सेवा से मिलने वाले फल को दुर्लभ क्यों कहा गया है? कौन है भगवान की लीला का अधिकारी? // 05/04/2026
पूज्य महाराज जी के श्रीमुख से युगल लीला का रस — ऊपर वीडियो में सुनें।
पूरा प्रवचन
वृंदावनेश्वरी तवै पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदपितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वाय परम शीतल माशयाम परम शीत शीतल माय तजस कोटि ब्रह्मांड विराज राधे राधे राधे तू जस कोटि ब्रह्मांड विराज राधे श्री शोभा बरनी ना जाए अगाधे राधे श्री शोभा बरनी न जाए अगाधे बहुत तक जन्म विचारत ही गए साधे साधे श्री हरिदास के स्वामी श्याम कहतरी प्यारी ये दिन मैं क्रम क्रम करी लाधे श्याम कहतरी प्यारी ये दिन मैं क्रम क्रम करी लाधे राधे राधे राधे राधे तू जस कोटि ब्रह्मांड विराज राधे राधे उपासक उपासना उपास्य देव इस त्रिपुटी का जब लय हो जाता है तब वो सिद्ध पुरुष कहा जाता है।
मैं उपासना कर रहा हूं। इसका विस्मरण केवल उपास्य देव ऐसी सिद्धा अवस्था में वो अपने आराध्य देव के समीप जो जीवन भर कष्ट सहकर साधना की उसका परम लाभ प्राप्त करता है। कैसा सुख मिलता है? आराध्य देव हमारे प्राण प्यारे जब परिपक्व अवस्था जागृत होती है तो आराध्य देव का प्राण प्यारा बन जाता है। यह बहुत दुर्लभ बात हुई। प्रभु को प्यार करने वाले लाखों में कोई एक होते हैं। उन लाखों प्यार करने वालों में कोई विरला ऐसा होता है। जिसको प्रभु अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं।
वो बिरला जो दैन्य है अहंकार किंचिन मात्र किसी साधना किसी तपस्या जितेंद्रियता विद्वता कोई भी अहम छू नहीं गया। ऐसे दैन्य को प्रभु अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं। स्वयं भगवान ने कहा है हमारी आत्मा भगवान शंकर हैं। मेरे प्रिय बड़े भाई बलराम जी लक्ष्मी जी इनको भी मैं उतना प्यार नहीं करता हूं। यहां तक कि मैं अपने आप को भी उतना प्यार नहीं करता हूं जितना हे उद्धव तुम जैसे सर्वस्व समर्पित भक्त को प्यार करता हूं। प्रभु के हृदय का मूर्तिमान प्यार हमारी श्री श्यामा जो है।
श्यामा जो कोई और नहीं है। लाल जू के हृदय का प्रेम ही मूर्तिमान रूप धारण किया तो हमारी श्री जी हुई। स्वामिनी जो प्रिया जो उपासक रसिक गुरुदेव के द्वारा दी हुई मंत्र उपासना में चित्त जोड़ता है तो उसका स्त्री पुरुषत्व भाव मिटता है। पहले मैं स्त्री हूं मैं पुरुष हूं। यह भाव मिटता है। उसको ऐसा अनुभव होने लगता है जैसे हम इस शरीर पर वस्त्र धारण किए हैं तो वस्त्र वस्त्र ही है। मैं नहीं हूं। ऐसे उस शरीर को जो वास्तविक ऐसा ही है उसके अनुभव में आता है। शरीर राग त्यागी गुरु कृपा पात्र मंत्र उपासना का बल प्रकाशित होता है तो उसे भाव देह की प्राप्ति होती है।
जब भाव देह की प्राप्ति होती तो भाव देह और आराध्य देव एक ही बात होती है। वह हर समय अपने आराध्य देव के समीप अपने को देखता है। जैसे स्थूल शरीर सैया पर सोया हुआ है पर स्वप्न में आप क्रियारत अपने को देखते हैं। स्थूल शरीर का भान भी नहीं होता जब आप स्वप्न में होते हैं। जब जागृत होते हैं तब स्थूल शरीर का भान आता है। वह तो अविद्या जनित स्वप्न मिथ्या है। ठीक ऐसे ही जागृत अवस्था में उपासक स्थूल शरीर का संपूर्ण भान रहते हुए संपूर्ण चेष्टाएं करते हुए भी वो विदेह रहता है।
देह भाव रहित यही सच्चिदानंद उपासना की विशेषता है। जैसे स्वप्निक देह में स्वप्न में वह विचरण करते हुए जागृत देह का बिल्कुल भान नहीं है। अविद्या अज्ञान दोनों झूठे। लेकिन जब उपासना से परिपक्व भाव अवस्था प्राप्त होती है तो जागृत शरीर में चेतना युक्त होकर संपूर्ण चेष्टाएं शास्त्र विधान के अनुसार करते हुए भी उभाव देह में स्थित महापुरुष कुछ नहीं करता। खाते पीते चलते उठते बैठते इसीलिए वह वेदातीत स्थिति उस पर कोई शास्त्र शासन नहीं होता काल का भी शासन उसके ऊपर नहीं होता इसीलिए महाप्रभु हरिवंश चंद्र जी ने कहा करण श्रति बोधि नित कुरवंतु कुरवंतु मा ग्रगाद विषय ग्रहण मुंतुवा कवा भाव रहस पारगती श्री राधिका प्रिय श्री राधा वल्लभ लाल के प्रेम में कोई ऐसी रहस्यमय स्थिति उस महापुरुष की है कि वो शास्त्र के विधान कर्म करे या ना करे वो विषयों को भोगे या ना भोगे वो बहिर्मुख पुरुषों का संग करे तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता।
क्यों? क्योंकि वह कर्ता ही नहीं बचा है। करता गया परम कारण प्रभु के चरणारविंद में कर्ता भाव समर्पित हो गया। भोगता भाव समर्पित हो गया। तब उसे यह महा सुख मिलता है। यद्यपि हमारे लिए बहुत दुर्लभ है। पर आचार्य गुरु कृपा के लिए बिल्कुल सहज बात है। उनकी संपत्ति है वह दे दे एक सेकंड में। महिमा तेरी कहा कहूं श्री हरिवंश दयाल तेरे द्वारे बटत है सहज लाडली लाल सहज बस अनन्यता की आवश्यकता है आचार्य अनन्यता गुरु अनन्यता उपासना अनन्यता इष्ट देव की अनन्यता उनकी कृपा से बहुत सहज हो जाता है।
