॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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ताज़ा

राधा नाम और मंत्र का अद्भुत प्रभाव / जानिये कैसे इष्ट से आसक्ति सारे दुख मिटा सकती है // 21/03/2026

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वापय परम शीतल मा श्रयाम परम शीतल माया ऐसी तो विचित्र जो बनी ऐसी कहूं देखी सुनी ना भनी ऐसी कहूं देखी सुनी ना भनी ऐसी तो विचित्र जोरी बनी मनहु कनक सुदा करी कर देह अद्भुत ठनी मनोहहु कनक सुदा करी कर देह अद्भुत ठनी श्री हरिदास के स्वा स्वामी श्याम तमाल उछंगी बैठे धनी ऐसी तो विचित्र जोरी बनी ऐसी कहूं देखी सुनी ना भनी उपासक अपने आराध्य देव के चरणारविंद की प्रीति प्राप्त करने के लिए ऐसे कभी संग का आदर ना करें जो तर्क आदि के द्वारा अपने आराध्य देव में अश्रद्धा पैदा कर कर दे।

बहुत सावधानी की जरूरत है। अपने वृंदावन रस की उपासना यह अत्यंत दुर्लभ विषय है। यह भोगी और योगी दोनों के लिए भी अगम्य विषय है। जो केवल विषयों की मांग उसी की पूर्ति वही जीवन का सुख वो बेचारे क्या जाने कि वैराग्य में क्या सुख है ज्ञान में क्या सुख है अर्थात राग रहित होकर स्वरूप स्थित होने में क्या सुख है या राग रहित होकर प्रेम में क्या सुख है यह जान ही नहीं सकते। इसीलिए ऐसे लोग प्रायः अगर भगवान से जुड़ते भी हैं तो कुछ समय बाद उनकी अश्रद्धा हो जाती है क्योंकि भारी धैर्य की आवश्यकता होती है इस मार्ग में।

यह हृदय की बात कह रहा हूं। जैसे किसान अपने खेती में बीज बोकर धैर्य धारण करता है। वह समय पर अंकुरित होकर बाहर आ जाता है और किसान आनंदित हो जाता है। मेरी फसल जग गई। ऐसे ही नाम रूपी बीज हृदय में डाल रहे हैं। बार-बार हमको खोद के देखने की जरूरत नहीं कि अंकुरण हुआ कि नहीं। नहीं तो बीज असफल हो जाएगा। जो आप नाम जप कर रहे हैं विश्वास कीजिए यह परम सुख प्रदान करेगा। सारे दुख मिटा देगा। पर आपको दीर्घ काल तक नाम जप करते हुए दुख सुख को सहना होगा। अगर यह सिद्धांत समझ में नहीं आता तो अध्यात्म की थोड़ी जलन ना सहने के कारण महान ज्वाला दावा नल भड़क रहा है संसार में।

इसमें जलना पड़ेगा। जहां कहीं भी निस्तार नहीं है। इसमें थोड़ी सी जलन है। इसको सह जाओगे तो महान शीतलता का अनुभव कर लोगे। आते हैं नवनि निकुंज में। आज बहुत सुंदर श्रीपाद स्वामिनी जी के मंत्र नाम और रूप आराधना का वर्णन करते हैं। आस्ते वृंदावन वन कत्र गम निकुंजे काचित देवी मधुर प्रकति [गला साफ़ करने की आवाज़] दुर्वित्युभावा कृतजल्या विनयम दिव्य गंध प्रस श्यामा परिचर परिकम भयो नमतम ये जो मैं तुम्हें बताने जा रहा हूं आज श्रीपाद कह रहे हैं। यह बड़ा गढ़ भाव है।

पहले कह दिया ये आगम निगम पुराण अगोचर सहज माधुरी रूप निधि इसे तुम प्रमाण नहीं दे सकते हो। पूज्य श्री रूपलाल गोस्वामी जी जिस समय उनकी महिमा प्रकाशित हुई तो वर्तमान कालीन उस समय के जयपुर के राजा ने कहा कि हम सुनते हैं आपके उपासना में व्रत नहीं है। ग्रहण नक्षत्र नहीं मानते आप। आप वैदिक सिद्धांत को नहीं मानते तो आप प्रमाणित कीजिए आकर के कि आपका उपासना का मार्ग शास्त्र सम्मत है। तो उन्होंने एक पत्र लिख के भेजा कि श्रीमान क्या आप हमारे रस के ग्रंथों का कभी स्वाध्याय किया है?

कहा नहीं हम केवल वैदिक सिद्धांत को जानते क्योंकि हमारे यहां बड़े-बड़े ब्राह्मण विराजमान रहते हैं। तो कहा फिर असमर्थ हैं हम आपको अपना सिद्धांत समझाने में। अलक्षम राधाम निखिल निगम रपत राम रसाम भो शारम किमपुमारम विजयते वेद भी जिसका लक्ष्य नहीं कर पाते हैं अलक्षम राधा्यम वो हमारी श्री जी है जिनको राधा कहा गया जिनकी आराधना स्वयं श्री कृष्ण चंद्र जी करते हैं श्रीपाद कह रहे हैं निगुण भाव है ये बिना रस रसिकों की कृपा के वृंदावन रज की कृपा के महारानी जी तक नहीं पहुंचा जाता।

कोई एक इशारा कर रहे कोई एक वो कौन है एक जो पहुंच पाता है? नाभा जी भी महाराज कह रहे हैं श्री हरिवंश गोसाई भजन की सकृत रीति को जान सकत कोई बिरला और महापुरुषों ने वर्णन किया जो कहो हरिवंश रस बिरलो समझनहार एक दोई जो पाई खोजी सब संसार इसमें एक दो कौन आते हैं वो विद्वान होंगे ज्ञानी होंगे बड़े भगत होंगे यहां ऐसा नहीं यह अंदर की बात आपको कह रहा हूं। यहां केवल समर्पण की बात है और समर्पण प्राय नहीं कर पाते। अपनत्व महत्व आकांक्षाएं ये सब बनी रहती हैं। अन्यत्र हमारी श्री जी को सिर्फ अपनापन चाहिए।

अवगुण करे समुद्र सम गणत ना अपनो जानी [गला साफ़ करने की आवाज़] और राई के सम भजन को मानत मेरु समान इससे पता चलता है कि अन्य योग्यताओं की यहां हमारी प्यारी जी के सामने कोई भी प्रताप नहीं चलता कि तपस्वी तेजस्वी जितेंद्र बुद्धिमान आदि आदि एक बात चलती है यहां मैं भोरी मेरी भोरी किशोरी अब जैसी हूं मैं आपकी हूं बस धैर्य पूर्वक धैर्य पूर्वक ये बात अभी ऊपर कह रहे थे कि कोई समझ नहीं पा रहा हृदय की बात यह जीवन का लंबा सफर है। यह उगताए हुए पुरुष को योग प्राप्त नहीं होता।

ऐसा तुम मान लो कि अब हमको परमार्थ में ही जीना है। दुख आवे, सुख आवे, लाभ दिखाई दे, हानि दिखाई दे। जैसे पतिव्रता अपने पति का वरण कर लेती तो स्वभाव का कैसा भी हो निर्वाह करती है। बस ऐसा कुछ मानना होगा। हमें कोई आनंद नहीं मिल रहा। हमारे कोई विकार नष्ट नहीं हो रहे। हमें कोई लाभ नहीं दिखाई दे रहा। पर हम छोड़ नहीं सकते। आपको हम नरक जाएंगे। ऐसे लक्षण है हमारे पर हम आपको नहीं छोड़ पाएंगे। जीत गए। हमारी बात समझ लेना। अगर समझ पाओ तो अगर यह बात हृदय में बैठ गई ना कि महारानी जी के सिवा हमारा निस्तार हमारा कल्याण हमारा परम हित अब और कहीं नहीं होना क्योंकि हम किसी काबिल नहीं अब हम महारानी जी को नहीं छोड़ सकते बस इतनी बात हमें चाहिए हम आपसे जितेंद्र हैं मनोनिग्रही हैं बने रहिए हमारे यहां केवल अपनेपन की मांग है आपकी और सब कुछ आप हो सकते हैं लेकिन अपनापन नहीं दे सकते।

मात तात सुतदार दार देह में मति अरुझ है मति मंदा और हित किशोर को होए चकोर तू लख वृंदावन सीधे लख वृंदावन चंदा एकमात्र प्रियाजु का आश्रय आदेश विधान सब कुछ स्वीकार गृह त्याग करा रहे हैं आचार्य चरण पुत्र पत्नी वैभव सम्मान त्रिभुवन पूजित आदेश होता है कि राधा वल्लभ जी को उन दो सखियों को प्रश्नवाचक चिन्ह नहीं आया कि प्रभु अभी तो त्याग के ही आ रहे हैं। क्या कहेंगे देववन वाले कि हित हरिवंश महाप्रभु यहां तो गृह त्याग किया अच्छा कहीं स्फुरण भी नहीं हुआ क्यों जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे आज उसी वंश से उनहीं आराध्य देव से लाखों का निकुंज में प्रवेश हुआ हो रहा है आगे होता रहेगा नित्यानंद महाप्रभु बाल्यावस्था से लंगूठी वाले परम वैरागी दिगंबर अवधूत कैसी-कसी स्थितियां महाप्रभु चैतन्य देव ने आदेश किया आपको विवाह करना है और ऐसी संतान प्रकट होनी है जिससे लोक मंगल होगा दोबारा प्रश्न नहीं किया कि आप गृहस्थ से विरक्त में पदार्पण गया और यहां बाल्यावस्था से विरक्त अबगृहस्थ की आज्ञा सरकार ये कैसी आज्ञा कभी प्रश्न नहीं किया नाम जापक है मार मार के खाल खींच दी गई उनके हृदय में प्रश्न नहीं हुआ कि ऐसा विधान क्यों बनाया हरी बहुत विचार करने पर उपासक को बहुत धैर्यवान होकर के इस मार्ग में चलना है ऐसे ऐसे चला जाता है।

यह मार्ग ऐसे चला कुछ पकड़ना मत तो वो आपको पकड़ लेंगे। गिरोगे नहीं। क्यों मैं प्रश्न उत्तर ये सब नहीं जिसका हृदय आराध्य देव के चरणों में समर्पित हो जाता है। वही इसके रहस्य को जानता है। ये सब साधन एक प्रक्रिया है। अगर प्रभु से अपनापन नहीं हुआ तो कोई खास बात नहीं। साधन का कोई खास साधन का सब साधन कर यह फल सुंदर प्रभु पद पंकज प्रीति निरंतर अभी कैसे विषय पुरुषों को समझ में आएगी बहुत सुलझने की जरूरत है नहीं जीवन व्यर्थ चला जाएगा दुर्व्कानु भाव युक्ता देवी निकुंज देवी श्री स्वामिनी जो बड़े बड़े-बड़े तार्किकों के भी तर्क से पकड़ में आने वाली नहीं है।

जैसे वेदांत दर्शन तर्क के द्वारा श्रद्धावान तर्क करें तो उसके द्वारा वो स्थापित होता है। कह रही यहां नहीं यहां सीधे स्वीकृति करो मेरी महारानी श्री राधा रानी तो आपके हृदय में बल प्रकट होगा। जाके बल में सबसो तोरी लोक रीति और वेद रीति दोनों से जाके बल में सबसो तोरी लोक वेद और कुल का लोक रीति वेद रीति कुल रीति इन सबका त्याग करके रस रीति में प्रवेश पाया जाता है। किसके बल से मेरी महारानी श्री राधा रानी जाके बल में सब सोरी लोक वेद कुलकानी मेरी महारानी श्री राधा रानी ये तर्क का विषय नहीं यहां स्वीकृति का विषय है अब उपासना बता पहले तो ये कह रहे हैं कि यह बहुत निगुण भाव है इसे वेद प्रमाणित भी नहीं कर सकते आप श्रद्धा और विश्वास करके रसिक की बात मान लो।

