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सच्ची भक्ति और निष्ठा का रहस्य – दुःखों का अंत निश्चित ! // 03/03/2026

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वृंदावनेश्वरी तव पदा प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हद्यपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वापय परम शीतल माशयाम निर्वापय परम शीतल माशयाम। परम सच्चिदानंद घन प्रेमानंद स्वरूप नवनि निकुंज महामहिम परम पावन श्री वृंदावन धाम श्री वृंदावन धाम के लाडलेले युगल चंद्र प्राणाराध्य श्री श्यामा श्याम समस्त हित परिककर निज परिकर यह मन इतना महत्व देता है भोगों का भोग सामग्रियों का शरीर संबंधियों का कि यह मानने ही नहीं देता कि श्री भगवान मेरे हैं।

उनको प्राप्त करना हमें मानव जी का परम कर्तव्य दिया गया है। अगर यह छूट गया तो फिर 83 लाख 999 योनियों में भटकना है। भगवत प्राप्ति नहीं है। जब हम अहेतु की कृपा श्री हरि की इस मार्ग का परिचय पाते हैं, चलते हैं तो अचानक माया कहीं भारी प्रतिकूलता दे देती है। कहीं अनुकूलता दे देती है। अनुकूलता दे देती है तो फिसल गए। आराध्य देव पहले नंबर पर नहीं रहे। वह दूसरे नंबर पर आ गए। धन राशि भोग सामग्री प्राकृतिक वैभव यह प्रथम नंबर पर हो गया। चूक हो गई। फिर गया साधक।

बहुत सावधानी की बात कह रहे हैं। यह बहुत फिसलने वाला मन है। इसको जब समझाओ कि तुम्हें क्यों चाहिए? क्या सुख ढूंढ लिया आज तक इसमें बहुत वैभव हो जाए संपत्ति हो जाए रुपया हो जाए तो क्या तेरे को शांति मिल जाएगी परमानंद मिल जाएगा तेरा आवागमन छूट जाएगा तेरी दुख चिंता मिट जाएगी तो विवेक से जब विचार आ जाए तो संपूर्ण त्रिभुवन की सामग्री मिलने पर भी शोक चिंता भय है मृत्यु इससे छुटकारा नहीं मिल सकता। एकमात्र सच्चिदानंद प्रभु की प्राप्ति ही है। बड़े तर्क वितर्क बुद्धि में जितना ज्ञान वो सब इस असत को सिद्ध करने में लगा दिया जाता है।

ध्यान देने की बात है। देह देह के भोग देह की पद प्रतिष्ठा संपत्ति वैभव इसको सत सिद्ध करने के लिए सारा ज्ञान सारा बुद्धि बल लगा देते हैं। जबकि इस अविद्या को नष्ट करने के लिए ज्ञान होता है। अविद्या का बढ़ावा दे रहे हैं और हम भगवत मार्ग के पथिक बने तो कैसा आनंद का कैसे अनुभव होगा? श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज कह रहे हैं ईश्मर कृष्ण सारकम श्री राधा प्रेम वांडावधम वृंदावनम गोचर मनषम श खेलनम कुरते हे भाई तुमको बहुत सार बात मैं बता रहा हूं। ये ज्ञान सिद्ध महापुरुष हैं।

वाराणसी के वेदांत दर्शन के प्रकांड ज्ञाता सुनने में आता है इनके 60 हजार शिष्य थे। बहुत से सन्यासी ब्रह्म बोध संपन्न थे। जब प्रेम रस का किनका मिला तब इनको समझ में यह आया कि वह सुख तो थुतकी कृत है। वृंदावन की प्रिया प्रीतम की सेवा सुख के सामने। कह रहे मैं सार बात बता रहा हूं और कोई सार बात पकड़ना नहीं चाहता। असार में ही भटकना चाहता है। भगवान स्वयं कह रहे हैं ना सतो विद्यते भाव ना भाव विद्यते सता इस असत की सत्ता नहीं है। चाहे जितने अरबों का तुम बना लो महल चाहे जितने खरब बैंक में जमा कर लो एक स्वप्न है।

जब शरीर छूटेगा तो कुछ नहीं। सब कोई जानता है। तो कह रहे स्मर कृष्ण सार मेकम एकमात्र सार वस्तु तो श्री कृष्ण है। वही स्मरण करने योग्य है। पर वो श्री कृष्ण श्री राधा के बंधन में बंधे हुए हैं। भगवान का एक नाम है प्रेमाधीन। और श्री राधा किशोरी कौन है? श्री कृष्ण के हृदय का मूर्तिमान प्रेम। तो जहां किंचित प्रेम आ जाता है तो भगवान कहीं रथ आकते नजर आते हैं। कहीं चरण चापते नजर आते हैं। कभी क्या-क्या सेवा जो सोच भी नहीं सकते सरकार अपने जनों को ऐसा दुलार करते हैं।

फिर वही प्रेम समुद्र प्रिया जो राधा किशोरी जाके अधीन सदा ही सांवरो या ब्रज को सिर ताज बोले यह एकमात्र जो राधा के आबद्ध है अधीन है लालन तेरे ही आीन यद्यपि वेद पुराण शास्त्र इनहीं का प्रताप वर्णन है लेकिन इनके हृदय हदय का जो आल्हाद है, प्रेम है, उसका गढ़ परिचय किसी निज जनों को प्रभु देते हैं। उनहीं निज जनों में अपने लोगों का नाम आ गया है। अहेतु की कृपा से जब धाम मिला, रसिक मिले, रज रानी मिली और महारानी की ठसक से यह बोलने का सौभाग्य मिला कि हमारे माई श्यामा को राज अब हमें दुर्लभ नहीं है।

श्री कृष्ण सार वस्तु और श्री कृष्ण तत्व का सार राधा तत्व इसी वृंदावन धाम ये युगल प्रेम रस प्रदान करता है। युगल प्रेम रस यहां धारा बहती है। परशत पुलिन सुलिन गिरा करसत चित सुरघोर हर्षत हित नित नवल रस बरसत जुगल किशोर यहां वर्षा हो रही प्रेम की पर हम लोग भी नहीं पा रहे क्योंकि अहंकार की छतुरी है। वासनाओं से तनी हुई है। जब तक ये टूटेगी नहीं तब तक इस वर्षा में भेजेंगे नहीं। ऊंचे त्याग की बात जाने दो। प्रेम में तो सर्वस्व का त्याग है। पर हम देखें अपने सामने तुच्छ से तुच्छ वस्तु का भी त्याग नहीं कर पाते।

एक तरफ रुपया 100 अरब लो। एक तरफ प्रभु फिसल जाओगे। ये महापुरुषों के अनुभव की बात है। एक तरफ तुम्हारे हृदय में काम वेदना है। भोगो भोगो बिल्कुल फ्री भोगो कोई भय नहीं माया कहती है हम तुम्हारी सुरक्षा करेंगे भोगो फिसल गए रुक गया मार्ग यदि तुम फिसलना रोक पाओ किससे रुकेगा गुरु के वचनों पर महत्व रखने से बस इतनी बात समझ लो गुरु के वचनों पर महत्व जिसका प्रकाशित हो गया उसके पैर डगमगा नहीं सकते। जे गुरु चरण रेन सिर धरह ते जन सकल विभव बस कर समस्त वैभव उसके अधीन होगा।

वह वैभव के अधीन नहीं होगा। जीवन निर्वाह के लिए भगवान कभी किसी की कमी नहीं रखते। जिसमें तुम्हारे प्राणों का पोषण हो। पानी, ऑक्सीजन, पृथ्वी, आकाश और कहीं ना कहीं अन्न भगवान सबको देते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] कर्मु आवश्यकता की पूर्ति जैसे आप कर्म कर रहे हो वो करुणा करके कर्मों का जो फल है बहुत संभाल के दे रहे हैं। एकदम टूट पड़े धज्जियां उड़ जाए। ऐसे ऐसे पाप कर्म किए हैं। वो बहुत संभाल संभाल के दे रहे हैं। सह रहे हैं। अब हमारे अंदर जो वासना पहुंचती है कि हमें इतनी की आवश्यकता है अब उसके लिए तुम्हें अपने कर्म मिटारने पड़ेंगे।

जो भाग्य में लिखे हुए हैं। उनको मिटना पड़ेगा। नवीन भाग्य की रचना करनी पड़ेगी। उसके लिए आपको निरंतर नाम रटना पड़ेगा। भगवत आश्रित नाम रटन करने वाला ही अपने भाग्य का परिवर्तन कर देता है। पर यहां चर्चा हो रही प्रेमी की। हम वृंदावन वासी क्यों नहीं भेजते युगल सरकार के प्रेम रस में? बोले आप सच्ची मान लीजिए। आपके हृदय में अभी युगल सरकार का महत्व नहीं जागा है। जिस दिन आपके हृदय में महत्व जगेगा युगल सरकार का तो सब तुच्छ लगेगा। अभी बहुत धोखा है। छोटी-छोटी वस्तुएं हमारे श्यामा श्याम का विस्मरण करा देती तो महात्व किसका बना?