बहुत सहज है व्यास सुवन प्रसाद देह मानसी गढ़ चित व्यास नंदन श्री हरिवंश महाप्रभु की कृपा से शरणागत उपासक के हृदय में जो प्रियाल की चिदानंद श्री अंग की सेवा का अधिकारी स्वरूप है वह सहचरी स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। तब उसे सुख प्राप्त होता है। श्रीपाद को जो सुख प्राप्त हो रहा वो वर्णन कर रहे हैं। सुंदर पान की बीड़ी बनाई और प्रियाजू को अर्पित की। यहां श्री राधा चरण प्रधान उपासना है। क्योंकि सहचरी भाव की सिद्धि राधा चरण प्रधानता से होती है। इसीलिए लालू सहचरियों की भी विनय करते हैं।
किंचिन मात्र सुसुख वांछा का लेश भी नहीं है। प्रधान सेवा श्री जी की प्रथम सेवा श्री जी की इससे लाल जी को बहुत सुख मिलता है। प्राय सर्वत्र पहले भगवान की सेवा होती है। फिर उनके वामांग में विराजमान उनकी सेवा होती है। अपने नवनिवत्त निकुंज में सहचरी भाव में पहले महारानी जी की सर्व सब प्रकार की सेवाएं स्नान तो पहले महारानी जी का पोशाक तो पहले महारानी जी की जो भी सेवा पहले महारानी जी को श्रीपाद रूपी सखी ने भाव देश में पान की बीड़ी प्रिया जी को दीदाना तामूलम प्रियतम मुख सपुलकम मुदा प्रयो दत्तम मधुर मदती चितो मपी तत किंचित्यति ददा दासी विवसय यशण्य लस सतिम जीवस वस मेरी जीवन धन स्वामिनी जो मेरे हृदय में बस रही है श्रीपाद कह रहे हैं जीवस मैं इनहीं से जीवित हूं क्या ममता है यह है प्रियाजु के चरणों की ममता मैं इनहीं से जीवित हूं यशो वृंदाण्य लसति मम जीवस मेरा जीवन है।
मैं इनहीं से जीवित हूं। ये देखो कहां से जीवित है श्री जी से। इतनी अत्यंत आसक्ति जब प्रकट होती तब भाव देश में प्रवेश होता है। अब प्रियाजु ने अपने प्राण प्यारे प्रीतम के मुख में एक श्लोक श्रीमद राधा सुधा निधि में महाप्रभु हरिवंश चंद्र लुलित नवलवंगोदार कर्पूर पूरम प्रीतम मुख चंदो तांबूल खंडम घन पुलक कपोला स्वादती मदास कि पिदासी वत्सला कर राधा बिल्कुल ठीक इसी का स्वरूप है। ऐसा ही हित सजनी जो देख रहे हैं। श्री लाडली जू के कर कमल में पान की जब बीड़ी दी तो अपने प्राण प्यारे श्री लाडू के मुख में श्री लाडली जो सहचरी ने लाडली जू को दी लाडली लाडली जो की इच्छा जानकर उस पान की बीड़ी का रसास्वादन करते हैं।
पुलकित हो रहे हैं। क्योंकि सहचरी का प्रेम भाव प्रियाजू के प्रति और प्रियाजू का मो को तो भावती ठोर प्यारे के नैनन में मेरे तन मन प्राण होते प्रीतम प्रिय प्रीतम को पवाना अब प्रीतम उस तांबुल को प्रियाजु के मुखारविंद पर प्रदान करते हैं। ठीक बिल्कुल ऐसा ही हित जो महाराज वह लाडली जो रोमांचित हो जाती है धन पुलक कपला स्वादती मुदा उस प्रेम रस में डूबी हुई सी प्रिया जो कृपा करती है अपनी सहचरी पर और वो प्रसादी पान सहचरी के मुख में प्रदान करती है मुदा प्रयो दत्तम मधुर मदती चविितपी प्रीतम के रसास्वादन किए हुए उस पान प्रसाद को प्रिया जो पाती हुई अपनी दासी को प्रदान करती तथा किंचित दावा दत दासी विवशय जो ही वो प्रसादी पान उस सखी को प्राप्त होता प्रेम विवस्था छा जाती है।
जिनके चरणों के दर्शन पाना दुर्लभ है उन प्रियाजु का श्री मुख का प्रसादी जो प्रीतम के मुख से यहां कोई भेद दृष्टि ना रखे हमारे प्रिया प्रीतम कहने को दो हैं। एक ही है कि कभी ऐसा होता है कि लालजू अपने कर कमल से पान की बीड़ी प्रियाजु को पवाती है। फिर प्रिया के मोक्ष का उदगीरण लाल जो कभी लाल जो के कहने को तो श्री हरिवंश सुरीत सुनाऊं श्यामा श्याम एक संग छ नहीं कबहु ना अंतर होई प्राण सु एक दे है दो कहने को केवल दो है श्रीपाद कह रहे हैं मेरा यही जीवन है। यही जीवन है।
धन्य है उनका जीवन जिनका जीवन प्रियाल है। जिनका जीवन प्रियाल की प्रसादी है जो प्रियाल के प्रेम में उन्मत्त है। नहीं तो यह प्रचंड माया अपने वेग से बहाती हुई प्रभु से दूर रखती है। बहुत विद्वता हो जाए, ज्ञान हो जाए शास्त्रों का खूब वर्णन करें। लेकिन ब्रह्म बोध नहीं हुआ, भगवत प्रेम नहीं हुआ तो कुछ नहीं हुआ। श्रीमद् भागवत में वर्णन है एकादशी स्कंध में। वही पूर्ण महात्मा है जो शाब्द ब्रह्म का पारगामी विद्वान और परम ब्रह्म का अनुभूत तो शब्द ब्रह्म का पारगामी विद्वान मिलना कठिन है।
ऐसा थोड़ी है। चार बातें शास्त्रों की पढ़ लिया तो शाब्द ब्रह्म संपूर्ण शब्द ब्रह्म वेद पुराण इतिहास सब का ज्ञान उसको पारगामी विद्वान हर सिद्धांतों का जिसको ज्ञान ऐसा अगर ऐसा है पर परम ब्रह्म की अनुभूति नहीं है तो कुछ नहीं है परम ब्रह्म की अनुभूति की तरफ चलना ये बहुत ही दुर्लभ बात है। शब्दों का लच्छेदार प्रयोग करना, शब्द माधुरी के द्वारा लोगों को रिझाना, वाक माधुरी के द्वारा आकर्षण करना यह सहज हो सकता है। लेकिन वृत्ति को ब्रह्माकार कर पाना, कृष्णाकार करना या भगवत प्रेम में डूबना ये बिल्कुल अलग है।
