जो कहते हैं कि प्रयास के बाद भी भजन नहीं होता, वे ध्यान से सुनें // 12/02/2026
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरि हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वापय परम शीतल माशयाम निर्वापय परम शीतल माश्रया परम सच्चिदानंद घन आनंद समुद्र प्रेम समुद्र द्र ज्ञान वैराग्य भक्ति ऐश्वर्य अनंत शक्तियों के स्वामी प्रभु श्री कृष्ण चंद्र जो अर्जुन जी को निमित्त बनाकर समस्त देह धारियों को ऐसा उपदेश कर रहे हैं जो श्रद्धा विश्वास पूर्वक श्रवण किया जाए महत्व बुद्धि रखकर मनन किया जाए और अपने जीवन में उतारा जाए तो इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाए।
इसी जन्म में समस्त कर्म बंधनों से मुक्त होकर परम सुख शांति जो हमारा स्वरूप है हम उसे प्राप्त कर ले। प्रभु कृपा करके वर्णन किए कि भजन कभी दुर्गति नहीं होने देता। वर्तमान में आपका प्रारब्ध भोग सुखद है या दुखद वह आएगा जिससे संचित कर्मों के द्वारा शरीर की रचना हुई है वो दो ही प्रकार के कर्म है शुभ और अशुभ शुभ पुण्य फल अनुकूलता अशुभ पाप फल प्रतिकूल बोलता जिसे सुख और दुख कहते हैं। यह अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म शुभाशुभम जिस संचित कर्म से कुछ कर्मों का परिणाम निकाल कर के इस शरीर की रचना हुई है उसमें जो शुभ अशुभ मिश्रित है वो सुख दुख आएगा।
पर जो आप भजन कर रहे हैं, यह आपको ऐसी सामर्थ्य देगा कि आप उस सुख में अभिमान में नहीं आएंगे और दुख में आप शोकित नहीं होंगे। आपको दुख सुख से बचाकर अखंड आनंद में यह भजन विश्राम देगा। पर भजन प्रयत्न पूर्वक करें। सतत करें और महत्व बुद्धि रखें कि इससे बड़ा कोई संपत्ति नहीं है। भजन से बड़ा कोई मित्र नहीं है। भजन से बड़ा कोई हमारा रक्षक नहीं है। भजन से बड़ा कोई आनंद नहीं है। और यह सत्य है। इसके अलावा जितना भी ब्रह्मा के द्वारा रचा हुआ प्रपंच है यह माया कृत है।
मायाकृत जो है नहीं पर दिखाई दे रहा है। सत्य है सच्चिदानंद प्रभु का नाम रूप लीला धाम प्रभु श्री कृष्ण चंद्र जो भूत भविष्य वर्तमान सबको वर्तमान की तरह ही देख रहे हैं। उन्हें सब दिखाई दे रहा है। ये जीव क्या था? क्या है? क्या होगा? क्या कर रहा है? क्या किया था? क्या करेगा? सब उन्हें पता है। वो आदेश कर रहे हैं। प्रयत्ना मानसु योगी संशुद्ध किल विष अनेक जन्म संसिद्ध ततो या पराम गतिम जो उपासक प्रयत्न पूर्वक यत्न करता है भजन का। प्राय वार्ता में ऐसे बोलते हैं कि हमारा तो भजन होता नहीं।
कुछ बोलते हैं हमसे भजन नहीं होता। दोनों बातें आप स्वयं अपना नाश करने के लिए बोल रहे हैं। आप राजी हैं मन बुद्धि की चाल में चलने से। इसीलिए आप ऐसा बोल रहे हैं। यह भव समुद्र संसार तुम्हें डुबोएगा, दुख देगा। कोई तुम्हारा साथी नहीं है। भजन ही तुम्हारा साथी है। भजन जो पहली बात कि हमसे होता नहीं तो भजन होता है सिद्ध महापुरुषों का। जिन्होंने श्वास और नाम को एकम एक कर दिया है। श्वास श्वास सुमिरन करे दुविधा रहा ना कोई। प्रत्येक क्षण नाम में डूबे हुए हैं। अब उनको नाम जपना नहीं पड़ता।
स्वाभाविक चलता है। जो कहते हैं हमसे भजन नहीं होता है। यह आपकी मानी हुई प्रमाद स्थिति है। क्योंकि आप में क्रिया शक्ति है। आप उस क्रिया शक्ति का प्रयोग शास्त्र विरुद्ध आचरणों में करते हैं। आपका मन मलन हो गया है। पाप अधिक मात्रा में हो गया है। इसलिए आपके अंदर ऐसी भावना बन रही कि मेरे से भजन नहीं हो सकता। यह पाप का लक्षण है। पापवंत कर सहज सुभाऊ भजन मूर्त ते भावन काऊ। जब हमारे पाप अधिक हो जाते हैं तो भजन करने की भावना का ही नाश कर देते हैं। हमसे नहीं हो पाएगा यह सब।
पाप अधिक हो गए। अगर कहीं पाप है पर वह पुण्य को दबा नहीं पा रहे तो आपको साधु संग शास्त्र स्वाध्याय और सामने की दृश्य परिस्थिति ऐसे विचार में डाल देगी कि आपका भजन होने लगेगा क्योंकि आपके पुण्य जोरदार है अगर पुण्य को दबा के पाप ऊपर बढ़ गया है तो फिर यही बात आएगी हमसे भजन नहीं होता इसके लिए भी उपाय भजन ही है। जबरदस्ती भजन करो। जरूरी थोड़ी जब हम पैसा कमाने जाते हैं कि हमें मनोनुकूल ही काम मिले। अब हमको वो ले गया अपनी लेवरी कराने के लिए। आठ घंटे के हमको ₹00 देगा।
अब वह जो चाहे झाड़ू लगवावे, ईंट पत्थर ढुलावे, कुछ भी करें तो हम मन को राजी कर लेते हैं ₹00 के लिए। आठ घंटे में ₹00 मिलेंगे। इसकी गाली भी सह लेते हैं। इसके कहे हुए अनुसार क्रिया भी कर देते हैं। तो हमें परम पद मिलेगा। महान सुख मिलेगा। समस्त दुखों से निवृत्ति हो जाएगी। यह जीवन की शाम होते होते आपको मिल जाएगा। सही ढंग से भजन करो। त बालक नहीं भर सयान काहे कृष्ण भजत नहीं नीके ठीक से भजन करो। क्या ठीक से कुत्सितवाद विकार पर धन सुनस मंद परती बंचो गंदी बातें सुनना बोलना बंद करो।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह विकार तुम्हारे नाश में तत्पर हैं। इनको मित्र मत समझो। इनसे हटने की चेष्टा करो। विकारों का त्याग करो। दूसरे के धन से सुखी होने की भावना का नाश कर दो। नहीं तो तुम्हारा नाश कर देगी। दूसरे की मां बहन की तरफ गंदी दृष्टि देखकर के उनमें दोष भावना उत्पन्न हो जाना। साधक के पतन का लक्षण है। किसी भी माता बहन को भोग दृष्टि से देखना यह साधक पतित हो चुका है। पतन हो जाएगा नहीं पतित हो चुका है। इसलिए उसकी ऐसी दृष्टि है। कुत्सितवाद विकार परधन सुनसिक मंद परती बंचो जब तक हम असाधनों का इन असाधनों का त्याग करने के लिए प्रयत्न नहीं करेंगे तब तक भजन कैसे हो पाएगा इसलिए तू बालक नहीं भरे शयान तेरे में बड़ी चतुरता भरी हुई है दूसरे की बेईमानी करने के लिए दूसरे के छल कपट हिंसा विभचार इन दोषों में उस चतुरता का प्रयोग कर रहे हो।
भजन में करो। भजन में इनसे बचने के लिए करो। चतुरता का प्रयोग सयानप इनमें लिप्त होने के लिए नहीं। इनसे बचने के लिए करो। ठीक से भजन करो। श्री भगवान आदेश कर रहे हैं। प्रयत्नादत मानस योगी संशुद्ध किलविष सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। जो प्रयत्न पूर्वक भजन करता है। उपासक को प्रयत्न करना पड़ेगा। जब तक हमारे पाप जमा है तब तक वह भजन में रुचि नहीं होने देंगे। यह बात बैठा लो। अब वो कितने जमा है तो प्रभु जानते हैं और नाम जानता है। प्रभु का नाम जो हम मंत्र नाम जप रहे हैं वो पूरा का पूरा पाप और उसकी प्रवृत्ति जहां से पाप प्रकट होते हैं जब दोनों का नाश कर देगा तो आपका हृदय प्रसन्नता पूर्वक भजन में आसक्त हो जाएगा।
यह पवित्र हृदय का लक्षण है। छूट ही नहीं सकता नाम। प्राण प्यारा लगने लगेगा। तदपिता खिलाचारिता तस्मरण परम व्याकुल तेति एक एक आचरण एक एक चेष्टा भगवान को समर्पित जरा सा भूल जाने पर भारी व्याकुलता ये पवित्र हृदय का लक्षण है। पर ये पवित्रता बाहरी तीर्थ अवगान से नहीं होगी। नहीं होगी। विश्वास कीजिए। यह होगी भगवत चिंतन से। बाहर से आपका शरीर धाम में रह रहा है। इससे बड़ा कोई तीर्थ है क्या? विचार करके देखिए। बाहर से शरीर धाम में रह रहा है, सत्संग में है, साधु वेश में है या साधु समागम में है?