उस वस्तु का प्रिया प्रीतम दूसरे नंबर पर वो वस्तु बनी। हम लोग प्रभु की महिमा नहीं जानते हैं। बात करते हैं भगवत साक्षात्कार की। पर उसे हम एक व्यवहार जैसा समझते हैं। महापुरुषों को अगर कहीं तुम देख पाओ तो उनके जीवन की एक विलक्षण दशा होती है। उसका वर्णन करना असंभव है। आप थोड़ा विचारें कि आपके पास कोई बहुत बड़ा पदाधिकारी इस लोक का या मान लो देवराज इंद्रा है। आपसे हाथ मिलावे आपको कैसा लगेगा और कह दे कभी तुम चिंता मत करो सोचोगे सो हम तुम्हें प्रदान कर देंगे देवराज या यहां का फोन करना हम बात आप एक ठसक में हो जाएंगे कि हमारा बहुत बड़ा पावर है देवराज जिनके शूद्र किंकर है जैसे कुबेर किंकर है ऐसे सब लोकपाल ब्रह्मा भी जिनके सेवक हैं वह श्री हरि हैं और वह अपनी वाणी ये स्वयं भगवान की वाणी गीता जी है कह रहे योगक्षेम भाम्यम तुम्हें विश्वास नहीं हुआ तुम्हारा हृदय प्रफुल्लित नहीं हुआ तुम्हारी छाती चौड़ी नहीं हुई दक्ष प्रजापति भगवान शिव को श्राप देते हैं पहले चरण छू के कन्यादान किया और फिर जब प्रजापति पद पर बैठे तो भगवान शिव को श्राप दे डाला।

यह पद, यह प्रतिष्ठा, यह वैभव बहुत दूर भगवान से कर देते हैं। सच्ची मानिए, हृदय की बात मानिए। यह माया का वह प्रलोभन होता है जो साधक समझ ही नहीं पाता है कि यह मुझे गिराने के लिए पासा फेंका जा रहा है। हम कितना कितना लाखों अरब मिल जाए तुम क्या करोगे? बोले निर्माण करवाएंगे। ऐसे निर्माण पड़े हैं अरबों रुपए के जिनका कोई सदुपयोग नहीं हो रहा। गंगा किनारे हमने भ्रमण में देखा है। कोई नहीं जानता किसने निर्माण कराया। जब एक रात्रि वहां रुके लगा कितना वैभव लगा होगा पैसा इसमें और उस आश्रम में केवल शाम के आरती गांव के करने आते तो ताला लगा के चले जाते हे सब व्यर्थ है।

प्रभु के सामने किसी का महत्व जब नहीं रहेगा तो तुम्हारी ये बात सच्ची मानी जाएगी कि तुम भगवत साक्षात्कार करना चाहते हो। इसको बैठा लिए। बहुत फिशलू मन है। हमने इसको देखा है। हमें प्रभु के सिवा कुछ नहीं चाहिए। ठीक है? कोई भी विषय, कोई भी संपत्ति, कोई भी अगर उसमें तुम्हें हर्ष हुआ तुम्हारे मन के अंदर, सुखद लगा केवल बोल रहे थे प्रभु के सिवा मेरा कोई नहीं। हर्षित क्यों हो गए? नहीं। ये पूरी सृष्टि तुम्हारी है। क्योंकि सृष्टि के मालिक के तुम दास हो। पूरी सृष्टि है।

एक दो कोने में क्या होगा? अनंत ब्रह्मांड तुम्हारे हैं क्योंकि उस स्वामी के हैं। तुम अनंत ब्रह्मांड के दास हो। कभी यह गर्व होता है? नहीं यह कमरा, यह मकान, ये इतनी जगह मेरी भगवत साक्षात्कार बाधित वृत्ति है। यह चिंतनीय महापुरुषों की बात कह रहे हैं। जिन्होंने चिंतन किया है। ऐसा विद्या का खेल है। निकले थे हरि को रिझाने को और रिझाने में लग गए विषय पुरुषों को। यह भषधारी हरि के उरशालय बहुत ध्यान से इसको सुनना जीवन में बस ये बात ध्यान रखो हमारा लक्ष्य प्रिया प्रीतम है संपूर्ण ये इतना वैभव नहीं संपूर्ण वैभव अनंत ब्रह्मांडों का मेरे मालिक का है।

मेरे बाप का है। मेरे स्वामी का है। एक कोने में अधिकार मत मान लेना। फस जाओगे। एक वस्तु में अधिकार मत मान लेना। सर्वम खलम ब्रह सब कुछ बेचारे कोई बड़ा आपसे जब यह कह के जाएगा कि मैं आपका हूं आप कभी अपने को अलग मत मानना जब आपको जरूरत हो तब आप हमें बता देना सबसे बड़े बोल रहे हैं अखिल कोटि ब्रह्मांड नायक ममवा सो तू काहे को किसी के और की तरफ देख रहा है तू मेरा अंश है शब मम प्रिय शमम उपजय तू मेरा बच्चा है मेरा प्यारा है लाडला है आजा मेरी तरफ आजा सनुख हो जा सनुख होते ही तेरे करोड़ों जन्मों के अपराध माफ कर दूंगा सनुख हो जीव मोह जब जन्म कोटि य नाश तब हम उनकी बात कर रहे हैं जिनके एक भकुट के इशारे से पलक झपकते झपकते अनंत ब्रह्मांडों का सृजन हो जाता है।

ऐसा कोई त्रिगुण में नहीं हरि के सिवा, प्रभु के सिवा वो तुम्हारे मन की जानते हैं। वो तुम्हारे पास इतने नजदीक है कि जहां से वाणी प्रकट होती परा पश्यती मध्यमा वैरी ये वैकरी वाणी जो सुन रहे हो जो अंदर परा उसके पहले ही वो देख रहे हैं सुन रहे हैं। इतने प्यारे नजदीक हैं वो। तुम एकांत कमरे में उसको पुकारो जो लौकी का पदाधिकारी कह के गया हम आपके हैं। पता नहीं सुन पावे कि ना सुन पावे पता नहीं आवे कि ना पता नहीं उसकी सामर्थ है कि नहीं हमारी जो दुख विपत्ति उसे दूर करें लेकिन ये तीनों बातें प्रभु में शव है कहीं भी बिना बोले वो सुन लेंगे अंदर की बात जहां भी हो वही वो पहुंच जाएंगे और करतुम अकर्तम अन्यथा करतुम सर्व समर्थ है उनसे बढ़कर कोई तुम्हारे दुख दूर करने वाला नहीं रत्ती भर महत्व हमारे प्रभु का तुम्हारे हृदय में प्रकट हो जाए तो जैसे कहते हैं ना दिव्यता दिव्यता आ जाए रति भर महत्व देखो माया की चाहल को देखो चल रहे हैं भगवत मार्ग में लेकिन लुभा रहे हैं उसके लुभाने फेंके हुए दानों पे अंतर की बात को देखना भगवत मार्ग के पथिक को ब्रह्मादिक के भो विषम लागत ताई नारायण ब्रज चंद की लगन लगी है जाई अपने बहुत बड़े के होने जा रहे हैं और छोटी छोटी वस्तु छोटी-छोटी धन राशि छोटी-छोटे मान सम्मान बड़ा विचारणीय विषय है उपासक सावधान पहले किसी सभा में जब कोई महापुरुष पधारता तो उस सभा में अहो भाग्य और धन्य भाग कहा जाता था बदल रही है बुद्धि कड़वा लगेगा।

बदल रही है बुद्धि। चक्रवर्ती सम्राट भी जहां घुटने टेक कर उनकी चरणज माथे पर लेकर और धर्म पूर्वक शासन करने की क्षमता प्राप्त करते हैं। आज भी जो धर्मात्मा जन है संतों का लेकिन अपने हृदय में ना पारमेष्ठ ना महेंद्रम फिर ये क्या फिर कैसे ये कैसे नहीं हरि के सिवा नहीं हरि भाव से किसी का भी आदर हरि के आंतरिक को बहुत देख रहे हैं सर्वज्ञ हैं हरि भाव से देखो किसी का भी आदर करो पशु का भी स्वान का भी भगवान प्रसन्न हो जाएंगे प्रभु के भाव से रहित नहीं भगवत रसिक जी ने कहा है भूत भविष्य लोक 14 में भय होए हरि प्यारे तिन तिनसो व्यवहार हमारो अभिमान ते न्यारे तो क्या महत्व प्रभु का है आपके हृदय में आप भगवत साक्षात्कार करना चाहते हैं अगर महत्व आ गया है तो अभी छाती फूल जाएगी कि त्रिभुवन में मेरे जैसा भाग्यशाली कोई नहीं मुझे गुरु कृपा से प्रिया लाल का दासत्व मिला है।

ऐसा इससे बड़ा कोई पद है जैसे एक बार कह थे हरिदासत्व से बड़ा कोई पद है? हां जो बड़ा होता है वो झुकता है। वो नम्र रहता है। अभिमान नहीं करता। यह जो गर्व है यह शुद्ध ब्रह्म गर्व है। अस अभिमान गोस्वामी जी कह रहे हैं जा जन भोरे मैं सेवक रघुपति पति मोरे ये अभिमान कभी भूले ना हम कि सियाराम हमारे स्वामी मैं उनका सेवक ये शुद्ध भगवत स्वरूप है। जिस समय आपके हृदय में यह बात बैठ जाएगी कि मैं प्रभु का सेवक हूं। इतने बड़े हमारे प्रभु हैं तो अशांति दुख माया तुम्हारी छाया को भी नहीं छू सकती।

