॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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बार-बार असफल हो रहे हो ? घबराओ नहीं—बस ये बात समझ लो // 25/11/2025

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वा परम शीतल माशयाम निर्वापय परम शीतल माशयाम परम सच्चिदानंद घन प्रेमंद स्वरूप नवनित निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले युगल चंद्र प्राणाराध्य श्री प्रिया प्रीतम जो समस्त हित परिकर निज परिकर हमारा हृदय सदैव आराध्य देव के चिंतन से ही सुरक्षित रह सकता है।

नहीं तो इसमें कोई ना कोई विकार, कोई ना कोई द्वंद अपने प्रभाव में लेकर हमें हर्षित और शोकित करता रहेगा। बहुत ध्यान से समझिए। अगर हमारे हृदय में आराध्य देव का चिंतन चल रहा है तो मानो हमारा हृदय सुरक्षित है। बहुत समर्थ पहरेदार खड़ा है जो किसी भी विकार को घुसने नहीं देगा। अगर हम तनिक भी चूक गए अपने आराध्य देव के चिंतन से तो उसी समय कोई ना कोई शत्रुवत व्यवहार करने वाला विकार अंदर अपना प्रभाव दिखा देगा। जिस हृदय में निरंतर चिंतन चलता है, एक दिन उसके हृदय में ऐसी परमानंद की बाढ़ आती है।

फिर कोई विषय, कोई व्यक्ति, कोई घटना, कोई परिस्थिति उसके हृदय में तनिक भी विकार पैदा नहीं कर सकती। पर जब तक ऐसी स्थिति नहीं है तब तक हमें बहुत सावधानी पूर्वक तेल धारावत भगवत चिंतन करने का अभ्यास करना है। चिंतन संसार का छूटा कि आप परिपक्व अवस्था को प्राप्त हो गए। जिसे सिद्धावस्था कहते हैं। किंचिन मात्र नानात्व का चिंतन न रह जाना यही परिपक्व अवस्था है। जागृत स्वप्न सुशुप्त स्फुरत में राधा पदाजत छटा यही परिपक्व अवस्था है। चाहे जागृत अवस्था हो, स्वप्नावस्था हो या सुशुप्त अवस्था हो अपने आराध्य देव में स्थित है।

क्योंकि तीन गुणों से ही अवस्थाओं का सृजन होता है। जो निरंतर चिंतन करता है वह त्रिगुणातीत हो जाता है। त्रिगुणातीत अवस्था में इन अवस्थाओं का कोई प्रभाव नहीं रहता। जागृत में देखने वाले स्नानात्म का स्वप्न में जो मन के द्वारा रचा हुआ जगत है। सुशुप्त में जो तमोगुण का आवेश होता है। नहीं तीनों अवस्थाओं का प्रभाव उस उपासक पर नहीं पड़ता। देखो सोवत हु रसना रटे राधा कृष्ण सुनाम क्या फर्क पड़ा सुशुक्ति में मानो महान समाधि में स्थित है जिभ्या सोते हुए भी सोवत हु रसना रटे राधा कृष्ण सुनाम अहो भाग्य धन्याति धन्य कैसा अभ्यास किया कोई प्रभाव तमोगुण का नहीं पड़ रहा लग रहा है कि वो नींद में पड़े हैं कोई प्रभाव भाव नहीं तमोगुण पर विजय प्राप्त किए तो सुशुप्त में भी राधा कृष्ण राधा कृष्ण ऐसा चल रहा है और स्वप्न महा आनंदमय हो जाता है।

प्यारी जो प्यारे जो उसके स्वप्न का विषय होते हैं। उनकी रूप माधुरी लीला माधुरी स्वप्न में देखता है। जागृत में जिधर दृष्टि जाती है वह अपने आराध्य देव को चिद चिद लक्षणम सर्वम राधा कृष्ण मयंम जगत उसके अब सुख का वर्णन कौन करें जिसको ऐसी स्थिति प्राप्त है पर ये स्थिति उसी को प्राप्त है जो सावधान होकर अपने चित्त को सुरक्षित रखता है हम बाहरी नाशवान वस्तु स्थान आदि की सुरक्षा में तो प्राणों को अर्पित किए हैं लेकिन अपने चित्त को सुरक्षित रखने के लिए हम बिल्कुल असावधान हैं।

सदगुरुदेव सत शास्त्र इसी पर दृष्टि रखते हैं। तुम्हारा चित्त विश्राम को प्राप्त हो जाए। तुम्हारा चित्त सुरक्षित रहे और चितचोर उसे चुरा ले। ये जीवन की सार्थकता हो गई। श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज बहुत सावधानी की और निर्भयता की दोनों बातें इसी श्लोक में कह रहे हैं। अगर यह सावधानी रहेगी तो निर्भय हो जाओ। तुम्हें निश्चित भगवत प्राप्ति हो जाएगी। श्रीपाद कह रहे हैं श्री वृंदावन वसति विधित्सो में देहाता वधि वधते श्रते दोष नाम श्रवण विध परस्य जिभ्या मुकाम भति सुद्ध गहे जड़ा स्तु हे भाई यदि लाडली जी की आप पर कृपा हो गई है और आपने मृत्यु पर्यंत श्री वृंदावन धाम का अखंड वास स्वीकार कर लिया है।

यह दुर्लभ बात है। बहुत दुर्लभ है। लाडली जी की कृपा से ऐसे सुलभ हो गई जैसे कोई बौना आकाश को स्पर्श कर ले। दुर्लभ है आकाश का स्पर्श करना। इसलिए बहुत दुर्लभ विषय है। अनंत जन्मों की बिगड़ी बांस मात्र से बन जाएगी। बस जो सावधानी आगे वर्णन करते हैं वो यदि हम अपने जीवन में उतार ले। श्रीपाद कह रहे हैं मृत्यु पर्यंत श्री वृंदावन में वास करने वाला निश्चित परम पद का अधिकारी निश्चित प्रियालाल को प्राप्त होता है। जैसे भगवान देवाधिदेव महादेव की जो परम पावन आनंदवन काशी है निश्चित वहां का प्रभाव है कि कीट पतंगा भी मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

देवाधिदेव महादेव की कृपा प्रसाद से देवाधिदेव महादेव जिनकी चरण रज की वंदना करते हैं वह यह भूमि है प्रियाल की। आज भी भगवान महादेव जी जो गंगा जी धारण किए हैं वह हमारे प्रभु का चरणामृत है। गांगम वारी मनोहारी मुरारी चरणचितम जो काशी में छोटे-छोटे जीवों को भी मोक्ष प्रदान कर देते हैं। वो इस धाम की रज को माथे पर धारण करते हैं। जो रज शिव शनकादिक याचत सूरज शीश चढ़ाऊं किशोरी तेरे चरणन की रज पाऊं ऐसे महामहिम धाम में जिसने अपने जीवन को समर्पित कर दिया यह बहुत बड़ी बात है बहुत बड़ी बात यह केवल जिनको वृंदा विपिन है कृपा तिनही की होए वृंदावन में तब ही तो रहन पाई है सोए बड़ी हेतु की कृपा लाडली जो की जो आश्रय लिए हैं और उपासना पद्धति के अनुसार चलते हैं तो भले वृंदावन के बाहर हैं लेकिन उनकी अंतिम स्थिति वृंदावन ही होगी।

पर जो प्रगट में वृंदावन वास कर रहे हैं अहो भाग्य धन्याति धन्य मानो अब कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं रह गया। वृंदावन मिल गया। श्रीपाद कह रहे हैं देहता शरीर जब तक चेतना में है तब तक धाम से विलग नहीं यह थोड़ा कठिन विषय है। शरीर की कैसी भी परिस्थिति हो आप अगर अपनी निष्ठा में बने रहेंगे तो सब ठीक हो जाएगा। सब बन जाएगा। प्रत्यक्ष में देखा है कई उपासकों के जीवन में कि अब उनको जाना ही पड़ेगा। कोई दूसरा उपाय नहीं। हमने भी प्रार्थना कर दी। कोई बात नहीं आप चले जाइए।

पर उनकी निष्ठा उन्होंने कहा महाराज जी नहीं अब हम मृत्यु का वरण करके रह रहे हैं। अब हम नहीं जा सकते। नहीं उस स्थान सड़ रहा है और वह केवल वही जहां ऑपरेशन हुआ है वही ठीक हो नहीं अब हमें मरना है पर हम धाम नहीं छोड़ेंगे सच्ची कह रहे हैं अपने आप जो मवाद बना हुआ सूख गया अपने आप ठीक हो गया वो अपनी मृत्यु समय आने पर गए वो कारण नहीं बना लाडली जो हमारी सर्व समर्थ है हमें घबराना नहीं कि कोई परिस्थिति शरीर के आ गई तो हम घबरा जाए। नहीं ठीक है। बुलावा आया है अगर इसी रूप में तो हम इसी बात के लिए यहां वास कर रहे हैं कि हम यहां राधा राधा पुकारते हुए शरीर छोड़े रज में तड़पते हुए प्यारी जो की स्मृति में प्यारी जो की चरण रज में और हमारा अंतिम विश्राम स्थल हो गया।

धैर्य रखना पड़ेगा। इसमें बहुत धैर्य की बड़ी विचिलता की परिस्थितियां थी। बड़ी विचिलता की देहातावधि मुझे मरना है हमें नहीं चाहिए दवा नहीं चाहिए सुविधा जिनके लिए जीवन अर्पित किया है अब कलंक नहीं लगने देंगे अब उन्हीं के लिए ये उन्हीं के बल से अपना बल नहीं उन्हीं के बल से अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी उनके अधीन है हमें चिंता नहीं करनी जब हम ये देख लेते हैं कि अरे यहां वहां कोई सुविधा देने वाला नहीं। घर में तो सुविधा है फिर चूक हो जाएगी। इसीलिए इस मार्ग में चलने वाले पथिक को पिछले कदम को पूर्ण रूप से हटा लेना चाहिए।

नहीं परिस्थितियां ऐसी आती है कि फिर अगला कदम हटाना पड़ता है। सच्चा भगवत मार्ग का पथिक अगला कदम नहीं हटा सकता। चाहे काट दिया जाए। निष्ठा निष्ठा होती है। कैसी भी परिस्थिति हो शरीर छूटना है ना बस इतना ही तो होगा ना ठीक है। अरे दिल में बीमारी है हमको बाहर जाना पड़ेगा तो बाहर जाकर जिस दिन स्वास पूरी होनी है बचा नहीं लेगा कोई नहीं ठीक है ये भगवत ऋषि जी महाराज कह रहे हैं जो कछु लिखो लिलाट दुख सुख देह संग भुगत वो जगो या सिद्धांत अभंग या सिद्धांत अभंग तजत क्यों धीरज प्राणी वृंदावन परिहरे प्रिया प्रीतम रजधानी जिस समय हम तड़प रहे होंगे तो हमारे स्वामी मुस्कुरा रहे होंगे क्या वो दूर बैठे रहेंगे क्या?