इससे बड़ा कोई परमार्थिक विधान मंगलमय हो सकता है क्या जो अपने लोगों को मिला है? पर क्या हमारा हृदय पवित्र हो गया है? पवित्रता का लक्षण है स्वाभाविक भगवत स्मृति में डूबे रहना। जिस समय संशुद्ध किलविष समस्त पाप नष्ट होकर हृदय शुद्ध हो जाएगा तो आसक्त हो जाओगे भजन में नाम इतना अमृत में लगेगा कि प्राण छोड़ देना अच्छा लगेगा पर नाम छोड़ देना नहीं यह है निष्पाप स्थिति की पहचान आप निष्पाप हो चुके हैं। इसकी पहचान यह है और आप में पाप की वृत्तियां हैं। पाप है।
इसकी पहचान भजन में अरुचि होना और भोगों में अच्छाई दिखाई देना। भोगों में सुख दिखाई देना। भोगों की इच्छा होना यह पाप का लक्षण है। प्रभु कह रहे हैं प्रयत्न पूर्वक भजन। भीतर की बात है भीतर की देहाभिमानी बाहर दिखावे के लिए सारा प्रयत्न करता है। भगवत प्राप्ति बाहर दिखावे से नहीं होती। चित्त के परिवर्तन से होती है। बड़ा तांडव है कलयुग का। हम प्राय बाहरी दिखावे में ही अपना जीवन नष्ट कर देते हैं। लोग हमें विद्वान कहें, ज्ञानी कहें, महात्मा कहें, भगवान का अवतार कहें, सरकार कहे जो भी इसके लिए पूरा जीवन नष्ट कर देते हैं।
लोग कहे पर प्रभु मुझे एक बार अपना कहे इसके लिए पूरे जीवन में प्रयास नहीं करते। कभी इस बात को आप लक्ष्य में लाइए कि एक बार मेरे स्वामी एक बार तो मुझे सामने आकर कह दे तू मेरा है। बस हम इसके इसके लिए प्रयास नहीं करते। हम इसके लिए प्रयास करते कि लोग कहे भजनानंदी है। लोग कहे हमारा नाम हो जाए। अरे भगवान का नाम नहीं लोग ले रहे तो तुम्हारा नाम क्या लेंगे? भगवान का नाम जो वेद से लेकर के सब पुराण शास्त्र ब्रह्म ऋषि महात्मा जिनके यश का गान करते हुए थकते नहीं पर कभी पार नहीं पाए उनका नाम नहीं ले रहे तुम्हारा नाम तुम हो क्या वह कम से कम सब कुछ छूट जाएगा नाम बना रहेगा अरे सच्चिदानंद नाम नहीं ले रहे तुम सच्चिदानंद नाम के प्रति लोगों की भावना और श्रद्धा नहीं है तो प्राकृतिक शरीर के नाम का तुम कहां भी यह कहां तक स्थाप स्थापना कर पाओगे।
इतिहास में लिखे हैं बड़े-बड़े सम्राटों के नाम। कौन? कहां सब मिट्टी पलित हो गए। भूमि में मिल गए। कहीं उनकी रब कहीं उनकी वो महिमा नहीं। विचार कीजिए। शांत भाव से विचार कीजिए कि हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है। यह माया है। अगर आप यश चाहोगे तो आपको यश मिल जाएगा। लेकिन टिकाऊ नहीं क्योंकि आपने चाह की है ना मिलेगा यश पर ऐसा मिलेगा आकाश में उड़ोगे धम से नीचे गिर जाओगे कोई जानेगा भी नहीं कि तुम क्या थे और भगवान का यश गाने वाले बनो कीर्तनी सदा हरि तो सदा सदा के लिए पावन यश तुम्हारा भले मृत्यु लोक में ना गाया जाए लेकिन भगवत धाम में गाया जाएगा तुम्हारा जैसे भक्त जन भगवान की चर्चा सुनते हैं ऐसे भगवान भगवान भक्तों का यश सुनते रहते हैं।
बड़े बड़े महापुरुष विराजते हैं और भगवान के भक्तों की चर्चा होती है। भगवान की सभा में। उसी सभा में तो दुर्वासा जी को पता चला था कि सर्वश्रेष्ठ महान भक्त इस समय अमरीश जी भूतल पर विराजमान। तभी तो उनकी परीक्षा के लिए आए थे कि मेरा नाम नहीं लिया गया। सर्वश्रेष्ठ में अमरीश जी का नाम ले। जैसे हम भक्तों का एक व्यसन है, एक आसक्ति में जीवन है कि हम भगवत चर्चा किए और सुने बिना नहीं रह सकते। ऐसे भगवान का एक व्यसन है। वह अपने भक्तों की बात सुने बिना नहीं रह सकते।
वो भक्तों की चर्चा सुनते हैं। सोचो अखिल लोक चूड़ामणि जिनके लिए वेद नेति नेति कह के महिमा का गान करते वो प्रभु अपने भक्त की महिमा सुनते हैं। यह मिलेगा आपको। मृत्यु लोक के प्राणी तो कुछ चंद दिनों के लिए हैं। ये ये सब मरेंगे क्योंकि इसका नाम मृत्यु लोक है। इनके शरीरों का परिवर्तन होगा। ये स्थाई नहीं है। अधिक से अधिक 100 वर्ष। 100 वर्ष कितना है? ब्रह्मा की आयु में ऐसे कमल में पंखुड़ी में सुई छेदा गया। यहां का एक वर्ष हो गया। क्या है तुम्हारा जीवन? प्रयत्न पूर्वक भजन।
जिनके लिए हमारा जन्म हुआ है उन प्रभु के लिए। हम कैसे भ्रमित हो जाते हैं। चार लोग प्रणाम कर लिए। हम इसी को अपना लक्ष्य मान लेते हैं। चार लोग वाहवाह कह दिए। हम इसी को अपने जीवन की तपस्या का फल मान लेते हैं। कैसी हमारी अभी मूढ़ता गई नहीं। अभी हृदय मलिनता गई नहीं। अरे एक बार प्रिया प्रीतम सामने आवे। दोनों हमको मुस्कुरा के देखें अपना कहे। यह हमारे जीवन का लक्ष्य है। संसार अपमान करें, निंदा करें। क्या फर्क पड़ता है? हमारे प्रीतम हमें प्यार करें। इससे बड़ा सुख क्या?