शब्द सुनो। अशांति दुख माया ये तुम्हारी छाया को भी नहीं छू सकती। अतुलनी आनंद से आप ऐसे उन्मत्त होने लगेंगे बिना साधना के। ये अनुभवी महापुरुष के वचन है। अन्य कोई साधना नहीं। भगवत आश्रय नाम जप और ये ठसाक हमारे प्रिया लाल इसके बीच में कोई ना आना चाहिए बस यह ना वस्तु ना व्यक्ति ना पद ना प्रतिष्ठा कुछ नहीं कुछ नहीं दूसरो ना कोई नान आन सु काज ये बहुत कठिन पड़ता है ना आन सु काज यही हम फिसल जाते हैं जब आपके अंदर ऐसा ऐसा भाव आएगा तो भगवत दर्शन के पहले आप ऐसे महापुरुष के दर्शन पाएंगे जिनके नेत्रों में प्रियालाल समाए होते हैं।

जिनके तुम नेत्र देख रहे हो वो अभी-अभी प्रियालाल से रूप स्वाद पाकर के बात करके तुम्हारी तरफ देख रहे हैं। जिस तुम शरीर को देख रहे हो अभी-अभी प्रियालाल ने उनका आलिंगन किया है। जिस महापुरुष को तुम वार्ता कर रहे हो प्रियालाल उनसे वार्ता की है तब योग्यता उनके दर्शन की आती है पर हमारी इस बात पर महता और विश्वास तुम्हारा नहीं बैठेगा क्योंकि तुम्हें पांच भौतिक ढांचा दिखेगा क्योंकि तुम्हारे मन में कूट कूट करके माया ने केवल संशय और विषय भर दिए विश्वास की कमी है।

हम लोग देखें अपना मन एकदम गंदा है। इसलिए जब किसी पर विशेष कृपा होती है तो महापुरुषों का सानिध्य मिलता है, दर्शन मिलता है। कितना भी मलिन हो उसे भगवत साक्षात्कार निश्चित हो जाएगा। एक पावन चरित्र है श्री भक्त गोपाल चरवाहे का। वह अपने ही उत्तर प्रदेश के ही थे। पहले ऐसा हुआ करता था कि सबकी गाय जैसे चराए तो सब लोग अन्ना आदि जो है उसके घर भिजवा देते थे और गाय छोड़ देते थे। वो ग्वाला ही कहा जाता था। सैकड़ों लोगों की गाय चराता था और उसके घर में अन्ना आदि जो आवश्यक सामग्री है भिजवा दी जाती थी।

ना तो एक अक्षर वह पढ़ा लिखा था और ना कभी उसने भगवान का नाम या कोई चर्चा सुनी थी। उसके कोई परमार्थ से संबंध ही नहीं था। बस गाय चराते थे। जंगल में रहते थे। पत्नी भोजन पहुंचा देती थी और परिवार चलाने के लिए गांव के लोग दे देते थे अन्न क्योंकि सबकी [गला साफ़ करने की आवाज़] गाय चराते थे। ना तो उसको किसी धर्म का ज्ञान था ना किसी साधना का ज्ञान था। एक दिन देखा जंगल से एक मंडली जा रही संतों के ओ श्री राम जय राम जय जय राम श्री राम जय राम ऐसे कीर्तन संत जन पहले मंडली बना के चलते थे तो नाम कीर्तन पद कीर्तन ऐसे उसको बड़ा आनंद आया उसको लगा कि इतने झूमझूम कर संत जन गा रहे हैं किसी से बात नहीं की पकड़ [गला साफ़ करने की आवाज़] लिया अब पूरा तो नहीं बस उतना राम राम राम राम ऐसे करने लगा देखो कई बार कहा है यदि आप बिना गुरु मंत्र के भी नाम जप करेंगे तो नाम जप आपको गुरु तक पहुंचा देगा क्योंकि गुरु प्रदत्त नाम भगवत साक्षात्कार कराता है उसको सूखी रोटी खाने को मिलती थी गांव के लोग अन्न दे देते थे कोई विविध व्यंजन थोड़ी उसको मिलते थे पर उसमें एक महान सद्गुण था संतों पर श्रद्धा इस श्रद्धा ने पकड़ा दिया नाम राम राम राम नीच जाति सुपचहु भलो जपत निरंतर नाम ऊंचो कुल के काम को जान हरि को नामो पचत गरिया जिभ्या वर्तते नाम त्यम वो स्वपच धन्य है जिसकी जिभ्या पर हरि नाम विराजमान है 50 वर्ष की अवस्था लगभग हो गई थी।

कभी कोई तीर्थ याटन, धर्म, कार्य, शास्त्र, स्वाध्याय, सत्संग कुछ नहीं। देखो कृपा, विश्वास। अब वो अलौकिक ढंग से नाम में मिठास लगने लगी उसको। तो जोर जोर से कभी कभी नाच पढ़ता चरवाहा है ना गाता तो और जो लोग थे उसका उपहास करते तुम्हारे लिए विमान आ रहा है नाम जप बहुत उपहासी लोग होते हैं तुम्हारे लिए बीमार अरे नरक में भी ठोर नहीं मिलेगी जिंदगी में कुछ पुण्य नहीं किया ये ऐसे लोग बहुत उपहास करने वाले ऐसे करने से क्या मिलेगा नाम से कुछ हो जाएगा वो सीधा साधा आदमी उसने कहा हमने तो कभी सोचा ही नहीं कि कुछ होगा।

हम तो ऐसे ही गा रहे हैं। पर यह लोग उपहास कर रहे हैं। क्या गलत है क्या ऐसा गाना? जब तक दृढ़ ज्ञान नहीं होता तब तक माया फिसला सकती है। उसने कहा कि हम किसी लाभ के लिए बैकुंठ जाने के लिए या कोई लाभ के लिए नहीं जबते हमें तो अच्छा लगा। वो गा रहे थे संत जन तो हम गाने लगे हैं। क्या सही में आप लोग समझते हैं कि यह गलत है? उन्होंने कहा तुम मूर्ख हो। तुम्हारी क्या समझ में आए? और उपहास करते उसका। उसके मन में एक बात आई कोई एक प्रमाण दे दे मुझे कि ये जो मैं संतों के मुख से सुना नाम ये परम सत्य है।

ये परम सुखकारी है। और इससे क्या बैकुंठ मिल जाएगा? कोई तो मिले मुझे। और जब किसी के हृदय में ऐसी आकांक्षा होती है तो वही मिल जाते हैं जो सबके हृदय की जानते हैं। एक दिन उसने देखा जब लोग दिल्ली की हंसी मजाक कर रहे थे उसी समय एक लंगोटी पहने हुए हाथ में कमंडल और दंड धारण किए हुए कोई वीतराग परमहंस जा दौड़ा चरणों में गिर गया। महाराज महाराज बस एक बात आप बता दीजिए जो हम राम राम कह रहे हैं यह लोग उपहास करते हैं। क्या इससे हमारा कल्याण हो जाएगा? यह लोग कहते कुछ नहीं इससे होगा।

वैसे तो हमारे अंदर कोई इच्छा ही नहीं थी। पर इन लोगों ने जनाया कि इससे कल्याण होता है। बैकुंठ मिलता है। तो कह रहे थे क्या तुम्हारा कल्याण हो जाएगा? क्या बैकुंठ मिल जाएगा? तो उन्होंने कहा बेटा यह बहुत मंगलमय भगवान का नाम है। पर हमें लगता है कि तुम्हें गुरुदेव की आवश्यकता है। यदि तुम गुरु कृपा पात्र बन जाओ तो इन उपहास करने वालों की बातें तुम्हारे मन में नहीं लगेंग और निश्चित तुम्हें भगवत साक्षात्कार हो जाएगा। तो पैर पकड़ लिया और कहा महाराज आप ही गुरु बन जाओ ना हमारे आप ही हमें मंत्र दे दो।

तो उन्होंने कहा हम तो तीर्थ यात्रा में हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] ऐसा हम नहीं कर सकते। पर यदि तुम भगवान से प्रार्थना करोगे तो तुम्हारे कल्याण के लिए सद्गुरु प्राप्त हो जाएगा। इसलिए जैसे कोई पूछते हैं किसको सद्गुरु बनाऊं? तो हम कहते किसी को नहीं। पहले भगवान को मानो श्री हरि को जगतगुरु श्री कृष्ण को। फिर उनसे प्रार्थना करो कि यदि आप आवश्यक समझते हो कि सद्गुरु के रूप में आप आकर के हमारा कल्याण करेंगे तो मुझे पहुंचा दो या आप स्वयं आ जाओ। मैं नहीं खोज कर पाऊंगा।

