॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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सच्ची उपासना का रहस्य और भाव प्राप्त करने के 10 उपाय // 14/03/2026

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

वृंदावननेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसोघ पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वापय परम शीतल श्रयाम निर्वाय परम शीतल माशयाम नील लाल गौर के ध्यान बैठे श्री कुंज बिहारी नील लाल गौर के ध्यान बैठे श्री कुंज बिहारी ज्यों ज्यों सुख पावत नाही त्यों त्यों दुख भयो भारी अरबरा प्रगट भई जो सुख भयो अर बरा प्रगट भई जो सुख भयो बहुत हिया श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंज बिहारी करी मनुहारी कुंज बिहारी करी मनुहारी नील लाल गौर के ध्यान बैठे श्री कुंज बिहारी उपास्य देव हर क्षण हर कण में विराजमान है।

उपासक प्रतिपल निरंतर सानिध्य का अनुभव करता है। अगर निरंतर चित्तवृत्ति आराध्य देव के सानिध्य का अनुभव नहीं कर पा रही है तो अभी कोई और है आपका प्यारा। कहीं कोई और संबंध है। वस्तु, व्यक्ति, स्थान, पदार्थ कुछ है। जब तक कुछ है तब तक इनका अनुभव नहीं होता। जब हृदय में एकमात्र केवल इनका चिंतन रह जाता है। तब सानिध्य का अनुभव होता है। प्रतिपल प्रति क्षण प्रति कण में वह दिखाई देते हैं, अनुभव में आते हैं। उपासक की जब यह स्थिति प्राप्त होती है तब भारी प्रेम की अद्भुत सुखवृत्ति उदय होती है।

उसी सुख वृत्ति में उपास्य देव की लीलाएं प्रारंभ हो जाती हैं। जो दिव्य लीला वर्तमान में हो रही है। उसका अनुभव होने लगता है। जैसे श्रीमद् चतुराशी जी में जितनी लीलाएं सब वर्तमान में ही हो रही है। आज अतिराजत दंपति भोर आजवन राजत जुगल किशोर आजवन क्रीडत श्यामा श्याम आज गोपाल आज तो जुत आज प्रभात लता मंदिर में आज संभारत नाही गोरी आज अभी इसी क्षण वर्तमान में लीला हो रही इस लीला का अनुभव वही उपासक कर सकता है निरंतर चिंतन परायण प्रतिपल सानिध्य का अनुभव अद्भुत प्रेम लीला में प्रवेश कहने में तो मिनट नहीं लगा पर गुरु कृपा से एक क्षण में भी हो सकती है और कई जन्म भी लग सकते हैं।

कृपा पात्र उपासक इसकी परवाह नहीं करता कि समय कितना लगेगा। वह परवाह इसकी करता है कि कोई समय व्यर्थ ना जाए। बस बात को समझिए। कब मिलेंगे इसकी परवाह नहीं। कितना समय लगेगा इसकी परवाह नहीं। पर वर्तमान का समय यदि हमारा व्यर्थ चला गया इसकी बड़ी चिंता होनी चाहिए। समय को प्रिया प्रीतम से विमुख नहीं काटना बस फिर आगे का कार्य तो अपने आप प्रकाशित हो जाएगा। श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज बड़ा अद्भुत श्लोक वर्णन कर रहे हैं। ऐसा हमने पहले कभी नहीं किसी वाणी में देखा जैसा वर्णन कर रहे हैं।

कि कदंब का ऐसा वृक्ष है जिसकी सीमा ही नहीं नापी जा सकती। ऐसा हमने महादेव जी के वट वृक्ष का वर्णन शास्त्र में पाया कि 60 हजार योजन की शाखाएं हैं। एक योजन का मतलब चार कोष एक कोष का तीन किलोमीटर 60 हजार योजन की शाखाएं हैं उस वट वृक्ष की और छह ऋतुएं उसी वृक्ष के नीचे रहती है। इधर वर्षा हो रही तो इधर शीतलता है। इधर ग्रीष्मता है। ऐसे बसंत है, शिशिर है। ऐसे ड ऋतुएं उसी वट वृक्ष की जिसकी इस एक शाखा 60 हजार योजन बहुत बड़ा लेकिन यहां जो कदम वृक्ष का वर्णन कर रहे हैं।

अनंत योजनोित प्रसारी शाखा नीप धुमस्मर शीतले तले विचित्र राधाया विचित्र वेशम माधवम ये पढ़ा भगवत ऋषिक जी बड़े बड़े महापुरुषों की वाणी नौ किशोर लताएं समान शाखा वाली बड़ी दिव्य कांत बड़ी शोभाएं वर्णन ये कि इतना विशाल कदंब वृक्ष है कि नाप ही नहीं हो सकती अनंत योजनो प्रसार शाखा उस कदंब वृक्ष की शाखा ही नहीं नापी जा सकती महादेव जी के बट वृक्ष की तो शाखा का 60 हजार योजन नाप बताइए लेकिन श्रीपाद देख रहे हैं कि अनंत योजन मतलब सीमा ही नहीं है असीम कदम का वृक्ष और अद्भुत कांत युक्त पत्ते सघन ऐसे महान कदम वृक्ष के नीचे सुंदर जो चबूतरा बना हुआ है उसमें जो पुष्पों की गादी बड़ी शीतल और सुगंधित वायु चल रही है।

हर समय बसंत ऋतु रहने के कारण कभी वृंदावन में पतझड़ नहीं होता। कभी पुष्पों का अभाव नहीं होता। क्योंकि सदा बसंत रहत वृंदावन पुलिन पवित्र सुभग यमुना तट यमुना जी के पावन पुलिन के समीपस्थ कुंज निकुंजों में सदैव बसंत का ही प्रसार रहता है। बसंत ही विराजमान रहती है। तो कदंब के पुष्पों की अद्भुत भीनी भी सुगंध शीतल वायु चल रही मंदमंद प्रिया प्रीतम विचित्र वेश में किशोरी जो और लाल जो विचित्र भाव से विचित्र मिलन स्थिति में किसी चित्रकार ने भावना करने की कोशिश की है।

अगर देखा हो चित्र तो प्रिया प्रीतम का मिलित रूप ऐसे दोनों के श्री चरण हैं। मतलब अद्भुत नागर नागरी कैसे पहचाने नहीं जा सकते हैं कि कहां से कैसे किसके कर कमल और कैसे किसके चरण कमल दोनों विराजमान है। जिस कुटिया में भजन करते हैं उसमें वो छवि लगी हुई है। मिल विचित्र ढंग से विचित्र वेशभूषा धारण किए हुए ऐसे विचित्र कदम के नीचे प्रिया प्रीतम विराजमान है। मैं ऐसे श्री राधा माधव का सतत स्मरण करता हूं। स्वर्ण जो कृष्णा तट ललित नव स्वर्ण व्ली गहाग्रे संतप्त स्वर्ण वरणाम मुरमणि सनद सुस्वर्ण भूषम मालाम सुसर्ण पुष्पम ददति रुचराम स्वर्ण सचपका श्री राधा बक्ष कुयन मुदितो माधव स्वर्ण वशी बड़ी बड़ी सुंदर शोभा का वर्णन कर रहे हैं।

आज ये कुंज स्वर्णिम शोभा वाली है। इसकी जितनी लताएं हैं तप्त कांचन वर्ण की उनके पत्ते भी स्वर्णिम उनके पुष्प भी स्वर्णिम और समीपस्थ यमुना जी में भी स्वर्ण जोत भाष कृष्णा तट ललित बड़े ही सुंदर स्वर्ण कमल खिले हुए हैं। यमुना जी में स्वर्णिम कमल खिले हुए हैं और समीप ही नौ स्वर्ण व्ली गृहाज्ञ नवीन स्वर्ण लताओं ने लता मंडप की रचना की है। कैसे बोले स्वर्णिम कुंज में कुंज भी स्वर्णिम है जिसकी शाखा पत्ते पुष्प छाल सब स्वर्णिम तपाए हुए स्वर्ण की कांत जैसी और स्वर्णिम बलरी ने लता भवन की रचना की है संतप्त स्वर्ण वर्ण मुर मण सन सुस्वर्ण भूषम आज प्रिया प्रीतम संत संतप्त तपाए हुए स्वर्ण के सात कुंभ तनु गोरी जैसी प्रियाजु ऐसी ही यमुना जी में स्वर्णिम शोभा जैसी प्रियाजु वैसे ही लता भवन जैसी प्रियाजू की अंग कांत वैसी पूरे कुंज की कांत तपाए हुए स्वर्ण के वर्ण सुंदर सुंदर पोशाक युगल सरकार धारण किए स्वर्णिम पोशाक और तपाए हुए स्वर्ण के सुंदर सुस्वर्ण भूषम आभूषण वस्त्र कुंज लता भवन समीपस्थ यमुना में खिले हुए पुष्प सब स्वर्णिम मालाम सुर्ण पुष्पम माला भी स्वर्णिम पुष्पों की धारण किए हुए हैं।

ददति रुचराम स्वर्ण चंपकाम प्रियाजु के अंग की भी स्वर्णिम मनोहर आभा प्रकाशित हो रही है। ऐसी कुंज लता भवन पोशाक माला आभूषण सब स्वर्णिम धारण किए हुए हैं। ऐसी स्वर्ण चंपक आभा वाली प्रियाजु को देख के श्री राधा भिक्ष विक्ष कुयन मुदितो माधवा स्वर्ण वंशी आज बंसी भी स्वर्ण के लिए हुई है और हमारी प्रियाजू को देख कर के कुयन बार-बार गायन कर रहे हैं प्रियाजू की रूप माधुरी गुण माधुरी और नामामृत का राधा राधा राधा श्री राधा विक्ष विक्ष मुदित माधवा स्वर्ण बंसी अद्भुत आनंद में मगन होकर माधव स्वर्णिम बंसी से श्री किशोरी जी के नाम गुण का गायन कर रहे हैं।

