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जब शरणागति ही सभी सुखों का कारण है, तो हम प्रभु के शरणागत क्यों नहीं हो पाते? // 16/04/2026

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

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वृंदावनश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम ह्यपितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माश्रयाम निर्वा परम शीतल माश्रया परम सच्चिदानंद घन आनंद समुद्र प्रेम समुद्र ज्ञान वैराग्य भक्ति ऐश्वर्य अनंत शक्तियों के स्वामी स्वामी प्रभु श्री कृष्ण चंद्र जो अपने आप से अपने आप को प्रकट करके खेल खेल रहे हैं। हम अपने को प्रभु से अलग मानकर प्रभु को भूल करके विषयों को सत्य मान करके खेल रहे हैं। बस यह खेल हमारी दुर्गति का कारण हुआ क्योंकि हम अपने स्वरूप को भूल गए।

अपने अंशी प्रभु को भूल गए। नहीं तो यह सच्चिदानंद प्रभु का खेल है। अगर आपको स्मृति जागृत हो जाए तो आपके लिए दसों दिशाएं आनंदमय हो जाए। दुख का लेश ना मिले। यह दुख मिलता ही है हरि विमुखता के कारण। अगर हमारे हृदय में यह जो देहाभिमान है, मैं स्त्री हूं, मैं पुरुष हूं, मैं धनवान हूं, मैं ज्ञानवान हूं। आदि आदि यह हट के मैं प्रभु का हूं। प्रभु मेरे हैं। यह बात बैठ जाए तो दुख की यात्रा जड़ से समाप्त हो जाए। नहीं तो यह यात्रा जन्म जन्मांतर से चल रही है। इसका विश्राम नहीं होगा।

बार-बार जन्म, बार-बार मरण, बार-बार रोग, क्लेश, अशांति, दुख प्रभु कहते हैं तुम केवल मेरी शरण में हो जाओ। यह हृदय में ठसक बैठालनी है। यह कोई ज्यादा कठिन काम नहीं है। क्योंकि हम प्रभु के हैं। इसमें किसी साधना की आवश्यकता नहीं। यह बात स्वीकार करने की। प्रभु के हम हैं। प्रभु के सिवा हमारा कोई नहीं है। क्योंकि वही वही है। अगर यह बात हम स्वीकृति में ले आवे तो ज्यादा कठिन नहीं पड़ेगा। पर हमारी स्वीकृति गलत हो गई है। इसी को सुधारना है। हमारी स्वीकृति हमारी आंख के ये तारे हमारी आंख के ये तारे राधा मोहन मोहन राधा ये दो रूप उजारे ये दो प्रेम पियारे हमारी आखिन के दो ततारे गौर श्याम अभीराम मनोहर ये ब्रज बरसाने वाले सुख शारद नारद बलिहारी उपमा मा बरत हारे उपमा बरत हारे हमारी आंखिन के दो तारे सूरदास निज प्रभु दर्शन को बार-बार बलिहारे राधा मोहन मोहन राधा ये दो प्रेम प्यारे हमारे आंख इनके के दो तारे बड़े करुणामय अति उदार वि सुंदर सुरत सुर सुकुमार अति लावण्य रूप अभिनय गुण नाही कोटि काम समतुल हो करुणों काम की सौंदर्यता को मात करने वाले युगल सरकार बड़े करुणामय समुद्र है हम सब पर कृपा की अपने निज महल में बुलाया।

अब हमारा हृदय इनकी तरफ समर्पित हो जाए। जब तक हम इनको अपना स्वीकार नहीं करते तब तक यह माया बखशने वाली नहीं। इनको ऐसे स्वीकार करना है कि हमारे नेत्र देखना चाहे तो सिर्फ युगल सरकार। हमारी श्रवण सुनना चाहे तो इनहीं की बात इनहीं का नाम इनहीं के रूप गुण कीर्तन हमारी ग्रहण इंद्री अगर सुगंध लेना चाहे तो इनहीं के प्रसादी इत्र प्रसादी पुष्प प्रसादी माला और तुलसी चंदन आदि हमारी रस्द स्वाद लेना चाहे तो इनको अर्पित किया हुआ भोग प्रसाद अगर हमारा शरीर स्पर्श करना चाहे तो इनके श्री चरणों को और इनके श्री चरणों में लगे भक्तों के श्री अंगों को हमारा जीवन अभी सार्थक हो जाए।

पर यह दुर्भाग्यवश हमारी बात समझ में नहीं आती। जैसे ही हम इनको अपना स्वीकार करते हैं तो हृदय में एक पीड़ा पैदा होती है कि हमने जिनको अपना माना वो तो पर्दे में छुपे हुए हैं। हमसे मिलते क्यों नहीं? हमसे बात क्यों नहीं करते? पीड़ा और बढ़ती है। पीड़ा ही विरह रूप धारण कर लेती है। अब तो हृदय हाहाकार से युक्त हो जाता है। प्रभु पता नहीं कितनी स्वासे रह गई। अब तो मिल जाओ नाथ। आप अपनी कृपा से मिल जाओ। उसके पास समय कहां रहता है किसी और को देखने का, सुनने का।

उसका हृदय तो प्रतिपल व्याकुलता से भरा रहता है। कहां माया है? कहां विघ्न है, कहां अशांति है? जब तुम माया का चिंतन करोगे, विघ्नों का चिंतन करोगे, अशांति का चिंतन करोगे, तब होगी। सबके हृदय में बड़ा बनने की इच्छा है। क्योंकि हम बड़े के हैं। बड़ों के बच्चे बड़े ही बनना चाहते हैं। अविनाशी का बच्चा अविनाशी स्वरूप में ही होना चाहता। वह मरना नहीं चाहता। सुख सिंधु का अंश सुख समुद्र में ही लीन होना चाहता है। पर हम बड़ा बनना चाहते हैं। रुपए के बल से, बड़ा बनना चाहते हैं।

पद के बल से, बड़ा बनना चाहते हैं। लोक सम्मान के भाव से, सब लोग हमें प्रणाम करें। गलत हो गया। यहां बड़ा वही बनता है जो सबसे छोटा हो जाता है। ध्यान रखना यहां सबसे बड़े पद का अधिकारी वही बनता है जो तणादप सुनी चेन अपने को सबसे छोटा समझता है। सबको अपने आराध्य देव की भावना से युक्त देखता है और अपने को सेवक कहां माया है? कहां बंधन है, कहां अशांति है? हम अशांति पैदा करते हैं। अशांति का संकल्प करते हैं। अशांति का चिंतन करते हैं। सावधान हो जाइए। श्याम भजे सो साहू बड़ा।

राम कृष्ण हरि कोई भी नाम लो। सब हमारे ही प्रभु के नाम है। वही सबसे बड़ा है जो नाम जप करता है। आप लोगों को यह बात अनुभव में नहीं आएगी। जिसका जितना हृदय प्रभु में समर्पित है उसको परिचय मिलता है। सब खोखला नजर आता है। कहीं सार वस्तु नहीं है प्रभु के सिवा। सब खोखला। भय लगता है कि अरे यह झूठे पदों में, झूठे मान में, झूठे भोगों में, झूठी संपत्ति में ऐसी अमूल्य स्वासों को नष्ट कर रहे हैं। इनको पता ही नहीं है। कुछ नहीं है इनके पास। जो प्रभु का नाम जप नहीं करते।

प्रभु से विमुख है। अपने को कुछ मानते कुछ नहीं है। वही बड़ा साहू है। वही जमींदार है। वही पदाधिकारी है। वही धनी है। वही सम्राट है जो श्याम भजे भगवन नाम का धनी। और जो कामना को भजे तो कह रहे काम भजे सो है ब चोर। जो कामनाओं के पीछे मारा घूमता है वह चोर है। आप उसे चोर कैसे कह सकते हैं? चोर तो वो होता है जो दूसरे की वस्तु का अपहरण करे। आप किसी को चोर क्यों कह सकते हैं? बोले हां प्रभु ने शसे दी। अपना कल्याण कर लो। साधन धाम मोक्ष कर द्वारा पाजे परलोक संारा राजकीय विभाग से स्वास रूपी धन मिला परमात्म तत्व के चिंतन के लिए आपने उन शसों को काम में विषय भोगों में व्यतीत कर दिया चोरी है प्रभु की वस्तु प्रभु को अर्पित करनी चाहिए आपको धरोहर रूप में स्वासे दी गई थी तदय वस्तु गोविंदम में समर्प गोविंद की वस्तु गोविंद को समर्पित कर देते तो गोविंद बन जाते बड़े हो जाते तो तन मन धन कछु थिर ना रहे वो काहे हुजिए इतो कठोर ये तुम्हारा शरीर तुम्हारा धन तुम्हारा पद और तुम्हारा मन सब चलायमान है स्थिर नहीं है।