मेरी वो दृष्टि नहीं है कि मैं किसी महापुरुष को पहचान सकूं। मैं तुमसे सत्य कहता हूं। सद्गुरु की जो शरण में हो गया तो उसके जीवन नौका की डांड सद्गुरु अपने हाथ में ले लेते हैं। फिर उसको कोई भय, कोई उपहास, कोई लज्जा नहीं सताती। वो सुख पूर्वक इस दुखद अपार संसार समुद्र से पार हो जाता है। पर बेटा तेरे ऊपर भगवान की बड़ी कृपा है। क्योंकि तू संतों को मानता है। तू मेरी बात पर विश्वास कर ले। अंदर से तू एकांत में रो। तुझे सद्गुरु मिल जाएंगे। अब ऐसा कहकर वो अपने राह में चले तीर्थ यात्रा के लिए।

अब वो खोजता एकांत में बैठकर देखता कभी-कभी वो पेड़ पर चढ़ जाता कि कोई संत तो नहीं आ रहे हैं। अब उसके लिए वहां भोजन पहुंच जाता पाता गाय देखता और बस खोज करता कि सद्गुरु आ जाए। सद्गुरु आ जाए। बहुत समय व्यतीत हुआ पर उसका विश्वास नहीं टूटा कि संत ने कहा था कि तुम भावना करो कि सद्गुरु आ जाएंगे भगवान सद्गुरु बनकर के आ गए वही है सद्गुरु बंधु गुरु पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि पर वो ऐसे मायाधीश है कि प्रगट में पहचान नहीं होने देते जब अंतर्ध्य हो जाता तब वो जीवनी पड़ते फिर अरे वो इतने महापुरुष ऐसे प्रकट में नहीं होने देते।

प्रगट में ऐसे ही माया का पर्दा पड़ा रहता है। देखा सामने से बड़े तेजस्वी महात्मा बड़े तीव्र गति से आ रहे हैं। वो दौड़ा गुरुदेव गुरुदेव चरणों में लौट गया। चरणों में जे गिरा तो एक बिजली सी दौड़ी उसके हृदय में। अब बात बन गई। गुरु मिल गए। उखड़े हो गए। देखते ही सात्विक भाव उत्पन्न हो रहा है। आंसू निकलने लगे। देखते ही मन में आया कि जो संत कह रहे थे सद्गुरु मिल जाएंगे। यही हमारे सद्गुरु हैं। हृदय में उत्साह बहुत आनंद मानो उसको परम पद मिल गया हो। जैसे विशाल वट वृक्ष की छाया में बैठने वाले पथिक को कोई श्रम सता नहीं सकता।

ऐसे गुरु चरणों में रहने वाले को कोई विक्षेप परास्त नहीं कर सकता। अपने लोग समझ नहीं पाते। बड़ा सरल हृदय चरणों में पड़ा हुआ है। जहां पर जे कर सत्य स्नेह सोते मिले न कछु संदेह उठाया क्या बात है भगवान जानकर भी जो लीला करते हैं वैसे ही स्वांग जैसा स्वांग वैसे ही वार्ता क्या बात है क्यों तुम इतनी श्रद्धा दिखा रहे हो अश्रु बहा रहे हो गुरुदेव बस एक क्षण रुक जाओ जाना नहीं दौड़ के गया और गाय धुई पात्र तो थे ही ला के गुरुदेव के हाथ में दिया फिर चरणों में ले आप इसको पहले पान करो उसका भोलापन उसका समर्पण दुग्ध पान किया ऐसा समर्पण अहंकार में नहीं होने पाता मैं विद्वान हूं मैं गुणी हूं मैं।

इसीलिए हम लोगों को बहुत समय लगता है। दौड़ने में थक जा फिर आत्मसमर्पण कर देना। आतुर आवाज प्रभु गुरु मंत्र दे दो। जो दूध पी चुके ना चरणों को नहीं छोड़ रहा है। प्रभु मुझे गुरु मंत्र दे दो। संत ने कहा था सद्गुरु गुरु मंत्र दे देंगे तो भगवान मिल जाएंगे। मुझे भवसागर से पार करने वाला गुरु मंत्र दे दो। गुरुदेव ने दुग्ध पान करके देखो आज तक कभी कहीं देखा गया तो भाव प्रधान देखा गया है चाहे वो भगवान हो या भक्त हो जहां पदार्थ प्रधान है वस्तु प्रधान है वहां भाव नहीं होता और वहां फिर वो भगवत सेवा नहीं मानी जाती वो शुभ कर्म माना जाता है और जहां भाव प्रधान होता है वहां भगवत सेवा मानी जाती है।

[गला साफ़ करने की आवाज़] भाववश भगवान जगह जगह भाव की महिमा कही गई। मेरा उद्धार करो गुरुदेव मैं आपके चरण आश्रित हूं। मंत्र दे दो। सच्चा शिष्य वही है जो अहम को समर्पित कर देता है। देखा अहम शून्य एकदम मन बुद्धि चित्त अहम भोलापन एकदम सरल रीत जाते हैं महापुरुष। भाई तू उठकर तो बैठ पैर छोड़ ऐसे थोड़ी दीक्षा दी जाती कि गली चलते दी जाए दूंगा जा पहले स्नान करके आ तेरा शरीर लगता है महीनों से तूने नहाया नहीं है फिर एकांत स्थान में बैठेंगे फिर तेरे को उपदेश देंगे बोला महाराज मैं जंगली आदमी हूं गाय चराता हूं हमारा घर बार से कोई आना जाना नहीं यही भोजन आ जाता है हां स्नान कहते हो कि स्नान के बाद तो अभी हम सरोवर से कराते हैं पर घर नहीं चलना एकांत नहीं किसी पेड़ के नीचे दे दो मुझे वर्षों हो गए घर नहीं गया गांव की गाय चराया करता हूं गुरुदेव प्रेम के बंधन में बंधे हुए हैं सच्ची मानिए तुम उनका त्याग कर सकते हो कभी तुम्हारा त्याग नहीं कर सकते क्योंकि तुम्हारे हृदय की मोह भरी वृत्ति है तो तुम नहीं जान पाओगे यह एक बार स्वीकार कर ले तो यह छोड़ना नहीं जानते।

तुम्हार सेवक असुरारी स्वार्थ रहित जग जुग उपकारी संत ने कहा अच्छा स्नान कर स्नान करके आए एक पेड़ के नीचे भाई मैं तुझे कुछ नियम दूंगा कुछ शर्त तो महाराज गवार आदमी है ना हम आपका कोई नियम पालन कर पाएंगे ना कोई व्रत पालन कर पाएंगे ना कोई साधना कर पाएंगे आप देख लो हमारी हालत 50 साल का हूं। पढ़ा लिखा बिल्कुल नहीं। कोई धर्म कर्म नहीं जानता। गाय चराता हूं। अच्छा समझ रहे हैं क्या करें? सर्वधर्म परित्यज मामेकम शरणम बड़े चतुर शिरोमणि हैं। गोपी जनों से क्या कहते हैं?

अच्छा तुम वृंदावन की शोभा देखने आई हो। हां हां वो तो देख ली ना। अच्छा मुझे देखने हां त्रिभुवन में कौन ऐसा है जो मेरे रूप को ना देखना चाहे? हां बंसीनाथ का आकर्षण ऐसा वो सब हो गया। अब आप जाओ अपने पतियों की सेवा करो। ऐसा क्या उत्तर दिया था गोपियों ने? हम समझ रहे हैं। हम समझ रहे हैं। सबकी आत्मा आप हो और आपने मेरा मन चुरा लिया। अब हमको कहते जाओ बिना मन के कैसे जाए? अभी आपके सामने प्राण निकल जाएंगे। अगर आप जाने की बात कहे। रास में प्रवेश। सीधे रास प्रवेश।

गुरुदेव क्या है? कुछ नियम है, कुछ शर्त है, कुछ प्रतिज्ञाएं करनी पड़ेगी तुमको। और गुरुदेव हम आपको सही कहते हैं। पढ़े लिखे हम है नहीं। कोई प्रतिज्ञा, कोई नियम, कोई धर्म कर्म कभी हमसे हुआ ही नहीं। गुरुदेव बस आप मंत्र दे दो। हमारा उद्धार कर दो। मैं गवार आदमी हूं। मुझसे बहुत बातें नहीं सधेंग। अगर एक कोई बात बता दो तो प्रण करता हूं। जिंदगी में प्राण त्याग सकता हूं। पर एक बात कोई एक नियम कोई दे दो। हमें बहुत नियम तो नहीं समझ में आएंगे। एक कोई बात बता दो कि ऐसा कर लेना और मंत्र जपना तो हम प्राण त्याग सकते पर आपकी आज्ञा उल्लंघन पर बहुत हम बातें नहीं मान पाएंगे क्योंकि हमारे इतना ज्ञान नहीं है।

गोपाल के वचन सुनकर के बहुत प्रसन्न हुए संत भगवान बैठ गए। ध्यानस्थ होते हुए और उसको अपने कमंडल से जल लेकर के छिड़का। देखो यह समर्पण जे ही जल का छींटा पड़ा तेही बुद्धि जैसे सोई हुई थी प्रकाशित हो गई देव कृपा कर बुद्धि प्रकाश जैसे ध्रुव जी भगवान को जब देखा कि गरुणध्वज भगवान श्री हरि कृपा कर दर्शन देने आए तो लगा कुछ स्तुति करूं भगवान का स्तवन करूं पर कुछ आता नहीं था तो भगवान ने पांच जन्म शंख से स्पर्श जे ही स्पर्श कराया वेद ध्वनि ऐसे गुरुदेव ने जे ही कमंडल का जल छिड़का बुद्धि प्रकाशित हो गई एक नियम तुझे देता हूं हमारे आराध्य देव श्री कृष्ण है गोविंद हैं।

