजु की रज है। चरण रज। यह आपके हृदय को प्रेम प्रकाशित करने में बिल्कुल निर्मल कर देगी। योग्य बना देगी। अगर धाम आए हो तो कहीं भी चार हाथ सोहनी जरूर लगा दो। तुम्हारा सौभाग्य होगा। यहां गंदगी मत फैलाओ। यह प्रियाजू का महल है। यहां जो भूल चूक से गंदगी फैला देते हैं उसको साफ कर दो। बड़ी कृपा होगी। आपके ऊपर बड़ी कृपा होगी। यदि ऐसा आप करेंगे पर वो देहाभिमान नहीं करने देता।
धूल लग जाएगी। जो तुम्हारे कर्मों की धूल धूल चटाने के लिए तैयार है उसको मिटाने के लिए यह ब्रज धूल है। जय श्री भट्ट धूल धसर तन यह आशा उद्धार बड़े वो महान भाग्यशाली हैं जिन्होंने ब्रजर के द्वारा समस्त कर्म बंधनों को छिन्न भिन्न कर दिया है। ये जल्दी समझ में नहीं आएगा। ब्रजर लगाने की हिम्मत नहीं पड़ेगी। पापात्मा को देखते हैं कि अगर ऐसे हुआ भी तो ऐसे ब्रज रज लेकर ऐसे लौटने की लगाने की ये बहुत महापुरुषों के गढ़ वचन है। रज का जरूर सेवन कीजिए। बहुत प्रार्थना ये अमूल्य समस्त ब्रह्मांडों में कहीं भी ब्रज रज की समानता करने वाली कहीं की रज की महिमा नहीं कही गई।
ब्रजर की महिमा वर्णन की गई। स्वयं श्री भगवान एक वर्ष तक शास्त्रों बक्षों का रूप धारण करके संपूर्ण ब्रज 84 कोस की रज का स्वाद लिया। जब ब्रह्मा जी ने अपहरण किया तब भगवान ही स्वयं बछड़े बने। यह रज बहुत अपार करुणामई है। सोहनी लगाने से स्वाभाविक ही रज का अभिषेक हो जाता है। और प्रिया जो देखती है कि मेरे महल की टहल कर रहा है। बहुत कृपा होगी। संपूर्ण वृंदावन संपूर्ण ब्रज हमारे प्रभु का निज घर है। निज घर है। कहीं भी सोनी लगा रहे हो तो प्रभु के घर में लगा रहे हो।
अमरीश जी और दुर्वासा जी अगर साधना में देखा जाए तो दुर्वासा की समानता कदापि त्रिभुवन में कोई बिरला ही कर सकता है। अमरीश जी की तो बात ही जाने दो। अगर साधन पक्ष में देखो तो दुर्वासा जी और समर्पण पक्ष में देखो तो अमरीश जी अपने हाथ से सोहनी लगाते हैं। अपने हाथ से पोछा लगाते हैं। चक्रवर्ती सम्राट होते हुए भी तो सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा में है और उनको पता भी नहीं। दुर्वासा जी दुर्वा रस पान करते हैं। केवल वलकल की लंगोटी लगाते हैं। 60 60 हजार वर्ष की समाधि धारण करते हैं।
कोई साधारण महात्मा नहीं लेकिन कहीं ना कहीं साधन पक्ष का बल है। और अमरीश जी के हृदय में साव मन कृष्ण पदारविंद केवल श्री कृष्ण चरणारविंद में मन अर्पित करके निरंतर चिंतन दैन्य भाव यह आत्म समर्पण बहुत जोर का होता है। ये सोहनी लगाना प्रभु के लिए पोछा लगाना यह बहुत बड़ी बात है। देहाभिमान इसी से गलित होता है। कुंजन को नित डोलबो दीजो दीजो भोर बुहारी रोज सोनी लगावे कहीं ना कहीं लगावे एक नियम बना ले थोड़ा सोनी लगाने का अपने लोगों को नियम था पूरा हित धाम को करते हुए परिक्रमा मार्ग मदन टेरर के सामने तक ऐसे पूरा साफ कर पद गुनगुनाते हुए जो सोहनी लगाने में सुख मिलता है ना अलग-अलग स्वाद होता भजन का जैसे एक ही खोए को बहुत प्रकार से हम स्वाद लेते हैं।
कुछ पेड़ा बनाकर, कुछ लड्डू बना के, कुछ उसी खोए के विविध प्रकार की मिठाइयां बनती है। ऐसे ही भजन का विविध स्वाद है। माला लेकर एकाग्रता पूर्वक जप करना, सत्संग सुनना, सोहनी पोछा लगाना, भगवत सेवा करना, साधु सेवा ये विविध प्रकार से उसी भगवनंद का रसास्वादन है। श्री भोरी सखी जी कहती है प्रिया जो ऐसी कृपा करो कि ब्रज में वास मिले वृंदावन वास मिले और आपके कुंजों में रोज सोहनी लगाने का सौभाग्य मिले ये संपूर्ण वृंदावन ब्रज ये कुंज निकुंज है कोटि प्राण नित बारी बो दीजे देखत चरण छटारी वैसे वैसे तो मुख्य पांच प्राण हैं और पंच प्राण सहायक है तो 10 प्राण कह गए हैं।
लेकिन अगर करोड़ों प्राण होते और न्योछावर करते उस न्योछावर के बदले में श्री जी के गोरे चरणारविंद को एक बार देखने का सौभाग्य मिलता तो सस्ता सौदा है। प्राण दिए यह प्रेम न प क्योंकि श्री जी के चरणों से प्रेम प्रवाहित होता रहता है। सत प्रेम सिंधु मकरंद रसोग धारा प्रेम धारा गोरे चरणारविंद से ही प्रवाहित हो रही है प्रियाजू के चरणों से लालजू का प्रेम ही प्रियाजू है। इसलिए एक रसिक महान पुरुष ने कहा कि श्री कृष्ण का प्रेम बिना प्रियाजू की कृपा के मिल ही नहीं सकता।
उन्होंने विनोद में कहा श्री कृष्ण के पास तो प्रेम है ही नहीं। वो तो प्रिया जी हैं। तो एक उपासक ने प्रश्न किया आगे धाम में कि उन्होंने ऐसे कैसे कह दिया हमें बड़ी जलन हुई कि श्री कृष्ण के पास प्रेम ही नहीं है। तो शब्द बोलिए आप वही शब्द बोलिए जो वो बोले वो क्योंकि आप मिलावट कर दोगे तो अर्थ नहीं निकल पाएगा। और जो के त शब्द वो बोले देखो उनके शब्दों में झांक के देखो क्या कह रहे श्री कृष्ण के पास तो प्रेम नहीं क्योंकि श्री कृष्ण का प्रेम तो मूर्तिमान प्रियाजु के रूप में विराजमान है तो बिना प्रियाजू के चरणों की आराधना के प्रेम कैसे प्राप्त हो जाएगा क्योंकि प्रेम रूप तो सांद्रानंद घन प्रेम मूर्ति किशोरी ललित रंगीली गाइए ताते प्रेम रंग रस पाइए प्रिया जी कोई और थोड़ी लाल जू के हृदय का प्रेम जब रूप धारण किया तो लाडली जू के रूप में हुआ कोटि प्राण नित बार बो दीजे देखत चरण छटारी जैसे जो केवल श्री कृष्ण उपासना में अभी प्रवेश नहीं पाए हैं पर भक्ति करते हैं वो जब सुनते हैं कि लाल जो मोर मुकुट पधराते हैं श्री जी के चरणों में तो हमने देखा वो क्योंकि अभी प्रारंभ है उनकी भक्ति का भगवान ऐसा कैसे कह सकते हैं भगवान कैसे ऐसा कह सकते हैं ठीक है लेकिन प्रियाजु तो लालू तो भगवान है ना भगवान से यही यही है तुम्हारी प्रारंभिक दशा जिससे तुम नहीं जान पा अरे वह सेन नाई के लिए राजा के चरण चापने पहुंच गए।
वह अपने भक्त के लिए सारथी बने बैठे हैं। वह अपने भक्त की मल भरी लंगोटी धो रहे हैं। प्रियाजू के चरणों में महावर लगावे तो कोई आश्चर्य की बात है। अरे प्रेम समुद्र प्रभु अपने प्रेम का दुलार कर रहे हैं। तुम्हें आश्चर्य लग रहा है। किंचिन मात्र किसी भक्त में प्रेम आ जाता है तो मेरे प्रभु हाथ जोड़े उसकी सेवकाई के लिए खड़े रहते हैं। भक्ताधीन मन पूज्य भक्त नाम भयंकर कैसे कैसे समझोगे थोड़ी सी प्रीति आ जाए तो जहां मेरा भक्त चरण रखो वहां रखूं मैं हाथ पीछे पीछे मैं फिरू कभी ना छानू साथ फिर वो प्रियाजु के चरणों में माथा रख दे कौन आश्चर्य की बात है नंददास प्रभु छवि विलोकत प्रीति के प्रतिपाल चापत चरण मोहन लाल कोटि प्राण प्राण नित बारी बोजे देखत चरण छटारी इतनी आस पुजावहु प्यारी भोरी बलि बलिहारी दीज मोहि एसो बास ब्रज माही जुगल नाम को भजन निरंतर और कदम बन छाही दीजो मोहि एसो बास ब्रज माही हे प्यारी रूप ऐसी मेरी आशा है और आप अत्यंत कृपालुता दयालुता के समुद्र हो मेरी आस पूरी करो मैं आपकी आपके गोरे चरणारविंद को देख पाऊं।
आपकी परिचर्या में रहूं। युगल नाम जप करूं और वृंदावन की विथियों में आपका सुमिरन करते हुए नेत्रों से आंसू बहाते हुए रज अभिषिक्त होकर अपना जीवन व्यतीत करूं। श्रीपाद प्रबुद्धानंद जी महाराज कह रहे हैं भाई बहुत भोग लिया है बहुत जन्म भोग लिए हैं। एक बार मेरी प्रार्थना मान लो तो आज तक तुम्हें जो शांति और विश्राम नहीं मिला वह मिल जाएगा। भ्रात भोगा सुभक्त का ना भता ना संसार मध्य ए भाई तुम्हें पता नहीं कि तुमने क्या-क्या भोगा। बहुत कुछ भोग लिया है। सब भोग भोग लिए हैं।
