यह अपनाया तो स्वार्थ–परमार्थ दोनों बनेंगे; लोक–परलोक सुधर जाएगा // 20/11/2025
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माशयाम निर्वा परम शीतल माश्रया परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप नवनित निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले युगल चंद प्राणाराध्य श्री प्रिया प्रीतम जो समस्त हित परिककर निज परिकर आत्म समर्पण यह भक्ति की पूर्णता है। आत्म विस्मरण यही हमारा भारी बंधन है। हम अपने को भूल करके देह भाव में नाना प्रकार के विषम संसार के भोगों में व्यवहार में चिंतन में जो हमारा दिव्य स्वरूप है जो महा सुखमय है उससे वंचित है।
हमारा स्वरूप है सुख राशि आनंदमय और हम आनंद की खोज विषयों में कर रहे हैं। अब इतनी सामर्थ्य नहीं रह गई कि हम अपने बुद्धि बल से इस विषय रूपी दलदल से हट पावे। अब हमें आत्म समर्पण करना है प्रभु को। करुणानिधान प्रभु पीछे के सारे अपराधों को माफ कर देते हैं। उनका स्वभाव है और यह सिद्धांत भी है। अगर हम इस जन्म में अपने संचित कर्म भस्म नहीं कर पाए, क्रियमान भगवत समर्पित नहीं कर पाए। प्रारब्ध को आनंद पूर्वक नहीं सह पाए तो बहुत घाटा हो जाएगा, हानि हो जाएगी क्योंकि और किसी योनि में यह करने का अधिकार नहीं है।
केवल मानव देह में ही है। इसलिए प्रार्थना है भोगों में ऐसा प्रमाद भरा हुआ है कि आप सोच भी नहीं सकते कि हमको भगवत प्राप्ति करनी है। हमारा लक्ष्य निरंतर भजन है। सत चिंतन है। आपकी सोच ही नहीं हो सकती। इतना मलिन हृदय यह कर देती है माया। बड़े कृपा पात्र जन हैं जिनको थोड़ी चेतना तो जागृत हुई कि हम सत्संग सुने हमारे जीवन में गंदे आचरणों का त्याग हो और सत आचरण अच्छे आचरण वो भी भगवत बल से भगवत समर्पित बस जीवन की धारा आनंद की तरफ चल पड़ी बड़ा कठिन है निरंतर नाम जप करना आप देख लोग बहुत से उपासकों से मिले वो कहते हैं और सब कुछ में हमारा भाव बनता है रुचि बनती है पर जहां हम नाम निरंतर जपने की सोचते हैं घबराहट आ जाता है भय होने लगता है और मन साथ नहीं देता है सच्ची बात मानना बिल्कुल ऐसा ही है और सब कुछ करने में मन राजी हो जाएगा धार्मिक चेष्टाएं पुण्य दान तीर्थ याटन सब कुछ लेकिन यह नाम में निरंतरता चलो निरंतर नहीं घंटे दो घंटे एक ही नाम बिना किसी विक्षेप के बराबर चलाना बहुत कठिन होता है और यही नाम ही हमको वो ज्ञान शक्ति प्रदान करता है कि हमारा जो आत्म विस्मरण हो गया वो स्मृति जागृत हो जाती है।
बिल्कुल आप सत्य समझिए। नाम के बिना ना प्रेम प्राप्त होगा और ना ब्रह्म बोध प्राप्त होगा। नाम बहुत आवश्यक है और नाम के प्रति जिनकी रुचि होने लगी है। बहुत बड़ी मंजिल तय कर चुके हैं। समझ लो आप क्योंकि बिना पाप नष्ट हुए अनर्थों की निवृत्ति हुए नाम प्रिय लगेगा ही नहीं। जहां तुम्हारी जिभ्या में थोड़ा भी नाम का स्वाद आया तो ऐसी रुचि ऐसा नशा चढ़ता है कि अगर कोई बात करने की चेष्टा करे तो उस समय बिल्कुल असहनीय हो जाता है। नहीं नहीं हमें नहीं बात करनी। हमारे में ऐसी बहिर्मुखता आ गई कि घंटों कोई प्रपंच की बात करें।
हम कर रहे हैं। हमें चिंता नहीं है कि मेरा अमूल्य समय अमूल्य स्वासे जो भगवत प्राप्ति के लिए मिली है। जो परम धन नाम रूपी खजाना पाने के लिए उनको हम कहां भोगों की वार्ता में प्रपंच की वार्ता में व्यर्थ के चिंतन में लगा रहे हैं। श्रीपाद कह रहे हैं हम अपने जीवन को बेच दिया। कल जैसे चर्चा हुई थी आज मैं अपने जीवन को धाम के नाम बेच दिया। धाम की कृपा से नाम निरंतर चलने लगता है क्योंकि यह सब धाम के अधीन है। प्रिया प्रीतम रूप लीला और इनका नाम तो यहां गूंज रहा है।
हमारी श्रवण मायाकृत प्रपंच से ऐसी मलिन हो गई कि सुनाई नहीं दे रहा। नहीं तो यहां के पक्षी यहां पत्तों की खरकन यहां वायु के प्रवाह में राधा राधा राधा चलत फिरत सुनियत यह श्री राधा वल्लभ लाल ऐसे वृंदा विपिन में बसत रहो सब काल यहां नाम पकड़ता है साधक को यदि अपराध ना करे हृदय की बात कह रहा हूं बाहर हम नाम पकड़ने का प्रयास करते हैं तो पकड़ में नहीं आता और यहां फिरे स्वार्थ अपने भजन गहे फिरे बा नाम पकड़ता है साधक को यह देखा है नाम पकड़ता है अंतर की चेतना से नाम पकड़ता है बड़ा चमत्कारिक धाम है वृंदावन हृदय की बात कह रहा हूं विश्वास कीजिए यदि आपको निरंतर वास करने का सौभाग्य ना हो तो जब कभी समय मिले आप भागकर वृंदावन आइए अमोग जीवन का लाभ आपका अमोग जीवन परम लाभ प्राप्त हो जाएगा।
यह मोग व्यर्थ जीवन व्यर्थ चिंतन व्यर्थ क्रियाएं व्यर्थ भावनाएं ये धाम नष्ट कर देगा। यदि अपराध ना हो तो श्रीपाद कह रहे हैं श्री वृंदा विपिन मया शरीर में तद विकतम त खलेंद्रियम सचितम श्री राधा रमण पदारविंद भक्ति मूल्यन श्रुति वत्सा ददाो किम बेच दिया अपने आप को बहुत बहुत महिमामय बात है चारों बराबर सामर्थ्यशाली है धाम नाम रूप लीला तो श्रीपाद ने देखा कि धाम के प्रभाव से नाम चलने लगा नाम के प्रभाव से रूप का प्रकाश हुआ रूपा शक्ति लीला में प्रवेश करा दिया।
बहुत करुणामय धाम है वृंदावन। यह जड़ देश नहीं है। परम चैतन्य घन है। सच्चिदानंद घन है। यह प्रेम आनंदमय है। बेच दिया अपने को। जो अखंड वृंदावन वासी हैं। धन्य है उनका जीवन। बस केवल एक बात से बचते रहे। वैष्णव अपराध ना बने। यह वैष्णो धाम है। फिर पीछे आपने श्रवण किया है कि श्रीपाद कहते हैं धाम भी कृपा नहीं करेगा जो संत अपराध वैष्णव अपराध फिर धाम कृपा नहीं करता यह वैष्णो धाम है। अगर एक अपराध से बच जाए वैष्णो धाम में वैष्णव अपराध ना हो तो फिर आप देख लेना सारी अपराध प्रवृत्तियों का नाश अपने आप धीरे-धीरे हो जाएगा।
श्री वृंदावन का ऐसा प्रभाव है कि हृदय में जो विकार बड़ी-बड़ी साधना से नहीं हटाए जा सके वो कृपा से ऐसे सहज में हट गए। बिल्कुल कह रहा हूं। बड़ी-बड़ी कठोर साधना से भी जिन विषयों की निवृत्ति जो स्फूरण अंदर हो रहा था उसे नहीं कर पाया गया। उस श्री धाम के आश्रित होने पर स्वाभाविक मलिनता नष्ट हो गई। स्वाभाविक स्फूरणा नष्ट हो गई। मैंने बेच दिया। विक्रीतम अपने आप को बेच दिया। अब आप देख लीजिए बेचा है कि नहीं। जहां आत्म समर्पण शब्द है वो बेचना ही है। श्री धाम वृंदावन के हाथ हम बिक गए।
अर्थात श्री वृंदावपिन मया शरीर में तद विकृतम खरीद लिया वृंदावन ने हमें तो क्या आपको मिला इस बेचने पर अपने को बेच दिया वृंदावन को बोले श्री राधा रमण पदारविंद भक्ति मूल्यन अत्यंत दुर्लभ बात श्री श्यामा श्याम के चरणारविंद का प्रेम प्राप्त हो गया जो भक्ति का स्वरूप है वो वो प्रेम है। अपने शरीर को तो हम छोटे-छोटे क्षद्र विषयों में भी बेच चुके हैं और हाथ नहीं लगा। कई लोग बोलते हैं कि जब भगवान की कृपा से पहली बार मनुष्य का शरीर मिला तो हम कौन से कर्मों का भोग भोग रहे हैं?