आज से तुम्हारे आराध्य देव गोविंद हुए। हां श्री कृष्ण है बिना उनको पवाए तुम्हें पाना नहीं है। बस यही तुम्हारे लिए नियम है। तुम्हारे पास जो आवे सूखी रोटी दूध चाच जो भी बिना उनको पवाए पाना नहीं है। सीधा सरल आदमी गुरुदेव प्राण चाहे चले जाए बिना उनको पवाया आज के बाद कभी जिभ्या पर कुछ नहीं जाएगा। ऐसा गुरुजन आदेश करते हैं वैष्णव मार्ग के पथिकों को कि जल भी बिना अर्पित किए मत पियो। अगर आप बिना अर्पित किए पीते हैं तो आपकी बुद्धि में इष्ट देव के प्रति ममत्व नहीं आ पाएगा।

नहीं आ पाएगा। उसने कहा कि जो आप नियम बताए कि पवा के पाना दर्शन हो जाएंगे गुरुदेव पक्का हो जाएगा बस बस वो चरणों में लौट गया देखो एक संत दर्शन ने भगवत साक्षात्कार का पूरा विधान बना दिया गुरुदेव ने कहा बेटा अब तुम समझ सकते हो जो हम बोलेंगे क्योंकि तुम्हारी बुद्धि प्रकाशित मेरा प्रभु गोविंद घट घट में विराजमान मान है। यह सारा विश्व मेरा कृष्णमय है। यही सार बात है। तू सच्चे मन से जहां भी भोग लगाएगा घट घट व्यापी श्री कृष्ण वहां से स्वीकार कर लेंगे। और बताएं श्री कृष्ण बहुत सुंदर है।

गुरुदेव वर्णन करने लगे। उनके शरीर का श्री अंग का जो रंग है वह अद्भुत सांवला है। कोई कहते हैं कृष्ण काले काले थोड़ी है कृष्ण ऐसे सांवरे हैं कि गोरी प्रिया जी चकोरी की भांति देखती रहते हैं। बड़े-बड़े मुनि जनों के मन को मोहित करने वाले कोटि कंदर्पों को मूर्छित कर दे मुस्कान मात्र से ऐसे सांवरे हैं। सौंदर्य माधुर्य निधि है प्रभु और उनके नेत्र से की करुणा बरसती रहती है। वो बड़ी गंभीरता से सुना है। मानो की पहचान बता रहे हैं गुरुदेव की जो भगवान भोग पाएंगे आके वो ऐसे होंगे वही हमारे भगवान होंगे।

प्रफुल्लित कमल सदस्य कमनी जैसे नील कमल की पंखुड़िया ऐसे चमकते हुए कपोल अमृत की वर्षा करती हुई उनकी वाणी गोपाल एक बार जिसको दर्शन हो गए उसको फिर कभी त्रिभुवन में कोई भी आकर्षित नहीं कर सकता और कोई दुख छू भी नहीं सकता और उनके होठ तो ऐसे अरुण वर्ण के है पूछो मत। मुख पर मधुर मधुर गान करती हुई मुरली विराजमान है और बड़ा ही तेजस्वी पीत वर्ण का पीतांबर धारण करते हैं। कट में मनोहर मेखला है। नपुर श्री चरणों में विराजमान है। गोपाल एक बार जो इनके रूप को देख ले वो तन मन धन सब भूल के इन्हीं का हो जाता है।

फिर उसे ना तो कोई और चर्चा सुनाई देती है, ना कोई दृश्य अच्छा लगता है, ना कोई पद अच्छा लगता है। पर देख मंत्र उच्चारण मत करना किसी के सामने। मंत्र जो बताया वह मंत्र और जो ठाकुर बताए वो ये अब आज से तू ऐसी आराधना कर। कोई भी बिना भोग लगाए प्रसाद मत पाना। भोग लगा के ही पाना। देख ऐसा करना अगर तू नहीं भूला तो बहुत जल्दी गोविंद आ जाएंगे तेरे पास। अब वो यह तो कभी पद्धति ही नहीं देखी थी कि पर्दा लगाया भोग रख दिया फिर पर्दा हटाया आचमन किया भोग उठा लिया। वो तो गोविंद को पवाना कहा गुरुदेव ने।

भोले भाले जनों का बहुत जल्दी भगवान से मिलन हो जाता है। अपने लोग छली कपटी बहुत चतुर बनते हैं ना तो चतुर शिरोमणि हरि लंबी डगर दे देते दौड़ दौड़ और जो सीधे होते हैं सरल होते हैं ना वो खुद आ जाते हैं कि ये तो बहुत भोला है महात्मा का चरणोदक लिया महात्मा ने कहा जब कभी तुम स्मरण करोगे हम आ जाएंगे तुम्हें जब कभी कोई प्रश्न हो तब बताना और वो चले गए अब तो गोपाल नाच पड़ा कि गुरु मिल गए गुरु मंत्र मिल गए और इष्ट का पहचान मिल गई। उसी समय घर से भोजन आया कोई कभी चटनी रोटी ऐसे ही बैठा एकांत वृक्ष के नीचे आओ गोविंद भोग पाओ।

एक बात यहां ध्यान रखना है। बहुत जन्मों के हमारे पाप हैं। बहुत बड़े-बड़े पाप हैं। जो हमारी अनंत काल तक दुर्गति करते हैं। यदि हमें भगवत साक्षात्कार होना है और कुछ थोड़ा कष्ट मिल जाता है और भगवान मिल जाते हैं तो सस्ता बहुत सौदा है। बहुत सस्ता सौदा है। हम ये जो टीका टिप्पणी करते हैं कि भगवान ने हमें दुख क्यों दिया? आप नहीं जानते दुख देने वाले तो इतने कर्म जमा थे कि अगर वो मिलते तो होश उड़ जाते तुम भोग भोग के नहीं काट पाते उन्होंने कृपा करके विधान किया है प्राय ऐसा देखा गया है कि जिन महापुरुषों का अंतिम जन्म भगवान की कृपा से बड़े-बड़े कष्ट उनके शरीरों में ऐसे ऐसे ऐसे जल्दी जल्दी जल्दी वो निमित्त मात्र भोगवा करके अपनी प्राप्ति करा लेते हैं।

अब देखो भगवान ही तो गुरु रूप से थे। अब गोपाल विचार में लगा कि आ तो रहे हैं ही नहीं। और गुरु जी ने कहा बिना पवाए पाना नहीं। पूरा दिन व्यतीत हो गया। गुरु जी कह रहे थे घट घट में विराजमान भगवान है तो कहीं से भी प्रकट हो सकते हैं। तो अंदर मंत्र जपता कहता आओ भगवान पाव आके नहीं आए। महाराज हमारे गुरुदेव ने आपका ध्यान जो बताया था वैसे ही आओ आप पाओ आकर के रात्रि हो गई देखा प्रभु नहीं आए तो भोजन उठाया गाय को पवा दिया तो बहुत सी गाय थी भूखा रह गया दूसरे दिन फिर भोजन आया एक पत्ता टोरा जल से छिड़का पत्ते पर और भोजन रखा भगवान को फिर पुकारा आओ प्रभु गुरुदेव ने आज्ञा की बिना आपको पवाए हम अपनी जबान में नहीं रख सकते।

शाम हो गई रात्रि हो गई फिर गौ को दे दिया नहीं पाया। अब एक तो 50 वर्ष की अवस्था और गौओं के पीछे दौड़ना और भोजन पाना नहीं शरीर में सामर्थ्य धीरे-धीरे कम होने लगी। तीसरा दिन, चौथा दिन, पांचवा दिन, छठा दिन, सातवा दिन, दीनानाथ प्राण चाहे निकल जाए हम गुरु की आज्ञा नहीं तोड़ सकते। अगर आप नहीं आएंगे तो भूखों मर जाऊंगा। पर हम यह बात देखो। यह बात चरवाहा है। कोई साधना पूर्व की नहीं। गौ सेवा के प्रताप से उससे संतों में प्रीति हो गई। नाम की कृपा से गुरु गुरु की कृपा से नामी की प्राप्ति की चाप ऐसे कई दिन व्यतीत होते गए।

उसकी पत्नी [गला साफ़ करने की आवाज़] ने देखा कि अस्ति मात्र होए रहे शरीरा। पूछते कि क्या बात है? भोजन तो हम रोज लाते हैं। आप रोज लेते हैं। क्या पाते नहीं? आपका विषय नहीं। शिक्षा मिलती है। यहां अपने गुरु उपदिष्ट साधन को किसी से बताना नहीं चाहिए। गुरु उपदिष्ट साधन जब तक सिद्धावस्था ना पहुंच जाए तब तक गुप्त रखा जाता है। जो जैसे आप सत्संग सुन रहे हो इसमें कोई वचन आपको लगा पकड़ लिया। अब वो जीवन में तभी बोलना जब उसका प्रभाव हमारे जीवन में आ जाए। नहीं ऐसे नहीं बोलना नहीं तो निकल जाएगा।