कागभुंडी जी को भगवत प्रसाद से शास्त्रों जन्म की स्मृति है। शास्त्रों जन्म क्या शास्त्रों युगों की स्मृति है। कई बार उनके सामने कलयुग आ चुका। कितनी बार चतुरयुगी व्यतीत हो गई। वह कह रहे हैं गरुड़ जी महाराज से कि सत्य कहता हूं हे पक्षीराज हरिवाहन आपके सामने सत्य कहता हूं। कोई ऐसा कर्म नहीं जो मैंने किया ना हो। कोई ऐसा भोग नहीं जो मैंने भोगा ना हो। लेकिन आज मुझे जो भगवान की स्मृति में सुख मिल रहा है वो किसी में सुख नहीं मिला। सब कुछ करके देख वो अनेक जन्मों की स्मृति से सब देख रहे हैं।
सकल कर्म कर थके गोसाई सुखी न भयो आज की आज जो मैं भगवान श्री राम की पावन चर्चा करता हूं। उनका नाम जप करता हूं। उनके ध्यान में मगन रहता हूं। इससे बड़ा सुख मुझे किसी भी साधन में, किसी भी भोग में, किसी भी कर्म में नहीं मिला। श्रीपाद कह रहे हैं भ्रातर भोगा सुभक्ता खूब भोग भोग लिए तुम्हें याद नहीं है। जैसे कई बार हमने स्मृति दिलाई कि नौ महीने मां के गर्भ में इसी जन्म में रहे। कुछ याद है? एक परसेंट भी याद है तुम्हें? ज्यादा समय नहीं हुआ। कोई 50 वर्ष, कोई 40 वर्ष, कोई 30 वर्ष, 25 वर्ष ऐसे सब बैठे हो।
आप विचार करके देखो कि ज्यादा लंबा समय नहीं गया। इसी जन्म की बात है। क्या आपको याद है कि मां के गर्भ में तुमने क्या दुख भोगा? 100 में एक परसेंट याद है? नहीं याद है। फिर पीछे जन्म की क्या जानोगे? ना भवताना संसार मध्य। इस जगत में ना तुम कभी सुखी हुए हो ना सुखी हो पाओगे। यदि भजन नहीं करोगे। देखो जब बच्चापन तो सिखाया जाता है खूब बढ़िया पढ़ो लिखो धन कमाओ ऐसे योग्य बनो। बढ़िया है। कभी अध्यात्म नहीं सिखाया। कभी नाम जप नहीं सिखाया। कभी यह बैठ के नहीं सिखाया कि बड़ों का आदर कैसे किया जाता है।
कभी यह नहीं सिखाया कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है। अब वो पढ़ाई लिखाई में गए, व्यसन सीख गए, व्यभचार सीख गए, अच्छी नौकरियां पाई, पैसे हैं। और फिर घर में आकर के उन बूढ़े माता-पिता को जो चलने लायक नहीं है। दरवाजा बंद करके ऐसी दुर्दशा करते हैं, मारते हैं। पूछो मत। जब यह दृश्य देखने को मिलते हैं ना तब लगता है भगवान कृपा करो इन माता-पिता को जो अपने बच्चों को शिक्षा नहीं दे रहे हैं कि धर्म किसे कहते हैं? तुम समझते हो ये धन कमाने लायक बन जाएंगे तो तुम्हें सुखी करेंगे।
ऐसे जैसे जानवर को मारते हैं ना क्रूर कर्मा लोग ऐसे बूढ़ी माता को मारते हैं। पिता को मारते हैं। पूछो मत। तब लगता है यह जानवर पैदा हुए हैं। यह मनुष्य रूप में पशु पैदा हुए। पशु क्या राक्षस है। माने मात पिता नहीं देवा साधुन ते करवावे सेवा जिनके ये आचरण भवानी। भगवान शंकर कहते ते निश्चर सम जानो प्राणी। निश्चर कहते राक्षस को वो राक्षस है। तुम अपने संतानों को राक्षस मत बनाओ। यह जो केवल तुम मात पिता बालक बुलावे उधर भरे सो जतन सिखावे तुम राक्षस बनाने की चेष्टा कर रहे हो बहुत सज्जन बेटा एक आया था अभी दो चार दिन के अंतर्गत एकांतिक उसने कहा मेरी मां कहती है कि तुम्हारा मोबाइल तोड़ देंगे यदि तुमने सत्संग सुना मेरा बाप कहता है कि तुम्हारे तुमको हमारी कसम है यदि वृंदावन गए यही बच्चे जब सतार्ग से विमुख हो जाएंगे और शराब पीकर घर आएंगे तब तुम्हारी पूजा करेंगे तब तुम्हें अपनी कसम ध्यान आएगी कि अगर यह वृंदावन जाता साधु समागम करता तो आज लातों से ना मारता आज ये मेरी दुर्दशा ना कर चीख रहा है क्या है भ्रातर भोगास भुक्ता भुक्तोगे ये जो कर रहे हो कर्म भुक्तोगे तुम्हारे बेटा बेटी देख रहे हैं कि बुड्ढे के साथ कैसा तुम कर रहे हो वही इंतजाम तुम्हारे लिए रहेगा।
वही इंतजाम उससे बढ़ के ब्याज सहित चिंता मत करो। इसलिए हम सबसे प्रार्थना करते हैं। यह कर्म भूमि है। जो बीज बोओगे वही फल काटोगे। आज देखने में लग रहा है कि माता-पिता के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है। लेकिन सत्य पूछो तो यह उनके कर्म का फल उनको देखने को मिल रहा है। ना कभी राम बोले ना कृष्ण बोले ना हरि बोले पूरा जीवन केवल इसी में लगाया तो देख परिणाम जिनके लिए जीवन लगाया वही तेरा जीवन लेने के लिए तत्पर हो रहा है। वो वही तेरा नाश कर रहा है। जिसको तूने सजाया वही तुझे दंड दे रहा है।
क्यों? भगवान का विरोधी भाव रखने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता। हनुमान जी महाराज रावण को कहते हाथ जोड़कर विनती करता हूं राम जी की विमुक्तता का त्याग कर दे नहीं शंकर साहस विष्णु अज तोही सन राख राम कर द्रोही। मैं सभा में कह रहा हूं ये हजारों हजारों भगवत स्वरूप महापुरुष भी तेरी रक्षा नहीं कर पाएंगे। तेरा विनाश हो जाएगा। यदि तू भगवान से विमुख रहेगा। हे भ्रात भोगा भवता ना संसार मध्य संसार के बीच में तूने क्या क्या नहीं किया बहुत से पाप किए बहुत से भोग भोगे अब बुद्धि ठिकाने लगा लो सावधान हो जाओ अभी सब मिटा सकते हो सब गलतियां मिटा सकते हो अभी बहुत अच्छे बन सकते हो अभी भगवत प्राप्ति कर सकते हो पूरा जीवन गलती करता रहा जामिल अंतिम में नारायण निकल गया तो भगवत प्राप्त हो गया अपना पता नहीं कब अंतिम अब सुधार लो।
अगर हमारी आवाज आपके कान में पहुंच रही है चाहे ऐसे समक्ष बैठे हुए या YouTube में आपके माता-पिता कैसे भी हो हमारी प्रार्थना है। यदि वह वयोवृद्ध हैं। चलने फिरने में असमर्थ हैं तो पहले समझ लो उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। तुम्हें मानना पड़ेगा। ये भ्रष्ट का मतलब होता है स्थिति से गिर जाना। अब वो ठीक नहीं बोलेंगे। वह आपको गाली देंगे। आप घी, चुपड़ी, रोटी, सब्जी, दाल सब देंगे। फिर भी वह आपको गाली देंगे। आपके रिश्ते नातेदारों से आपकी निंदा करेंगे। पर आप उनकी इस बिगड़ी हुई बुद्धि का रोष पूर्वक अनुगमन करते हुए उनको पीटना, उनको मारना, यह आचरण मत करें।
क्योंकि उनकी कर्मु बुद्धि बिगड़ चुकी है। अब अपने कर्म आप मत बिगाड़िए। वो आपके भगवान हैं। सच्ची मानिए उनमें भगवान बैठे हुए हैं। ऐसे असमर्थ माता-पिता को भगवान की तरह दुलार करोगे तो तुम सदैव श्री संपन्न रहोगे। लक्ष्मी तुम्हारे घर से नहीं जाएगी। और जिन घरों में माता-पिता को त्रास दिया जाता है। जिन घरों में आए हुए पानी ग्रहण करके पत्नी के साथ अनर्थ नाना प्रकार की दोष वृत्तियां वो घर कभी श्री संपन्न नहीं हो सकता। सुख संपन्न नहीं हो सकता। आप सत्संग सुनने आए हो।
इसी का सुधार करना चाहिए। माता-पिता आपके साथ क्या व्यवहार कर रहे हैं? बिल्कुल मत देखो। ये मान लो कि ये पागल है। उनकी बातें मत सुनो। तुमका अपना कर्तव्य देखना। तुम्हारा क्या कर्तव्य? हमको केवल अपना कर्तव्य देखना। हमें बहुत कष्ट होता है। जब यह बात देखते हैं कि बूढ़े असमर्थ माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार तब लगता है एक कलेजा है इसका। इसका हृदय है कि भगवान ने पत्थर की रचना की इसके हृदय में। अरे और कौन जिसने नौ महीने गर्भ में रखा जिसने अपने रक्त का दूध बनाकर तुम्हें पिलाया।