यहां तर्क वितर्की की कोई गुंजाइश नहीं है। यह भाव देश है। यह तर्क देश नहीं है। अब हमारी स्वामिनी जो केवल हाथ जोड़ने मात्र से प्रसन्न हो जाती है। इतनी करुणामय इसीलिए लाल जो महाराज जब सेवा में प्रवेश होते हैं तो ऐसे प्रवेश होते हैं। करबद्ध बहुत कृपालु हैं। दयालुता की सरलता की मूर्ति है स्वामिनी जो जो बड़े-बड़े सिद्धांतों की रचना करके उपदेश करने वाले और उनके फल को देने वाले प्रभु हैं। यह उनके अधीन है। प्यारी जो कि एक भकुटी के इशारे से घोर पापी को भी वह पद प्राप्त करा देंगे जो बड़ी-बड़ी साधनाओं से नहीं मिलता है।

विश्वास कीजिए। आपको लगेगा केवल बातें ही है कि प्रमाण भी है तो नरवाहन जी कोई भी सदा आचरण नहीं था। 84 कोस ब्रज मंडल का मूर्धन्य राजा जरा भी ब्रज 84 कोस में उनके खिलाफ या उनकी अधीनता ना स्वीकार करने पर प्राणदंड मिलता था। सीधे प्राणदंड कोई क्षमा याचना नहीं ऐसा उनका स्वभाव और प्रभाव था। महाप्रभु हरिवंश चंद्र जो राधा वल्लभ लाल जो पालकी में विराजमान रसिक जनों के साथ गुण कीर्तन नाम कीर्तन जय जयकार होते हुए आए और लता भवन में विराजमान किया। सेवकों ने सूचना दी कि कोई महान तेजस्वी पुरुष आभूषण आदि लेकर के अपने इष्ट देव के साथ पधारे हुए हैं।

पर उनका तेज ऐसा है कि हम लोगों की हिम्मत ही नहीं कि उनके सामने जा सके। यह आपसे निवेदन करते हैं। नरवाहन जी ने विचार किया कि ऐसा कौन तेजस्वी ब्रज मंडल में जो हमारे आज्ञा पर क्रूर हिंसा कर देने वाले कठोर हृदय वाले भी भय धारण कर रहे हैं। सामने नहीं गए। हम स्वयं चल के देखेंगे। एक भागवतिक आभा होती है। एक भागवतिक बल होता है। वह जिस पर कृपा होनी होती है उसी को अनुभव में आता है। जैसे अपने गुरुदेव भगवान के पास जब जाते हैं तो एक भागवतिक बल वहां स्थापित है। वो शायद है कि लाडली जी की कृपा से आपको दिखाई देगा।

रोम रोम उस समय बिल्कुल अलर्ट रहता है। सावधान एक अद्भुत कि जब गुरुदेव श्री जी को देख रहे हैं तो हम गुरुदेव को देख सकते हैं। लेकिन जब गुरुदेव हमारी तरफ देखेंगे तो हमारी हिम्मत नहीं कि हम देख सके। नेत्र झुक जाएंगे ऐसे। वो एक अद्भुत बल होता है। नरवाहन जी पर कृपा होनी थी। हित जो महाराज किसी भी भाव से कोई आवे तो उसको श्री जी प्रदान करते हैं। इतने अद्भुत दाता हैं। महिमा तेरी कहा कहूं श्री हरिवंश दयाल तेरे द्वारे बटत है सहज लाडली लाल। बड़ा विचार कर रहा था।

कैसे होंगे? क्या प्रभाव होगा? जब दर्शन करने के लिए आए तो हिम्मत नहीं पड़ी सामने जाने की। लता भवन की ओठ से देखा जैसे प्रियाजू के नेत्र ऐसे हितजू महाराज के नेत्र अतुलित रस बरसत सदा सुख निधान वनवास अद्भुत महिमाम प्रगट सुंदरता की रास सुंदरता की रास कनक दति देह रुचि जैसे स्वामिनी जो की श्री अंग की कांत सात कुंभ तन गोरी ऐसे हित सजनी स्वरूपा महाप्रभु प्रभु हरिवंश चंद्र जो की अजान बाहु कमल नयन सुंदर नासिका सुंदर थोड़ी युगल चरणारविंद पान किया और बस उन्मत्तता छा गई अभी राधा वल्लभ जी को देखा ही नहीं था केवल महाप्रभु को देखा था बस हृदय में बैठा लिया वहां रसिक जन कीर्तन कर रहे थे राधा वल्लभ श्री हरिव श्री वृंदावन श्रीवचंद बैठा लिया राधा वल्लभ श्री हरिवंत राधा वल्लभ श्री हरिवंश यह नाम जपते ही कुछ दिनों में ऐसा लगने लगा कि मैं बहुत अधम हूं।

अब नहीं करूंगा। अपने हाथ से किसी की हिंसा नहीं करूंगा। कभी चोरी नहीं करूंगा। कभी किसी से कर नहीं लूंगा। ऐसा और एक तरह से परम वैरागी होकर रह रहे। पर कार्यक्रम उनका वही चल रहा है। उनके अनुगामी जनों ने एक जैनी व्यापारी की बड़ी नौका को रोका और कहा यहां से निकलने वाले को कर देना पड़ता है। उसके साथ कई 100 सैनिक बलवान थे। तो सैनिकों के बल के कारण उसने कर देना अस्वीकार कर दिया। युद्ध हुआ। समस्त सैनिक मारे गए। जैनी को बंदी बना लिया। पूरी संपत्ति नाव की हड़प ली।

छोटी-मोटी नाव नहीं जिसमें आठ नौ से सैनिक सुरक्षा में हो तो कितना ऐश्वर्य होगा। पहले नावों से ही व्यापार होता था। नौका पूरी जप्त कर ली गई। उसको बंदी बना लिया गया और उसमें जो मुखिया थे क्योंकि नरवाहन जी तो राधावल्लभ श्री हरिवंश आठों पैर जप में लग गए थे। कैसी असीम कृपा हुई थी। पहले दर्शन में ही लुट गए थे। अब वह कैसे लूटेंगे? उनके अनुयायियों ने उस जैनी से कहा कि अगर आप जितनी संपत्ति है इतनी दोबारा नहीं मंगाते हैं तो आपको फांसी की सजा दी जाएगी। उतनी संपत्ति उसके पास थी नहीं।

धीरे-धीरे फांसी का समय निश्चित हो गया कि कल फांसी दी जाएगी। तो रात में 9 10 बजे स्वयं भोग लेकर के एक दासी गई और उससे कहा कि तुम सावधान कल तुम्हारी मृत्यु का दिन है। रो पड़ा मेरा क्या अपराध? उन्होंने कहा यहां अपराध नहीं गिने जाते। यहां कोई निर्णय नहीं होता। मारे जाओगे कल तुम। उसका कोई उपाय बचने का। बोले एक उपाय है रात्रि के 12:00 बजे राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश जोर से उच्चारण करना मुझे पूरा विश्वास है यह नाम तुम्हें बचा लेगा अरे तो मरने वाले को जैसे संजीवनी बूटी मिल जाए थोड़ी ही देर के बाद उच्च स्वर से शुरू किया राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री हरिवंश वो आवाज नरवाहन जी जहां एकांत में जप कर रहे थे वहां पहुंच अरे ये तो अपराध बन गया।

मेरे गुरु जी का कोई शिष्य बंदी बना लिया गया। तत्काल गए खुलवाई जेल अंदर गए। हाथ जोड़ा प्रणाम किया और कहा मुझे क्षमा करना। मुझे पता नहीं था आप हमारे गुरु भाई हैं। अपने सैनिकों को बुलाया और कहा तत्काल पूरी संपत्ति दी जाए और अधिक संपत्ति इनको दी जाए। उनसे हाथ जोड़कर कहा कभी गुरु जी के सामने यह चर्चा मत चलाना कि आपको इस तरह से प्रताड़ित किया गया। आज से बिल्कुल आदेश लागू हो जाएगा। कुछ किसी के साथ ऐसा नहीं होगा। नहीं तो बहुत बड़ी गलती हो जाती। जहां उसको फांसी की सजा मिलनी थी।

वहां नवीन वस्त्र धारण कराकर सारी संपत्ति उसके मन में आया एक बार तो उनसे मिलूं। जिनके नाम के बल से मुझे सम्मान मिला जहां मृत्यु मिलने वाली थी और व्यापार में जो लाभ मिलता उससे अधिक धन मिल गया उनका मूल तो मिला ही और भी संपत्ति नरवान जी ने दी इस बात की कि मेरा गुरु भाई है लता भवन में आए पता लगा के महाप्रभु के दर्शन की सारी संपत्ति भेंट की महाप्रभु ने कहा नहीं आप इसका प्रयोग स्वयं कीजिए और कहीं लगा दीजिए हमारे राधा वल्लभ लाल लता भवन में विराजमान है। हमें इतनी संपत्ति की जरूरत नहीं।

पर आप देना क्यों चाहते हैं? तो उन्होंने कहा आपके नाम के कारण मेरा जीवन बच गया। पूरी घटना बताई। तो मैं तो नहीं जानता नरवाहन कौन है। महाप्रभु को इतनी करुणा उदय हुई कि केवल राधावल्लभ श्री हरिवंश नाम सुनकर ऐसा बुलावा कहां है? अब नरवाहन जी को बुलाया गया तो कांपते हुए आए कि पता नहीं अब उनके हृदय में तो था मेरे गुरुदेव हरिवंश चंद्र जो मेरे इष्ट राधा वल्लभ पता नहीं गुरुदेव क्या दंड विधान करेंगे क्योंकि गलती हो गई सामने गए महाप्रभु को देखकर रो पड़े ऐसा सौंदर्य ऐसी करुणा महाप्रभु के स्वरूप से चरणों में गिरे महाप्रभु ने कहा नरवाहन आज तुमने खरीद लिया मुझे।

अब उनको आत्मबल प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा तुमने कभी हमसे दीक्षा नहीं ली। कभी ऐसा संग नहीं किया केवल सुनने मात्र से। तो देखो मैं तुम्हें अपने नित्य विहार का सर्वस्व प्रदान करता हूं। विलास रस और रास रस। 11वा पद विलास रस का है। मंजुल कल कुंज देश राधा हरि विषद वेश राका नव कुमुद बंधु शरद जामिनी सावल दुति कनक अंग बिरत मिल एक संग ये विलास का पद है और 12वा पद चलेह राधिके सुजान तेरे हित सुख निधान रास रच श्याम तट कलिंद नंदिनी इसके आखरी नरवाहन प्रभु निहार लोचन भरी घोषणा नक्षिक सौंदर्य काम दुख निकंदनी देख हमारे प्रिया प्रीतम कैसे है जो अनंत जन्मों की साधनाओं से भी नहीं बनता क्षण में महाप्रभु ने वो बात हम ऐसे आचार्य की शरण में है जो करुणा समुद्र लाडली का साक्षात स्वरूप है।

हमारी श्री जी और हमारी हित सजनी जो एक ही है। आप देखो सिद्धांत विचार में ध्रुवदास जी कहते हैं तहां श्री के श्री मुख की वाणी श्री जी के श्री मुख की वाणी हित जी को संबोधन करते हैं त श्री जी के श्री मुख की वाणी ये गढ़ विषय है आचार्य कृपा करें रसिक जन कृपा करें तो घोर पापाचारी को भी नित्य विहार रस प्रदान कर दे हमारी स्वामिनी जो बड़ी कृपालु है हाथ जोड़कर नमस्कार करने मात्र से ही प्रसन्न हो जाने वाली प्रियाजु है। क्या करो? बोले निकुंज देवी की सेवा विराजमान करो।

निकुंज देवी प्रियाजु की सेवा प्रियाजु ये नाम सेवा राधा नाम सेवा राधा वल्लभ रूप सेवा ये प्रियाजू ही है। राधा ही जहां की वल्लभ है। यह है प्रेम उपासना। यहां की वल्लभ कौन है? प्रीतम कौन है मेरे प्राणनाथ श्री श्यामा शपथ करो तण छिए रहो को काहु मन लिए हमारी प्रिया जी को श्याम वर्ण बहुत पसंद है प्रीतम के श्री अंग कांत के कारण तो श्रीपाद कह रहे हैं यदि श्याम वर्ण का पुष्प और श्याम वर्ण के गंध का आले कस्तूरी प्रियजु को बहुत प्रिय श्याम श्यामा मवे परिचर परिकम भयो नमतम कृजल्यानति सुविनयम दिव्य गंध प्रसून सुंदर पुष्प श्याम वर्ण का हो श्याम कमल या और भी श्यामता लिए हुए बहुत प्रिय है प्रियाजु को कस्तूरी आदि का लेपन और सुगंधित द्रव्य आदि अर्पित करके हाथ जोड़ जुड़ के हृदय से अपनापन करके परिक्रम में चार परिक्रमा करके भूयो नमतम भूमि में मस्तक रखकर के नमस्कार कर दो तो स्वामिनी जो अपना सर्वस्व प्रेम प्रदान कर देती है।