और अगर रोक लिया तो मंथन करेगा अंदर और आपको उसमें स्थित कर देगा। एक भी शब्द नहीं बताया कि हमारी गुरु दीक्षा हो गई। गुरु जी ने कहा था पवा के पाना और इतने दिन हो गए भगवान तो आ नहीं रहे इसीलिए हम पा नहीं रहे तो हमारी ये दशा है। देखो आज का समय ऐसा है कि प्रकट में सब इंद्रियों के पोषण की व्यवस्थाएं भगवान दी। चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो। लेकिन क्या हमारे अंदर निष्ठा है ऐसी? शबरी जी जब उनके गुरुदेव पधारने लगे तो चरणों में रो के गिरी कि प्रभु इस पूरे विश्व में मुझ अधम को सिर्फ आप ही प्यार करने वाले आप ही ने दुलार करके मुझे रखा नहीं सब जगह ठोकर मिलती कोई भी संत महात्मा हमारी तरफ देखना नहीं चाहते और प्रभु आप जा रहे हो अब कैसे जीवन जानते हो क्या कहा हम तो भजन के प्रभाव से भगवान के धाम जा रहे हैं बेटा भगवान स्वयं चलकर तुम्हारे पास आएंगे।

शबरी जी बहुत वर्षों तक कभी गुरु के वचनों पर अविश्वास नहीं हुआ। कहते थे भगवान आएंगे रोज पावड़े डालती हूं। सोनी लगा के जल छिड़कती हूं। रोज लगता है फसला तो नहीं दिया गुरु जी ने। नहीं गुरु के वचन भगवान आएंगे। शायद ऐसा वर्णन किए शास्त्र हजार वर्ष सोचो जरा और भगवान आए और शबरी को निहाल किया ऐसे वो गुरुदेव ने कहा है भगवान आएंगे जब तक वो ना पाएंगे तब तक हम हमने कहा है कि और उनका उद्देश्य अलग था कहने का कि आप भगवान को भोग लगा के पाइएगा और भजन कीजिएगा तो मंत्र के प्रभाव से तुम्हारे मानस पटल पर भगवान दिखने लगेंगे ऐसा होता पर सीधा आदमी सीधा समझा जब तक भगवान नहीं पाएंगे तब तक हमें नहीं पाना 18 दिन बीत गए कुछ ना खाना ना पीना गोविंद भी देखते हैं बाल भक्त ओम प्रकाश जी महाराज यही अपने चामुंडा के पास से उधर बहुत नाम निष्ठ महात्मा बाल भक्तों में बहुत ही मानो प्रह्लाद जी ही हैं।

जैसे प्रह्लाद जी नाम निष्ठ भगवन निष्ठ घट घट में भगवान को देखने वाले ऐसे श्री ओम प्रकाश जी बाल भक्त बड़े-बड़े महापुरुष गए हरि बाबा उड़िया बाबा सब बस वो यही कहते हैं कि ये श्री कृष्ण का आदेश है। फिर शायद 50 के भी ऊपर दिन गए थे। ऐसे 70 दिन 70 दिन तक उस महापुरुष ने कुछ नहीं खाया। सशरीर अंतर्ध्य हुए आज समाधि उनकी बनी। हे जब महत्व भगवान का जग जाता है तो शरीर का महत्व नहीं। अच्छा प्राणनाथ जब प्राणों का पोषण कर रहे हैं तो अन्न में भी तो प्राणनाथ की ही दी हुई शक्ति है।

तो बिना अन्न के भी उनका पोषण हो रहा है। पर ये भागवती का आदेश से मनमानी करने से नहीं मनमानी करने में फिर मार्ग रुक जाएगा। भगवान आदेश करते हैं अपनी वाणी से युक्तहार विहारस उचित आहार विहार वो तो भगवत आदेश होता है। 18 दिन बीत गए। 19व दिन जब भोजन आया तो पेट की आतें सब सिकुड़ गई थी। वैसे ही 50 वर्ष के थे। आंखें धस गई थी। उठने की ताकत नहीं। पत्नी ने फिर कहा कि आप कुछ तो बताइए कि क्या आपको कोई रोग हो रहा है? आप भोजन नहीं पा रहे। मैं रुक जाऊं यही आपकी सेवा के लिए या आप घर चलिए।

कोई उत्तर नहीं। आप जाइए। हम ठीक हैं। ऐसा फिर धीरे से पत्ता लाए छिड़का भगवान और पाव आ के शाम हो गई फिर गाय को दे दिया। विचार कर लिया कि अब मरना ही है। मुझ जैसे अधम के पास भगवान तो आएंगे नहीं। वो तो भगवान है। पर मैं अपने गुरु के वचन नहीं तोड़ सकता। मर चाहे जाऊं। 27 दिन व्यतीत हो गए। एक कवल भी अन्न नहीं पाया। ना चलने की शक्ति थी, ना पत्ता लाने की शक्ति थी, ना जल छिड़कने की शक्ति थी। जिस पात्र में भोजन लाई थी लेटे ही लेटे खोला और कहा प्रभु मुझे पता है आप इस शरीर से नहीं मिलोगे।

पर आप जान लो मैं अपने गुरु की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करूंगा। यह मतलब जितने महान हुए हैं सब निष्ठावा निष्ठावान हुए हैं। अपने लोग फिसड्डी हैं। जरा सा कोई दुख जरा सा कोई सुख फिसल जाते हैं। प्राण अनंत जन्मों की बिगड़ी 27 दिन क्या होते हैं? क्या होते हैं 27 दिन? अनंत जन्मों का जमा कूड़ा करकट भगवान साफ कर रहे हैं। इस जो तन्मयता गुरु निष्ठा जो प्राण भूख से व्याकुल सब भस्म हो रहे हैं पाप अनंत जन्मों के। नारद जी को क्या कहा था भगवान ने? व्यास जी को अपनी कथा सुनाते हैं कि चार महीने संतों के पात्र मार्जन और जूठन पाने के प्रभाव से मुझे संसार से वैराग्य हो गया और हरि के चरणों में अनुराग हो गया और अकस्मात भगवान ने कृपा की कि मेरी मां को सांप ने काट लिया और पधार गई।

अब तो मैं स्वतंत्र हो गया। घोर जंगल की तरफ बढ़ा और चलते-चलते जहां एक बढ़िया सरोवर विशाल पीपल का वृक्ष स्नान करके जे पीपल के वृक्ष के नीचे बैठा ते ललित माधुर्य में भगवान हमारे ध्यान में अभी मैं ठीक से देख ही नहीं पाया था कि अंतर्ध्य हो गए अब तो भारी विकलता वन में रो रहे हैं तो आकाशवाणी हुई है बालक अध कचरे योगी को मेरा साक्षात्कार प्रकट में नहीं होता इसलिए तू तू खूब भजन कर और शरीर छूटने तक इंतजार कर। अब जब शरीर छूटेगा यह जो मैंने दर्शन दिए यह तेरे को लुभायमान करने के लिए कि तेरी चित्तवृत्ति कहीं और जाए ना अब तू अगला जन्म नारद मेरा पार्षद बनेगा।

ये 27 दिन क्या होते हैं? अनंत जन्म जैसे हम सोचे कि भगवान इतने निर्दयी कैसे हैं? नहीं निर्दय। आत्मा को कुछ फर्क नहीं पड़ता और शरीर ने जो किए हैं जन्म जन्मांतरों के वह निष्ठा के कारण दुख नहीं पहुंचेगा। निष्ठावान को दुख नहीं पहुंचता। वो आपको दिखाई देगा दूर से उसको दुख नहीं पहुंचता। क्योंकि निष्ठा का कवच है। वो कभी कोई भेद नहीं सकता। किसी भी माया के यंत्र में ताकत नहीं कि निष्ठा को भेद सके। उसी को निष्ठा कहते हैं। नहीं भेद पाए। 27वा दिन है। पति की दशा देख के कहा स्वामी अब तो आप कहोगे भी तो मैं नहीं जाऊंगी।

हम आपकी दशा इशारे से कहा आज भर चली जा क्योंकि उसको लग रहा था आज प्राण निकल जाएंगे। आज भर चली जा फिर कल से जैसी तेरी आज चली जा। इशारे से बोलने की भी सामर्थ्य नहीं थी। गोपाल के आंसुओं की धारा चल रही पड़े पड़े धीरे से खुला जो भोग है और अंतस्थल आज बोल भी नहीं पा रहे अंतस्थल से कह रहे प्रभु अब चाहे आके पा लो या लिवा जा के पवा देना देख लो आप आखरी है आके पा लो या लिवा जाना अपने यहां पवा हुआ ना क्योंकि हमारे यहां तो पाए नहीं आप बड़े प्रेम से अंदर से आवाज आई गोपाल सा खुली क्योंकि बोलने की हिम्मत नहीं अंदर से प्रार्थना की थी गोपाल वो अमृतमय गुरुदेव ने कहा था कि उनकी वाणी से अमृत बरसता एकदम आंख खुला देखा वही पीतांबर