क्योंकि पीछे तो हम मनुष्य बने नहीं। नहीं नहीं असंख्यों बार मनुष्य बन चुके हो। यह जो मानव देह है ना असंख्य बार प्राप्त हो चुका है। तुम बहुत पुराने हो। कितने युग कितने कल्प बीत गए तुम्हें बार-बार जन्म मरण के चक्र में जन्मते मरते लेकिन तुमने वो कार्य नहीं किया जो करना चाहिए था। भगवत प्राप्ति बहुत बार भगवान ने कृपा करके अवसर दिया है। अबकी बार सत्संग मिल गया। अगर आप स्वीकार ना करें सत्संग के वाक्य तो फिर जीवन बेकार हो जाएगा। जब भगवान अवतार लिए थे तो हम कहीं ना कहीं होंगे क्योंकि हम कोई ना कोई शरीर धारण किए तो रहे होंगे।
परम पद मिला नहीं तो हमारा चक्र तो चलता ही रहा ना। और अविनाशी है। चैतन्य घन आत्म स्वरूप मुक्त हुआ नहीं तो इसका मतलब जब भगवान का अवतार हुआ होगा तब भी कहीं ना कहीं किसी योनि में होगा। पक्का समझो अगर स्वीकृति ना हो तो भगवान सामने होने पर भी भगवान के प्रति भगवत भाव या भगवत दर्शन का सुख नहीं मिलेगा। जैसे दुर्योधन, दुशासन आदि को सामने भगवान हैं। पर ना भगवान की बात मान रहे हैं और ना भगवान को भगवान मान रहे हैं। सत्संग से यदि विवेक जागृत हो जाए, स्वीकृति हो जाए तो कोई कण ऐसा नहीं जहां भगवान तुम्हें दिखाई ना देने लगे।
ये माया का पर्दा हटते ही वही है वही दूसरा कोई नहीं। भगवान ने अपनी विभूतियों का वर्णन किया है। कभी पढ़ के देखो त्रिगुण माया भी वही है। पंचभूत भी वही है। कण-कण भी वही है। पर हमें नहीं दिखाई दे रहा क्यों हमारे अंदर भगवत भाव नहीं है। हमारा हृदय मलिन हो चुका है। अब हमें कोई उपाय समझ में नहीं आ रहा। तो कह रहे हैं कि धाम का आश्रय ले लो। बहुत सरल है। धाम का आश्रय ले लो। अखंड वास तो धाम की महारानी जो लाडली जो है उनकी कृपा से मिलेगा पर आश्रय तो ले सकते हो जहां भी हो वहीं से वृंदावन का आश्रय ले लो हे वृंदावन मैं आपकी शरण में हूं अपने जीवन को हम आपको समर्पित करते हैं।
मात्र वृंदावन का जहां चिंतन प्रारंभ हुआ तो बड़ी-बड़ी साधनाओं से जिन पापों का नाश करना बड़ा कठिन हो जाता है वो नष्ट हो जाते हैं। वृंदावन को चिंतवन यह दीप उटि जन्म के अगम काट करे उजियार करोड़ों जन्मों के महान पापों का वृंदावन का आश्रय और चिंतन मात्र नाश कर देता है। और इतना ही नहीं उजियार प्रेम प्रकाश कर देता है। श्री धाम वृंदावन को हमने अपना जीवन समर्पित कर दिया। एक बार दांव खेल लो ना। बहुत जगह आपने खेल के देखा है। कभी किसी शरीर के लिए शरीर को बेच दिया।
कभी किसी भोग के लिए शरीर को बेच दिया। कभी किसी इच्छा के लिए शरीर को नष्ट कर दिया। देखो आप अपने शरीर की क्या कीमत लगाए हो। जा रहा है तुम्हारा जीवन मृत्यु के गाल में। तुम क्या ले पाए हो और किसको जीवन दे पाए हो? झूठा जीवन। यदि नाम जप नहीं है, भगवत आश्रय नहीं तो कुछ नहीं तुम्हारे पास है। सिर्फ पाप और पुण्य ये दो कर्म है। दोनों व्यर्थ ही है। पुण्य से तुम्हें थोड़ा अच्छे भोग मिलेंगे फिर क्षीण हो जाएगा। वो कोई स्थाई चीज नहीं है। इसलिए स्थाई वस्तु अविनाशी प्रभु का नाम, धाम, रूप, लीला इसी की प्राप्ति के लिए आए हैं।
अगर हम अपना आत्म समर्पण कर दे तो सारी जिम्मेवारी हमारे प्रभु ले लेते हैं। सारी जिम्मेवारी पर हमें आत्म समर्पण भी करना नहीं आता। इसीलिए भगवान कृपा करके साधु समागम देते हैं। साधु समागम से पता चलता है कि आत्म समर्पण कैसे होता है। तो आठ भक्ति जो है आत्म समर्पण कराने के लिए है। श्रवणम कीर्तनम स्मरणम विष्णुपाद सेवनम अर्चनम वंदनम दास्यम सख्य तब आत्म समर्पणम और जहां आत्म समर्पण हुआ फिर किसी साधन का वर्णन नहीं है। पाई रस भक्ति ग जुग जुग जग दुर्लभ भव इंद्राद विधिम आत्म समर्पण से ही महा प्रेम की प्राप्ति होती है।
इसीलिए कह रहे हैं कि मैंने अपने आप को बेच दिया। बड़े भाग्यशाली जन हैं। कोई निष्ठा तो आवे हृदय में जिनके गुरु निष्ठा, नाम निष्ठा, धाम यहां विषय निष्ठा है। अहंकार की निष्ठा है। मनमानी निष्ठा है। जो मन कहेगा वही हम करेंगे। जो इंद्रियां कहेंग वही सुख है। बहुत भूल में जीवन जा रहा है। श्री राधा रमण पदारविंद भक्ति मूल्यन श्रुति वचसा ददास नो क्यों मैंने सुना है कि प्रभु को आत्म समर्पण कर दे धाम को आत्म समर्पण कर दे तो वो वाक्य मुझे याद है कि उसका निश्चित परम कल्याण हो जाता है।
वह प्रेम को प्राप्त होता है। यही सुनकर मैंने अपने आप को बेच दिया। सुनने से शरणागति होती है। श्रवण सुजस सुनि आयो प्रभु भंजन भव वीर त्राहि त्राहि आरती हरण शरण सुखद रघुवीर आपकी महिमा सुनी प्रभु आ गया आपकी शरण में त्राहिमाम अब जैसा भी हूं मैं आपका हूं। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं जिसके हृदय में थोड़ी भी श्रद्धा वृंदावन के प्रति आई तो कह रहे हैं सब संदेह देह के जह अरु विषयन को संग लगे जो वृंदावन को रंग यदि वृंदावन थोड़ा भी प्यारा लगने लगे रसिकों का तो प्राण है वृंदावन जीवन है वृंदावन सर्वस्व है वृंदावन सच्ची मानिए जिस दिव्य शोभा दिव्य लीला परम सुख को कहा गया संभाव्य पविंच नारद शिव स्वयंभय बड़े-बड़े ईश्वर कोटि के महापुरुषों के लिए अगम्य है अगर वृंदावन को आत्म समर्पण कर दिया वृंदावन प्यारा लगने लगा तो आप देख लेना जहां संभाव्य संभावना नहीं इन ईश्वर कोटि के महापुरुषों की वो आपके नेत्र गोचर हो जाएंगे।
यह गांव जैसा नहीं है। यह ब्रह्मा का रचा हुआ नगर नहीं है। बड़ा दिव्य अलौकिक धाम श्री वृंदावन है। अचानक दृश्य बदल जाता है। ना कोई बिल्डिंग है ना कोई ये सांसारिक रोड है। सच्ची मालना दिव्य कुंज निकुंजे और गलब यहां दिए हुए निकस कुंज ठाड़े भय भुजा परस्पर हंस श्री राधा वल्लभ मुख कमल निरख नयन हरिवंश ये नहीं यहां की दर्शन केवल होते हैं। नहीं एक बार जिसको नेत्रों में प्रिया प्रीतम की झांकी पड़ी कि सदा सदा के लिए प्रिया प्रीतम का संग प्राप्त हो जाता है। छिन छिन बिहरत संग व्यवहार में वो कार्य वर्तते हुए दिखाई देता है पर वो व्यवहार में नहीं होता।
वह अपने आराध्य देव में स्थित होकर यही भागवतिक शक्ति है कि यदि व्यवहार में है तो फिर आंतरिक कैसे अपने आराध्य देव में है। नहीं यह बुद्धि की क्षमता से नहीं होता। जहां से समस्त ब्रह्मांडों को बुद्धि प्राप्त होती है, वह प्रभु ऐसी सामर्थ्य देते हैं कि अपने आराध्य देव में स्थित रहते हुए व्यवहार करता नजर आता है। एक बार केवल वो वृंदावन प्रदान करता है। बिल्कुल अक्षरशा सत्य समझो। यह वृंदावन तुम्हारे जीवन में ऐसी घटना प्रकट कर देगा। निहाल हो जाओगे। बस अगर हमारे धाम वास करते हुए या धाम आश्रय लेते हुए भाव नहीं बढ़ रहा तो आप अपने हृदय को देखिए कोई ना कोई नकारात्मक भाव किसी न किसी की निंदा किसी ना किसी वैष्णव के प्रति अपराध भाव है।
अपने लोग जान ही नहीं पाते। बातचीत में अपराध कर देते हैं। सहज में ऐसे भारी अपराध कर देते हैं। किसी भी संत की, किसी भी वैष्णव की हम ऐसी हे निंदात्मक बातें करने लगते हैं। आप क्या जानो? हृदय की स्थिति को क्या जानो। बाहरी व्यवहार से किसी की हृदय की ऊंचाई को नहीं देखा जा सकता। बड़े-बड़े ऋषियों से भूल हो गई। माता शबरी की हृदय की स्थिति को कोई नहीं देख पाया। उनके गुरुदेव जानते थे किस महान रस भाव में यह देवी विराजमान है और सब बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि हे भाव से देखते थे भीलनी है ऐसा ऐसा भगवान सच्चिदानंद प्रभु सबके नेत्र खोल दिए केवल सबरी माता से मिलने गए वहां किसी के आश्रम में नहीं गए आप विचार करके देखिए हृदय की स्थिति को वो ब्रह्म ऋषि जान पाए जहां घोर निशाचर रहते हैं जो जिंदा ऋषियों को खाते हैं।
अपने तपोबल से वह सुरक्षित हैं। लेकिन उनको भी शबरी जी के हृदय की स्थिति का ज्ञान नहीं। वो समझते हैं हम बड़े महान है। ये तो स्त्री शरीर है और ये भीलनी है। कहां? बस अगर कहीं आसपास सोहनी लगा रही है तो वो दूर हटते थे। कहीं सोहनी से कोई कण छू गया तो हम अपवित्र हो जाएंगे। क्या ज्ञान है? क्या स्थिति है इनकी? क्या जान रहे हैं शबरी माता की स्थिति को? भक्त के हृदय की स्थिति को जानना सिर्फ भगवान या उसी कोटि के महापुरुष जैसे मतंग ऋषि जानते थे कि हमारी ये जो शबरी जी है ये कितनी भाव की ऊंची दशा में विराजमान है।
हम किसी वैष्णव या किसी संत की बाहरी अपनी बुद्धि की कल्पना के अनुसार अपनी बुद्धि के निर्णय के अनुसार देख पाते हैं। बाहरी प्राकृतिक और हम निंदा कर बैठते हैं। नहीं हमें अपने हृदय को पावन करके प्रियाल के प्रेम में प्रभु के प्रेम में यदि पहुंचाना है तो नियम लेना होगा। धाम की कृपा आपको रस में डुबो देगी बस अपराध ना बनने और जैसे हमारे द्वारा कामा आदि अन्य दोष हैं तो कह रहे हैं कि सब संदेह देह के जय है अरु विषयन कोष जहां हमारे अंदर विषय पूर्ण हो रही जहां हमें विषय पुरुषों की प्रेरणा से विषयों के प्रति आसक्त हो रही ये वृंदावन माफ करके हमें आगे बढ़ा देगा विश्वास करो होए विषय विनाश होए वृंदावन बस गति होए सुदृढ़ सत्संग होए रस रीति अगाधा होए सुजस जग प्रगट होए पद प्रीति सु राधा ये धाम है धाम होए विषय विष नाश होए वृंदावन बस गति होए सुदृढ़ सत्संग होए रस रीति अगाधा होए सुजस जग प्रगट होए पद प्रीति सु राधा धाम की महिमा आपको निर्विषय कर देगी।