क्यों अपने हृदय को अभिमान की कठोरता से भर रहे हो? तुम्हारे पास कुछ भी स्थाई वस्तु नहीं है। सब चलायमान परिवर्तनशील नाशवान है। ते धनवंता ते सुखवंता कृष्ण नाम जपते निशिभोर वही सबसे बड़ी धनवान धन संपत्ति वाला वही सबसे बड़ा सुख सामग्री वाला सुखवता जो रात दिन कमाई नाम की कर रहा है। कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधा राधा राधा राधा ते धनवंता ते सुखवंता कृष्ण नाम जपते निशिभोर रात दिन जो नाम जप कर रहे हैं वही धनी वही सुखवान है काम क्रोध मद लोभ मोह में विषय वासना लागी डोर शूर सूरदास प्रभु सुमिरन करले ना त जम की पोर प्रभु को भूल करके काम क्रोध मद मोह मत्सरता की प्रेरणा से दुष्कृत कर्म कर रहे हो एक ही उपाय है बचने का प्रभु का नाम जप लो नहीं तो यम के द्वारे पर तुम्हारी बहुत पिटाई होने वाली है जब तक शसे हैं तब तक तुम संभल जाओ नहीं मन पछताई है अवसर बीते यहां खूब डींग हाकी जाती है खूब मुच्छ में ताव दिया जाता है और जब कानून के विरुद्ध आचरण किए जाते हैं और जब फंस जाता है केस जब सजा होती तब उसको पता चलता है कि अरे मैंने अगर यह गलती ना की होती तो आज कितना स्वतंत्र जीवन में घूम सकता था।

मैं जा सकता था। आज इन चार दीवारी के अंतर्गत शासन में रहकर कष्ट सहता हुआ बिना रुचि का हमारा जीवन जा रहा है। अब तो क्या जब फंस गए फिर क्या अभी तो क्या यमदूत क्या यम द्वारा क्या नरक सब बातें लिखी पड़ी है। कुछ सत्य नहीं है। कह लो तुम्हारे कहने से होगा। जब तुम्हारे दुष्कृतों का फल आएगा तब तुम्हें पता चलेगा और उस समय तुम कुछ कर नहीं पाओगे। इसलिए सावधान वही धनवान है, वही बड़ा है, वही सुखी है, वही बुद्धिमान है जो रात दिन प्रभु का नाम जप करते हैं। प्रभु कह रहे हैं मेरी ये गुणमई माया बड़ी बड़ी दुरत्य है।

अगर इससे कोई पार पा सकता है तो जो मेरा शरणागत भक्त है वही पार पा सकता है। क्योंकि माया मेरी है। जब कोई मेरी शरण में आ जाता है तो भगवान को कहना नहीं पड़ता। माया अपने आप उसका सहयोग करने लगती है भगवत प्राप्ति में। और जब कोई अहंकार करता है शरणागत होते हुए भी तो तत्काल फिर वो कसौटी में कसती है। दिखाओ इस प्रश्न का उत्तर देकर के फिर वो हार जाता है। फिर रोता है। फिर वो सहयोग करती है। चलो आगे बढ़ो। अभिमान मत करना। सब सुख का साधन श्री भगवान की शरणागति है। या में तेरो कहां घटेगो आ ध्यान देकर सुन या में कहा घटेगो तेरो नंद नंदन करी घर को ठाकुर आपुन होए रहो चेरो या में कहा घटेो तेरो भली भई जो संपत्ति बाढ़ी बहुत कियो घर घेरो सुत बनिता बहु जूथ सकेले वैभव भयो जु घनेरो कहूं हरि कथा कहूं हरि सेवा कह भक्तन को डेरो शूर समर्पण करो श्याम को यह सांचो मत मेरो या में कहां घटे गो तेरो अगर आप सुखी परिवार चाहते हो खूब मंगल चाहते हो कभी चिंता ना करना पड़े ऐसी स्थिति चाहते हो अपने आप सारी व्यवस्थाएं होती रहे कोई विपत्ति विघ्न आपको सता ना पावे तो एक उपाय कर लो मामे प्रपदते तुम नंद नंदन को अपने घर का मालिक बना लो।

है ही वह पर तुम मानो। अभी तुम अपने को मालिक मानते हो। इसमें तुम्हारा कुछ जाएगा नहीं और तुम्हारा मंगल हो जाएगा। अपने घर को ठाकुर जी के हवाले कर दो। यह ठाकुर जी का भवन है। भक्त लोग तो लिख भी देते प्रिया कुंज निकुंज ऐसे यह प्रियाजु का कुंज है। आप अपने पूरे परिवार सहित प्रभु की दासता के भाव से हो जाओ। श्रुत बनिता जितना परिवार है मालिक है इस घर के ठाकुर जी। आप हुए सेवक चाहे जितनी संपत्ति हो आपको बांध नहीं सकती। क्यों? कभी हरि कथा करवा रहे हैं। कभी हरि भक्तों को सुंदर सुंदर प्रसाद पवा रहे हैं।

कभी दीनों की सेवा कर रहे हैं। ये मालिक की सेवा है। ये मालिक का आदेश है। वैसे हम जी रहे हैं। भला तुम्हें विपत्ति छू लेगी। भला तुम्हारे यहां संपत्ति की कमी रहेगी। पक्की बात समझो सुखी होना चाहते हो तो ठाकुर जी को अपने घर का मालिक बना लो आप सेवक हो जाओ और जो भी वैभव है उनकी आज्ञा के अनुसार उसको प्रयोग में लाओ अभी आनंदित हो जाओ करो अधर्म और चाहो सुख कैसी मति तुम्हारी बेईमानी अधर्म से हिंसा से कभी कोई धनी होकर सुखी हुआ है क्या साधु सेवा करो, दीनों की सेवा करो, दुखियों की सेवा करो और उनमें भगवत भावना करो और वह भी प्रभु के द्वारा दी हुई संपत्ति से, प्रभु की सेवा की भावना से अभी मंगल हो जाएगा।

दसों दिशाएं आनंदमय हो जाएगी। ऐसा सब क्यों नहीं कर पाते? यदि आप ऐसा कहते हैं कि भगवान की शरणागति, भगवान की भक्ति सुख देने वाली है तो सब क्यों नहीं कर लेते? अगर यही सुख का साधन है तो सबको करना चाहिए। भगवान कह रहे हैं कि मा प्रपदते माया मेंताम तरते श्री भगवान आगे का श्लोक कह रहे हैं कि इसलिए सब शरणागत हमारे नहीं हो पाते नमा दुष्कृतिनो मूढ़ा प्रपद्यते न राधमा माया हृत ज्ञान आसुरम भाव मास्रिता ये जो मेरे से विमुख हैं मेरी माया के द्वारा जिनका ज्ञान अपहरण कर लिया गया है वे आसुर भाव वाले राक्षसी शोभा वाले देखो सींग नहीं होते यहां के राक्षसों के बिना सींग के यहां के राक्षस राक्षसों को कैसे दांत बाहर निकले यहां बहुत सुंदर राक्षस है बहुत देखने में सुंदर लगेंगे बड़ा सुंदर जीवन है कैसे तुम्हें बताएं कैसी वो अपनी दुर्गति कर रहे हैं।