जिसने तुम्हारे मल मूत्र साफ किया। आज तुम हाथी जैसे जवान हो तो लात मारते हो। डंडा मारते हो। उनको गाली देते हो। चिंता मत करो। तुम्हारे लिए ब्याज सहित व्यवस्था है। ब्याज सहित दंड मिलेगा। अगर तुम्हें थोड़ा भी यह पता है कि भगवान है तो इतना समझ लो उनके वचन भी है अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म शुभाशुभम शुभ और अशुभ कर्मों का भोग भोगना पड़ता है फिर माता पिता ये तो साक्षात भगवान है इनके प्रति ऐसा ये कुछ भी बोले हमने देखा है वयो वृद्ध आदमी की बुद्धि पतित हो जाती पतित अगर जीवन भर भजन नहीं किया ना तो पतित का मतलब होता है स्थिति से गिर जाना भ्रष्ट होने का मतलब गिर जाना।
अब उसको जो बोलना चाहिए वो नहीं बोल पाएगा। उस समय हमको क्रोध नहीं करना कि हम तो इतना खवाते पिलाते हैं। ये हमारी निंदा करते हैं। ये हम बहुत गढ़ बात आपको कह रहे हैं। जिसने अपने माता-पिता की सेवा कर ली उसने भगवान को प्रसन्न कर लिया। उनके नाराज रहने पर उनके गाली देने पर उनके तिरस्कार करने पर भी पर हमारी प्रार्थना है। हम जो शब्द कह रहे हैं उसे ध्यान से सुनिए। जो माता-पिता असमर्थ हो चुके हैं, चलने फिरने लायक नहीं है, उनके वर्ताव और उनके कटु वचनों पर ध्यान ना दिया जाए।
उन्हें भगवान की तरह पूजन करके उनकी सेवा की जाए। जितने दिन जिए खूब मेहनत करके कमाओ, उनको खाओ, पियो, कपड़ा, लत्ता सुख पूर्वक जीवन तो तुम्हारा लोक और परलोक दोनों बन जाएगा। यह शब्द हम शर्त इसलिए रखते हैं कि जो माता-पिता अपने कर्तव्य का पालन करना नहीं जानते हैं और अभी चल फिर रहे हैं। मनमाने आचरण करते हैं। गंदे विचारों का पोषण करते हैं। पोषण करने वालों का शोषण करते हैं। ऐसे माता-पिता के लिए नहीं कह रहे। हम उन असमर्थ माता-पिता के लिए कह रहे हैं कि जिनकी वास्तविक बुद्धि बिगड़ चुकी है।
शरीर सेवा में समर्थ स्वयं नहीं रह गया है। अब हमारा कर्तव्य बनता है वो गाली दें। वो पड़े पड़े हगे तो भी हमें उनकी सेवा करनी चाहिए। निश्चित भगवान प्रसन्न हो जाएंगे। निश्चित हमने आपको कई बार उदाहरण में बताया है महाभारत का प्रसंग। एक महात्मा कश्यप नाम के थे। तो एक वृक्ष के नीचे बैठे ध्यानस्थ थे। जब एक बगुली बीट कर दिया तो ऐसे माथे से गिरा तो ऐसे देखा और रोष पूर्वक देखा तो भस्म हो गई आग लग गई और जलकर राख होकर गिर गई उनको लगा मेरी तपस्या बहुत पावरफुल हो गई एक घर में गए भिक्षाम दे एक साध्वी भगवत भाव परायण पति को भगवान मानने वाली पति पतिव्रता देवी निकली प्रणाम किया ब्रह्मन कुछ क्षण रुकिए अभी मैं आपको भोग लाई जे ही वो घर गई तो दूसरे दरवाजे से उसके पति आ गए बिल्कुल ध्यान से सुनना अपने पति को साक्षात भगवान मानना अपने पति की ही आराधना में तन्मय रहना ये पातीव्रत बड़ा महान धर्म है।
इसी से भगवान शंकर ब्रह्मा और विष्णु को छछ महीने के बालक अनुसूया जी ने बना दिया था। लेकिन ये बहुत दुर्लभ बात है जो अपने देह को पावन करके एक पति को समर्पित करके आजीवन वो देवी ये भारत यति और सतियों का देश है। धर्म की यहां जय जयकार सदैव होती रहे होती रहेगी। हां थोड़ा कम ज्यादा अंतर पड़ता रहेगा। अब आज क्या धर्म को समझे जो बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड यह दलित दुराएं दिमाग में बैठ गई है। यह क्या समझेंगे कि धर्म किसे कहते हैं? पतिव्रत धर्म किसे कहते हैं? एक पत्नी व्रत किसे कहते हैं?
जिसका पानी ग्रहण किया आजीवन निर्वाह किया। अब वो पति सेवा में पति को बैठाना उनको जल पिलाना। फिर इसके बाद कहा भगवन आपके घर में एक अतिथि भगवान उस दरवाजे पर आए। आदेश हो तो मैं उनका स्वागत करूं। भिक्षा दे दूं। कहा तत्काल जाइए तत्काल जाइए वो कुछ फल फूल अनादि ले गई इतना विलंब क्यों किया वो तो उस रोष में थे कि हमारा तप बढ़ चुका है मैंने बगुली के देखा था भस्म हो गई तो कहा भगवन शांत शांत विलंब का कारण मैं एक पतिव्रता हूं मेरे प्रभु मेरे पतिदेव आए मैं उनको आसन दिया जल पिलाया फिर उनकी अनुमति से आपको देने आए हो उन्होंने कहा तुमने हमको ऐसा वैसा महात्मा समझ लिया लिया क्या?
तो उसने कहा महाराज तुम्हारे उस वृक्ष की बगुली नहीं हूं कि तुम्हारे देखने से भस्म हो जाऊंगी। मैं एक पतिव्रता हूं जो बैठे-बैठे तीनों लोकों का दर्शन कर रही हूं अपने पातिव्रत धर्म के व्रत से बहुत बड़ा बल होता है पातिव्रत धर्म में। ये कोई खिलवाड़ नहीं है। गृहस्ती कोई साधारण धर्म नहीं। आप लोग जिसे बिल्कुल अवहेलना कर रहे हैं कि अरे हम तो गृहस्थ हैं। हम तो विषय हैं। अरे भगवान के अंश हो। तुम जहां हो वहीं से भगवत प्राप्ति कर सकते हो। इतनी सामर्थ्य आप में है।
अब तो होश उड़ गए उनके कि यह बात तो केवल मैं ही जानता था कि बगुली को देखने से भस्म हुई। दूसरा कोई नहीं। तो हाथ जोड़ा और कहा देवी तुम्हें कैसे पता है? तो उन्होंने कहा इतना ही नहीं पता। मुझे सब कुछ पता है आपका। मुझे पूर्व जन्म का भी पता है आपका। मैं अपने पति की सेवा के प्रभाव से त्रिकालक भी हो चुकी हूं। जाओ अभी तुम्हें सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ। सच्चा ज्ञान प्राप्त कराने के लिए अमुक प्रांत में जाओ और वहां जो मांस बेचने का व्यापार करते थे। कसाई के रूप में वो जन्मे थे उस कुल में लेकिन वो खरीद करके मांस व्यापार उनके कुल परंपरा का वहां जाइए और वह तुम्हें धर्म का उपदेश करेंगे।
विचार किया कि इतने सिद्ध महापुरुष है अपने पतिव्रत धर्म से मुझे जाना चाहिए। वहां गए तो कितना चाहिए जो जितना हो वैसा घृणित यह उपदेश करेगा धर्म का चलने लगे तो कहा कश्यप जी बिना परिचय के परिचय कश्यप जी रुकिए रुकिए आपको अमुक गांव की पतिव्रता पत्नी ने भेजा है ना हां पहले फोन तो था नहीं कि फोन कर दिया होगा बोले आप रुकिए मैं अपना व्यापार रूपी पूजा कर्म कर लूं फिर आपको मैं उपदेश निर्देश करता हूं। आश्चर्यचकित हो गए। इतना मलिन कार्य करने वाला और त्रिकालज्ञ है।
यह भी बिना परिचय के परिचय जानता है। और वो पत्नी ने क्या कहा यह मुझे कैसे बाद में जब अपनी सेवा से निवृत्त हुए तो दुकान को अपनी प्रणाम किया, पैर छुआ और वो कर्म भगवान को समर्पित किया कि मैं मुझे जिस कुल में जन्म दिया वो मैं कर्म कर रहा हूं और नाम जप निरंतर चलता। उन्होंने कहा पहले तो मैं पूछना चाहता हूं आप इतना निंदनीय कर्म क्यों करते हैं? तो कहा मेरी कुल परंपरा से चल रहा है। फिर तुमको इतना पवित्र ज्ञान कैसे हो गया तीनों काल का? बोले मैं निरंतर नाम जप करता हूं।
अपने कर्म को भगवान की पूजा समझता हूं और आओ और घर ले गए और दिखाया कि श्वेत पलंग पर बूढ़े माता-पिता बैठे हुए हैं। जाकर साष्टांग दंडवत किया। बोले जो उससे धन मिलता है उससे मैं अपने इन भगवान की सेवा करता हूं। रात दिन माता-पिता की सेवा के प्रभाव से नाम जप के प्रभाव से अपने व्यापार को भगवान की पूजा समझने के प्रभाव से मुझे तीनों काल का ज्ञान है। तो उन्होंने कहा मेरी तपस्या अपूर्ण क्यों है? कश्यप जी ने उन्होंने कहा इसलिए कि तुम अपने माता-पिता की अवहेलना कर चुके हो और वह वृद्ध माता-पिता भटक रहे हैं।