आपको महत पुरुषों का संग प्रदान कर देगी। आपके हृदय में वृंदावन रस रीति का उदय हो जाएगा। आपके हृदय में गोरे चरणारविंद विराजमान हो जाएंगे। महारानी जी के वह गोरे चरणारविंद जिनके चरणों में महावर स्वयं अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक परात्पर प्रभु रचते हैं और धन्य भाग मानते हैं जोप श्री वृंदावन धन भावे परम धनी है जो वृंदावन धन में आसक्त हो गया है। वृंदावन का धन का क्या स्वरूप है? वृंदावन के धन है श्री प्रिया प्रीतम वृंदावन के अधिकार में है। जैसे वृंदावन चाहता वैसे इनको खेल खेलना होता है।
वैसे क्रीड़ा करते हैं। जैसे ये क्रीड़ा करते हैं वैसे ही विस्तार शोभा का वृंदावन तत्काल करता है। यह चिदानंद वृंदावन धाम है। यह आपको परम धन प्रदान करता है। राधा नाम कहीं नहीं है। आगम निगम अगोचर राधे जैसे कोई कहता है हमें तो शास्त्रों में तो नहीं हम खुद कह रहे हैं आगम निगम अगोचर राधे ये जो किशोरी जो का सांद्रानंद घन प्रेममय रूप है परम रस सुधामय नाम राधा नाम है यह धाम की कृपा से आता है। हृदय में, वाणी में या श्रवण इंद्री में अगर कोई धाम का प्रेमी है सो ही राधा नाम का परिचय आपको मिलेगा अन्यथा नहीं मिलेगा।
हमारी रसमय वाणियां इस बात में भरी हुई है। प्यारी जी के रूप में प्यारी जी के नाम की महिमा में तो कह रहे हैं जो पे श्री वृंदावन धन भावे अब मैं वृंदावन धन पायो अविनाशी धन है। विनाशी धन तुम्हारे साथ एक सिक्का भी नहीं जाएगा। चाहे जितना बैंक बैलेंस कर लो। चाहे जितना बढ़िया मकान बना लो, चाहे जितनी भोग सामग्री एकत्रित कर लो, जाना है। जाना है यहां से। सोचो जरा एक क्षण सोचो। यहां से जाना है। कैसा महसूस होता है? और जाना है परम सत्य है। सबको जाना है। कब जाना है यह भी पता नहीं।
पर जाना है। घबराहट नहीं पैदा हो जाएगी। सोचो जरा। अब हमें किसी क्षण बुलावा आ सकता है। हर समय तैयार जो हैं उनको भय नहीं होता है। तैयारी क्या है? राह में हमें कोई कष्ट नहीं होगा और हमें पता है कि हमें कहां जाना है। बस दो बात यदि आपके पास है तो मृत्यु आपके लिए खिलौना हो जाएगी। मृत्यु का नाम सुनते ही आप भयभीत हो जाएंगे। क्यों? क्योंकि आपके पास ना राह का खर्च है और जहां जाना है वहां कोई परिचय नहीं है। जहां जाना है वहां परिचय नहीं। बस इस बात से घबरा रहे हो कि जो परिचय बनाया है जो धन एकत्रित किया वो छूट जाएगा।
बस मृत्यु यही भय प्रदान करती है। नहीं मृत्यु कोई खास वस्तु नहीं है। जैसे आप बाल्यावस्था से जवान हुए। जवानी से बुढ़ापा आया। ऐसे बुढ़ापा से एक मृत्यु और मृत्यु से फिर नया जन्म ये क्रम चल रहा है। पर भयावह इसलिए है कि आप जीने की इच्छा और इतना प्यार फैला चुके हैं रुपया से मकान से सब जगह अपनी ममता रख दिए अब मरना है। ये सब छूटेगा। यह है दुख। भयानक दुख जो आंतरिक होता है वह राग का होता है। वह ममता का होता है। जीने की इच्छा का होता है। और जहां जाना है वहां परिचय नहीं है।
जहां जाना है वहां के लिए राह खर्च नहीं। राह खर्च है। परम धन राधा नाम आधार परम धनी हो जाओगे। सच्ची कहते हैं यदि आप आत्म समर्पण प्रभु को कर चुके हैं तो स्वप्न में भी भय देने की ताकत नहीं। स्वप्न में जागृत की तो बात जाने दो। कई बार देखा स्वप्न कोई भयाव आने वाला है। ऐसा दृश्य उपस्थित है। उसी समय किसी न किसी रूप में स्वप्न में भय से रहित कर दिया जाता है। जागृत की तो बात जाने दो। अगर नाम आपके पास है तो आपको परिचय मिल जाएगा कि आपको जाना कहां है और जिसको जहां जाना है वहां का परिचय मिल गया तो मरने से सब जग डरा मेरो मन आनंद ये बात मृत्यु आनंदमय हो गई अब कौन सा भय है सबसे बड़ा भय तो मृत्यु का ही है और उसे आप बुलाए हुए हैं।
यह माया की चाल है आपके समय को नष्ट करने के लिए। भोगों में नाना प्रकार की आसक्तियों में इतने बुलाए हुए हैं कि आपको यह ध्यान ही नहीं आता कि अपने को जाना है। सोचो जरा एकांत में कभी सोचना। जब आपको प्रपंच के चिंतन में मन घसीट रहा हो तो सोचना जाना है। सब नीरस लगने लगता है। सब नीरस जाना है। जाना है ये भी छोड़ना है। जाना है। तब जहां जाना है उसके परिचय की जिज्ञासा धन्य है वह जिनके अंदर मृत्यु का भय लग गया और वह अभय होने के लिए भगवान की शरण में बढ़े आगे जो सभी हित आया आवा शरणाई रखो ताई प्राण की नाई भगवान कह रहे हैं यदि भयभीत होकर मेरी शरण में आ जाए तो जैसे मैं अपने प्राणों अवश्य प्यार करूंगा उसे निर्भय कर देते हैं तो जो पैसे वृंदावन धन भावे अगर वृंदावन का धन आपको अच्छा लगने लगे।
वृंदावन का परम धन राधा नाम है। इसी से सब प्राप्त हो जाएगा। राधा नाम जिभ्या पे चल रहा है। सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। विश्वास कर लीजिए। यह धाम का गुप्त धन है जो स्वयं भगवान श्री कृष्ण चंद्र जो अपनी बंसी से राधा नाम गाते रहते हैं। अपनी जिभ्या से गाते रहते हैं। था कालिंदी तट कुंज मंदिरतो योगेंद्र वत पद ज्योति ध्यान परा सदा जपतिया प्रेमास पूर्ण हरि यमुना के पावन कुंज में एकांत में बैठकर राधा राधा राधा राधा वो हम तो उनके अंश हैं। उनके चरण सेवक हैं। अगर हमें राधा नाम जपने को मिला अहो भाग्य स्वयं हरि जपते हैं।
ये परम धन है आप कोई क्यों तर्क ना करके आप कुछ दिन श्रद्धा विश्वास भाव बने तो जप लो और ना बने तो ऐसे ही जप लो बिना श्रद्धा के आप देखना राधा नाम का प्रभाव देखना अगर यह धन अच्छा लगने लगा तो कत स्वार्थ परमार्थ लग मूढ़ मन ही दोहरावे ऐ मूढ़ मन अब तू चिंता मत कर तेरा स्वार्थ और परमार्थ सब राधा नाम बना देगा धाम की कृपा से राधा नाम सुनने को मिलता है। धाम की कृपा से राधा नाम जिभ्या में आता है। धाम की कृपा से राधा रूप हृदय में प्रकाशित होता है। महाप्रभु हरिवंश चंद्र जो कह रहे हैं कहां ये महामहिम राधा नाम और कहां में तुच्छ आप विचार करो हित सजनी जो है अवतार लिए हैं।
राधा नाम के दाता हैं और श्री किशोरी जी के चरणारविंद की दिव्य सेवा देने के लिए प्रकट हुए। वो कह रहे हैं क्वाह तच्छा परम मधमा प्राण हो गर कर्मा यतन नाम महिमा हरेश वृंदावनस ये राधा नाम जो मेरे हृदय में मेरी जिभ्या मेंित हो रहा है सिर्फ वृंदावन की कृपा है नहीं तो कहां मैं तुच्छ अधम और कहां ये महामहिम राधा नाम बोले तुम्हारी मूढ़ता नष्ट हो जाएगी राधा नाम से और जो अमूढ़ पुरुष होता वो परम पद को प्राप्त करता है। मूल पुरुष इसी जगत के भोगों में संबंधों में नाना प्रकार के गलत आचरणों में फंसकर अपने मनुष्य जीवन को नष्ट कर देता है।
यदि राधा नाम चल रहा धाम के आश्रित हो तो तुम्हें स्वार्थ और परमार्थ की चिंता नहीं करनी। अपनी इतनी अल्प बुद्धि के हैं। सोचते कैसे होगा? अगर हम भजन करने लगेंगे तो हमसे काम नहीं होगा। काम नहीं होगा तो हमारा जीवन नहीं चलेगा। यह तुम्हें माया केवल प्रेरित करके ऐसा समझा रही है। भजन करते हुए बहुत सुंदर हर कार्य होता है। आप कितना कार्य करते हैं? आप कितना कार्य? कितने घंटे मेहनत करते हैं? जब युद्ध करते हुए नाम जप हो सकता है। कौन सा ऐसा कार्य है जिससे भजन विक्षेप पहुंचा दे?
नए-नए अभ्यास की कमी। नाम जप करते हुए बहुत सुंदर हर कार्य हो सकता है। तो तुम्हारा स्वार्थ और परमार्थ दोनों बन जाएंगे। भगवत प्राप्ति हो जाएगी और इस लोक में समय का इंतजार करो। आपके केवल पाप नष्ट होने दो नाम जप से। फिर देखना अनुकूलता बिछ जाएगी। देख लेना लौकिक सुख भी जिनके लिए तुम नाना प्रकार के प्रयत्न करके नहीं पा पा रहे हो। उस समय तुम्हारे अंदर इच्छा नहीं होगी। अनक्षित आवे बरियाई जबरदस्ती लोक की सुख सामग्री आपके पास आ जाएगी। जैसे समुद्र चाहता नहीं पर नदियां सब प्रवाहित होकर वहीं जा रही है।
ऐसे सुख और संपत्ति जो नाम जापक है जिसके पाप नष्ट हो गए। अपने आप घेर लेती है। हरिवंश महाप्रभु कहते यह परलोक सकल सुख पावत। हरि राम व्यास जी कह रहे हैं स्वार्थ परमार्थ सब हाथ में आ जाएगा। आपके अंदर इच्छा नहीं रहेगी भोगों की पर ऐश्वर्य आपको घेर लेगा। ऐश्वर्य तो लौकिक बात है। श्री राधा किंकरणा लुठत चरण रभता सिद्धि कोटि करोड़ों सिद्धियां पर पहले पाप नष्ट होने दो। जहां आप भजन शुरू करते हैं आपके मन में जलन होती है। मन अशांत होने लगता है। नाना प्रकार की गंदी स्पुनाएं दिखाई देती है।