उनको पता नहीं है प्रमाद स्थिति में कैसा अपना नाश कर रहे हैं। देखो दुर्मति या संसार की हरि सो हीरा छाड़ी हाथ ते बांधत पोट विकार की देखो दुर्मति या संसार की झूठे सुख दुख में भूल रहे हैं सुध बरी करतार की नाना विधि के कर्म कमाए खबर नहीं सिर भार की देखो दुर्मति या संसार की को खेत को वज चाकरी को आशा हथियार की अधा धुन फिरत दसहु द फूटी आंख गवार की नरक जान के मार्ग चाले सुन सुन बी प्र लवार की अपने हाथ गले में डालत फांसी माया जार की बारह ही बार पुकार कहत हो सुन हो सिरजनहार की सूरदास ये बिनस जाएगी देह छिनक में छार की देखो या दुर्मति संसार की कैसी बुद्धि हरि के भजन ना करने से होती है जो हरि का भजन नहीं करते वो कैसी बुद्धि होती है बोले पहली बात इतनी मूर्खता छा जाती है कोई हीरा छोड़कर कांच बटोरने लगता है।

हरि नाम हीरा है। यह ऐसा हीरा है कि इसकी कीमत कहीं भी त्रिभुवन में कोई नहीं दे सकता। इतनी अमूल्य है इसकी कीमत। सब बिक जाएंगे पर इसकी कीमत नहीं दे पाएंगे। और जिसके पास ये धन है हरि नाम धन सब उसके आगे झुकेंगे। अब कितनी बड़ी मूर्खता है। इस हरि नाम रूपी परम धन का त्याग करके हम ऐसे रुपए बटोरने में लगे हैं जिनका कहीं कोई अस्तित्व नहीं है। ना ये पहले हमारे साथ थे ना ये बाद में हमारे साथ रहेंगे और ना बीच में हमारे साथ हैं। केवल हम उनका चिंतन करके सुखदख का अनुभव कर रहे हैं।

हमारे पास धन कम है। दुखी हो रहे हैं। बैंक में जमा है। हमारे पास इतने करोड़ है। हम करोड़पति हैं। बस इस बात का सुख और पाने को क्या है? बिलसने को क्या है? भोगने को क्या है? जो चार दिन की चांदनी है वो रोज का रोज इंद्रियां शिथिल हो रही हैं। शरीर में बल क्षीण हो रहा है। स्वासे कम हो रही है। उनको पता नहीं हरी से विमुख होने पर पहली मूर्खता ये काम करती है। बुद्धिहीनता काम करती है कि वो भजन रूपी हीरा नहीं कमाने देती। संसार के भोग रूपी कांच बटोरने में लग जाता है।

वह ऐसे विकारों की पाप पोटली बांध लेता है जो सीधे नरक पहुंचाती है। जब कामना बढ़ जाती है ना तो यह नहीं दिखाई देता कि इनके हमें पैर छूना चाहिए कि इनके प्रति हमें काम भाव रखना चाहिए। बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। जो तुम्हारे द्वारा पोषित है उन्हीं का शोषण होने लगता है। जो घोर पाप है वह सब होने लगते हैं। और ऊपर से हम ऐसे रहते तभी कह रहे कितने सुंदर राक्षस हैं। देख के आप भावना भी नहीं कर सकते कि कुछ गलत हो सकते हैं क्या? नहीं। भाव उनके ऊपर आसुरी भाव राक्षसी भाव नहीं।

मां ने कोई अनुजा तनुजा बहन बेटी का भाव ही खत्म हो गया केवल भोग बुद्धि पवित्र पूज्य भाव ही चला जा रहा है केवल स्वाद बुद्धि भोग बुद्धि इंद्रिय जन भोग मिले बस रुपया आया मनमानी आचरण शुरू पाप की पोटरी इकट्ठा कर रहा है हरि विमुख संसार में झूठ बोल बोल करके झूठे वादे करके झूठी झूठी बातें करके वह सोचता है मैं खूब धनी हो जाऊंगा। इन सब का दंड मिलेगा। कमाई है तुम जो बो रहे हो वही तुम्हें काटना पड़ेगा। जब काटने का अवसर आता है ना तब कोई नहीं होता। केवल आप होते हो।

अभी आपको लगता है परिवार के पोषण के लिए हमारा कर्तव्य चाहे धर्म से चाहे अधर्म से हम धन कमाए उनको सुखी करें। लेकिन जब तुम्हारे कुकर्म का परिणाम आएगा तो तुम्हें ही सिर्फ भोगना पड़ेगा। सावधान कह रहे हैं कि अपने ख्याल में उस सृष्टि को रचने वाले और उनके विधान को भुला देता है और अपने को सब कुछ मान लेता है। अरे कोई नहीं देखता मनमानी आचरण भांति भांति के शास्त्र विरुद्ध आचरण कुकृत ऐसे कुरकृत करता है। इतना बोझा लद जाता है दिमाग में बेखबर हो जाता है। मुर्दा जीवन मुर्दा जीवन भक्तों की दृष्टि में वह मृत जीवन है जिन हरि भगत हृदय नहीं आनी जीवित सब समान ते प्राणी कभी वो खेती करता है कभी व्यापार करता है नौकरी चाकरी करता है कभी हथियार उठा के हिंसा आदि चोरी आदि करता है दसों दिशाओं में अधाधुंध पागल बना घूम रहा है केवल वासना की पूर्ति के लिए देश विदेश ये अपने सष्टा अपने स्वामी अपने मालिक श्री हरि को बसरा करके यह धूल बनने वाले शरीर पर अहंकार करके तू नाश को प्राप्त हो रहा है।

बढ़िया अवसर मिला है इसे खो मत। श्री भगवान कह रहे हैं जो आसुरी भाव वाले जन हैं वो मेरी शरण में नहीं आते। पाप कर्म करने से मूढ़ता को प्राप्त हो गए हैं। ऐसे लोग कभी मेरी चर्चा नहीं सुन सकते। मेरी शरण में आने की बात भी नहीं सोच सकते। देखो बड़ी कृपा है अपने ऊपर। श्यामा श्याम की बड़ी कृपा है जो हमें रोज उनकी बातें सुनने को मिलता है। मानो रोज हमको जगाया जा रहा है। रोज हमें पवित्र सत्संग से बढ़कर पवित्र करने वाला कोई तीर्थ नहीं है। सत्संग सीधे हरि चरणारविंद का आश्रय और प्रेम प्रदान करता है।

बड़ा दुर्लभ जगत में संसार में यह सत्संग है। सच्ची मानिए दुर्लभ वस्तु सब कुछ मिल सकता है। लेकिन सत्संग बिना कृपा के नहीं मिल सकता। राम कृपा बिन सुलभ न सोई। प्रभु जिन जनों पर कृपा करते हैं वह भले समझ में ना आवे तो आप कहोगे समझ में नहीं आएगा तो फिर बात कैसे बनेगी? सांप झारने वाला जब मंत्र शुरू करता है ना तो उसका विष उतरना शुरू जो असली मंत्र ज्ञाता है। उसको कुछ समझ में नहीं आता। जिसके सांप का जहर चढ़ा होता है। ऐसे ही माया का जहर चढ़ा हुआ है। कुछ समझ में नहीं आता।

क्या त्रिगुण क्या बोलते रहते हैं क्योंकि बुद्धि का जब तक अध्यात्म में प्रवेश नहीं होगा फिर भी जैसे आप सत्संग में बैठे हो तो आपके जीवन का समय दो घंटे तीन घंटे आपने संत संग इसका क्या परिणाम तो सत्संगति संस्कृति कर अंता निश्चित ये संसार चक्र का नाश करके भगवत प्राप्ति करा देगा सत्संग की बड़ी महिमा है जो दुष्कृति होते हैं नमाम दुष्कृति मूढ़ा प्रपदते नराधमा बड़ा विचित्र खेल है। मनमानी आचरण भाई छोड़ो। जब तक आप अपने मन को दुलार करते रहेंगे तब तक आप समझ नहीं पाएंगे भगवत मार्ग।