उनकी सेवा छोड़कर उनकी अनुमति के बिना तुम ये ऐसा जाओ पहले उनकी आज्ञा का पालन करो। आप समझो महाभारत में पढ़ के देखना भगवान श्री कृष्णान व्यास देव जी ने लिखा है आज उनहीं माता-पिता से जिनसे परम सिद्धि प्राप्त होती है परम कृपा प्राप्त होती है ये नादान लोग नहीं जान पा रहे और अपना कर्म नाश कर रहे हैं। कर्म नाश कर रहे हैं। पूरा जीवन नष्ट कर रहे हैं। हम इस विषय में इसलिए बोल रहे हैं कि आजकल बहुत बच्चे उदंड हो रहे हैं और ब्याह हुआ तो वही नई बच्चियां जिनको अपने माता-पिता का सम्मान करना नहीं आया वो अपने पति के माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करती हैं।
पति के अधीन करके दोनों मिलकर उनको पीड़ा पहुंचाते हैं। हम वयोवृद्धि की बात कह रहे हैं। हम उनकी बात नहीं कर रहे जो समर्थ है कर सकते हैं। जो शोषण करते हैं हम उनकी बात नहीं कर रहे। हम उनकी बात करें जो असमर्थ है। चलने में भी असमर्थ है। अब उनके ऊपर डंडे का प्रहार उनकी पिटाई बिल्कुल ठीक नहीं। हे भ्रातर भोगा सुभक्ता जो तुम कर्म कर रहे हो सुभक्ता तुम्हें भोगना पड़ेगा। और बहुत भोग चुके हो। जैसे मां के गर्भ में कितना बड़ा दंड भोगा तुम्हें याद भी नहीं है। इसलिए भताना संसार मध्य दोबारा इस संसार के बीच में जन्म ना हो ऐसा उपाय कर लो।
क्या विद्या दान धरा कति कति जगत ख्याति पूजा लब्धा इससे तुम्हारा जन्म मरण नहीं रुकेगा। बहुत पढ़ लिखकर विद्वान हो गए हो तो तुम्हारी ख्याति हो जाएगी। बहुत दान दे दोगे तो तुम्हारा यश हो जाएगा। बहुत भोग सामग्री आहार विहार बांट दोगे बहुतायत रूप में तुम्हारे पास आ जाएगी। लेकिन तुम्हारा जन्म मरण नहीं रुकेगा। जन्म मरण रुकेगा। अध्याहारे पियािक उरण वान समत्मा श्रीमद वृंदावन सतत मट सके सर्वतो मुक्त संग आहार विहार की चिंता छोड़ दो योगक्षेम्य हमम का ठेका भगवान लेते हैं अपने कर्तव्य का धर्म पूर्वक पालन करो धन की चिंता मत करो आ जाओ श्री धाम वृंदावन सत्संग सुनो उसके अनुसार आचरण करो साधना भजन करो तुम्हारा परम मंगल हो जाएगा आवागमन से मुक्त हो जाओगे हे सखे वृंदाण्यम तजे प्रवति यदि कोपस जिम छिन श्रीमद् वृंदावन माम यदि नति बलात कोपितम ह्यवश्यम यदि किसी ने मुझे वृंदावन से बाहर जाने की बात कह दी तो मैं उसकी इतनी अनन्य निष्ठा है श्री पाद की।
बोले आप एक बार आइए। फिर उसे कहना पड़ता है कि क्षमा कीजिएगा। श्री धाम वृंदावन का क्षेत्र सन्यास है। क्षेत्र सन्यास का तात्पर्य होता है मैं जिस क्षेत्र में सन्यास ले रहा हूं उस क्षेत्र का कभी त्याग नहीं कर सकता। इसे क्षेत्र सन्यास अनन्य निष्ठा। और कह रहे हैं यदि कोई मुझे रिश्ते नाते या किसी संबंध से बलात वृंदावन से बाहर करने की कोशिश करेगा तो मैं उसको श्रीमद वृंदावन माम यदि नैति बलात कोपितम ह्यवश्यम बहुत जोर की बात है बहुत होश में सुनना ये दो बातें तो हो गई अनन्य निष्ठा की अब रहने की बात कर रहे हैं एक गजब की वृंदावन की निष्ठा है श्रीपाद बात प्रभुदांद जी की जबान काटने का मतलब होता है मैं तुम्हारी बात नहीं मानूंगा।
देखो नहीं जैसे गुरुजन बात कर रहे हो तो वो नहीं कहते क्यों बार-बार हमारी जबान को काट रहा है जो मैं बोल रहा हूं बात मान जबान काटने के दो अर्थ होते हैं। एक मूर्खता पूर्वक अर्थ निकाला जाए तो बोले जबान पकड़ के काटना और एक होता है बात ना मानना। इस सरल शब्दों में संत किसी की जबान नहीं काटते। संत उनकी बात नहीं मानते। यही है जबान काटना। बोले हमारी जुबान को बार-बार काट रहे हो। हम जो कह रहे हैं उसको नहीं मानना मतलब जबान काटना। उसको सरल शब्दों में समझिए। और मारना का तात्पर्य होता है हम आपको आज से अपना नहीं मानते।
जैसे ध्रुवदास जी ने इसे सरल भाषा में कहा माता मित्र सुतादित्य तज ध्रुव तिनको पास वृंदावन के वास को जिनके ना उल्लास वो कोई भी हो हम अपना संबंध नहीं मानते हैं जो हमें वृंदावन से बाहर कर सके ऐसे इसका अर्थ लो अब जो कह रहे हैं वो बहुत गढ़ विषय है कामम बेश्याम उपया नखल प्रणया या तोयाम काममम चम कुर धन न पद वृंदावन कैसे अर्थ पढ़े हिम्मत नहीं पड़ रही काममम वेश्याम खल परिणया यात याम काममम बहुत ऊंची निष्ठा है इसलिए समझ पाना बहुत कठिन है। ये बहुत बड़ी बात कह रहे हैं कि वृंदावन में मैं वैश्या गमन करके भी रहना स्वीकार कर सकता हूं।
लेकिन वृंदावन के बाहर में बहुत बड़ी बात कह रहे हैं। मतलब उसका अर्थ करना कठिन है क्योंकि उनकी बहुत ऊंची निष्ठा से बात कर रहे हैं। भला ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष के अंदर कहीं कामना हो सकती है। भला ऐसे अंतःकरण वाले महापुरुष जो प्रेम में निष्ठ है उनके अंदर कहीं कामना हो सकती है। लेकिन निष्ठा की चरम सीमा का स्वरूप है। ये निष्ठा की चरम सीमा समझ पाना बहुत कठिन बात होती है। बहुत कठिन बात होती है। रसिक अनन्य माल में एक चरित्र आता है कि वह उनके गुरुदेव भगवान हरिवंश महाप्रभु थे।
उन्होंने बताया जैसे हरि राम व्यास जी को श्याम श्यामा पद कमल संग शनायो श्याम श्यामा के चरणों की जो आराधना करने वाले भक्त जन उनकी आराधना से निश्चित प्रिया प्रीतम की प्राप्ति हुई। उन्होंने गृहस्थ में थे वो अपने घर में साधु सेवा विस्तार करने लगे। जो जहां जैसे संत सुनते उनके घर आते तो एक नौजवान आदमी ने जो बिल्कुल कोई मतलब भजन साधन से नहीं देखा बहुत साधु वेश में हलवा पूरी खवाया जाता है और दक्षिणा भी मिलती है तो पाखंड वेश धारण करके वो साधु नहीं था वो वहां गया तो उन्होंने उसका पूजन किया वैसे ही जैसे संत सेवा करते हैं अब वहां कोई रोक-टोक नहीं थी तो जैसे यह निष्ठा है ऐसे वो बहुत ऊंची निष्ठा उसको सब लोग नहीं कर सकते भी नहीं चाहिए।
अब उनके घर में एक नवयुवती बच्ची थी जो ब्याह योग्य थी और मातापिता और सब खूब वैभव ऐश्वर्य और साधु सेवा करते थे। रात्रि में छत में गर्मियों में शयन होता है तो संत जो संत नहीं थे केवल वेश मात्र था वो कुछ ऐसी चेष्टा बड़ा प्रसंगम सारांश निष्ठा का स्वरूप सुबह हुआ अब आंगन में माता पिता और वो समझ गया था कि देख अब वो घबरा रहा था उसके प्राण व्याकुल थे कि मारे गए हम। तो हाथ जोड़ा दोनों ने कहा प्रभु मैं सदैव संतों को भगवान मानता रहा हूं और आपको भी भगवान मानता हूं।
आपने जो भी चेष्टा की मैं समझता हूं मेरे राधा वल्लभ लाल का ही इशारा था। आप इस बेटी का पानी ग्रहण करें। सारा महल और ये सब ईश्वर आपका और मुझे आदेश करें। अब मैं अपने गुरु हरिवंश चंद्र जी के पास वृंदावन जाकर और चल दिए सब छोड़ के। हे ऐसी निष्ठाएं कहीं हजारों में नहीं होती कोई बिरला तो जैसे श्रीपाद कह रहे बहुत ऊंची निष्ठा की बात है इसे साधारणतया ना ले लिया जाए क्योंकि जो ब्रह्म बोध संपन्न महापुरुष न स्वात्म राम विषय तष्णा भ्रमति और दूसरा जो प्रेम में वहां कहीं गुंजाइश ही नहीं है यह निष्ठा की केवल बात है कह रहे कि यदि तो भले चोरी करके खा लूं चोरम कुरम धनार्थम नत चलति पदम अंत वृंदावन में एक कदम वृंदावन से बाहर नहीं होगा चाहे मुझे छीन के खाना पड़े चाहे चोरी करके खाना पड़े चाहे वृंदावन वृंदावन वृंदावन इसीलिए इसकी व्याख्या ज्यादा नहीं की कि ये अज्ञानी जीव नहीं समझ पाएंगे परिहासे पन्या प्रिय कथन मुक्तो ब ही रहा।