वो नाम काम कर रहा है। तुम्हारे हृदय को पावन कर रहा है। नवनिधि अष्ट सिद्धि वन वैभव स्वप्ने अंत न पावे। जिसने धाम का आश्रय लिया, राधा नाम का आश्रय लिया तो कह रहे नौ निधियां, अष्ट सिद्धियां यह सब प्राप्त तो हो ही जाएंगी और वृंदावन जो अनंत सुख प्रदान करने वाला है वो सुख आपके हृदय में जागृत हो जाएगा। इन नैनन सब सुख देख अपनो जन्म सुफल कर ले। ये पार्थिव नेत्रों में दिव्य प्रेम नेत्र जागृत हो जाएंगे। और ये बिल्डिंग नजर नहीं आएगी। ये इनकी सत्ता नहीं है। नवनि निकुंज भासने लगेगा।
दिखाई देने लगेगा। जैसे अभी जगत आपको दिखाई दे रहा है वो नहीं। अब वो आप वो कल्पना नहीं होगी। वो सत्य होगा। पर पहले हमारे पाप नष्ट होने चाहिए। हमारी अनर्थ निवृत्ति होनी चाहिए। नव निधि अष्ट सिद्धि वन वैभव नौ निधियां ये कुबेर के पास है अष्ट सिद्धियां कई महापुरुषों के पास जैसे हनुमान जी के भी पास है जानकी मैया ने अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता अस्वरदीन जानकी माता वन वैभव वृंदावन का महा प्रेम जहां अनंतता है अंत नहीं है प्रति क्षण वर्धमानम वो आपके हृदय में जागृत हो जाएगा जाएगा।
जिस मोक्ष के लिए ज्ञान मार्ग में बड़ी-बड़ी कठोर साधनाएं की जाती है। तो कह रहे हैं यहां घर घर भटकत मुक्ति बावरी। यहां मोक्ष घर घर के दरवाजे पर खड़ा इंतजार करता है। ये कभी चाह ले कि मैं मुक्त हो जाऊं। तो मोक्ष अपने का सौभाग्यशाली समझता है कि यहां कोई वरण कर ले। पर यहां कोई मोक्ष का वरण नहीं करता। धाम प्रेमी हरिवंश महाप्रभु कह रहे विभेम कैवल्यता मुझे मोक्ष श्री रूप जी महाराज रूप सनातन रूप जी महाराज कह रहे हैं ये पिशाचिनी मुझे नहीं चाहिए मोक्ष मुझे प्रिया प्रीतम का सानिध्य चाहिए मोक्ष नहीं यहां वृंदावन में मोक्ष भटकता कोई लेता नहीं भगवान भी कह रहे हैं कि जो मेरे सेवा में आसक्त हो गया तो दमानम न ग्रहणती बिना मत सेवनम जना मेरे मेरे जो दास हैं, सेवक हैं, उनको जो प्रेम सुख मिलता है तो मैं मोक्ष देना चाहता हूं पर वो स्वीकार नहीं करते।
वृंदावन में घरघर मोक्ष दरवाजे पर खड़ा है कि मुझे स्वीकार कर लो। ये वो महापुरुष बोल रहे हैं जिनको प्रेम नेत्र प्राप्त है। ये विशाखा सखी के अवतार श्री हरिराम व्यास जी महाराज है। कह रहे हैं महा पतित पावन जमुना जल भूतल ताप नशावे। यमुना जल का दर्शन यमुना जल का स्पर्श और स्पर्श करके आई हुई वायु जब हमारे शरीर पर रखती है तो निष्पाप हो जाते हैं। जिनकी भावना यमुना जी के प्रति ऐसी बन रही हो कि अब तो यमुना जी मलिन हो रही है। यमुना जी को मलिन कर दे। ऐसी माया में ताकत ही नहीं।
यमुना जी कोई पानी नहीं बह रहा है। यह प्रियाल के हृदय का उच्छलित प्रेम हमारे वृंदावन की यमुना जी है। हमारे वृंदावन की कलिंद पर्वत से आई हुई वृंदावन की यमुना जी में मिली और वही फिर प्रयाग में जाकर गंगा जी से मिली। हमारी यमुना जी कुंडलाकार जैसे कर्ण का कुंडल ऐसे वृंदावन को घेरे हुए आप इधर यमुना जी इधर यमुना जी ये यमुना जी ब्रजेंद्र सोनु राधिका हृद प्रपयो महारसा पुरयोति विरेगता हमारे लाडली लाल के हृदय का प्रेम उच्छलित होकर वृंदावन के चारों तरफ यमुना जी के रूप में रस रानी के रूप में विराजमान है।
जो कलिंद नंदिनी है वह पटरानी बोली जाती है। यमुना पटरानी की जय। यमुना पटरानी आके यहां मिली है। सहचरी है ये हमारी श्री जी की यमुना जी। जो हमारी यमुना जी हैं वृंदावन की ये रहस्य है। बिना रसिकों के ये रहस्य समझ में नहीं आता। भगवत रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कुछ समझ सके ना। बाहर से हरि अवतार लेकर आए थे। बाहर गए और लीला की। हमारे जो लाल जो महाराज हैं वह कभी एक कदम ब्रज से बाहर नहीं गए। यही है। प्रियाल के साथ यही है। ऐसे हमारी यमुना जी भी अलग ही है। आई है वहां से इनमें मिली है और आगे चली गई।
हमारी यमुना जी कुंडलाकार प्रियालाल को सुख पहुंचाने के लिए सहचरी बपू है। इतना पावन है कि दर्शन मात्र से यमुना जी के जो यमुना जी का दर्शन करता है, आचमन करता है, भाव से स्नान करता है उसको उनके संबंध के कारण दर्शन के कारण कभी यमराज देखते भी नहीं है। कभी नहीं देखते हैं। यमुना जी का स्पर्श प्रिया लाल के चरणारविंद की प्रीति प्रदान करने में समर्थ है। क्योंकि मोह का नाश करना बहुत कठिन है। और ये दुरंत मोह भंजनी श्री यमुना जी दुरंत मोह का नाश करके श्री प्रियालाल के चरणों का प्रेम प्रदान करने वाली है।
यही राधिका पते पदा भक्ति मुत्तमा मवासा ध्रुवं भवेत परत्र त प्रियगा यमुना जी क्या कृपा करती कि इसी जीवन में हृदय में श्री प्रिया प्रीतम के चरणारविंद की उत्तम भक्ति और फिर भाव दे प्रियनुगा सहचर्य भाव का प्रादुर्भाव और प्रिया जी के पीछे पीछे सेवा सामग्री लेकर चलने वाली दिव्य सखी जो किशोरी महात्मानम किशोरी जी के समीप किशोरी स्वरूप प्राप्त करके सेवा में ये यमुना जी प्रदान करती है। महामहिम यमुना जी महापतित पावन जमुना जल भूतल ताप नशावे दैहिक दैविक भौतिक तीनों तापों का नाश करके प्रियालाल का प्रेम प्रदान करने वाली यमुना जी हैं।
आप ऐसा ना सोचे कि अमुक अमुक ये सब गिर रहा है। नहीं सुरशरी मिले सो पावन कैसे हां कुछ भी यमुना जी को मलिन नहीं कर सकता सबकी मलिनता यमुना जी पावन कर रहे यमुना जी को कौन मलिन कर सकता है हां हम पार्थिव नेत्रों से युक्त है तो हमारे अंदर ये भाव आता है कि हम कैसे स्नान करें कैसे आचमन करें कैसे हम अब वो यमुना जी नहीं रही ऐसा नहीं भाव करो कोई कोई श्रवण इंद्र से सुन वो तो यमुना जी वही को रोक ली गई दिल्ली से तो ऐसा ऐसा ऐसा नहीं हमारा भाव समझो हमारी जो यमुना जी वृंदावन की है ये साक्षात प्रियाल के हृदय
से प्रकट हुआ प्रेम उचलित है कभी दूषित भाव मत करो आपका परम मंगल हो जाएगा ये माया का स्वरूप ऐसा है कि इन पावन नदियों पर हमारी अब भावना भी ये बनती चली जा रही कि अब तो बड़े-बड़े नाले गिर रहे हैं अब कहां वो यमुना जी नहीं नहीं नहीं नाले भी गिर रहे हैं तो उनको पावन कर दिया वो हमारे को अपवित्र नहीं करेगा हमारी यमुना जी को अपवित्र करने की सामर्थ्य त्रिभुवन में माया में है ही नहीं हमारे यमुना जी परम पावन है यह हमारी दृष्टि बदल रही तभी हमारा भाव जा रहा है अगर आप भाव से तो वही कहीं तुम्हें अपने पावन पुलिन पे ही खेलते हुए प्रिया प्रीतम की झांकी करा देंगे हमें अपने भाव से जैसे अब वो वृंदावन नहीं रहा।
अब तो ऐसा मत बोलो। ऐसा मत सोचो। वृंदावन एक रस है। परिवर्तनशील संसार नहीं। यमुना जी अपने स्वरूप में है। उनको ऐसे भाव से ना देखो। भगवत प्रेमी महात्मा अपने स्वरूप में है। उनको ऐसे भाव से ना देखो तो हमारा परम कल्याण हो जाएगा। नव निकुंज रति पुंजन बरसत हरस राधे गुण गावे। यह नौ निकुंज है। ऐसी ऐसी शोभा वृंदावन की कुंज निकुंजों की है। पर ऐसी लीला बाहरी है कि यहां तुम्हें करीली अगर कहीं दिखाई देंगे तो करील आदि कमाल आदि पर आपको सच्ची बतावे जो धाम की कृपा से दृष्टि गोचर जब होगा तो वृंदावन द्विती पत्र की उपमा को कछु ना कोटि कोटि बैकुठ ते सम कह जाए जैसे आप सेवा कुंज जाइए तो आपको कटीली लताएं दिखाई देंग।
ऐसी नहीं है। ये केवल हमारे नेत्रों में धोखा प्रकट कर रही है माया। ये जब आपका भजन ठीक होने लगेगा और धाम कृपा करेगा। एक पत्ते की कांत के बराबर महामहिम धाम बैकुंठ धाम को भी इतना क्योंकि उसमें प्रियाजू का प्रतिबिंब पड़ रहा है। बड़ी सुंदर शोभा बड़ा नव निकुंज रति पुंजन बरसत हरस राधे गुण गावे जो पैसी वृंदावन धन पावे यदि आप कुछ पद याद किए हो और वृंदावन की गलियों में गाते हुए देखो बाहरी स्वरूप को तो आप छोड़िए अगर उसको पकड़ोगे तो वही फंसे रहोगे एक एक ये जो गलियां है यहां की जो भूमि है ये महान प्रेमियों के आंसुओं से भीगी हुई है।
इसे कोई बदल नहीं सकता। देखो वही गिरिराज जी है जिनको प्रभु ने उठाया। यह वही यमुना जी है जहां हमारे प्रिया प्रीतम अवगान करते थे। अवगान करते हैं। अवगान करते रहेंगे। हमारे आपकी क्या बात? आज भी वही यमुना जी हैं। यह वही भूमि है जहां महान प्रेमियों ने अपने विरह अस्त्र से प्रेम अस्त्रों से संपूर्ण भूमि भिगोई है। चाहे गोपी जनों से लेकर अभी तक जितने को भी जितने महापुरुष यहां प्रेम को प्राप्त हुए आंसुओं से या तो आनंद अश्रु बह रहे हैं या विरह अश्रु बह रहे। आप यहां घूम रहे हैं।
आपको यहां विचरण करने का सौभाग्य मिला। आप एक पद दो पद जो याद किए हो उसी को गुनगुनाते रहो। फिर आप देखो उस पद की लीला झलकने लगेगी। थोड़ा पावन होने दो। सदा अधीन रहत नित मोहन मन ले प्रियह रिझावे। हमारी महारानी जो के अधीन श्री लाल जो महाराज अब आप हम राधा चरणारविंद के शरणागतों की ठसक कैसे जानेंगे? अरे शिव वीरंच जिनके चरण रखने की चौकी की वंदना करते हैं वह लाल जो महाराज है जाह विरंच उमापति ना तापे त बन फूल बिलाए हम ऐसी महारानी जी की शरण में तो हमका मतलब हम सब वृंदावन में कोई किसी भी संप्रदाय का हो किसी भी उपासना का हो यहां बोलना पड़ेगा जय जय श्री राधे ये महारानी जी का महल यहां राधा गुण गाने पर ही आप किसी भी उपासना में हो आपकी सिद्धि होगी।