अरे बहुत प्यार करने वाले तुम्हारे मानस पटल पर छा जाएंगे। फिर दुख किसको होगा? मन तो प्रिया प्रीतम के आनंद रंग में रख जाएगा। विश्वास कीजिए। विश्वास कीजिए। कभी विचलित मत होइए कि कोई हमारा सहयोगी नहीं। कोई नहीं था। कोई नहीं है। कोई नहीं रहेगा। वही हमारे हैं। वही हमारे थे। वही हमारे रहेंगे। हम पहचान नहीं पाते। विश्वास कीजिए। बार-बार इसलिए कह रहे हैं विश्वास कीजिए कि ये विश्वास से ही आपका धैर्य पुष्ट होगा। नहीं तो हाथ पैर मारना बंद नहीं होता। और हाथ पैर मार के भंवर से बच नहीं सकते।

और हाथ पैर मारना बंद कर दो। भंवर ही खत्म हो जाएगी। ये ऐसा मार्ग है। विश्वास कीजिए। बिन विश्वास भगत नहीं। श्रीपाद कह रहे देहांतावध यह महा व्रत है महाव्रत बस अब जीवन हमने वृंदावन को दे दिया अब नहीं कोई प्रश्न नहीं जीवन का प्रभु से कोई प्रश्न नहीं आप हमारे शरीर को व्यवस्थित रख रहे हैं या अव्यवस्थित रख रहे हैं बड़ी दुख की परिस्थिति है या सुख की परिस्थिति है कोई ना धन्यवाद आपको और ना शिकायत आपको क्योंकि धन्यवाद दूसरे को दिया जाता है। हम तो बिक चुके हैं आपके।

धन्यवाद क्या? आपने खरीद लिया। धाम वास देकर अपने चरणों की उपासना देकर खरीद लिया। हम तो बिक चुके हैं। अब हमारा अधिकार नहीं कि हम आपको धन्यवाद दें। अब आपकी वस्तु कैसे रखो। जो कुछ लिखा लिलाट दुख सुख देह संग भुगत जहां जाएगो। यह सिद्धांत अभंग अभंग सिद्धांत है। तो बोले यहां का फायदा क्या होगा? बोले कलह कलेश ना व्यापेठा यह ठोर विश्वते न्यारी अगर यहां वास कर रहे हो तो भयानक प्रारब्ध जो महान दुख देने वाला था वो व्यापेगा ही नहीं बहुत साधारण में निकल जाएगा। बहुत साधारण में विश्वास मानिए धाम का बड़ा प्रभाव है।

सत्संग में बड़े-बड़े महापुरुषों से सुना था कि असाध्य रोग भगवान की विशेष कृपा से आता है। तो कांप गया मन सुन के कि भैया शरीर स्वस्थ है तो हम आसनों में बैठे हैं। साधन करें और अगर असाध्य रोग तो कौन सी कृपा है? लेकिन जब हुआ तब समझ में आया कि जो साधनों से नहीं बनता इस असाध्य रोग ने साध्य कर दिया उस तत्व को किसी से हम कल कह रहे थे हे भाई हमारा प्रयास रहता है कि जो हमें हाथ पकड़ा दे उसे अनाथ बना दूं उसे असरण बना दूं अनाश्रित बना दूं और फिर ये बना के फिर नाथ अनाथन हित समर्थ मोहन श्री राधा उनके हाथ में दे दूं।

आप संभालो आपकी वस्तु आपको समर्पित है। पोस्टमैन का काम हमारा कार्य है तुम्हारे अंदर यह बैठ जाए कोई मेरा नहीं। तुम्हारे अंदर अन्य आश्रय ना रह जाए। तुम्हें लगने लगे कि प्रभु आपके सिवा मैं असमर्थ हूं। अनाथ हूं नाथ। यदि आपने स्वीकार नहीं किया तो मेरा कोई नहीं। यह हमारी आंतरिक युक्ति है। जिस युक्ति से प्रिया प्रीतम का आकर्षण होता है। नाथ अनाथन हित समर्थ मोहन श्री राधा यह तभी हो सकता है जब विश्वास पूर्वक निष्ठा पूर्वक हम धाम को गुरुदेव के वचनों को नाम को स्वीकार करें।

देहाता वते श्रतिम देखो बड़ी करुणा करके कह रहे हैं मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं किसकी वृंदावन की नहीं जो अखंड वृंदावन वास ले लिए हैं मृत्यु पर्यंत श्रुतिस्ताम मैं स्तवन करता हूं तुम्हारे स्तुति करता हूं हाथ जोड़ के प्रार्थना करता हूं कि मेरी बात मान लो क्या मान लो दोष नाम श्रवण विध परस तुम कभी किसी के दोष अपने कानों से मत सुनो। हाथ जोड़ की स्तुति करता हूं। हे अखंड वृंदावन वासी तुमने जो जीवन पर्यंत वृंदावन वास स्वीकार किया बहुत जल्दी तुम्हें आनंद की अनुभूति हो जाएगी।

मेरी प्रार्थना मान लो। श्रीपाद कह रहे हैं कह रहे दोष नाम श्रवण विधो परस्य दूसरे के दोष की बात कान से सुनना बंद कर दो धाम के रहनी में आ जाओ ज्यादा व्यवहार करना ज्यादा लोगों से मिलना जुलना भगवत भाव अगर नहीं बना है तो फंस जाओगे इसीलिए सिद्धांत लागू कर दिया जाता है कि आप इस नियम के अनुसार चले आप मिल क्योंकि आप भी जीत संग दोष नहीं हुए कोई भी विषय कोई भी व्यक्ति कोई भी घटना कोई भी परिस्थिति आपके को फसा लेगी नहीं आपको इस सीमा में रहना है और सीमा में रहते रहते जब परिपक्व हो गए तो आप पूरे विश्व में तुम्हें कोई नहीं फसा सकता जितंग दोष विषयान ग्रहण मुंच कैसी महिमा है वो विषयों के बीच में रहते हुए भी निर्विषय रहता है।

अभी एकांत में रहते हुए विषयों से हटके भी विषय चिंतन होता है। बहुत कमजोर स्थिति है। पर निंदा केते आवत नहीं कछु हाथ। मूर्ख पर्वत पाप को ले चल अपने साथ। जो कथन करते हैं और श्रवण करते हैं दूसरे के दोषों का दोनों एक ही अपराध माना जाता है। जैसे लीला गायन और श्रवण दोनों का एक ही फल है। एक ही फल है। गावत श्रवणन सुनत सुखाकर विश्व दुरित दवनी। प्रियाल की लीला का गायन करना और लीला श्रवण करना दोनों बराबर फल प्रदान करते हैं। ऐसे ही पर निंदा करना और पर निंदा सुनना दोनों बराबर फल प्रदान करते हैं।

क्या फल? पाप की गठरी। क्यों? आपका लक्ष्य वृंदावन वास करके प्रिया प्रीतम से मिलना है तो क्यों किसी की निंदा सुनो? अगर कोई निंदा कर रहा है राधा राधा राधा राधा कान में अंगुली डाला। ऐसा आदेश है संत समु श्री पद अपवादा कही सुनी त अस मर्यादा काटी जीभ तास जो बसाई श्रवण मूंद नत चले पराई भगवान की निंदा भक्तों की निंदा संतों की निंदा भक्ति की निंदा आदि आदि जो कर रहे हैं तो बोले मर्यादा है ऐसी या तो उसकी जबान बंद करो और या कान में उंगली डालो चल दो भक्त का स्वभाव लड़ना झगड़ना नहीं हमें उसके प्रति कोई व्यवहार नहीं करना।

कटु ना प्रिय। हमें उदासीन हो जाना है। कान में उंगली डाले राधा राधा राधा चल दिए। बहुत जल्दी आपका भजन बढ़ने लगेगा। ये जो भजन विक्षिप्त होता है ना तो आप निंदा नहीं करते पर सुन लेते हैं। यह बहुत बड़ी हानि हो जाती है। हम किसी की जब बाई करेंगे तो सावधान रहे। देखना शब्द रपट जाएगा। किसी की निंदा कर बैठेगा। इसीलिए कहा गया है तात सुनो मायाकृत गुण दोष अनेक गुण या उभय न देखी देखी सो विवेक हे तात ये गुण और दोष मायाकृत है सबसे बड़ा गुण विवेक यह है कि हम किसी के भी गुण दोष की चर्चा ना करके भगवान प्रियाल की लीलाओं का गायन श्रवण करें उनकी वार्ता करें बोधता परस्परम क्यों हम किसी व्यक्ति के गुण दोष का वर्णन करके अपराधी बने हम अपने मन को मलिन करें पाप बुद्धि बढ़ाएं।

श्री पाद हाथ जोड़ के प्रार्थना करते हैं। कितनी करुणा है इनकी। स्तुति करता हूं तुम्हारी क्योंकि तुम वृंदावन वास स्वीकार किए हो। पर मेरी बात मान लो। दोष नाम श्रवण विध परस किसी की भी दोष वाली बात आप कान से तेरे भावे जो करे भलो बुरो संसार नारायण तू बैठ के अपनो भवन बुहार। पहली बात तो सब भगवत स्वरूप है। मुझे अपने हृदय में यह प्राप्त करना है। गुण दोष मायाकृत है। जैसे कोई बहुत गुण है तो किसके हैं? माया जनित ही तो है। गुण मानी संसार और सकल गुण प्रीति बिनु भगवत प्रेम नहीं तो उन गुणों को क्या करेंगे लेके?

तो हमें ना किसी के गुण की तरफ देखना है ना किसी की दोष की तरफ देखना है। क्यों? गुण वर्णन करने में कोई दोष नहीं है। लेकिन जहां हम किसी एक के गुण वर्णन करेंगे तो जिभ्या फिसल कर उदाहरण में चली जाएगी और वो दोष वर्णन कर दे ही देगी दूसरे का। बस हम चूक कर बैठे और फिर आप देखना भजन में विक्षेप पड़ने लगेगा। आप समझ नहीं पाएंगे। अरुचि होने लगेगी। ज्यादा निंदा अपराध बन गया तो जहां से तुम्हारा काम बनना है वही दोष दर्शन गुरु पे होने लगेगा। गुरु की बातों में अश्रद्धा होने लगेगा।

और वो आपको दूर कर दे और जहां दूर की बस पहुंच गए माया के पाली पे अब वो रौदेगी क्योंकि बचाने वाला कोई नहीं माया का दलदल मोह कलिल ये ऐसा व्याप्त हो जाएगा निकलना मुश्किल है इसीलिए हाथ जोड़ के कह रहे हैं सोचो इतने बड़े महापुरुष कि तुम्हें लाडली जी ने कृपा करके वृंदावन वास दिया हे भाई मैं तुम्हारी स्तुति करता हूं कि तुम्हारे बड़े भाग्य हो गए अब तुम अपनी श्रवणेंद्र को बचाओ दूसरों के दोष सुनने से परस जी्या मुकाम भि जब दूसरे की निंदा करने की अंदर वेग आवे आता है अरे उसी समय तुम मुंह खो जाओ मौन धारण कर लो मत बोलो परस जिभ्यास्ताम भितु जब तुम्हारी जिभ्या बोलने के लिए तैयार हो दूसरे की निंदा करने के मौन धन दांत से दांत दबाकर जबान को अंदर नहीं वेग को सह जाओ नहीं तो यह बुद्धि को भ्रष्ट कर देगा भक्त निंदा अति बुरी भूल करे जिन कोई के सुकृत बहुजन्म के क्षण में डाल फिर बहिर्मुख होकर घूमता रहता है अंतर्मुखता आ ही नहीं सकती और फिर आप खुला निंदा वर्णन करो तो सोचो आपको कैसा परिणाम मिलेगा भजन में ही नहीं रुचि

जैसे आंख में जरा सा भी कण बर्दाश्त नहीं होता ऐसे पवित्र हृदय में थोड़ी सी चूक पहाड़ जैसी दिखाई देती अरे गलती हो गई गलती हो गई कहां कह मौसम कौन कुटिल खल कामी कौन जिनके सामने प्रभु विराजमान है दिव्य लीलाएं जिनके नेत्रों में चल रही महासागर लीलाओं का जिन्होंने रचना किया वो श्री सूरदास जी महाराज और हम पहाड़ जैसे अपराध करके भी मुस्कुरा रहे हैं क्योंकि मलिन हृदय है गलती नहीं होने पावे मूकम मूख हो जाओ मौन हो जाओ जब किसी की निंदा करने की बात आवे मौन नहीं भूलना हट जाओ वहां से अपने को बचा लो प्राय साधक शारीरिक अपराध विशेष सावधान रहता है कि ना हो वाणी से अपराध बन जाता है श्रवण इंद्री से अपराध बन जाता है इसलिए श्रीपाद यहां कह रहे हैं हाथ जोड़कर तुमसे प्रार्थना है मानो आप गंदे आचरण नहीं करते पक्का क्योंकि साधक हो अब आप सुनने में चूक कर दिए दूसरे की निंदा सुन रहे हैं दूसरे की निंदा कर रहे हैं।

तो कह रहे पर दोषों का यह जो ग्रहण करने की वृत्ति है धीर ग्रहे जड़ास्तु तुम्हारी बुद्धि जो जड़ता को प्राप्त हो गई है कि दूसरे के गुण दोष का वो दर्शन कर रही है वर्णन करा रही है श्रवण करा रही है छोड़ दो अगर यह छोड़ दिए तुम तो कह रहे श्री वृंदावन वतिम वृंदावन वास मात्र से तुम्हारे हृदय में प्रिया प्रीतम प्रकाशित हो जाएंगे यह दिव्य धाम है। यहां किशोरी जी का नाम कण कण में छाया हुआ है। सच्ची मानिए ये राधा नाम कैसे तुम्हें बताएं? जब तुम्हारी आसक्ति हो जाएगी इस नाम में तो तुम्हें सुनाई देगा।

