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जल्दी-जल्दी पैसे कमा लेता हूं, फिर भजन करूंगा और वृंदावन वास करूंगा

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श्री धाम वृन्दावन पर पूज्य महाराज जी के वचन — ऊपर वीडियो में सुनें।

पूरा प्रवचन

एक प्रश्न आया था कि उसमें लिखा था कि जल्दी-जल्दी पैसे कमा लेता हूं। फिर एकदम विश्राम होकर वृंदावन वास करूंगा और फिर कभी नहीं कभी नहीं कर पाओगे। कभी नहीं कर पाओगे। पैसे के बल से वृंदावन वास या पैसे के बल से भगवान का भजन ये भूल जाओ कि हम बढ़िया फ्लैट ले लेंगे। एसी रूम लगा लेंगे। हर समय बढ़िया भोजन व्यवस्था होगी और खूब नाम जप करेंगे। भूल जाओ भूल जाओ। खूब भोगों का चिंतन होगा और भोग भोगोगे। लिख लो हमारी बात लिख लो। ऐसे नहीं बोल रहे हैं। बचपन से बाबा जी हैं और वो अनुभव करके बोल रहे हैं और जो बोल रहे हैं उसे तुम लिख लो।

अकाट्य है। अकाट्य हर व्यवस्था खाने पीने की और ये मनोरंजन की हो। भजन थोड़ी होता है। भजन तो होता है। कांप रहा है शरीर सर्दी में और बैठे हैं यमुना किनारे। फिर परमात्मा के ध्यान में तब भजन होता है। अगर भजन हो व्यवस्था में तो बताना। सुबह उठो रजाई ओढ़ के माला हाथ में ले लो तो माला छूट जाएगी। भजन होगा। ऐसे भजन होगा। अच्छा रोज टिफिन बढ़िया लगकर चक रहा है तो भोग अच्छे लगेंगे कि भजन अच्छा लगेगा? यह भजन खिलवाड़ नहीं भाई। जिसका भोजन नीरस उसका भजन सरस और जिसका भोजन सरस उसका भजन नीरस।

रुपया केवल से भजन होता तो बड़े-बड़े महान चक्रवर्ती सम्राट वे सब भजन करके भगवान को प्राप्त हो जाते। भजन करो। जो व्यवस्था भगवान ने दी है वह भगवान के नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी और भजन में लगो तो भजन हो सकता है लेकिन रुपया में लग के की व्यवस्था कर ले फिर भजन करेंगे कदापि नहीं हो सकता है कि जल्दी-जल्दी मेहनत अभी आज ही कर लेते हैं कल के लिए कल किसने देखा कल आए ना आए कल पता नहीं आंख मूंद जाए हम व्यवस्था करते करते एक संत भगवान के पास एक शिष्य सेवा में जाते थे तो उन्होंने कहा महाराज जी मैं बहुत गरीब आदमी हूं।

सुना है आप सिद्ध पुरुष हो। मेरी गरीबी दूर कर दो। तो उन्होंने कहा ठीक है। वो डिबे वाला उठा के लाए। बोले पारस मणि है सात दिन के लिए देता हूं। जितना चाहो लोहे को छुआ के सोना बना लो। अच्छा महाराज जी उन्होंने कील को जो स्पर्श कराया सो स्वर्ण की बन गई। उनको विश्वास हो गया। अब वो ले गए। उन्होंने विचार किया कि छुआने में तो दो मिनट लगता है। पहले जमीन बेची घर को गिरवी में रखा। सब जितना प्रॉपर्टी जो कुछ की सब जाके लोहा खरीद के ले आवेंगे। और घर में सब लोहा जमा करके बस छुआ दिया।

सब सोना बन गया। अब वो जमीन बेचना, ये बेचना, वहां से लोहा लाना, ये लाना, वो लाना। वो यह भूल गए कि सातवें दिन हमको वापस करनी है। तो सातवें दिन के शाम थी बहुत ढेर सारा लोहा जमा हो चुका था। कुछ गाड़ियां आ रही थी जो उतरवानी थी। इतने महात्मा जी आए बोले बेटा हमारी पारस मणि वापस करो। बोले बोले महाराज आप ऐसा कैसे कर सकते हैं? हमने जमीन बेची सब बेचा। अरे बोले सात दिन में कुछ नहीं 16 बला पाया था। अब क्या वापस कर चल वापस कर खत्म खेल जो था वो भी कबाड़ में बदल गया किसी काम में नहीं आया तो जो लोग ऐसा सोचते हैं ना कि हम कल भजन करेंगे नहीं काल करे सो आज कर आज करे सो अब पल में प्रलय होएगी बहुत करोगे कब आज ही राम राम बोलो आज ही राधा राधा रटो कल जैसी परिस्थिति होगी देखा जाएगा कल मंगलमय हो अरे जी गृहस्थ में तो बहुत सारे ग्रहक आ रहे हैं हम कह रहे हैं सबसे बड़े ग्रह स्थान हम है तुम्हारा परिवार कितना बड़ा हमारा परिवार गिन लो हजारों भी मिलेंगे सबसे

बड़े गृहस्थ हम गृहस्थ का मतलब ये थोड़ी है कि कोई बंधन है अब हमें क्यों बंधन नहीं सब हमारी श्री जी का है हमारा कुछ नहीं है सब श्री जी का है सब प्रभु का है वही बात तो आपको बोलनी है बात बराबर हो गई ना नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी कोई बंधन नहीं भाई आपने मान रखा है बंधन मान अगर एक लंगोटी में आसक्ति है तो वह आसक्ति हमारा पतन करा देगी और एक चक्रवर्ती सम्राट अंबरीश जी भगवान में आसक्ति है तो महान भक्त हुए दुर्वासा जी को परास्त कर दिया वलकल की लंगोटी लगाने वाले धूप का रस पीने वाले एक महात्मा परास्त हो गए एक चक्रवर्ती सम्राट महाराज अमरीश से क्यों क्योंकि उनका मन भगवान में लगा हुआ और दुर्वासा जी तप अहम अगर हम गृहस्थ हैं और भगवान के चरणों का आश्रय लिए हैं और ये हमारे हृदय में कि नाथ सकल संपदा तुम्हारी मैं सेवक समेत सुत नारी वो निश्चित भगवत प्राप्त हो जाएगा।

महाराज भरत जी एक हिरण के बच्चे में प्रेम कर लिए तो अगला जन्म हिरण का हुआ जबकि भगवान के लिए अपना राज्य और सब कुछ छोड़कर आए थे। तो यह सोचना कि हम गृहस्थ हैं। यह बहुत गलत बात है। हम गृहस्थ नहीं हम भगवान के हैं। यह गृहस्ती भगवान ने सेवा दी है। हम भगवान के हैं। हमें राष्ट्र सेवा दी। हमें गृहस्ती की सेवा दी। हमें समाज सेवा दी। वही हम कर रहे हैं। बाबा जी बनकर वही हम कर रहे हैं। समाज सेवा कर रहे हैं। लोगों का मन उत्साहित करके धर्म में प्रेरित करके वही कर रहे हैं।

वही आपको करना है। ये मार्ग है। हम दोनों भाई हैं। गृहस्थ और विरक्त। एक विरक्त मार्ग जाता है। एक गृहस्थ मार्ग जाता है। लेकिन जाता दोनों परमात्मा की तरफ है। यदि आप अपने धर्म से चले। हम अपने धर्म से चले तो दोनों को एक ही परमात्मा की प्राप्ति होगी।

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Bhajan Marg (YouTube)

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