प्रीतम की तरफ से विमुख हो। सब वाहवाह कर रहे तो क्या कुछ हाथ नहीं लगेगा। ठीक से प्रयत्न करो। तू बालक नहीं भर शान काहे कृष्ण भजत नहीं के ठीक से भजन देखो महाप्रभु कह रहे हैं तन ही राख सत्संग में मनह प्रेम रस भयो सत्संग में आना कोई साधारण बात नहीं है जब द्रवह दीन दयालु राघव तो साधु संगति पाई भगवान जिस जीव पर कृपा करते हैं कितने ब्रह्मांड है। कितने लोक हैं? उनमें से एक मृत्यु लोक कितने जीव उन जीवों में कितने मनुष्य उन मनुष्यों में कैसे-कैसे स्वभाव वाले कितने लोग सत्संग इस समय सुन रहे हैं।
अधिकतर इस समय सब मोह निद्रा में सोए हुए हैं। तमोगुणी निद्रा में मोह निद्रा में सब आप सब सौभाग्यशाली हैं। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त के पहले ही आप भगवत चर्चा सुन रहे हैं। परम पावन महामहिम श्री वृंदावन धाम की भूमि में बैठकर यह सौभाग्य आपके कर्मों से नहीं है। यह प्रियाजु की अहेतु की कृपा से है। हमारा प्रयत्न शिथिल नहीं होना चाहिए। हमें यह विचार करना है कि देखो हमें प्रभु ने कैसा संयोग दिया है। सही रोना आ जाएगा। यदि आप इस बात को गंभीरता से ले तुमने दिया सदा ही मुझको अपना प्यार दुलार महान मैंने सिर ना चढ़ाया उसको किया निरंतर ही अपमान मैं कृत अति नीच नराधम सभी भांति अति ही मलन दीन बंधु ने दोष न देखे अपना लिया जान जन दीन जैसे स्नेह मईमा शिशु का मल धोती नहलाती आप स्नेह सिंधु तुमने वैसे ही किया विशुद्ध मिटा मलताप पर मेरी निपट नीचता अतिशय दया तुम्हारी अमित अपार सहज दयावश भस्म कर दिया तुमने मेरा अग संभार चरण शरण मिल गई सदा को छाया सुधांद सब ओर उदय हो गया प्रेम सूर्य अब मिटा मोह माया तम घोर हे नाथ जब से स्मृति है तब से देखा है आपने केवल कृपा ही कृपा की है।
प्यार ही प्यार आप जानते हो जहां आप बैठे हो। तरसते हैं बड़े-बड़े महापुरुष। सच्ची मानिए ये आप जान नहीं पा रहे कि प्रिया जी ने आपको क्या दे दिया। मनुष्य शरीर और इस दुरंत माया से आपको हटाकर परम पावन श्री धाम वृंदावन का दर्शन कुछ क्षण बैठने का सौभाग्य और कहीं वास तो अहो भाग्य अहो भाग्य धन्य धन्य धन्य धाम का उपासी नाम का उपासी प्रिया प्रीतम के रूप का उपासी धन्य धन्य धन्य ते ये इनके उपास है पर क्या प्यारी जी के प्यार दुलार को आप सम्मान दे रहे हैं? उनके प्यार दुलार की तरफ देख पा रहे हैं आप कि उनकी कितनी कृपा है।
सदैव कोसते रहते हैं आप। मैं सब कुछ छोड़कर वृंदावन वास किया। आपका भजन किया। आपके लिए परिवार छोड़ दिया। कैसी मूढ़ता? परिवार तुम छोड़ सकते हो। तुम वृंदावन वास कर सकते हो। तुम एक बार भी राधा नाम बोल सकते हो। तुम्हारी सामर्थ्य है? नहीं। अज्ञान की धरा में आप केवल बोल रहे हैं। श्री जी ने अहेतु की कृपा करके श्री जी ने आपको यह सब सौभाग्य दिया है। उसे आप अपने अहम में ले जा रहे हैं। मैंने सब कुछ त्याग किया। मैंने मैं छोड़ो इस मैं को। यह मैं पकड़े रहोगे तो अनुभव नहीं होगा कृपा का।
यह सिर्फ कृपा से हो रहा है। देखो महाप्रभु कह रहे हैं बार-बार इसीलिए इस बात को आपको सुनाते हैं कि आप समझो कह रहे हैं कि क्वाहम तुच्छा शब्द देखो जरा हित सजनी जो है हित सजनी जो प्यारी जु को भी हां तू तो सखी सयानी ते मेरी एकको ना मानी हो तू सो कहत हारी जुगति जुगति सो मेरी एक भी बात आप मान नहीं रही देखो प्यारी जी को कह रहे हैं ओगी मंगी रहत गर्भ की माती ये कितनी बड़ी सामर्थ है प्यारी जी को वो सजनी जी कह रही हैं जब राधा नाम की बात आई क्वाह तच्छ परम अधम प्राण गर कर्मा य नाम महिमा हरे वृंदावनस कहा में तच्छ अधम अपरा ध करने वाला और कहां है महामहिम राधा नाम यह तो केवल वृंदावन की कृपा है महिमा है जो राधा नाम मेरी जिभ्या पर मेरे हृदय परित हो रहा महाप्रभु बोल रहे हैं जो दाता राधा नाम के हैं।
श्री धाम वृंदावन महाप्रभु का तन है। यह हित का तन है। नव निवत निकुंज महल उनका हृदय है। और उसमें विहार करने वाले प्रिया प्रीतम निरंतर महा सुख लेते रहते हैं। जिनका तन वृंदावन है। तन विपिन हरिवंश को सोचो वो कह रहे हैं कि प्रथम यथामति प्रणम श्री वृंदावन अतिरम मैं जैसा वर्णन कर रहा हूं ऐसा ही इतना ही नहीं है। जैसा मेरी मति में आ रहा। पहले तो मैं महिमा को प्रणाम करता हूं वृंदावन की। फिर जैसा प्रिया मेरी मति में दे रहे जितना उतना ही बोल पा रहा हूं क्योंकि श्री राधिका कृपा बिन सबके मनन अगम में कौन ये बोल रहे हैं जिनका तन ही वृंदावन है जिनका मन लाल जो है जिनकी आत्मा प्रिया जो है किशोरी महात्म जिनका हृदय निकुंज है और निरंतर इनको दुलार करते रहते हैं वो हित जो कह रहे उस धाम में आप वास कर रहे हैं उस नाम का आप कीर्तन करते हैं, जप करते हैं, ध्यान करते हैं, सेवा करते हैं।
जिस नाम की सेवा स्वयं अखिल लोक चूड़ामणि भगवान श्री कृष्ण करते हैं। य नामांकित मंत्र जापन पर प्रीत्या स्वयं माधवा स्वयं माधव ये तुम्हारे भाग्य में लिखा था क्या? नहीं नहीं ये करुणामय किशोरी की कृपा है। तो क्या आप सर झुका के इस कृपा को कभी रोए? इस कृपा के लिए कभी आप समर्पित हुए कि आहा मेरी लाडली की कितनी कृपा नहीं कोसते रहते हैं। हमने ये चाहा ये नहीं किया वो नहीं किया। ये काम करो किशोरी ये काम करो ये काम करो। क्या क्या तुम आराधना कर रहे हो? हम तो आठों पहर आपकी सेवा में लगे।
आप हमारा ये काम कर दो ना। काम कर दो तुम। तुम सेविका हो या उनको सेवक बनाना चाहती हो? अंदर की वृत्ति से देखो। तुम तो उनकी दासी हो। तुम उनकी सेविका हो। फिर आप क्या बोलते हो? श्री जी हमारा काम कर दे। तो क्या माना श्री जी को आपने? बिहारी जी यह काम कर दो। आदेश दे रहे हो। बड़े-बड़े लोकपाल जिनके आगे सर झुकाते उनको तुम आदेश कर रहे हो। तुम्हारी बुद्धि मंद हो गई। ये काम कर दो बिहारी जी। अखिल कोटि ब्रह्मांडों के दाता तुम्हारे कुछ चंद रुपए चंद भोग चंद फल जिन्होंने अनंत ब्रह्मांडों के जीव का भरण पोषण उनकी रचना एक सेकंड में की है उन प्रभु को तुम क्या समझ रहे हो ए फूल बंगला बना देंगे तुम्हारा भोग लगा देंगे हमारा एक काम कर दो घस हर जगह चलती प्रभु के यहां नहीं चलती सत्य के यहां घूष नहीं चलती सत्य के यहां समर्पण चलता है सत्य के यहां समर्पण चलता है घूष नहीं चलती वो तुम्हारे ईश्वर हैं, मालिक हैं।
उनसे ठीक से बात करो। वह तो कुछ नहीं बोलेंगे लेकिन उनकी शक्तियां तुम्हें रौंद देंगी। उनके पार्षद तुम्हें रौंद देंगे जो तुम ज्यादा अभिमान में हो। बिहारी जी 10 लाख का हम कल भंडारा करवाएंगे। आप एक काम कर दो। क्या समझाया बिहारी जी को? क्या समझाए प्रभु को? हंसते हैं। प्रभु हंसते हैं हमारी मूढ़ता पे कि इतनी अहेतु की कृपा फिर भी समझ नहीं पा रहा। जलते रहते हैं। धाम में जरा जरा सी अनुकूलता भंग होने पर प्रभु की तरफ रोष दृष्टि से देखते हैं। अनुकूलता के पुजारी हो या प्रिया प्रीतम के पुजारी हो।
ध्यान देकर देखिए। मैंने सिर ना चढ़ाया उसको किया निरंतर ही अपमान। अपने प्रभु का अपमान करते हो। तुम दास हो। जरा सोचो विचार करके। देखो अगर इसको प्रगट में खोल के ना कहे तो आप कहोगे कौन भगवान का अपमान कर सकता आप करते हैं कौन है प्रिया प्रीतम प्रियाजू की एक मंद मुस्कान एक चितवन के लिए अखिल कोटि ब्रह्मांडों का स्वामी विनय करता है सखियों से जिनके चरण रखने की चौकी को ब्रह्मा शंकर आदि वंदन करते चरण स्पर्श भी नहीं प्राप्त कर पाते मुनि मन ध्यान धरत ने वो प्रभु हैं और हमारे ऐसे युगल सरकार उनके साथ बर्ताव क्या करते हैं?