वायु चल रही तो उसमें राधा राधा एक एक पत्ता एक एक किसी भी दिशा में तो बस राधा ही राधा राधा ही ये धाम है राधा धाम है ये ये राधा नाम यदि जिभ्या में तुम्हारी चलता रहे तो ये जितनी पर निंदा करना पर निंदा सुनना या पर दोष देखना हट जाएगा राधा नाम रटत रहे सोई धन्य कल में ताके पद पंकज की रेणु में बलि में आ हा जिसकी जिभ्या से राधा राधा राधा तो कह रहे धन्य है इस कलिकाल में मैं उसकी चरण रज की वंदना करता हूं और उसकी बलिहारी लेता हूं वो वो राधा नाम उच्चारण किया।

सोई सुकृत सो पुनीत सोई कुलवंता जाको निश बास ही राधा नाम चिंता वही महान पुण्यशाली है। पीछे सत्संग में कई बार वर्णन किया गया है कि नाम से बढ़कर कोई तीर्थ पावन करने वाला नहीं। नाम परम ज्ञान है, नाम परम व्रत है, नाम ही परम पद है। सर्वस्व नाम है। ये महापुरुषों ने अनुभव किया है। और बड़े-बड़े महापुरुषों को देखा है। चाहे वो प्रणव नाम हो या राम कृष्ण हरि कोई नाम हो। वो बिना भगवन नाम की ऊंचाई पर नहीं पहुंचे हैं। निरंतर नाम चिंतन का आधार लेकर वो चाहे निराकार की उपासना क्यों ना हो नाम का आधार लेकर के वो उस तत्व में स्थित हो गए हैं।

बोले सबसे बड़ा वही पुण्यवान सुकृति महादानी महाज्ञानी जिसकी जिभ्या पे नाम चल रहा है। राधा राधा सोई सुकृत सबसे बड़ा पुण्यवान सो पुनीत परम पावन परम पावन देखो तीर्थों को भी तीर्थत्व प्रदान करने की सामर्थ नाम जाप में आती है कैसा नाम सुधा रसम राधा नाम सुधा रसम कहां फुर्सत है किसी की बात सुनने को देखने को बोलने को फुर्सत उन्हीं को है जो प्रमाद कर रहे हैं। नाम जप नहीं कर रहे। नाम जप चल रहा है हमारी रुचि ही नहीं होगी। देख लेना आप नाम सो पुनीत शरीर भी पवित्र और हृदय भी पवित्र जिसकी जिभ्या पे नाम आ सवायाभ्यांतर सूची बाहर और भीतर दोनों जगह से पावन हो जाता है जिसकी जिभ्या पे नाम चल सोई कुलवता जो नाम जप रहा है राधा राधा राधा होतो यज्या वर्तते नाम तभ्यम वो स्वपच भी सबसे श्रेष्ठ है जिसकी जिभ्या पे नाम चल रहा है।

सोई कुलवंता जाको निशवास रही राधा नाम चिंता रात दिन चिंतन हो रहा है राधा नाम का और एक ही चिंता है कहीं नाम छूट ना जाए त स्मरण परम व्याकुलते धन्य हो गया धन्य हो गया जिसके हृदय में राधा नाम की चिंता है कि कहीं मेरा ये परम धन राधा नाम आधार विस्मरण ना हो जाए छूट ना जाए जो यज्ञ तीर्थ व्रत राधा नाम माही राधा नाम बिना और कल उपाय ना चाहे जितना चाहे जितना और कुछ कर लो कलिकाल है सिद्धावस्था नहीं प्राप्त हो अलग-अलग युगों का युग धर्म होता है। इसमें कलयुग केवल नाम अधारा सुमिर सुमिर नर उतरह पारा नाम नाम कह रहे हैं कि योग यज्ञ वैसे भी जितने भी यज्ञ है सब यज्ञों में भगवान ने स्वयं वर्णन किया है कि जप यज्ञ मैं हूं।

यज्ञ नाम जप यज्ञ राधा राधा इससे बड़ी कोई यज्ञ नहीं है। यह बहुत बड़ी यज्ञ है। पर यह इसमें तुम्हारी प्रारंभ में प्रशंसा नहीं होगी। बाहरी यज्ञ में तो प्रशंसा होगी। अब ये जो सबसे श्रेष्ठ यज्ञ बताई गई। यज्ञ नाम जप यज्ञ ये आगे चलकर बिस्तरे। सब जग विमल कीरति साधु संगति ना टरे जब आप निर्विकार स्थिति में हो जाएंगे तब आपको वो बुलाना नहीं पड़ेगा जनाना नहीं पड़ेगा आप खुद जान जाएंगे सब आराध्य देव है फिर सबसे प्यार मिलने लगेगा क्योंकि सब में मेरा प्यारा ही बसा हुआ है जोग जगज्ञ तीर्थ आप जहां हैं जैसे हैं जो भी हैं राधा राधा राधा राधा आप सबसे बड़े तीर्थ में अवगाहन कर रहे हैं।

समय मिले चले जाओ कोई बात नहीं। लेकिन आपके अंदर यह नहीं होना चाहिए कि अब हमको मतलब तीर्थ अवगाहन करने की आवश्यकता है। नहीं नाम चल रहा है परम तीर्थ में। परम तीर्थ में और नाम का तुम्हारे हृदय में नहीं है। नाम पे प्रीति नहीं है तो तीर्थ भी जाओगे। अभिमान और पुष्ट करो। वहां से ये ये किया ये किया ऐसा किया वैसा किया वो अहम पुष्ट होता रहेगा जो पावनता चाहिए कि अहम गलित होकर प्रभु के चरणों में लग जाए वो नाम से होगा कह रहे कि जितना फल योग में यज्ञ में तीर्थ में और व्रत में बड़े-बड़े अनुष्ठानों में वो नाम की बराबरी नहीं कर सकता।

पीछे भी वर्णन हुआ है कि वो 16व अंश के बराबर भी नहीं है जो नाम जापक को लाभ मिलेगा नाम बिना और कल उपाव नाही अगर नाम नहीं चल रहा तो फिर कलयुग की ऐसी चाल है कि वो सूक्ष्म तत्व पर पहुंचने ही नहीं देगी। अध्यात्म एक बड़ा सूक्ष्म मार्ग है। इसमें बाहरी कोई दिखावा, बाहरी कोई मान प्रशंसा की चाह ऐसा नहीं। ये अंतर्मुखता का है और गुप्त मार्ग है। अंतर ही इसका मार्ग चलता है। उसको बहुत छिपाया जाता है। अंतर की वृत्ति को जिससे हम उस परम तत्व में स्थित हो जाए या उससे हमें प्रेम हो जाए।

वो अध्यात्म एक बड़ा गुप्त मार्ग है जो हम बाहरी को अध्यात्म की तरफ ले जाने वाला नहीं बनता। उसका आंतरिक उद्देश्य बाह्य होता है। नहीं तो छिपाना ही छिपाना होता है। छिपाना ही छिपाना। बहुत बड़े महापुरुषों के सानिध्य मिले हैं। गंगा जी के भी किनारे पावन धाम में भी छिपाना ही छिपाला होता है। अगर गुरु कृपा है तो दृष्टि से पहचान लो कि किस कोटि के महापुरुषों को कृपा करके समझावे नहीं उनके बाह्य लीला से तो समझ ही नहीं सकते हैं। बोले जो स्थिति है वह नाम प्रदान करता है।

राधा नाम बिना और कलयुग पाना सबको सार राधा कबहु नहीं बिरिए सबको सार सार के सार कृष्ण चंद्र जो कृष्ण नाम वही राम वही वामन वही नरसिंह सब रूप उनहीं के उन्हीं के नाम वो स्वयं जप रहे हैं। श्रीमद् राधा सुधाानिधि और हमारे रसिक महापुरुषों की वाणी में यहां वेद प्रमाण नहीं है। यहां वेद का जो स्वरूप है रस स्वरूप है वो रसिक जनों ने देखा है। तो भगवत ऋषिक जी कहते हैं यहां वेद रसिकन की वाणी जो ब्रह्म तत्व सार वस्तु है उसका बोध किए हुए महापुरुषों ने जब कृष्ण रूप का कृपा पूर्वक अवगाहन किया स्वाद लिया तो बोले कृष्णा परम किमप तत्व मम न जाने कृष्ण से बढ़कर कोई और तत्व है मैं परम तत्व श्री कृष्ण श्री मदूदन सरस्वती जी और श्री कृष्ण स्वयं हरि रसना राधा राधा रट य जापा सक्रदेव गोकुल पति रा तक्षणा ये वृंदावन का रस है ये गढ़ विषय है वृंदावन के डाल डाल पात पात में एक एक कण में यहां राधा राधा समाया

हुआ है हमारा मलिन हृदय इसलिए हम नहीं समझ पा रहे राधा बोले सबको सार जैसे उन्होंने कहा कृष्णा परम तत्व हम न जाने तो कृष्ण का सार हार है किशोरी जी कृष्ण का जो प्रेम स्वरूप है जो उनके हृदय का आल्हाद है वो जब रूप धारण किया तो राधा रूप हुआ सांद्रानंद घन प्रेम मूर्ति किशोरी इसीलिए जपत हरि विवस तव नाम प्रतिपद विमल राधा राधा राधा वंशी से और अपनी जिभ्या से भी राधा राधा राधा सबको सार राधा कबहु नहीं बसिए राधा नाम लेके अब भव सागर तरिए बहुत मीठा बहुत सरल सार का सार स्वयं परम तत्व श्री कृष्ण जिस नाम को जपते राधा राधा राधा आपको वृंदावन आने को मिला आपको वृंदावन में सत्संग मिला राधा राधा नाम महिमा सुनने को मिली।

अब तुम काहे को काम गंदा करोगे दूसरे की निंदा सुनकर काहे को वाणी गंदा करोगे जिसमें हमें नाम चलाना है। यदि नाम जापक वैष्णव की निंदा हुई या किसी की निंदा हुई तो नाम भगवान नहीं चलेंगे। ध्यान रखना नाम केवल शब्द ही नहीं है। जो कृष्ण नाम है वही कृष्ण है। जो राधा नाम है वही राधा किशोरी है। मानो किशोरी जो कृपा करके राधा नाम के रूप में हमारी जिभ्या में विराजमान। अब इस जिभ्या से यदि हम अश्लील वचन बोलेंगे, गंदे वचन बोलेंगे, कड़वे वचन बोलेंगे, निंदा के वचन बोलेंगे तो हमारी जबान में कैसे नाम चलेगा?

बहुत सावधान। जहां ऐसी कोई बात हो हम मुंह को हो जाए। हमें बहुत बढ़िया अवसर मिला है। चलते हैं भगवान श्री कृष्ण चंद्र जो अर्जुन जी को उपदेश कर रहे हैं। यदि तुम कर्म फल का हेतु बनोगे तो तुम दुखी सुखी हो जाओगे। प्रायः हम कोई भी कर्म करते हैं तो पहले फल सामने रखते हैं। विचार करके देखना। हम कर्तव्य मान के नहीं करते। हम फल सामने रखते हैं। इसीलिए कर्म करते हुए वो कर्म योग नहीं बन पाता। हम द्वंदों से ऊपर नहीं उठ पाते। अनुकूल परिस्थिति आ गई, फल मिल गया तो हम इतने फूल गए, नाच पड़े और अगर हमारे प्रतिकूल फल की तो फिर हम इतने उदास हो गए कि ऐसा लगने लगा कि अब जीना ही बेकार है।

नहीं भाई यह मानव देश इसलिए नहीं मिला। भगवान कह रहे करण वाधिकारस्ते मा फले कदा चन मा कर्म फल हेतु भूमाे संगो कर्मणी तुम केवल अपने कर्तव्य कर्म को देखो तुम्हारे मांगने ना मांगने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा तुम्हारा कर्तव्य तुम्हें फल देके ही रहेगा। पर तुम फल पर यदि दृष्टि रखोगे तो निराश हो जाओगे। यहां विचारणीय विषय है। मनुष्य शरीर में दो बातें हैं। एक है पुराने कर्म का फल भोग और एक है नया कर्म करना। मनुष्य योनि छोड़कर शेष जितनी योनियां हैं वह केवल पुराने कर्मों का भोग कर सकते हैं।