आप अगर आत्म ज्ञान प्राप्त करना है तो बोलना पड़ेगा राधे राधे। यह महल है हमारी महारानी जी का। आपको कोई भी मार्ग में सिद्धावस्था प्राप्त करनी है तो यहां जय श्री राधे बोलना पड़ेगा। यह महारानी जी का महल है। तभी यह धाम आपको उच्च अवस्था प्रदान करेगा। सदा अधीन रहत नित मोहन मोहन जिनको कहीं भी मोह नहीं होता उनका नाम है मोहन और मोहन सबको मोहित कर ले इन मोहन को मोहिनी प्रिया जी ने अपने अधीन कर लिया है प्रेम में ते निज भजन कनक तन जोवन लियो मनोहर मोल राधा प्यारी तेरे नयन सलोल ते निज भजन कनक तन जोवन लियो मनोहर मोल अधीन मानो बिके हुए लाल जो श्री हमारी लाडली अब हमें क्या परवाह अनंत ब्रह्मांडों का मालिक हमारी प्रियाजु के अधीन और हमारी प्रिया जो हमारी स्वामिनी है हमारी प्रिय सखी है हमारी प्राण प्रिय है हमारे प्राणों की स्वामिनी प्राणनाथ है मेरे प्राणनाथ श्री श्यामा शपथ करो त्रछ अब बोलो क्या मांग आपकी बाकी रह जाएगी यदि श्री राधा किशोरी के चरणों का आश्रय श्री लाल जो महाराज सारे न्याय अनंत ब्रह्मांडों के इनहीं से होते हैं अनंत ब्रह्मांडों के जितने भी न्याय तभी वो कहते हैं अनुख्या अनंतानित राधान मधपति जो राधा चरणारविंद का आश्रित राधा राधा राधा तो महाराज उसका रजिस्टर ही हटा देते हैं।
ये तो प्रियाजु के चरणों का आश्रय ले लिया। व्यास स्वामिनी रास मंडल में चुटकिन पिय नचावे जो पे श्री वृंदावन धन भावे यदि वृंदावन का आश्रय राधा नाम का रटन तो सब कुछ प्राप्त हो जाएगा वो देखने को हरि राम व्यास जी कह रहे मैं देख रहा हूं जैसे प्रिया जो चाहती है वैसे लाल जो नृत्य कर रहे हैं हमारे हृदय में यह जो जगत का रंग चढ़ गया है इससे बचने के लिए समता अत्यंत आवश्यक है। सुखदख में सम लाभ हानि में सम मान अपमान में सम जो हम कर्तव्य कर्म कर रहे हैं उसके फल में सम हुए बिना यह हमें कर्म बांध लेंगे।
हमारे जीवन का लक्ष्य जो परम सुख है जहां किंचिन मात्र दुख की निशानी नहीं वहां हम नहीं पहुंच पाएंगे। श्री भगवान गीता जी में कह रहे हैं दूर हवरम कर्म बुद्धि योगा धनंजय बुद्धो शरण मन विच्छ कृपणा फल हे तव ये जो जन साधारण है जिनको सत्संग प्राप्त नहीं हुआ इनको इतना भी ज्ञान नहीं है कि कौन सा कर्म हमें नरक ले जाएगा और कौन सा कर्म हमें सुख प्रदान करेगा। थोड़ा जो सत्संग या शास्त्र स्वाध्याय कर रहे हैं वो यह बात समझे कि कोई भी कर्म शाश्वत नहीं है क्योंकि उसका आदि अंत होता है।
प्रारंभ हुआ और अंत हुआ कर्म। वो कर्म तुम्हें अनंत सुख की प्राप्ति कैसे करा सकता है? कोई भी कर्म हो उसका आदि है और अंत है। अगर उसमें योग नहीं हुआ तो वो कर्म तुम्हें सुख प्रदान करने वाला शाश्वत सुख प्रदान करने वाला नहीं बनेगा। प्रायः हम कामनाओं से युक्त होकर कर्म करते हैं। तो भगवान कह रहे हैं बहुत ही दुखी होना पड़ेगा। क्योंकि सफलता असफलता जय पराजय लाभ हानि सुखदख ये दोनों का क्रम चल रहा है। पूर्व प्रारब्ध से बना हुआ शरीर है। वो प्रारब्ध बहुत प्रबल हुआ तो तुम्हारा जो पुरुषार्थ कर्म बन रहा है वो प्रबल पुरुषार्थ अगर हो इतना कि उसे रोक पावे तो आप आगे बढ़ जाओ।
नहीं आप करोगे कर्म सुख प्राप्ति के लिए लेकिन सफलता नहीं होने देगा आपका पूर्व का कर्म प्रबल प्रारब्ध क्या है जैसे हमसे कोई महत पाप बन गए हैं अब हम प्रयास कर रहे हैं कि निकले हम उत्तम सुख की तरफ बढ़े वो आपको बढ़ने नहीं देगा अगर आपके पास प्रबल पुरुषार्थ हो जाए प्रबल पुरुषार्थ क्या है निरंतर नाम जप भगवत आश्रय ये त्रिगुणातीत है नाम त्रिगुणातीत है। भगवत आश्रय त्रिगुणातीत है। ये त्रिगुण पर शासन कर सकता है। नहीं त्रिगुण माया में जो किए हुए पूर्व के कर्म है।
इसीलिए देखा जाता है कि कोई बहुत अच्छा कर्म कर रहा है लेकिन उसे दुख पे दुख मिलता चला जा रहा है। क्योंकि उसका प्रबल प्रारब्ध आगे नहीं बढ़ने दे रहा। उसको दुख प्रदान कर रहा है तो कैसे बचे? भगवान कह रहे हैं बुद्धि योग के द्वारा। बुद्धि योग कहते हैं क्षमता को। चलो समता का अगर परिचय ना प्राप्त हो तो ऐसा सोच लो कि हम भगवान को समर्पित हैं। अब जो भी होगा बड़ा मंगल होगा। भगवान ने अगर हमें दुख दिया है तो कोई हमारे पापों का नाश हो रहा है। हम पवित्र हो रहे हैं और हम आगे बढ़ने की तैयारी पे कहीं उदास ना हो, निराश ना हो क्योंकि भगवान मंगल विधान कर रहे हैं।
तो वो दुख सहज में भोग कर आप आगे बढ़ जाएंगे। किसी ने जैसे प्रश्न किया कि हमने भगवान से बड़ी प्रार्थना की थी कि मेरी मां अभी पधारे नहीं और खूब मंदिर गए और ऐसा किया पर मां पधार गई भगवान ने तो सुना ही नहीं दो चार साल और दे देते तो क्या चला जाता देखो भाई यह निश्चित समय है भगवान जितनी स्वासे दी उसके आगे नहीं महात्मा भी नहीं बढ़ा सकता अपनी एक स्वास हां अब वो अपने प्राणायाम के द्वारा अपनी स्वासों को सुरक्षित रख रहे हैं। तो जितनी संख्या में स्वास है आप चाहे भोगों में जल्दी जल्दी उसको खर्चा कीजिए या आप योग के द्वारा उसे रोकिए जैसे 1400 वर्ष तक रोका चांगदेव जी महाराज बड़े योगी थे शसों को रोकना और रोक करके भगवत चिंतन करना वो एक अलग बात हो गई पर जितनी स्वासे आपकी है अब वो संपन्न होने जा रही है तो मंदिर जाने की तो बात जाने दो जो बड़े-बड़े भजनानंदी महापुरुष है रात दिन भजन करते एक स्वास भी आगे नहीं बढ़ सकती।
आप ध्यान से बात सुनना। भगवान को मत कोसो। जितनी स्वासे हैं उससे एक स्वास नहीं बढ़ेगी। उनहीं स्वासों को आप रोक रोक करके आप चाहे जितना बड़ा जीवन कर जैसे कहा जाता है कि अमुक महात्मा 400 वर्ष के मानते हैं 400 वर्ष के मानते हैं क्योंकि वो अपनी श्वासों को रोक रहे हैं। एक मिनट में हम जितनी स्वासे लेते हैं अब वो प्राणायाम के द्वारा अपने प्राणों को इतना सूक्ष्म कर लिया बहुत लंबे समय तक श्वास को चढ़ाना फिर छोड़ना एक श्वास इतने में हमारी 100 200 स्वासे निकल गई वो अगर आयु बढ़ रही है तो उनकी तपस्या से नहीं प्राण वायु का संयमन करने से प्राण वायु को उन्होंने रोका है।
अपनी स्वासों को सुरक्षित रखा है। नहीं तो एक स्वास किसी की भी नहीं बढ़ सकती। अगर हमारा मरण का आखिरी स्वास है तो तुम भोग लगाने के बाद या मंदिर जाने के बाद तुम्हारे पास यदि त्रिभुवन की राज्य लक्ष्मी हो और आप दें कि एक स्वास बढ़ा दो तो नहीं बढ़ेगी। इतना कीमती तुम्हारा जीवन है। तुम श्रद्धा ना करो तो नाना तो में फंसते हुए और दुर्गति को प्राप्त होगी और श्रद्धा करोगे तो तुम्हें ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। अरे जाना है भाई चिल्ला चिल्ला के कहते हैं गर्भ में ही प्राण निकल जाते हैं।
बाहर निकल जाते हैं। यौवन अवस्था में निकल जाते हैं। इसके लिए प्रार्थना काम नहीं करेगी कि हमें अब आखिरी स्वास है और अभी तक नहीं कुछ बना पाए। अब क्या बना पाओगे? पक्की बात समझ लो। इसीलिए सावधान हो जाओ। तुम्हारा जीवन बड़ा संकट पूर्ण जीवन है। मानो देह यद्यपि दुर्लभ है पर क्षणभंगुरा रहा। किसी भी क्षण नष्ट हो सकता है। आप यह ना सोचे कि हम मंदिर गए प्रार्थना किए तो स्वासे अगर है स्वासे तो रुकते रुकते भी आगे बढ़ जाएंगी और नहीं है तो चलते चलते रुक जाएंगी। कोई नहीं इनको बचा सकता।
स्वासे बिल्कुल गिनती की है। एक भी स्वास नहीं बढ़ सकती। विश्वास मानिए और बात आप छोटी-छोटी बातों में कामना करके भगवान को आपकी कामना पूर्ति नहीं हुई तो उपहास नहीं करवा रहे आप अपने भगवान का। आप कैसे हैं? हम कोई पद गा रहे हैं या कोई चालीसा गा रहे हैं या कोई स्तोत्र गा रहे हैं कि यह काम हो ही जाना चाहिए। और अगर नहीं हुआ तो क्या आपके अंदर आस्तिकता की जो नींव है वो हिल नहीं जाएगी? क्या आपके अंदर नकारात्मक भाव भगवान के प्रति नहीं आ जाएंगे? यह समझने के लिए बुद्धि योग चाहिए।
यहां श्री भगवान कह रहे हैं कह रहे कि जो फल का हेतु बनाने वाले अत्यंत दीन हो जाते हैं। यहां दीन वो भक्ति वाली दन्यता नहीं यहां मूढ़ता वाली दन्यता है। अब हम सोच रहे हैं कि यह काम बन जाए। अब अगर वो काम नहीं बना हम सब मिलकर के कोई पाठ करते हैं उस काम के लिए। अब क्या होगा? उपहास ही तो करवा रहे हैं। एक लौकिक तुच्छ कार्य के लिए हम हजारों लोग बैठकर के पाठ कर रहे हैं और वह पूर्ण नहीं हुआ क्योंकि भगवान ने उस विधान को देखा है कि पूर्ण करना ठीक नहीं है। हमें ये मानना है तुम्हारी बुद्धि क्या निर्णय करे तुम जानो।