आप हमारा यह काम कर दो। आप हमारी ये इच्छा पूर्ण कर दो। आप ऐसा कर दो तो मैं ऐसा कर दूंगा। क्या हो तुम? मूढ़ हो। मूढ़ सरल भाषा में पागल हो। पागल किससे बात कर रहे हो तुम? उनसे बात करो। प्रभु से। कितना बढ़िया अवसर मिला है। तो उनको इच्छाएं समर्पित कर दो। तो ऐसा आनंद वो आपको प्रदान करेंगे कि आपकी इच्छा में वो था ही नहीं आनंद। जो आपने इच्छाएं की थी उनमें आनंद था ही नहीं। आप अपनी इच्छा समर्पित करके उनके हो जाओ। यह समर्पण का स्थान है। यहां जो कुछ भी प्राप्त होता है समर्पण से होता है।
और समर्पण दैन्यता से होता है। अभिमान से नहीं होता। इसीलिए तणाद सुनी चेन तर सहना अमानना मान देन कीर्तन सदा हरि आप हरि सेवक हो हरिदास पदवी पे हो और अपने स्वामी से कैसी अभद्र वार्ता करते हो ये आप अंदर से देखो हम सब अपने आराध्य देव का अपमान करते हैं और उनकी केवल अहेतु की कृपा ही कृपा हम पर बरस रही है अगर वो रोज करें तो हमें नरक में भी ठोर ना मिले बोलो हम वृंदावन धाम रहने लायक है। जहां की रज प्राप्ति के लिए उद्धव आदि बड़े-बड़े महापुरुष याचना करते हैं।
वहां हम साधारण मनुष्य कृत आचरण करते हैं। आप साधारण विषय पुरुष जैसा आचरण करता है। हम धाम में वैसा आचरण करते हैं। अपराध नहीं है ये। यह प्रिया प्रीतम का अपमान नहीं है। उनके निज महल में प्रेम समुद्र वृंदावन में रहकर सांसारिक चेष्टा सांसारिक भोग वासना की क्रियाएं ये क्या है? ये उपासक का लक्षण है। आप विचार करके अपनी दिनचर्या पर देखिए। अपने जीवन को देखिए। अपमान के शिवा आराध्य देव का आप क्या सम्मान कर रहे हैं? आराध्य देव से क्या चाह रहे हैं आप? उनको माना आपने आराध्य देव बस केवल बातों में माना हृदय से मान लोगे तो रोना आएगा रोना उनकी कृपा से आएगा शिकायत थोड़ी होगी जब तन समर्पित अंतःकरण समर्पित फिर आपका शिकायत करने वाला वस्तु क्या रह गया है क्या आपका रह गया है क्या है आपका आपका कुछ है नहीं तो आपके प्रिया प्रीतम है और वह सच्चिदानंद बपू है सर्वज्ञ हैं।
ऐसे परम प्यारे हैं कि करुणा के समुद्र ने कहूं न रिस कहूं भू न होत सखी रहित प्रसन्न सदा हे मुख हाहास है। ऐसी सुकुमारी जो की उपासना तो आपका हृदय कहीं असंतुष्ट हो सकता है। आप अपनी अज्ञान की कल्पना करके आप भयभीत होते हैं। असंतुष्ट होते हैं और अपने स्वामी का अपमान करते हैं। बोलो अगर आपने किसी संत को गुरु माना है तो आप उसे कहेंगे सुनो तुम्हें भोजन की व्यवस्था कर रहे हैं जरा आप ये काम कर दीजिए हिम्मत है आपकी कहने की वैसे अनंत संतों के भी गुरु हैं लाल जी महाराज अनंत संतों के जितने भी महापुरुष हुए हैं सबके माथे पर इनहीं के चरण रज है धम सदा परिभष्ट दोहम अभीष्ट प्रदान करने वाले इनहीं के चरणारविंद धेय सदा जिन्होंने इनका ध्यान किया उसके अभीष्ट की प्राप्ति इनहीं चरणों से कोई भी हो तीर्थ पदम शिव विरंच नतम शरण्यम जितने भी तीर्थ इनहीं के चरणों से हैं आप विचार करो ऐसे प्रभु के प्रति आपका का कैसा व्यवहार है?
स्वामी के साथ कैसा व्यवहार सेवक का होता है? जितने भी संत महात्मा हैं सबके गुरु श्री कृष्ण सबके गुरु अगर कोई ज्ञानी भी है तो तदात्म भाव करता है। अगर प्रेमी है तो अपने इन भावों में भी चरता है। कोई दास्य भाव, कोई शक्य भाव, कोई वात्सल्य, कोई कांता, कोई सहचरी और इन प्रभु की गुरु है हमारी प्रिया जो पी को ना चल शखवत प्यारी सकल विद्या विदिित रहस हरिवंश हित मिलत नौ कुंजवर श्याम ब भाग री श्याम ब भाग री श्याम ब भाग री मिलत नौ कुंजवर श्याम ब भाग री ऐसी महामहिम जुगल जोरी को आप क्या आदेश करते हैं आपकी क्षमता है आदेश करने की वो आप करते हैं आदेश देखिए ऐसा कर दो ना प्रिया प्रीतम कर दो।
आप सेवक हो। आपका रह क्या गया है जिसके लिए आप करवाना चाहते हो? आपका क्या है? ना व्यवहार है, ना परमार्थ है, ना शरीर है, ना अंतःकरण है। तभी समर्पण समर्पित हो। फिर क्या कर बिक गए हो। प्रिया प्रीतम के नाम रूप में रसिकों ने खरीद लिया आपको। हरिराम व्यास जी कहते हैं अब तो रसिकों के हाथ बिक गया हो और मोल में प्रिया प्रीतम। प्रिया प्रीतम के लिए रसिकों अब हमारा क्या तो आप अपने स्वामी का अपमान ही करते हैं। सम्मान तो एक केवल नाटक होता है। हम प्रणाम भी करते हैं तो पीछे कोई हमें देख रहा है कि नहीं?
हां अगर देख रहा है तो साष्टांग कर रहे हैं। बहुत बढ़िया भगत देखो साष्टांग प्रणाम। हम ये सुनना हम उनको सुख नहीं देना चाहते। हम उनके लिए नहीं कर रहे। श्रृंगार करते हैं तो चार लोग वाह क्या श्रृंगार होता है वहां। नाचते क्या लोग प्रिया प्रीतम पता नहीं दृष्टि में है कि नहीं है यह हमें देखना होगा हमारा प्रयत्न प्रिया प्रीतम के लिए होना चाहिए कौन हो आप यह ध्यान रखो आप प्रिया प्रीतम के हो आप प्रिया प्रीतम के लिए हो आपकी प्रत्येक चेष्टा प्रिया प्रीतम के सुख के लिए है तो आप महा सुख में निमग्न हो जाओगे सहचरियों की चेष्टा प्रिया प्रीतम को सुख पहुंचाना है तो सहचरिया कहां निमग्न है?