नया कर्म नहीं कर सकते। जैसे कीट पतंग पशु पक्षी देवता ब्रह्मा तक ब्रह्मलोक तक जितनी भी देव योनियां ईश्वर कोटि की योनियां वो सब नया अनुष्ठान नहीं कर सकते एक केवल मनुष्य तभी तो दुर्लभ हो मानसुदेव ऐसा कहा गया है यह करना है यह नहीं करना है यह विधान केवल केवल मनुष्य शरीर में लागू है। और जो कर रहे हैं पशु पक्षी आज जितने भी वह अपने पूर्व पुण्य या पाप से प्रेरित होकर वैसे कर्म कर रहे हो। नया अनुष्ठान नहीं हो सकता। जैसे कोई पशु दौड़ा किसी को मारा ये उसका नया कर्म नहीं है।

उसका शरीर भोग और उससे प्रारब्ध से प्रेरित होकर वो उसे दंड दे रहा है। कर्म उसके ऊपर सवार हो गया है। मनुष्य में एक ऐसा है कि वो विवेक के द्वारा नया अनुष्ठान कर सकता है। बस इसीलिए इसकी दुर्लभता है। साधन दाम मोक्ष कर द्वारा पाए न जे परलोक संभारा कबहु का करुणा नर देह देत ई बिनु हेत सने यह शरीर जो मिला बहुत दुर्लभ शरीर आप कुछ भी बन सकते हैं लेकिन आपका ध्यान केवल उधर ही है विषयों की तरफ संसार के भोगों की तरफ संबंधों की तरफ वैसा लगता सत्य है यह शरीर सत्य है यह शरीर सत्य है यह भोग सत्य है यही हमारी बुद्धि को अविद्या ने ग्रस लिया फसा लिया है।

पशु पक्षी कीट पतंग जितनी भी और योनियां हैं यह नया कर्म कुछ नहीं कर सकते। वह पुराने कर्म का फल भोग भोग रहे हैं। बुरा या अच्छा जैसा जैसा कर्म आता जा रहा है। उसके द्वारा यदि तुम्हें दिखाई देता है कि कोई नया कर्म है तो वह नया कर्म नहीं है। उसका पूर्व प्रारब्ध कर्म है। अनुकूल परिस्थिति प्रतिकूल परिस्थिति सुखद परिस्थिति दुखद परिस्थिति अन्य योनियों में वो केवल कर्म के अनुसार आ रही है। पूर्व कर्म नया कर्म नहीं मनुष्य शरीर एक ऐसा है जो अपने पुरुषार्थ से यह जो शरीर बना है इतने भर का भोग होगा।

पूर्व जितने जमा उन सबको भस्म कर सकता है। आगे जो नए कर्म वो निष्फल कर सकता है। प्रारब्ध को भोगने की क्षमता प्राप्त कर सकता है और इसी जन्म में भगवत प्राप्ति कर सकता है। मनुष्य शरीर में दो विभाग हैं। एक है उसके सामने पुराने कर्मों का फल। अनुकूल प्रतिकूल परिस्थिति मात्र केवल आती है पुराने कर्मों के फल से जिसको हम लाभ हानि कहते हैं। जिसको हम सुख दुख कहते हैं। और दूसरा है नया कर्म। नए कर्म के अनुसार हम अपने भविष्य का निर्माण करते हैं। पशु पक्षी देवता ये नहीं वहां केवल क्षीण हो रहा है।

पाप क्षीण हो रहा है। पुण्य क्षीण हो रहा है। यहां हमारे सामने दो परिस्थितियां आती है। एक अनुकूल एक प्रतिकूल जो हमारे पाप और पुण्य के अनुसार जो शरीर बना है उसके भोगने में। अब हम स्वतंत्र हैं। हम उन परिस्थितियों में पिसे नहीं। दुख आ गया है तो हम पशु की तरह उसमें डूब ना जाए। अनुकूलता आ गई तो हम पशु की तरह इतने फूल ना जाए कि प्रभु को भूल जाए। हमारा कर्तव्य क्या है? इसको भूल जाए। प्राय ऐसा ही होता है। हर्षित हुए तो इतने हर्षित हुए कि भूल गए और दुख पड़ा तो इतने दुखी हुए शोकित हो गए कि जीना मुश्किल हो गया।

ये ये अध्यात्म का प्रवेश नहीं हुआ आपके हृदय में ज्ञान का इसलिए ऐसा है आप कौन है समझिए आपको कौन सी योनि मिली है इस योनि की वंदना देवता भी कहते हैं बड़े भाग मान पा सुर दुर्लभ देवताओं को दुर्लभ भाई क्या भोग तुम्हारे पास श्रेष्ठ है जो देवताओं के पास उनको दुर्लभता यहां का कोई बहुत अच्छा जितेंद्र मनो निग्रही वहां का थोड़ा सा एक भोग उपस्थित हो जाए तो विचलित करने की सामर्थ्य रखता है। क्या भोगों के भोगने के कारण इसको कहा गया क्या कि सुर दुर्लभ नहीं भगवत प्राप्ति के लिए नवीन अनुष्ठान करके सारे संचित कर्मों को भस्म करके और हम अपने प्रारब्ध को सहने की क्षमता प्राप्त करके इस जन्म को आखिरी जन्म करें।

यह मनुष्य जन्म का भविष्य का निर्माण कैसे होगा? शास्त्र और संतों के संग से दो पर रुचि ही नहीं रह गई आज की समाज की। हमारे ब्रह्म ऋषियों ने भगवान ने जो शास्त्र की रचना की बैठकर 10 मिनट एकांत स्वाध्याय करने की वृत्ति नहीं रह गई क्योंकि मोबाइल ऐसी सृष्टि हो गई। सारा समय उसी में चलो अहो भाग्य है जो मोबाइल से सत शास्त्रों की बातें संतों की बातें सुनते हैं तो सदुपयोग हो जाएगा लेकिन दुरुपयोग ना होने पावे तो सावधानी यह आपको आगे बढ़ा देगी सब कुछ है उसी में अगर आपको संतों का संग मिल गया और शास्त्रों की ज्ञान भरी वार्ता सुनने को मिली तो तुम्हें पता चल गया कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए चाहिए।

अब आप शास्त्र अनुशासन गुरु अनुशासन से चले तो आपको बल मिलेगा अध्यात्म बल और आप अपने मन को दुर्वासनाओं से गलत कर्मों से बचा लोगे। गलत कर्मों से जहां बचाया और पवित्र कर्म हुए तो पवित्र कर्म का एक प्रभाव होता है। आपका हृदय निर्मल होने लगेगा और अध्यात्म मार्ग दिखाई देने लगेगा। अध्यात्म का मार्ग अंदर प्रकाशित होता है। देखो हमें जाना बिहारी जो है और हम बहुत दौड़ रहे हैं विपरीत दिशा में छठी कला की तरफ तो उस दौड़ने की प्रशंसा होगी क्या वो अज्ञानी प्रशंसा करे क्या बात है कितना अपने लक्ष्य की तरफ दौड़ नहीं लक्ष्य तो उसका बिहारी जी थे वो गलत दिशा में जा रहा है उसकी दौड़ का कोई महत्व नहीं और एक आराम से लेट लेट के जा रहा है लेकिन बिहारी जी की तरफ जा रहा है पूरा ऐसे पहुंच जाएगा हर कदम उसका लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा है और हर कदम उसका बड़ी तीव्रता से बढ़ रहा है।

फिर लक्ष्य के विरुद्ध चल रहा है। आंतरिक लक्ष्य बिना सत्संग के दृढ़ नहीं होता। कल की चर्चा में था जैसे महान जलाशय के प्राप्त होने के बाद फिर छोटे-छोटे गढों का महत्व नहीं रह जाता। ऐसे ही महान भगवत आश्रय परमात्मा आश्रय होने पर फिर अन्य आश्रय सब छूट जाता है। नाना प्रकार के पुण्युष्ठान कर्मुष्ठान ये सब इनका आश्रय छूट जाता है और जीवन में यह सब होता रहता है। लेकिन आश्रय केवल प्रभु का रहता है। मनुष्य पुरुषार्थ के लिए मिला। केवल पुरुषार्थ के लिए चार पुरुषार्थ रखे गए हैं।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। अगर धर्म से आप अर्थ कमाएंगे तो तुम्हारे अंदर पवित्र कामनाएं होंगी। पवित्र कामनाओं की पूर्ति होगी तो मोक्ष की तरफ चल पड़ोगे। और धर्म हटा दिया। केवल अर्थ आज सामने रखा जाता है। पहले क्या है? धर्म फिर है अर्थ। धर्म की सीमा के अंतर्गत अर्थ को प्राप्त करो। अब क्या है? धर्म को एकदम हटा दिया। अब रह गया अर्थ। तो अर्थ जो कामनाएं पैदा करता है वो आसुरी भाव की करता है। तो इधर धर्म हटा इधर मोक्ष हटा। अब दो बातें रह गई। पुरुषार्थ तो कर ही रहे हैं लेकिन पुरुषार्थ के प्रथम सीढ़ी और अंतिम बात दो को हटा दिया गया है।

केवल अर्थ और कामनाओं की पूर्ति रह गई। देख लीजिए आप हृदय में विचार करके। खूब अर्थ कमाए और मनमानी कामनाओं की पूर्ति करें। उनको भोगे तो पहला धर्म चला गया और पीछे जो परिणाम आना चाहिए मोक्ष हट गया। अब बार-बार जन्म बार-बार मरण वही दुर्गति पुरुषार्थ के लिए मानव देह मिला है। नए कर्म करने के लिए मनुष्य शरीर स्वतंत्र है। इसमें प्रारब्ध कुछ नहीं कर सकता। आप अपने कर्तव्य को इसमें ये नहीं कि जो होना होगा सो हो जाएगा। प्रारब्ध में ये पशुता की बुद्धि है। यह पशुओं में लागू होता है।

मनुष्य में नहीं। एक असफलता हमको निराश कर दे। नहीं हजार असफलताएं हमको निराश नहीं करेंग। हम अविनाशी के बच्चा हैं। एक बार हम कमर कस लें। असफलता हर असफलता हमको सावधानी देती है। कहां चूक हो गई? कहां चूक हो गई? और हम उस चूक को सुधार कर हम आखिरी मंजिल तक पहुंचेंगे। नहीं पहुंच पाए तो मंजिल हमारे सामने आ जाएगी। इस शब्द पर ध्यान दीजिए। हम प्रभु की तरफ चले हैं तो उनके वचन याद कीजिए ना भक्त प्रणसति हम नहीं पहुंच पाए तो वह आ जाएंगे हमारे पास और आना उन्हीं को पड़ेगा हमारी इतनी चाल जोर की नहीं है उनको आना पड़ेगा और वो आते हैं वो आते हैं आप पुकारते रहिए चिंता मत कीजिए अब वो अंतिम विषय ऐसा तो नहीं है कि सर्टिफिकेट बन गई हो दिखा दिया जाए नहीं वो जाने मोरी छाती वो हृदय जानता है।

आपका हृदय गवाही होगा पर बता नहीं पाओगे। विश्वास कीजिए जब वास्तविक बात आएगी तो बता नहीं पाओगे। उसको प्रमाण नहीं दे सकते। यह कोई डिग्री नहीं है। हे ये डिग्री नहीं। हां बाहरी क्रियाओं को आप डिग्री बना सकते हैं। इतने दिन से भोजन नहीं पाया। इतने दिन से ये नहीं किया। ये नहीं किया। ये नहीं किया। यह सब बाहरी प्रकृति जन्य शरीर प्राणों की बालता हो रही है। आध्यात्मिक की नहीं आध्यात्म इनके छोड़ने की है। स्थूल सूक्ष्म कारण और यहां सारी चर्चा स्थूल की क्रियाओं की वो चाहे जिस रूप में हम प्रकाशित करें वो प्रकृति जन्य ही है।

परमात्म जन्य आंतरिक इनको छोड़ के आगे बढ़ना। इनको छोड़ना ही अपने में स्थित हो जाना है। बड़ा सूक्ष्म अध्यात्म मार्ग पिछले कर्मों का फल दुख सुख रूप में आएगा। तुम्हें बदलने में प्रयोग नहीं करना अपने भजन को। आदेश हो रहा है। तुम भगवत भजन इतना बढ़ा दो कि वह दुख तुम्हें परास्त ना कर पावे और सुख तुम्हें अभिमान में ना लेने पावे। इतना हर्षित ना होने पाओ कि आप मर्यादा भूल जाओ। देखो किसी भी कार्य में जब चलो आप तो एक बिंदु रखो कि 99% तो हम विजय का प्रयास कर रहे हैं।

पर एक परसेंट अगर हम असफल हो गए तो तो उसी समय हृदय में जोश आना चाहिए। फिर अगली बार प्रयास करेंगे। तो एक पॉइंट में आपने अपने को मजबूत कर लिया। पर हम क्या करते हैं कि पूरा और जब असफलता आती है वो फिर निराश हो जाता है। अब क्या नहीं निराश होना ये क्या हमारा जीवन था सफलता नहीं जीवन की हमारी सफलता को कोई नहीं रोक सकता। हर हार हमको विजय की तरफ पहुंचाएगी। बस थोड़ा समझना अध्यात्म को है। हम अध्यात्म को तो समझते नहीं। सीधे केवल विषम संसार की प्रकृति परिस्थितियों में अब प्रतिकूलता आई तो हम बहुत निराश हो हताश ये निराशा खोखला कर देगी आपको ये निराशा आपको जीना मुश्किल कर देगी नहीं नहीं ये निराशा हमें धारण नहीं करनी भगवान वर्णन कर रहे हैं अनुकूल प्रतिकूल दो ही परिस्थितियां पैदा करेंगे तुम्हारे पूर्व के कर्म लेकिन तुम इनको बदल नहीं इनको सहना सीखो नहीं तो जो आगे भजन कर रहे हो इनके बदलने में लगाओगे तो तुम्हारे पास रह क्या जाएगा?