आपके अंदर सब ज्ञान है। आप ऐसा ना समझे कि किसी किसी के ज्ञान रखते हैं। भगवान सबके हृदय में। आप सच्ची मानो सामग्री सबके हृदय में देते हैं। बस आपको उस सामग्री का सदुपयोग करना है। जागृत हो जाएगा। अच्छा बताओ वाल्मीकि जी जो पहले रत्नाकर नाम के डाकू थे। कौन सा ज्ञान था? पर था ना उनके अंदर ज्ञान। वह ढका हुआ था अधर्म आचरण करने के कारण। संत कृपा से जब नाम जप में लगे अधर्म आचरण छूटा तो वही ज्ञान जागृत हो गया। कहा गया ब्रह्म ऋषि वाल्मीकि जी ब्रह्म ऋषि उल्टा नाम जपत जग जाना वाल्मीकि भय ब्रह्म ब्रह्मर्षि वाल्मीकि जी इतना विशुद्ध ज्ञान कि भगवान की संपूर्ण लीला उनके हृदय में प्रकाशित हुई और जो गोस्वामी जी ने टीका करके रामचरितमानस के रूप में सहज भाषा में लिखा वही वाल्मीकि जी ने संस्कृत में लिखा संस्कृत देव भाषा में सबके अंदर ज्ञान छुपा हुआ है।

बस उसे हमें प्रकट करना है। वह प्रभु के आश्रय से होता है। प्रभु का आश्रय लेने का पहला लक्षण है मनमानी छोड़ना। अगर आप मनमानी नहीं छोड़ पा रहे हैं तो प्रभु को पुकारिए। प्रभु के सामने बात रखिए। वो सुन रहे हैं। आप अपनी कुटिया में जो विराजमान श्री जी हैं उनसे बात कीजिए। उनके सामने अपनी बात रखिए कि देखो लाडली जो मेरे अंदर ऐसी ऐसी बात है आप जान रहे हो फिर भी आप नहीं सुन रहे इसलिए हम सुना रहे इसको आप अगर आपको ये पसंद नहीं तो ये बात हमारे हृदय में क्यों टिकी हुई है हम नहीं हटा पाएंगे लाडली जो आप कृपा करो आप रोज प्रार्थना करो प्रार्थना से भगवान का अवतार हो जाता है सब मिलकर भगवान से प्रार्थना करते हैं तभी तो भगवान का अवतार होता है पर हम क्या करते हैं मनमानी आचरण करते मनमानी आचरण ही दुष्कृत हो जाते हैं।

दुष्कृत सुकृत और दुष्कृत सुकृत गुरु आज्ञा के अनुसार चलो। शास्त्र आज्ञा दुष्कृत मन के अनुसार चलो। जो मन के अनुसार चलना है वो दुष्कृत जो दुष्कृति लोग हैं वो भगवान की शरण नहीं होते। क्योंकि उनकी दृष्टि में मुख्य चीज होती है नाशवान पदार्थ जो परिवर्तनशील है। अगर इसका अपहरण कर लेंगे तो हमको इतने रुपए मिल जाएंगे। अगर इसकी हत्या कर देंगे तो इतनी धनराशि मिल जाएगी। अगर ऐसा हमने छल कपट किया तो यह सामग्री यह संपत्ति उनके सामने लक्ष्य होता है नाशवान परिवर्तनशील पदार्थ।

दुष्कृति किसे कहते हैं? जिनका लक्ष्य होता है नाशवान परिवर्तनशील पदार्थ। सुकृति किसे कहते हैं? जिनका लक्ष्य होता है अविनाशी सच्चिदानंद प्रभु। वह इतनी ममता रखते हैं सांसारिक पदार्थों में छोटी छोटी बात में छोटी छोटी वस्तुओं में झगड़ करके एक दूसरे के प्राण ले लेते हैं। उस वस्तु का कोई महत्व नहीं जिस पर झगड़ा हो रहा है। खेतों की मेड़ होती है। मेड में खुरपी से ऐसे वो इतनी इतनी मेड़ हर साल काटता है। अब एक किसान बहुत गंभीर शांति से ये भाई तू क्यों रोज मेड काटता है इतनी काटता झगड़ा हुआ लाठी चली दोनों पार्टी के मरे मे वहीं की वही है मारने वाला जेल जा रहा है मरने वाला नरक जा रहा है कुछ नहीं हाथ कैसी मूढ़ता अमूल्य जीवन को खेती वही पड़ी है इतनी मेड़ में कुछ नहीं बिगड़ता अगर वो काट भी लेगा तो अन्न का खजाना थोड़ी पैदा कर लेगा उससे अगर तू नहीं काटता है तो तू धनी धनी थोड़ी हो जाएगा।

धैर्य रख देने वाला कोई और है। वो दे रहा है तुम्हारे धैर्य को झगड़ा करने की क्या जरूरत है? वो इतनी पदार्थों में ममता रखते हैं कि वो कुछ भी कर सकते हैं। जरा जरा सी बात जरा जरा सी वस्तु में माता-पिता बूढ़े हैं। जल्दी मर नहीं रहे। हमें अपनी कामनाओं के अनुसार सब तो फिर विचार करते हैं कि अगर यह मरे तो प्रॉपर्टी हमारे नाम आवे। अब वो उनका अहित अमंगल जिन्होंने उससे पाला पोशा है उसके नाश का। चलो ऐसा नहीं। तो हमारे यहां वीआईपी लोग आते हैं बड़े-बड़े और फिर पूछते हैं कौन बुढ़िया बुड्ढे खांसते रहते हैं।

सुनो इनको अनाथालय में छोड़ आओ। हमारी इज्जत जाती है इनसे। बूढ़े माता-पिता जिनकी अब तुम्हारी आवश्यकता है जो तुम भष्ट पुष्ट हुए हो उनके दुलार से अब आवश्यकता है तुम्हारी सेवा की क्योंकि वृद्ध हो गए उनको अनाथालय में छोड़े आए या वृद्धा आश्रम में छोड़ आए चंद रुपए जमा कर दिए अब वो बेचारे जीवन काट रहे वो अपनी कामना ममता के इतना अधीन हो जाते हैं वो जान नहीं पाते कि हमसे कितना पाप बन रहा है कितना अधर्म बन रहा है जब कोई ज्यादा हठ करता है तो बव वृद्ध जन कह देते भैया तू चिंता मत कर यह दस्तखत जहां जहां चाह दस्तखत करवा ले भिक्षा मांगने इधर बिहारी जी की बगल की गली से जा रहे थे तो एक बुड्ढा बुड्ढ बैठे ऐसे रो रहे थे अपनीपनी पोटरी रख के जब हम लौट के आए तो उन्होंने कहा बाबा दो रोटी दोगे क्या उन्होंने कहा आप तो गृहस्थ वेश में दिखाई दे रहे ऐसे कैसे तो उन्होंने कहा राजस्थान से हम आए हमारे लड़कों ने भगा दिया है।

हमारी जो संपत्ति थी वो लिखवा ली जब उनहीं के लिए थी तो हमने सोचा अब उन्होंने निकाल दिया है। अब कोई हमें नहीं रख रहा। वृंदावन आए हैं भगवान की शरण में आए। बिल्कुल वयोवृद्ध दोनों वो जो था आप पा लीजिए। पर बहुत अंदर दुख हुआ कि इनकी सेवा करके भगवत प्राप्ति की जा सकती है। यह जो वयोवृद्ध माता-पिता है इनहीं में भगवान की भावना करके लेकिन कैसे करें? उनका लक्ष्य नाशवान पदार्थ है। नाशवान भोग सामग्री सच्ची मानिए सच्ची यदि आप अपने माता-पिता की सेवा वयो वृद्धों की सेवा कर लिए तो भगवान की सेवा है।

भगवान प्रसन्न हो जाएंगे। सेवा कभी नष्ट नहीं होती। सेवा कभी ऐसा नहीं बिना फल दिए नहीं जा सकती सेवा किसी भी जीव की सेवा वो आपको बड़ा फल देगी सोचो थोड़ी भी सेवा किसी जीव की कर दोगे तो अविनाशी हो जाएगी सेवा वो आपको महान फल देगी लेकिन बुद्धि भ्रष्ट है हम मनमानी आचरण करते हैं जहां जिनकी सेवा करनी चाहिए जानते हो राक्षस किसे मां नहीं मां तू पिता नहीं देवा साधु ते कर आव सेवा जिनके ये आचरण भवानी ते निश्चो राक्षस है कामना पूरी होने पर लोभ होता है। कामना की पूर्ति में बाधा लगने पर क्रोध होता है।