बहुत करुणाम में ऐसा कुछ नहीं लिखा जो सब कोई ना कर सके। गृह में अपने स्वामिनी जी की सेवा विराजमान करो। राधा नाम राधा वल्लभ रूप गुरुदेव आचार्य ये सब स्वामिनी जो ही है आचार्य भी स्वामिनी जो है गुरुदेव भी स्वामिनी जो है जैसे हित जो महाराज को सेवक जी कह रहे हैं मम स्वामिनी धनी मेरी स्वामिनी ऐसे ही आचार्य ही गुरुदेव है तो गुरुदेव मम स्वामिनी गुरुदेव मम स्वामिनी आचार्य मम स्वामिनी इष्ट मम स्वामिनी कोई अंतर अंतर नहीं है। सेवा विराजमान करके हमारी लाडली जो को सबसे ज्यादा जो पसंद है वो अपनापन पसंद है।

यह अंदर की बात है। मेरी लाडली देखो अपने जैसे अधम के पास तो सेवा के लिए कुछ था ही नहीं। इत्र भी मांग के गुरुदेव भगवान से लाते थे। वही इत्र भी देते थे अपने पास। केवल गुरुदेव ही थे अपने पास केवल गुरुदेव ही थे हैं रहेंगे जो है वो गुरुदेव का दिया हुआ है अंदर और बाहर भी इतनी मिश्री का भोग लगता था जो वृंदावन के पुष्प वो समर्पित और सबसे बड़ी बात कृपा की यह थी कि पर्दा लगा के और जब मिश्री इतनी रखते थे तब रुदन होता था स्वामिनी जी आपके लिए कुछ नहीं हमारे पास और हम जैसे हैं आपके कभी-कभी रोटी मांग के जो सूखी मिली वो सामने ऐसे रज के पात्र में रख के जब दिखाते थे तो जो भोग लगता था हम तुम्हें कैसे बताएं कि रोटी रख गई और घंटो ऐसे बैठे हैं भाव उत्सवेन भजता रसका हमारी प्रियाजों को अरे वैभव क्या वैभव जिनका है वह तो उनके महावर लगाते हैं और कौन सा वैभव प्रिया जी को पसंद आएगा जिनका वैभव है वह तो महावर लगाने के लिए याचना करते हैं उनको कौन सा वैभव बस नमस्कार प्रियाजू को मस्तक रखकर भूमि पर हाथ जोड़कर और जो प्रियाजु को पसंद है श्याम यदि आपके पास श्याम पुष्प नहीं है, श्याम मृगमद नहीं है, कस्तूरी तो श्याम सुंदर का नाम और गुण तो है।

सुनाओ उनको गोविंद कथा गोविंद नाम कीर्तन प्यारी जी को बहुत प्रिय है। जब आप सुनाओगे ना गोपाल सहस्त्र नाम श्रीमद् भागवत के श्लोक जिनमें रूप माधुरी श्री कृष्ण चंद्र जो की या जो महान ऋषिकों के क्योंकि स्पष्ट समझ लीजिए मेरे तन मन प्राण होते प्रीतम प्रिय मुको तो भावती ठोर प्यारे के नैनन में और खास बात नंद के लाल हर मन मोर बस ये है हमारी श्री जी की पूजा अगर समझ पाओ पकड़ पाओ श्री जी की पूजा ये है तो बोले श्याम वर्ण के पुष्प और कस्तूरी आदि अर्पित करके चार परिक्रमा करके अगर आपको कुटिया में ऐसा विधान नहीं है कि आप परिक्रमा कर सके तो आप यहां कर लीजिए चार परिक्रमा राधा वल्लभ जी की चार परिक्रमा कर लीजिए या अपने ठाकुर को ऐसा सिंहासन रखिए कि सेवा के बाद ऐसी जगह विराजमान कीजिए जहां पीछे से परिक्रमा कर सके।

बड़ा महत्व है परिक्रमा का। पूजा की पूर्णता परिक्रमा से ही है। कह रहे हैं परिकम्यो और फिर भू नमत्वम चार परिक्रमा करके भूमि पर मस्तक रख के स्त्री शरीर है तो पंचांग पुरुष शरीर है तो साष्टांग ये बहुत पहले आदेश हो चुका था श्री जी की प्रेरणा से कि हर साधक 11 21 51 108 जितनी शरीर में सामर्थ्य है दंडवत करेंगे तो ये तो सखी भी कर सकते हैं प्रगट जिनका स्त्री शरीर है पंचांग किया फिर खड़े हो गए मंत्र जपा फिर प्रणाम किया पंचांग फिर खड़े हो गए पांच सात 11 ये तो कर ही सकते हैं ना इससे निश्चित आप देखना बहुत आनंद का मार्ग है श्री जी की चार परिक्रमा अच्छा सेवा आप सब आप नहीं कर रहे तो दर्शन कर रहे हैं ना सब सम्मिलित है सेवा में निकुंज में सेवा कैसे एक सखी पत्रावली लगा रही है तो शास्त्रों सखियां तन्मय हो रही है उसी पत्रावली तो सबकी पत्रावली की सेवा हो रही है।

एक पान की बीड़ी पवा रहे। सब तन्मय हो रही तो सबकी बीड़ी सेवा हो रही है। ये आंतरिक विषय है। आगे जब मन पवित्र होकर सेवा में जाएगा तो आप देख लेंगे। उसमें थोड़ा होता है कि मैंने पत्रावली नहीं कि तू हट मैं पत्रावली करूंगी। कल तूने की थी। ऐसा नहीं सब सखियों में एक ही मन है। अगर एक प्रियाजु को चवर कर रही है तो अनंतों सखियां चवर कर रही। यह बात तब समझ में आएगी जब वहां प्रवेश होना पर मान लो सुन के ये सुनने को ही मिल रहा है बड़ी दुर्लभ बात है श्रीपाद आगे जो कह रहे हैं छिप दिव्यहार निष्क कोस्तभादी चंद्रिकम गंध लिप वक्ष आत राधिकांग पल्लवम राधिका विचित्र वेश भूषणाद तत्परम राधयाभिंगत रोम विग्रहम अंग अंग से रूप कांत प्रकाशित हो रही है हमारी स्वामिनी जी की पारश्व में विराजमान कौस्तुप मणि धारण किए हुए श्री लाल जो महाराज और पल्लवों से आक्षादित लता भवन में और पल्लवों की सैया में जो हमारी प्रिया जो विराजमान अद्भुत वेशभूषा श्याम तमाल के समीप मानो कंचन बेली लिपटी हुई हो ऐसी गुण स्वरूप वाली प्रियाजु लब्धम भजन विभव चक चोर निशथे बहुत जोर की बात कह रहे चोरी चोरी भजन करना सीखो श्री कह रहे चोर निशथे निश कहते हैं अर्ध रात्रि को 12 बजे चोर का प्रोग्राम 12:00 बजे से शुरू होता है।

नहीं होता क्योंकि 12 और दो का जो समय होता है इसमें सब बेशुद्ध होने लगते हैं। चार तक तो जिसको नींद ना आती हो तो दो से चार के बीच में आ ही जाएगी। और यही होता है भजनानंदी का भजन का समय। 12 सा 12:30 इसमें दिनचर्या प्रारंभ हो जाती है। आठ और नौ के बीच में शयन भैया कमाने आए हैं यहां ओवर टाइम भी करना है सब सो रहे हैं और उस समय जब हो रहा है लनम भजन विभव अपने गुरुदेव भगवान की दिनचर्या काफी समय तक जब वही रहे तब देख पाए सेवा तो बहुत वर्षों में उनकी कृपा से सौभाग्य मिला नजदीक रह के लगभग वो दो ढाई बजे शयन करते थे और 4:30 बजे दिनचर्या प्रारंभ हो जाती थी अभ्यास तो 2 बजे का पूर्व का था ही जगने का अपने का जैसे 12:30 एक बजे उठे तो देखा शांत बैठे तो अरे गुरुदेव इस समय बैठे हुए जहां ढाई तीन

बजे 4:30 बजे 100 ला क्या जीवन को कैसे प्रिया के चरणों में समर्पित किया जाता है गुरुजनों से समझ में आता है कभी कोई बाल भोग कभी कभी कोई ब्याहुला कोई उत्सव 20ों वर्ष नहीं ये सब यहां हो रहा है वहां दर्शन कोई गुरु जी की श्री जी की नहीं संभाषण नहीं आंख उठा के देखना नहीं ये पास रहकर ये अब जो है ना तो बरसंत में सहजादभुत सौख्य धम सहज में सुख वर्षा कर रहे हैं देख रहे हैं संभाषण कर रहे हैं आरती कर रहे हैं सब दर्शन कर सकते हैं प्रवेश नहीं लम भजन विभव चोर निशते आदेश कर रहे हैं हमारी श्री जी का भजन चोर चोर करो चोर चोर चोरी चोरी कोई जान ना पावे कि आपकी कितनी ऊंची अवस्था है भजन का स्वरूप समझो अंदर ही अंदर आपके आग जल जाए भजन करने की जितना नींद को कम कर पाओ धीरेधीरे ऐसा वो कम करना नहीं माना जाएगा कि सत्संग में सो गए माला चलाते समय सो गए फिर ये ठीक नहीं ये विक्षेप नहीं होना चाहिए जिस समय से जगे तो बस जगे फिर झपक नहीं आनी चाहिए तब माना जाएगा कि आपका अभ्यास ठीक है अब उधर तो आपने तोड़ दिया नींद अपनी और इधर

पूरी कर रहे हो तो फायदा क्या हुआ तोड़ने का सत्संग में नींद पूरी कर रहे हो कीर्तन में नींद पूरी कर रहे हो और आप तो यह उपासना में ऐसा ठीक नहीं है। उतना आप सोइए जिससे जगने के बाद फिर आपके झटके ना लगने पावे। ठीक राइट टाइम पे बिना किसी अलार्म के पूरे जीवन में उठने का स्वभाव बनाओ तो वैसे ही उठ जाओगे। वो घड़ी दिमाग में चलती है अपने आप। पांच मिनट नहीं कहते आगे पीछे नहीं दो यदि आप इसी जन्म में उस महा प्रेम रस स्वामिनी को प्राप्त करना चाहते तो आधी रात को उठो निशे और चोरऊ चोर की तरह चुपचाप चुरा के भजन करो जान ना पावे कोई कि भजन ऐसा तुम्हारा चल रहा है तब आनंद आपके अंदर प्रकट होगा विभव भजन विभव भजन का वैभव प्रकट हो गए।

देखो ना कर यही आनंद लेने के लिए उठे हो जो तुम्हें उठाया गया है प्रपंच दलदल से तभी कह काहे को बड़ी दुर्दशा है। एक स्वतंत्रता दिवस में राष्ट्रपति जी जेल में पधारे। सब कैदी सामने आए। आज मैं बहुत खुश हूं। मांग लो तुम्हें जो मांगना हो। एक उठे सर [गला साफ़ करने की आवाज़] सर्दी में एक कंबल मिलता है। दो मिल जाएंगे क्या? पास दो कंबल आज से हर कैदी को सर्दी में एक उठे नहाने वाला साबुन बहुत घटिया आता है। अच्छा मिल जाएगा क्या? पास ऐसे सब ने अपनीपनी मांग की। एक उठा कहा श्रीमान जी आप अपने शब्द पर स्थित हैं।