हमारी यात्रा के लिए पूंजी तैयार करनी है। इसीलिए जो बड़े-बड़े संत महा भागवत जन देखे गए कि बड़ा कष्ट पा रहे हैं और तो लगता है इनके भजन का इनको क्या प्रभाव मिला? तीन परिक्रमा गिरिराज जी की और 108 गोपाल शास्त्र नाम के पाठ रोज करते थे। एक संत भगवान। सोचो जरा क्या साधना। 108 गोपाल सहस्त्र नाम और परिक्रमा तीन गिरिराज जी की और उनको लकवा मार गया वो पैरालिस क्या कह हां ऐसे आधे शरीर में तो पूज्यपाद उड़िया बाबा हरी बाबा उस समय प्रगट रूप से विराजमान थे जब सुना तो गए दोनों महापुरुष और जाकर के बैठे और कहा बाबा मुझे पता है आप संकल्प कर लो तो विश्व का पैरालिस ठीक हो जाए पूरे विश्व का आप इतने परम धनी हैं और आप ऐसे कष्ट को तो बोले विनोद कर रहे हो ना क्योंकि दोनों महापुरुष थे विनोद कर रहे हो ना अरे बाबा मच्छर मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग नहीं होता ये तो शरीर में है भोग लेते हैं इसके लिए भजन का प्रयोग नहीं ये चतुर सुजान राम भजे चतुर ये नाशवान है आज नहीं तो कल छूटेगा इसके लिए हमें भजन नहीं हमें हमें भजन प्रभु की प्राप्ति के लिए करना है तो कर्म फल दुख और सुख देकर नष्ट हो जाएगा।

अपने आप नष्ट हो जाएगा। तुम्हें अनुकूल प्रतिकूल या दुख सुख परिस्थिति में डूबना नहीं है। हम लोगों को यही कला नहीं आती। सुख आया तो फूले घूम रहे हैं। दुख आया तो इतने इतने निराश कि कैसे समझावे हमको? इतने निराश नहीं निराशा हमें खोखला कर देगी। हमें मतलब जीते जी एकदम एकदम असमर्थ कर देगी। ये निराशा को छूने मत दो। सत्य वस्तु की आशा विजय की आशा इतनी प्रबल करो कि तुम इतने अभ्यासी बन जाओ कि ये हार तुम हम हार गए। ठीक है। हम आगे अभ्यास करेंगे। ऐसे दृढ़ बनेंगे। नहीं ये हार विजय में बदलेगी।

और अगर सत्य मार्ग में आप चल रहे हो तो विजय अंतिम हमारी ही है। हरा दिया युधिष्ठिर जी को। बड़े फूले हैं दुर्योधन आदि 12 वर्ष का वनवास एक वर्ष का अज्ञातवास महान कष्ट पाया। पर उनका क्या हुआ? पूरे वंश का नाश हुआ। और विजय श्री युधिष्ठिर को मिले। निराश नहीं हताश नहीं। हमको अपने मार्ग को समझना है। हम भारतवासी अध्यात्म को जानने वाले अध्यात्म में स्थित होने वाले ये परम धर्ममय देश है। जय और पराजय ये पहलू है। दिन और रात जैसे है। ठीक है। हो गई। हमें फिर मजबूत बनना है।

हमें निराशा नहीं और एक दूसरे को उत्साहवर्धन करना चाहिए। यह नहीं कि पढ़ाई में कोई फेल हो गया तो घर वाले उसको इतना भार दे दे कि वो अपनी हार को पूरी हार मान जाए। किसी भी विषय में चाहे वो किसानी हो, व्यापार हो, नौकरी हो, क्रीड़ा हो, पढ़ाई हो, अध्यात्म हो फिसल सकते हैं अध्यात्म में। अरे तुम्हारी माया बाजी पसारी विचित्र सुरमुनि मोहे काकी कोड बड़ी विचित्र माया देवी हसा गुणमई मम माया दरत्या अध्यात्म में भी फिसल सकता है तो फिसल गए तो इसका मतलब हार गए हम गिर गए हम बेकार हो गए नहीं नहीं हम उस जगह को देखेंगे कि हारे तो कैसे हारे हमारी फिसलन चूक क्या हुई क्या हमारे अभ्यास में कमी हुई हमारी सावधानी में कमी हुई हम उसको सुधारे आगे बढ़े ये मानव देख केवल दुख दुख सुख भोगने के लिए नहीं है।

विश्वास कीजिए आप इतने महान है कि दुख सुख आपको छू ही नहीं सकता। आपने दुख सुख को पकड़ रखा है। पूरे उद्धार की सामग्री भगवान ने आपके अंदर रख दी है। एक दिन बताया था कि तिजोरी अंदर है। चाबी भी अंदर है। जो आनंद की खोज कर रहे वो अंदर है। लेकिन हम बाहर ढूंढ रहे हैं। पूरे जन्म के जन्म व्यतीत होते जाते हैं। बाहर ढूंढ रहे हैं। नहीं मिलने वाला। सर्वात्म विजित बहिर इंद्रियाण आओ अंदर आओ। आओ समाधि भीतर चित ना डुलाई तू स्वामी जी अंदर तो आप माल भरा हुआ है आनंद सिंधु मध्य तो वासा तू आनंद के कण खोज रहा है आनंद समुद्र तेरे अंदर विराजमान है हम लोग बहुत जल्दी निराश हो जाते हैं बहुत जल्दी बहुत जल्दी फूल जाते हैं ऐसा नहीं होना चाहिए धैर्यवान बनना चाहिए ये दोनों चीजें बड़े-बड़े महापुरुषों के जीवन में देखी गई स्वयं भगवान भगवान अवतार लेकर के लीला दिखाते हैं।

महान अयोध्या सजी हुई है। उत्सव बधावे की धूम मच रही। क्यों? कल प्रातः कालीन चक्रवर्ती सम्राट पद पर भगवान श्री राम जी का अभिषेक होगा। भगवान ने भी सुना। तैयारियां हो रही है। सब सामग्री तैयार कर ली गई है। बड़े-बड़े विप्र ब्राह्मण वेदज्ञ सब उपस्थित होकर के विधान बना रहे हैं। इधर बदला पहलू महाराज दशरथ जी के भाग्य का पहलू बदला। कितना फूले हुए हैं दशरथ जी। बहुत प्यार सबसे ज्यादा कैकई जी को करते हैं। इसलिए सबसे पहले कैकई जी के महल में जा रहे हैं। अब यहां बदल रहा है।

प्रारब्ध बदल रहा है। बड़ा विचित्र कर्म का फल होता है। प्रारब्ध बदल रहा है महाराज का। बड़े आनंद में उमगते हुए जा रहे। जे ही कैकई के भवन में तो वहां का वातावरण देखा कि हमारे प्राण प्रिय रघुनाथ के तिलक की बात सुनकर के यहां उत्सव नहीं है। यहां सब निराश दास दास यहां महारानी कहां है? कोप भवन कोप भवन सुनते ही जैसे धरती खिसक गए हो पैरों को क्योंकि अतिशय प्यार करते थे कोप भवन जाने का क्या मतलब हो सकता है नजदीक गए देखा मलिन वस्त्र धारण किए मानो रूस गए हो ऐसे प्रिय इस समय तुम्हें रूसने का अवसर अरे तुम्हारा तुम्हारे को राम जी तो प्राणों से भी अधिक प्रिय है।

हमने देखा है कई बार कि तुम राम चर्चा करते हुए अशुभ प्रवाह करने लगती हो और उनहीं मेरे और तुम्हारे प्राण प्रिय राम का प्रातः कालीन राज्या अभिषेक है और तुम ऐसे मलिन वस्त्र धारण करके कोप कर रहे हो। कारण क्या हो सकता है? कारण आप हैं। आपने कहा था वरदान ओ मेरा भूलने का स्वभाव है। एक वरदान, दो वरदान, चार वरदान जो तू मांगे अगर कह दे तो मैं बलपूक किसी देवता का भी वध कर सकता हूं। क्योंकि इनको आमंत्रित किया जाता था। देवता अपने पक्ष में लेकर असुरों से युद्ध करते थे।

महाबली थे दशरथ जी महाराज। तुम कहो किसको जीवन दान दे दे तुम जो कहो कर दे लेकिन इस समय उदास होने की जरूरत नहीं हां तू सुनू मैं दो वरदान मांग श्री राम को 14 वर्ष का वनवास और भरत को इस राजगद्दी पर अभिषेक महाराज तुम मूर्छित होकर मेरे प्राण प्रिय राम को 14 वर्ष का वनवास उस दशा में वो कह मैं तेरे चरण स्पर्श कर रहा हूं। हाथ जोड़ रहा हूं। मेरे प्राण निकल जाएंगे। तुम एक बात जो कही सुबह होते ही भरत को बुला के राजतिलक कर मेरे राम को वनवास आप देखो परिस्थिति कैसे बदली हम तुम तो क्या है सोचो भगवान के पिता का सौभाग्य और स्वयं भगवान राज तिलक होना है सब जे सूचना पहुंचती है कि पिता श्री ने याद किया तो वहां गए वहां दृश्य जी बताया कि यह तो बताएंगे नहीं ये तो ऐसे ही मूर्छित पड़े हैं आपके उसमें लेकिन इन्होंने मुझे वचन दिया है आपको 14 वर्ष का वनवास तपस्वी वेश में किसी ग्राम नगर में नहीं जाना 14 वर्ष विशेष उदासी उदासी भाव से बहुत प्रसन्न हुए भगवान मानो राजतिलक में उतने प्रसन्न नहीं हुई थी।

उस समय संकोच में हो गए थे कि हम चारों भाई एक साथ प्रकट हुए हैं। फिर मेरा ही राज तिलक क्यों? सब भाइयों का राज तिलक हो खुना चाहिए। भगवान का स्वभाव। लेकिन जे भी सुना भरत को राजतिलक मेरा लेकिन हुआ क्या? पूरी अयोध्या और महाराज के प्राण विसर्जित हो गए। राम राम राम कह के हम उसी मृत्यु लोक में जन्मे हैं। हमें मानव देह मिली है। ये दुख सुख आएगा। आप इसके प्रति सावधान पहले से रहे। सुख में इतने ना भूल जाए कि आगे दुख आने वाला है। दुख में इतने ना डूब जाए चिंता मत करो आगे सुख आने वाला है।

और हमें तो लगता है कि ऐसे बलवान बनो कि ये सुखदख का सदुपयोग कर लो। दुख आया है। भगवान ने कृपा की मेरे किसी पाप का मोचन हो रहा है और हम नाम जप करके उसे सह लेते हैं। सुख आया है। उसे चार लोगों की सेवा में बांट देते हैं। भगवान ने मुझे सौभाग्य दिया है तो चार मिलकर के उस सुख का उपभोग अगर हम उसके भोगता बनेंगे तो दुख का भोग हमें करना ही पड़ेगा। एक विशेष बात समझने की है कि मनुष्य जीवन में प्रारब्ध के अनुसार जो शुभ या अशुभ परिस्थिति आती है जो सुख और दुख प्रदान करती है वास्तव में देखा जाए अगर आप उसका भोग ना करें तो यह सुख और दुख आपको व्यापेंगे ही नहीं।