हमारे प्रभु का उपहास हमारे प्रभु की अवहेलना यह ठीक नहीं है। हम अपने कल्याण के लिए अपने सतार्ग के लिए और भगवत प्रसन्नता को जानने के लिए साधना करते हैं। माया की कामनाओं में फंस करके हम अपने आराध्य देव को हमें अच्छा नहीं लगता। अगर हम कष्ट में है तो हम राधा नहीं बोलेंगे। मुख से हृदय से बोलेंगे। हां राधा हम नहीं बोलेंगे। हम भाव में आएंगे तो बोलेंगे राधा। देखो समझना होगा ये प्रारब्ध भोग है जोई जोई प्यारो करे सोई मोह भावे और लौकिक क्रियाओं में हम अभ्यास करते हैं लौकिक क्रियाओं की प्रवीणता उनकी कृपा से प्राप्त बुद्धि से हम प्राप्त करते छोटी छोटी बातों को छोटी छोटी व्यर्थ की कामनाओं को प्रभु के आगे रखते हैं और जब नहीं पूर्ण होती तो अश्रद्धा हो जाती है।
ये बिल्कुल ठीक नहीं। भगवान कह रहे हैं योग को समझो और भगवान की अवतार लीला को जब गाया जाता है तो क्या भगवान अवतरित हुए तो उनको दुख नहीं पड़ा क्या समस्याएं नहीं आई क्या तो आपका मृत्यु लोक में जन्म हुआ है तो समस्याओं से लड़ने के लिए हुआ है अब छोटी-छोटी बातें आप प्रभु के जब कभी ऐसी बातें आती है तो हमें दुख होता है हृदय में क्योंकि आपके अंदर अश्रद्धा हो जाएगी वही कर्तव्य कर्म केवल करो आप जो आपको करना परिणाम भगवान के ऊपर छोड़ दो। बड़ा मंगल होता है परिणाम हमारी अब हमें जो अब किसानी करनी है अब हम बैठ गए और हम कोई पाठ करें कि भगवान हाल चल जाए बीज बिना बोए जग जाए ये या तो उच्च कोटि की इतनी अविनाशी स्थिति हो आपकी तो हो जाएगा करतुम अकर्तुम अन्यथा करतुम अरे हमको जो कर्तव्य कर्म मिला है हम बढ़िया खेती तैयार करें बढ़िया बीज बोए उसकी उसकी रक्षा करें फसल हो जाएगी।
हां भगवान के आश्रित हैं हम। लेकिन हम छोटी-छोटी कामनाएं अगर करेंगे तो हमारे अश्रद्धा हो जाएगी। उपहास करते हैं फिर लोग। क्या हुआ तुम्हारे हवन करने से? क्या हुआ? कहां गया तुम्हारा भगवान? उपहास करते हैं। यह भगवत भक्ति अविद्या का नाश करने के लिए है। दुखों का नाश करने के लिए है। भगवान की प्राप्ति के लिए है। कामना तो फिर सांगोपांग अनुष्ठान। जब किसी महापुरुष ने कोई कामना की है तो आप उसकी साधना पढ़ के देखिए। कामना का फल उनको मिला है। पर उसके लिए कठोर संयम पूर्वक आराधना हुई।
भगवान का विधान कामनाओं के लिए वैदिक सिद्धांतों से भरा पड़ा है। आप स्वीकार करें नहीं वो सिद्धांत भी स्वीकार नहीं। आचरण भी पवित्र नहीं। जो कामना का अनुष्ठान का स्वरूप है वो अनुष्ठान भी नहीं। बस थोड़ी हम जैसे पाठ आदि के फिर उपहास लोग करते हैं। क्या कहां गया तुम्हारा भगवान? हमारे कानों में चुभती है फिर बात कि हम अपने भगवान को अपनी उपासना को अपनी भक्ति को क्या समझे हुए हैं। इन छोटी-छोटी क्रियाओं के लिए लौकिक बातों के लिए भगवान का प्रयोग करते हैं। ये हो जाए ये हो जाए।
मांग के ऊपर मांग मांग के ऊपर मांग। भजन एक मिनट भी मन प्रभु में लगाने की सामर्थ्य नहीं है। थोड़ा भी प्रियता प्रभु से नहीं है। बस केवल कामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान कह रहे हैं कि कृपणा फल हेत ये जन बहुत ही द मतलब दन्य का तात्पर्य होता है। बहुत ही मूढ़ता छाई हुई है। देखो कितना उपहास होता है। लाखों के बीच में उपहास होता है कि हम कोई पाठ कर रहे हैं सब मिलकर के कि ऐसा कार्य हो जाए। अब वो कार्य नहीं हुआ तो अब उपहास का पात्र नहीं हुआ कि अब हम ये अपने आराध्य देव का ये पाठ कर रहे थे।
इतने लोग मिलकर नहीं हुआ तो कोई निष्ठावान टिकेगा नहीं। श्रद्धा हो जाएगी कि शायद इसका फल नहीं है। नहीं वह अमोग है। सत्य वस्तु कभी व्यर्थ नहीं जाती है। पर उसको तुम व्यर्थ असत्य क्रियाओं में तोलने लगे तो कृपणा फल हेतवा। सकाम भाव से कर्म करने वाला सदैव दुखी ही होता है। अब हम सब सकाम भाव से ही लगे। देख लीजिए। बड़े भाग्यशाली है जो सत्संग के प्रभाव से फल में समता ले आए हैं। अगर लाभ मिला तो जय श्री हरि अगर हानि भी हो गई तो जय श्री हरि क्योंकि हानि हमारी हानि कर नहीं पाएगी।
नाम चल रहा है प्रभु के आश्रित है। बड़ा छुपा के अपनी भक्ति को ऐसे प्रदर्शन में मत लाओ। नहीं तो उपहास होता है। बहुत बुरी तरह से उपहास होता है। जाओ ये हो जाएगा। अब होना ही चाहिए। अगर कह दिया जबान से कि ये हो जाएगा तो फिर होना चाहिए। अब कुछ नहीं पलट सकता। अब इतनी जितेंद्रियता, इतनी पवित्रता, इतनी तपस्या, इतनी सामर्थ्य, अब भगवान को भी वही करना होगा। वही होना तब तो बोले और नहीं तो चुप रहे। उपहास ना करवावे अपनी भक्ति का अपने एक है कि इतना अभ्यास में प्रवीण है कि अभ्यास के द्वारा वो लाभ को लाभ पर अपना अधिकार कर रहा है।
हम है कि हवन कर रहे हैं। उसके अभ्यास की जरूरत है। इस समय हवन की जरूरत नहीं है। हवन की जरूरत है भगवान को प्रसन्न करने के लिए। वो मुस्कुराए और हमारी अविद्या का नाश हो और मायाकृत इस जाल से हम मुक्त हो। हम कहां की बात कहां लगा देते हैं? अभ्यास वहां चाहिए। वहां यह उपहास मत किया जाए अपनी भक्ति। प्राय ऐसा फिर वो निराधर तुमने पाठ किया सब मिलके क्या मिला तुम्हें? अब वो नास्तिकता और पुष्ट हो रही है। कैसे बतावे? श्री भगवान कह रहे हैं यह सकाम भाव अत्यंत निकृष्ट है।
यह परिणाम में दुखी और नास्तिकता ही पैदा करता है। क्योंकि अनुष्ठान नहीं है। करदम जी को आदेश हुआ सृष्टि रचना करो। उन्होंने कहा कि इसके लिए तो हमें पत्नी चाहिए और कौन पत्नी बनेगा अब हमें पता नहीं है और हम किसी के पास याचना करने जाएंगे नहीं। एकांत होकर के 10,000 वर्ष तक तपस्या की। भगवान प्रकट हुए और कहा आदि सम्राट महाराज मनु अपनी पुत्री देहुति को लेकर के परसों आएंगे और आपको पानी ग्रहण करा देंगे। अगर हमें चाहिए भी तो फिर इस कोट से चाहिए। अनुष्ठान ऐसे 10,000 वर्ष तक उन्होंने अपनी तो आयु ही 80 70 है।
अरे तो 10 दिन तो अनुष्ठान संयम से हो जाए। किसी कामना की पूर्ति के लिए केवल ऐसा नहीं है कि आप थोड़ा सा और फिर मनमानी आचरण कभी ऐसा नहीं हुआ। कितने वर्ष तक ब्रह्मचर्य रह के कश्यप जी ने जब पुत्र उत्पत्ति की तो भगवान के परम वाहन गरुड़ जी महाराज प्रकट हुए। सूर्य के सारथी अरुण जी दो पुत्र प्रकट हुए विता जी से गरुड़ और अरुण तपस्या और भजन तप संतान तो ऐसे महान प्रकट हमारी हालत क्या है धर्म को हम जानते नहीं है भजन का स्वरूप क्या है केवल हम अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए थोड़ा सा और हमारे सर्वज्ञ भगवान अगर तो फिर आपको अपने आराध्य देव का उपहास कराना ये अच्छा नहीं है।
सच्ची भक्ति का स्वरूप यही है कि बड़े से बड़े कष्ट में हम आ कह सकते हैं राधा नहीं बोलेंगे नहीं भूलेंगे आपने हमें जो यह दिया है महान प्रसाद आजीवन इसको हंसते हुए सहेंगे और अंदर अंदर आपकी मुस्कुराहट देखना चाहेंगे बस इसके लिए राधा नहीं बोलेंगे कि हाय मैं बहुत कष्ट में हूं राधा या ये विपत्ति दूर कर दो राधा नहीं इससे लड़ने की सामर्थ्य अपने आप हमें प्राप्त हो जाएगी और सच्ची सच्ची मानना जब ऐसी निष्ठा में आओगे तो ब्याज में ये सब खत्म हो जाएंगे। ये जितने दुख देने वाले कर्म है मूल तो प्यारी जो और प्यारे जु का प्रेम प्राप्त होगा।
ये सकामता हमारी दुर्गति किए दे रही है। और सब सकामता के बिना एक कदम नहीं चलना चाहते। यही यही हमारे बंधन का हेतु है। सच्ची मानो आपको कुछ नहीं चाहिए। आप ऐसे महान है अंदर से। आपका जो स्वरूप है कैसे बतावे? क्योंकि वाणी का विषय नहीं। यह शरीर की आसक्ति के कारण ही हम कामनाओं के जाल में फंस गए। इसी जाल से बचने के लिए मानव देह और सत्संग मिला है। ये भक्ति ये ज्ञान ये योग के मार्ग इनसे बचने के लिए है। और हम प्रयोग करना चाहते हैं इसी में और फंसने के लिए। कैसे सर्वज्ञ भगवान आपको फंसने देंगे।
यदि आप वाणी से भी बोल चुके हैं कि मैं आपका आश्रय लेता हूं। ये माया के दलदल में और आपको धकेल देंगे। वो सर्वज्ञ आपको धकेल देंगे। जब नहीं तो फिर आपकी मांगी हुई बात पूरी नहीं होगी। नहीं पूरी होगी तो आपकी अश्रद्धा हो जाएगी। इसलिए कह रहे कृपणा फल हेतवा ये बहुत समझने का विषय है। हम लोग इसी में प्राय प्रश्नों में यही आता है। भगवान ने ऐसा क्यों नहीं किया? भगवान ने भगवान ने उसको क्यों नहीं बचा लिया? भगवान ने उसको क्यों? तीन लीलाएं वो अपने आप से अपने आप में कर रहे हैं।
आप अपने आप को जान जाओ। आप कोई और नहीं है। सृजन करना, पालन करना, संहार करना तीनों बराबर होंगी। बराबर ना तुम्हारा अनुष्ठान रोक पाएगा ना किसी का अनुष्ठान। आज तक इतने महापुरुष हुए रात्रि को नहीं रोक पाए कि दिन के बाद रात्रि आए ही ना। जो प्रकृति का नियम है वह परमात्मा के द्वारा कानून बनाया हुआ है। वह भी अपने कानून की रक्षा करता है। जैसे भारतीय संविधान है तो जहां से बड़े-बड़े पद में विराजमान है अगर उस कानून के अंतर्गत गलती हो जाए तो स्वयं स्वीकार करेंगे।