हां जो मांगेंगे तो आज स्वतंत्रता दिवस है आपने कहा देंगे तो सर मुझे जेल से मुक्त कर दो बोले मुक्त कर दो इसे सब बोले नहीं नहीं हमको भी मुक्त बोले नहीं तुम्हें साबुन चाहिए ना जेल में रह के तुम्हें कंबल चाहिए ना हम लोग ऐसे ही हैं हमारे प्रभु ने अवसर दिया साधु संग सत्संग चलो सत्संग का फल क्या है बड़े भाग पाई सत्संगा विनय प्रयास हो भंगा तो यहां यही मांग रहे हैं इसी जेल में संसार रूपी जेल में हमारा मुकदमा जीत जाए हमारी नौकरी लग जाए हमारी पत्नी हमारे अनुकूल हो जाए बेटा हो जाए जेल में कोई एक कहता है कि मुझे संसार से मुक्त कर दो हमारी दुर्दशा वही तिहाड़ जेल में गए हुए राष्ट्रपति वाली है ये राष्ट्रपति से हम मांग रहे हैं तो जेल के अंदर ही रहने वाली बात मांग रहे यह नहीं मांग रहे कि जेल से मुक्त कर दो मुझे इस माया प्रपंच से मुक्त नहीं मुझे यह दे दो तो अमर हो जाओगे कितनी देर चलेगी तुम्हारी ये मांग होश में इतने बड़े महान प्रभु को रिझाकर ऐसा मांगो कि मांगना मिट जाए फिर मांगने की चाह ना रह जाए यही समझ

में नहीं आती आनंद का मूल भजन है तुम इस भजन संपत्ति को बढ़ाओ और नित्य छुप छुप करके इसका अनुष्ठान करके इसको बढ़ाते रहो। चलते फिरते उठते बैठते नाम चल रहा है। एक दिन देख लेना त श्री राधा स्वमति रसात प्राप्त दो बंधम कठे कृत्वा इसका भाव है कि महा करुणामय स्वामिनी अपने प्रीतम के साथ आकर के दोनों बाहें अर्थात एक लाल जी के प्रियाजू के बीच में आप होंगे कैसा सुख होगा अनंत ब्रह्मांडों का स्वामी गले लगा रहा है इधर मेरी प्रियाजु इधर लालजू मान जाओ मान जाओ यह धोखे में माया के जाल को मत अपने गले में फांसी बांधो कि प्रभु मुझे यह दे दो अरे जितना दिया है उतना तो रौंदे दे रहा है और दे देंगे तो भूल जाओगे भगवान को भी

बड़ी कृपा है कि उन्होंने नहीं दिया तो कम से कम यह अपमान ये तिरस्कार ये अभाव साधु संग तक तो पहुंचा दिया नहीं जिनके पास खूब वैभव है उनको समय नहीं वृंदावन में पांच मिनट बैठकर सत्संग सुनने का माया की दौड़ दौड़ दौड़ तत श्री राधा सुमति रसात प्राप्त दुर्बल बंधम कंठे कृत्वा ओ हो हो और भी नहीं नहीं जीह तेति कभी नहीं छोड़ेंगे सत्यम मैं सत्य बोल बोल रहा हूं श्रीपाद सत्यम सत्यम ब्रम मैं सत्य बोल रहा हूं क्योंकि उनके साथ ये घटना घटी तब वो कह रहे सत्यम मैं सत्य बोल रहा हूं विश्वास मानिए श्री जी लाल जो आकर गले से लगा ले कभी नहीं छोड़ेंगे आगे निज मंत्र की बात कर रहे हैं हित जो महाराज की विशेष कृपा श्रीपाद प्रबोधनंद जी पर थी कह रहे मंत्रम हृष्या अखिल निगमा गम में प्रवे बहुत गढ़ विषय है बड़े भाग्यशाली हैं जो इस विषय को समझ पावे यह जो निज मंत्र है रहस्य श्री किशोरी जी का ये किसी शास्त्रों में नहीं है अगम्य निगमा अगम्य ब्रहमी जितने भी वेद पुराण शास्त्र हैं इनकी ताकत नहीं वहां तक पहुंचने की जो प्रियाजु का

जहां निज मंत्र पहुंचाता है किसी आप को अगर खोल के ना समझावे तो आपको आश्चर्य लगेगा कि ऐसा कैसे हो सकता है। आज तक जितने भी भारत के ग्रंथों में महापुरुषों का वर्णन है वो सब ईश्वर कोटि के हैं। इसमें कोई संशय नहीं है। पर इस श्लोक पर आइए। पत्रावली रचित कुचयो कपोले बुम विचित्र कबिम नवमलिका भी इसका अधिकार कभी किसी महापुरुष को प्राप्त हुआ हो तो हमें बता देना कभी नहीं। लास्ट में समीपस्थ राधा कृष्ण के दर्शन एक रात्रि गोपी बनकर श्री महादेव जी मुनि इंद्र वृंद वंदिते ये वहां की शोभा देख के वर्णन कर रहे हैं नौ निव निकुंज वहां महावर लगाने का सौभाग्य लालू को मिला है वह भी सहचरी रूप में ध्यान रखना बहुत गढ़ आनंद जहां आप बैठे हुए वृंदावन धाम समस्त निगमा गम ब्रम ये मैं स्वयं अनुभव से और महान रसिकों के अनुभव से कहता हूं ब्रवीम कि मंत्रम हस्य अखिल निगमागम्यमेव ब्रममि यह अखिल वेद पुराण शास्त्रों में भी नहीं है और उनके अगम में है यह मंत्रमस्य जो निज मंत्र है य प्राकट्यम कच कृतम नो रहस्या गमेशु जिसके प्राप्त हो जाने पर और सिद्ध कर लेने पर ये सिद्ध आचार्य परंपरा से चला आ रहा है पर आपके अंदर सिद्ध का तात्पर्य निरंतर चलना अभ्यास के द्वारा तो बोले इस मंत्र को य प्राकट्यम कचित कृतम नो रहस्या गमेशु उसके लिए कोई भी निकुंज का रहस्य अगम्य नहीं रह जाता।

जिसके हृदय में निज मंत्र सिद्ध हो जाता है। सिद्ध माने होता है निरंतर चलना। पाद प्राते विलति महा सिद्धि संघ जप्त उसके चरणों में करोड़ों महा सिद्धियां लौटने लगती हैं जिसके हृदय में निज मंत्र चलता है महाप्रभु हरिवंश चंद्र श्री राधा किंकरी नाम लुठति चरणभता सिद्ध कोटि पाद प्राते विलुठति महा सिद्ध संघ जप्त हो महान करोड़ों सिद्धियां उसके चरणों में लौटती है जिसके निज मंत्र निरंतर चलता है। तुम्हें क्या मिला है पता है? खिलवाड़ समझे हो। स्वाद नहीं ले रहे हैं।

चंद रुपए चंद भोग सामग्री चंद नाम महिमा हमारी हो। इस पर हम परेशान घूम रहे हैं। य प्राकट्यम कचप कृतम न रहस्यागमे कोई भी निकुंज का ऐसा रहस्य नहीं है जो निज मंत्र जापक के हृदय में प्रकाशित ना हो जाए। पाद प्रांतते विलति महा सिद्धि संघ जप्त उसके चरणों में महा सिद्धियां लौटने लगती है जिसके निज मंत्र चल रहा है श्रीमद् भावा अप भगवतो यत प्रभावात कर श्री भगवान का जितना भी भाव देश है यत प्रभावात कर उसके हाथ में सब हो जाता है जैसे आंवले को रखे चारों तरफ से देख सकता है ऐसे भगवान के भाव रहस्य महिमा महिमा ऐश्वर्युर्य सब का ज्ञान निज मंत्र में छुपा हुआ है।

नित्यम य जापिनी नन जने नो विधि नियध इस मंत्र का जो नित्य जाप करता है वो विधि निषेध से ऊपर उठ जाता है। उसके लिए कोई शास्त्र विधि या निषेध लागू नहीं होता। वेद सनस्त सा केवलम अनुराग लभते अखंड प्रेम निज मंत्र प्रदान कर देता है और विधि निषेध से परे हो जाता है नित्यम यपिनी नन जने नो विधि नो निषेध ना विधि ना निषेध दोनों से नाभा जी महाराज विधि निषेध नहीं दास अनन्य उत्कट व्रत धारी महाप्रभु हरिवंश चंद्र जी के लिए कहा यहां निज मंत्र के लिए कह रहे हैं नित्यम य जापिन नन जने नो विधो निषेध जो जन निरंतर इस मंत्र का जाप करता है वो विधि निषेध दोनों से परे हो जाता है और निज मंत्र प्राप्त और भटक रहे हैं क्यों तुम्हारे गले में रखी बंधी हुई है पारस मणि लेकिन तुम दो रुपए के लिए भटक रहे हो उसको जान नहीं पा रहे हो आगे जो वर्णन बड़ी महिमा तत पादा युग रजो वेद तत्व ज्ञान पुनात उसकी चरण महिमा के आगे समस्त वेदों का ज्ञान धूल धरित हो जाता है।

रज कण के समान जिसके अंदर निज मंत्र का प्रभाव जागृत हो गया तो ऐसे लगेगा कि ऐसा क्यों कह रहे हैं? तो वेद जिसे नेति नेति कहता है वो उसके अधीन हो गया है। भावे मोहे जोई सोई सोई करें प्यारे अब ये नहीं कि जोई जोई प्यारो करें यह स्थिति निज मंत्र में आती है भावे मोह जोई सोई सोई करें प्यारे युगल सरकार दोनों वैसे ही तो बोले तत पाम बो युग रजो वेद तत्व ज्ञान परम पवित्र ब्रह्म ज्ञान वेद शास्त्रों का सार उसके चरणों के आगे लुटता है। अर्थात मोक्ष उसके चरणों के आगे लुटता है।

निज मंत्र जिसके हृदय में प्रकाशित हो चुका है। जिसके हृदय में य प्राकट्यम कुचित कृतम रहस्या गमेशु निज मंत्र का निरंतर ऐसे आव्रत हो रहा। बार-बार निज मंत्र चल रहा है। प्रिया प्रीतम प्रकट हो गए। प्रेम प्रकट हो गया। उनकी रस रीति प्रकट हो गई। निकुंज का कोई भी रहस्य अगोचर नहीं रहा। तो बोले त पादो युगो ऊपर के श्लोक में कहा पाद प्रते विलति महासद्धि संघ जपतो उसके चरणों में महासिद्धियां करोड़ों लौटती है दूसरे श्लोक में कहा तत पाद युग रजो वेद तत्व ज्ञानम पुनाति तत्व ज्ञान परम पुनीत महामहिम वेदों का सार उसका फल है मोक्ष वो मोक्ष लुटता है ऐसे महा प्रेमी के चरणों की रज में य पीयूषति सुमधुरम मंगलम मंगल नाम वो प्रेमामृत जो मंगल का भी मंगल करने वाला है यह पान करने को उस उपासक को मिलता है नित्यम य जापिन जो नित्य जाप करता है नन जनेनो विधि निषेध जो विधि निषेध से परे निज मंत्र का नित्य जाप करता है वो य पियूषदति सुमधुरम मंगल मंगलम मंगल नाम मंगल का भी परम मंगल करने की सामर्थ जिस प्रेमामृत में है उस प्रेमामृत का सुमधुर पान करता है सर्वाित महिम साधकम साधक नाम बड़े बड़े साधकों और सिद्धों के लिए भी सर्वामय स्थिति जो है वो असीम महिमा युक्त इस निज मंत्र के साधन से प्राप्त हो जाती है।

यह जो नित्य विहार का बीज मंत्र निज मंत्र है जिनको प्राप्त है तुम अहो भाग्य नहीं मना रहे हो क्योंकि तुम्हें पता नहीं पाए रतन चीन नहीं दी करते डार ये माया श्री कृष्ण की मोह सब संसार आगे धारे तेवम जो इसे धारण करते हैं तो साध्या नाम य परम परमम साध्य मत मदा नाम मानंदा नाम पिच परम प्रेमंद माहु सर्वासा य परम सु रहस्यावली नाम रहस्यम राधेवम जप तद निशि सार्थ संस्मृत अनन्य जो इस निज मंत्र का जाप करते हैं वो समस्त साध्यों का परम साध्य है निज मंत्र साध्य नाम साधना नाम नहीं साध्या नाम परम साधनों का साध्य क्या है हरि ब्रह्म परमात्मा उनहीं को कहते हैं उनका भी साध्य क्या है बोले मंत्र खुद हरि जपते हैं यमुना के पावन पुलि कुंज में बैठकर के अशुभ प्रवाह करते हुए राधा राधा राधा राधा राधा तो कहेंगे निज मंत्र के यहां तो चर्चा हो रही है।