बढ़ो आनंद मोद सबके महा प्रेम महा प्रेम सुरंग रंगी ये महा प्रेम के रंग में रंगी हुई है। अपनी उपासना को समझो। अपने स्वामी को आदेश मत करो। हे स्वामी आपकी कृपा का हमने अपमान ही किया। मैं बहुत कृत हूं, नीच हूं। किए हुए को ना मानने वाला। गुरुजनों ने आपसे क्या लिया है? आपको उपदेश दिया, आपको नाम दिया, आपको मंत्र दिया, आपको अपनापन दिया। जिन्होंने विश्व के संपूर्ण अपनेपन को समेटकर प्रभु के चरणों में दिया। उन्होंने आपको अपनापन दिया। आप उनकी अवेलना। आप उनका निरादर आप कहोगे नहीं करता तो उनकी बात ना मानना उनका निरादर है।
भजन के लिए जुड़े भजन नहीं किया यह उनका अपमान है। यह उनको क्लेश देना है। आपने जिस बात के लिए अपनापन संबंध बनाया जिसके लिए उन्होंने अमोग जीवनी शक्ति नाम दी मंत्र दिया। अगर आप उसको नहीं जपते तो गुरु का अपमान करते हैं। मनमानी आचरण करते हैं तो गुरु को संतप्त करते हैं और उसका परिणाम होगा कि आपकी दुर्गति आप नाना प्रकार के प्रापंचिक बंधनों से जलते रहेंगे। हे दीन बंधु इतना होने पर भी आपने हमारे दोष नहीं देखे। सदैव मुझे अपना ही माना। आहा यह मेरा जन है ऐसा ही माना।
अगर मेरे अपराध देखते सच यहां का अपराध जानते हो धाम है नरक में भी ठोर ना मिले जैसे कहा जाता है ना नरक में भी ठोर ना मिले वो हमारी दुर्दशा हो जाए हमसे ऐसी गलतियां हो जाती है हम यहां झूठ बोल देते हैं हमारे द्वारा यहां व्यभचार हो जाता है पापाचार हो जाता है हिंसा हो जाती है गंदी बात हो अब उसका परिणाम ये धाम है महापुरुषों ने बहुत सावधान किया मत जाना वृंदावन एक दिन के लिए जाना उपवास करके परिक्रमा करके नाम जप करके चुपचाप चले आना कोई अपराध ना बने ऐसे शिक्षा दी जाती कभी ब्रजवासियों पर वैष्णव पर दोष दर्शन ना कर लेना हमें कितनी कृपा मिली जीवन यापन करने का लाडली जी ने अवसर दे दिया और ऐसा अवसर दिया महल में रह रहे हैं श्री जी के महल में पर हम कर क्या रहे हैं क्या महली श्यामा श्याम को दुलार कर रहे हैं।
उनका चिंतन कर रहे हैं। उनके अनुकूल चल रहे हैं। क्या हम महल में रहने लायक है? फिर भी हमारे सारी गलतियों को गलती ही नहीं माना। दुलार बढ़ता गया। कैसा? जैसे स्नेहमई मां अपने बच्चे को मल युक्त देख के घृणा नहीं करती। उसके मल को धोकर नहलाती है और सुंदर सुंदर श्रृंगार करती है। ऐसे ही हमारे प्रभु हमारे दोषों को अपराधों को इस धाम में करने पर भी उन्होंने माना ही नहीं कि यह दोष है। नहीं तो हम रात दिन जलते माना ही नहीं। और हमारे मलों को उन्होंने साफ किया। बिना कहे हम जानते ही नहीं हमारे मल है।
उनको साफ किए। स्नेह समुद्र प्रभु आपने जैसा प्यार दिया मेरे मल मेरे पाप ताप की तरफ ना देख के ऐसा कोई नहीं कर सकता। मैं फिर भी निपट नीच ऐसा आचरण करता हूं कि आपको दुख पहुंचे। देखो किसी भी प्राणी में हमारे प्रभु विराजमान यदि हम किसी से ईर्ष्या करते हैं, द्वेष करते हैं, किसी को दुखद वचन बोलते हैं, दुखद चेष्टा करते हैं। हम अपने प्रभु को ही पीड़ा दे रहे हैं। पर तुम्हारी अमित अपार दया है। दयावश आप हमारे सारे अपराधों को भस्म कर रहे हैं। बड़ी कृपा हुई जो मेरे अपराधों की तरफ ना देखकर आपने मुझे चरण शरण दी।
अब तो प्रभु आपके चरणों की शरण में आने पर आनंद ही आनंद अमृतमय सुधा आनंद छा रहा है। हे नाथ आपके चरणों के आश्रय से अब मेरा हृदय शीतल हो रहा है और प्रेम भास्कर का उदय हो रहा है। यदि आप अपनी तरफ से कृपा ना करते तो यह नहीं हो सकता था। हमें जो प्रभु ने कृपा पूर्वक सौभाग्य दिया है, इसे हमें अपमानित नहीं करना चाहिए। हम अपने प्रभु की कृपा का अपमान करते हैं, अवहेलना करते हैं। कितनी हमारी छोटी धरा है। जरा सी प्रतिकूलता हुई तो प्रभु को कोसने लगते हैं। और जरा सी अनुकूलता हुई तो अहंकार बढ़कर के सिर माथे बोलने लगता है।
मैंने ये किया इसलिए ऐसेसे ऐसा हुआ। अरे आप क्या समझते हैं? जीवन भर भजन ही करते रहे। अभिमान चढ़कर के बोलता है और जरा सा प्रतिकूलता हो गई तो प्रभु को कोसने लगते हैं। क्या आप इतना नहीं कर सकते थे? अज्ञानी जो अहित होने वाली बात है वो प्रभु कैसे कर दे? जैसे अंधा कुएं में गिरने जा रहा हो तो कोई नेत्र वाला गिरने नहीं देगा। ऐसे ही परम सौहार्द से भरे हुए प्रभु वही विधान करते हैं जिससे हमारा परम मंगल हो। भगवान आदेश कर रहे हैं। प्रयत्न पूर्वक भजन करो। यह भजन तभी आपके अनुभव में आएगा जब आपके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे।
तब तक आपको बिना स्वाद के बिना रुचि के जपना होगा। हमारी रुचि भजन में नहीं होगी। पहले सुन लीजिए। हमें भजन का स्वाद नहीं मिलेगा। समझ लीजिए। तब तक जब तक हमारे पाप और पाप की प्रवृत्ति का नाश नहीं हो जाएगा। इसलिए हमें निरंतर प्रयत्न पूर्वक बिना सुख बिना स्वाद के भजन करना है। अभी प्रारंभ में आपको जिद्दी स्वभाव बनाना पड़ेगा। सहनशील स्वभाव बनाना पड़ेगा। आज्ञा पालन मात्र यह आपको लक्ष्य में स्थित कर देगा। नहीं मुझे भजन करना है बस सुख मिले दुख मिले सद्गति मिले दुर्गति मिले इसकी मुझे कोई परवाह नहीं है प्रयत्नादत प्रयत्न पूर्वक तत्परता पूर्वक दिन प्रतिदिन भजन बढ़ना चाहिए सजगता बढ़नी चाहिए सावधानी बढ़नी चाहिए संशुद्ध किलविष संपूर्ण अंतःकरण के दोष नष्ट हो जाते हैं अब प्रभु की प्राप्ति की ऐसी लगन भीतर लगती है कि जो भोग संग्रह मान बढ़ाई आदि की इच्छाएं थी वो सब भस्म हो गई।