ये ऐसे आसुरी स्वभाव वाले लोभ और क्रोध के वशीभूत होकर आचरण करते ही रहते हैं। यह व्यभचार दोष में इतने फंस जाते हैं कि यह सोच ही नहीं पाते कि यह निषिद्ध कार्य कितना हमें नर्क प्रदान करेगा। पूज्य जनों के प्रति भी उनकी दोष बुद्धि हो जाती है। अरे जो हमारी माता के समान पवित्र भावना वाली उनके प्रति हम जननी भाव रख जो हमारी अवस्था वो हमारी बहने हैं। हमसे छोटी हमारी बेटी के त्र्य उनकी हमें रक्षा करनी है। उनके प्रति भगवत भावना करनी है। पवित्र भावना करनी हमारे आचरण कितने गिरते चले जा रहे पशु जैसे पशुओं से भी गिरे हुए।

ऐसे लोगों के हृदय में कपट जाल रहता है। दिखावा ऐसा करेंगे कि बहुत पवित्र प्यार कर रहे हैं। दिखावे में कमी क्योंकि कपट हृदय में रहता है। विश्वासघात उनका स्वभाव बन जाता है। बेईमानी आदि ये पाप आचरण उनके जीवन में भरपूर हो जाते हैं। क्रोध के वशीभूत होकर द्वेष वैर आदि की दुर्भाव पूर्वक वृत्ति रखकर के हिंसा करने में बिल्कुल नहीं चकते। जो भगवत विमुख है वह ऐसे राक्षसी स्वभाव के हो जाते हैं। मनुष्य शरीर दूसरों को सुख पहुंचाने के लिए परमानंद में डूबने के लिए मिला है।

और योनिया तो सब भोग योनियां है। ये कर्म योनि है। ऐसे अच्छे कर्म करो। आप सुखी हो औरों को सुखी करो। जिसका लक्ष्य श्री भगवान नहीं होते। उसके यही आचरण होते हैं। बाहर से वो कितना सुंदर चिकना चुपड़ा रहे। चेहरे के तेज से नहीं जाना जा सकता कि तपस्वी का है कि भोगी का है। वो एक दृष्टि होती है जिसमें पहचाना जाता है कि यह तपस्या है और यह भोग है। ऐसेसे भोगी जन चमक रहा है चेहरा सब निकृष्ट मांस सब खाते हैं। यह पहचाने नहीं जा सकती। आचरण आचरण पहचाने आपके आचरण कैसे हैं?

बस प्रभु का जो आश्रय नहीं लिए प्रभु से विमुख है उनके अंदर ये माया ऐसा आकर्षण करती है कि वो राक्षसी स्वभाव से युक्त हो जाते हैं। देखो ना कितना भरा क्रोध नाक पर गुस्सा है। जरा जरा सी बात में एक दूसरे को नष्ट करने पर उतारी हो जाते। थोड़ा भी क्षमा नहीं, थोड़ी भी दया नहीं, थोड़ी भी धर्मशीलता नहीं, थोड़ा भी विश्वास नहीं। जहां देखो वहां विश्वासघात, सद्गुरु के साथ, संतों के साथ विश्वासघात, जरा जरा सा धन के लिए, जरा जरा सा सुख के लिए, पद प्रतिष्ठा के लिए यह आसुरी भाव भगवान की शरणागति नहीं होने देता।

जिसके हृदय में संसार सुख प्रधान है, वह महा माया मोहित हृदय है। बस उसका एक ही लक्ष्य रहता है। मैं खूब जीू, स्वस्थ रहूं और मनमानी भोगों को भोगूं। उनको यही बात जचती है। उनके मन में कभी यह बात नहीं आती कि यह सब नाशवान है। यह स्वप्निक है। जैसे स्वप्न में भोगा हुआ सुख जब जगो तो उसका अस्तित्व ही नहीं है। ऐसे ही केवल चंद दिनों का ये जीवन है। मरोगे तो कुछ तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा। उनको समझ में नहीं आता। इसीलिए भगवान की शरण में नहीं होते। वो बहुत कृपा पात्र हैं।

जिनको भय लग गया है संसार से। कोई हमारा नहीं। हे भगवान मुझे स्वीकार कर लो। मुझे मृत्यु से डर लग रहा है। मुझे लोगों से भय लग रहा है। किस पर विश्वास करूं? कोई अपना नहीं। बस समझो कृपा की पहली आपके ऊपर किरण पड़ गई है। यदि आप डर गए हो क्योंकि यह डर आपको निडर की तरफ ले जाएगा। कृपा की पहली किरण आपके ऊपर पड़ गई। यदि आपको यह लगने लगा कि अरे यहां कोई विश्वास का पात्र नहीं। जिसको देखो वही केवल शोषण करना चाहता है। जिसको देखो वही विश्वासघात कर रहा है। कैसे मैं संसार से बचूं?

हे नाथ हे करुणामय प्रभु आप मुझे मृत्यु के भय से बचा लीजिए। आप मुझे संसार के भय से बचा लीजिए। तो जो सभी आसर नाई प्रभु के वचन है तो रख हो ता प्राण की नाई यदि भयभीत होकर उसने सर झुका दिया हमारी शरण में आ गया तो मैं उसे प्राणों की तरह दुलार करता हूं भगवान के वचन है पर वो आता नहीं है जो प्रभु शिव विमुख आचरण करता उसके मन में यह रास्ता ही नहीं दिखाई देता है। चाहे जितना उपदेश करो उनके असर नहीं चढ़ेगा। पाप करने वाले को एक बार भगवान शंकराचार्य जी ने देखा दो लोग मछली मार रहे थे।

एकदम एकाग्र बंसी में से जरा सा हिले बसु से नजदीक गए। उनका दिन भर में कितने रुपए कमा लेते हो। ऐसे चंद्र रुपए किसके लिए कमाते हो? भोजन वस्त्र परिवार चलता है। चलो चार मठों की स्थापना आदि गुरु भगवान शंकराचार्य जी ने की है धर्म रक्षा के लिए चलो तुम मठ में नारायण नारायण नाम का कीर्तन करो जितने घंटे मछली मारते हो जितने पैसे मिलते हैं उतने पैसे भी देंगे भोजन भी मिलेगा परिवार को भी भोजन ले जाना वस्त्र भी देंगे बस ये काम बंद करो मछली मत मारना उतनी देर बैठकर तुम नारायण नारायण कहना पूरे परिवार को भोजन देंगे वस्त्र आद गुरु भगवान हुआ ले गए वहां का भक्ति का वातावरण भागवतिक वातावरण उनको बैठाल के गए वो भाग गए फिर उनके दोबारा में क्यों बोले हमें मछली मारना चाहिए हमें दुष्कृति के द्वारा ये भागवती का आचरण नहीं हो सकते तमोगुण की अधिकता होने के कारण उनको यह सब अच्छा नहीं लगता उनको सब नाटक लगता है आडंबर लगता है दूर से ही ऐसे कार्यों की निंदा करते हैं वो लोग क्योंकि उनकी रुचि उधर है ना तो इधर भागवतिक जनों की निंदा करते हैं।

भगवत वार्ता की निंदा करते हैं। सारसार का ज्ञान नहीं है। नित्य अनित्य का ज्ञान नहीं। सत्य असत्य का ज्ञान नहीं। क्या ग्राह है? क्या त्याज्य है इसका ज्ञान नहीं। वो भगवत विमुख मूढ़ दुष्कृति उनको प्रभु की वार्ता भी अच्छी नहीं लगती। देखो ना कभी भगवत वही व्यर्थ की बातें अहंकार मैंने यह किया मैंने वह किया फिर मैंने ऐसा कुछ व्यर्थ की बातें नराधमा प्रभु कहते हैं मनुष्यों में सबसे नीच पुरुष है दुष्कृति मूढ़ पशुओं से भी नीच कम से कम पशु अपनी एक मर्यादा में रहते हैं पशु है भोजन पा लिया जो सेवा विवाह उनसे करवाई जाए।