मान लो हमारी बात राधा राधा राधा राधा आगे सब खुल जाएगा। मान लो हम आपको जो बातें बता रहे हैं मान लो राधे वेस्टम संप्रदाय कर्ता आचार्य राधा मंत्र सद्गुरु मंत्रो राधा यस सर्वात्म वंदे राधा पाद पदम प्रधानम साध्य नाम य परमम परम साध्य मतद नाम उन्माद साध्य के हृदय में पैदा कर दे। ऐसा है यह नाम। ऐसा है मंत्र जो सब साधनों के साध्य हैं प्रभु उनको भी उन्मत्त कर दे। वो है यह निज मंत्र राधा नाम आंदा नाम पिच परम प्रेमंद माहो। आनंदों को भी आनंद प्रदान करने वाले प्रभु को जो प्रेमानंद में डुबो दे।

वह है राधा नाम जो प्रेमानंद नाम है यह हरि को भी उन्मत्त कर देता है श्रीमद राधा सुधाानिधि दे नाम भक्त मुक्त सुदा मत दूर च प्रेमंद रसम महा सुखकरमारितम प्रेमता उच्चारण करते राधा राधा और आंसू बहते हैं उनका नाम है प्रेमानंद गोविंद शरण जो यहां शरण है तो प्रेमंद गोविंद वहां से है दे नाम भक्त मुक्त सुदा मत दूरम चत प्रेमानंद रसम महा सुख करम कौन गोविंद जो गोविंद प्रेमानंद में उन्मत्त होकर राधा राधा रटते हैं तो प्रेमानंद कौन है राधा और उन्मत्तता किसके चढ़ी गोविंद के तो शरण में कौन है प्रेमानंद गोविंद शरण देवा नाम भक्त मुक्त सुदांत दूरम प्रेमंद रसम महा सुख करम चितम ये आपको जो मिल रहा है राधा नाम आपकी समझ में अभी नहीं आ रहा है श्री जी कृपा करें समझ में आ जाए अत्यंत दुह अत्यंत गढ़ अत्यंत अमृत गणिष्ठ मिल रहा है अगर पान कर पा जाओ तो निहाल हो जाओगे आप कहते हो पुराणों में नहीं लिखा है पुराण है राज दरबार के कानून और यह है महल का कानून आओ तुम्हें महल के ग्रंथों में दिखाएं अलग-अलग जो राजा राज दरबार में बैठकर

तुमने उसका प्रभाव देखा जैसे हरिवंश प्रताप रूप गुण भय बल श्याम उजागर जिसके भय से भयभीत होकर वायु चलती है। जिसके भय से भयभीत होकर मृत्यु अपना काम करती है। जिसके भय से भयभीत होकर सूर्य तपता है। जिसके भय से भयभीत होकर काल चक्र चलता है। वह हमारी प्रिया जो के निर्दन भकुट बदन अंबुज मृदु सरस हास मधुबूलन अति आसक्त लाल अल लंपट बस की बिन मोलन जैसी धरिवंश प्रताप रूप गुण वैबल श्याम उजागर जाकी भू विलास बस पसुरी दिन विथ की तर सागर देखो माई सुंदरता की सीमा कैसे तुम जानोगे भगवत रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोई समझ सके कहना राज दरबार में जिस राजा का वैभव देखा आओ हमारे साथ और महल के भीतर झांक के देखो उस राजा की जो महिमा तुमने देखी अगर धूल धरित ना लगने लगे तो बताना जब उद्धव जी प्रभु के पास थे तो गोपियां अज्ञानी नजर आती थी और जब गोपियों गोपियों के पास आए उनकी चरण धूल माथे पर लगी तो प्रभु बड़े कठोर नजर आए कि ऐसे प्रेमी जनों से विलग रह रहा है।

अरे कैसे वह जी रहे हैं इनके बिना उल्टा हो गया यहां आए तब आओ महल में तो पता चलेगा कि जिसके हुकुम पर प्रांत के प्रांत नष्ट किए जा सकते हैं वो यहां किसी की भकुटी संचालन से भी भयभीत होता है। सुन भयभीत वज्र को पंजर सूरत सुर रणधीर सूरत सुर रणधीर और किससे भयभीत है जैसे धरिवंश परम कोमल चित परम कोमल चित चपल चली पिय तीर तो सुन भयभीत वज्र को पंजर सूरत सुर रणधीर यश्या कटाक्ष सरपात विमूर्छितस कहा हो कैसे जानोगे भगवत रसिक रसिक की बातें रसिक बिना कोई समझ सके सात साध्या नाम यत परम परम साध्य मत मादा नाम साधनों के परम साध्य जिन्हें ब्रह्म कहा गया परमात्मा कहा गया भगवान कहा गया उनको ये उन्माद अवस्था प्रदान कर दे कौन बोले ये राधा नाम मानंदा नाम पिच परम प्रदानंद माहु बड़े बड़ों को उन्माद प्रदान कर देने वाले जैसे भगवान शंकर सरकाद इनको प्रेम उन्माद में छका देने वाले श्री कृष्ण ऐसे श्री कृष्ण को जो छका दे प्रेमानंद में वो है राधा य जा सकदेव गोकुल पते राकर्ष तक्षणा तत्काल श्री कृष्ण को अधीन करने की सामर्थ राधा नाम में तुम्हें क्या चाहिए धर्म अर्थ काम मोक्ष जो चाहिए मिल जाएगा थोड़ा धैर्य रख पहले पाप नष्ट होने दे धैर्य नहीं बिल्कुल हाथ में दही जमाना चाहते हैं।

अरे भाई समझो अनंत जन्मों के दुष्कृतों का नाश पहले होने दो। धैर्य पूर्वक लगो बहुत भाग्यशाली हो जो रोज सत्संग में तुम्हें सावधानी मिल रही है और धैर्य पूर्वक चल सकते हो। नहीं तो इतनी आंधी चलती है कि एक कदम परमार्थ में नहीं चल पाओगे। लड़खड़ा के गिर जाओगे। तभी कहा गया है कि संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दो। सुत दारा धन लक्ष्मी पापी के घर होए परमार्थ पर खड़े करना फिर चलाना और चल के बचा के सिद्ध कर देना यही रसिकों का खेल है तभी कहा गया कि गुरु गोविंद दो खड़े तो काके लागो पाए तो बोले बलिहारी गुरु आपने गोविंद तो पहले भी थे लेकिन हम माया में पिसते रहे वो मुस्कुराते रहे लेकिन जब गुरु रूप में आए तो बचा लिया गुरु रूप में आए तब तो इसलिए बलिहारी गुरु आपने जो गोविंद दियो बताए हे भाई अगर ये महिमा सुनने के बाद तुम्हें राधा नाम में प्रीति ना हो निज मंत्र में प्रीति ना हो तो पंडित जी वाली बात याद रख लेना अभी तुम्हारे कपार में और कुछ लिखा है नहीं मूसर से अभी कुछ लिखा है हां बोले सर्वाश य परम सु रहस्य बल नाम रहस्यम खुद कह रहे हैं कि जितने रहस्य उन समस्त रहस्यों को परम रहस्य है ये राधा नाम परम रहस्य है बस भगवत कृपा गुरु कृपा रसिकों की कृपा हो जिनको ये हृदय में बैठ जाए राधा राधा राधा कुछ भी हो अब छोड़ने वाले नहीं सर्वाशाम यत परम सुरास्या वलीना रहस्यम तुम कुछ और जानने की कोशिश मत मत करो।

यह अति रहस्य है। परम रहस्यों का भी रहस्य तुम नहीं समझ पाओगे। कहां लिखा है राधा नाम? तो तुम कितना पढ़े हो? कितने ग्रंथ पढ़े हो? यहां एक ट्रक ले आओ तो हमारी रस वाणियां उससे ज्यादा निकलेंगी। एक एक रसिक चार चार लाख न जाने कितने पद के रचने वाले हैं। अभी रस वाणियों को देखा है क्या? जहां वेद भी हाथ जोड़कर नमस्कार कर देता उसके आगे हमारी पढ़ाई शुरू होती है। वासुदेवा स्वरम के आगे हमारे स्कूल में भर्ती शुरू होती है। ये पीएचडी है कहारा नहीं है। [गला साफ़ करने की आवाज़] यहां सीधे नित्य बिहार रस प्रिया प्रीतम का अद्भुत अगर तुम यहां की बात समझना चाहते हो तो रसिकों की बात सुनो जहां वेद भी नहीं।

वेद तो जो रस नेति नेति श्रुति भाख्यो और ताको ते अधर सुधारस चाख्यो जाह बिरंच उमापति नाए तापे त ते बन फूल बिनाए कहां जान पाओगे बहुत कृपा है जो समझ जाओ तो बोले राधे तेवम जप तद निशो सार्थ संस्मृत अनन्य ये रहस्यों का परम रहस्य है राधा राधा इति बोले यदि जप तदनशम रात दिन इसको जपो और साथ में स्मरण करते रहो जप के साथ में कहा सार्थ संस्मृत अनन्य तीन बातें कही ध्यान दो पहले कहा कि जप करो इसका रात दिन फिर दूसरा कहा सार्थ साथ में संस्मृति स्मरण रा धा तीसरा कहा अनन्य इसी के अनन्य हो जाओ रसना कटो जो अन रटो अभी आनंद आ जाएगा राधा नाम कैसे स्वीकार करना है बोले रात दिन जपना है दूसरी बात ध्यान करते हुए जपना है राधा संस्मरण स्मरण के सहित तीसरी बात इस नाम के अनन्य हो जाए फिर क्या होगा तो बोले ये उल्टा हो जाएगा राधा का उल्टा क्या होता है?

धारा आपके अंदर रस धारा बहने लगेगी। उसका आगे का श्लोक साउदिक मधन माधुरी सारधारा प्रेमंदो मदरस चमत्कार सर्वस्वधारा अस्माकम वासवा वेद कोस वास कस्या पेशा परम हृदयस धारेथा जो इस राधा नाम को धारण करता है तो उसके हृदय में सायूषद मदिन माधुरी सारधारा उसके हृदय में महान प्रेमामृत रस की धार बहने लगती है। राधा नाम सुधा रसम और यहां रसधारा प्रेम रस धारा हृदय में बहने लगेगी। पता कैसे चलता है? जब रसधारा बहती तो छलकने लगती है। आंखों से छलकती है। हृदय की रसधारा कंठ होते हुए आंखों कंठ को अवरुद्ध कर दिया।

आंखों से असुर बहरा रोमांच छोरा वृंदावन की रज लगी है। निहाल करने वाला हो गया। गदगद सुर नैना सजल और दंपति रस रहे भीन इगत वृंदा विपिन में फिरे प्रेम तलीन साउ सादिक मधित सन माधुरी सारधारा उत्कृष्टुर्य का सार प्रेमामृत उसके हृदय में प्रवाहित हो जाता है। किसके हृदय में जो राधा राधा ये जब प्रेमामृत प्रवाहित हो गया तो बचा क्या? लोग यही नहीं समझ पाए। हमें प्रेम नहीं चाहिए। हमें प्रभु नहीं चाहिए। हमें मोक्ष नहीं चाहिए। हमें कल्याण नहीं चाहिए। अरे ये वो बात कही जा रही है जिसके प्राप्त होने के बाद कुछ नहीं चाहिए।

सब कुछ हो जाता। प्रभु मिल गए तो अनंत ब्रह्मांड हमारे कब्जे में हो गए। तुम समझते नहीं। एक एक चीज पकड़ोगे तो अनंत वासनाएं कभी पूर्ति नहीं होगी। अनंत को पकड़ लोगे कुछ आप पूूर्ति रह ही नहीं जाएगी। जिसके पाने के बाद कुछ पाना बाकी नहीं रहता उसे भगवत प्राप्ति कहते हैं। इसीलिए कह रहे भगवत प्राप्ति लक्ष्य रखो। इस राधा नाम धन का प्रयोग भगवत प्राप्ति के लिए करो। अनंत जन्मों से भटक रहे हो। समझ नहीं आ रही। यह चार दिन की समस्याएं हैं निपटंगी लेकिन अनंत जन्मों की आगे की जो समस्याएं हैं उनको निपटाएगा राधा नाम तुम चिंता क्यों करते हो वर्तमान को भी संभालेगा पर धैर्य तो रखिए धैर्य नहीं रखोगे तो फिर इस मार्ग में खड़े नहीं रह पाओगे प्रेमानंदो मदरस चमत्कार सर्वस्वधारा ये प्रेमानंद उन्माद प्रकट करके एक अद्भुत चमत्कार प्रकट कर देगी क्या राधा नाम की धारा राधा राधा राधा अस्माकम वास सुभग तवा वेद कुस वास्यात श्रीपाद कह रहे कौन जानता है मेरी इस बात को वेद नहीं