अरे जब किसी अग्नेस्त्र, वरुणास्त्र, वायोस्त्र, दिव्यास्त्र की पहुंच नहीं है आप तक तो सुखदख कैसे पहुंच जाएंगे? हम लोग उसके इतने भोक्ता बन चुके हैं कि यही हमारा जीवन हो गया है। थोड़ी सी व्यापार में हानि हम अपने प्राणों को त्याग देते हैं। एक फसल नष्ट हो गई तो हम अपने को एकदम जीवन व्यर्थ समझ लेते हैं। एक क्लास में हम फेल हो गए तो नहीं भाई नहीं। यह जीवन अमोग पदवी प्राप्त कराने के लिए तुम कहां छोटे छोटे विषयों में फसकर आप इतने निराश हो गए हर विजय प्राप्त होगी आप विश्वास करो केवल आप थोड़ा अध्यात्म को समझे थोड़ा धैर्यवान बने दुख की बात कहो तो देखो देवकी वसुदेव जी भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त किए सर्वलोक महेश्वर पधार रहे हैं लेकिन कहां कड़े शासन में राक्षसी प्रवृत्ति के पहरेदार कंस के हथकड़ी बीड़ी जकड़ी हुई आ कौन रहे समस्त भव बंधन से मुक्त करने वाले प्रभु ऐसा तो किसी का जन्म नहीं होता होगा विचार करके देखो भगवान स्वयं जब अवतरित हुए हैं तो लीला करके दिखाया है यहां दो पहलू है दुख और सुख दोनों देखने को मिले भगवान स्वयं विजय श्री है लेकिन रणछोड़ भी नाम पड़ा लीला करके दिखाया है।

वो कई बार आक्रमण कर चुका था जरासंध और इतने में ही देवर्षि नारद जी से पता पूछ के कि कोई मेरे समान योद्धा है उस कालयवन उसने बहुत से करोड़ों मक्षों को लेकर चढ़ाई कर दी द्वारिका में। अब श्री भगवान तो सर्व समर्थ है ना लेकिन एक नाम रखवाने के लिए भाग पड़े। रण शोर भगवान की जय बोला जाता है हां काहे के लिए बड़ा रहस्य होता है भगवान की लीला में मुचकुंद जी को अपना साक्षात्कार करवाना है और मुचकुंद की दृष्टि से उसको भस्म करवाना है भाग पड़े भगवान वो कह रहा अरे रुको रुको वासुदेव तुम्हारा बड़ा यश है जरा हमसे लड़ के तुम भाग क्यों रहे हो और पीतांबर फहराते हुए ठाकुर जी भाग रहे और वो पीछे ललकार रहा है भागते हुए उसी गुफा में गए जहां मुकुंद महाराज देवताओं के साथ युद्ध सहयोग करके युद्ध में असुरों पर विजय प्राप्त कराई थी।

तो देवताओं ने कहा आप जो वरदान मांगे बोले मुझे आपसे कुछ और नहीं चाहिए। मुझे नींद लग रही मैं बहुत थका हूं। मैं सो जाऊं और मुझे कोई विक्षेप ना पहुंचाए। उन्होंने कहा जो तुम्हें विक्षेप पहुंचाएगा दृष्टि खुलते ही भस्म हो जाएगा। आराम से गुफा में सो रहे थे। भगवान गए अपना पीतांबर उड़ा दिए। अब वो आया और देखा कि देखो मुझे तो दौड़ा दौड़ा कर थका दिया और लड़ा है नहीं अपना आके यहां सो रहा है। एक लात मारी जे ही लात मारी तो आंख खोल के देखो भस्म हो गया। अब जब भस्म हो गया तो आप प्रकट निहाल कर दिया मुस्कुंद जी को विस्तवन किया।

परिचय भगवान ने अपना दिया। फिर भगवान ने कहा कि तुम जिस इस रस को प्राप्त किए हो यही जगत में अन्य जीवों को भी प्रदान करो। इसलिए तुम्हारे एक जन्म और लेना पड़ेगा। तो नरसी मेहता जी के रूप में वही मुकुंद जी प्रकट हुए। भगवान का नाम रण छोड़ पड़ा। देखो यह मृत्यु लोक की लीला है। जब आप पर्दे पर कोई सीन देखते हैं तो उसमें सुखदख का अनुभव नहीं करते हैं। आपको पता है ये झूठा है। ए ये झूठा खेल चल रहा है। तुम सच्चिदानंद प्रभु के सच्चिदानंद अंश हो। तुम इस झूठे खेल को इतना सत्य मान लेते हो कि आप इतना दुखी हो जाते हो, इतना निराश हो जाते हो।

नहीं। इसीलिए अध्यात्म की जरूरत है। हर बुद्धि में अध्यात्म योग होना आवश्यक है। अगर बुद्धि में अध्यात्म योग नहीं है तो यह बहुत दुखी करता है संसार। ये विषम है। ये कभी एक रस रह ही नहीं सकता। नहीं रे सब दिन होत ना एक समान। किसी के नहीं हुए। किसी के नहीं हुए। सदैव विजय किसी का वर्णन नहीं करती। सदैव हार में कोई नहीं बना रहता। यह चलता रहता है। इस पर थोड़ा दृष्टि डाली जाए। हम थोड़े-थोड़े हार पर थोड़े-थोड़े विजय पर इतना निराश, इतना उदास, इतना हर्षित, इतना अभिमान नहीं थोड़ा अध्यात्म को समझने की कोशिश करो।

श्री भगवान कह रहे हैं दुखी सुखी होना यह कर्म का फल नहीं अज्ञान का फल है। भगवान कह ये दुखी सुखी जैसे अब दुख आ गया है। अब राधा राधा राधा राधा क्यों आया है? कैसे जाएगा? हमको इस झंझट में नहीं फंसना। जैसी परिस्थिति दी उसमें हमें कैसे भजन करना है? कैसे अपने कर्तव्य कर्म को करना है? पक्का समझ लीजिए आप। आप यदि अपने सत्य मार्ग पर स्थित हैं तो कोई आपको दुखी नहीं कर सकता। अगर यह दुखी कर दे तो यह सब बंद हो जाए। आप ध्यान देना। ये अगर दुखी कर दे तो यह नहीं हो सकता भाई।

कर्तव्य कर्म का पालन दुखी भाव से नहीं हो सकता और ना अभिमान भाव से हो सकता है। हर्ष शोक से कर्तव्य का पालन नहीं होता। कर्तव्य का पालन हर्ष और शोक दोनों को त्याग करके होता है। परिणाम क्या होगा हरि जाने मेरे को कर्तव्य मिला केवल कर्तव्य। कर्तव्य से चूक नहीं होने देंगे और परिणाम जो आएगा वो हरि की तरफ से आएगा और उसका हम स्वागत करते हैं जोई जोई प्यारो करे सोई मोह भावे हमारे कर्तव्य की चूक ये हमें बर्दाश्त नहीं होगी कर्तव्य पर कर्मने वास्ते मा फले कदाच क्यों कह रहे हैं तुम्हें दुख से बचाने के लिए कह रहे हैं कोई भी कर्म बिना फल दिए नहीं जाएगा तुम चिंता क्यों करते हो केवल अपने कर्तव्य पर अगर हम कहीं अपने कर्तव्य में अभ्यास में चूक करेंगे तो हमें फिर हार का मुख देखना पड़ेगा।

करता हम बड़े प्रयासरत है। हमारा प्रयास ठीक है तो हमें निराश नहीं होना है। हमारी चूक हो गई तो हमें निराश होना है। हमारे कर्तव्य में चूक नहीं तो हमें निराश नहीं होना है। और कर्तव्य का पालन करने वाले के अंदर भगवान ऐसी सामर्थ्य देते हैं कि वो हार में भी निराश नहीं होगा। भगवान यही युक्ति सिखा रहे हैं। गीता जी हमें परम सुख प्रदान करने के लिए भगवान ने गाई है। यह सुखी और दुखी हो जाना अज्ञान का फल है। कारण परिस्थिति तो बाहर से आई और सुखी दुखी तुम भीतर से हो रहे हो।

परिस्थिति को तुमने अपना इतना गाढ़ भाव से तन्मयता से स्वीकार कर लिया। परिस्थिति के अनुसार तुम दुखी सुखी हो रहे हो। बहुत सुंदर बात है। आप अपने स्वरूप को नहीं जानते। इसीलिए है अपने लोग अपने स्वरूप को भूल गए। अपने प्रभु को भूल गए हैं। ये कोई विजय विजय नहीं। ये कोई हार हार नहीं है। ये हार और जय हमें स्पर्श नहीं कर सकती। हम केवल बाहरी ही विचरण में इतने निराश इतने हर्षित नहीं होना चाहिए। नहीं होना चाहिए। देखो मानव देह केवल इतने के लिए नहीं मिली। अगर आप इस बात को नहीं समझेंगे तो आपकी बुद्धि आपका मन आपको गलत सलाह देने लगेगा।

इसी में भगवान कहते हैं कि तुम यह भी मत सोचो कि मैं आज से कर्म नहीं करूंगा। विजय नहीं मिली तुम्हें कर नहीं तू ना करने में भी ये तो नहीं बनेगा। कर्म करना ही है। बहुत बहुत भगवान बोल रहे हैं। बिल्कुल आनंदमय जीवन हो जाएगा। हम दुख सुख के साथ अपना तदात्म भाव कर लेते हैं। इसीलिए परिस्थिति हमको परास्त कर देती है। अगर दुखदाई परिस्थिति आई है तो घबराने की जरूरत नहीं सावधान होने की जरूरत है। हमसे क्या चूक हुई है? कोई पूछे अब जैसे तो हमसे कोई पाप हुआ। हमसे कोई चूक हुई।

उसका परिणाम है। भीष्म जी बाणों पर हैं। हां कोई चूक हुई पर हमें नहीं दिखाई दे रही। तो भगवान उनको दिखा रहे देखो यह चूक हुई है। हमसे चूक हुई है। चूक होना भी स्वाभाविक है। अरे मनुष्य शरीर मिला है। हो सकता है। कोई भी चूक हो सकती है। जब हम उस चूक को अपने सुधारने की वृत्ति ना लाके उस पर डूब जाते हैं कि अब क्या होगा? अब तो चूक हो गई। अब तो हार गए। तब हम दुख का भोग करने लगे। नहीं नहीं तुम्हें दुख का भोग नहीं करना। ये आया गया। जैसे कोई भी दुख आता है आप देखो धीरे-धीरे क्षीण हो रहा है।

धीरे-धीरे वृत्त उससे उभर रही है। और अगर कहीं आप भगवान का आश्रय लिए हैं, अध्यात्म का आश्रय लिए तो सेकंड में निकल सकते हैं। मिनट में निकल सकते हैं। घंटे में निकल सकते हैं। और कोई कोई जीवन भर नहीं निकल पाता। निकल ही नहीं पाता। अध्यात्म की युक्ति के द्वारा बड़े से बड़े शोक से ऊपर निकला जा सकता है क्योंकि वह शोक आपको डुबो ही नहीं सकता। आपको छू ही नहीं सकता। आप शोक को पकड़ लिए हैं इसलिए आप दुखी हो रहे हैं। हमारे को मा फलेशु कदाचन किंचिन मात्र भी फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।

और हम सब फल की ही चिंता में रहते हैं। हम यहां जा रहे हैं तो हमको क्या फल मिलेगा? हम यहां जाए। अगर वह काम नहीं बना तो मुझे फल नहीं मिला। हम यह पुण्य करें या यह कर्म करें। यह फल की आकांक्षा ही हमें दुखी सुखी कर रही है। अब कैसे समझाएं? बिना फल के कुछ सोच ही नहीं है। अगर हमारी कोई सोच भी बनती है तो उसका फल क्या होगा? चलो अच्छा फल के ही देखने वाले हो तो फिर अधर्म आचरण में क्यों नहीं देखा? कि ये जो मैं करने जा रहा हूं इसका उधर नहीं देखेंगे। फल में उधर फल में नहीं देखेंगे।