बिल्कुल अलग है। इस प्रेम की ऊंचाई पर चढ़कर प्रियाल के सेवा सुख में निमग्न होना है तो और बड़ी बात हो गई। सबसे बढ़िया ऊंचाई ध्रुव जी को मिली अटल पदवी। पर उनका हृदय जल गया जब भगवान ने तथास्तु कहा। कि अरे मैंने प्रभु से उनकी सेवा ना मांगकर अटल पद भी प्राप्त की। इसका मतलब मेरे में अभी चाह रह गई थी इसलिए मैं प्रभु की सेवा प्राप्त नहीं कर पाया। हे नाथ आप एक करुणा और करो। अपने प्रेमी महा भागवतों का संग प्रदान करो जिससे हमारा हृदय आपकी सेवा लायक बने। क्योंकि त्रुटि हो गई हमारे अंदर।
चाह थी। मैंने नारद जी महाराज गुरुदेव का मंत्र तो स्वीकार किया संग स्वीकार नहीं किया अगर संग किया होता तो आपका प्रेम मांगता ये अटल पदवी नहीं इसलिए मुझे महा भागवतों का संग प्रदान करें जब ये देह भाव गलित होता है तब यहां कुछ है नहीं जैसे स्वप्न में एक मन के सिवा कोई नहीं ऐसे ही उस उपासक को जागृत में अपने प्रभु के सिवा कुछ बोध नहीं होता क्योंकि है ही नहीं कुछ नासतो विधते भाव इस असत की सत्ता ही नहीं है ये बहुत कृपा से समझ में आता है जो उपासक गुरु प्रदत्त भजन में अंदर ही अंदर हर समय एकाग्र होकर लगा रहता है उसका भाव बदल बदल जाता है।
बहुत जल्दी बदलता है। अब भाव देश से प्यारी जु प्यारी जो की सेवा में निमग्न स्मर श्री मद वृंदावन मति महानंद रसदम सदा प्रेमदे हृद नव किशोर परिचर महा आनंदकारी वृंदावन की नवीन नवीन कुंज निकुंजों में वह अपने प्रिया प्रीतम की परिचर्या में मगन रहती है। जो भाव देह को प्राप्त हो जाती है क्या अजम शगंध व्यजनवर ताम्बूल मृदुपद सुषवा दिव्या भरण वसना प्रणयनो महा प्रेमावे पुलक रस घा तनु सदा राधा दासी स्मर हृदय सेवा विद धति धन्य है उसका जीवन बहुत ध्यान से सुनिए हमारी इस श्री प्रिया प्रीतम की जोड़ी को यदि आप चवर कर रहे हैं ये कोई साधना नहीं है ये अधीन करने का मंत्र है मानो आप प्रिया प्रीतम को अधीन कर बड़ी बड़े उदार है।
आप समझ नहीं सकते उदार हृदय कैसा होता है। जिसमें किंचिन मात्र भी कोई चाह नहीं होती उसको उदार हृदय कहते हैं। और ऐसे उदार हृदय की थोड़ी भी सेवा तो वो सेवा के बोझ से दबने लगता है। जैसे परम उदार रघुनाथ जी हनुमान जी से कह रहे हैं। प्रति उपकार करो का तोरा कैसी बड़ी बात कह रहे सनुख होए ना सकत मन मोरा तुम्हारी सेवा का इतना कि मैं उसके बदले में कुछ नहीं कर सकता मेरा मन सकुच करके तुम्हारे सामने सकुच जाता है ऐसे उदार स्वामी है फिर उदार उदारता कि समुद्र तो प्रिया जो है आप व्यजन कर रहे हैं पंखा हो गई प्राप्ति का बहुत बड़ा कार्य हो गया सेवा बहुत बड़ी वस्तु है बड़े भाग्यशाली है जिनकी थोड़ी भी भगवत सेवा में रुचि है जैसे मंदिर बनवा देना श्री विग्रह विराजमान करना सेवा में किसी को लगा देना यह एक अलग बात हो गई।
आप बहुत धनी है। आप वैभवशाली हैं। चार सेवक लगा दिए, पैसे दिए, वह सेवा कर रहे हैं। आप पुण्य आत्मा होंगे। लेकिन आप प्रेमी नहीं माने जाएंगे। आप अमरीश जी से बढ़कर धनी नहीं है। चक्रवर्ती सम्राट महाराज अमरीश अपने हाथ से पोछा लगाते। अपने हाथ से श्री अंग की सेवा करते। एक दिन उनकी अनुपस्थिति में उनकी नवीन जो रानी थी वह सेवा में वो आकर बोले सेवा की चोरी नहीं आपको अगर सेवा प्रिय तो अलग से ठाकुर विराजमान करो सारी व्यवस्था कर देते हमारी सेवा में नहीं तो उनकी सेवा में सुदर्शन चक्र रहता था उनको पता नहीं था अमरीश जी को स्वयं की दासता में भगवान अधीन हो जाते हैं तुम पैसा लगा के अरबों का मंदिर बनाकर के लाखों सेवक रख दो।
वह बात अलग हो गई और स्वयं परिचर्या में विराजमान वो बात अलग हो गई। अजम शगंध व्यजनता मृदुपत माला का निर्माण करके ग्रंथन करके ये हाथ धन्य हो गए इसी से भगवत प्राप्ति हो जाएगी ध्यान दीजिए एक सेवा आपको भगवत प्राप्ति करा देगी दन्य भाव से मेरी प्रिया प्रियाजू ये माला धारण करेंगी। ये अंदर चिंतन चल रहा है आपका। यह चंद्रिका है माथे पर धारण करेंगी। प्रियाजू ये बाजू बंद है। भुजाओं पर धारण करेंगी। आपका चिंतन चल रहा है। आप माला गूंथ रहे हैं या गूंथ रही हैं। यह सीधे भगवत प्राप्ति करा।
इसमें साधन नहीं देखा जाता है। एक होता है विविध प्रकार की साधना करके फिर वह बहुत लंबा जन्म जन्म मुनि जतन करा और यह सेवा एक सेवा सीधे भगवत प्राप्ति करा देगी। एक सेवा आप इसकी चिंता ना करें। कल्याण भगवत प्राप्ति हमारी प्रिया जी बहुत करुणामय उदार। हमारा बल इसीलिए प्रबल है कि नेक हूं न रिस कहूं भूल ना हो सके। रहत प्रसन्न सदा ही मुखास से हमारी ऐसी स्वामी अभी आप प्रारंभ में एक पद सुना तू जस कोटि ब्रह्मांड विराजे राधे करोड़ों ब्रह्मांडों में आपका यश व्याप्त हो रहा है किशोरी जो बोले करोड़ों ब्रह्मांडों में कैसे कैसे प्रमाण दीजिए कैसे बोले अनंत ब्रह्मांडों के अधिपति लाल जो आपकी परिचर्या में इसलिए जिनके चरण रखने की चौकी को ब्रह्मा शकाद शिवाद माथा रखकर वंदन करते हैं।
वो प्रभु आपकी परिचर्या में इसलिए तू जस कोटि ब्रह्मांड विराजे राधे श्री शोभा वरन न जाए अगाधे स्वामिनी जो आपकी शोभा कैसे कोई जाने राधा तत्व क्या है बिना वृंदावन रज और रसिक की कृपा के कोई जान ही नहीं सकता नित्य माल्य अहोभाग्य जो नित्य माला बनाकर श्री जी को अर्पित करते हैं। सेवा से सीधे भगवत प्राप्ति है। आप बात समझ लीजिए। बहुत करुणामय युगल सरकार है। मेरे लिए माला बनाई। आपको पता नहीं जब आप फूल उठाते हैं गुंथन करने के लिए उसे ग्रथित करते हैं। उसे माला रूप देते हैं।