देखो देखो अब समझना अगर मैं कभी हंसी मजाक में भी बुरा बोलने की बात आएगी तो गूंगा बन के रहूंगा। कभी किसी को कष्ट देने के लिए हंसी मजाक भी नहीं करूंगा। परिहासे ऐसे महापुरुष भला जरा सोचना। इसीलिए वहां रुक रहे थे कि शायद है बहुत लोग बाहर के भी बैठे ना समझ पावे। इतनी ऊंची स्थिति की बात और महापुरुष की बात का उपहास करने लगे। परिहासे प्य्या प्रिय कथन मुति बरा यदि किसी का अप्रिय दुख भरा मेरा वचन उनके कान में पहुंचने का हो अपनी वाला हो तो मैं जिंदगी भर मौन रहूंगा कब बोलूंगा नहीं परिहास में भी नहीं बोलूंगा जिससे किसी का हृदय दुखी हो और परेशान दोष श्रति मनु विलो नयन यदि वृंदावन में कोई गलत कर रहा है ऐसा मेरे नेत्र देखेंगे तो कभी देखने लायक नहीं रखूंगा अपने नेत्रों को।
वृंदावन का दोष मैं नहीं देख सकता। वृंदावन वासी का मैं दोष भाव कभी अपने परेशान दोषान मैं सुनूंगा भी नहीं। मन से भी नहीं चिंतन करूंगा। और विलोकेंद्र नयना देखते हुए भी मैं अंधा बन जाऊंगा। अपने नेत्रों को देखने लायक नहीं रखूंगा। यह निष्ठा वृंदावन और वृंदावन वासी शिलावन निश्च बाधा लव विध यदि कोई हमारे शरीर को पीटने लगेगा तो मैं बिल्कुल पत्थर की काष्ट की तरह बन जाऊंगा पीट लो प्रारब्ध है इस शरीर मैं पलट कर उसको थप्पड़ नहीं मारूंगा इतनी बड़ी स्थिति को समझना है ऐसा देखा है महापुरुषों को देखा है देखा है आप लोग इस समय से आधुनिक वातावरण में है कि जहां वह कष्ट नहीं मिले हैं।
नीचा अपमाने सुधा नीच पुरुषों द्वारा किया हुआ अपमान अमृत के समान सहा जाता है। ये अवसर होते हैं। ये कृपा होती है। आप कैसे समझोगे इसे कृपा कहते हैं। ये परीक्षा होती है। भूमिका बदलने के लिए ऐसे भूमिका बदलती है अध्यात्म की। बड़े-बड़े महापुरुषों की। चाहे कोई कितना भी मुझे कष्ट दे पीटे मैं पत्थर के हृदय रखकर के सह जाऊंगा कभी शिलावन निश्चष्टा कोई चेष्टा ही नहीं करूंगा पत्थर में जैसे डंडा मारो कुछ नहीं बोला ऐसे पर वपुश बाला लव विधो लेश मात्र भी पीटने वाले को कष्ट नहीं होने देंगे ये उमा संत के यही बाई मंद करत जो करे भलाई हे प्यारे ऐसे वृंदावन वास करो।
ऐसे वृंदावन वास करो। ऐसी निष्ठा दो। आखरी जन्म है। वृंदावन में सत्संग सुन रहे हो। नाम जप करो। नहीं वृंदावन वास है तो आश्रय ले लो। पर इतने सहनशील रहो। तो ये आखिरी जन्म है। बार-बार जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो। मानव जीवन केवल अच्छी कमाई के लिए है। संतों के महामहिम वचनों के अनुसार जो चलता है वह पुण्य एकत्रित करता है और जो कुमार्गगामी बुद्धि के अनुसार चलता है वह पाप एकत्रित करता है। भगवान के सिवा सुनो महापुरुषों के वचन है। भगवान के सिवा तुम किसी और का सहारा लोगे तो अंत तक तुम्हें पछताना पड़ेगा।
भगवान के सिवा किसी और का सहारा लोगे तो अंत तक तुम्हें पछताना पड़ेगा और नरक जैसा जीवन हो जाएगा। नरक जैसा जीवन भगवान के आश्रय में जो अपार सुख होता है कैसे हम तुम्हें बताएं। ये जीव सोचता है धन का आश्रय, परिवार का आश्रय बिल्कुल सब नाटक धोखा ही धोखा सच्ची वाली है। भगवान के सिवा दूसरे का सहारा लोगे तो अंतिम में तुम्हें पछताना पड़ेगा। नरक जैसा कष्ट होगा और अगर भगवान का सहारा है तो सच्चे माने जीवन परम मंगलमय देखने को मिल रहा है। नारकी स्थिति से जीवन परम मंगलमय देखने को मिल रहा है।
दूसरा संसार के मनुष्यों से जो प्रेम किया जाता है वह अगले जन्म का निमंत्रण है। अगला जन्म का और यदि भगवान से प्रेम किया जाता है तो परमधाम जाने का अगला जन्म का खत्म। अब देखो तुम्हें पसंद क्या करना है। तीसरा जिस शरीर में जितनी आसक्ति कर लोगे अगला वही जन्म उसी शरीर का मिलेगा। जैसे हिरण के शरीर में आसक्ति कर ली तो भरत जी हिरण बन गए। पुरंजन ने स्त्री में आसक्ति कर ली तो पुरंजन बन के अगले जन्म में स्त्री बनकर के जन्मा। इसलिए जिस शरीर से अधिक प्रेम कर जो मकान से ज्यादा प्यार करता है वो छिपकली बनकर मकान में रेंगता है।
ध्यान जो जिससे अधिक वैसे योनि को प्राप्त हे तुम योनि प्राप्त करने के लिए नहीं आए। तुम भगवान को प्राप्त करने के लिए मानव देह प्राप्त किया है। नाम जप करो। सच्चाई से नाम जप करो। तुम्हें खुद दिखाई देगा जो लिखा है। कोई किसी से प्यार नहीं करता। सिर्फ नाटक सिर्फ नाटक प्यार का चल रहा है। कोई प्यार जो राग और द्वेष पूर्वक जीवन व्यतीत करता है। वो दुर्गति का पात्र बनकर के नाना प्रकार की नारकी योनियों को भोगता है। प्राय राग द्वेष में ही जीवन जा रहा है। यह 18 दोष भोगने ही पड़ते हैं जो भगवान का भजन नहीं करता है।
भूख, प्यास, बीमारी, बुढ़ापा, राग, द्वेष, मोह, निंदा, चिंता, भय, खेद, विषाद, जन्म, मरण, विस्मय, शोक, मंद, अरति। कहीं मन नहीं टिक रहा। घोर, अशांत, डिप्रेशन में, अरति। यह 18 दोष भगवत विमुख को भोगने ही पड़ते हैं। और यदि वह भगवान के आश्रित हो जाता है तो उसमें जैसे भूख है, प्यास है, बीमारी है, बुढ़ापा है। इन सब में भगवान का एक विशेष कृपा प्रसाद रहता है। देखो बेटा और बहू की कथा सुन चुके हैं। एक संत भगवान ने कभी शिष्य नहीं बनाए थे। श्रीधर बाबा और जब वृद्धावस्था आई तो अपने लोग आठ द संतों की होड़ लगती थी कि देखो आपने एक घंटा सेवा की है।
अब आप हटिए अब हम सेवक और जानते उनको कैसे सोच कराई जाती थी। ऐसे टांग लिया जाता था दोष ऐसे हाथ में कराई जाती थी। क्यों? क्योंकि भजन करते थे। सौभाग्य था किसको शौच कराने को मिले किसको स्नान कराने को मिल जाए किसको वस्त्र धारण यह सौभाग्य भगवान के सिवा किसी को अपना नहीं माना तो ऐसे गोद में संतों की गोद में उनकी सेवा होती थी और अंतिम समय राधा राधा मुख से निकल रहा था सब संत कीर्तन कर रहे थे और ऐसे पधारे पूछो मत ये है ना कोई शिष्य ना कोई जगह ना कोई एक रुपया तो ऐसे भगवान की तरह अंतिम समय उनकी की पूजा हुई जब उनका शरीर असमर्थ था ड्यूटी लगती थी अलग-अलग ड्यूटी लगती थी कई संत भगवान अपने ड्यूटी में लगी थी कि इतने बजे से इतने और लड़ाई होती थी देखो आपने सवा घंटा आज कर लिया 15 मिनट ज्यादा कर लिया अब आप हटिए आप मुझे तो कहते यार थोड़ी देर और कर ले लोभ लगता कि जितना अधिक मैं सेवा कर पाऊं क्यों क्योंकि भजन परायण थे और वहां पैदा किया है संपत्ति दी है लात मार रहे हैं भगवान से विमुख जो है उसे विशेष 18 दोषों को भोगना पड़ता है।
जो भगवान के कृपा पात्र होते हैं उन्हें संत संग मिलता है। जिन्हें संत संग मिलता है। उनमें अंतकाल में जैसे भगवत प्राप्ति होगी वैसा संयोग बना दिया जाता है। अंत काल में दादू मन ही सोमल उपजे मन ही सोमल धोई सीख चले गुरु साधु की तो तू निर्मल होई नाम जपे रुचि साधु को साधु जपे रुचि नाम दादू दोनों एक टक यह अरंभ यह काम कह रहे मन गंदा हो गया है अब मन ही निर्मल हो तब बात बनेगी। कैसे निर्मल हो? बोले गुरु का उपदेश साधु का संग यह साबुन है। बहुत जल्दी मन को निर्मल कर देता है।