अगर भोग संग्रह मान बढ़ाई की इच्छा है तो अभी भगवत प्राप्ति की लगन नहीं लगी। अभी पीछे जो आपने चर्चाएं सुनी महाभागवत जनों की खास बात उसमें थी। उनके हृदय में भगवत प्राप्ति की बात आई। नहीं पहुंच पाए। भगवत प्राप्ति की बात है। कहीं अटक गए तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी। समय जरूर लगेगा। उनका लक्ष्य भगवत प्राप्ति है। खास बात जिनकी चर्चाएं सुनी। लक्ष्य भगवत प्राप्ति है। मान बढ़ाई नहीं है। लोक परलोक नहीं है। लक्ष्य भगवत प्राप्ति है। उपासक लक्ष्य को दृढ़। हमारा लक्ष्य भगवत प्राप्ति है।
अगर लक्ष्य ठीक है तो बीच में फिसल गए या रुकावट हो गई तो आपको रुकने नहीं दिया जाएगा। आगे ही बढ़ा दिया जाएगा। जैसा पीछे आपने श्रवण किया। हमें अपने मार्ग में जो भजन मार्ग है प्रतििक्षण विश्वास पूर्वक चलना है। उत्साह पूर्वक बोले कुछ अनुभव में तो नहीं आ रहा है ना। कह दिया ना जब तक आपके पाप और पाप प्रवृत्ति नष्ट नहीं होगी तब तक अनुभव नहीं होगा। अंतःकरण शुद्ध होने पर अनुभव होता है। ये अध्यात्म है। ये तुरंत थोड़ा है कि अभी बोला और अभी सब कुछ अनुभव होने लगे।
जनम जनम मुनि जतन करा। भगवान कह रहे अनेक जन्म संसतो यात परम गति बहुत जन्मों की साधना से तब स्थिति प्राप्त हुई है। आप सब एक जन्म से थोड़ी लगे ये बड़ी कृपा है। ये जो आप सौभाग्य प्राप्त करें पता नहीं कितने जन्मों से साधनाएं प्रारंभ में करते करते ऐसे आए। कई जगह बात पड़ी है कि किसी जन्म में इतने भगवान की भक्ति फिर किसी और भगवान की ऐसे करते करते फिर ब्रज के ठाकुर की भक्ति फिर निकुंज ऐसा वो क्रम बाय क्रम ऐसा और यह सब इसी जन्म में हो सकता है भगवत प्रेमी महात्मा की कृपा हो जाए तो इसी जन्म में तो हम ये मान लेते कि हमारे जन्म अनेक हो चुके अब मुझे अनेक जन्मों वाली लाइन में नहीं खड़े होना अब इसी जन्म में भगवत प्राप्ति करनी है इसके लिए हमें प्रयासरत रहना है।
हमें अनुभव में नहीं आ रहा लेकिन हम राधा राधा बोल रहे हैं। हमारे भाव नहीं है। हमें सुख नहीं मिल रहा। पर जिनका नाम ले रहे हैं वो तो सुन रहे ना कि हम पुकार रहे हैं। वो तो सुन रहे ना। प्रज्ञा चक्षु एक महात्मा बिहारी जी के दर्शन करने रोज आते थे। तो किसी ने उनसे कहा कि आपको तो बाहर से कुछ दिखाई नहीं देता। आंखें तो आप क्या दर्शन करते हैं? बोले हमारी आंखें नहीं तो बिहारी जी की आंखें नहीं क्या? हम रोज उनको दर्शन देने आते हैं। हम नहीं देख पाते तो वह तो हमें देख रहे हैं ना।
दो में कोई प्रेमी में एक ही देख ले तो काम हो जाता है। वो रोज हमें देखते हैं ना हो गया। हम उनको अपने दर्शन देने आते हैं या हम भी हैं। आपके चरण सेवकों में आंख से अंधे थे पर ज्ञान में परम प्रवीण थे। वो सामने रोज नियम से दर्शन करने आते तो किसी ने विनोद में पूछ दिया कि स्वामी जी आपके तो नेत्र है नहीं आप रोज दर्शन करने आते हैं तो क्या दर्शन करते हैं हमारे नेत्र नहीं तो बिहारी जी के भी नेत्र नहीं है क्या उनके तो नेत्र हैं उनको दर्शन देने आते हैं रोज देखो कि तुम्हारा भी कोई एक है तुम देखो हमें रोज हमें ऐसे ही हमारे भाव नहीं है हमारे प्रेम नहीं लेकिन प्रियाजु तो प्रेम समुद्र है ना तो उन्हीं को तो पुकार रहे हैं राधा राधा राधा राधा कभी भनक पड़ेगी कान कभी देख लेंगे कि कोई मुझे पुकार रहा है बस उसी दिन हम निहाल हो जाएंगे हमें पुकारना बंद नहीं करना नाम जप करना मंत्र जप करना मानो प्रतििश्वास हम उनको पुकार रहे हैं और वो बहुत करुणा समुद्र है बहुत जल्दी काम बन जाएगा बस हमको उनकी करुणा पर विश्वास करके ततो याति पराम गतिम वो परम गति को निश्चित प्राप्त हो जाता है जिसको परम परम गति कहते हैं वो अनुभव गम्य है।
जिसके प्राप्त होने के बाद कुछ भी प्राप्त करना नहीं रहता। जिस लाभ के बाद कोई भी लाभ नहीं बचता। सब कुछ वो परम गति वो परम लाभ उसे प्राप्त हो जाता है। भयंकर से भयंकर दुख ज्वाला भी उसके हृदय में ताप नहीं पहुंचा सकती। वो परम लाभ उसे प्राप्त हो जाता है। श्री भगवान कहते हैं तपसभ्यो अधिको योगी ज्ञानभ्यो पमतो कर्मभधो योगी तस्मा योगी भर्जुन श्री भगवान कहते हे अर्जुन तपस्व अधिक योगी तप तपस्वियों से भी श्रेष्ठ है योगी ज्ञानीभ्य मतोधिक ज्ञानियों से भी योगी श्रेष्ठ है ऐसा मेरा मत है भगवान कह रहे कर्मभ कर्मभ्य चाधिको योगी और कर्म कांड में परम प्रवीण कर्मठों से भी श्रेष्ठ है योगी तस्मात योगी भव्जुन हे अर्जुन तुम योगी बनो योगी नाम सर्वे मदगतेत्मना श्रद्धावान भजते यो माम सम युक्त तमो मत अब प्रभु कह रहे संपूर्ण योगियों में भी जो श्रद्धावान भक्त मुझ में तल्लीन होकर मेरा भजन करता है, वह मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी है।
भगवान के मत में जब सर्वश्रेष्ठ है तो सारे मत इन्हीं से निकले हैं। प्रभु से प्रभु कह रहे हैं तपस्विियों से भी अधिक ज्ञानियों से भी अधिक और कर्मकांडियों से भी अधिक जो कर्म में प्रवीण है शास्त्र के अनुसार उनसे भी श्रेष्ठ है योगी तो प्रश्न होता है कि योगी कौन सा तो बोले जितने भी भगवत मार्ग में चलने वाले सिद्धांत हैं ज्ञान कर्म योगा जितने भी उन समस्त योगियों में योग नाम मदते श्रद्धा भजते योम सा युक्त तमोता भगवत मार्ग में चलने वाले साधन सिद्धांतों का सार बात भगवान बता रहे हैं कि संपूर्ण योगियों में सर्वश्रेष्ठ योगी मेरे मत में कौन है?