वह उसी समय आपके भाव और आपकी क्रिया दोनों को देख रहे हैं। बहुत पुलक करके उधारण करते हैं। जब कैसे जाना कि पुलक कर वो पुलकित है तो यहां पुलकन आ जाती है। जब यहां पुलकन आती है तो पता है हमारे स्वामी पुलकित है। स्वामी पुलकित है तो साधन नहीं देखते। यह घर की दासता है। तो दासता दो प्रकार की होती है। एक बाहर का दास लाया हुआ जो व्यवस्था उसकी मनोकामना पूर्ति अर्थ आदि के द्वारा एक होता है घर जाया दास जिसको पेमेंट से मतलब नहीं होती अर्थ से नहीं मतलब होती वो केवल सेवा सुख के लिए ही होता है।
अपने स्वामी को प्रसन्न देखकर वो गर्वित होता है। आनंदित होता है। यह जो और सेवाएं करते हैं यह घर जायदास नहीं है। कुछ तो बहुत विनोद भरी बात होती है जो सेवा शब्द से ही बहिष्कृत है। जैसे हे प्रभु आप हमारा अमुक काम कर दीजिए। मैं आपको छप्पन भोग लगाऊंगा। घूस नहीं साहब आप एक काम कर दीजिए। इतनी से ऐसी ऐसी व्यवस्था आपकी कर देंगे। जरा देखो ना हंसी की बात है कि नहीं। अनंत ब्रह्मांडों का भरण पोषण करने वाले प्रभु को प्रलोभन दे रहा है। अब वो छप्पन भोग लगाएगा तो ललचा के वो काम पूरा कर देंगे।
जहां देखो ना कैसा मूढ़ता छाई है। भगवान हमारा यह काम कर दो आपको इतने रुपए देंगे। ऐसे ₹151000 चढ़ाएंगे आपके ऊपर। अरे मां लक्ष्मी चरण चापती रहती है। बावरे देने लेने की वहां बात मत कर। घर जाई सेवा की यहां बात हो रही है। यहां बात समझना। ये जो हम कह रहे हैं एक सेवा भगवत प्राप्ति करा देगी। यह बाहर से आए हुए नौकर की बात नहीं है जो पेमेंट पर है। यह तो उपहासास्पद बात है कि भगवान आप हमारा काम कर दो। मैं आपको ऐसा करूं इसे सेवा ना पूजा इसे नहीं। ये उपहासात्मक बात है।
आप विचार करके देखो तुम्हारी बुद्धि क्या है? इस बात पर विचार कीजिएगा। आप भगवान को हमारे क्या समझते हैं कि आप 100 ग्राम सोना एक किलो सोना चढ़ा देंगे रुपया पैसा चढ़ा देंगे भोग चढ़ा देंगे ऐसे नहीं सोचा जाता अनंत ब्रह्मांडों का सृजन पलक झपकते हो गया वो प्रभु है बड़ा बढ़िया अवसर मिला है सेवा का जब हम अपनी वस्तु मान के प्रभु को समर्पित करते हैं तो भी सेवा नहीं मानी जाती जब हम सेवा करके कुछ चाहते हैं तो भी सेवा नहीं मानी जाती। ध्यान रखना यह जो हम सेवा की बात कर रहे हैं कि एक से ही भगवत प्राप्ति इसलिए इसकी विस्तार से बात कर रहे हैं नहीं तो लगेगा कि केवल प्रभु के लिए प्रभु के होके प्रभु की प्रसन्नता के लिए सेवा हो रही है।
बोले आप चवर करके आ रहे हैं। बड़े भाग्यशाली क्या भाग्य ये शरीर उनका मन उनका प्राण उनका जीवन उनका मेरा कुछ अस्तित्व ही नहीं है ये तो उनका सब कुछ है हमें क्या पेमेंट मिल रही है मुझे चवर करने को मिल रहा है यही मिल रही है ऐसे उपासक को जो बिका हुआ प्रभु का है एक सेवा उसे भगवत प्राप्ति करा देगी नित्य माल्यार्पण करना यह हमारे वृंदावन का एक पुष्प और एक करोड़ का बाहर से लाया हुआ पुष्प समानता नहीं कर सकता। ध्यान रखना बाहर से एक करोड़ का पुष्प मंगाओ और वृंदावन की किसी लता का एक पुष्प तो जो हमारे प्रिया लाल वृंदावन के एक पुष्प से प्रसन्न होंगे वो बाहर के एक करोड़ से नहीं वो नहीं आते वो रंग बिरंगे बड़े महंगे महंगे फूल वो हमारे प्रिया लाल को पसंद नहीं परम पावन ब्रज 84 को भूमि में प्रकट हुआ जो पुष्प है और दैन्य भाव से अर्पित किया जाता है।
गंध प्रियाल के श्री अंगों में इत्र है। सुगंधित चंदन है। यह जब हम लेप करते हैं कि मेरे स्वामिनी मेरी स्वामिनी प्रभु जरा सी बात में आप देखो यह तो नित्य सेवा है। यह तो प्रियाल की सेवा है। मथुरा पधारते हैं सरकार। वहां कुबरी उस चंदन की सेवा कंस की करती थी। राज दरबार में चंदन पेश कर। भगवान ने कहा मुझे चंदन देगी। उसकी कोई श्रद्धा नहीं कि वो आकर के भगवान को चंदन लेप करे मेरे स्वामी और प्रणाम ना कुछ नहीं चंदन कहां ले जा रही है महाराज कंस के ये चंदन मुझे देगी देखा बहुत सुंदर हां तुम पुरुष भूषण हो बहुत सुंदर हो चंदन तत्काल भगवान ने श्री चरण का स्पर्श करा के झटका वाला एकदम सीधी सुंदर दिव्य रूप अब तो पीतांबर पकड़ लिया कहां जा रहे हो बोले आएंगे हम आपसे मिलेंगे आपसे जब उद्धव जी के साथ गए तो उद्धव जी को वो सर्व्श्चर्य हो रहा था कि ये प्रभु मुनियों के ध्यान में ना आने वाले इसको यह सौभाग्य मिला केवल एक बार चंदन लगाने का सौभाग्य एक दर्जी ने अब सखाओं के जो जैसे कपड़े थे सब वैसे वो काट के सिलकर बिल्कुल फिट कपड़े में कुल परंपरागत ईश्वर बढ़ता रहे और अंतिम समय मेरे धाम को आए सुदामा नाम के माली ने माला धारण करा दी एक एक बार की सेवा में भगवत प्राप्ति कुल परंपरागत ऐश्वर्य बढ़ता रहे ऐसा वो हमारे हमारे प्रभु हैं।