वैसे मोर मुकुट वही मुरली वही करधनी वैसे नपुर वैसे ललित त्रिभंगी गुरुदेव ने जैसा वर्णन किया था वैसा ही सुंदर रूप गोपाल के सामने प्रभु मुख मंडल की मनोहरता देखकर निहाल हो गए हे निहाल कर देंगे थोड़ी पीड़ा सहनासी को सहित सहित बाड़े भगति गृह तन गुरु हितगार गृह तन गुरु हितगार हार अपनी कर मा सेवक जी कह रहे हैं देखो गृह तन गुरु हितकार गार हार अपनी कर तन मन प्राण गुरु वचनों पर न्योछावर जो भी सहना पड़े सहूंगा मिल गए प्रभु प्रभु दूर नहीं है प्रिया प्रीतम बहुत कृपालु है मानो करोड़कर करोड़ काम की सौंदर्यता को हे करते हुए प्रभु के लावण्य का प्रकाश हो रहा है।

मनहारणी मुरली जैसे कहा था अधरों में रख वैसे अधों में विराजमान अच्छा खास बात ये ना कोई गाय देख पा रही ना कोई और चरवाहा देख पा रहा है ये भगवान जैसे इस सभा में किसी से बात करें भगवान किसी से मिले तो पास बैठा व्यक्ति भी नहीं देख पाएगा ना जान पाएगा क्योंकि प्राकृतिक इंद्रियां प्राकृतिक शरीर और वो चिदानंदमय वो तो जिसको दर्शन देंगे तो पहले दृष्टि प्रदान करते हैं। भगवान जिससे मिलते हैं पहले दृष्टि प्रदान करते हैं। तो गुरु रूप से दृष्टि प्रदान ये जो अंतर में पुकारा ना वो अंतर्दृष्टि खुल गई सामने देखा इतना सुंदर विश्व मोहिनी भगवान श्री हरि का ललित त्रिभंगी रूप कि गोपाल की आंखें नहीं टिकी इतना सुंदर रूप आंखें भगवान के तेज के आगे बंद हो गई जब बंद हुई तो देखा मानस पटल पर वैसे ही ललित फिर खोला देखा सामने भगवान मुस्कुराए सामर्थ्य प्रदान की देखो अर्जुन के साथी तो खेलते हैं भगवान सखा भाव से रथाक रहे हैं लेकिन भगवान का विराट स्वरूप देखने की सामर्थ अर्जुन में थी क्या दिव्य दृष्टि प्रदान की फिर भी कांप रहे थे अर्जुन जी भगवान की दिव्य दृष्टि संपन्न नेत्रों से उस विराट महिमा को देखकर कांप रहे थे अर्जुन यह तो माधुर्य रूप प्रभु का है।

उसने मानो इशारा किया प्रभु को कि हमारी सामर्थ में मैं सकिल कर आ जाऊं। नजदीक आप आ जाओ। आ गए। अपना माथा प्रभु के चरणों में रखा। आंसुओं से भगवान के चरणों का प्रक्षालन कर रहा है। देखो गांव का गाय चराने वाला गुारा जिसको कोई धर्म कर्म का ज्ञान नहीं, कोई भक्ति का ज्ञान नहीं, कोई शास्त्र का ज्ञान नहीं। भगवान ने फिर उसको उठाया और अपने हृदय से जो हृदय से लगाया हष्ट पुष्ट स्वस्थ सब अंतर बाहर पूर्ण कोई पीड़ा नहीं कोई दुख नहीं बिल्कुल तेजस्वी स्वरूप भगवान की स्पर्श की महान सामर्थ्य है जब बाली ने बहुत मारा ना सुग्रीव को तो कर परसा सुग्रीव शरीरा इस पर सारी पीड़ा गई भगवान अमृत सावी है भगवान दिव्य चिदानंद भाव देने वाले हैं।

अब तो सुर मुनि वांछित प्रभु की छाती से लपटा हुआ है। यह ऐसा ना सोचो कि ये कहानियां है। ऐसा नहीं। यह सत्य विषय आप भी प्राप्त कर सकते हैं। इसी के लिए रोज सत्संग होता है। जब भगवान से लिपट कर छाती में अश्रु की बूंदे तो भगवान ही था माम प्रपद्यते भगवान की अश्र बंदों से गोपाल का अभिषेक हो रहा है। मानो सुदामा मिलन हो रहा है। जैसे भगवान को दैन्य बहुत प्रिय है। तभी [नाक से की जाने वाली आवाज़] भाई जी महाराज कहते हैं पद में कि बुद्धिहीन बना दो। हे भगवान हमें बुद्धिहीन बना दो।

यह जो बहुत बुद्धि चलती है ना इसके लिए दौड़ भाग है। नहीं सीधे प्रभु हमारे हैं। हम प्रभु के हैं। नाम जप आश्रय भगवत प्राप्ति निश्चित। भगवान बोले प्यारे गोपाल अब तू रो मत। देख मैं तेरे प्रेम में पगी हुई है जो सूखी रोटियां है अभी पाता हूं भगवान बैठ गए और उसके घर की जो रोटी थी उसे देखो मुझे त्रिभुवन का कोई भी भोग प्रसन्न नहीं कर सकता गोपाल मुझे त्रिभुवन का कोई भोग प्रसन्न नहीं कर इस बात को समझो जिनको ये भ्रम हो कि हम अधर्म से कमा के छप्पन भोग लगा के प्रभु को प्रसन्न कर लेंगे तो ये बात सुनो कह रहे मुझे मुझे त्रिभुवन का कोई भोग प्रसन्न नहीं कर सकता।

मैं ऐसे ही अन्न की चाह रखता हूं। भगवान के वचन जैसे दुर्योधन का महल का सब वैभव त्याग के स्वागत ठुकरा के और विदुरानी जी के हाथ का छिलका पाया। मैं ऐसे ही अन्न की चाह रखता हूं। भगवान कहते हैं बलिहारी है। कभी प्यार से एकांत में रो के इनको पवाना सीखो। भले आप इतनी कटोरी में सब्जी दो रोटी और अगर दन्य भाव से कि नाथ कहां आप और कहां कैसे आपको पवाएगा जो छवि है ना पंखा करते जाओ ऐसे बीचबीच में जल पिला देखना यही था माम प्रपद्यते ताज आप जैसा मानोगे वैसा ही व्यवहार करेंगे पक्का समझ लो गोपाल जो सच्चे हृदय से मुझे पुकार ारता है।

मैं अवश्य उसको मिलता हूं। जो प्रेम पूर्वक मुझे पवाता है मैं अवश्य उसका पाता हूं। पत्रम पुष्पम फलम तोयम ये भक्त भक्ति पूर्वक जो पवाया भक्ति पूर्वक का मतलब दैन्य अभक्त में अहंकार होता है। देखो ये ये किया मैंने वो भगवान स्वीकार नहीं करते। वह आपका शुभ कर्म बन सकता है। वो भी धर्म से कमाई की है तो पर भगवान की प्रसन्नता का हेतु होगा दैन्य। जहां भी देखो हमारे स्वामी को जहां भी देखो दैन्य में बिके हुए पाए गए दैन्य में। और ये दन्य किसी बाजार में नहीं मिलती।

यह दैन्यता बनावटी नहीं होती। ये वस्तुता हृदय की होती। की भगवत प्रदत्ति होती है। पर जो संत सद्गुरु देव की आज्ञा का अक्षरशा पालन करे तो इस दैन्य का निश्चित प्रादुर्भाव हो जाएगा। अहंकार गलित हो जाएगा। वत्स मैं किसी भी वस्तु का कभी भूखा नहीं हूं। मानो गोपाल के बहाने से हमको समझा रहे हैं। क्या चाहिए? भगवान को क्या चाहिए? एक बार आनंदी बाई राधावल्लभ जी के पीछे मंदिर है। बड़ी ही महान उच्च कोटि की भक्ता हुई। लाल जी को अपना पुत्र मानती थी और किशोरी जी पुत्रवधू जो भक्तों ने ला बड़ी अकिंचन जो भक्तों ने लाके वस्त्र दिए थे पहना रहे थे श्री जी को साड़ी बार-बार पल्लू खसक जाता तो कहती बहू तू बता कि कौन से रंग की कौन सी तुझे पसंद आएगी अब जो थी वो हम कोई साड़ी रुकती ही नहीं भक्तों की एक अलग होती है वो जान जाते कि आज जो है यह पोशाक इनको रुचि नहीं रही।

आज ये पोशाक चाहिए। यहां से कोलकत्ते गई थी साड़ी के लिए कुछ पैसे एकत्रित करके अपनी बहू के लिए साड़ी लाने के लिए गई थी। सोचो वृंदावन, दिल्ली, आगरा नहीं कलकत्ते गई थी। ऐसी साड़ी लाऊंगी कि बहू को पसंद आ जाए। तो दुकानों की खोज ही कर रही थी कि देखा है एक रिक्शे में बैठी हुई नव युवती बहुत ही सुंदर साड़ी तो वह भी रिक्शे में थी बढ़वाया रिक्शा जब वो अपने स्थान पर रुकी तो रुकी कहा राधेधे क्योंकि वृंदावन की थी अब वो बिचारी क्या राधेधे जाने तो उसने कहा हां माई क्या बात कहा बिटिया ये जो साड़ी है हमारी बहू को बहुत पसंद आई क्योंकि हमें पसंद आ गई हमें मिल सकती है कहां कहां से कहां से खरीदा है?