उनकी पहुंच नहीं है कौन जानता है मेरी इस बात को जो मैं कह रहा हूं अभी तक जो सुन रहे हो कौन जानता है तो बोले वेद प्रमाण बोले वेद नहीं जानते इस बात को अरे फिर वेद को तो भगवान ने गीता जी में कह दिया त्रिगुण विषय वेदागुण भवजुन वेदातीत होने के लिए देवर्षि नारद जी बोल दिए ये तो नौ निवत्त निकुंज का प्रेम है कौन जानता है अस्माकम इसको कौन जानता है वासुभग इस महान सौभाग्य को कौन जानता है कोस जब वेद नहीं जानते तो अन्य कौन बचा कश्यापेशा श्याम है कोई तुम्हारी नजर में जो इसे जानता है बोले एक है परम हृदय उ्लास धारे दो अर्थ जिसका दो अर्थ निकला राधा और धारा बोले वही वही जान पाता है जो इस धारा को चला रहा है राधा राधा राधा राधा तो चल पड़ी प्रेम रस धारा वही केवल जान सकता है दूसरा नहीं जान सकता दूसरा का कोई प्रमाण नहीं दे सकता।

हृदय उ्लास धारे तद इस मंत्र का सीधा अर्थ है हृदय में प्रेम रस धारा प्रकाशित कर देना। ये परा विद्या है राधा परा विद्या है बीज मंत्र है ये महा प्रेम का निकुंज श्री वृंदावन कुंज देव निशम गोपाधिराजत्मजे श्री वृंदावन की निकुंज देवी है हमारी स्वामिनी जो तुम यदि प्रति रात्रि नाभता दिनममगतम प्रक्षत आत्मा वते रात्रि का मतलब केवल रात्रि से मत ले इसे मोह रात्रि में ले सब मोह रात्रि में स्वप्न देख रहे तुम जाग जाओ स्वप्न देखना कितने लोग हैं कह रहे हैं कि हमारी जो हमारे कुछ स्वप्न है उनको हम पूरा करेंगे अरे बावरे स्वप्न कभी पूरे होते हैं कह रहा है स्वप्न अर्थात झूठा झूठी की कल्पना और वो कह रहा है कि भगवान तो तभी जो हमारे कुछ स्वप्न है वो पूरे कर दे।

अरे भगवान तो जागृत को भी स्वप्न कर रहे हैं। मां कहूं मैं अनुभव अपना सत हरि भजन जगत सब सपना कैसे समझ में आवे सोते हुए स्वप्न देखने वालों को लाख लाख जगाओ पानी डाल के जगाओ चाहे जैसे धक्का लगा के जगाओ ये करवट बदलते फिर सो जाते हैं। कैसे जगेंगे? अच्छा कुछ तो ऐसे हैं जो जग के सोने का नाटक कर रहे हैं तो उनको तो जगाया ही नहीं जा रहा। जो असली में सो रहे हैं वह तो जग सकते हैं लेकिन जो जग कर सोने का नाटक कर रहे हैं उनको जगाना बड़ा कठिन है। जाग जाओ भैया। देखो तुम अकेले आए हो।

तुम्हें अकेले ही जाना है। जाग जाओ। कमाई करने आए हो। ये परदेश है। तुम्हारा ये घर नहीं है। घर तुम्हारा वृंदावन धाम है। घर वाले प्रिया प्रीतम और सहचरिया है। तुम भूल गए हो। यहां तुम आए हो। तो अब अपनी भूल मिटा दो। यहां तुम्हारा ना कोई जननी है, ना कोई जनक है, ना कोई बंधु है, ना कोई सुरद है, ना कोई रिश्ता है, ना कोई नाता है। तुम बाबा जी हो। इसीलिए बोलते हो हम तो गृहस्थ है। तो तुम भी नाता किए हो तो कृष्ण से किए हो। दूसरे से नहीं किए जान नहीं पा रहे। नहीं उस शरीर से जब कृष्ण अंतर्ध्य हो जाते हैं तो क्यों जला देते हो?

रख लो शरीर को। कृष्ण को तो देखा नहीं जाना नहीं लेकिन अनजाने में भी श्री कृष्ण से ही प्यार करते हो। कृष्ण आकर्षण जो सबके हृदय में एक पावर रूप से विराजमान परमात्मा तत्व उसी का आप आदर करते हो। हे अकेले आए हो। अकेले जाओगे। रात में उठो और खूब भजन करो। आत्म माने इस मोह निद्रा से उठो और भजन में लगो। भजन करके ही आप इस माया के जो अंधकार है यह विध्वंस कर सकते हो। अन्यथा कुछ का कुछ आपको दिखाई देगा। ठूठ का भूत नजर आएगा। रस्सी में सांप नजर आएगा। यह बहुत बुरा अंधकार छा गया है।

अंदर कुछ नहीं है। किसी भी भोग में सुख नहीं है। किसी भी संग्रह में सुख नहीं। पर बुद्धि मलिन है इसीलिए इसी में लगी। हमारे आराध्य देव की हम पर बहुत कृपा हो गई है। ये जो सत्संग आप सुन रहे हो मंत्र महिमा नाम महिमा ये बड़े-बड़े महान रस में डूबे हुए हमारे लिए ये गा रहे हैं। इसलिए पकड़ लो। जो तुम्हें मंत्र मिला है, जो नाम मिला है, इसकी परिपक्व अवस्था तुम्हारे और कृपा से दोनों से होगी। तुम्हारी कृपा जरूरी है। वैसे सबकी कृपा हो गई है। बस आपकी कृपा बकाया रह गई।

आप अपने ऊपर कृपा कर लो। किसी के आशीर्वाद की जरूरत नहीं। आप अपना आशीर्वाद अपने ऊपर कर लीजिए। दूसरे के तो बहुत आशीर्वाद है। आपका आशीर्वाद आपको नहीं मिल रहा है। बस इसीलिए आप परेशान हैं। आपका आशीर्वाद हां अपने ऊपर कृपा कर लीजिए। आप अपना अपने आशीर्वाद से अपना उद्धार कर लीजिए। तो इसको तो तुम वही कर्म करवा रहे हो जिससे नरक प्राप्त हो औरों के आशीर्वादों की आकांक्षा करते हो तो नहीं हो पाएगा भाई नहीं हो पाएगा देखो आज कुछ ऐसी हवाएं चल पड़ी है परमार्थ को जानना मुश्किल है कैसे कैसे नौटंकी नाटक मतलब आश्चर्य होता है कि तुम उपदेशक के मंच पर बैठकर ऐसे कैसे बोल सकते हो अगर अगर बोलने को तुम्हें सौभाग्य मिला है तो जो सुखदेव जी ने बोला है व्यास भगवान ने बोला है श्री कृष्ण चंद्र जो बोले वो बात बोलो जिससे वो कान में जाए समझे ना समझे मंगल होगा ऐसी वार्ता तो ना बोलो जिससे सत्य मार्ग का अस्तित्व ही लुप्त हो जाए सुनने वाले के हृदय से आज बहुत संकट में धीरे-धीरे हमारे धर्म ग्रंथों का रहस्य पड़ता चला जा रहा है क्योंकि इनके इनके लिए जो हम मंत्र जाप करके बुद्धि पवित्र होती सो अर्थ बता सके।

नहीं तो केवल मनोरंजन रह गया कि सामने वाला केवल प्रसन्न हो जाए। इसके लिए शास्त्र रचे गए हैं। हमारे सामने तो हमारा काम बन जाए। ये शास्त्र है। शास्त्र का ये स्वरूप नहीं है। तुम्हारी जेब भर जाए जो जन्मजनम से खाली रही। किससे? नाम से भर जाए। तुम्हारी नाम में रति हो। भगवान में रति हो। तुम्हारा यह जीवन मंगलमय सुखमय जाए। अगर कहीं अगला जन्म हो तो तुम महा भागवतों के रूप में जन्मो। तुम्हें माया फंसाकर रौंद ना सके। इसलिए सत्संग है। इसलिए धर्म शास्त्रों की रचना भगवान को कुछ बोलने की जरूरत थी।

क्या जिन्होंने इस माया प्रपंच को रचा उन्होंने माया मुक्त करने के लिए सूत्र रच दिए। ऐसे चलो तो फसोगे नहीं। कैसे चल गेम है गेम ये भगवान ने अपने आप से अपने आप में खेल रचा है। तुम भी उसी अपने आप में अपने आप को देखो मुक्त हो जाओगे। अब यहां केवल सामने वस्तुएं रखी हैं। केवल भोग सामग्री केवल पद प्रतिष्ठा केवल संसार का अस्तित्व और यह संसार का अस्तित्व इन सबको मिटाने वाला है। और हम सजाने वाली बात करते हैं। बहुत बहुत अपने कानों को प्राय बचा करके रखो। जहां सत्य मार्ग की चर्चा मिले तो सुनो नहीं तो नाम जप करो।

एकांत सेवन करो। ऐसी कोई बात मत सुनो जो नाम रूप लीला धाम से आपको विलग कर दे नहीं तो जीवन की बड़ी भारी हानि हो जाएगी और उपासक अपने आराध्य देव को सबके दर्शन से बचावे ये बड़ी गढ़ बात हम आपको कह रहे हैं अब जब खुलकर के जैसे यहां सेवा हो रही हो बात अलग है जब उनका आदेश हो जाए नहीं तो अपने आराध्य देव के दर्शन से जैसे कहते हैं ना सबकी श्री जी सबकी श्री जी नहीं तो हमारी श्री जी है। हम चाहेंगे तो आपको दर्शन करने देंगे अन्यथा नहीं करने देंगे। इस पर तुम्हारा अधिकार नहीं है।

अपनी जो श्री जी है इस पर केवल अपना अधिकार है। पूज्यपाद शिव बाबा जी महाराज परमात्मा सर्वव्यापी सबकी वस्तु है। पक्का पर प्यारे लाडले प्रभु अपनी वस्तु है। जो हमारी पूजा में विराजमान है। हम छूने दे ना छूने दें। पूजा करने दे ना करने दे। दर्शन करने दे ना करने दे। इसमें मेरा पूर्ण अधिकार है। यह सबकी वस्तु नहीं है। ये सिर्फ हमारे हैं। जैसे पृथ्वी पर सबका अधिकार है। लेकिन उस पृथ्वी में हमने मकान बना लिया। अब मेरा अधिकार घुसने दे ना घुसने दे। आने दे अंदर ना आने दे।

पृथ्वी पर सबका अधिकार है। परमात्मा पर सबका अधिकार है। लेकिन जो हमने प्रभु की सेवा विराजमान की इस पर सिर्फ मेरा अधिकार है। हम चाहे तो तुम छू लो। हम चाहे तो तुम देख लो नहीं पर्दा लगा देंगे। ये तुम नहीं कह सकते कि खोलो श्री जी सबकी है। नहीं सबकी श्री जी ढूंढो जाके। ये हमारी पर्सनल श्री जी है। ये हमारे पर्सनल ठाकुर है। जैसे पृथ्वी सबकी मकान हमारा जितने में हमारा मकान बन गया है। इसके अंदर आने दे तो हम आने दे ना आने दे तो ना आने दे। इसलिए उपासक जब तक भगवदाकार वृत्ति ना हो जाए।

अपने आराध्य भगवदाकार वृत्ति कि अपने आराध्य देव अपने से बात करने लगे। तब तक अपने आराध्य देव को प्रदर्शन ना बनावे। कोकिल साईं कभी किसी को दर्शन नहीं करने देते थे। जब कोई विशेष प्रेमी महाभागवत तब ले जाते थे। ये कहते थे कि हमारे लाडली लाल से कुछ कह मत देना। कुछ कहना नहीं तो हम दर्शन करा देंगे। क्या मतलब? वो मूर्ति समझ रहे हैं। देखो जरा वो खेल रहे हैं। तुम कुछ बोल दोगे वो तुम्हारी तरफ आकर्षित हो जाएंगे। परस्पर उनके खेल में कुछ बोलोगे नहीं बस चुपचाप दर्शन कर लो तो ओ महा भागवतों से अन्य का तो प्रवेश ही नहीं था इसका कुछ रहस्य है अपने ठाकुर जी को प्रदर्शन ना बनाए अपनी सेवा को प्रदर्शन ना बनाए अपने भजन को प्रदर्शन ना बनाए उपासक यदि व्यवहार में उतार देगा अपनी उपासना को तो फिर सिद्ध नहीं हो पाएगा जब तक अपने आराध्य देव से बात ना होने पावे तब तक आराध्य देव गुप्त ही रहने चाहिए और जब आराध्य देव से बात होने लगे फिर उनकी इच्छा है कि चलो हम मंगल तो बात अलग