हमारे प्रभु के भी प्रभु है प्रेम और प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप है लाडली। आप कहेंगे प्रभु के प्रभु हां अगर प्रभु को कोई अधीन कर पाया है तो प्रेम प्रेमाधीन कहा गया प्रभु का और वो प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप हमारी प्रिया जो है और प्रिया लाल दोनों को आपने माला अर्पित की। एक बार माला अर्पित किया तो भागवत में पढ़ के देख। एक बार चंदन अर्पित किया तो आप पढ़ के देख लीजिए। एक बार वस्त्र पोशाक सुधार दी तो आप पढ़ के देख लीजिए। जबकि किसी विशिष्ट भाव सेवा में नहीं कि वो भाववेश में दास्य भाव सख्य भाव कांता भाव सहचर कोई ऐसे भाव का विशेष जो नित्य प्रभु को चंदन अर्पित करता है गंध अर्पित करता है व्यजन पंखा करता है बरसाने में लाडली जो की पंखा सेवा में बाबा वृद्ध रहते उनकी टांग में फोड़ा हुआ और उसने कैंसर रूप रख लिया सेवा से नहीं हटते थे बहुत कष्ट रहता तो किसी भगत ने देखा तो कहा कि आप चलो एक बार मथुरा चलना पड़ेगा वहां कहा पंखा सेवा बोले आप जहां लाडली जी का मध्यान में सहन होगा
हम गाड़ी ले आ जाएंगे आपको मथुरा ले चलेंगे और आपको सेवा के समय उपस्थित कर देंगे तो राजी जब आज डॉक्टर को देखा तो उनका कहा है तो पैर कटेगा ये ठीक तो होने वाला है नहीं कहा नहीं नहीं फिर हम श्री जी के पास नहीं जा पाएंगे पंखा नहीं कर पाएंगे नहीं नहीं हम मरेंगे पर श्री जी के सेवा करते करते ये सब नहीं करेंगे कोई दवा नहीं हमें छोड़े श्री जी के पास छोड़ दे पंखा रात्रि में जब श्री जी सहन कर दी तो बाहर हो गए तंद्रा से आई लाडली जो आई बाबा तो कहां पीड़ा है ऐसे
देख बाबा खड़े होकर देख कोई पीड़ा नहीं तेरे चेतना आई खड़े हुए एकदम फिट कहीं कोई कष्ट ले करतुम अन्यथा करत स्वामिनी की सेवा में जरूरत है। सच्ची मान ये तो उनका लीला विलास है कि पंच भौतिक नाशवान शरीरों की भक्तों में पीड़ा देखी जाती है। वो केवल बाहरी आंतरिक जो महा सुख मिलता है उसको कौन देख पाता है? तांबुल दान श्री स्वामिनी जी को ये अपनी सेवा पद्धति में है। भोग पवाया आसमन कराया और पान की बीड़ी युगल सरकार को अर्पित की। मृदु मधुर पाद संवाहनम जब हम श्री जी को शयन करा रहे हैं।
ऊपर से वस्त्राविष्टित किया भाव में से बैठ गए। प्रियाजु के चरण चाप रहे। लाल जी के चरण चाप आपको लग रहा है कि खिलवाड़ हो रहा है। इसी से अधीन हो जाएंगे वो। जब एकांत में शांत भाव होकर हृदय से एक दिन देखना आपके ऐसे जो आप कर रहे हैं कि चरण चापने के उसी में श्री चरण आ जाएंगे। सत्य वस्तु प्रभु है। कोई कल्पना नहीं है। मृदु मृदु पाद संवाहनम फिर प्रियाल की हम उत्थापन सेवा करके फिर उनको सुंदर पोशाक सुंदर माला धारण कराना ऐसे जो करता रहता है वह महा प्रेमावेश में एक दिन डूब जाता है।
महा प्रेमावेश में पुलक शरीर होकर के देह भाव रहित होकर के वो श्री जी की सखियों में सम्मिलित हो जाता है। राधा दासियों में सम्मिलित क्या बताया साधन? श्री जी की सेवा परिचर्या कब ऐसा होगा कृपा दृष्टि दासे हरि हरि कदा तयो रिह प्राप्त्य कांतम प्रतिदिन मदसुर विलप ऐसा हम पर कब कृपा होगी कि मैं हे युगल सरकार आपकी दासता से युक्त होकर के अशुभ प्रवाह करता हुआ एकांत अंत में हां मेरी स्वामिनी हां मेरे प्रीतम विलाप करता हुआ आपकी सेवा में रहूं अंदर ही अंदर प्रेम विकलता और सेवा में डूबा हुआ ये वृंदावनाधीश्वरी की सेवा अनंत जन्मों के मानो सुकृत फलीभूत हो गए यदि आपकी श्रद्धा बन जाए आपकी भावना बन जाए प्राय
देहाभिमान होने के कारण साधन भाव में त्याग आदि की तरफ जिसमें वाहवाही उसमें तो रुचि साधक की हो जाएगी पर जो श्री जी की एकांतिक परिचर्या जिसे कोई नहीं जानता कोई तुम्हें बढ़ाई नहीं बढ़ाई प्रिया प्रीतम देंगे वहां रुचि नहीं हो पाती जिसमें चार लोग देखे उसमें रुचि हो सकती जिसमें प्रिया प्रीतम देखे उसमें एकांतिक रुचि होना ये बड़ी विशेष कृपा की बात इसीलिए कह रहे कृपा दृष्टि दासे हरि हरि कदा सान मत तयो इस दास पर कभी ऐसी कृपा दृष्टि करो हे हरि हे प्रभु हे प्रियाजु कि आपकी दासता की रुचि हो जाए बस और कुछ नहीं आपकी दासता की रुचि हो जाए स्वयं आचार्य चरण अपने कर कमल से वृंदावन के वृक्षों से लताओं से गिरी हुई सूखी लकड़ी बिनते थे और रसोई बनाते थे।
एक बार नारमल जी आए। उन्होंने देखा कि पूज्य सदगुरुदेव भगवान अपने पीतांबर में लकड़ी बिना ये हम लोग जो पीत वस्त्र धारण करते हैं अपनी स्वामिनी के श्री अंग कांत का भाव करके और सदा बसंत रहित वृंदावन बसंती रंग वृंदावन की शोभा और हमारे प्रीतम प्रीतांबर धारण करते हैं। पूरी उपासना है ये गुरु प्रदत्त है। कोई मनमानी नहीं कि हम पीला ऐसे मन में आया और धारण कर लिया। ऐसे नहीं नारमल जी ने देखा कि पूज्य आचार्य चरण अपने पीतांबर में लकड़ी से लगा मेरे गुरुदेव बहुत वो धनी मानी उन्होंने कहा जय जय आप रहने दो ना वो हम धीमर को बोल देंगे वो बीन करके ढेर सारी लकड़ियां जमा कर देगा आप महाप्रभु ने कहा होश में हो आप क्या बोल गए?