ऐसा कोई प्रेम भरा शब्द बिटिया तो उन्होंने कहा माता जी आप जानती नहीं है। देखो श्री जी कैसी कृपा कब कहा कैसे किस पर करें मैं बड़ी अभागिनी हूं। वैश्याव वृत्ति से जीती हूं। मुझे वैश्या कहते हैं। कहा बिटिया कुछ नहीं। प्रभु बड़े कृपालु है उनका। तो अगर ऐसा आप कहते हैं तो आप पता दे दीजिए मैं ऐसी ही साड़ी लेकर स्वयं आती हूं। यदि आप हम पर कृपा करें आप ये कह रही कि प्रभु क्षमा करते हैं तो आज के बाद मैं कभी ऐसा कृत नहीं करूंगी। पर यह अवसर हमें कहा ठीक है जब वो साड़ी आई तो श्री जी धारण कर गए।

तब आनंदी का हमें समझ में आ रहा था कि किसी का उद्धार करना है, किसी का मंगल करना। पर हमें यह देखना है कि अपने प्रभु की रुचि हम क्या करते हैं? अपनी रुचि ही सर्वश्रेष्ठ रखते हैं। प्रभु बिकते हैं उनके हाथ में जिनकी हर चेष्टा। इसीलिए सखियों के विषय में आता है मन मन की रुचि जान नेह विधि अनुसरे। आराध्य देव गुरुदेव की क्या रुचि है ऐसा जान के प्रभु कहते मैं किसी वस्तु का कभी भूखा नहीं हूं और भक्तों से मांगते हैं ऐसे कितने चरित्र आते हैं कि ये मुझे पहना दो ये मुझे पवा दो वहां मुझे ले चलो उसको बुला दो ये लीलाएं करते हैं पर ये किन के जो एकमात्र केवल प्रभु को समर्पित है आज से अब दुख सुख नाम का कोई भी शब्द तेरे जीवन में नहीं रहेगा।

भगवान कह रहे सुख समुद्र है ना? देखो भाई जब हम आप सबसे एकांतिक में जो प्रश्नकर्ता आते हैं उनसे कहते हैं कि दुख मिटाने का एकमात्र उपाय प्रभु का आश्रय राधा राधा राधा राधा। प्रभु क्या कह रहे हैं? आज से तुम्हारे जीवन में दुख का नाम नहीं रहेगा। कुछ भी कर लो माना कि तुम तात्कालिक वर्तमान दुख को मिटा सकते हो तात्कालिक लेकिन संपूर्ण दुखों को मिटाने के लिए हरि नाम गरज रहा है राधा नाम गरज रहा है आपसे प्रार्थना है समझो इस बात को कोई साधन सिद्ध नहीं हो पाएगा इस समय ऐसी अव्यवस्था हृदय की और बाहर की है आप देखो कितने घंटे घंटे आप एकाग्र हो के रह सकते हैं।

अपनेित को लगा सकते हैं। बिल्कुल नहीं। ऐसे मेंढक की तरह उछलता है। बंदर की तरह उछलता है मन। उछल ले तू मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। राधा राधा राधा राधा एक एक कलयुग केवल नाम आधारा। देखो सुन के राम राम शुरू किया। मिल गए सिद्ध सदगुरुदेव। दे दिया मंत्र बता दी निष्ठा और मिल गए भगवान और भगवान कह रहे हैं अब तेरे जीवन में कभी दुख का लेस नहीं रहेगा तू अब घर जा अब किसी की गाय चराने की जरूरत नहीं है कुल परंपरागत तेरे लक्ष्मी बढ़ती रहेगी तुझे कुछ करने की जरूरत नहीं देखो बड़े-बड़े सोने के पहाड़ किसी सुनार ने बनाए क्या प्रभु ने ही तो बनाया अरे मथुरा में जब प्रभु गए किसी ने माला पहना दिया तो निहाल कर दिया।

किसी ने जरा सा वस्त्र सिल दिया तो निहाल कर दिया। चंदन लगा दिया। जो जरा सी सेवा में इतने रिझवाल ठाकुर हैं। 100 200 बार सिलाई थोड़ी की थी। जा अब पढ़ के देखो। कुजा जी ने ऐसे वह सुंदरी रूप और वह सौभाग्य भगवत साक्षात्कार कोई साधारण बात है चाहे जिस भाव से सके चिंतन तो सच्चिदानंद का ही होता है हमारे जीवन का लक्ष्य बन जाए प्रभु की प्राप्ति भगवान हंसते हंसते समझ ही नहीं पाए और अंतर्धान हो गए अभी गोपाल कुछ अपने मन भर के देख नहीं पाए आया था कह नहीं पाया था भगवान अंतर्ध्य हो गए अब तो चिल्ला चिल्ला के रोने लगा और विवश होकर आंख मूंदी तो देखा उसके मानस पटल पर आए अब तो राजी हो गया कि हे मेरे प्रभु ऐसी जगह विराजमान

हो गए कोई देख नहीं पाएगा हम रोज बात करेंगे रोज दर्शन करेंगे नारायण या गौर श्याम को हृदय निकुंज बस तो इसलिए धैर्य धारण करके कितना भी कष्ट हो अब पीछे पीछे मत हटो फिसलो मत माया अपने पार्षदों को भेजेगी प्रभु का चिंतन छूटे वो कुछ भी स्वीकार नहीं प्रभु का चिंतन होते हुए जो हो रहा है उनका सृष्टि का कार्य है जो जो जिसको सेवा दे हो रहा है हमारा प्रभु का आश्रय अगर बदला किसी व्यक्ति का आश्रय या किसी अन्य का आश्रय बहुत घाटा हो जाएगा अपने इस मन को देखते रहिए कि ये प्रभु को प्रथम नंबर में रखता है या द्वितीय नंबर नंबर में हमें तो लगता है हो सकता है चौथे पांचवे नंबर पर रखता हो।

एक साधक ने प्रश्न किया पूज्य राधा बाबा से कि मुझे भगवान का दर्शन क्यों नहीं होता है? लोग संतो से ऐसे कहते हैं कि मतलब ऐसे विनम्रता से हां बाबा ने कहा हम बताए तुमको क्यों नहीं होता। पहली बात तो तुम में अहंकार है और दूसरी बात जैसे एक आदमी बाजार गया ना तो वहां 100 ग्राम बर्फी ले ली एक कपड़ा ले लिया एक पेन ले लिया ये लिया वो लिया फिर सोचा कि यार संतों के पास भी जाते हैं एक भगवान की बुक लेते भगवान की कोई वाणी ले लेते हैं और गोपाल जी की मूर्ति ले लेते हैं जिससे सब लोग यह तो ना कहे कि ये भगत नहीं है बोले इसलिए भगवान नहीं मिलते तुम्हारी दृष्टि में भगवान का प्रथम महत्व नहीं जैसे बाजार गया हुआ जैसे अयोध्या की बात कई बार सुनाई कि एक सिद्ध संत थे तो एक नवीन भागवत सीखी थी तो उन्होंने कहा जाकर के प्रभु भागवत सीखी आप आदेश करें तो सात दिन भगवत चर्चा आपकी कृपा से आपको सुनाऊं ठीक है सुनाया सात दिन उन्होंने कहा प्रभु भगवत चर्चा जो आपको सुना सुनाई तो हमारे हृदय में कुछ आकांक्षा भी थी।

बोले हां हमें पता है मांगो क्या मांगोगे? दक्षिणा देनी चाहिए कथा सुनने के बाद। आप बोलो क्या मांगोगे? बोले प्रभु पुत्र नहीं है। हो जाए हां हां ठीक। फकीर है भगवान के जन है। भगवान अपनी बात भी सार सकते हैं। भक्तों की नहीं। भक्तों का प्रण पूरा करते हैं। तुमने कथा सुनाई। चलो पुत्र हो जाए। बोले प्रभु एक और बात है क्या पुत्र हो जाएगा धन नहीं है तो व्यवस्था कैसे चलेगी धन भी हां हां वो भी हो जाएगा ठीक है जाओ बोले प्रभु भगवान की भक्ति दे दो डांट दिया ह भगवान की भक्ति चलो अधिकार नहीं है तुम्हारा तीसरे नंबर पर भगवान को रखा पहले पे बोल देते तो पुत्र भी हो जाता संपत्ति भी मिल जाती भक्ति भी मिल जाती कि प्रभु सबसे पहले हमें जिनकी कथा सुनाई उनके उनके चरणों में अनुराग हो जाए।

उनके चरणों का महत्व हो जाए। अब प्रभु जीवन निर्वाह के लिए जो कुल परंपरा चलाने के लिए संतान हो जाए धन वो चलेगा। लेकिन पहले नंबर पर आपने संतान दूसरे पर धन और तीसरे में भगवान की भक्ति ऐसे भक्ति नहीं होती। हम लोग लगभग लगभग ऐसे ही है ऐसे भगवान नहीं। प्राणों की बाजी लगाकर गुरुजनों के वचनों पर जब चला जाता है तब श्री भगवान मिलते हैं। शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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