बोले जब नाम जपे तब रुचि साधु की जब नाम जपो कहे तो संतों में तुम्हारी प्रीति हो जाएगी। और जब संत नाम देंगे तब भगवान में प्रीति हो जाएगी। ये नियम है। ये सिद्धांत गुरुमुख के प्राप्त नाम से ही भगवत साक्षात्कार होता है। दादु हरि साधु यो पाइए अविगत के आराध साधु संगति हरि मिले हरि संगत सु साध। बोले जब हरि की कृपा होती तो साधु मिलते हैं। और जब साधु की कृपा होती है तो उस अविगत परमात्मा की आराधना शुरू होती है तब वो हरि मिलते हैं। तो हरि की कृपा का फल साधु और साधु की कृपा का फल हरि दर्शन हरि जब अव्यक्त कृपा करते हैं तब संत दर्शन मिलता है।
अब मोह भाव भरोस हनुमंता बिन हरि कृपा मिले नहीं संता तो मन भंग बहु विष भ्या निर्विष क्यों न होई दादू मिलिया गुरु गारुणी तो निर्विष किया सोई बोले ये मन बड़ा विष फैलाता है काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर बड़ा विषय बना दिया तो बोले अब ये विष कैसे उतरे बोले गुरु गारुणी विष उतारने वाले गुरुदेव हैं। जो गुरुदेव ने नाम मंत्र दिया है, उसको जपो तो मन का सारा विष उतर जाएगा। निर्विकार मन हो जाएगा। पूजा मान बढ़ाइया आदर मांगे मन राम कहे सब परिहरे सोई साधु जन सबके मन में होती है।
हमारी पूजा हो, हमारी मान हो, हमारी बाई हो, हमारा आदर हो। लेकिन साधु वही है जो मान बढ़ाई आदर को स्वीकार नहीं करता इच्छा नहीं करता सब में मेरे प्रभु है सबको प्रभु को भाव से प्रणाम इतने विराट रूप भगवान इतने रूप में आकर दर्शन देते यह भाव नहीं रखना मान बड़ाई आदर इसका कहीं भी नहीं मेरे प्रभु आकर मुझे दर्शन देते हैं करुणा करके इतने रूपों में दर्शन देते हैं जो भगवान को प्राप्त करना चाहता है। वह साधु कैसा होता है जो मान बढ़ाई आदर आदि को भी स्वीकार नहीं करता।
विष सुख माही रम रहा माया हित चित लाई सोई संत जो उभरे स्वाद छोड़ गुण गाई संसार के विषय भोगों में रम रहे जीवो का उद्धार कौन कर सकता है बोले संत बोले कौन संत जो बोले केवल भगवान के गुण गा रहा उसके बदले में कुछ नहीं चाहता है अगर कुछ चाह है रुपया पैसा भोग सामग्री स्वाद मान बढ़ाई प्रतिष्ठा तो उसकी वाणी का प्रभाव नहीं पड़ेगा। विषयों में फंसे हुए माया में फंसे हुए जीवों का उद्धार किससे होता है? बोले संत से। बोले किन संत से? बोले सोई संत जन उया जो स्वाद छोड़ गुण गाय स्वार्थ स्वाद इनको छोड़कर कोई भी चाह नहीं केवल स्वाता सुखाए तुलसी रघुनाथ गाथा बोले ऐसे संतों की वाणी से माया में फंसे हुए लोगों का उद्धार होता है साधु मिले तब उपजे हृदय हरि को ध्यान दादु संगति साधु की अभिगत पुरवे आ बहुत शीघ्र परमात्म प्राप्ति होती है।
ऐसे संत महात्मा के संग से उनके बताए हुए ध्यान नाम गुण कीर्तन से बहुत जल्दी भगवत साक्षात्कार होता है। प्रेम कथा हरि की कहे करे भगत ल लाई पिव पिवावे राम रस सो जन मिल आई बोले बड़े संतों की पहचान क्या होती है? बोले जिनके पास बैठने से केवल भगवत चर्चा ही हो। हमारे आचरण सुधरे, हरि नाम में प्रीति हो, हरि चरणों में प्रीति हो, भक्ति का हृदय में प्रादुर्भाव हो, वह स्वयं भगवत रस पिए हुए हैं और वही भगवत रस हमें पिला सकते हैं। साहब सो सनुख रहे सत्संगति में आई।
दादू साधु सब कहे सो निर्ल क्यों जाई? बोले साहब के सनुखता बनी रहेगी यदि संत संग रहेगा साहब हरि हरि के सनुख हो जाओगे और सनुख होए जीव मोह जह जन्म कोटि यग नाश तह करोड़ों जन्मों के पाप उस जीव के नष्ट हो जाते हैं जो भगवान श्री हरि की सनुखता प्राप्त कर लेता है वो सनुखता साधु संग से प्राप्त होती साधु संग कभी निष्फल नहीं हो सकता अमोगस निरैरी सब जीव सो संत जना सोई दादू एक आत्मा बैरी नाही कोई संत वही किसी भी संप्रदाय की मे पूरा विश्व विश्वंभर सब जग आभास एक ही परमात्म तत्व अनंत ब्रह्मांडों में है फिर मृत्यु लोक की बात क्या निर्वेरी सब जीव सो संत जना सोई सब किसी से बैर नहीं।
सब अपने हैं। सब अपनी आत्मा है। दादू एक आत्मा बैरी नाही कोई। काहे को दुख दीजिए घट घट आत्म राम। दादू सब संतोषिए यही साधु को काम। घट घट में हमारे प्रभु रमे हुए हैं। जो उसका साक्षात्कार कर लेता है। वही भगवत प्राप्त होता है। कैसे साक्षात्कार होता है? एक अक्षर पीव का सोई सत कर जानी हरि नाम सतगुरु कहा दादुर सो परवाणी जो गुरुदेव ने अक्षर बोला बस उसी पकड़ लिए बहुत जगह महापुरुषों से मिला है गुरु द्वारा दिए गए नाम मंत्र का अद्भुत चमत्कार है बस उसी में लग जाओ जितना जपोगे उतना ही लाभ मिलेगा दादू नी का नाम है तीन लोक तर जाए रात दिवस रटबो करे रात दिन बड़े भाग्यशाली जिनको यह पता है कि जाना है मुझे तो खूब अधिक धन कमा ले नाम रूपी धन राधा राधा राधा राधा वल्लभ राधा वल्लभ दादूनी का नाम है हरि हृदय नसारी मूरति मन माही बसे सांस सांस संभा भारी तब जानना कि हमारा नाम रंग ला रहा है।
जब हर स्वास में नाम चले और सामने नाम ही की छवि विराजमान हो। दादू जी साहब कह रहे मूरत मन माही बसे सांसे सांस संभारी। दादू नी का नाम है आप कहे समझाई और आरंभ सब छाण दे हरि नाम लो लाई। केवल लगन लगा लो नाम में सब पूर्ति हो जाए। जितना नाम अधिक जपोगे श्री भगवान गीता जी में कहते हैं कि कई प्रकार के हमने यज्ञों का वर्णन किया श्रेया द्रव्य मया यज्ञ ज्ञान यज्ञ पर तप सर्वम कर्माखिलम पार्थ ज्ञान परिसमापते बड़ी यज्ञ अभी कल चर्चा की थी कि श्री भगवान ने बताया है ब्रह्म यज्ञ द्रव्य यज्ञ स्वाध्याय यज्ञ तप यज्ञ प्राणायाम यज्ञ भगव दर्पण यज्ञ अभिन्नता यज्ञ कर्तव्य कर्म रूपी यज्ञ विषय हवन रूप यज्ञ समाधि रूप यज्ञ योग यज्ञ स्तंभ प्रवृत्ति ये सब यज्ञ हैं।
इन सब यज्ञों में भगवान कह रहे हैं जो द्रव्य यज्ञ है रुपया पैसा से जो यज्ञ होती है यह जितनी भी यज्ञ हैं इन सब में ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है सर्वम कर्माखिलम पार्थ ज्ञाने पर समाप्त इसलिए श्रेया द्रव्य मया ज्ञान यज्ञ परम तप परम कल्याण जो होता है वो ज्ञान होने से होता है इतना तो ज्ञान हो जाना चाहिए कि हमारा स्वरूप भगवान का अंश है। भगवत स्वरूप है। हम शरीर में फंस गए और मुझे मुक्त होना है इस शरीर से। इस शरीर से मुक्त होना है। अगर इस शरीर से मुक्त नहीं हुए तो बहुत घटिया शरीर मिलने वाले हैं।
कीड़ा, मकुड़ा कितने योनियां हैं। जो रुपए से यज्ञ होती है उसमें महत्ता धन की होती है। इसलिए वह परम लाभ नहीं प्राप्त हो पाता द्रव्य यज्ञ के द्वारा। द्रव्य यज्ञ में सब पदार्थ आ जाते हैं यज्ञ के क्योंकि वह सब अर्थ से प्राप्त होते हैं। एक द्रव्य यज्ञ करें 10 अश्वमेध यज्ञ और एक एक बार श्री कृष्ण को भाव से प्रणाम कर ले तो 10 अश्वमेध यज्ञ करने वाला श्री कृष्ण को प्रणाम करने वाले की बराबरी नहीं कर सकता। अब आप विचार करो द्रव्य यज्ञ कितना छोटा है जिसको बहुत बड़ा माना जाता है।