महाप्रभु के हृदय में दुख पहुंचा। इस बात से परम रसिक महापुरुषों की कृपा से मुझे मेरी स्वामिनी की सेवा मिली और मेरी स्वामिनी की सेवा को आप धीमर से करवाने की बात करते हो। तुम शिष्य हो हमारे। जाओ मैं तुम्हारा त्याग करता हूं। आज के बाद हमारे सामने मत आना। रजोगुण लेकर वृंदावन आते हो। जानते नहीं हो। स्वामिनी की सेवा को धीमर से करवाने की बात तुमने कर दी। जब श्री जी ने स्वयं महाप्रभु जी से कहा कि इसका कोई दोष नहीं आपके सुख के लिए कह रहा शब्दों में त्रुटि हो गई।
अगर कह देते प्रभु आप विराजिए हम भी इन करके एकत्रित तो कहीं तक बात बहुत उचित थी। पर भीमर से करवाने की बात जब हरिराम व्यास जी आए महाप्रभु उस समय बट लोई चढ़ाई हुई थी श्री जी की रसोई अमनिया करने के लिए सूचना मिली कि कोई बहुत प्रकांड विद्वान दिग्विजय पंडित ओरछा के राजा के गुरु हरिराम व्यास जी आपसे वार्ता करना चाहते हैं। पहले को आ गए। महाप्रभु ने बटुई उतार के रख दी। कहा कि हम प्रश्न तो बाद में करेंगे पर प्रभु आपने बटोई क्यों उतार दी? बोले आपसे बात करनी है ना।
बोले हाथों का काम है बात करना। हाथों से सेवा करना और मुख से बात करना तो हाथों का काम हाथों से होने दीजिए और मुख से बात कीजिए। बोले यहां नहीं होता। ये यहां नहीं होता। यह व्यवहार नहीं है। यह प्रेमोपासना है। और तत्काल एक पद की रचना जो श्रीमद् चतुरासी जी में यह जो एक मन बहुत ठौर कर जरा विचार कीजिएगा किस कोटि का भाव है कि हम मुख से बोल भी नहीं सकते। उस समय जिस समय हम श्री जी की रसोई तो उसी में पूरा ध्यान मेरी प्रियाजु पाएंगी। हम उस भाव में डूबे हुए हैं।
हम तुमसे बात करते हुए ऐसे कि रसोई चिढ़ी हुई है। तुझसे बात नहीं सेवा में नहीं हमारी प्रिया जो पाएंगे हम भाव में भरकर डूबे हुए हैं। श्रीपाद कह रहे हैं। ऐसा कब हम पर कृपा होगी। बड़ी खास बात पूज्य पाद उड़िया बाबा जी बता रहे। कल इसका बड़ा रसास्वादन हुआ। बाबा कह रहे हैं कि आप जब आचार्य परंपरा से जुड़ते हैं तो उससे विशेष लाभ यह मिलता है कि उस आचार्य परंपरा में जितने उपासना करके सिद्ध हुए महापुरुष जब आप उनके उपास्य देव और उपासना को स्वीकार करके ईमानदारी से भजन करते हैं तो जितने सिद्ध महापुरुष उन सबकी कृपा उसको प्राप्त होती है।
तभी वह बहुत शीघ्र भाव देश को प्राप्त हो जाता है। ये बड़ा आनंददायक वचन मिला। जब हम आचार्य परम जैसे हम हित जो महाराज जिस आचार्य महाप्रभु हरिवंश चंद्र जी से जुड़े तो जितने परंपरा में सिद्ध महापुरुष हुए उनको वही मंत्र मिला है। वही उपासना मिली जो हमको कृपा प्रसाद से मिली। तो जब हम अपने उपास्य देव की प्रियता श्री राधा वल्लभ लाल जी के अपने भाव में जितना हमारे अंदर हम सेवा शुरू करते हैं तो सब आचार्य परंपरा आचार्य से लेकर परंपरागत जितने सिद्ध हैं सबकी कृपा प्राप्त होती है जिससे वो उस महान रस को प्राप्त कर पाता है।
जितने भगवत स्वरूप हो गए उन सब की शक्ति उसकी सहायता करती है उपासक की जो आचार्य परंपरा से इसीलिए आचार्य परंपरा से जुड़ने का बहुत बड़ा महत्व है। मनमानी भजन करने का फल है गुरुदेव की प्राप्ति जो आचार्य परंपरा से है। यह नवीन कल्पना करके जो छोटे-छोटे समुदाय तो यहां पूज्यपाद बाबा कह रहे हैं कि समुद्रमय उपासना ये कोई सरोवरमय उपासनाएं नहीं होती कि छोटे-छोटे आचार्य परंपरा से होना चाहिए। इसीलिए भगवान आचार्य रूप में अवतरित होते हैं। परंपरा प्रकाशित करते हैं। तो जहां जुड़े वह आचार्य परंपरा से जुड़े।
किसी की वाक माधुरी उससे प्रभावित होकर नहीं। पहली बात शब्द ब्रह्म का ज्ञान और परम ब्रह्म का बोध अत्यंत आवश्यक है। जहां हमें जुड़ना है। शब्द ब्रह्म तो वो अपनी अनुभूतियां बता सकता है। परम ब्रह्म उसको अनुभूत है। अगर अनुभूत नहीं भगवत प्राप्त नहीं ब्रह्म बोध नहीं तो क्या बता वो फिर पकड़ में नहीं आएगी बात नहीं बनेगी। आचार्य परंपरा से गुरु मंत्र उपासना पद्धति करने वाले पर आचार्य परंपरा के समस्त सिद्धों का कृपा प्रसाद प्राप्त होता है। जो तुम्हें मंत्र मिले और उपासना की निष्ठा मिले उसमें पक्के हो जाओ।
पक्के किसी भी स्थिति में अब ना मंत्र छूटना है ना उपासना छूटनी है। यह पक्का समझ लो तब पक्के हो जाओगे। चाहे कोई कितनी भी हमारे सामने निंदा करें, कैसी भी परिस्थिति रख दे, हम मंत्र और अपनी निष्ठा से ना डगमगाए। जैसे सप्त ऋषि आकर पार्वती जी से कहते हैं कि तुम्हें महादेव जी में क्या गुण दिखाई दिया और ऐसा ऐसा पर उनकी निष्ठा कोटि जन्म लग रगर हमारी बरहु शंभु नत कुमारी और मंत्र गुरुदेव नारद तजो नारद कर उपदेशु आप कहे सत बार महेशु दोनों बात मंत्र निष्ठा गुरु वाक्य और उपासना निष्ठा जो इष्ट गुरुदेव ने दिए उनकी उपासना पद्धति सहित यदि ये दो बात पक्की हो जाए तो हर समय आपकी स्वाभाविक भजन वृत्ति जागृत हो जाएगी।
जब तक यह पक्की नहीं होती तभी तक अखंड भजन नहीं होता। अखंड भजन की जो वृत्ति जागृत होती वो ऐसे उपासक पे होती कि विषय भोगों की उपस्थिति में इंद्रियों का विषय भोग ना करने की प्रवृत्ति होना। बिल्कुल नहीं। रुचि नहीं। हर विषय उपस्थित हो और तुम्हारे अंदर भोगने की इच्छा ना हो उसे कहते हैं भजन की वृत्ति जागृत हुई नारायण हरि भजन में पांचो अनुसात विषय भोग निद्रा हंसी जगत प्रीति बहु बात तो देखो अभी भजन कहां है हमारा कहां भजन की वृत्ति है कहां निष्ठा परिपक्व है कहां मंत्रकार वृत्त है प्रभु का नाम वांछा कल्प तरु है फिर उपासक क्यों मांग करता है मत मांग करो वो वांछा कल्पतरु वो देख रहे हैं आपको जो जरूरत है अपने आप कर देंगे गने की मांगने की बिल्कुल जरूरत नहीं वो कोई अल्पज्ञ तो है नहीं कि हम अपनी बात नहीं कहेंगे तो वो सुन नहीं पाएंगे देख नहीं पाएंगे हम नहीं मांगेंगे तो वह जान नहीं पाएंगे नहीं सर्वज्ञ है सर्वत्र है सर्वशक्तिमान है।