बार-बार श्री किशोरी जी को देखते हुए राका हिमकर कोट छवि वृंदावण साख वृंदाय मन मन आनंदाम बुद्ध कंदाय प्रीति कृष्ण चंद्राय अब दूसरी कुंज का वर्णन करते हैं। कैसा अद्भुत सुख है। पहला वर्णन किया इतना विशाल कदम वृक्ष विचित्र अनंत शाखाओं वाला सदन उसके नीचे सुंदर चौकी बेदी पर जहां पुष्प सैया है युगल सरकार विचित्र ढंग से विचित्र वेशभूषा में मिलित रूप मानो श्याम तमाल पर कंचन की बेल लिपटी हुई हो ऐसे विराजमान है ऐसे श्री राधा माधव मेरे सदैव स्मरण में रहे दूसरे श्लोक में सब स्वर्णिम शोभा सब कुछ स्वर्णिम अब इस कुंज में वर्णन कर यहां की लताएं सब चंद्रमा की कांत वाली क्या अद्भुत अद्भुत शोभा अलग-अलग कुंज की राका हिमकर कोटिच्छ वृंदाण साख वृंदाए वृंदावन की वृक्षों की शाखाओं से करोड़ों चंद्रमाओं की कांत प्रकट हो रही ये दूसरी कुंज है स्वर्णिम कुंज का वर्णन किया अब ये वर्णन कर मानो पूर्णिमा के करोड़ करोड़ करोड़ चंद्रमा एक साथ उदय हुए हो।

ऐसी वृंदावन की वृक्षों से शाखाओं से कांत प्रकट हो रही है। मन मन आनंदाम बुध कंदाय प्रीति कृष्ण चंदाय यद्यपि आनंद के मूल समुद्र है श्री लाल जो फिर भी ऐसी लताएं जो करोड़ करोड़ों चंद्रमाओं की सी चांदनी प्रकाशित करती उनके बीच में हमारी श्री गौरांगी प्रिया जी जिनके अंग से अद्भुत गौर छटा प्रकाशित हो रही है उनको देखकर श्री कृष्ण चंद्र जी के हृदय में अद्भुत प्रीति प्रकाशित हो रही। यद्यपि ये आनंदाबुद्ध कंदाय ये आनंद समुद्र के मूल है प्रभु पर आनंद समुद्र को भी प्रियाजु इस कुंज में अद्भुत आनंद वर्धन कर रही है।

संपूर्ण कुंज की शाखाओं से लताओं से वृक्षों से करोड़करोड़ चंद्रमाओं जैसी कांत प्रकाशित हो उनके मध्य में हमारी गोरी प्रियाजू और उनको देखकर आनंद समुद्र के मूल श्री लालजू के हृदय में आनंद वर्धन हो रहा है। गौर श्याम किशोरहु कांचन कुतुकान मिथो ममस चोरहु ऐसे ये गौर श्याम नव किशोर जुगल जोरी सरकार ये हमारे चित्त को चुराने वाले दूसरे की सामर्थ ने श्रीपाद करे कि मेरेित को चुरा ले ये गौर श्याम जोड़ी इनको कोई श्रम भी नहीं होता चुराने में कौतुक मम चोर इनका तो खिलवाड़ हुआ और मेरे मन को चुरा लिया इसीलिए कहते हैं धैर्य पूर्वक वृंदावन का आश्रय लो जिनको वास मिल गया है निर्भय निश्चिंत हो जाओ बस नाम ना छूटे एक दिन ये खुद खेल खेल में कदावा खेलंतो ब्रज नगर विधि

हृदयम हरंतो श्री राधा ये हरण कर लेंगे हरंतो श्री राधा ये हमारे मन का हमारे हृदय का हरण कर लेंगे खेलते खेलते गौर श्याम किशोर कांचन कुतुकान मिथो मम चोर इनका तो कौतुक होगा मेरा काम बन जाएगा जो मन बड़ा चंचल है विषयों में जा रहा है चुरा लेंगे पर ध्यान रहे ये चुराते उसी का है जिसके मन में और कुछ नहीं केवल इनका ही आश्रय है अपबल तपबल और बाहुबल चौथो बल है दाम धन का बल विद्या का तपस्या का साधना का इसीलिए सर्वेशु साधन चरम निराशा तो वर्ष में सहजाध श्री राधिका चरण रेणु महास्मरा केवल किशोरी जो के चरण चरणों का आश्रय और नाम जब चल रहा है तो इनका खिलवाड़ होगा।

हमारे मन को चुरा लेंगे। मन को चुरा लेने का मतलब है अपने समीपता प्रदान करना। हर क्षण आपको प्रिया प्रीतम की समीपता मिल जाएगी। छिन छिन बिहरत संग छिन छिन निरखत प्रेम भरी छिन जस कहत अभंग यह जो कृपा हरिवंश की ये कौतुक वश युगल किशोर ने मेरे मन को चुरा लिया खेल खेल में चुरा लिया अब तो वृंदावन ने मुझे प्रेम रस्सी से बांध लिया है प्रेम गुण परिबद्ध वृंदावणे अब जी नहीं सकता वृंदावन के बिना कितने महान भाग्यशाली जन हैं जिनको यह बंधन प्राप्त हुआ है। वृंदावन के बिना आप जी नहीं सकते।

वृंदावन के एक एक कण से एक एक लता से एक एक जगह से इतना प्यार हो जाए कि बस हमारा जीवन यही बहुत दुर्लभ विषय सबको नहीं हो सकता। सब इस कोटि के प्रेमी बन सकते हैं। पर दूरदपास स्वजन सुख कोटिम सर्वेशु साधन चिरम निराशा जिसका किसी से सुरत संबंध नहीं है। जो अर्थ की किसी भी व्यवस्था में हर्षित नहीं होता। जो साधन का कोई बल नहीं रखता वह हमारी महारानी जी के चरणों के महाबल से युक्त हो जाता है। प्रेम गु परिबद्ध वृंदावण वृंदावन ने प्रेम रस्सी से बांध लिया। अब जाओगे कहां?

पकड़ लिया वृंदावन ने। फिर क्या स्मर स्मर छुब्ध बार-बार प्रिया प्रीतम की याद में हृदय प्रेम विकल हो जाता है। और गदगद सुर नैना सजल दंपति रस रहे भीन इ गति वृंदा विपिन में फिरे प्रेम तन लीन सामने दिखाई दे रहा है छैल छबीली लाडली छैल छबीलो लाल छैल छबीली सहचरी मनो प्रेम की माल भाव बढ़ रहा है कंठोद्ध हो रहा है अशुभ प्रवाह हो रहा यह महा सुख यह महा सुख है श्रीपाद कह रहे वृंदावन ने मेरे हृदय को प्रेम डोरी से बांध लिया। युगल सरकार ने मेरे मन को चुरा लिया। बस यहां खास बात है आश्रय।

दृढ़ आश्रय ले लो। अगर आप अखंड वास नहीं कर पा रहे तो धाम का आश्रय ले लो। कहीं भी रहो। जैसे देश विदेश सब जगह नौकरी करने जाया जाता है। पर यह जब घर की बात पूछे तो पता हमें किसी से पूछना नहीं पड़ता। हृदय में रहता मैं अमुक गांव का, अमुक शहर का, अमुक देश का हूं। ऐसे ही तुम्हारे हृदय में होना चाहिए। मैं वृंदावन का हूं। भले देश विदेश में मैं सेवार्थ व्यापार्थ नौकरी के लिए आया हूं। पर मेरा घर तो वृंदावन है तो आप कहीं भी शरीर छोड़ेंगे तो आए मिले परिवार आपने हरि हस कंठ लगायो वृंदावन का आश्रय निश्चित निश्चित प्रिया प्रीतम से मिला देता फिर जिनको वास मिल गया है ये तुम्हारे पुण्य से नहीं मिला है ये कृपा से मिला है मेरी लाडली जो कृपालु हो गई जिनको वृंदा विपिन है कृपा तही की होए वृंदावन में तब तो रहन पाए सोए अब आपको वृंदावन वास जिनको मिल गया वृंदावन का आश्रय मिल गया भाव जग जाए भाव उत्सवन ये भाव उत्सव हृदय में आ जाए पूज्यपाद श्री उिया बाबा जी महाराज कह रहे उपासना में भाव की प्रधानता होती है।

ये 10 बातें भाव को प्रकाशित कर देती है। बड़े महापुरुष है। इन 10 बातों का यदि उपासक ध्यान करें और सावधानी पूर्वक जीवन में उतारे तो उसके अंदर भाव जागृत हो जाएगा। भाववश्य भगवान भाव के अधीन भगवान है। भगवान को अगर भूख लगती है तो भाव की लगती है। ध्यान रखना भोजन की नहीं लगती। भाव का भूखा हूं मैं। भाव ही एक सार है। भाव से मुझको भजे तो भाव से बेड़ा पार है। भाव बिन सुनी पुकारे मैं कभी सुनता नहीं। भाव पूरित टेरर ही करती मुझे लाचार है भाव उपासना में भाव की प्रधानता है और ये 10 बातें 10 सूत्र ऐसे हैं जो निश्चित भाव को प्रकट कर देते हैं।