यहां भगवान कह रहे हैं द्रव्य यज्ञ से श्रेष्ठ है ज्ञान यज्ञ। क्योंकि सभी यज्ञ कर्म जन्य और कर्म करने वाले में यह रहता है कि मैंने ये किया। एक हमने देखा है यज्ञकर्ता को अभिमान रहित। अंदर के कितने विशुद्ध भाव होते हैं। धार्मिक पुरुषों में उनकी मैदा की कई फैक्ट्रियां थी। वह आते थे। पूर्व गुरु आश्रम में जब सन्यास मार्ग में थे द गाड़ी उनके साथ होती थी बहुत दूर से गाड़ी और पादुका उतार करके सबको वही रोक कर अकेले उन्होंने जब यज्ञ कराई सब जो यज्ञ के एक हाथ में टोकरी एक हाथ में सोनी जहां कोई खा पी के फिर हार सुविधाएं सब पवित्र वैदिक सिद्धांत से होना और उनका काम केवल यही था झाड़ू और टोकरी ली पूरे किलोमीटर में यज्ञ मंडप था पूरी सब व्यवस्थाएं और अकेले किसी का चंदा नहीं खूब अर्थ था और वो स्वयं ये करते थे जब कोई उनसे पूछता यज्ञ कोई
कहीं भी कोई पोस्टर बैनर नहीं और कोई पूछता यज्ञ कौन कराते तो हमें तो पता नहीं हम तो यहां दोना पत्तल फेंकने की सेवा मिली बस वो जानते हैं कोई नहीं जानता था यज्ञ कौन करा रहा खूब आनंदम ऐसे ऐसे कोई कोई द्रव्य यज्ञ करने वाले बिरला होते हैं जो भगवत समर्पित होते हैं पर उनको ज्ञान है इस बात का कि तदय वस्तु गोविंदम त्यम समर्प देनहार कोई और है देत रहते दिन रहन लोग भरम मोपे करे तासो नीचे नैन ऐसे वो गृहस्थ में रहते हुए भी वो महान याज्ञ थे यज्ञ करने वाले तो जब द्रव्य यज्ञ कराई जाती है तो उसमें कहीं ना कहीं अहम स्पुरित हो जाता मैंने इतने करोड़ अर्पित किए मैंने इतने लोगों को पया तो जीवन मुक्त होने के लिए वो पर्याप्त नहीं रह गया क्योंकि अहम का लय होना चाहिए।
इसीलिए भगवान कह रहे हैं सर्वम कर्माखिलम पार्थ ज्ञाने परिसमाप्त ज्ञान में क्या होता है? अहम का नाश हो जाता है। इसलिए भगवान यहां कह रहे कि सबसे बढ़िया यज्ञ है ज्ञान यज्ञ। अंतःकरण में तीन दोष होते हैं जिनके कारण भगवत साक्षात्कार नहीं हो पाता। मल मल कहते हैं संचित पाप को। जो संचित पाप होते हैं उनके कारण भजन में मन नहीं लगता। जहां भजन शुरू करोगे भगवत मार्ग की बातें शुरू करोगे तो पाप आकर्षण शुरू हो जाएगा। इसे मल कहते हैं। दूसरा होता है विक्षेप। चित्त का चंचल होकर बार-बार भोगे हुए विषयों का चिंतन करना।
इसे विक्षेप कहते हैं। आवरण आवरण कहते हैं अहंकार, अज्ञान। इन तीन के कारण जीव की भगवान में रुचि नहीं होती और भगवान की प्राप्ति में बाधा ये तीन पहुंचाते हैं। मल, संचित पाप, विक्षेप, भोगों के प्रति चित्त का चंचल होना, आवरण, अहंकार, अज्ञान। जब हम कोई भी कर्म करते हैं तो उसमें ये आवरण ढक जाता है। अहंकार मैंने ये किया और जहां ये हुआ मैंने ये किया तो उसका कल्याण नहीं हो पाता। यह खास बात है। उसका फल मिलेगा उसे भगवत प्राप्ति नहीं हो पाएगी। अहंकार विमूढ़त्मा कर्ता मनते अहंकार में मूढ़ता बनी रहती है और यह रहता है कि मैंने यह किया और जब मैंने ये किया तो अवश्य भोगना पड़ेगा।
चाहे शुभ हो या अशुभ हो भगवत प्राप्ति नहीं होगी। जब हमें किसी महापुरुष का आश्रय मिलता है संत महात्मा का और वह जब हमें उपदेश करते हैं तब हमें समझ में आता है कि सारे कर्म भगवान के लिए करने हैं। हमारे पास जो शारीरिक बल रुपया पैसा भोग सामग्री सब श्री भगवान की तो हम भगवत भाव से जब कर्म करके भगवान को समर्पित करने लगते हैं तो हमारे अंदर के दोष नष्ट होने लगते हैं। मल पहले नष्ट होगा। संचित पाप भस्म हो गए। अब हमको थोड़ा विवेक आने लगा कि जितने भोग भोगे उनमें कोई सुख तो है नहीं।
तो बार-बार चित्त जो भोगों की तरफ जा रहा था उसे वापस करने लगे। तो विक्षेप नष्ट होने लगा। अब अहंकार भगवत अर्पित होकर के चरणों में चला गया। तीनों ठीक हो गए। मल विक्षेप आवरण जहां हटा सामने सच्चिदानंद भगवान का उसको अनुभव हो जाता है। अब बोले यह मल विक्षेप आवरण हटाने के लिए जो साधु संग चाहिए गुरु का संग चाहिए वो कैसे प्राप्त हो बोले जब विवेक वैराग्य समदमाद सट संपत्ति मुमुक्षता श्रवण मनन निध्यासन तत्व पदार्थ संशोधन ये जो दैवी भागवती ज्ञान के साधन है इनकी जब प्राप्ति की इच्छा होती है तो गुरु बनाने की इच्छा होती है।
कोई ऐसे संत मिले, कोई ऐसे सद्गुरु मिले। देखो भगवान सामने विराजमान है अर्जुन के और कह रहे हैं कि जब कभी मल विक्षेप आवरण हटाने के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है तो गुरु की प्राप्ति की इच्छा होती है। तो अपने मल विक्षेप आवरण को हटाने के लिए कल्याण प्राप्ति के लिए मंगल के लिए सुख प्राप्ति के लिए ज्ञान यज्ञ के लिए तत्व ज्ञान के लिए किसी संत का आश्रय लो। कैसे बोले तद्व प्रणिपातेन परिष्न सेवया उपदेश ते ज्ञानम ज्ञान तत्वदर्श भगवान से पहले प्रार्थना करो कि हमको तत्व ज्ञानी महात्मा मिल जाए बड़ा मुश्किल है तत्व ज्ञानी महात्मा मिलना ये छोटी छोटी मे ऐसी बन गई है लड़ाई झगड़ा एक दूसरे की निंदा स्तुति समझ ही नहीं पा रहे।
जैसे जमीन में खड़े होकर देखो तो कोई सात खंड की कोई कुछ कोई कुछ ऐसे बिल्डिंग और थोड़ा हेलीकॉप्टर में बैठ के देखो ऊपर उड़ के तो सब एक जैसा दिखाई देने लगेगा। तो जो ऊंचाई में चढ़ा हुआ महापुरुष है वह एक जैसा देखता है। सब जगह एक है। देखो शास्त्रों में हमने वैदिक सिद्धांतों में भी पाया आ ब्रह्म है। आ अब आप कुछ भी बोलो आ निकलेगा। सर्वव्यापी ब्रह्म आ है। ये हमने शास्त्रों में पाया। क ख ग च ट ज्ञ का से ले ज्ञ तक कोई भी अक्षर बोलो आ निकलेगा। अब जो अक्षर है वो ब्रह्म में है।
ऐसे चराचर जगत ब्रह्म सर्वम खलमिदम ब्रह्म। अब ये वेद सिद्धांत पढ़ते हैं। लड़ाई झगड़ा कहां रह गया? कहां निंदा स्तुति रह गई? कहां राग द्वेष रह गया? कहां छोटा बड़ा रह गया? कहां अपना पराया रह गया? यही समझ सनातन आकाश की तरह है। ध्यान रखना। सनातन धर्म आकाश की तरह है। सनातन धर्म वायु की तरह है। सनातन धर्म जल की तरह है। सनातन धर्म पृथ्वी की तरह है। सनातन धर्म सूर्य की तरह है। जहां देखो वही सनातन सूर्य। सनातन वायु, सनातन जल, सनातन भूमि, सनातन आकाश, सनातन अग्नि, अंदर और बाहर ये है सनातन।
तो ब्रह्म सनातन परमात्मा सनातन तो धर्म सनातन उसको समझो ये छोटी छोटी मे नहीं सनातन सनातन आकाश की तरह है सनातन वायु की तरह है सनातन अग्नि की तरह है सनातन जल की तरह सबका भरण पोषण सनातन भगवान सबसे पहली बात कह रहे हैं ज्ञान तत्वदर्शना किसका संग करना है तत्व ज्ञानी हरिवंश महाप्रभु कह रहे हैं कैसे प्रिया प्रीतम के प्रेम में जाओगे बोले ये क्रूरा पापिनो न सभास दृश्य सर् वस्तुत निरीक्ष परम स्वराध्य बुद्धिम सबको आराध्य रूप में देखो चाहे पापी हो चाहे पुण्य आत्मा सब में राधा वल्लभ लाल विराजमान है ये आचार्य का आदेश है यह है ज्ञान तत्व दर्शना सब जगह अपने इष्ट को देखना यह कहां मिलेंगे यह भगवान मिलाएंगे भगवान से सबसे पहले प्रार्थना करनी चाहिए कि मुझे ऐसे संत का सानिध्य दीजिए जो आप में रमण करता हो।
मैं तो नहीं पहचान पाऊंगा। प्रभु आप मेरे हृदय को भी जानते हो और संत को भी जानते हो तो मुझे संत संग दीजिए। अब मोह भा भरोस हनुमंता बिनु हरि कृपा मिले नहीं संता और जब संत मिले तब क्या करो तो बोले तद्व प्रणिपातेन परिष् सेवया अर्जुन पहले उन महापुरुषों के पास जाए तो जाकर उनको साष्टांग दंडवत करें। संपूर्ण आत्म समर्पण का भाव साष्टांग दंडवत में माना जाता है। ऐसा भगवान क्यों कह रहे हैं? क्योंकि बिना श्रद्धा के आपको ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। श्रद्धावान लभते ज्ञानम अगर श्रद्धा कमजोर है तो ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता।