उनका विधान परम मंगलमय है। अगर वांछा करनी, आशा करनी तो एक ही बात की करो कि आप मिल जाओ। आप मिल गए तो सब मिल गया। अखिल कोटि ब्रह्मांडों का स्वामी मेरा हो गया तो सब ब्रह्मांड की। वैभव संपत्ति भी तो मेरी हो गई। और सही पूछो तो इच्छा ही खत्म हो जाती है। भगवनंद का स्मरण होते ही न सोचति नका। कोई चाह नहीं, कोई इच्छा नहीं, कोई शोक नहीं। उपासक की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उपासना में यह मिलती है कि सतत स्मरण किसका चल रहा है यह देखना है। अगर आपका सतत स्मरण भगवान का चल रहा है तो आप भगवान के उपासक हो।
प्रियाल के तो प्रियाल का और भोगों का तो भोगों के उपासक हो। भष कोई भी हो। देखो एक बात अंदर से समझनी है कि यह वाह वाह उपासना का फल नहीं है। नहीं है यहां की स्थिति उपासना का फल है। बाहर की नहीं प्रकृति राज्य नहीं है। ये भागवतिक है। उपासना की सिद्धि यहां देखी जाती है। यहां नहीं देखी जाती। बाहर अंतर देखी जाती है। अंतर में स्थिति क्या है? निरंतर भगवदाकार मान अपमान निंदा स्तुति आदि में शाम स्थिति ठीक है ये बाहर की तो इसका क्या भरोसा परिवर्तनशील संसार परिवर्तनशील शरीर क्या भरोसा है इसका ये टिकाऊ चीज नहीं है कि मान ले कि जीवन में हमारे साधना और भजन का फल हुआ कि हमारा नाम हो गया ये अज्ञान की वृत्ति यह साधना की वृत्ति नहीं है।
यह उपासक की वृत्ति नहीं है। यह जिज्ञासु या ज्ञानी की वृत्ति नहीं है। यह घोर अज्ञान की वृत्ति है। चार अल्पज्ञ पुरुषों के द्वारा दिया गया सम्मान और उससे हम यह मान ले कि हम महान हो गए। ये अल्पज्ञता ही है। अज्ञान ही है। स्नेह भरा निरंतर स्मरण उपासक की उपासना की परिपक्व अवस्था है। ये बहुत बचना चाहिए। सम्मान से, लोकप्रियता से, लोक रिझावे से। इसका कोई अस्तित्व नहीं है। कोई अस्तित्व नहीं है। आपको लगता है कुछ तो है। कुछ नहीं है। जैसे लगता है कि 100 लोग तो प्रणाम करें।
कुछ तो है। बिल्कुल नहीं हो सकता। कुछ नहीं हो सकता। ऐसा भी हो सकता है। कितने हजार की भीड़ लगती है। फिल्म वाले जो बना होता है क्या थिएटर कहते हैं। कितने हजार क्या होता है उसमें? कितने हजार लोगों को आप देखो दिन भर वहां आना जाना लोगों का चलता रहता है। तीन घंटे का शो चलता हजारों लोग होते क्या होता है कुछ नहीं झूठे पे झूठा तो हजारों लोग मानसिक बुद्धिमान तो है ही वहां है तो कुछ तो होगा कुछ नहीं व्यर्थ का पैसा व्यर्थ का समय व्यर्थ का चिंतन व्यर्थ की लीला उसमें राजी है तो 100 लोग हमें प्रणाम कर दिए नमस्कार कर दिए हम मान लिए हम कुछ हो गए कुछ नहीं है कुछ नहीं कुछ नहीं जीरो बोले बड़ा यश है जब तक पुण्य तब तक है पुण्य खत्म तो अपने आप समझ में आ जाएगा क्या हो स्थिति पुण्य और प्रभाव सम्मान मान इनसे नहीं
होती चार लोग जान भी नहीं सकते बगल से निकल जाए सिद्ध महापुरुष उनको पता थोड़ी चलेगा कभी सम्मान और प्रियता को अपनी साधना की स्थिति ना समझ ले साधना की स्थिति स्नेह भरा आराध्य देव का स्मरण और द्वंदों में समता ये प्राप्त हुआ तो साधना का फल मिला ये सब नहीं कुछ नहीं भाई कुछ नहीं जैसा कह रहे हैं विश्वास करो कुछ नहीं चमड़ी और दमड़ी का चमत्कार पुण्य उसका चमत्कार चमत्कार यहां का सिद्ध महापुरुषों का यहां का होता है हृदय का लौट कर अपने हृदय में देखो सम्मान सुख
दे रहा है हां अपमान बुरा लग रहा है हां कुछ नहीं मिला आपको अध्यात्म का कुछ नहीं मिला ये तुम्हारे पुण्यों का है खेल तुम्हारे लिए संसार में कोई निंदा का पात्र है? बोले हां है। कोई प्रशंसा का पात्र है। हां कुछ नहीं हुआ तुम्हें। कोई ज्ञान नहीं है। कोई तुम्हारे अंदर अध्यात्म नहीं जागृत हुआ। अगर निंदा की जाती है तो इस शरीर की निंदा की जाती है तो मन और इंद्रियों की जो विषयगामी है। प्रशंसा की जाती है तो सत्य सच्चिदानंद भगवान में स्थिति की। बस और तो चराचर जगत भ्रम में भटक रहा है।
इसकी क्या निंदा? यह सब भगवत स्वरूप खेल हो रहा है त्रिगुण माया का। मनुष्य शरीर बहुत मलिन है। इससे एक ही उज्जवलता है भगवत प्राप्ति। सबसे बड़ा लाभ है मनुष्य शरीर का। भगवत प्राप्ति। यह नहीं हुआ तो बहुत ही गंदा है कुछ नहीं। भगवत भजन होकर भगवत प्राप्ति नहीं हुई तो इस शरीर की दुर्लभता जो वर्णन की गई है वह भोगों के लिए नहीं है। जब उपासक उपासना में लगता है तो उसको भिन्न डालने के लिए सबसे बड़ा शत्रु खड़ा होता है जिसका नाम अहंकार है। अभिमान जहां अभिमान हुआ तो उसका परिचय है कि आप में अभिमान है कि नहीं।
जब दूसरों में दोष दर्शन होने लगे तो आप में गुणा अभिमान हो चुका है। इसीलिए दूसरों में दोष दर्शन होते हैं। दोष दर्शन करने वाला निंदा करके ही रहेगा। वो दूसरे की निंदा करेगा। दूसरे का अपमान करेगा। उपासना सबसे छोटा बनना सिखाती है। और वो अपने को गुणी मानकर जब दूसरों की निंदा करता है तो उपासना में किया कराया। सारा तप सुकृत नष्ट हो जाता है। बहुत ध्यान से इसे सत्संग कहते हैं जो सत से संग करा दे। उपासक उपासना में देखता रहे कि कहीं किसी बात का अहंकार तो नहीं है।