व्यभचार में मदिरापान में मांस भक्षण में हिंसा में दत कीड़ा में फल पे दृष्टि नहीं डाली लेकिन थोड़ा भी अगर दान पुण्य सत्कर्म उस पर फल पे हमने हवन किया हम विजय क्यों नहीं प्राप्त किए हमने दान किया हम कोई लाभ क्यों नहीं और उधर अब वो उधर जो किया है जिसके फल का तुमने चिंतन नहीं किया वो फल आकर के तुम्हें ऐसी परिस्थिति में फंसाएगा तुम्हें दुख देगा यह सिद्धांत है सिद्धांत है सिद्धांत को इसमें तुम्हारा तर्क काम नहीं करेगा। फल को भगवान के ऊपर छोड़ के अपने अभ्यास और अपने कर्तव्य को इतना दृढ़ कर दो और ऐसी सम स्थिति में रहो।

सुख दुख समय कृत्वा लाभा लाभ जया जय लाभ हानि में जय पराजय में सुखदख में थोड़ा सम होना सीखो। मनुष्य शरीर में टूटने के लिए नहीं मिला। फल की इच्छा ना रखकर के जो कर्तव्य कर्म करता है कर्म उसको बांध नहीं पाता। कर्म बंधन से मुक्त हो जाता है। प्राय हम फल की इच्छा में ही बंधकर करते हैं। फल की इच्छा का त्याग ही नहीं कर। कोई विशेष परमार्थी ऐसा जो कर्तव्य कर्म का ध्यान रखते हुए फल की इच्छा नहीं रखता। फल इच्छा भोक्तत्व भाव पैदा कर देगी और दुख सुख भोगना पड़ेगा।

भोक्तत्व भाव में ही कर्तत्व भाव टिका हुआ। जन्म मरण निश्चित हो गया। यह भगवान कानून वर्णन कर रहे हैं। सिद्धांत वर्णन कर रहे हैं। फलेक्षा का त्याग भोक्तत्व भाव त्याग तो कर्ता भाव मिट गया। जीवन मुक्त हो गए। कर्म बंधन बांध ही नहीं पाया। फलेक्षा सर्वथा मिटने से कर्तत्व भाव मिटा। कर्तत्व भाव मिटा। जीवन मुक्त हुआ। जीवन मुक्त हर समय परमानंद में निबंध। बड़ा गढ़ विषय है। पर हम क्या करते हैं कि फलेक्षा का त्याग नहीं कर पाते तो भोग तत्व अपने आप बन जाता है। भोगना पड़ेगा।

नहीं आए तो निराश हो गए। अश्रद्धा हो गई। हम कई बार प्रार्थना करते हैं कि कर्म करके फल को भगवान के ऊपर छोड़ दो। ठीक समझो जो निर्णय होता है वह हमारे ही अभ्यास और कर्म का होता है। पक्का समझिए कहीं भी कोई विजय प्राप्त करता है उसका अभ्यास बहुत दृढ़ हो गया है। वह अभ्यास से आगे निकल रहा है। अभ्यास उसमें आप ऐसी भावना ना सोचे कि हम कोई ऐसा दान पुण्य की वो वो एक अलग कर्म बन गया। वो आपका एक अलग कर्म बन गया। नहीं आपकी अश्रद्धा हो जाएगी प्रभु में। हम अभ्यास से जो हमें जीतना है उसको हम सोचे कि यहां दान कर देते हैं और वहां हम विजय प्राप्त कर लेंगे तो एक नया कर्म शुभ कर्म आपका फलीभूत होगा आगे लेकिन वर्तमान में वहां अभ्यास काम करेगा आपको हम कभी गोली नहीं चलाई जानते ही नहीं अब हम मनाए कि प्रभु यह निशाना हमारा जो है ठीक लक्ष्य पे लग जाए अभ्यास करो और निशाना नहीं लगा तो हमें अश्रद्धा हो भगवान हमने कहा था तुमसे कि निशाना सही लग जाए ऐसी मूर्खता ऐसी अज्ञानता नहीं करनी है जो अभ्यास अर्जुन को क्या

बोल रहे हैं भगवान अभ्यास योग युक्त सामने खड़े हैं सरकार अभ्यास योग युक्त है ना चेतसा गामिना लक्ष्य पर आपकी दृष्टि रहे दृढ़ अभ्यास रहे बस यही बात समझनी है चाहे परमार्थ हो चाहे पढ़ाई हो चाहे व्यापार हो चाहे नौकरी हो चाहे कोई क्रीड़ा हो अभ्यास प्रमाद स्थिति नहीं भोगों में मनोरंजन नहीं अभ्यास अभ्यास विजय दिलाएगा यही अभ्यास भगवत स्वरूप है भगवान की प्राप्ति के लिए भी कहा है कि मन को यदि मेरे में लगाना है तो दो उपाय है वैराग्य और अभ्यास अभ्यास में बाधा देने वाले से राग रहित हो और अभ्यास में दृढ़ हो जाओ क्या नहीं प्राप्त हो सकता क्या नहीं हो सकता हमारी अभ्यास की इतनी प्रवीणता बन जाए कि जिस लक्ष्य पर हम लगे उसको हम पार करें।

उस पर हम पहुंचे निराश होने की जरूरत नहीं। श्री भगवान कह रहे हैं कर्मों में निष्कामता सिद्धि है पर बहुत कठिन है। हम कोई भी कर्म बिना कामना के करते ही नहीं है। इसलिए बंधते चले जाते हैं। अभी अध्यात्म है। समझ बिना फल दिए जाएगा ही नहीं। तुम्हें कामना करने की जरूरत ही नहीं है। पर कभी-कभी ऐसा होता है कि ऐसे विशिष्ट अपराध होते हैं, बड़े अपराध होते हैं जो हमारे बहुत साधन करने पर भी नष्ट नहीं होते। वो हमारे ऊपर हावी हो जाते हैं। फिर हमको लगता है कि हमारी साधना, हमारा भजन, हमारा साधन अगर हम बाह्य सुख की आकांक्षा करते तो अश्रद्धा होने लगती है।

हम आपसे प्रार्थना करते हैं। आप कभी अश्रद्धा मत करना। अपनी आस्तिकता की नीव को मत हिलने देना। यह आया हुआ प्रारब्ध नष्ट हो जाएगा और आप जो कर रहे हैं, इसका महान फल मिलने वाला है। यह तत्कालिक क्रिया का फल नहीं मिलता है। तत्काल अभी कोई हमारा कानून विरुद्ध आचरण बन जाए तो तुरंत थोड़ी फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा। उसके लिए बहुत कारवाईया होती है। बहुत निर्णय होता है। वो कई कई वर्ष व्यतीत हो जाते हैं। फिर जाकर निर्णय मिलता है। आप यही देख लो ना। अगर सबके सामने तुरंत दंड मिले तो बहुत सुधार हो जाए।

नहीं हो जाए कि इसने यह किया देखो ऐसे ऐसे किया गया तुरंत नहीं होता। ऐसे ही हमसे यदि पापाचरण हो रहे थे तुरंत उनका फल नहीं मिल रहा। हमसे ऐसे सत्कर्म हो रहे तो उनका तुरंत नहीं फसल भी तुरंत नहीं तैयार हो जाती। अरे तुरंत के लिए आपकी चित्तवृत्ति जिस सतार्ग में लगी है। आप थोड़ा धैर्य धारण करो। थोड़ा विश्वास करो। फल दिए बिना जाएगा ही नहीं। चाहे असत कर्म हो चाहे सतकर्म हो। पर अगर तुम फल के हेतु बन जाओगे तो बहुत निराश हो जाओगे, उदास हो जाओगे, हताश हो जाओगे।

क्योंकि एक रस संसार नहीं है। कभी सुख, कभी दुख, कभी लाभ, कभी हानि, कभी जय, कभी पराजय। इनहीं द्वंद से जीतने के लिए अध्यात्म मार्ग है। शुभ क्रिया में फल की इच्छा यदि ना हो तो हर शुभ क्रिया भगवान की प्राप्ति कराने में समर्थ हो जाए। फल की इच्छा करते हैं तो उसका कुछ फल मिलकर के नष्ट हो जाता है। बहुत बड़ा लाभ ले लो। पत्रम पुष्पम फलम तोयं छोटी सी छोटी वस्तु भगवत प्राप्ति करा सकती है। पर हम लोग इतने सकामी हैं। इतने कामना में रत हैं कि हमको यह पता नहीं कि निष्काम का कितना महान फल मिलता है।

इसीलिए प्रया जब कोई प्रश्न करता है। बड़ा दुखी होकर प्रश्न मैं उनका हित करता हूं। वो हमारे साथ ऐसा बर्ताव करते हैं। वह इतने कमजोर हृदय हमारे हो गए हैं। अध्यात्म विद्या के बिना अध्यात्म ज्ञान के बिना बहुत कमजोर हो गए हैं। श्री भगवान उसी शक्ति को जागृत करें जो आपके अंदर है। निष्काम में इतनी सामर्थ्य है कि आपको कोई दुखी कर ही नहीं सकता। हमारी कामना ही हमको दुखी करती है। सच्ची बात है। हमारी इच्छा नहीं है आपसे प्रशंसा सुनने की। तो आप निंदा करो। हमें दुख पहुंचेगा नहीं।

हमारी इच्छा नहीं कि आप हमारा मान करें तो आप अपमान करो हमें दुख पहुंचेगा ही नहीं और जब अगर कहीं भास भी हुआ अंदर दुख का तो तुरंत विवेक जागृत हो जाएगा। मेरे किसी अपराध का मार्जन करने के लिए यह भगवान लीला कर रहे हैं। श्री भगवान कह रहे हैं योगस्था कुरकर्माण संगम तक्त्वा धनंजय सिद्ध असिद्धयो समो भूत्वा समत्वम योग उच्चते अब कैसे समझ में आएगी सरकार कह रहे हैं कि हे धनंजय तू आसक्ति का त्याग करके सिद्धि असिद्धि में सम बहुत अभी प्रसन्न हो जाओगे अखंड प्रसन्नता जागृत तभी होती है इतने दिन हो गए भजन करते अभी तो काम नहीं मिटा अभी तो क्रोध नहीं मिटा अभी तो ये नहीं मिटा उधर देख काहे को रहे हो उधर देखो प्रभु की तरफ जिधर लक्ष्य बनाया है राधा राधा राधा राधा हम सत्य पे चल रहे असत चेष्टा होने नहीं देंगे और ये जो मन में कूड़ा कर कर जागृत हो रहा है जागते रहो देखते अपने आप नष्ट हो जाएगा अपने आप समन हो जाएगा भगवान आदेश कर रहे हैं सिद्धि असिद्धि में सम संगम तक्त्वा किसी भी कर्म को हम एकदम तदात्म भाव से करते हैं अब तो ये मिलेगा ही नहीं मिला फिर हालत क्या हो जाती है भगवान युक्ति दे रहे हैं बचने के लिए कर्म तो करना ही पड़ेगा रहेगा।

बिना कर्म किए कोई एक क्षण भी नहीं रह सकता। और वह कर्म हमें बांधता है। किससे? आसक्ति से। फल इच्छा से। तुम परमानंद स्वरूप हो। अगर कर्म बंधनों से मुक्त हो जाओ तो अभी निहाल हो जाओगे। कोई बाहरी सुख की जरूरत नहीं। अपने अंदर इतना सुख भरा हुआ है। भगवान कह रहे संगम तत्वा। किसी भी कर्म में, किसी भी कर्म के फल में, किसी भी देश, घटना, परिस्थिति, व्यक्ति, अंतःकरण, बहीकरण में यदि आसक्ति ना हो तो अभी जीवन मुक्त हो जाओ। अब यही समेटना कठिन पड़ रहा है। हम लोग बिखर गए हैं।

बिखर गयो मन सिमटत नाही इंद्र लीनो जीत। अब अध्यात्म का पता नहीं इसलिए ये बातें समझ में नहीं आती। भगवान स्पष्ट कह रहे हैं कर्म करने में तेरा अधिकार है। फल में कभी तेरा अधिकार नहीं है। तू कर्म फल का हेतु मत बन और कर्म ना करने में भी तेरी आसक्ति ना हो तब तू संगम तक्त स्थिति को आ जाएगा। अगर कोई व्यक्ति मिलता है तो उसका प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है। कोई पदार्थ देखते हैं उसका प्रभाव पड़ता है। कोई घटना देखते हैं उसका प्रभाव पड़ता है। ये कैसा तुम्हारा हृदय हो गया?