पहला है सम्मान दूसरा है बहुमान तीसरा है प्रीति चौथा है विरह पांचवा है इत विचिकित्सा छठा है महिमाख्याति सातवा तदर्थ प्राण धारण आठवा तदीयता नौवा सर्वत्र तदभाव दसवा अप्रतिकूलता ये दस है जिनके द्वारा दिव्य भाव प्रकट हो जाता है पहला सम्मान अपने आराध्य देव गुरुदेव के सामने से जितनी बार निकले उतनी बार प्रणाम मुद्रा में ही निकले जैसे श्री विग्रह विराजमान है अर्चा विग्रह विराजमान है तो वहां से ऐसे नहीं निकला जाता झुक के हाथ ऐसे करके निकला जाता है गुरुदेव विराजमान है हाथ जोड़ के निकला जाता है वहां सीधे नहीं निकला जाता उनके सामने जय बार जाएंगे त नमन मुद्रा मनुष्य सेवा में ही है तो हर बार साष्टांग दंडवत पंचांग दंडवत थोड़ी करेंगे पर प्रणाम मुद्रा में ही निकलना चाहिए ऐसे इससे आपका भाव बनेगा गुरुदेव और आराध्य देव के सामने से जितनी बार निकले उतनी बार प्रणाम मुद्रा होनी चाहिए जब गुरुदेव देव पधारे जितनी बार पधारे उतनी बार खड़े हो जाना चाहिए।

इससे भाव का प्रादुर्भाव होता है। जो इस सम्मान को आराध्य देव गुरुदेव को अर्पित कर देता है और स्वयं के सम्मान को स्वीकार नहीं करता है। तो यह सम्मान उसके अंदर भाव पैदा कर देता है। यह 10 बातों में पहला है। स्वयं सम्मान रहित होकर अपने गुरुदेव आराध्य देव के सामने जय बार से निकले त प्रणाम मुद्रा होनी चाहिए। मुद्रा प्रणाम मुद्रा अपना सम्मान प्रिय नहीं लगना चाहिए। सम्मानम कल्यात घोर गरम अपने लिए ऐसा होना चाहिए। और आराध्य देव गुरुदेव के लिए ऐसा होना चाहिए।

इससे भाव का प्रादुर्भाव हो जाएगा। बहुमान अपने संबोधन के आगे गुरु प्रदत्त नाम का ही उच्चारण करवावे। जैसे अपने लोगों के नाम रखे गए हैं। गुरुदेव प्रदत्त नाम रखे गए। श्यामा शरण, कृष्ण मोहिनी शरण, माधव शरण, केशव शरण ऐसे जो नाम रखे गए यह हमारे भाव को बढ़ाने वाले हैं। अगर कोई लौकिक नाम जैसे घर में रखे गए सांसारिक वो ले तो निषेध कर देना चाहिए। उत्तर नहीं देना चाहिए। दो में एक बात कर देनी चाहिए। जैसे कोई पुराना नाम ले बुलावे तो ना देखना चाहिए ना बोलना चाहिए।

क्योंकि अब हमारा वह नाम नहीं है। जो गुरु प्रदत्त नाम है उससे भाव प्रकट होता है। बड़ी महिमा है गुरु प्रदत्त नाम की। इसी नाम के नाते से कल्याण भी हो जाता है। हम कौन है? बोले अमुक शरण है। नाम जैसे बोले हरि प्रिया शरण हम हरि प्रिया की शरण में हैं। अब हमारी दुर्गति कैसे हो सकती है? यह जो गुरु प्रदत्त आचार्य परंपरागत नाम मिलते हैं यह बहुत महिमा रखते हैं। कोई साधारण बात नहीं है। प्राय ये जो शरणागत विरक्त जन है जो भगवत आश्रित हो गए हैं संसार संबंध रहित हैं उनको यह नाम प्रदान किया जाता है।

बहुमान में अपना पूर्व सांसारिक नाम ना स्वीकार करना। गुरु प्रदत्त नाम का ही उच्चारण और आदर करना ह कहावत सब कहत ये खास बात यह हो गई कि हमारा संबोधन ही होता है आराध्य देव से आराध्य देव से ही संबोधन होता है प्रिया शरण अब हमको कोई चिंता है गुरुदेव ने कह दिया है कि तुम्हारा नाम क्या है बोले बोले प्रिया शरण श्यामा शरण लाडली शरण सहचरी शरण कितने सुंदर सुंदर गुरु प्रसाद से नाम मिलते हैं ये गर्व का विषय है ह कहावत सब कह अब कोई चिंता है हम प्रिया जी की शरण गुरुदेव ने कहा है अपने नाम के विस्मरण की वृत्ति और गुरु प्रदत्त नाम के स्मरण में सुखी हो जाना हम कौन है?

बोले अमुक सर पीछे का पुराना नाम कोई ले तो ना तो संबोधन स्वीकार करना चाहिए। अगर कोई प्रियजन है तो निषेध कर देना चाहिए। उसको पता नहीं है कि अगर आप ऐसे नाम उच्चारण करते हो ठीक नहीं है। हमारे गुरु ने जो नाम रखा है वही नाम रखना चाहिए। नहीं बोलना चाहिए। जैसे पुराने नाम में है तो नहीं बोलना चाहिए। वो संबोधन करे तो नहीं बोलना चाहिए। इससे गुरु कृपा से भगवतीय गुणों का हृदय में प्रादुर्भाव हो जाता है। गर्व से अपने गुरुदेव प्रदत्त नाम का स्मरण करना चाहिए गर्व से।

अरे हमको गुरुदेव ने कहा है कि आप मुख शरण है तो ये गर्व का भी अब हमको क्या चिंता है? उन्होंने ये नाम रखा है। इस नाम का प्रभाव यह होता है कि इष्ट के सद्गुण उसमें जागृत होने लगते हैं। नाम मात्र से शरीर संबोधन नाम यह बहुत गुप्त बात है। जल्दी ये सौभाग्य किसी को नहीं मिलता। जैसे मिला है सौभाग्य तो इसकी रक्षा करो। इसकी रक्षा करो। जो तुम्हें नाम प्राण वल्लभा शरण हां प्राण वल्लभा प्यारी जो और उनकी शरण गुरुदेव ने कह दिया अब क्या चिंता प्राण वल्लभा देखेंगे हमें गर्व होना है इस बात का कि हमारा नाम क्या है बस ह कहावत सब कहत ये ठसक अंदाज बहुमान इससे समस्त इष्ट देव के सद्गुण उसके हृदय में प्रकाशित होने लगते हैं।

इष्ट देव का स्वभाव आने लगता है। दूसरा कोई अपने इष्ट देव का नाम बहुमान कोई इष्ट देव का नाम एकदम आश्चर्यचकित आनंदित होकर उसकी तरफ देखना राधा राधा राधा राधा श्री हरिव श्री हरिव श्री हरिव श्री हरिव वो एक बार बोला कई बार बोलकर उसके सामने हाथ जोड़ के झुक के खड़े श्री हरिव आपने आराध्य अंदर प्रसन्नता बहुमान आराध्य देव का नाम उच्चारण किया राधा राधा राधा श्री हरि खड़े हो गए सम्मान उसका उसने हमारे आराध्य देव का बहुमान पहला बहुमान में अपना नाम जो गुरु प्रदत है उसी को उच्चारण करवाना उसी के संबोधन में बोलना दूसरा अपने इष्ट देव का कोई नाम ले ले तो क्या दे दूं इसको क्या कर दूं ऐसे हृदय में आना देखो जो हरिवंश को नाम सुना सुनावे तन मन प्राण तासु बलिहारी जो हरिवंश उपासक सेवे सदा सेव ताके चरण बिचारी कोई सुना श्री हरिवंश सेवक जी कह तन मन प्राण सब बलिहार करता आ अपने प्राणों को, अपने तन को, मन को उसके चरणों में बलिहार करता।

उसने श्री हरिवंश बोला। देखो बहुमान गोस्वामी तुलसीदास जी तुलसी जा के मुख से धोख निक सत राम ता के पग की पग तली मोरे तनु की चा इष्ट का बहुमान हमारे इष्ट देव का कोई नाम ले तत्काल उसके चरणों की तरह श्री हरिव राधा राधा राधा क्या सेवा करूं आपकी हृदय से आजा लाचे आप हमारे इष्ट का नाम सुना दे बहुमान अपने आराध्य देव का कुछ भी चिन्ह देखकर ये मूर पंख ओ चंद्रिका किसी कपड़े के छाप में भी चंद्रिका ये तो मेरी प्यारी जो के माथे पर विराजमान होने वाली श्याम मेघ ओ मेरे प्रीतम का ऐसा ही

वर्णन है नवीन जलधर मेघ की कांत जैसा कुछ भी अपने प्रीतम का चिन्ह देख के एकदम आनंदित हो जाना जब वृंदावन से गुंजा की माला और माखन मिश्री रज महाप्रभु प्रभु चैतन्य देव को प्रसादी में कोई ले जाता पूरी में जब दहाड़ मार कर रोने लगते मानो साक्षात प्रीतम मिल गए हो प्रीतम की प्रसादी बहुत बहुमान ये प्रियाजू का प्रसाद प्रसाद एकदम पहले हाथ में ले माथे से ऐसा लग रहा है दूर से देखने में कि कितना आनंद प्रसाद हां बात करते जा रहे हैं प्रसाद नहीं सब बंद करो पहले प्रसाद अगर राजभोग प्रसाद डलिया आई है पहले चार परिक्रमा करो उसकी प्रणाम करो भगवत प्रसाद का सम्मान प्रसादी वस्त्र का सम्मान प्रसादी पुष्प का सम्मान प्रसादी इत्र का हर चीज जो हमारे प्रभु से इष्ट देव से संबंध बहुमान प्रसाद हां हां रख दो फिर पा लेंगे अपमान हो गया नहीं तत्काल पहले अगर आसन में बैठे हो तो उठो खड़े होकर सम्मान करो प्रसाद का माथे पर लगाओ एक किनका ले मुख में डाल लो फिर पा लेना पर पहले एक किनका मुख में डालो सम्मान करो और दाहिने हाथ से