ये गुरुदेव भगवान को भी देखा अब वो दर्शन ऐसे जो नाम सेवा है घंटों ऐसे घंटों श्री जी का नाम सेवा ऐसे ले घंटों ऐसे क्या उनको दिखाई दे रहा है बार-बार बार-बार और यह सब होता बंद बंद करके दरवाजा कभी सेवा प्रकट वो तो सेवा में थे इसलिए दर्शन नहीं किसी का और देखो आज वही प्रगट में सेवा हो रही है प्रगट में सबको ये साधक को ये सावधानी है कुछ गुण राशि इसलिए महापुरुष जन कह रहे हैं उसमें क्यों म ना करके अपनी भावना को पुष्ट करना चाहिए और यह ध्यान रहे कि भगवान को भोग पाने की इच्छा नहीं क्योंकि वह नित्य तृप्त पूर्ण काम है।

भक्त का भाव भगवान की भूख लगाता है। जैसे भोजन की खुशबू जो है भूख ना लगी हो तो भी लग जाएगी ना। बढ़िया ऐसे बने हो तो देख के लगे। चलो भाई ऐसे ही भगवान के अंदर भूख पैदा होती भाव से। भक्त का भाव अगर भाव नहीं है तो पूज्य बाबा कह रहे भगवान नित्य तृप्त पूर्ण काम है उनमें कभी भूख पैदा नहीं होती जब सेवा करने वाला देखा है हमने कि दो रोटी से भोग लगा गरम गरम रोटी घी लगा के दौड़ के जा रहे हैं एक एक परोसते जा रहे हैं ऐसे एक साध छोटे-छोटे टुकड़े करके पवाते जा रहे हैं एक व्यजन कर रहे हैं पंखा कर रहे बीच-बीच में थोड़ा अनुकूल जल पिलाते कभी मीठा पवार भाव ये नहीं कि थाल ऐसे रख दिए पर्दा लगा दिया चले गए ऐसे और कुछ लोग तो सुबह चिरोरी और गिलास

में पानी रख दिया शाम के हटा दिया ऐसा तुम्हारे साथ बर्ताव हो किसी रिश्ते नातेदार के यहां तो क्या होगा जिस कमरे में हो उसी चार पाई के समीप आकर के एक टेबल रख दे एक गिलास पानी थोड़ी चिरौरी रख दे पर्दा लगा दे बाहर से या तो दरवाजे में ताला अब कैसा लगेगा आप तो पाओ बाल भोग में हलवा और चाय बिस्कुट और ये वो और ठाकुर जी के आगे छोटी कटोरी में चिरोरी रख दी परिणाम क्या होगा जानते हो हां अपराध बनेगा क्योंकि सेवा विराजमान किए हो परिणाम में आपको फिर संकट घेरेंगे परेशानी आएगी अगर ठाकुर जी घर में विराजमान किए हो तो अपने पर्सनल ठाकुर जी हैं तो वैसे हैं जैसे लाडला पुत्र अपना अपना पुत्र कैसे कोई महानुभाव तो कि अब हम बाहर जा रहे हैं पड़ोसी को दे दिए कभी दो पुत्र अपना पड़ोसी को दोगे पुत्र अगर देने की भी बात आ गई तो हृदय हमारा कहेगा नहीं वो कैसे प्यार करेगा जैसे हम प्यार करते हैं हमारे साथ ठाकुर जी जाएंगे या ठाकुर जी की व्यवस्था होके घर में ही कोई एक रहेगा अब हम कहते हैं साथ रखो पर ठीक है फिर उनका सम्मान भी रखो।

उनको ऐसे सम्मान से रखो ठाकुर जी को साथ ले जाते हुए जैसे ठाकुर जी को रखा जाता है। सेवा का मतलब है स्वामी अधीन हो जाते हैं। बहुत बड़ी बात है जो सेवा विराजमान करना है। देखा जाता है ठाकुर जी बहुत ऐसे हो गए। ऐसे तो सेवा बताती है कि तुम ठाकुर जी को प्यार नहीं करते। तुम तो ऊपर से बहुत चिकने सब लगाए। ठाकुर जी कैसे हैं? उनका कैसा चेहरा होगा इसका सेवा बताती है कि तुम कैसे सेवा इसी सेवा से प्रभु की प्राप्ति हो जाएगी भाव पूर्वक भोग लगाओ तुमको भूख लग जाएगी भाव पूर्वक आभूषण पहराओ तो तुमसे कहने लगेंगे कितने भक्तों से ठाकुर जी बात करने लगते हैं जो तन्मय हुए हमको आज ये इस रंग की पोशाक चाहिए आज हमको ऐसा भोग चाहिए आज हमको यह पदार्थ चाहिए अगर भूल गए शयन में जल रखना तो स्वप्न में आकर बोले देखो आज तुमने शयन में जल नहीं रखा आज तुमने रजाई तो वहां जाकर देखा तो नहीं ठाकुर जी बात करने लगते हैं अपने इष्ट के सिवा अन्य किसी इष्ट विग्रह का अपमान ना करें उपासक यही विचार करें कि हमारे इष्ट ही इन विभूतियों के रूप में विराजमान है।

जैसे हम रसिक अनन्य उपासना में हैं। अब हम जा रहे हैं परिक्रमा लगा रहे तो केसी घाट में हनुमान जी का अर्चा विग्रह विराजमान अब आरती हो रही है। तो अब यह नहीं है कि हम नहीं खड़े हो गए हाथ जोड़े दो चार आरती राधा वल्लभ लाल की जय हो मेरे प्रभु और चल पड़े। कभी किसी श्री विग्रह का अपमान ना करें। कहीं आरती हो रही है कहीं मान लो आपकी दृष्टि नहीं पड़ी बात अलग हो अगर दृष्टि पड़ गई कि अमुक ठाकुर जी यहां विराजमान है तो गरीबा झुक जानी चाहिए राधा वल्लभ लाल की जय प्रभु आगे निकल जाए क्योंकि हमारे ही प्रभु विभिन्न रूपों में विराजमान है उपासक को थोड़ा ज्ञान भी होना चाहिए इस बात का कि हम और हमारे प्रभु से हमारा क्या संबंध है।

एक बार सभा में हनुमान जी से पूछा गया कि तुम प्रभु से क्या संबंध रखते हो? तुम ज्ञानी हो या भक्त हो? क्या कहोगे अपने आप को? दो प्रश्न प्रभु से क्या संबंध रखते हो? तुम ज्ञानी हो या भक्त हो? हनुमान जी ने विचार किया कि मैं प्रभु का सेवक हूं तो सेवा का ज्ञानी कैसे हो सकता है? ज्ञान समुद्र प्रभु का यदि मैं अपने को अज्ञानी कहता हूं तो मेरे प्रभु पर दोष आता है कि ज्ञान समुद्र प्रभु का सेवक अज्ञानी कैसे हो सकता है? हनुमान जी बोले शरीर दृष्टि से मैं भगवान का भक्त हूं।

सेवक हूं और यह हमारे स्वामी हैं। जीव दृष्टि से मैं अंश हूं। यह हमारे अंशी हैं। और तत्व दृष्टि से जो यह है वो यहां है। इतना ज्ञान गुरुदेव भगवान आरती ऐसे कर रहे थे। पूछा प्रभु इधर आरती वो समझ में आ रहा था पर श्री मुख से सुनना तो उनका जो सिंहासन में विराजमान है वो यहां भी विराजमान ऐसे जानना कठिन है भाव का विषय भक्त को साधना अवस्था में भले परिचय ना मिले लेकिन सिद्धावस्था में परिचय मिल जाता है कि जो मंदिर में विराजमान वही यहां विराजमान है। अब कोई भेद नहीं रह गया।

उपासक को चलते फिरते उठते बैठते खाते पीते हर समय जब अपने इष्ट की स्मृति में रहेगा तब इष्टाकार वृत्ति होती है और इष्टाकार वृत्ति जब ही हुई तो भूत भविष्य वर्तमान तीनों काल का ज्ञान हो जाता है उसे क्या हुआ है क्या हो रहा है क्या होगा इष्टाकार वृत्ति होती है किसका का जगत का नहीं जगत का चिंतन तो कब छूट गया अपने इष्ट का पूर्व में क्या लीलाएं हुई वर्तमान में क्या हो रही आगे क्या होने वाली है यह ज्ञान प्राप्त हो जाता है जहां कृष्णाकार भगवदाकार इष्टाकार वृत्ति हुई फिर उसके लिए कुछ दुर्लभ नहीं रहता सब ज्ञान सब रहस्य सब प्रेम साक्षात्कार सब कुछ लीला दर्शन सब खास बात है इष्टाकार वृत्ति वो कैसे होती है बोले उठते बैठते चलते फिरते खाते पीते हर समय इष्ट की स्मृति इष्ट का ध्यान उपासक कब समझे कि हमारी भक्ति चरम लक्ष्य में स्थित हो गई है।

बोले जब केवल प्रेम ही प्रेम की मांग रह जाए। दुख सुख मान अपमान इनकी कोई भान वृत्ति ना रह जाए और केवल प्रेम ही प्रेम प्रेम में प्रेम की चाह तब समझे भक्ति का चरम लक्ष्य जागृत हो चुका है। तुम्हें कोई गाली दे तुम्हारी भाषा में खूब अच्छे से समझते हो। तुम्हें ऐसे दुख ना हो जैसे कोई तुम्हारी विदेशी भाषा में तुम्हें गाली दे जिस भाषा को नहीं जानते तो तुम उसके मुंह की तरफ देख के बस चल दोगे मुस्कुरा कुछ बोल रहा है बस ऐसे तुम्हारी भाषा में तुम्हें गाली दे मुस्कुरा के चल दो तो समझो भक्ति का चरम लक्ष्य जागृत हो रहा है तुम्हारा अपमान हो तुम्हारी निंदा उसे बहुत अमृत है सच्ची कहते हैं तिरस्कार अपमान निंदा ये भगवान की प्राप्ति करा के ही रखती है भक्त को अनुकूल ूलता नमस्कार सम्मान प्रणाम भगवान बचावे ये जहर कभी पीने को ना मिले अगर यह जहर मिल जाता है तो फिर आगे कदम नहीं बढ़ पाते परमार्थ के ये देह बुद्धि कब नष्ट होती भक्त की कि मैं स्त्री हूं मैं पुरुष हूं।

बोले जब भगवत बुद्धि जागृत हो जाती है सबसे पहली प्यारी चीज है भगवत स्मृति इतनी याद में खो गया कि देह की स्मृति नहीं रहे और पूर्ण रूप से देह भाव का त्याग होता है भगवत साक्षात्कार के बाद महाराज जी भगवान में प्रेम होना तो बड़ा कठिन है वो दिखाई तो देते नहीं दिखाई दे तो ज्यादा जल्दी प्रेम हो जाए। अब देखा तो है नहीं तो कैसे प्रेम करें? उनके नाम से उनके नाम में बहुत सामर्थ्य है। उस नाम का निरंतर चिंतन यदि करोगे तो तुम्हारे चित्त के सारे विक्षेप नष्ट हो जाएंगे।

श्री कृष्ण को कहा गया है आकर्षणकारी लेकिन नाम में इतनी सामर्थ है कि श्री कृष्ण का आकर्षण कर ले। यह बात अनुभवी महापुरुष ही बोल सकते हैं। श्री कृष्ण का आकर्षण त्रिभुवन को आकर्षित किए और नाम श्री कृष्ण का आकर्षण कर लेता है। इसलिए बिना देखे भी परम सिद्धि को वो प्राप्त होते हैं जो निरंतर नाम जप करते हैं। महाराज कहते हैं कि कृपावान ही भजन करता है। कृपा तो सब पर है। फिर सब भजन क्यों नहीं करते हैं? सब पर मोरी बराबर दया महात्मा और भगवान की कृपा सबके ऊपर समान होती है।