अगर वास्तविक किसी संत का लाभ लेना है तो श्री भगवान ने आदेश किया पहले अहंकार छोड़ो पहले कोरे कागज की तरह उनके पास जाओ। यहां इतनी लिखा पढ़ी करके आते कि डस्टर चलाने का मन ही नहीं होता। इतनी लिखा पढ़ी पहले से ही रखी हुई है। बिल्कुल बेकार। आप सच्ची मानिएगा 70 70 वर्ष जीवन के हो गए अभी तक यह नहीं निर्णय कर पाए कि मुझे चलना किधर है अहो भाग्य आप लोगों का जिनको यह चित्त का समाधान हो गया कि मेरा मार्ग क्या है नहीं 70 70 वर्ष हो गए और अभी यह नहीं पता कि चौराहे पर खड़े कि जाऊं किधर ज्ञान मार्ग में जाऊं कि ध्यान मार्ग में जाऊं कि योग मार्ग में जाऊं भजन मार्ग में जाऊं कि अभी तक यह निर्णय नहीं भगवान कह रहे हैं किसी ज्ञानी महापुरुष का आश्रय लेना है तो श्रोत्री और ब्रह्मनिष्ठ दो बातें कही है।
श्रोत्री कहते हैं जिन्होंने खूब गुरुजनों के चरणों में बैठकर शास्त्रों का श्रवण किया है और ब्रह्मनिष्ठ जो उसी तत्व में स्थित हो चुके हैं। ऐसे महापुरुषों से निवारण होता है संसार का जिनका एक ही उद्देश्य केवल श्री भगवान और भगवान में स्थित है। भगवान आदेश करते हैं प्रणिपातेन उन महापुरुषों के पास जाए हाथ जोड़कर साष्टांग दंडवत करें। नीचवत सेवेत सद्गुरु अपने को सबसे नीचवत मान के सद्गुरु का सेवन करें। कभी भी शरीर से गुरु का निरादर ना करें। तिरस्कार ना हो। इसलिए गुरु के सामने नम्र सरल और जिज्ञासा के भाव से उनकी आज्ञा पूर्वक सेवा करें।
अपने आप को गुरु के चरणों में सबसे छोटा अधीन सेवक समझे। शरीर और वस्तुएं दोनों गुरु के आज्ञा के अनुसार है। साष्टांग दंडवत प्रणाम का मतलब है मेरा शरीर गुरु की आज्ञा पर चलेगा। अहम गुरु के चरणों में अर्पित है। सेवया भगवान कह रहे हैं परिप प्रश्नेन के लिए सेवया शरीर और वस्तुओं से गुरु की सेवा गड मुख्य है गुरु की आज्ञा का पालन करना जिससे गुरु प्रसन्न हो बस वही कार्य करना उनकी प्रसन्नता प्राप्त हो गई उनके मन के संकेत के अनुसार तुम्हारी चेष्टा हुई उनकी आज्ञा के अनुकूल तुमने कार्य किया तो प्रश्न करना ही नहीं पड़ेगा।
उत्तर तुम्हारे हृदय में अपने आप आ जाएगा। देख लेना संत महापुरुषों की सबसे बड़ी सेवा होती है उनके संकेत के अनुसार चलना। उनके इशारे को समझना। वो किधर चलाना चाहते हैं? वो क्या चाहते हैं? अपना जीवन उनकी आज्ञा में अर्पित करना। संतों को जितना सिद्धांत प्रिय है उतना अपना शरीर प्रिय नहीं है। तो एक आदमी संत की शरीर सेवा करें। उनकी आज्ञा का उल्लंघन करें और एक आदमी केवल उनकी आज्ञा का पालन करे तो संत कृपा उसके पास ज्यादा फलीभूत होगी जो आज्ञा का पालन कर रहा है।
संत सिद्धांत की रक्षा के लिए अपने प्राण त्याग सकते हैं। इसलिए सच्चा संतों का सेवक वही है जो उनकी आज्ञा का दृढ़ता पूर्वक पालन करता है। तो पहले प्रणिपात साष्टांग दंडवत सेवया तन मन वचन से उनकी सेवा फिर परिश्न तब प्रश्न बनता है केवल प्रश्न होना चाहिए परमात्मा की प्राप्ति का अब जैसे लौकिक सांसारिक बातों को आप हमारा भी समय नष्ट करेंगे अपना भी समय नष्ट करेंगे वो तो आप भोग ही रहे हो आप उनसे से कैसे निकल पाऊं इसके लिए तो संत समागम मिला है और वहां आकर भी प्रपंच की चर्चा अब हम कैसे बताएं अब हमसे आकर के मान लो वोट का समय चल रहा है हम तो खुली बात करते हैं हमारा उद्देश्य भगवत प्राप्ति का है।
अब हमारे पास आए साष्टांग दंडवत किए बैठे अभी बोट में खड़े हैं। आपका आशीष चाहिए। तो भाई जय विजय इस पर ध्यान ना देकर राष्ट्र सेवा पर ध्यान दो। बाहरी जय विजय कोई विशेष बात नहीं। राष्ट्र सेवा की प्रियता ही विजय श्री है। तुम हार होते हुए भी हारोगे नहीं। यदि राष्ट्र सेवा का भाव है और यदि राष्ट्र सेवा का भाव नहीं पद भोग का है तो विजय होते हुए भी तुम्हारी हार है। वो कोई खास बात नहीं। महाराज श्री ने विजय श्री का आशीर्वाद दिया। हम कहते हैं भैया हमारी बात को समझो।
हमारा उपदेश केवल धर्म, राष्ट्र और भगवान के लिए है। विजय श्री उसी के पास है जो उत्साह संपन्न होकर हमारे राष्ट्र की सेवा का भाव रखता है। ये प्रजा भगवान का स्वरूप है। जब आप प्रजा को प्यार करोगे, उनके बीच में जाओगे, उनकी समस्याओं को देखोगे, वहां समस्याओं का निदान करोगे। अपने आप आप हमारे भारत के प्रिय रहेंगे। हमारा उद्देश्य भगवत प्राप्ति। हमारा उद्देश्य नेता और महान जनों को गाइड कर सके। ऐसी मेरी सामर्थ्य नहीं। हम तो उनके गाइड के लिए हैं जो इस संसार से छक गए हैं और भगवान की प्राप्ति करना चाहते हैं कि अब मैं भगवान को प्राप्त हम ना किसी के वोट जिता पाएंगे और ना किसी के हम सहयोग कर पाएंगे।
हम इतने बड़े महात्मा नहीं है कि विजय श्री नहीं होगी। कह तो दिया किसकी विजय हो गई? कुछ नहीं होगी। हां हरि शरणम हरि शरणम राधा राधा राधा पक्का संसार से विजय प्राप्त कर लोगे। माया पर विजय प्राप्त कर लोगे। ये बात हमको बड़ा चुभता है छल कपट का व्यवहार। हम तो सिद्धांत की बात करते हैं। आप उसे घसीटते हो पार्टी बंदी में। आप उसे घसीटते हो अपनी नेतागिरी में। हमारे पास यह सब नहीं। कम से कम संतों को तो बखश दो। भगवान के मार्ग में चलने लायक उनको तो रखो। हमारे लिए संपूर्ण भारत प्राण प्रिय आत्म स्वरूप है।
हमारे लिए ना कोई श्रेष्ठ है, ना कोई लघु है, ना कोई प्रिय है, ना अप्रिय है। सब हमारी आत्मा है। जितनी भी पार्टियां जितने भी भारत देशवासी सब हमारी आत्मा है। हमारे लिए कोई एक नहीं है। इसलिए प्रार्थना है कि ये जो पक्ष लेकर आया जाता है कि हमको विजयश्री का आशीर्वाद मिले। ये ऐसा यहां बिल्कुल नहीं है। कदापि मत आइए। यहां आइए तो अपना परिचय मत दीजिए कि हम नेता जी हैं। आप आइए भगवत चर्चा सुनिए और आंख मूंद कर प्रणाम कीजिए श्री जी को और चले जाइए। यहां परिष्नन किस बात का प्रश्न?
भगवत प्राप्ति का प्रश्न। इसके अलावा हमारी प्रार्थना है आप अपना समय बर्बाद मत कीजिए। मेरा बर्बाद मत कीजिए। खिलवाड़ मत समझो साधु महात्माओं को। कि आप उनकी बात को घसीट कर के अपने पक्ष में अगर लिखने की कोशिश करोगे तो पक्ष नहीं रह जाएगा। बहुत सावधानी से यह पार्टी बंदी नहीं है। साधु महात्माओं का खेल है। इनमें बहुत राजा जोगी अगंजल इनके उल्टी रीत परशुराम इनसे बच के रहिए। इनसे करिए थोड़ी प्रीति संभल करके राज योग हठ योग ये बड़े-बड़े तो आप सत्संग के लिए आए। सिर्फ एकांतिक भगवत प्राप्ति के प्रश्न के ही करता आवे।
वो कोई भी हो सकता है। उसके लिए हमारे पास कोई योग्यता की बात नहीं। कोई भी हो चाहे आप अभिनेता हो, चाहे आप नेता हो, चाहे ग्रामीण हो, चाहे आप कोई पदाधिकारी हो। हृदय से आपका स्वागत है। लेकिन आप अपना परिचय बता करके आप अपनी वोट बैंक पुष्टता के लिए, आशीर्वाद के लिए हमारे में योग्यता नहीं। हम माइक से कह रहे हैं। माइक से कह रहे हैं। मेरे में योग्यता नहीं कि मेरे हाथ धर देने पर कोई पदाधिकारी बन जाओगे। नहीं हम हाथ धरेंगे तो बाबा जी बन जाओगे। पदाधिकारी राधा वल्लभ लाल
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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