जैसे बैल आदि थे तो हल जोता जाता था जो और वह भी उनके एक साल में एक ऋतु आती है। बस उसी ऋतु में वो काम होते हैं। लेकिन यहां तो मनुष्य के लिए कोई सीमा नहीं। जब जहां जैसे चाहे पशुओं से भी गए बीते हैं। पशु योनि भोग करके ऊपर की तरफ बढ़ता है। उच्च और यह मनुष्य आचरण करके नीच अधम नीचे की तरफ जाता है। ऐसे मूढ़ता पूर्वक पाप करने वाले प्राणी नरकों को प्राप्त होते हैं। भगवान कह रहे हैं अपने को संभाल लो। बहुत बढ़िया अवसर है। किसी की बात मत सुनो जो भगवत विमुख करने वाली है।

अंदर ही अंदर खूब नाम जप करो। ये मन बुद्धि बहुत बहुत गंदे हैं। ये हमको वही सलाह देते हैं जिससे हम प्रभु से विमुख हो जाए। खूब अच्छे से देखा है इनको। चाहे जितनी इनकी बात मानो चाहे जितना इनको आदर दो, दुलार दो, यह वही सलाह देंगे जिससे हमारा नाश हो। इनकी बात मानना बंद करो। मन बुद्धि की मन बुद्धि को गुरु की बात मनवाओ। शास्त्र की बात मनवाओ। ऐसे प्राणियों को प्रभु कहते हैं जो दूसरों से द्वेष रखते हैं। दूसरों की हिंसा करते हैं। विश्वासघात करते हैं। यह बहुत बड़ा पाप है।

विश्वासघात। कभी किसी के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए। अगर वचन दे दिया है तो उसका पालन करो। कहां चल रहा है? आजकल कहां आज तो ऐसी मूढ़ता छा रही। पता नहीं अभी ये बोल रहा है क्या बोल रहा है। इसका क्या विश्वास कि एक क्षण बाद क्या बदल जाएगा? सत्य तो जीवन में नहीं रह गया। आचरण में नहीं रह गया। वाणी में कहां से आ जाएगा? यह क्रूर संसार नराधम पुरुषों को मैं बार-बार नरको भुगवाकर आशु योनि में डालता हूं। भगवान कह रहे मालिक कह रहे हैं, ईश्वर कह रहे हैं। वो आसुरी योनियों को प्राप्त होकर घोर नरको को जाते हैं।

माया प्रत जाना आशुम भाव माशित प्रभु की जो तीनों गुणों वाली माया है। देखो धाम में आ गए हो। धाम का एक प्रभाव अपना है। पर अगर यहां आप पापा आचरण करोगे तो उसका वृक्ष है। इधर लगाओ, इधर दोनों को अगर उर्वरक भूमि है तो दोनों को बढ़ाएगी। एक जो है कटीला है, एक है रशीला और उर्वरक भूमि है तो दोनों को पावर बराबर देगी। आप अगर गलत आचरण किए तो आपका जो पाप का वृक्ष है वह भी बहुत बढ़िया हरा भरा होगा। क्योंकि उर्वरक भूमि है। पावरफुल भूमि है ये। तो जानते हो यहां दंड क्या मिलता है?

यही के जीव बनते हैं। आप देखो यहां के जीवों को क्या कष्ट नहीं है क्या? बहुत कष्ट है। जब दिखाई देता है तो लगता है भगवान मुक्त करो इसको। कितना तड़प रहा है। कई कई दिन तक उसको तड़पते देखकर अब यह लाभ यहां है कि संतों की दृष्टि में संतों का सानिध्य उनके हृदय में दया करुणा भगवान से प्रार्थना करके उसके कर्मों को नष्ट करके आगे पर भोगना पड़ेगा। प्यारे क्या यहां पशु पक्षी आपको नहीं दिखाई देते जो पिस जाते हैं जिनके हाथ पैर टूट गए जो ऐसे सब डरो ऐसा नहीं कि धाम है आप खूब पाप आचरण करो अब तो धाम आ गए ना धाम कल्याण कर देगा अब मन मान नहीं डरो इस बात से ऐसा नहीं है ये उर्वरक भूमि है जो बोगे वही आपको काटने को मिलेगा हां धाम है इसलिए लंबा चक्र तो तो नहीं फंसेगा।

पर अगली जो योनि मिलेगी आपको बड़ी दुखदाई मिलेगी। बड़ा कष्ट भोगना पड़ेगा। फिर इसके बाद श्री जी की प्राप्ति हो जाएगी। धाम है ना अगली योनि में पाप नहीं बन पाएंगे। जैसे और पशु पक्षी आदि की योनियां मिली। तड़प रहा वो क्या पाप कर सकता है? पर ऐसी दुर्गति को काहे को प्राप्त हो कि श्री जी का स्मरण नहीं श्री जी की सेवा नहीं और ऐसे जीव बन के ऐसे कष्ट भोगे फिर उसके बाद श्री जी की प्राप्ति अच्छे से चलो किसी धाम का नाम का बल लेकर प्रभु को प्रसन्न किया जाता है दुराचार नहीं किया जाता ये धाम का बल ले लिया धाम पाप नष्ट कर देगा हम पापाचरण कर ले नाम का बल ले लिया नाम पाप नष्ट कर देगा महामहिम पापा इनका बल लिया जाता है प्रभु को प्रसन्न करने के लिए धाम के बल से, नाम के बल से, लीला गुण गायन के बल से हम अपने स्वामी को रिझा लेते हैं।

यह दुराचार बढ़ावे के लिए नहीं है। प्रभु की जो तीनों गुणों वाली माया है, इस माया का कार्य होता है बुद्धि को ढक देना। कुछ का कुछ दिखाई देना। जैसे अगर हमारे अंदर बात है कि सब सारे दुष्ट हैं तो आप किसी को भी देखो आपका चश्मा दुष्टता का चढ़ गया है। अब आपको सब दुष्ट ही नजर आएंगे। फिर अगर पूछूं कि इनमें साधु कौन है? दुष्ट कौन है? हम कैसे पहचाने? तो पहले चश्मा उतारो अपना दुष्टता का तब आप पहचान पाओगे। क्योंकि आपने तो दुष्टता का खुद अपने आचरण में दुष्टता का और दोष दर्शन का चश्मा लगाए हो तो आपको सब दुष्ट नजर आएंगे।

अगर आपके आचरण भगवत प्रसन्नता वाले हैं और भाव भगवत है तो आप देखो इस चश्मे का प्रभाव जिधर देखोगे सब आपको जित देखो तित श्याममई सृष्टि कैसी आपकी दृष्टि जैसी आपको बुरा दिखाई दे तो किसी को बुरा मानने की जरूरत नहीं अपनी बुराई हटा दो जो आप बुरे आचरण कर रहे हो और आपके अंदर जो बुराई का भाव है उसको हटा दीजिए कोई बुरा नहीं सब भगवान है सब रूपों में आपके अंदर जैसे जैसी भावना होती है वैसे ही आप देख पाते हैं। तो ये भावना कैसी होती है? जिस गुण के अधीन होते हैं वैसे भावना होती है।

गुण ढक देता है आपकी बुद्धि को और उस ढकी हुई बुद्धि को अगर प्रकाशित कोई करता है तो देव कृपा कर बुद्धि प्रकाश जस बरनो हरिवंश विलास देव सुबुद्धि कृपा कर मोह पो सुगुण माला रचो प्रभु कृपा करके वो माया का पर्दा हटा देते बुद्धि में प्रकाश और उसी प्रकाश में देखते हैं सर्वम खलम ब्रह अरे यहां कोई और नहीं केवल प्रभु ही प्रभु है जिनका विवेक ढक दिया है माया ने उनको क्या दिखाई देता है स्त्री पुरुष समझो माया ने जिनका विवेक ढक दिया है उनको क्या दिखाई देता है उनकी एक एक वृत्ति में पदार्थ भासता है वस्तु व्यक्ति स्थान बुरा अच्छा लाभदायक हानिकारक अनुकूल प्रतिकूल यह दिखाई देता है और जिसकी बुद्धि माया से हट गई है।