उत्तर पर जो भगवान या महात्मा की आज्ञा का पालन करता है वही उस कृपा का पात्र बनकर कृपा को रोक पाता है। अन्यथा प्रवाह है निकल गया। जो महात्मा या भगवान की आज्ञा में स्थित रहकर परिस्थिति के अनुसार ना चलकर उसमें अंतर ना आने दे परिस्थिति के अनुसार बोले दुखद परिस्थिति आई भजन छूट गया आज्ञा का पालन नहीं हो पा रहा ऐसा नहीं सुखद परिस्थिति आई भूल गए प्रभु को भूल गए उनकी आज्ञा ऐसा परिस्थिति के अनुसार नहीं वो भगवत प्रसाद वो महापुरुषों का प्रसाद प्राप्त करता है जो उनकी आज्ञा में पूर्णतया स्थित रहता है।

ये महात्माओं की निंदा क्यों होती है? बड़े-बड़े महात्माओं की ये निंदा क्यों होती है? जब इस कोटि के महापुरुष होते हैं तो उनकी निंदा संसार में लोग क्यों करते हैं? दो स्वरूप है। एक है भक्ति दूसरी है माया। जब वो भक्ति या ज्ञान के द्वारा सिद्ध होते हैं तो जो माया के सिद्ध होते हैं उनके हृदय में अपने आप द्वेष हो जाता है। माया सिद्ध कामी क्रोधी लोभी मोही ये देखते हैं जब संतों को तो अपने आप इनके आंख पैदा हो जाती है। ये कुछ है ऐसा कि ये माया के पार्षद जो है ये आए हैं देखने के लिए थर्मामीटर डालने के लिए।

पर वो थर्मामीटर भक्तों में होता है। मायावियों में तो होता नहीं। भक्ति से जान सकते हो माया के द्वारा नहीं तो महापुरुषों की जब प्रभाव और यश का विस्तार होता है तो जो मायावी जन होते हैं माया के दास होते हैं उनके हृदय में भयंकर द्रोह पैदा हो जाता है द्वेष पैदा हो जाता है इतनी जलन उनको होती है कि वो किसी भी तरह मिटा पाए बस ये बात होती है किसी भी तरह मिटा पावे पर सीम की चाप सके कुतासु ब रखवार रमापति जासु जिनके भगवान रक्षक है उनको कौन नष्ट कर सकता है? तो इसलिए उपासक को यह भी तैयारी रखनी है कि अपमान निंदा तिरस्कार यह हमारे इस मार्ग के पुरस्कार हैं।

मिलेगा मिलता रहा है। मिला है मिलेगा। पक्का जैसे अपने लोग हैं ना तो बहुत अच्छे से मिलते रहे पूरे जीवन पूरा अभ्यास रहा है इनका उनकी कृपा रही है प्रभु की कि ऐसे ऐसे महीना दो महीना में एक दो टेबलेट मिलते रहे हैं कि आपका मान सम्मान यश कीर्ति से जो जहर बढ़ा है वो एक टेबलेट में नीचे उतर जाए उतारते रहते हैं किसी न किसी महापुरुष को भेज के माया के महापुरुष और वह ऐसा बर्ताव कराते हैं फिर पूछते हैं अब क्या होता है आपकी बड़ी कृपा तो आगे निकल गए हम ही थे और कोई नहीं था हम ही थे और कोई नहीं था ये तो हम आपसे प्रश्न कर रहे थे साधक इस बात पर सावधान रहे कि जब उसकी निंदा हो अपमान हो तो समझे कि मेरे प्रभु मेरे सामने पढ़ा के जगतगुरु अब वो प्रश्न कर रहे हैं।

मुझे सहन करके आगे निकलना है। आज के सत्संग का सार कुछ समझ में आवे जनावे जो मंत्र मिला है नाम मिला है हर समय जपो ये सब कुछ प्रकाशित कर देगा और खास बात हम कैसे हैं हमें ये भूलना होगा हमारी प्रियाजु कैसी हमें यह याद रखना होगा अगर हम अपनी याद रखें तो बर्बाद हो जाएगी पक्की बात है आज तक की तुम्हें बात बता रहे हैं भाई अपने घर में जैसे बात की जाती है अगर इस मार्ग में चलना है तो यहां क्या हो रहा है? यहां क्या होना चाहिए? और यहां क्या होगा? यह तीनों जिम्मेवारी हमने अपने प्रभु को दे रखी है।

और हम चैन से सोते हैं। जो हो रहा है वह आप कराओ। जो होना हो वह भी करवा लेना। जैसे भी है हम आपके हैं। आपके सिवा हमारा कोई है नहीं। आपको अब हम छोड़ने वाले नहीं। पक्की यह हृदय में बैठा लो। इसलिए बार-बार कह रहा हूं कि बहुत तूफान चलते हैं माया के। कभी दक्षिण वायु कहीं उतरा रही उत्तर की कभी पछिया कभी पूर्वैया साधक इधर टटिया लगावे तो उधर उड़ा जा रहा है। उधर लगावे तो उधर उड़ा जा रहा है। बहुत गंभीरता से विचार पूर्वक ये सब निर्णय की बात हम आपको कह रहे हैं। हमको अपने चिंतन की वृत्ति छोड़नी होगी।

तभी आगे बढ़ पाओगे। नहीं आपको बीचबीच में लगेगा कि परिवर्तन तो हुआ नहीं। ऐसी माया है। यह हम खूब एकांत में विचार करके बोल रहे हैं। इसलिए सबसे प्रार्थना है। प्रार्थना है कि अपने को भूलना होगा। इस मार्ग में अपने भक्ति मार्ग की बात कर रहा हूं। हमारे आराध्य देव का स्वभाव कैसा है? उनका प्रभाव कैसा है? वो कितने करुणा में? यह याद रखना है और अपने में क्या है यह भूलना पड़ेगा नहीं तो बार-बार आप विक्षेप को प्राप्त होंगे। यहां माया आपको ऐसे विचार देगी ऐसे आपको दर्शन कराएगी जिससे आराध्य देव का सानिध्य छूट जाए।

उनका भरोसा छूट जाए। अब हम जैसे हैं। अगर शरणागति के सत्संग को याद करो आप। तो उसमें यह कहा गया था उपासक जब अपनी चिंता करता है तो शरणागति पर कलंक लगाता है। ठीक है? अब हम क्या कर सकते हैं? हम तो आपकी शरण में हैं। हम जैसे भी हैं मलिन विचार, अच्छे विचार आपने हमको वरण किया है ना। हम तो आपको वरण बाद में किया। पहले आपने हमें वरण किया है। वकालत में हम लोग जीत जाएंगे। हमने आपको वर्ण नहीं किया है। हम तो जानते भी नहीं थे आपको। आपने चयन किया पूरे संसार से। अलग-अलग बुलाया।

कोई हरियाणा से आया, कोई पंजाब से आया, कोई उत्तर प्रदेश से, कोई तो पकड़ के मंगाया ना अपने अपने भाव द्वारा घसीटा। जब उन्होंने चयन कर लिया है तो क्या देख के चयन किया है? हम में कोई विशेषता थोड़ी देखी है। हम में अधमता देख के चयन किया है। ये बेचारा साधन करके भगवत प्राप्ति नहीं कर पाएगा। अब हमको साधन से क्या मतलब है? तो किससे मतलब है? जिन्होंने हमको पकड़ा हमको उनसे मतलब है। उनका स्वभाव कैसा? उनका प्रभाव कैसा हमारी बात मान लेना हम हंसते हंसते वो बात कह रहे हैं जिससे आप निहाल हो जाओगे अपने को देखोगे कदम लड़खड़ा जाएंगे उनकी तरफ देखोगे भाग पड़ोगे अपने देखने से कभी कल्याण नहीं होगा उनकी तरफ देखने से ही कल्याण होगा अपने देखने से बहुत दुखी हो जाते हैं उनकी तरफ देखते हैं तो बहुत सुखी हो जाते हैं हमें सुखी होना है हमें आनंदित होना है हमें अपनी तरफ नहीं देखना हम नहीं संभल पाएंगे नहीं सुधर पाएंगे कब तक जब तक उनकी तरफ नहीं देखेंगे।

हम अपने को देखकर पावरहीन होते हैं। उनको देखकर के हमारे अंदर पावर आती है। जब भरत जी अपनी तरफ सोचते हैं तो कदम लड़ाने लगते हैं। जब सियाराम जी की तरफ सोचते हैं तो उत्साह संपन्न होकर चलते हैं। तो हम अपनी प्रियाजु की तरफ देखें। जैसी परिस्थिति रोज कट रहा है। रोज के रोज आयु क्षीण हो रही है। मृत्यु के नजदीक जा रहे हैं। हमारे पास राधा नाम धन है। हमें दुर्गति की कोई परवाह नहीं है। हिसाब नहीं कर पाएगा कोई त्रिभुवन में इतना माल हमारे पास है। बोले आपके पास है क्योंकि आप भजन करते रहे।

हम एक नाम की बात कर रहे हैं। एक बार तो सुन ही लिया ना अभी राधा भले ना बोला हो तो इसका भी हिसाब नहीं क्योंकि गावत श्रवणम सुनत सुखाकर विश्व दुरित ध्वनी बोलने वाला और सुनने वाला बराबर फल का अधिकारी होता है। खूब नाम जप करो मंत्र जप करो जैसे भी है इससे बुरी स्थिति में हमको पकड़ा गया है। इससे बुरी स्थिति में हमको चयन किया गया है। आज तो हम घेरे के अंदर नहाए धोए बैठे हैं। कल तो कीचड़ में खेल रहे थे तब हाथ मिलाया। जब हम कीचड़ में खेल रहे थे तब हाथ मिलाया।

अब तो नहा धो के बैठाल दिया तो अब क्यों छोड़ देंगे? और छोड़ दे ऐसी उनमें ताकत नहीं। उन्होंने आज तक जिसे पकड़ा है इतिहास साक्षी छोड़ा नहीं तो हमें क्यों छोड़ देंगे? आप समर्थ हो। हम आपको छोड़ सकते हैं लेकिन आप हमें नहीं छोड़ यह विश्वास है तो मोह परी ओढ़ मोसो ना बिगारन को तो सो ना ए भाई हम ये इसलिए बहुत दन्य होकर बोल रहे कि माया हाथ छोड़वा के तुम्हें अपनी तरफ अपने पाले में ना घसीटवे देखो तुम बुरे हो तुम जैसे हो हमारी श्री जी के हो पक्का श्री जी मिलेंगे हम सब उसी पंक्ति में खड़े हैं सही यही कह रहे हैं वो पकड़े हैं इसलिए हम खड़े हैं।

नहीं ऐसी हवा चल रही है कि ना खड़े रहे आपकी दृष्टि में भी नहीं आएंगे। ऐसे पड़े हो जाएंगे। ऐसे गिर जाएंगे। वो पकड़े हैं। गुरुदेव पकड़े हैं। श्री जी पकड़े हैं। ये जब हमको पकड़े तो आपको भी पकड़े। आपको नहीं लग रहा कि वह पकड़े हैं तो इतना मान लो हम आपको पकड़े ऐसे ऐसे नहीं बहुत जोर की पकड़ है वो हमको पकड़े और ऐसे पकड़े तो पूरी लाइन बच जाएगी माया उड़ा नहीं पाएगी अकेले पड़ जाओगे तो उड़ा ले जाएगी एक दूसरे को पकड़े हुए हम सब श्री जी के पास चलते अब देखो इस जन्म में सौदा बीच में मत करो यार श्री जी चाहिए इस जन्म में प्रभु चाहिए ये इस जन्म में हमें अब माया से मुक्त होना है।

थोड़ा तो उत्साह बनाओ। शरीर तो छूटना ही है। ये छोड़ के जाना ही है। उत्साह बना लोगे तो धनी होकर चलोगे धनी के पास। नहीं फिर आएंगे यमनराज के दूत तो मार डंडो ले जाएंगे। बेमतलब गलत दिशा में। इसलिए हमारा कोई अन्य योनि ना मिले। अगर हमें जन्म मिले तो मनुष्य जन्म मिले और भगवान की आराधना करूं। आराधना करके पुनः उनको प्राप्त करूं। वैसे तो इसी जन्म में मिल जाए बहुत अच्छा है। इसलिए नाम ना छूटने पावे। ए भाई राधा राधा राधा राधा राधा श्री राधा वल्लभ लाल की जय

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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