प्रसादम स्वामिन्य स्वकर तल दत्तम प्रणयता अपने हाथ में पहले हाथ में लीजिए थोड़ा ढाई प्रसाद फिर बाद में देखेंगे पहले प्रणाम आते ही बहुमान प्रसाद का होना चाहिए। खड़े हो जाना चाहिए। जैसे प्रसाद आया खड़े हो प्रसाद आया है। प्रभु का प्रसाद आया। अगर माला प्रसादी मिल रही माथे पर एक आनंद का मेरे प्रभु ने प्रसाद भेजा है तुलसी दल मिला मेरे प्रभु के चरण प्रसादी बहुमान प्रसाद में बहुत सावधान एक भी किनका ऐसे नहीं कैसे आप पारस भोजन नहीं हो प्रसाद है इसलिए बहुत सावधानी एक भी किनका तुम्हारे पत्तल दोना में नहीं बचना चाहिए श्री जी का भोग लगता है प्रसाद है उतना ही पत्तल में डलवाओ जितना उदर पोषण कर चाट चाट के हमने संतों को देखा है खपर में जैसे नारियल के सन्यासी जन जैसे रज पात्र में अपने विरक्त जन दो

बूंद पानी डाल के धो के पी लिया प्रसाद का किनका भी नहीं रहना चाहिए अब आजकल तो ऐसे प्रसाद पाते हैं कि आधा पाया आधा नहीं बोले नहीं पशु पक्ष तो ऐसे पाओ एक पत्तल रखो एक रोटी तुम रखो एक रोटी उसमें में निकाल के रख दो फिर पवाओ तो तुम्हें बहादुर माने ऐसे नहीं और जीव पाएंगे तो बड़ी दया है तो आधी रोटी आप पा लो शेष पहले निकाल के रख दो फिर हाथ धो के आचमन करके सम्मान से पवाओ जाके उष्ट करके फेंकना ये अपराध माना जाता है प्रसाद उतना ही प्रसाद लो जितना आप चाट कर पत्तल पा जाओ एक दो बूंद पानी डाल के धोना पी गए प्रसाद की जितनी मह आपको कैसे बताएं प्रसाद में राधा वल्लभ लाल जी की खिचड़ी का प्रसाद सुबह सबको बैठता है पीछे जब झांक आदि संयोग प्रसाद झाकी दर्शन में ऐसा भाव आया कि खड़े रहे वही मंदिर फिर एकदम ध्यान आया कि खिचड़ी प्रसाद नए नहीं उस समय कोई परिचय किसी से ज्यादा पीछे गए तो बोले प्रसाद तो बट गया तो जहां प्रसाद ब था वहां आठ 10 दाने से एक एक दाना बिन करके जब उसको पाया फिर दोबारा दर्शन करने गए तो कुछ और ही

भाव प्रसाद को जितना भाव से लेंगे उतना ही आपके अंदर भाव बढ़ेगा चरणामृत मेरे प्रभु का स्नान कराया हुआ चरणामृत बड़े भाव से अगर वस्त्र कोई रुमाल या ऐसे जरूर लगा ले चरणामृत लेने में ऐसे जरूर लगा ये वैष्णव दोनों पद्धति है ऐसे लिया और वो कहीं ऐसे टपक के तुम्हारे पैरों में पड़ा ऐसे नहीं ऐसे चरणामृत ऐसे लेकर के भगवत प्रसाद का अब जैसे प्रसादी पुष्प माला आदि ऐसे और आपके चरणों में पड़ जाए नीचे तो आपके सारे सुकृत नष्ट हो जाएंगे। एक बार सुनाया कि काशी के नरेश की जो काशी नरेश जी थे उनका एक बगीचा था जो भगवान शिव के लिए ही पुष्पों के लिए था।

पर वो स्वयं पूजा करते थे तब वो पुष्प आते थे और भगवान विश्वनाथ जी के अनन्य पार्षद पुष्पदंत जी ने देखा तो उनको लगा कि कुछ पुष्प बहुत बड़ा बगीचा है। सबसे पहले हम चयन करके तो वह तो दिव्य तनुधारी अंतर्धान होकर बगीचे में प्रकट होते और पुष्पों का चयन करके अंतर्ध्य हो जाते। रोज जो सेवक जन थे वो कहते प्रभु कोई चोर आता है और पुष्प चुरा ले जाता है। तुम्हारी पहरेदारी कैसी? बोले प्रभु कोई साधारण चोर नहीं है। आसपास से पूरे सैनिक होते हैं। यह कोई दिव्य चोर है। विद्वानों की मंडली रहती थी राजाओं के पास सलाह किया तो उन्होंने कहा अगर कोई दिव्य है तो भगवान शिव के जो प्रसादी बिल पत्र है वो बगीचे में डाल दिए जाए तत्काल पकड़ा जाएगा उसकी सारी सिद्धियां नष्ट हो जाएंगी ऐसा ही किया गया बिल पत्र डाल दिए जे ही पुष्पदंत जी उतरे उनको पता तो था नहीं तो जे ही चरण रखा सब शक्ति खत्म प्रसादी तुलसी ये ध्यान रखिएगा जैसे मंदिर जाते हैं तो कई बार देखा है तुलसी जी ऐसे पड़ी है बहिर्मुख बाहरी लोग पैसे के बल से खरीद लिए वो सावधानी रखी नहीं तो तुलसी ऐसे गिरती चली जा रही या वहां से लाए प्रसादी तो सावधानी नहीं रखी वो गिरती चली जा रही तो कदम बहुत देख के अगर उस प्रसादी पुष्प और तुलसी पर चरण पड़ गए तो तुम्हारे सुकृत नष्ट हो जाएंगे बड़ी सावधानी की जरूरत उपासना में पुष्पदंत जी ने पुष्प चयन के अंतर्ध्य का संकल्प किया हुए ही नहीं तब दृष्टि गई तो ओ हो ये तो महादेव की प्रसादी पर पैर पड़ गया।

तत्काल अंदर से बहुत पश्चाताप किया और शिव महिमाना स्तोत्र की रचना की। तत्काल दिव्यता अंतर्ध्य हो गए। प्रसादी पुष्पा देखो भगवान शंकर जी स्वयं भगवान हैं। लेकिन हरि चरणामृत को गंगा जी को दृष्टि से भी रोक सकते थे। लेकिन जटाओं में रखा जटाओं में धारण किया। भगवत प्रसाद का बहुत सम्मान करना सीखे। प्रसादी वस्त्र को प्राण समझे। अपने प्रभु का कोई प्रसादी वस्त्र गुरु का प्रसादी वस्त्र ये हमारा जीवन है। हमारा प्राण मानो हर समय हमारे गुरुदेव पास रहते हैं। अगर प्रसादी वस्त्र का सम्मान नहीं आया तो प्रभु के प्रति भाव बनना बड़ा कठिन होगा।

देखो भाव बढ़ जाता तो किस कोटि का पूज्य पंडित गया प्रसाद जी महाराज बाबा गिरिराज वाले जो ठाकुर जी के कमरे में पोछा लगाते थे वो जब पोछा सेवा से मुक्त हो जाता था तो उसे ऐसे छाती से लगा के रुदन करते और कहते प्रभु आपके सहयोग से हमारे प्रीतम की सेवा बनी अब आप सेवा से मुक्त हो रहे हैं तो ऐसे नाम कीर्तन करते हुए जाते और गिरिराज जी की तलहटी में रज में नीचे दबा के और फिर प्रणाम करके आते क्या भाव सोहनी घिस जाती तो ऐसे सोहनी को आप हमारे प्रीतम की सेवा में रही बहुत सुख पूर्वक छाती से लगा फिर वो वहां भाव बढ़ गया सारा खेल भाव का है भावुक महापुरुषों को कदम कदम पर प्रभु का दिव्य लीला सुख प्राप्त होता रहता है बहुमान कोई अगर भक्त को रोक सकता है तो भगवत चर्चा करने वाला प्रभु का नाम लिया तो उसके कदम लड़खड़ाए प्रभु की बात की तो रुक गया बहुमान ये आराध्य दिवस संबंधी आपके प्रति बहुमान इसमें अपने नाम से लेकर यहां तक इसे बहुमान ये जो बहुमान है यह भाव प्रदान करता है।

पर यह बहुमान आराध्य देव गुरुदेव अपने प्रति मान शून्यता तीसरा है प्रीति। जो हम नाम जप करते हैं जो गुरुदेव ने दिया है नाम उसमें अपार प्रीति होनी चाहिए। आज तक का अनुभव के सबसे कठिन काम है गुरु प्रदत्त नाम और मंत्र को निरंतर चलाना। अरे पता ही नहीं चलता है बकवासी मन कब जो है सरक जाता है नाम से हट जाता है फिर एकदम ध्यान करो तो फिर वैसे देखो साधना में देखो ना आप लोग तो साधक ही है कब सरक जाता है इसको बहुत अच्छा लगता है कि कोई बात करने लगे किसी तरह समय कटने लगे क्योंकि जब एकांत होगा साधक तो चढ़ा बैठा रहेगा इसके ऊपर नाम मंत्र तो ये उबता है मन उसको कुछ चाहिए प्रपंच चाहिए तभी बहुत समय हो जाता है और हमारे अंदर कोई दिव्यता नहीं आ पाती है।

मंत्र में प्रियता नहीं जागृत हो पाती है। जो गुरुदेव ने दिया है नाम मंत्र विशेष आदर विशेष सम्मान उसके सामने कुछ नहीं। उसके आगे कुछ नहीं। यह बिल्कुल हृदय में बैठा लो भाव उत्पन्न करने के लिए। कोई आकर के आपको कह दे कि यह मंत्र जपो बहुत जल्दी आपको लाभ मिलेगा। देखो आपको वह मंत्र मिला। अभी तक कुछ अनुभव में आया कि नहीं आया? तो पर धर्म भयाव नहीं हमें जो गुरुदेव ने दिया है उसी से परीक्षा भी हो सकती है। गुरुदेव प्रदत नाम और मंत्र में अत्यंत प्रीति होना। बड़े भाग्यशाली तभी तो भाव बढ़ता है।