उसको क्या दिखाई देता है? सब भगवान सीधी बात है। यह है प्रकाश। जैसे हम रस्सी को सांप समझ रहे थे। जब प्रकाश हुआ तो देखा सांप तो है ही नहीं। केवल रस्सी ही रस्सी। ऐसे यहां कोई बुरा भला है ही नहीं। केवल प्रभु ही प्रभु है। कोई भी महात्मा जब उस स्थिति को पहुंचता है तो उसे यही दिखाई देता है। जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मैं जानी बंधो सबके पद कमल सदा जोर जुग पान मेरे प्रभु सब रूपों में स्पुरित हो रहे हैं। इसके सिवा जब तक आपको कोई वस्तु व्यक्ति स्थान पदार्थ दिखाई दे रहा है तब तक अभी शरणागति का रंग नहीं चढ़ा।

अभी माया अपना पर्दा डाले हुए है क्योंकि कहीं ना कहीं हमारी कामना ममता अहंकार अभी शरणागति में पूर्णता नहीं आने दे रही आशु कहते हैं प्राणों को भगवान ने कहा आसुर आसुर कौन जो अपने प्राणों को पोषने के लिए कुछ भी ना हिचके देखो कैसी मलिन बुद्धि हो जाती है भला दूसरे सरे शरीर के मांस को खाए कैसी घृणित बुद्धि जो किसी पशु पक्षी का जब अंडा गिरता है नीचे तब उसके दर्शन होता है कितना उसमें लिबलिबा मल धरा होता है कितनी गंदी चीज देखने में लगती है वही जीव रूप धारण करता है जाके आप उसको खा के क्या हो अब बोले अंडा तो कोई दोष नहीं हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो आशुर आशु आप केवल अपने प्राणों के पोषण आप एक साल ब्रह्मचर्य रहकर देखिए नमक रोटी खाइए आप और आपसे अगर कोई हाथ मिला ले तो उनसे बात करना एक साल केवल आप ब्रह्मचर्य रहिए व्यायाम संयम से रहिए और आपसे कोई हाथ मिला ले तो बताओ चाहे डेवढ़ा को आप उठा के पटक देंगे क्योंकि ब्रह्मचर्य का बल है ये अंडा मांस मुर्गा बेचारे सीधे साधे जीव उनको पकड़ा और खा रहे हो किस लिए बोले

अपने प्राणों का पोषण। यह बुद्धि भ्रष्ट हो गई, मलिन हो गई है। सबसे प्रार्थना है। यदि आप ऐसा करते हैं तो आप देख लेना कि आपका परिणाम कैसा भयंकर होगा। यमदूत उसी के शरीर को बड़ी-बड़ी गर्म सरसियों से शमशियों से ऐसे नोच करके और उसी को खवाते हैं। जो दूसरों का मांस खाता है उसको जो दूसरों का रक्त पीता है कोलहू में पहरा जाता है। कोलू में जैसे यहां गन्ना नहीं पहरा जाता वहां मरना नहीं। यहां तो जरा सी खोपड़ी जाएगी आप दर्द रहित हो जाएंगे मर जाएंगे खत्म दर्द वहां नहीं मरना नहीं पूरा कोलहू में पेरा जाता है फिर वैसे यातना दे उसे वही खून पी खून पी के फिर उसको कोहलू में पेरा बड़ा भयानक दंड है उसको ऐसा मत सोचो तुम्हारे आंख मूंदने से बच जाओगे बिल्ली जब कबूतर पर झपटती तो उड़ना नहीं वो सोचता है आंख मूंद लो बच जाओ आंख मूंद बिल्ली झपेटने में ले गई तुम नकारो कि अरे कोई नरक वर्क नहीं है इससे बच नहीं पाओगे जाना पड़ेगा छोड़ दो दूसरों के जीवों

के शरीर का मांस खाना अंडा खाना ये सब छोड़ दो भगवान बड़े कृपालु माफ कर देंगे तुम जिस जीव की हत्या करते हो वो कर्म तुम्हें दंड देने के लिए अव्यक्त रूप से विराजमान हो चुका है समय जब वो आएगा काल जब आएगा काल माने समय जब आएगा फिर बच नहीं पाओगे तुम्हें ऐसा दंड मिलेगा त्राहिमाम बोलोगे कोई तुम्हें बचाने वाला नहीं होगा यज्ञ में जो कभी पवित्र मंत्रों के द्वारा कुछ ऐसे पहले पुराणों में पीछे नारद जी ने प्रचेताओं को कहा देखो आकाश में जिन जीवों को वो सब खड़े तेरा इंतजार तू समझता है तेरा मंगल हो जाएगा वो सब खड़े हैं समय आने दो तुम्हारे को भयंकर कष्ट देंगे भगवान फिर बचा लो।

वह एकमात्र उपाय सब बंद करो और हरि शरण हरि की शरण में जाओ। वो सब क्षमा कर देंगे। एक उपाय हरि शरण में हो जाओ। कितना पापाचरण लोग कर रहे। कितना छोटा सा जीवन इतना बोझा ला दोगे तुम। 84 लाख योनियों में भोगते भोगते तुम कष्ट से कभी नहीं बच पाओगे। यह अभी समझ में नहीं आती। यह बातें ऐसे लगता है महासाधु महात्मा प्रवचन करते ही रहते हैं। डरो। जब दंड मिलता है तो अंदर से निकलता है पाप कर्म कोई कभी ना करें। पाप कर्म तुम्हें ऐसी जगह फंसा देगा। कोई सा धरा है रुपया खड़े हैं सैकड़ों लोग लेकिन तुम्हें जो भोग भोगना है भोगो अकेले भोगो हाय हाय सब कर रहे हैं।

कोई पाप कर्म किसी को नहीं बखशता। चाहे महात्मा हो चाहे दुरात्मा हो। हां अंतर ये होता है कि दुरात्मा को आश्रय नहीं होता। महात्मा को आश्रय होता है भगवान का। तो उनके सहारे से भोग लेता है। नहीं सोचो परमहंस स्थिति को प्राप्त श्री रामकृष्ण जी को गले में कैंसर ना खा सकते हो ना बोल सकते उसमें सत्संग करते थे। डॉक्टरों ने मना किया है महाराज जी आप बोलिए नहीं डॉक्टर क्या जाने बोलने के लिए ही तो हमें भगवान ने ज्ञान दिया है जिससे सबका मंगल हो। ये अपनी तरफ बना रहेगा रोग।

यह भगवत आश्र से होता है। बिना पाप कर्म के कोई भी दुखी नहीं हो सकता। यह बात आप लिख लीजिए। पाप कर्म है कभी ना कभी का तो 100 की जगह वो 10 थप्पड़ लगेंगे। 90 माफ हो जाएंगे। लेकिन लगेंगे भगवान का ऐसा नहीं कि जीरो पे आ जाए। किसी का देखो इतने बड़े ब्रह्म महिमा में लीन महापुरुष श्री उड़िया बाबा गड़ासा चला रोम रोम कांप उठता है कि यहां दो चार माला जप करके हम आशा करते हैं विमान आएगा और वो ब्रह्मलीन महापुरुष समाधि में बैठे हुए गड़ासाचल कर्म किसी न किसी जन्म का कर्म आकर भीष्म जैसे महाभागवत जो भगवान की की हुई शपथ को भी तुड़वा सकते हैं उनका कर्म शर्मा आकर उनको छ महीने बाणों की नोक पर सुलाया।