ऐसे ही प्रकृति का कानून है। यहां सृजन होता है, पालन होता है, संहार होता है। रूप कोई भी हो। आपके रोने धोने से आपके अनुष्ठान से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। हां आप भक्ति का अनुष्ठान ज्ञान का अनुष्ठान इन त्रिगुण माया से बचने के लिए निकल जाओगे। अब आपने मंदिर गए प्रार्थना की आपका शुभ लागू हो गया। काम बन गया। बोले भगवान हैं भगवान ने हमारी कामना पूर्ति की। और अगली बार सब में भगवान। बहुत समझो। बिजली का पावर जैसे सब यंत्रों में ऐसे सब में भगवान जो विनाश कर रहा है वो भगवान की शक्ति है।
उसमें जो पालन कर रहा है वो भगवान की शक्ति से पालन हो रहा है। जो सृजन हो रहा है वो भगवान की शक्ति से हो रहा है। तुम अल्प बुद्धि हो। सीमा में बांध लिया मैं मोर तैत तो एक पालन कर रहा है तो जय हो और एक विनाश कर रहा है तो उसके हां ठीक है। व्यवहार काल में ऐसा होगा। वो तो धर्म का पालन करने वाले अधर्म का विरोध करते ही हैं। पर आंतरिक मूल बात अगर छाती से धर्म प्रकट हुआ है तो सरकार की पीठ से अधर्म प्रकट हुआ है। पावर दोनों को वही से मिल रहा है। और ये बात समझना बड़ा कठिन है।
आप शास्त्र पढ़ के देखो। यहां से हृदय से भगवान के धर्म का प्रादुर्भाव होता है। तो पीठ से भगवान के और आप किधर हो? पीठ की तरफ। भगवान के सन्मुख हो गए तो धर्ममय आचरण हो जाएंगे और भगवान से विमुख हो गए तो अधर्म में आचरण अधर्म का परिणाम रचा हुआ है नर्क और दुख आदि नाना प्रकार की चिंता भय आदि ये सकाम भाव अगर आप छोड़ पावे तो बहुत जल्दी काम बन जाए कोई परेशानी छोड़ने में नहीं हम जो कर्म कर रहे हैं उसे भगवान को समर्पित करके फल भगवान पर छोड़ दें जे विधि होय नाथ हित मोरा करो वेग दास इसमें क्या परेशानी है और सच्ची हम मांगना नहीं जानते हैं अगर हमें मांगने की बात आवे ना तो जैसे एक गरीब
आदमी किसी चक्रवर्ती सम्राट के सामने जाए और कह दे मांगो आज मैं तुम्हें दे दूंगा तो उसकी सोच ही इतनी है कि वो चार गाय एक भैंस है उसका अगर साल भर का चारा मिल जाए और परिवार के लिए भोजन मिल जाए और एक लाख मिल जाए वो बहुत जब इतना सोचेगा तब इतना ही मांग सकता है और अगर उसको उसके के ऊपर छोड़ दे कि महाराज हम क्या मांगे अब आपका जो मन हो तो वो अपनी स्थिति के अनुसार देगा ऐसे ही महापुरुषों ने प्राय कि हम प्रभु मांगना भी नहीं जानते कि आपसे क्या मांगे आप अपनी इच्छा से दे तो अपनी इच्छा से भगवान अपनी अविरल भक्ति दी है प्रेम दिया है माया नहीं दी है जब कृपा करते हैं तो माया मुक्त करते हैं भगवान द्वंदों से मुक्त करते हैं और हम लोग माया के ही कुछ कणों को मांगते हैं।
जब वो नहीं देते हैं तो बोले भगवान भैया हम हाथ जोड़ते हैं। मानो जीवन अश्रद्धा के लिए नहीं मिला। अपना कल्याण कर लो। ये पाठ ये नाम जप ये हवन ये भगवत प्राप्ति के लिए है। इसका प्रयोग इधर मत करो। पहले से ही हम इतना फंसते हैं वासनाओं में और आश्रय मिला है। अब कृपा से अगर हम उन वासनाओं से तोलेंगे इस भक्ति मार्ग को ज्ञान मार्ग को प्रश्न करते हैं कि पाप करते हुए देखा गया पूरा जीवन पाप किया और कोई कष्ट नहीं और यहां भजन करते हैं कदम कदम पर दुख आ रहा है। ये क्या है?
बड़े आराम से वो चैन से मरता है। ये भाई लंबा है सफर उसका। लंबा है सफर। पता नहीं अभी कितने कल्प भटकना पड़ेगा। और यह जो संत महात्मा या धर्म से चलने वाले गृहस्थ हैं इनको जो आप दुख देख रहे हो ना इनका बहुत कम में निपटा के ये आखिरी है ये जन्म आखिरी है अब अपने प्रभु से मिलन का बहुत जन्म से तड़पे हैं दरस बिन दुखन लागे नैन अब अवसर मिला है तो ये जो कष्ट पे कष्ट दिखाई दे रहा है ये बहुत जल्दी पूरा हिसाब बहुत थोड़े में और साफ कानून के अनुसार भी कि हां भोग मिल मिल गया 100 का एक में निपटा देंगे भगवान।
देखो ना बड़े-बड़े महापुरुषों ये कष्ट ये कष्ट ये और वो पाप आचरण कर रहा है। धर्माचरण कर रहा है। पूरे जीवन में आखिरी में ऐसे सहज में मर गया। कोई सड़न नहीं कोई परेशानी नहीं। इसका मतलब नहीं है कि ये वर्तमान की है। अब जो फसल उसने की है बहुत जन्म काटना है। और अब ये जा रहा है अपने प्रभु के धाम को। यह मलिन शरीर फटाफट भोग रहा है और बड़े हिसाब को थोड़े-थोड़े में तो यह अज्ञान के कारण ना जानने के कारण कहते हैं कि ऐसा क्या भगवान का निर्णय है ऐसा कि पाप आचरण कर रहा है।
बड़ा सुखी दिखाई दे रहा है। धर्म से चल रहा है। बड़ा दुखी ऐसा नहीं अज्ञान की बुद्धि से मत नापो। संपूर्ण कर्म तुम्हें बांध ही रहे हैं। जो भी तुम कर रहे हो जैसे धरिवंश नर्क गति दुर्भरी यम द्वारे कटियत नक छीके मतलब यहां एक सेकंड भी जो क्रिया कर रहे हो बिना फल दिए नहीं जाएगा। अगर आप होश में नहीं हो तो आपकी हर क्रिया शास्त्र विरुद्ध हो जाएगी। क्योंकि मन और इंद्रियां केवल यह माया से आकर्षित होकर अधर्माचरण की प्रियता रखती हैं। अपवित्र हो चुकी है। इनको वही अच्छा लगेगा।
जो निषेध किया गया है वही खाना पीना वही आचरण अच्छा लगेगा। फिर हमारा मार्ग बिगड़ जाएगा। तो क्या करें? भगवान कह रहे हैं योग बुद्धि योग। अगर हर कर्म हम भगवान को समर्पित करने की भावना करें क्योंकि समता को समझना बड़ा कठिन है। हर कर्म भगवान को तो हमारे अंदर डर पैदा होने लगेगा। जो डर गया वो बच गया। समाज का डर, कानून का डर, शास्त्र का डर, भगवान का डर। इनमें से कोई भी डर अगर हमारे अंदर आ गया तो हम बच जाएंगे पापाचरण करने से। लेकिन ऐसी मलिन बुद्धि हो गई कि ना तो भगवान का डर रह गया है ना शास्त्र का डर रह गया है समाज का भी डर नहीं रह गया कानून का भी डर नहीं रह गया मनमानी आचरण करते चले जा रहे यही बंधन यही दुर्गति डर आ जाए बड़े भाग्यशाली जिनको डर आने लगा समाज क्या कहेगा अगर ऐसा किया तो आजीवन कारावास हो सकता है मृत्युदंड हो सकता है अगर ऐसा किया तो भगवान देख रहा है हमारी दुर्गति हो जाएगी शास्त्र का शास्त्र में लिखा है ऐसा नहीं करना चाहिए।
अगर डर आ जाए तो हम सुधरना शुरू कर दें। पर मलिन हृदय ऐसा इधर डर रहित हो रहा है और प्रभु की तरफ चलने में डर लग रहा है। उल्टा कर्मों का परिणाम जन्म मरण नाना प्रकार के दुख चिंता अब उद्धार की गुंजाइश नहीं रह जाती। यदि अधर्म रूपी कर्म बनते गए ना और योग नहीं बना तो ना सोच रह जाती है उद्धार की हिम्मत ही नहीं रह जाती वो असमर्थ सा होकर अगर ये बातें जो हो रही हैं और अगर आप थोड़ा पवित्र हृदय नहीं तो ऊपर से सब निकल जाएगी और पवित्र हृदय तो जैसे चातक स्वाति के बूंद को ऐसे एक एक शब्द उसके दिमाग में पहुंचेगा ताकत ही नहीं रह जाती उसकी ये सोच करने की मुझे भगवान से मिलना है मेरा उद्धार हो जाए।
यह सोचने की ताकत नहीं रह जाती। अगर यह कुशलता आ जाए समता या भगवत समर्पण कर्म का और फल में भगवत इच्छा पे अगर समता समझ में नहीं आ रही तो भगवत इच्छा पे जोई जोई प्यारो करे सोई मोह भावे। भगवत इच्छा बहुत आवश्यक है। तभी आप कर्म बंधन से मुक्त होंगे। यह बहुत सरल है। कई बार समझाया है। इससे आप मुक्त हो जाएंगे कर्म बंधन से। सुबह उठे भगवत स्मरण करें। प्रभु का नाम जप करते हुए अपनी दिनचर्या करें। एक घंटा दिनचर्या हुई शौच स्नान जो जो भी एक हे प्रभु यह कर्म आपके चरणों में समर्पित फिर और सेवाएं शुरू हुई।
फिर एक घंटा हुआ फिर स्मरण किया। हे करुणामय प्रभु यह इस एक घंटे का समय में जो कर्म बना वो आपके चरणों में समर्पित अगर आपसे भूल हो गई है तो शाम के जब शयन करने जाएं तो सुबह से जगने से लेकर शयन तक हे करुणानिधान भगवान इतने घंटे से अभी तक जो सेवा होती रही वो आपके चरणों में समर्पित है और मुझे ऐसा बुद्धि योग प्रदान करें कि इसमें जो त्रुटि हुई है जो आपके विरुद्ध हमसे आचरण बन रहे हैं या सोच बन नाथ आप हमें सावधान करके ऐसा बल दें कि वो गलती हमसे बिल्कुल सहज है भगवत प्राप्ति का कोई कर्म
बंधन आपको बांध नहीं पाएगा बीच-बीच में आपको स्मरण हो राधा राधा राधा एक बार कहा था कि पांच मिनट में एक बार राधा बोल दो पांच मिनट में एक बार बहुत सहज है पांच मिनट में एक बार बोलना है राधा अब चार मिनट के लिए आप बिल्कुल फ्री देखो आप फिर पांच मिनट में राधा राधा अगर 24 घंटे राधा राधा ना चलने लगे तो हमें बताना क्योंकि हर चार मिनट में सैकड़ों बार राधा होगा कि पांचवे मिनट में बोलना है राधा बोलना तो है मुख से राधा लेकिन अंदर से चलने लगेगा राधा राधा क्योंकि पांच मिनट में बोलना है ये फसाओ ना मन को मन ने तुम्हें फसाया है ये भोग ये भोग ये भोग फसाओ राधा नाम पे और मुक्त होने का बिल्कुल सहज उपाय कह रहे तस्मात शास्त्रम प्रमाणम ये मनमानी नहीं कह रहे नव योगेश्वर ने कहा है स्वभावश अह अहंकार वश चेष्टा जो जो भी हो रही है वो परम पुरुष नारायण को समर्पित कर दे।