हर संग का प्रभाव तो दुखी सुखी चिंतित क्लेशित जित संग दोष वास्तविक तेरी स्थिति है स्थिति है कोई भी तुम्हारे स्वरूप को स्पर्श नहीं कर सकता अब भूल के स्वरूप को देह में लगे हुए हैं हर वस्तु आसक्त कर रही हर कर्म आसक्त हर व्यक्ति आसक्त कर हर घटना आसक्त कर रही इस पर विचार जो पवित्र थोड़ा भजन हो रहा है बुद्धि पवित्र वही समझ सकते हैं यह अंतःकरण या बहिर यह तू नहीं है। तेरी आसक्ति हो गई। इसीलिए तू दुख सुख भोग रहा है। तो वास्तविक तू निर्लिप्त है। निर्लिप्त हो जा।

अंतःकरण धर्म में आसक्त शरीर में आसक्ति इसीलिए दुखी सुखी एक एक वृत्ति जलाती है। बहुत विचित्र खेल है। छोटी-छोटी बात छोटी-छोटा विषय एकदम चित्त में ऐसा छा जाता है। अब अब क्या? अब क्या बहुत कमजोर हो गए हम लोग अध्यात्म शक्ति विहीन हो गए बोली बड़ी दुर्दशा हृदय की हो रही है यह जो चिपकने का स्वभाव है मन का वस्तु व्यक्ति दृश्य स्थान इसी के सुधारने के लिए ये जन्म मिला है चिपकने का स्वभाव आसक्ति का स्वभाव किसी भी व्यक्ति वस्तु स्थान को देखो मन मन के चिपकने का मतलब उसमें दृश्य आ जाना उसका उसका प्रभाव आ जाना, उसका चिंतन होना, कोई हमें किस भाव से देख रहा है, कैसे क्रिया हो रही है, कैसी वस्तु है, कैसी उसका सबका प्रभाव पड़ रहा है।

असंग अभी जीवन मुक्त किसी का कोई प्रभाव मन पे नहीं। कब? जब मन में नाम चलेगा बुद्धि में विवेक जागृत होगा। नहीं पीस रहा है। संसार भैया सबको पीस रहा है। जल रहा है। हृदय। आनंद सिंधु होकर जल रहा है। सिद्ध सिद्ध समो भूत्वा साधक सावधान भगवान वर्णन कर रहे हैं। तुम्हें चिंता नहीं करनी कि सिद्ध हुए कि नहीं हुए हैं। हम ये जो कार्य कर रहे हैं भजन कर रहे हैं इसका लाभ मिल रहा है कि नहीं। तुम्हें इतना पता है सत्य है। बस तुम्हें इतना पता है गुरु का आदेश है। बस तुम्हें इतना पता है शास्त्र आज्ञा कर रहा है।

बस फल से तुम निश्चिंत हो जाओ। सिद्धि असिद्धि में सम हो जाओ। यही स्थिति है। यही सिद्धावस्था है। खास बात समझो। जहां सम हुए स्वरूप प्रकाशित हुआ। यही सिद्धावस्था है। जब तक विषम रहोगे प्रकृति का आकर्षण आपको बखशेगा नहीं। हमारा कार्य पूरा हुआ। कर्तव्य पूरा हुआ। फल नहीं मिला। हमें निराश नहीं होना। बार-बार भगवान समझा रहे हैं। संसार की दृष्टि से फल नहीं मिला पर आपको कर्तव्य का महान फल मिलेगा। आप विजय को प्राप्त होंगे। निराश नहीं होना। कर्म करने पर तेरा केवल लक्ष्य होना चाहिए।

कोई तेरे कर्म करने पर आदर करे या निंदा और देखो संसार है जय होगी तो फूल माला पहनाएगी और पराजित हुआ तो यह नहीं देखेगा कि जी जान की ताकत लगाकर उसने कोशिश की अभ्यास किया नहीं सफलता हाथ लगी असफलता में जो साथ दे वही सच्चा मित्र होता है। सफलता में तो सब साथ देने पर पक्की बात समझ लो। असफलता में कोई बिरला ही साथ देता है। धैर्य बंधाता है। नहीं तो यह पता नहीं कि उसके हृदय में क्या हो रहा है। कितना उसने प्रयास किया। चाहे अध्यात्म में हो, चाहे पढ़ाई में हो, चाहे क्रीड़ा में हो, किसी भी खेल में हो कोई भी चाहता है क्या पराजय?

अभ्यास उसकी पूरी कोशिश अब परिणाम उसका उसके अनुकूल नहीं आया तो हम सबको चाहिए कि साथ देना चाहिए एक दूसरे का उत्साह वर्धन करना चाहिए लेकिन जिनको शुद्ध बुद्धि प्राप्त नहीं है वो उत्साहवर्धन की जगह और निराश कर देते हैं बच्चा फेल हो के आया अगर मत आ इतने पैसे लगा दिए तू खिलवाड़ में समय नष्ट किया फेल हो गया और वो वैसे उसके मित्र जो पास हो गए है वो वैसे ही ऐठ के चल रहे थे। वो वैसे ही दुखी हो रहा था अल्पबुद्धि और ऊपर से आकर आपने अब वो क्या उसकी निराशा कहां पहुंचा देगी उसको?

ऐसे किसी भी विषय में सबसे प्रार्थना है कोई भी पराजित हो रहा हो उठाने की कोशिश करो। उसको उस पराजय के दुख से निकालने की कोशिश करो। उसको सहयोग दो। मानसिक सहयोग दो। वाणी का सहयोग दो। तभी हम वास्तविकता में मित्रता का व्यवहार तभी हम एक दूसरे को सुख पहुंचा सकते हैं। पर प्राय ऐसा नहीं देखा जाता। असफलता पर अरे नहीं भाई कोई नहीं चाहता असफलता। कौन चाहता असफलता? पूरा प्रयास करने पर यदि असफल हुआ है तो पूजनीय है। प्रशंस नहीं उसकी प्रशंसा करो। तुमने बहुत प्रयास किया।

निराश होने की जरूरत नहीं। ये अभ्यास ये प्रयास एक दिन सफलता तुम्हारे चरण चूमेगी। तुम्हें निराश नहीं होना। भगवान कह रहे हैं तुम्हारा आदर करे कोई या निरादर प्रशंसा करे या निंदा अंतःकरण शुद्ध हो या ना हो सिद्धि मिले ना मिले तुम्हें बिल्कुल परवाह नहीं। भगवान कह रहे हैं तो फिर काहे को चिंता करते हो? तभी तो शरणागत मस्त रहता है। निश्चिंत रहता है। महाराज आपकी नाव में बैठ गए। अब आप देखना पर यहां नाव का परिचय ही नहीं है। इसीलिए हम निराश हो जाते हैं। हताश हो जाते हैं।

दुखी सुखी हो जाते हैं। बहुत सुंदर मार्ग है भगवान का आश्रय। निहाल कर देते हैं। सच्ची कहते हैं भगवान का आश्रय ना हो तो फिर वो दुर्गति होती है। अंतर में होती है। सब सुविधाएं लेकिन जल रहा है हृदय उसको कैसे शांत करोगे? एसी नहीं शांत कर पाएगी। ठंडा जल नहीं शांत कर पाएगा। विचार शांत करेंगे और वो विचार बाजार में नहीं मिलते। वो भगवत आश्रय से आते हैं। भगवत आश्रित से भगवत आश्रित को विचार देकर भगवान बचा लेते हैं। भारी से भारी दुख की परिस्थिति है पर इतना उत्तम विचार है कि दुख उसे छू नहीं पा रहा है।

श्री भगवान करुणा करके कह रहे हैं योग कुरकर्माण। कर्म केवल तुम्हें नहीं बचा पाएगा। कर्म योग बचा लेगा। योगस्था कुरकर्माण कर्म के साथ योग भी जोड़ ले। भगवान से संबंध रखना और कर्तव्य का पालन करना यह योग हो जाता है। अहम से संबंध रखना और कर्म की फल की इच्छा रखते हुए कर्म करना यह बंधन कारक कर्म बन जाता है। भगवान कह रहे योगस्था कुर कर्माण सिद्धि असिद्धि में सम ये तभी होगा जब थोड़ा सा ज्ञान प्राप्त हो जाए। थोड़ा अध्यात्म ज्ञान प्राप्त हो जाए। नहीं सिद्धि असिद्धि में सब होना बड़ा कठिन होता है।

लाभ के लिए करते हो जब हानि होती है तो देखो हम सब निराश हो जाते हैं। ठीक नहीं है। यह निराशा हमारी उन्नति में बाधक हो जाएगी। हमारे जीवन को जीने में बहुत बाधा पहुंचा देगी। इतना दुर्लभ जीवन हम निराश होकर जिए। हम हताश होकर जिए। ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं है। इसीलिए अध्यात्म की कला आनी चाहिए। अध्यात्म की युक्ति होनी चाहिए। कोई यह ना समझ ले कि आरंभ में एक बार मैं गिर गया तो गिरता ही रहूंगा। ये ऐसे अमृतमय वचन है चलने वाले के लिए। जो नहीं चल रहे वो क्या समझेंगे?

कभी यह ना समझे कि आरंभ किया और गिर गए तो अब क्या? नहीं। जैसे जीतने वाले को उत्साह होता है उसे हजार गुना उत्साह बढ़कर हम बढ़ाएंगे। हम यही नहीं समझ पा रहे हैं। विजय तो हमारे चरण चूमेगी। अरे अविनाशी के बच्चे हैं। हमें बिल्कुल निराश नहीं होना। एक बार आरंभ में यदि हम गिर गए हैं। चूक हो गई चढ़ना हमारा फिसल गया पैर हमें बिल्कुल पीछे नहीं हटना। ये प्राय गिराने पर ही है। कोई उत्साह बढ़ाने वाला नहीं मिलता। अपनी बात कहते कोई उत्साह बढ़ा नहीं वो केवल हरि गुरु है बढ़ बढ़ आगे बढ़ नहीं यहां संसार चमत्कार का नमस्कार वाहवाही तभी तक है जब तक तुम्हारे गुण दिखाई दे रहे हैं और गुण में चूक हुई फिर तुम तैयार हो ऐसे तुम्हें ऐसा मजबूत तैयार होना है कि किसी की प्रशंसा और किसी की निंदा तुम्हारे कदम ना रोक पावे असफलता भी तुम्हारे कदम ना रोक पावे ए साधक ए उपासक ए मनुष्य देह में विराजमान भगवदंश कोई असफलता तुम्हारे कदम न रोक पावे चलना है हमें हमें उस दिव्य वस्तु को

प्राप्त करना है हमें विजय प्राप्त करनी है एक बार तुमने यदि असफलता में भी कदम बढ़ा दिए तो महावीर बन जाओगे ये असफलता कदम रोक देती है अब क्या होगा अब वही होगा जो होना है बस जिद्दी स्वभाव चाहिए यहां जिद्दी स्वभाव चाहिए जीवन में देखा है जहां कहीं भय जहां कहीं परास्त होने की बात मन ने खड़ी की है वही अब कर परास्त तू और हर तरह से देखा है कि क्रॉस कर गए निकल गए वो अहंकार नहीं होता वो भगवत आश्रय और अपने अभ्यास उसमें दृढ़ता उसमें फिसड्डी स्वभाव नहीं रोने वाला स्वभाव नहीं होना चाहिए नहीं हम रो नहीं सकते रुलाएंगे ये काम क्रोध बहुत रुला चुके हैं।

भगवान का आश्रय लेकर हर विकार को भगाएंगे। ये वीर पुरुष के लिए नहीं। हम सब महावीर के अंश हैं। महाबली है हमारे प्रभु अभय भुज दंड मूल पीना अंश सानुकूल उनके शरणागत हैं। ये केवल बातें या प्रवचन नहीं कर रहे। ये छाती की बात कर रहे हैं। कदम कदम पर पराजय परास्त करने के लिए दौड़ती है और उपासक देख रहा है। पर घबराए नहीं। हर कदम उसका विजय श्री की तरफ बढ़ेगा। क्योंकि हम सत्य वस्तु की तरफ चल रहे हैं। हम अपने कर्तव्य का पालन एक बार असफल हो गए तो क्या हुआ? हमको अपनी सफलता प्राप्त करनी है।

निराश नहीं होना। और एक बार यदि तुम ऐसा कर ले गए सम सिद्धि असिद्धि में तो समझ लो कि तुमने परमात्म प्राप्ति या ऊंचाई पर चढ़ने के लिए कमर कस लिए तुम्हें कोई नीचा नहीं दिखा सकता। इसीलिए भगवान स्वयं कह रहे हैं योगस्था कुरु कर्माण समत्वम योग उच्चते शेष व्याख्या श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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