बड़े भाग्यशाली उपासक हैं जिनको यह सिद्धांत हृदय में बैठ गया। गुरुदेव प्रदत्त नाम मंत्र ये हम मैं बहुत से शास्त्रों में पढ़ा बहुत से संतों से भी सुना गुरु प्रदत्त नाम मंत्र वो बैठ जाना चाहिए हृदय में पतंजलि जी सातु दीर्घकाल निरंतर सत्कार सेवितो दृढ़ भूमि जो गुरु प्रदत्त नाम मंत्र है उसे दीर्घ काल तक निरंतर आदर पूर्वक महिमा इस बात की है कि निरंतर आदर पूर्वक उसको जपा जाए तो दृढ़ भूमि निष्ठा जागृत हो जाएगी। गुरु प्रदत्त नाम मंत्र ग्रंथ उपासना में आसक्ति हो जाना।

अगर गुरुदेव ने वाणी जी दी है तो आजीवन उस वाणी का परिवर्तन नहीं होना चाहिए। बदलाव नहीं होना चाहिए कि अब तो ये चतुरा जी पुरानी हो गई। हम दूसरे पूज्य सदगुरुदेव भगवान की जो 42 लीला वो काफी पुरानी हो गई थी तो जैसे पुराने पन्ने हो जाए तो जल्दी में ऐसे करो तो हानि होने की संभावना होती फट जाने की कई जगह ऐसा तो निवेदन किया महाराज जी एक नई राधा वल्लभ जी के कार्यालय में मिलती तो लाख बोले नहीं ये गुरु प्रदत्त है ऐसे नहीं तो अब नए पाठ में भले प्रयोग कर ले वो अपने जो गुरु प्रदत्त वाणी है यह भाव बढ़ाने के लिए है तभी भाव आएगा गुरु प्रदत्त माला गुरु प्रदत्त वाणी इनका बड़ा आदर गुरु प्रदत्त नाम गुरु प्रदत्त मंत्र गुरु प्रदत्त उपासना गुरु प्रदत्त बात यही हमारे जीवन को भाव में प्रकाशित करेगी चौथा विरह आराध्य देव गुरुदेव की स्मृति से व्याकुलता पैदा होती है।

सही मानो एक ऐसा शब्द है विरह जो हर समय सानिध्य का अनुभव कराता है। ये बड़ा रहस्यमय है। शब्द तो है विरह पर हर समय संयोग सुख प्रदान करता रहता है। शब्द है संयोग पर हर समय व्याकुलता रहती है। इसका रहस्य प्रेमी जन ही जानते हैं। ऐसी जी होत जो जी सो जी मिले तन सो तन समाए ले तो देखो कहा हो प्यारी विरह हृदय से हृदय लगा हुआ है तो नेत्र विरह हो रहे हैं देखो कहा हो प्यारी और नेत्र देख रहे हैं तो तन में विरह संचार प्रेम का बड़ा सूक्ष्म स्वरूप गुरुदेव के समीप है गुरुदेव की स्मृति में है आराध्य देव की स्मृति में है पर एक अंदर से व्याकुलता बनी रहती है।

समीपता होने पर भी मनो कभी मिले ही नहीं। एक व्याकुलता एक अतृप्ति भरत जी महाराज कह रहे हैं आज तक प्रभु श्री राम को भर नेत्र नहीं देखा। ये हमारे प्रिया प्रीतम दोनों एक ही पुष्प गादी पर विराजमान है। दो आद अनंत विहार करें तो लाल प्रिया में भन चिन्हारी प्रेम का कैसा स्वरूप है ये नित्य नवम ऐसा लगता है कि कभी देखा ही नहीं कभी मिले ही नहीं नित्य नवम विरह आराध्य देव गुरुदेव की स्मृति मेंित गदगद होकर व्याकुलता पूर्वक उनके सानिध्य के अनुभव की मांग हृदय में सानिध्य होते हुए भी सानिध्य तन मन के बिछरे नहीं पर चाह बढ़े इससे भाव बढ़ता है।

अपने आराध्य देव गुरुदेव का सानिध्य मिला हुआ है। पर फिर भी कहीं ऐसा ना हो जाए। कहीं है अधिक प्रीति मन भा संदेहा जब कोई आश्रय नहीं है कोई साधन बल नहीं है जो कुछ है सो गुरुदेव है तो व्याकुलता पैदा होती है फिर वही विरह रूप धारण करता है आराध्य देव के विरह में तो बड़े भाग्यशाली जन कोई विरले ही होते हैं जो डूबते लेकिन उससे भी भाग्यशाली जन होते हैं जो गुरुदेव के विरह में जैसे श्री विट्ठल विपुल देव जी महाराज श्री सेवक जी महाराज बड़े बड़े ऐसे महाप्रभु गुरुदेव के भी आराध्य देव गुरुदेव के चिंतन में हृदय गदगद है मिलन की प्रबल आकांक्षा है और सामने वो मिले हुए है इसीलिए कह रहे हैं विरह प्रतिपल संयोग का अनुभव कराता है विरही जब पुकारता है तो सामने होता है जिसको पुकारता है और संयोगी जब हृदय से लगा होता है तो अंदर से ही होता कहीं बिछड़ ना जाए।

कभी कभी तो ऐसा अनुभव भी हो जाता है कि बिछड़ गए। अंकित कि प्रलापम हा मोह मधुरम कसत गोद में विराजमान होते हा मोहन वो क्वास क्वासभानु नंदिनी बिल विपिन बड़ा सूक्ष्म विषय हृदय करुणा से भरता रहे उनकी स्मृति में ऐसी व्याकुलता प्रेम समाधि प्रदान करती है आंख खुली हुई बैठा हुआ पर अंदर से खोया अचानक कोई जी मनु वहां है ही नहीं अपने आराध्य देव गुरुदेव के प्रति ऐसी विकलता ऐसा गाढ़ चिंतन बड़े भाग्यशाली है जिनको ये चिंतन प्राप्त हो जाता है उठते बैठते खाते पीते चलते फिरते मधुर स्मृति आराध्य देव गुरुदेव की इससे भाव प्रकट होता है पांचवा इत विचिकित्सा यह पांचवा बड़ा जोर का है।

अपने इष्ट देव और गुरुदेव के सिवा कभी भी किसी से प्रभावित ना होना यह इत विचिकित्सा है। इससे भाव की बहुत पुष्टता होती है। ऐसा ही हृदय हो जाता है। अपने आराध्य देव जो गुरुदेव ने दिए हैं और गुरुदेव इसके सिवा कहीं प्रभावित ना हो जाना। ये उपासक के हृदय के बार-बार हमारे सामने माया फेंकेगी। किसी से प्रभावित ना होने का मतलब आपके सीधे व्यक्ति पर जा रही होगी दृष्टि। नहीं केवल व्यक्ति नहीं किसी वस्तु से किसी पद से किसी से भी प्रभावित ना होना किसी से भी प्रभावित ना होना ये अनन्य इष्ट निष्ठ में गुरु निष्ठ में होती है इत विचिकित्सा उपमन्यु जी का चरित्र जो सुनाया भगवान शंकर के अनन्य थे भगवान शंकर जब उनके जो मनो अभिलाषा थी उसकी उसकी पूर्ति के लिए दर्शन देने आए तो शिव रूप में नहीं आए देवराज इंद्र के रूप में आए अंबाजी और भगवान शिव एरावत पर बैठे हुए इंद्र और सचि के रूप में हर शिव पार्षद देवता के रूप में वरम ब्रू वरदान मांगे आंख खोला देखा प्रणाम त्रिभुवन पति आपको तो ना मैंने पुकारा है और ना आपका मंत्र जपा ना आपसे मेरी कोई चाह है।

नहीं वरदान मांगिए नहीं मुझे आपसे नहीं चाहिए। आपको प्रणाम है आप यहां से जा सकते हैं। महाभारत में उन्होंने कहा जो तुम चाहोगे मैं तुम्हें प्रदान कर दूंगा। वरदान मांगे। बोले भगवान शिव मुझे कुत्ता बना दे स्वीकार है। आप देवराज इंद्र बनावे तो मुझे स्वीकार नहीं। आप यहां से चले जाइए। मुझे आपसे कोई वरदान नहीं चाहिए। पहली प्रणाम मुद्रा थी, दूसरी रुद्र रूप। फिर उन्होंने शिव निंदा शुरू कर दी क्योंकि भगवान शिव ही थे। तब उनको उन्होंने कहा ऐसा मत समझिए कि आप मेरे आराध्य देव की निंदा करके यहां से सुरक्षित जा सकते हैं।

अगर हमने मंत्र बल का प्रयोग किया तो मैं तुम्हारे हेरा सहित समस्त पार्षदों सहित तुम्हें यही भस्म कर सकता हूं। भगवान शंकर के प्रभाव से। इसलिए आप सम्मान पूर्वक अभी वापस चले जाइए। फिर भी नहीं माने क्योंकि शिव ही थे। तत्काल अघोर मंत्र का प्रयोग करके भस्म करने की जे संकल्प वृत्ति की नंदिकेश्वर ने रोक दिया और देखा साक्षात गौरांग गंगाधर महादेव और त्रिपुर सुंदरी भगवती लौट गए चरणों। बोले तुम्हारी अनन्य निष्ठा देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूं। वरदानों की झड़ी लगा दी।

इत वि चिकित्सा अपने इष्ट देव गुरुदेव के सिवा अन्य किसी से प्रभावित ना होना। हमारे ही प्रभु द्वारिकाधीश है कोई और थोड़ी है। यहीं से मथुरा मथुरा से द्वारिका। लेकिन जो नित्य विहार रस है अवतार लीला से बिलक जो हर समय नवनि निकुंज में विहरण करते रहते हैं प्रिया प्रीतम वहीं से तो आए हैं ब्रज लीला में प्रभु चतुर्भुज महानश्वरशाली द्वारिकाधीश विट्ठल दास जी दर्शन करने नहीं गए हरिवंश महाप्रभु के शिष्य प्रियालाल की अनन्य उपासना सूबेदार पद पर थे। कई बार सुनाया है।