इसे सहज भागवत धर्म कहते हैं। जो भी कर्म कर रहे हैं यत करोशी भगवान ने स्वयं श्री कृष्ण चंद्र जी ने कहा ये बहुत बढ़िया कर्म बंधन से मुक्त होने का उपाय आज तक जो हुआ राधेश्याम आगे हम गलत ना करें सावधान रहे और अभी से नियम ले ले कि कोई भी समय हम बिना भगवत समर्पित किए व्यर्थ नहीं जाने देंगे। नियम ले लो। बहुत जल्दी निष्कामता आ जाएगी। बहुत जल्दी आपके हृदय में आनंद आने लगेगा। पर यह एक दो दिन करते हैं फिर भूल जाते। माया का काम है भुला देना। पकड़ लो। कुछ तो पकड़ो।
धाम निष्ठा, नाम निष्ठा, कर्म समर्पण, निरंतर भगवत चिंतन कुछ तो पकड़ो। या चार दिन करते हैं फिर भूल जाते हैं। एक दिन 20 माला, दूसरे दिन दो माला, फिर दो दिन एक भी माला ऐसे नहीं चलता। अगर हम दो माला तो दो माला हम बढ़ाते चले जाएंगे फिर आगे घटना नहीं चाहिए हम लोग ऐसे प्रमादी है कि आज सुनेंगे आज से समझ में आ गया हां कर्म समर्पण करेंगे और दो दिन तीन दिन बाद फिर वही चलने लगा भूल गए ये अपना कल्याण करना है बुद्ध शरण मनविच्छ समता जब बुद्धि में आ जाती है तो वास्तविक शरणागति हो जाती है।
हम फंसे हुए हैं लाभान सुखदख में है नहीं पक्का समझो बोले हमें तो भोगना पड़ रहा है तुम्हें क्या तुम तो बाबा जी हो स्वप्न में जैसे आपको भोगना पड़ता है ना सुखदख और होता कुछ नहीं है आपसे सच्ची कह रहे हैं बिल्कुल ऐसा ही है ये बिल्कुल ऐसा ही एक बड़ा सपना है इसी सपने में सब कुछ हो गया सत्य कुछ नहीं है कई बार आपको बताया है महापुरुषों ने भगवान से कहा हमें अपनी माया दिखाओ। जैसे मार्कंडेय जी जब भगवान नारायण प्रकट हुए तो कहा तुम्हारी कोई इच्छा तो उनका प्रभु आपके चरण कृपा प्रसाद से कोई चाह नहीं है।
सुना है आपकी माया बड़ी प्रबल है। ये क्या है? दिखाओ अपनी माया। अंतर्धान हो गए भगवान। थोड़ी देर में देखा कि समुद्र अपनी मर्यादा तोड़ के बह रहा है। ये देर ना लगी। पूरा ब्रह्मांड जल में भारी थपेड़ों में मार्कंडेय ऋषि हाहाकार मच गया कुछ नहीं बस ब्रह्मांड में जल ही जल और क्या क्या आप पढ़ के भागवत में देखिए बड़ा जब विकल हुए एकदम तो उस महान जल राशि में बट वृक्ष और उसमें पत्ते पर गोविंद बाल गोविंद क्या करविंद पदारविंदम मुखारविंद विनंतम वटस पत्रस पुन बालम मुकुंदम मन भगवान अपने अंगूठे को ऐसे मुख में ले ऐसे यह थोड़ी शांति मिली क्योंकि भगवत दर्शन हो रहे पर फिर अचानक इतनी लहरें मुस्कुरा दिया भगवान उनके मुख में उधर में गए वो फिर वहां सब वही ब्रह्मांड वही प्रलय बहुत वर्णन इसके बाद जब त्राहिमाम प्रभु बचाओ तो आंख खुली तो कुशासन में बैठे हैं अपने आश्रम में एक बूंद पानी नहीं महा प्रलय हो गई जल की और एक बूंद पानी नहीं और यह देखा बहुत कल्प व्यतीत हो गए और दो घड़ी में 48 मिनट में बहुत कल्प बीते ए ये वही माया में अपने लोग फंसे हुए हैं।
कोई नहीं है ना मैं ना तू ना मेरा ना तेरा या मैं ही मैं है या तू ही तू है। ये द्वैत ये भेद नहीं है। ये स्वप्न चल रहा है। अरे हम नहीं कह रहे काशी से बोल रहे हैं भगवान शिव उमा का हूं मैं अनुभव अपना सा हरि भजन जगत सब सपना हमारी बात ना मानो तो शिव जी कह रहे सपना में है चल रहा है उड़िया बाबा से महात्मा ने पूछा तो क्या हम आपसे बात कर रहे हैं तो स्वप्न में बोले स्वप्निक तो हो ही मैं और तू दिखाई दे रहा है ना आप बात करता है हमसे उत्तर ले रहे हैं तो स्वप्न में तो ले रहे हैं जागृत जब होगे तो एक ब्रह्म द्वितीय नास्त कोई प्रश्न नहीं अगर प्रश्न है तो स्वप्न पुरुष हो स्वप्न में हूं मैं और तू दिखाई दे रहा है ना उत्तर देने वाला प्रश्न करने वाला दो दिखाई दे रहे हैं ना यह स्वप्न चल रहा है और स्वप्न बड़ा सुखद और दुखद होता है बिना जागे सुखदख नहीं हटता है ये हम सब अविद्या रूपी मोह ग्रसित होकर यही सुखदख के पच में भगवान जगा रहे हैं शरण में हो जाओ भगवान की और दुख सुख से बचने के लिए अपने हर कर्म को भगवान को समर्पित कर दो अगर अगर हमसे कोई अशुभ कर्म भी हो जाता है।
भगवान बड़े कृपालु है। जन अवगुण प्रभु मान न काऊ दीन बंधुति मृदुल सुभाव बच जाओगे नहीं अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म सुभा शुभम जैसे आग में चंदन डालो लोहा डालो विष्ठा पड़ जाए तो आग अपना ही स्वरूप दे देती है यद्यप तीनों अलग-अलग है चंदन सौरभ परम पवित्र लोहा एकदम घन और वो निकृष्ट लेकिन आग तीनों को स्वरूप दे देती है अपना उनका नाम रूप हटा के आग आग कर देती है। चंदन भी आग बन जाता है। लोहा भी आगम में हो जाता है और विष्ठा भी आगम में हो जाता है। हमारी सत असत भावनाएं सब परम पावन हो जाएंगी।
यदि हम भगवान की शरण में होकर फल के हेतु ना बने। हम फल पर जो विचरण कर रहे हैं हमारी अज्ञान की धरा है। और फल मिलेगा। बहुत अच्छा मिलेगा। अरे भैया भोग लगाओगे तो प्रसाद आप ही को पाना है। बड़े कृपाल सब आपको ही मिलेगा। प्यारे हर कर्म का बड़ा उत्तम फल मिलेगा आपको। पर आप जो फल की कामना कर रहे हैं वो निकृष्ट है। भगवान कह रहे हैं दूर हवरम कर्म बुद्धि योगा। ये जो बुद्धि योग से बिलग है ये सकाम भाव करने वाले अत्यंत निकृष्ट भाव को प्राप्त हो गए। निकृष्ट भाव को यह निकृष्ट भाव जब कानों में पड़ता है तब लगता है कि आप अपने साथ धोखा कर रहे हैं।
शास्त्र अवहेलना, संतों की अवहेलना, भगवत अवहेलना ये आप अपने साथ धोखा कर रहे हैं। किसी का कुछ नहीं बिगाड़ रहे हैं। फल अवश्य मिलेगा। महान फल मिलेगा। छोटे से कर्म का ध्यान दीजिए। बहुत उत्तम बात है। छोटा सा कर्म निष्काम आपको महान फल देके रहेगा। बिना दिए वो रुक नहीं सकता। अगर आपने कामना कर ली तो कृपण फल हेतवा फिर आप वैसा ही अनुष्ठान करो जैसी कामना नहीं तो नहीं मिलेगा और अगर आप निष्काम है अनुष्ठान में त्रुटि है वैसा पूर्ण भी नहीं है पर वो कर्म आपको उत्तम फल प्रदान करेगा भगवत प्रसन्नता और जिसके ऊपर ठाकुर जी प्रसन्न है फिर दुर्लभ क्या रह गया कर्म बंधन से मुक्त होने के लिए मानव देह मिला है सब लोग बहुत धैर्य पूर्वक रहो सुख दुख को सहो निरंतर नाम रटो भगवान का आश्रय ले लो जाना है कल हम कुछ साधकों से एकांत में ए भाई थोड़ा सोचो जाना है कौन क्या तुम्हारा कौन क्या तुम्हारे साथ ए जाना है कहां जाना है प्रियाजू के पास जाना है तैयारी कर लो जाने की राधा राधा राधा ये जो भी आप परिवार में कार्य कर रहे हो ये सब भगवत स्वरूप है यह सृष्टि भगवान ही बने हुए हैं।
आप उनको कर्म अपने अज्ञान की निवृत्ति के लिए वस्तुतः गुणानुगुण वर्तते आप कर्ता है ही नहीं पर इतना उच्च कोटि का ज्ञान आपको नहीं है तो आप कर्म समर्पण पे आ जाओ जो कर्म करो भगवान को समर्पित कर दो नाम जप करो भगवत आश्रित रहो जीवन धन्य हो जाएगा ये दुख सुख क्षणिक है अभी दुख आया है फिर सुख आ जाएगा सुख आया है तो दुख आ जाएगा इन द्वंदों में मत फसो ऐसे महा सुख में चलो चलो जहां आनंद समुद्र है दुख का लेश नहीं है भय नहीं है निरंतर नाम श्री राधा वल्लभ लाल की
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
संबंधित
- भजन का सच्चा स्वरूप ! //27/09/2026 — गुरु निष्ठा के लिए आपने या गुरु समर्पण के लिए जो अभी बातचीत की है तो बड़े चौड़े में और खुले में आज सब चर्चा करते हैं। हम लोग कहां असफल क्यों हो जाते हैं महाराज जी क्यों ऐसी अच्छा…
- अनन्यता से ही होगा सब कुछ प्राप्त ! // 26/09/26 — हम लोग भगवान के शरणागत जन है। प्रिया लाल के शरणागत जन है। लेकिन शरणागति का रहस्य ना जानने के कारण बहुत वर्षों तक या जन्म पूरा व्यतीत होने तक हमारा जो भागवतिक आनंद है वो स्पुरित…
- हमें जीवन में मुश्किलें कब तक सहनी पड़ेंगी ? //25/09/26 — कोई ना कोई सा किसी ना किसी सेवा सेवा में पांच 10 15 20 का एक होता है आमच राग द्वेष बनने से बहुत ज्यादा दुभावना रहती है उसके कारण क्या विक्षेप होता रहता है और एक दूसरे की ये मतलब…
- इस एक बात से आपका पूरा जीवन बदल जाएगा ! // 24/09/26 — देखो सबसे पहली बात कि जो ही हम शरणागत होते हैं हमारी बात ही हमारे सारे जीवन का भूत भविष्य वर्तमान का पूरा भार इष्ट पर होता है। अब हमको जो कर्तव्य करना है इस समय शरणागति का वह…
- यदि साधक स्वयं पर कृपा करे, तो यह लाभ मिल सकता है/ काकासुर, शकटासुर एवं तृणावर्त का उद्धार — वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता निर्वापय परम शीतल माश्रयाम परम शीतल माश्रया [नाक से की जाने वाली आवाज़] परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप…
- श्रीकृष्ण का छठी पूजन एवं पूतना वध / बाल कृष्ण के दर्शन को को आए महादेवजी ! // 22/09/26 — नीलमणि ने सकला वयवाना कुरविंद नेव बिंबा धरस कमल रागेने पाण पादस्य शिखर मणने नखर निकस निर्माण कदा चिन मणमयोवा इंदवरे सकला वयवस्य बंधु केनेव बिंबा धरोष् जपा कुसुमेव पाण पादस्य…