बोले जो श्रद्धा पूर्वक मुझ में तल्लीन हुआ तन्मया अंदर से नाम चल रहा है उसी को देख रहा है उसी को सुन रहा है बस एकमात्र प्रभु के स्मरण में तल्लीन ऐसा होता है ये प्रारंभ में नहीं होता है जब आप अभ्यास रत रहोगे हृदय निष्पाप होगा तो ऐसी स्थिति होती बिना किसी प्रयास के सब ठप हो गया सब ठप मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार सब एकदम बिल्कुल जैसे घड़ी से सेल हटा लो सब जाओ जहां बस ढोल बज रहा है। सब हाहाकार आवाजें सब कुछ नहीं। बस वही चल रहा है। सामने वही छाया हुआ है। वो ये साधन का फल मिल रहा है।
अब ये साधन ये साधन नहीं होगा। यह साधन का फल प्रकट हो रहा है। अचानक ऐसी स्थिति एक सेकंड, दो सेकंड, एक मिनट, एक घंटा, एक दिन एक यह कृपा बढ़ती चली जाएगी। वैसे बात करते करते अब उसमें तुम्हारी सामर्थ्य नहीं। वो तुम्हारे प्रयत्न से नहीं हुआ। तुमने प्रयत्न किया कृपा ने डुबो दी। इसे कहते हैं डूबना। कोई पद चल रहा है, पंक्ति आई एकदम झक छोड़ दिया और बस रूप प्रकाशित और डूब गया। ऐसा महा सुख आगे मिलता है उपासक को फिर वो छोड़ नहीं पाता। तल्लीनता ये शब्द बड़ा जोरदार है।
तन्मया स्मृति खत्म अन्य केवल आराध्य देव। अब ऐसा आप सोच भी नहीं सकते कि ऐसा कैसे हो सकता है। सब शांतित चिंतन शून्य बुद्धि निश्चय शून्य मन संकल्प विकल्प शून्य अहम क्रिया शून्य पूरा अंतःकरण बस केवल मंत्राकार या नामाकार या रूपाकार अब ये स्थिति कितने सेकंड कितने मिनट कितना समय अधिक से अधिक ये कृपा से होता है। जैसा आपने अभ्यास किया भजन का उसी के अनुसार स्थिति आती। लड़खड़ा गया। आंख खुली है या बंद है? एकदम शांत एकदम शांत। कोई हलचल नहीं। किसी भी तरह की कोई अन्य तरंग नहीं।
अन्य कोई विक्षेप मल विक्षेप आवरण तीनों नष्ट हो गए। एकदम वो एक रस आनंद एक बार यदि मिलेगा आपको तो ललचा जाओगे। छोड़ नहीं पाओगे। फिर इसी की खोज थी। इसी की खोज थी। सोचो सब कुछ करते हो लेकिन विश्राम आपको नींद में मिलता है क्योंकि आप संसार का चिंतन उस समय छूट जाता है और आप चार पांच घंटे तमोगुण की स्थिति में नींद में होते हैं तब आपको अच्छा लगता है अगर आपको नींद ना आए तो आप विचलित हो जाएंगे क्योंकि आपके चिंतन के तार बंद नहीं होंगे आप परेशान हो जाएंगे और अगर जागते हुए कहीं आपकी ऐसी स्थिति हो हो गई कि कहीं भी संसार का चिंतन नहीं हो रहा।
सोचो उसको कितना परमानंद होगा। आप तमोगुण नींद में जब संसार का चिंतन छूट जाता है तो आप कितने अपने को विश्राम स्थिति में मानते हैं और कहीं जागृत में ऐसी स्थिति हो कि आप जाग रहे पर बिल्कुल संसार का चिंतन नहीं हो रहा। जैसे गाढ़ सुशुप्ति ऐसे गाढ़ स्थिति अपने आराध्य देव में तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि उस समय उपासक को कैसा आनंद होता है। ये तमोगुणी तो मिथ्या है जिसमें आप इतने रिलैक्स हो जाते हैं कि सुबह फिर पूरी चेतना से आप अपने कार्यरत हो जाते हैं। सोचो अगर यह हमारी इंद्रियां ये हमारा मन जिस सुख की खोज जन्म जन्मांतर से करता रहा है।
वह सुख जागृत अवस्था में उसे ऐसी गाढ़ स्थिति में ला दे कि उसको कुछ सुनाई नहीं दे रहा, दिखाई नहीं दे रहा। जैसे नींद में पड़ा हुआ और गाढ़ चिंतन में यद्यपि वो जग रहा है पर बाहर की प्राकृतिक सारी चेष्टाएं शून्य है और वो सच्चिदानंद यही तो आओ समाधि भीतर स्वामी जी कह रहे आओ समाधि चित्त को हेतु मत भगाओ अगले जन्म की व्यवस्था मत करो कर्म करके आ जाओ समाधि में आ जाओ तल्लीनता योग नाम सर्वे मदगते नाना श्रद्धा भजते योम साम युक्त तमो मता पूज्य श्री राधा बाबा कह रहे भाई जब आपने यह निश्चय कर लिया कि मुझे वृंदावन वास करके प्रिया प्रीतम की प्राप्ति करनी है तो तेरा निश्चय अमोग क्यों नहीं हुआ?
दृढ़ क्यों नहीं हुआ? तेरी रसना राधा नाम के सिवा और क्यों बोलने लगी? इसको काटने की इच्छा क्यों नहीं हुई? तो इसको डांटा क्यों नहीं अपनी रस इंद्री को जिसमें वाक इंद्री भी विराजमान है। हे राधा नाम के सिवा प्रिया प्रीतम के जस के सिवा कुछ बोल रही हो। तुमने निश्चय किया था वृंदावन वास करके प्रिया प्रीतम का ही जस गाऊंगा। प्रिया प्रीतम की प्राप्ति करूंगा। नयन यदि उनकी छवि के सिवा और कुछ देखना चाहते तो क्या फायदा ऐसे नेत्रों का वृंदावन में रखना? श्रवण इंद्री यदि प्रियाजू के सुयस में आसक्त नहीं हुई अन्य बातें सुनने की इच्छा करती है तो फोड़ डालने योग्य है।
ऐसी श्रवण इंद्री यह बात हरिवंश महाप्रभु कह रहे हैं पूज्य राधा रसना कटो जो अन रटो निरखन फुटो नैन श्रवण फूटो जो अन सुनो बिनु राधा जस बहन आपने निश्चय किया कि वृंदावन वास करके प्रिया प्रीतम की प्राप्ति करेंगे तो आपको सही उपाय हरिवंश महाप्रभु बता रहे सब सो हित निष्का काम मति वृंदावन विश्राम श्री राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान मुख नाम सब में अपने प्रभु का भाव करके सबको सुख पहुंचाने की भावना में किसी से किसी भी तरह की कोई स्वार्थ बुद्धि नहीं और हमारी विश्राम स्थली श्री वृंदावन धाम है वृंदावन की प्रेम भूमि हमारी विश्राम स्थली है और हृदय में श्री जुगल रूप राधा वल्लभ लाल के रूप का ध्यान और मुख में उनका नाम बोलो।
इससे बढ़कर प्रिया प्रीतम की प्राप्ति का क्या उपाय हो सकता है? इसीलिए हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि दिन रात श्री राधा वल्लभ लाल के मुख कमल को भावना में देखो। देखो ऐसा कैसा विलक्षण कुंज है जिसके चारों तरफ अशोक कदंब कचनार बहुत सुंदर सुंदर सुगंधित पुष्प वाले कुसुमित वृक्ष लताएं हैं। सुंदर सुंदर गुच्छे फूलों की कुंज स्थली की शोभा बढ़ा रहे हैं। कैसे कैसे वृंदावन के रंग रंगीले छबीले ये पक्षी हैं। नित्य निकुंजेश्वरी श्री लाडली जी का दर्शन पाकर यह उत्कंठा पूर्वक उनका नाम गुणगान करते रहते हैं।
कैसी सुंदर मनोहारी वृंदावन की भूमि है जहां मयूर नाचनाच करके हर्षित हो रहे हैं। कोकिला कुहू कु करके वृंदावन में अपनी स्वर गुजा रही है। ऐसे सुखद कुंज में गलवहिया दिए हुए युगल सरकार बाहर निकल रहे हैं। और यह तुम्हें दिखाई दे निकस कुंज ठाड़े भए भुजा परस्परश राधा वल्लभ मुख कमल निरख नयन हरिवंश इसके लिए वृंदावन गए हो। आपको बुरा लग सकता है पर आपसे हम यह कह रहे हैं कि वृंदावन जाकर जो आपको करना चाहिए वह आप नहीं कर पा रहे हैं। वृंदावन बिहारी के महल में रहकर भी वृंदावन बिहारी को नहीं देख पा रहे हैं।