नहीं गए नहीं गए। कहने पर भी हमें आवश्यकता नहीं। हमारे प्रिया हमारी नेत्र की जो भूख है वो मनो मृणाल भूषण भूषित भुज श्याम हंस पर डारी मैं इस शोभा का पान करता हूं। मेरे ही प्रभु में माना मुझे कोई नहीं। पर मेरे अंदर भूख ही नहीं। मैं क्या देखूं? इधर वि चिकित्सा अपने इष्ट और गुरुदेव के सेवा में जब उन के वस्त्र को झटका कहां है से श्री हरिव श्री हरिव श्री रोम रोम से गंगा यमुना बाई के ऊपर विपत्त श्री हरिव श्री हरिव वही नाम वही रूप वही लीला इष्ट अनन्य अपने इष्ट में अन्य कोई नहीं इत विचिकित्सा यह भाव को बहुत पुष्ट कर देती है।

पर कोई बिरला इस पर टिक पाता है। इसीलिए तो भाव देह और भाव प्राप्त होना कठिन है। भगवान स्वयं कहते हैं कि मैं भाव पूरी टेरर ही करती मुझे लाचार है। यह भाव बाजार में नहीं मिलता है। ये भाव ही प्रकट होने की बात बताई जा रही है। छठवा महिमा ख्याति अपने गुरुदेव इष्ट देव की ही बात मुख से निकलना। अगर हमारी वाणी से निकलेगा तो अपने गुरुदेव की बात निकलेगी। अपने इष्ट देव की बात निकलेगी। भाव बड़े से बड़े किसी की महिमा सुनेंगे, प्रणाम करेंगे लेकिन हृदय में नहीं आएगी।

हृदय में अपने इष्ट देव गुरुदेव की महिमा का ही प्रभाव रहेगा। वाणी से हम महिमा गायन करेंगे तो अपने इष्ट देव और गुरुदेव की महिमा ख्याति इष्ट देव गुरुदेव की महिमा के सिवा अन्य ना हमारी श्रवण देखो आचार्य चरण रसना कटो जो अनरटो निरख अन फूटो नैन श्रवण फूटो जो अन सुनो श्री राधा जस बैन यह हमारे हृदय की निष्ठा हो जानी चाहिए अगर हृदय में कुछ भाव की गुदगुदी होगी तो इष्ट और गुरुदेव के वचन सुनकर उनकी महिमा सुनकर उनके संबंध से अन्यथा नहीं यह आना ही चाहिए उपासक के हृदय में हृदय में ये महिमा ख्याति बैठ जानी चाहिए तो भाव प्रबल होता है सातवा तदर्थ प्राण धारण अपने इष्ट देव गुरु गुरुदेव के लिए ही प्राण धारण करना।

श्री भगवान ने भी कहा मदगत प्राणा यहां तदर्थ प्राण धारण। मेरे प्राणों का कोई महत्व नहीं रहा। मेरे प्राणनाथ के चरणों में प्राण समर्पित हो गए। अब वो अभी चाहे ले ले वो 10 वर्ष बाद चाहे ले ले। वो जैसे हमारे प्राणों का हमारे लिए कोई अस्तित्व नहीं। कान भय प्राण में प्राण भय कान में ह में ना जान पर कान है कि प्राण है यह उसी के होता है जो तदर्थ प्राण धारण ये प्राणों का हमारा अस्तित्व नहीं रहा हमारे स्वामी का अस्तित्व प्राणों पर है मेरे प्राणनाथ श्री श्यामा फिर आपको क्या परेशानी तदर्थ प्राण धारण है अब चाहे हमारे प्राण रहे या जाए हमें क्या चिंता अगर इनकी चिंता है तो इसका मतलब प्राण समर्पित नहीं है।

मदगत प्राणा नहीं हुआ। अपने गुरुदेव इष्ट देव के लिए प्राण धारण करना। इसीलिए ये जो बड़े-बड़े महापुरुषों के चरित्र सुनते हैं ना तो इष्ट देव को प्राण समर्पित है। उन्होंने स्वीकार कर लिया। अब क्या उनको प्रश्न नहीं है कोई? उनको कोई पीड़ा नहीं है। पीड़ा होते हुए भी पीड़ा नहीं है। प्राण छूटने का भय उसको होता है जिसके प्राण होते हैं। वो तो उनके प्राण प्राणनाथ के पास पहले ही समर्पित हो चुके हैं। उनको क्या भय? अपने इष्ट देव गुरुदेव के लिए प्रत्येक क्रिया अनन्य भाव से होना ही प्राण धारण करना है।

तदर्थ प्राण धारण करना है। हमारे शरीर से हमारे प्राणों से अब जो चेष्टा होगी वो आराध्य देव और गुरुदेव की आज्ञा के अनुसार उन्हीं के लिए होगी। तदर्थ उन्हीं के लिए होगी। तब प्राणों का समर्पण हो जाता है। हमारे प्राणनाथ श्री श्यामा है। उन्हीं के लिए वही हमारे गुरुदेव है। गुरुदेव ही श्यामा उन्हीं की आज्ञा में उन्हीं के लिए मेरा जीवन समर्पित है। उनकी आज्ञा में प्राण रहे चाहे चले जाए इसकी परवाह नहीं। तदर्थ प्राण धारण इससे भाव पुष्ट होता है। आठवा तदीयता अपना संबंध केवल इष्ट देव गुरुदेव से हमारा और कोई नहीं है।

तदर्थ प्राणध अब तदीयता सर्वस्व हमारे इष्ट देव गुरुदेव है। सर्वस्व उनके सिवा हमारा कोई नहीं है। ये सिद्धि है। ये साधना नहीं है। यह जिसके हृदय में आ गई उसकी सिद्धि है ना कोई मेरा तुम माता च पिता तुम्हें हो तुम बंधु सखा तुम हो तुम विद्या द्रविण तुम सर्वम मम देव देव ये है तदयता आप ही मेरे मां हो आप ही मेरे पिता हो आप ही मेरे इष्ट आप ही मेरे सब कुछ हो धन हो संपत्ति हो विद्या हो संबंधी हो रिश्ते जितने हो सब आप ही हो तद यता अपने इष्ट गुरुदेव के अलावा और कहीं किसी से प्रियता ना रह जाना।

इसका परिचय अगर आपसे कह दिया कि आपको किसी से संबंधी से बात नहीं करना है। वो आपने छुप के बात की फिर कभी पूछा आपने बात की नहीं। आपकी प्रधानता उस संबंधी की हो गई। गुरु संबंध इष्ट की नहीं। हां जी तो आपने गलती क्यों की मना किया था भूल से हो गई आगे से कभी दोबारा शिकायत नहीं मिलेगी तो तद प्राण धारण जो वृत्त थी वो तदीयता में बदल गई जहां तदीयता आई भाव की लहर उठने लगती केवल मेरे इष्ट देव गुरुदेव देख लो अनन्य रसिकों के चरित्रों को पढ़ के देख लो आश्चर्य छोटी सी वाणी है रसिक अनन्य माल देखो रसिक अनन्यों के चरित्र पढ़ के देखो होश उड़ जाएंगे कि ये किस धरा के हैं कैसे कैसे उनके साथ व्यवहार हो रहे हैं और कैसे कैसे उनके भाव है आश्चर्यचकित व्यवहार में तो कहीं कोई समझ ही नहीं सकता कि ऐसा कैसे हो सकता है तद यथा सब कुछ अपने इष्ट को मानना गुरुदेव को मानना देखो यह भाव है।

भाव आ गया तो भाववश भगवान भगवान अधीन हो जाते हैं। यह भाव की बात है। तदीता सब कुछ अपने इष्ट को मानना गुरुदेव को मानना। इष्ट और गुरुदेव एक है। इष्ट ही गुरुदेव के रूप में आकर साधन का रहस्य समझाते हैं। जब साधन बनता है तो अनुभव जो होता है वो गुरुदेव का ही होता है। गुरु साक्षात परम ब्रह्म वही इष्ट रूप में अनुभव में आ जाते हैं। इष्ट और गुरुदेव दो नहीं है। कहने में केवल दो है। नवा सर्वत्र तद भाव बहुत सुंदर बात है। अद्भुत क्रम है। तदर्थ प्राण धारणा तदयता और तद भाव सर्वत्र तद भाव गुरुदेव अखंड मंडलाकारम व्याप्तम चराचरम मेरे गुरुदेव ही की सत्ता है।

हम किसी को नमस्कार करें। अपने गुरुदेव को नमस्कार। मेरे गुरुदेव सब जड़ चैतन्य में व्याप्त गुरुदेव हैं। जैसे आकाश जहां भी देखो आपको मिलेगा ऐसे ही ब्रह्मंदम परम सुखदम केवलम ज्ञान मूर्तिम द्वंदातीतम गगन सदसम तत्वस्याद लक्षम एकम नित्यम विमल अचलम सर्वध साक्षी भूतम भावातीतम त्रिगुण रहितम सद्गुरु तम नमाम गगन सदसम जैसे आकाश सर्वत्र ऐसे हम कहीं भी है अपने गुरुदेव के नीचे है गुरुदेव की चरण छत्र छाया में है गुरुदेव के सानिध्य में कहीं भी देखूं आकाश दिखाई देगा मैं जहां भी देखता हूं मेरे गुरुदेव विराजमान नजर आते हैं सर्वत्र तद भाव इष्ट देव गुरुदेव सर्त निरीक्ष परम स्वराध्य बुद्धि धीरेधीरे भाव बदल जाएगा व्यक्ति का महत्व नहीं रह जाता।