बाणों की नोक पर छ महीने और भगवान से कह रहे हैं कि आपके युधिष्ठिर को उपदेश करो महाराज एक कांटा गढ़ जाता है। कितनी पीड़ा है यहां एड़ी से लेकर सर तक में अर्जुन के विषैले बाण चुभे हुए हैं और छ महीने से उस भयानक कष्ट को भोग रहा हूं। भीष्म जी की महाभारत में स्वयं की अनुभूति ऐसा नहीं कि उनको कष्ट नहीं हो रहा था। उन्होंने कहा इतना भयानक कष्ट हो रहा है और आप कह रहे हैं उपदेश करो भगवान ने इसे स्पर्श किया तब उनका कष्ट दूर हुआ बड़े-बड़े महापुरुषों को बड़े-बड़े संतों को ये क्या अनंत जन्म व्यतीत हो गए पता नहीं किस जन्म में हमसे कौन से पाप बन गए चलो पीछे का स्टक हरी जाने अब तो सुधार लो सामने तो मत करो अब तो मत करो पर ये अपने प्राणों का पोषण करना ही जिनका स्वभाव होता है वो जीवों को ऐसे कष्ट कष्ट देते हैं।

कभी-कभी ऐसे दृश्य जैसे भ्रमण में देखने को मिले हैं कि जो राक्षसी स्वभाव के लोग शराब पिए एकांत जंगल ऐसे सूंवर के पैर बांधे हुए बंधन के के बोल रहा है ऐसे वो ऐसे बांस या लाठी में ऐसे डाल के दो लोग बीच में आग लगी है। जिंदा आधा घंटा तक जलता तड़पता रहता है। यह कैसा अब उसको खाएंगे अपने प्राणों के पोषण के लिए फिर उनकी दुर्गति इससे भी भयानक होती परिणाम क्योंकि यह तो आपका कमाया हुआ है ना अब इसका ब्याज बढ़ेगा जो कर्म है उसका ब्याज भी बढ़ेगा और ब्याज से ही भुगतना पड़ेगा तुम्हें तैयार हो ऐसा नहीं है कि मालिक देख नहीं रहा वही तुम्हारे अंदर ही बैठा उसको किसी गवाही की जरूरत नहीं जो प्राणों का पोषण करने में लग गए केवल इतनी बात कि हमें सुख मिले वह नहीं देखते कि हमसे पाप कर्म हो रहा है।

वो रुपए के लिए पैसों के लिए अपनी जबान के स्वाद के लिए अपनी शरीर की पुष्टता के लिए किसी भी जीव की हत्या करने से तुम्हें सुख मिलेगा। ऐसा हमें आज तक शास्त्रों में नहीं मिला। और ना यह कभी किसी का मंगल कर सकता है कि तुम किसी देवी देवता के नाम पर किसी जीव की हत्या करो और तुम्हें सिंहासन मिले। भगवान के वचन अवश्य में भोक्तव्यम कृतम कर्म शुभाशभम पहले नरबलि भी दी जाती थी किसी देवी देवता को प्रसन्न चतुर्भुज दास जी जब भ्रमण करते थे तो देखा कि एक आदमी बहुत चीख चीख कर चिल्ला रहा है और कई लोग को सब बैंड बाजे बज रहे घंटा नगाड़ा बज रहे तो पूछा भाई यह क्या है एक आदमी रो रहा है और सब आदमी आनंद मना रहे बोले इसकी देवी में बलि दी जाएगी वैष्णव अपने भाव से थे वहां जाके कोई भी बिल्कुल इसे और देवी जी से कहा तू मां है तू अपने बच्चों की बलि स्वीकार करती

तुझे दर्द नहीं होता तेरे सामने गर्दन झुका कर काटा जाता है हटा के उनको अपने मुरली मनोहर ठाकुर जी को विराजमान किया और देवी जी से कहा पूरे राज्य पूरे नगर में तुम ही बोलो जाकर के कि आज के बाद यहां किसी भी जीव की बलि नहीं चढ़ेगी नहीं तो हम तुम्हें क्षमा नहीं करेंगे तो देवी ये समझो समझो हरि भक्तों का बल देवी जी गई राजा को उठाकर पटक दिया उसकी छाती पर बैठ गए बोले हुकुम कर पूरे नगर में हम जल रही जब से चतुर्भुज दास जी मंदिर में आए अगर एक भी जीव की बलि दी जाएगी तो मैं पूरे परिवार का नाश कर दूंगी तेरे उसी दिन से वहां की बलि प्रथा बंद हुई कहा ठीक है हम अपने ठाकुर को वो तो भ्रमण ही कर रहे थे अब बैठ सिंहासन पर सात्विक सेवा ले अगर तुझे बलि चाहिए तो मां है नारियल फल की बलि ले ऐसे ले ये जीवों की हत्या क्या भगवत शरणागति हृदय में स्वीकार करो और संयम से रहो।

तुम्हारे रोग निवृत्ति के लिए तुम्हारा ब्रह्मचर्य बहुत बड़ी औषधि है। मान लीजिए कोई भी रोग तुम्हें परास्त नहीं कर सकता। बड़े से बड़ा भयंकर रोग भी परास्त नहीं कर सकता। अगर आप ब्रह्मचारी हैं। किसी भी घी दूध में उतनी ताकत नहीं। किसी भी बलिष्ठ पदार्थ में किसी भी स्वर्ण भस्म चांदी भस्म में ताकत नहीं जो ब्रह्मचर्य में है। आप केवल अगर ताकतवर बनना चाहते हो तो आध्यात्म बल से भी संयुक्त कर देगा आपको ब्रह्मचर्य। ये सावधानी संयम से रहो। जबान के स्वाद के लिए किसी जीव की हत्या मत करो।

नहीं तो बहुत जन्म व्यतीत हो जाएंगे। आपको निकलने का अवसर नहीं मिलेगा। श्री भगवान कहते हैं ऐसे मूढ़ मनुष्य कभी मेरी शरण में नहीं हो सकते। जो पे दुष्ट हृदय सोई मोरे सनुख की सोई पापवंत कर सहज सुभाव भजन मोर ते भाव न काओ हे एक चींटी को भी दुख ना पहुंचे ऐसे चलो तुम्हारा ऐसा बर्ताव हो किसी जीव को सृष्टि में दुख ना पहुंचे देख लेना भगवान गले लगा लेंगे आके हमारी बात मान लो कुछ नहीं होता यह सब गंदी बातें करने से कुछ नहीं होता केवल मन का विलास है ये सब गंदे आचरण छोड़ो अच्छे बनो पवित्र आचरण करो नाम जप करो सात्विक भोजन करो बहुत बल होता है सात्विक बल देखो सबसे बड़ा बल होता है संकल्प बल तुम्हें अंदर की बात बताते हैं यदि तुम शरीर से बहुत बलवान हो और भोगी हो तो तुम्हारा संकल्प बल नहीं होगा और संतों को देखा गया है कि ऐसे हैं लेकिन संकल्प बल इतना बड़ा है कि देवता भी घबराते हैं उनके सामने हमें यह अध्यात्म बल, संकल्प बल यह बहुत बड़ा बल है और फिर भगवान का बल तो इससे भी बड़ा बल है।

अरे ऐसे निकृष्ट बल को तुम बल अपना मानते हो। पाप के द्वारा किए हुए कर्म से तुम निर्बल बनोगे। बलवान नहीं बनोगे। सत्कर्म करोगे, भजन करोगे तो देखो बल का मतलब होता है काम क्रोध पर विजय प्राप्त करना। भला कोई गंदा भोजन करने वाला काम क्रोध पर विजय प्राप्त कर सकता है? नहीं चलो और माने ना माने लेकिन आप सब सत्संगी हो। आपको जहां तक आपकी पहुंच हो आपके परिवार तक रिश्ते नातेदारों तक हाथ जोड़कर पैर छूकर उनसे प्रार्थना करो कि आप मानस मत खाओ। आप शराब मत पियो। आप गंदे आचरण मत करो।

ना माने तो उनकी बात से पर आप तो प्रार्थना करो कि आपका परिकर आपका घर परिवार आपके रिश्ते नातेदार जो हो ऐसे गंदे आचरणों से बचे। राधा राधा जपे। भगवान ऋषभदेव जी कहते वही पिता पिता है वही गुरु गुरु है वही पति पति है वही रिश्ते रिश्तेदार है वही भ्राता भ्राता है जो अपने सगे संबंधियों को भगवत नाम जपना सिखा दे भगवत प्राप्ति का मार्ग बता दे असद आचरणों से छुटा दे सच्चा रिश्तेदार वही है सच्चा हितषी वही शेष चर्चा की श्री राधा वल्लभ लाल की

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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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