आपको जागरण स्वप्न सभी समय अधिकांश वृंदावन में संसार दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि जैसा जीवन आपका होना चाहिए वैसा नहीं है। इसलिए वृंदावन में निकस कुंज ठाड़े भय भुजा परस्पर अंश यह ना दिखाई देकर संसार दिखाई दे रहा है। पूज्य श्री राधा बाबा जब तक आप पूर्ण दृढ़ता पूर्वक ऐसा नहीं चाहेंगे तब तक किसी का आशीर्वाद आपको ऐसा दर्शन नहीं करा सकता। कोई अन्य उपाय जीवन को ऐसा स्थिति प्रदान कर दे असंभव चाहे नाक दबाओ चाहे पद्मासन में बैठो सर केवल खड़े हो जल में खड़े हो कोई तपस्या करो यह बात बननी केवल इसी में सब सो हित निष्काम मति वृंदावन विश्राम राधा वल्लभ लाल को हृदय ध्यान मुख नाम यह भजन आपको करना होगा आपको प्रमाद करोगे आज कर लो चाहे कल कर लो चाहे मृत्यु के बाद अगले जन्म में कर लो चाहे हजार जन्म के बाद कर लेना करना आपको ही पड़ेगा विषय त्याग करके भजन और भजन से प्रिया प्रीतम के प्रेम की प्राप्ति भजन बिना नहीं प्रेम छिनहु भजन न छाड़िए धरिए या ध्रुनेम भजन न होई संग बिन भजन बिना नहीं प्रेम प्रेम और बिना प्रेम की इस जोड़ी का साक्षात्कार नहीं हो सकता।
मानव जन्म पाकर यदि कल के लिए भजन को छोड़ते हैं तो बहुत बड़ी मूढ़ता करते हैं। सावधान। अनेक जन्मों के गर्भवास का कष्ट, अनेक जन्मों में मृत्यु का भयानक कष्ट, बुढ़ापे का कष्ट, रोगों का कष्ट सब भोगते आए हो। अब क्यों पुनः भोगना चाहते हो? तुम असंभव को भी संभव कर सकते हो। नाम जप करके मिटा दो इस काल चक्र को, जन्म मरण को, दुख शोक को, अशांति को भजन से मिटा दो। यह भजन से ही मिटेगा। यह तुम प्रमाद कर रहे हो। इसीलिए आपको हमारे वचन कठोर लग रहे होंगे। पर तुम प्रमाद कर रहे हो।
इसलिए वृंदावन में रहते हुए तुम्हें निकस कुंज ठाड़े भय यह नहीं दर्शन हो रहा। हमारी बात मान लो। कान से केवल प्रिया प्रीतम की चर्चा सुनने का स्वभाव बनाओ। दूसरी बात हो तो कान में उंगली डाल लो। मत सुनो। ऐसा करते हैं क्या आप? जहां किसी की निंदा हुई तो पूरे कान खुले कर लेते हैं। किसी की अवहेलना, किसी का उपहास, किसी के दोष भरी बात ये वृंदावन आए हैं हम प्रिया प्रीतम की प्राप्ति के लिए। कहां है? बहुत सावधान। बहुत जल्दी हमारा हृदय आंगन गंदा होता है इन खिड़कियों के खुले रहने से।
कान, आंख और जबान तीन का बड़ा योगदान है भगवत प्राप्ति में। पूज्य श्री राधा बाबा कह रहे हैं कान से प्रिया प्रीतम की चर्चा के सिवाय कुछ भी नहीं सुनना। दूसरी कोई बात होने लगे तो कान में अंगुली डाल लो। नहीं सुनना। यही तो कहेगा बहुत नाटकी है। कान में उंगली। अच्छा है। संसार रूपी नाटक में यदि हमें प्रिया प्रीतम के अनुराग करने के लिए यह नाटक करना पड़े तो हमें कोई बात नहीं। ऐसे नहीं सुनना तुम्हारी बात। हमें गुरुजनों के रसिक महापुरुषों के पास तुम्हारा प्रपंच बैठे रहो।
तुम अपनी बात सुनना है। आंखों से प्रिया प्रीतम के प्रेम बढ़ाने वाली ही वस्तुओं का व्यक्तियों का श्री विग्रह का दर्शन करें। अन्यथा आंखें झुका के रखें। वृंदावन धाम है यह तो वैष्णव संत जनों का जिनसे हमें भगवत स्मृति हो प्रभु के श्री विग्रह का गुरुजनों का अन्यथा नेत्र झुके रहने चाहिए। थोड़ा पर्दा पड़ा रहना चाहिए। हर समय आंख रूपी खिड़की खुली नहीं रहनी चाहिए। इसमें अलौकिक कैमरा लगा हुआ है। जैसे सीसी कैमरा हमें पता भी नहीं चलता कि हमारी फोटो खींच रही क्या वो तो पूरा वीडियो बन रहा है।
ऐसे ये पूरा वीडियो बना लेता है और एकांत में चिंतन कराता है। अगर सही हुआ तो भजन बढ़ता है। गलत हुआ तो फिर भ्रष्टता आती है। वाणी से सिर्फ राधावल्लभ राधा वल्लभ की पुकार लगी रहे। व्यर्थ की कोई बात करने की इच्छा हो मौन हो जाओ। जबरदस्ती मौन हो जाओ। नहीं बोलना दांत पीस के बैठ जाओ नहीं बोले नहीं बोलना प्रयत्न इसे कहते हैं प्रयत्नशील आप प्रयत्नशील है आप सच्ची मानिए आपका जीवन बदल जाएगा वृंदावन के किसी भी कोने में खड़े हुए तुम बिहारी जी को देख लोगे केवल मंदिर में ही नहीं है बिहारी जी यह उनका घर है कहीं भी गलबिया दिए युगल सरकार आपको दिखाई देंगे की विहरण कर रहे हैं।
संपूर्ण वृंदावन मंदिर है प्रभु का। जैसे हम मानते हैं कि यह मंदिर है। ऐसे पूरा वृंदावन मंदिर है। पूरा महल है। कहीं भी किसी भी जगह हो उनका घर है। यह ऐसा किया तो निश्चित निश्चय आप वृंदावन बिहारी को अर्पित हो जाएंगे। आपकी जीवन की ऐसी रहनी निश्चय ही प्रिया प्रीतम को विवश कर देगी दर्शन देने के लिए। आप उनके दर्शन पाकर कृत कृत हो जाएंगे। प्रभु की आप पर अतिशय महती कृपा है कि आपका पांच भौतिक शरीर श्री धाम वृंदावन में रह रहा है। ओो पर आप अपने ऊपर और कृपा कर लीजिए कि मन में भी धाम बसा लीजिए।
शरीर पंच भौतिक तो रह ही रहा है। मन को भी धाम में बसा लीजिए। यह भिक्षा मांगो श्री किशोरी जी से कि हे महारानी जी अनंत असीम अनुराग की धारा आपके श्री चरणों से प्रवाहित होती रहती है। आप ऐसी कृपा कर दो कि मेरा मन आपके चिंतन के सिवा और कहीं ना जाए। बिसरी हो ना बिसारी हो यही दान मोहे देव श्री हरिवंश की लाडली मोहे अपनी कर लियो। आप देखना महारानी जो बहुत कृपालु हैं। आपकी हृदय धारा राधा के सन्मुख हो जाएगी। धारा राधा हृदय धारा राधा के सन्मुख हो जाएगी। प्रेम में डूब जाएगी।
अनुराग का स्रोत खुल जाएगा। और यह स्रोत कभी फिर बंद नहीं होता। बढ़ता ही रहता है। आपको श्री धाम और अपने में अब भेद नहीं रखना। यह बाबा अंतिम साधक की परिणति का आप धाम में हो गए हैं। आप अपने में और धाम में वेद का तात्पर्य अब आप धाममय हो गए हैं। शरीर धाम में, मन धाम में, बुद्धि धाम में, प्राण धाम में तभी तो यह स्थिति आती कि खंड खंड होए जाए तन अंग अंग सत टूक वृंदावन ने छाड़ीबो छाड़ीबो है बड़ी चूक धाममय हो गया। निश्चय आप महा भाग्यवान बन गए हैं। आपको एक दिवस वो मिलेगा जिसमें आप देख पाएंगे प्रिया प्रीतम कैसे यहां सुख बरसा रहे हैं।
बस अपने मन को अपनी वाणी को नेत्रों को श्रवण इंद्री को भगवान आदेश कर रहे हैं। प्रयत्न पूर्वक भजन में लगाइए। सबसे बड़ा उपयोगी वही है। तपस्विियों से भी, ज्ञानियों से भी, कर्मियों से भी। कौन जो श्रद्धा पूर्वक निरंतर प्रभु का भजन करता रहता है। श्यामा श्याम श्यामा श्याम श्यामा श्याम प्रभु स्वयं श्री मुख से कह रहे हैं श्रद्धावान भजते माम श्यामे युक्त तमो मता मेरे मत में इससे बड़ा कोई योगी नहीं अब और कुछ नहीं ढूंढना शास्त्रों में कुछ नहीं जानना बहुत बढ़िया बात मिल गई तपस्वी अधिको योगी जगतगुरु भगवान बोल रहे हैं तपस्वियों से भी अधिक योगी श्रेष्ठ ज्ञानभ्य मतोधिक कहा मेरे मत में ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ योगी कर्मचाधिक योगी कर्मकांडियों से भी श्रेष्ठ योगी तस्मात योगी भव अर्जुन हे अर्जुन इसलिए तुम योगी हो जाओ कैसे योगी बोले योगी नाम सर्वे मदतेत्मना श्रद्धा भजते योमा सा युक्त तमोता मेरे मत में सब योगियों में श्रेष्ठ योगी वही है जो श्रद्धा पूर्वक तल्लीन होकर निरंतर मेरे भजन में लगा रहता है।
सब शास्त्रों का सार यही है। यही है विश्राम भूमि। हृदय की यही है विश्राम भूमि। हर समय प्रभु से जुड़े रहना। प्रभु के नाम रूप लीला धाम हर समय प्रभु में जुड़े रहना यही जीवन की सार्थकता है।
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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