इष्ट का महत्व जागृत हो जाता है। फिर इष्ट ही दिखाई देते हैं। व्यक्ति नहीं दिखाई देता। गोपी जनित देखू तित श्याम श्याम ही दिखाई दे रहे हैं। पंच भौतिक शरीर या प्रकृति जनित रचना उनके सामने नहीं केवल श्याम जड़ चैतन्य कछु नहीं देखत जित देखत तित श्याम खड़े सर्वत्र तदभाव अपने आराध्य देव गुरुदेव के सानिध्य का उपस्थिति का चराचर में अनुभव करना और दसवा अप्रतिकूलता अपने इष्ट देव गुरुदेव की इच्छा में दखल ना डालना। जो विधान उनका बना उनकी आज्ञा, उनकी इच्छा समझकर ठीक वैसे ही मान लेना।

अपनी बुद्धि ना लगाना। लोक दृष्टि से, कुल दृष्टि से, अपने शरीर दृष्टि से, हित दृष्टि से कोई भी उनके प्रतिकूल संकल्प आचरण विचार ना करना ये दसवा अप्रतिकूलता भगवत इच्छा गुरु इच्छा में दखल ना देना जो कुछ उनका विधान जो कुछ उनकी आज्ञा उनकी इच्छा के अनुसार ठीक वैसे ही मानना वैसे ही चलना उसके विपरीत लोक हित शरीर दृष्टि व्यवहार दृष्टि कुल दृष्टि हमारे तो कुल देवता ये है हमारा तो अब हमारा हमारा सर्वस्व गुरुदेव उनका जो आदेश वही हमारा जीवन ना तो लोक दृष्टि लोक में ऐसा ऐसा व्यवहार ऐसे कैसे हो सकता है ऐसा नहीं अब नहीं जब तक हम समर्पित नहीं थे तब आप समर्पित हो गए तो हमारे लिए लाज तीन लोकन की न वेद को कहो करे आप तो गुरुदेव जो कहेंगे वही करेंगे ना लाज तीन लोकन की न वेद को कहो करे न शंख भूत प्रेत की न देव जच्छते डरे गुरुदेव ने जो आज्ञा करी बस वही हमें पालन करना उनकी इच्छा समझकर ठीक वैसे ही बर्ताव करना उनके विपरीत लोक हित कुल दृष्टि आदि का या अपने शरीर या व्यवस्था आदि का कोई भी संकल्प ना करना यह अप्रतिकूलता कहलाता है।

इन द 10 भावों का पालन करने वाले के अंदर भगवान को अधीन करने वाला भाव प्रकट हो जाता है। सम्मान बहुमान प्रीति विरह इत विचिकित्सा महिमाख्याति तदर्थ प्राण धारण तदीयता सर्वत्र तदभाव और अप्रतिकूलता ये द भाव हैं। संशय ना करे इसमें ऐसा कैसे हो सकता है कि ऐसा नहीं संशय आत्मा को ना तो परमार्थ का सुख होता है और ना स्वार्थ का सुख होता है संशय आत्मा विनश्यति प्राय देखा गया है कि जो विषयों में आसक्त होते हैं वो तत्काल क्यों म्यू करके संशय कर बैठते हैं ऐसा कैसे हो सकता है ऐसा कैसे हो सकता है तुम्हारी बुद्धि अगर लाभ लेना चाहती तो पहले स्वीकार करो ऐसा ही है।

अब उसको पाने के लिए उसको समझने के लिए साधन करो तुम्हारे हृदय में अनुभव में आ जाएगा कि ऐसा ही है। संशय थोड़ी किया जाता है। संशय करने वाला ना परमार्थ का पथिक होता है और ना व्यवहार में ही सुखी होता है। वैदिक गौड़ी अनुरागात्मिका ये तीन प्रकार की उपासना इसमें जो भक्त वेद शास्त्र पुराण की आज्ञा के अनुसार विधि विधान से आराधना करता है उसे वैदी उपासना कहते हैं। और जो गौड़ी उपासना जो भगवान के ऐश्वर्य महिमा गुणों पर प्रभाव पर दृष्टि रख के की जाती है। भगवान ऐसे सामर्थ्यशाली ऐसा ऐसा ऐसा वो गौड़ी उपासना कही जाती है।

लेकिन अनुरागात्मिका उपासना प्रेम लक्षणा भक्ति इसमें केवल माधुर्य ही माधुर्य ये जो वृंदावन की उपासना है इसमें केवल माधुर्य ही माधुर्य इसलिए माधुर्य भाव में उपासक को चलने के लिए पहले द्वंदातीत होने के लिए जो जो आज्ञा हो वैसे चले सीधे जैसे नहीं हमारी उपासना में तो ये नहीं बाबा बाबा का बहुत बड़ा अनुभव है। जो द्वंदातीत नहीं होता वो आरंभ से ही यदि माधुर्य वाली बात पकड़ेगा तो आगे जो शब्द कह रहे वो गिर जाएगा। प्राय बहुत सुधी हुई बात है। बहुत अनुभवी महापुरुष की बात है।

क्योंकि जैसे लकड़ी गीली और उसे सुखाई नहीं गई और उसे जल में और डाल दिया जाए और फिर आग लगाया जाए। बोला जलेगी क्या? नहीं जलेगी। प्रेमाग्नि कैसे उठेगी? विषयों से हमारा जो द्रवित मन है उसको पहले शुष्क किया जाता है वैराग्य के द्वारा। जगते भयो फिरे वैरागी ये नहीं हटाओ इसको इसको अब मन जला तब उसके अंदर माधुर्य प्रेम का प्रकाश एक बार भगवत ऋषिक जी महाराज अपने गुरुदेव के चरणों में बैठकर निवेदन किया कि जैसी आपकी आज्ञा ठीक अक्षरशा वैसे ही वैराग्य से रह रहे बहुत वैरागी महापुरुष फिर भी काम वेदना सता रहे इसका क्या हो सकता है?

खानपान की कोई व्यवस्था नहीं। माधुकरी वृत्ति से बहुत एकांत प्रिय बहुत अद्भुत साधना फिर भी गुरुदेव ये अंदर काम वेदना। कहा करवा ले आओ। उस करवा में गांव में तो उसे अंडी कहते हैं। बड़ा पेड़ होता है। छोटे-छोटे उसके ऐसे बीज होते हैं। उससे तेल निकलता है। तो वो बोले करवा ले आओ। ले आए। बोले देखो इसमें तेल तो नहीं है। बोले नहीं पानी भरा थोड़ी देर रखा तो तेल आ गया। बोले जानते हो इसमें तेल क्यों आ गया? क्योंकि इसमें तेल रखा गया था। फिर धोया फिर डाला। फिर देखो फिर आ गया ना तेल बोले अब देखना और उस करवे को रसोइया मनिया की गई थी तो ढेर सारी आग थी उसी आग में रख दिया 1015 मिनट रखने के बाद फिर निकाला बोले अब पानी रखो पानी रखा तेल नहीं आया बोले समझ गए अभी तुम्हारे तप में कमी है और तप करो भस्म हो जाएगा ये जब तक इसके संस्कार है कई जन्मों से भोग वासनाओं के खेल खेलते चले आ रहे तो संस्कार है जहां संयोग बनेगा त प्रकट होने लगेगा वो दिखाई देने लगेगा भस्म करो इसको तप के द्वारा जैसे आग में रख दिया गया तो संस्कार भी तेल के भस्म हो गए वो पानी में अब दोबारा फिर नहीं आए ऐसे ही तप के द्वारा भजन के द्वारा वासना को भस्म कर दिया जाता है तब उपासना परिपक्व होती है तोुर्य भाव ये जो प्रेम लक्षणा भक्ति है इसमें सबसे बड़ी बड़ी सावधानी चढ़ के मेन तुरंग पे चलबो पावक माय इसमें अत्यंत वैराग्य की आवश्यकता है तो जो प्रारंभ से एकदम जुड़े और सही दिशा नहीं मिली गुरुजनों का सही निर्देश सानिध्य नहीं मिल पाया तो वो फिर इसी में भटक जाते हैं।

इसी में भटक जाते हैं। संसार मार्ग में क्योंकि हृदय में एक द्रवण क्रिया होती है। उस द्रवण किया के लिए वैराग्य की बाढ़ होनी चाहिए। वैराग्य की कसौटी अगर वैराग्य की बाढ़ नहीं है तो द्रवण किया फैल जाएगी। पहले राग रहित होकर फिर अनुराग में जाया जाता है। तो कह रहे माधुर उपासक को चाहिए आरंभ में किसी महापुरुष के निर्देश के अनुसार साधना में पहले लगे। क्या प्रिया प्रीतम का प्रेम रस है? क्या उनका नित्य विलास है? बिल्कुल मतलब नहीं। समझ रहे हो? जो मंत्र दिया, जो उपासना दी, जो पाठ दी, जो दिनचर्या बताई, बस उस पर चलना है।

वहां विचार की क्षमता नहीं आपकी। धीरे धीरे धीरे धीरे राग रहित होकर पहुंच जाएंगे आप। अब कैसे समझेंगे आप? कैसे अंदर प्रवेश हो? इसीलिए कहा है प्रथम सुन भागवत भक्त मुख भगवत वाणी क्यों इतने बड़े महापुरुष भगवत ऋषिक जी ने सीधे क्यों नहीं कह दिया श्री सुख मुख जो वचन सुनावो तब श्री हरिवंश सुनाम कहावो मन सुमिरन मिश्र में क्यों भाई ऐसा क्यों कह दिया ये जो बात नहीं समझते हैं ना वो हमारे ऐसे किसी की बात नहीं सुनना आचार्य वाणी की बात मानो भीड़ मिटे भट जमन की भय भंजन हरि सोए भय भंजन हरि सोए भरम भूले भटकत कद भगवत भक्ति विचार वेद भागवत प्रीति रति भक्त चरण धरि भाव तरत भव सिंधु अगाधा

सेवक जो महाराज श्री सेवक वाणी जो अति अगाद मत ग बिरल कोई समझ हित मार मार्ग आरूढ़ हित मार्ग आरूढ़ भाव भागवत मिले सब चार वेद सुस्मृति जो चार और गाय ले जब तब पावे सेवक हृदय जो हित मार्ग उपदेश है क्यों कहा क्योंकि गीता और भागवत की कसौटी पर वैराग्य और ज्ञान की कसौटी पर जब हृदय कस गया तो माधुरी रस परोस दिया गया वो संबंध अभी तो जीवत तो है देहा अभिमान मैं पुरुष मैं स्त्री कैसे इस रस का इसलिए गुरुदेव की आज्ञा पे चलो रस की बात को मत देखो कि हमारा तो सहचरी भाव आता ही नहीं ऐसे आ जाएगा तुमको इससे मतलब नहीं कि सहचरी भाव क्या है पिया प्रीतम का नित्य विहार क्या तुम्हें साधना से मतलब है तुम पुरुष समझ रहे हो हां चलो लोगों पहले कहारा पढ़ो मात्राएं पढ़ो पहले उन शब्दावली पढ़ना सीखो फिर पीएचडी की बात समझ में आएगी ये वासुदेवा सरमित से पढ़ाई शुरू होती है।

ये कोई छोटी मोटी नहीं है। वृंदावन नित्य विहार रस है। ये यहां बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषि भी जहां हार गए वो ये रस है वृंदावन का प्रेम रस। हार गए कृष्णा परम कि तत्व महाम न जाने अभी तो पहुंचे नहीं किशोरी तक। श्रीमद सुदन सरस्वती जी कहते हैं जो ब्रह्म चिंतन में स्वराज स्वरूप स्थान में विराजमान आत्म बोध संपन्न महापुरुष उनको जब रूप माधुरी ने आकर्षित किया श्री कृष्ण चंद्र के तो कहते हैं कृष्णा परम कि तत्व महाम न जाने और उनको क्या पता कि ये सौंदर्य माधुर समुद्र लाल वेणु पितालित शिखंडम चितम ब्रजराज सो य्या कटाक्ष सरप यस्या कटाक्ष सरपात विमूर्छितस कैसे पता चलेगा अब सीधे नित्य विहार रस की बात इसीलिए गुरुजनों ने सिद्धांत बनाया प्रथम सुन भागवत भक्त मुख भगवत

वाणी गीता और भागवत की कसौटी पर उपासक का हृदय कसा होना चाहिए आसपास पात्र मे मजबूत है रस डाला सीधे उसमें सुरक्षित है नहीं तो द्रवित हृदय और फिसल गया तो ये फिर संसार में चला तो उपासक महाधुर्य रस की उपासना वाला पहले गुरुदेव प्रदत्त साधना में प्रीति करे अब नित्य विहार का मतलब क्या पहले तुम राधा राधा रटो एक भी मिनट नाम ना छूटे पहले ऐसे चलो पहले अपनी इंद्रियों को ठीक करो पहले अपने आचरणों को ठीक करो पहले आप जैसा आज्ञा हो रहा है वैसा चलो फिर आगे का रस अपने आप आ जाएगा समझाने की थोड़ी जरूरत पड़ेगी और तुम्हारी समझ क्या संभाव्य विर नारद शिव तुम समझना चाहोगे समझ जाओगे जो मंत्र मिला है जो उपासना मिली उसमें रति करने से उपासना के दो परिणाम होते हैं आधे तक उपासना दोनों की एक ही चलती ज्ञानी की भी और प्रेमी की भी जब कोई उपासक उपासना करता है तो पहले अंतःकरण शुद्ध होता है।

यहां तक सबकी उपासना एक ही चलती है। अंतःकरण शुद्धि। अंतःकरण शुद्ध का मतलब मन में कोई भी सांसारिक संकल्प नहीं रह गया। बुद्धि का निश्चय जो ये था कि इंद्रियों के सहित मन जब भोगों का संयोग करेगा तो हम सुखी हो जाएंगे। खत्म हो गया। बुद्धि का निश्चय है एकमात्र प्रियाल में ही सुख है। मन संकल्प विकल्प छोड़ दिया संसार केित की वृत्ति भगवदाकार हो रही है। अहम दासत्व में बदल गया। यह है शुद्ध अंताकरण भक्त का और ज्ञानी उसका शुद्ध अंताकरण जहां हुआ उसे अनुभव हुआ। स्थूल नहीं सूक्ष्म नहीं कारण नहीं आत्म स्वरूप और अपने आप उसका राग तीनों शरीरों से खत्म क्योंकि शुद्ध हो गया ना तो दिखाई दे रहा अब अपने आप में स्थित अब वो दृष्टा मात्र है गुणानगुण वर्तनते यहां तक एक चलता है भक्त और ज्ञानी अंतःकरण शुद्ध होने वो निकल गया दासत्व की तरफ और वो निकल गया स्वरूप में स्थित होने की तरफ आत्म निवेदन करने वाला उपासक मोक्ष पदवी की भी इच्छा नहीं रखता।

फिर अन्य इच्छाओं की तो बात जाने दो। आत्म निवेदन आराध्य देव को। यह नवी भक्ति है। जब तक उपासक के अंदर वासना है, काम है, नाना प्रकार की छाएं हैं। तो साधना पर ध्यान दे। साध्य की दिव्य लीलाएं जो नित्य विहार रस की है वो चिंतन करने का अधिकार नहीं। यह तो निरखत नित्य बिहार पुलकित तन रोमावली आनंद नैन सुधार यह जो कृपा हरिवंश की क्योंकि वाणी जी समर्थ है स्वयं प्रकाशित हो जाती है हृदय में ये चिंतन का विषय तब बनता है जब देह भाव छूट जाए बनिता पुरुष भाव मिट जाए तब चिंतन आज वन क्रीड़त श्यामा श्याम सुभग बनी निश शरद चांदनी रुचिर कुंज अभिरा खंडन अधर करत पर ये चिंतन जो दिव्य भावावेश में अपने सहचर स्वरूप में वो देख रहा है सामने निकुंज है कैसी चांदनी छिटकी हुई है कैसी सुंदर सैया है कैसी प्रिया प्रीतम विराजमान वो सब शोभा ये अर्थ थोड़ी हो सकता है अर्थ नहीं हो सकता यह चिंतन का विषय होता है।

तो नित्य विहार रस माधुर्य रस के उपासक को चाहिए कि वाणी जी का पाठ करें अर्थ समझने की नहीं सिद्धांत का अर्थ समझे लीलाओं का नहीं लीला गायन करो गायन करने से ही गायन का फल लिखा है छटी चौरासी भ्रमते निरखय जुगल किशोर जब निरखय जुगल किशोर तब लीलाओं का चिंतन प्रारंभ होता है उस समय निर्विकार अवस्था होती सच्चिदानंद वपू अभी तो यह जो वपू धारण किए विकारी है ये काम से पैदा हुआ है इसके अंदर परमाणु है कामना के जन्म जन्मांतरों से इसी में हम बंधे चले आ रहे हैं इस शरीर की रचना काम से हुई है संकल्प कामना चिंतन काम का संकल्प काम का कामना उससे इसकी उत्पत्ति सृजन ही इसका हुआ है और जिस देह से सेवा सेवा होती है।

उसका भाव से सजन होता है। ध्यान रखना वो ना संकल्प का है ना कामना का देह है। वो गुरु प्रदत्त मंत्र के भाव का देह उसे भाव देह कहते हैं। विशुद्ध सच्चिदानंद बु प्रेममय तब नित्य विहार लीला का चिंतन जरा सा चिंतन हुआ। हृदय में अद्भुत आनंद आंसुओं की छड़ी लग गई। देखो प्रिया प्रीतम झूल रहे हैं। पैग बढ़ी तो अबलाद सुकुमार डरत मन वर हिंडोर झकोर तो पुलक पुलक प्रीतम और लागत दन उझको अब अरुझी विमल माल कंकन सो कुंडल सो कछ डोर ये शोभा जब देख स हो कैसा अपार सुख हो रहा है तो दशीष हरिवंश प्रशंसत कर अंचल की आचार्य हरिवंश महाप्रभु जी जो हित सजनी स्वरूप में है आशीर्वाद ये सुख जब इन नेत्रों से देख रहा है उपासक इतनी सामर्थ तब उसका सही भाव और अर्थ समझ में शब्दावली से नहीं शब्दावली से नहीं समझ सकते इसीलिए गुरुदेव भगवान का आदेश महापुरुषों के रसिकों की बात

मान कि वाणी जी का अर्थ नहीं गायन करो गायन करने मात्र से छुट चौरासी भ्रमते निरख जुगल के पहला तो यही है कि भजल निधि को नाव और काम पावक को पानी गाते गाते देखना तुम्हारा हृदय कैसे निष्काम हो जाता है निष्काम हृदय ही प्रीति रस में अभी तो बहुत कड़ा कर वाणी जी गाओ नाम जप करो श्री जी की सेवा करो आठों पहर जो कर्तव्य कर्म है धर्म पूर्वक करो भगवत अर्पित करो निष्कामता पहले जागृत होगी फिर प्रेम मार्ग का रहस्य आएगा जैसे हम इंटर कॉलेज है और वो कक्षा एक से लेकर 12 तक है तो हम पढ़ाई एक से शुरू करेंगे कि 12 वाले स्कूल में बैठ जाएंगे ऐसे ही ये जो नित्य विहार रस है ये साधारण से लेकर असाधारण स्थिति तक पहुंचाने के लिए है।

तभी कहा है श्री सुख मुख जो वचन सुनाओ सेवक जी कह रहे श्रीमद् भागवत और भगवत गीता जी इस साधक की कसौटी है साधना की ज्ञान वैराग्य भक्ति रस से परिपूर्ण तब जाकर आत्म समर्पण और फिर पाई रस भक्ति ग जुग जुग जग दुर्लभ इंद्राद विधि तो ये जो द भाव बढ़ाने वाले सूत्र बताए गए इनका मनन करो अपने आचरण में उतारो। निरंतर नाम जप करते रहो। शेष चर्चा आ गई। श्री राधा वल्लभ लाल की

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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