अभिमान तो नहीं बढ़ रहा। उसका परिचय यही है। आप निंदा करो या ना करो। दूसरों को देख के यदि दोष दर्शन होने लगे तो अपने में गुणा अभिमान जागृत हो गया और वो आपको गिराएगा पक्का गिराएगा। बहुत सावधानी की जरूरत है। तुमको यह नहीं देखना क्या असत्य है, क्या असत्य है। तुमको तर्क में नहीं फंसना। तुम्हें जो गुरु जी ने उपासना दी परम सत्य है। उसी में चित्त को समर्पित कर दो। जो विषयों से प्रेम करता है वह प्रिया प्रीतम का प्रेमी नहीं होता। जो प्रिया प्रीतम का प्रेमी होता है वो विषयों का प्रेमी नहीं होता।
विश्वास करो यह जीवन केवल प्रभु के प्रेम के लिए प्राप्त हुआ है। अगर हमारे इस जीवन में भगवत प्रेम नहीं हुआ तो कैसा फिर जीवन का मतलब क्या रहा? प्रेम कहां से प्रकट होता है? भगवत भक्तों के चरित्र पढ़ना, भगवत भक्तों का संग करना, निरंतर भगवन नाम जप करना, शरीर पोषण के लिए भगवत प्रसाद पाना, स्वरूप पोषण के लिए गुरु मंत्र जपना, भगवान की लीलाओं का गायन श्रवण करना। इसी से प्रेम का प्रादुर्भाव होता है। कल की चर्चा में सुना अर्जुन जी से भगवान कहते हैं मेरे दिव्य कर्म है।
मेरे दिव्य जन्म है। इनका जो गायन करता है, श्रवण करता है उसका दोबारा जन्म नहीं होता। अरे भगवत प्राप्ति कोई कठिन विषय नहीं। हम चाह करें। भगवत प्राप्ति की चाह ना होने के कारण हम विषयों की चाह में फंस गए। हमारा जन्म तो भगवत प्राप्ति के लिए हुआ है। केवल यह बात अगर हमारे हृदय में बैठ गई श्री भगवान कह रहे हैं कि हमारे जन्म कर्म को दिव्य जान ले। जन्म कर्म च दिव पुनर्जन्म अर्जुन उसका पुनर्जन्म नहीं होगा। आगे के श्लोक में जो वर्णन करें अब यह बात बहुत ध्यान देने योग्य है कि भगवान के जन्म कर्म को दिव्य कौन जान सकता है जो जान लेगा उसका जन्म नहीं होगा तो जान कौन पाएगा वितराग भय क्रोधा मन मया मामपाश्रिता बहवो ज्ञान तपसा पूता मद भाव मागता वीत राग भय क्रोधा वीतराग राग जिसका बीत चुका है खत्म हो चुका है उसे वीतराग कहते हैं।
किसी भी वस्तु व्यक्ति स्थान से कोई राग नहीं है। यह भी कथा भगवान की पढ़ने से, सुनने से, चिंतन करने से राग नष्ट हो जाता है। यहां हम एक प्रार्थना करना चाहते हैं कि श्रीमद् भागवत की कथा, गीता जी और भी पौराणिक सिद्धांत, वैदिक सिद्धांत इन पर विचार करना चाहिए। पढ़ना, सुनना और विचार करना। पर नौ निवृत्त निकुंज की रसमय लीलाओं पर विचार करने का अधिकार तब तक नहीं जब तक हमारा पुरुष भाव या स्त्री भाव शिथिल ना हो जाए। क्योंकि यदि आपके अंदर पुरुष भाव और स्त्री भाव है तो कहीं आप उन लीलाओं का प्राकृतिक लीलाओं से जोड़ ना कर दे।
नहीं तो अपराध बन जाएगा। हृदय मलन हो जाएगा। हो सकता है कि आपकी भावना में फर्क पड़ जाए। बहुत ध्यान से सुनना। आप पद गाइए। खूब उन्मत्तता प्रेम की बढ़ा देगा। आप देख लेना कुछ ऐसे श्लोक हैं जो वृंदावन महिमामृत में जिनको हमने नहीं गाया क्योंकि सब अधिकारी नहीं। कुछ पद है ऐसे जिनको नहीं केवल गा सकते हैं उनका अर्थ नहीं। क्योंकि उस कोटि की दशा हृदय में होनी चाहिए। तो गीता जी और भागवत जी इनका तो विचार करें, चिंतन करें। निकुंज रस में सिद्धांत का चिंतन करें और लीलाओं का केवल गायन करें।
चिंतन का अधिकार देह भाव शिथिल होने पर होता है। ध्यान रखना। नहीं तो मन बड़ा विचित्र है। फिर अधिकार ना होने के कारण आप अनाधिकार चिंतन कर सकते हैं। वो ठीक नहीं रहेगा। हमारी बात को समझने की चेष्टा कीजिए। हम वृंदावन में है इसलिए खूब उच्च स्वर से गा करके कभी-कभी थोड़ी व्याख्या भी स्पर्श कर लेते हैं। बकाया बाहर तो व्याख्या या सबका अधिकार नहीं होता है। स्थिति का एक बार पूज्य राधा बाबा स्वामी श्री हितस महाराज वृंदावन के अपने श्री राधा वल्लभ जी के अनन्य उपासक तो राधा प्यारी तेरे नयन सलोल ये पद गया तो बाबा रोक दिए गीता वाटिका में और कहा सब अधिकारी नहीं इसके सुनने के आप सब में वहां 10 पांच लोग बैठे होंगे उन्होंने कहा बाबा हम तो वृंदावन वासी हम तो माइक से गाते हैं हजारों के बीच में गाते बाबा ने कहा यह तो बहुत गुप्त बात है।
बोले बाबा यहां गुप्त होगी लेकिन वृंदावन तो महल है महारानी जी का और वहां सब रसिक जन ही है। तो इन पदों की व्याख्या ना पढ़ना। नए उपासक को अर्थ सहित वाणी नहीं खरीदनी चाहिए। सिद्धांत जब तक परिपक्व नहीं होगा आप सिद्धांत भागवत और गीता जी का स्वीकार कीजिए। मंत्र उपासना निकुंज की और वाणी गायन कीजिए आप पहुंच जाएंगे वही हमारी बात मान लीजिए प्रथम सुने भागवत भक्त मुख भगवत वाणी ये पहला सूत्र है भागवत और गीता जी के विचार से परिपक्व हुई बुद्धि देह भाव जिसका शिथिल हो चुका है और रस गायन से रस की उत्पत्ति वो आगे बढ़ता है।
ऐसे पदों का अगर अर्थ चिंतन करेंगे तो अनर्थ भी उत्पन्न हो सकता है आपके मानस पटल पर। इसलिए प्रार्थना है नए साधक को अर्थ की तरफ ध्यान नहीं देना चाहिए। उसकी सामर्थ्य नहीं पद गाओ श्लोक गाओ वही आपको स्थिति प्रदान कर देंगे। वीत राग बहुत सुंदर बात है। लीला का निर्विकार स्वरूप अनुभव देखो। अगर गोपी प्रेम में तनिक भी कोई ऐसी बात होती तो परमहंस श्री सुखदेव जी जो लौट कर अपने पिता का मुख नहीं देखा। जब पुकार रहे थे माता को तो देखा ही नहीं। वो भला ऐसे विलास को कभी गा सकते थे।
विचार करो। बृहस्पति शिष्य उद्धव वंदे नंद ब्रजस्त पाद विभीषण सा अंतिम समय स्तव का गायन करते हैं भीष्म जी उस समय गोपी जनों का चिंतन करते हैं भगवान की उस लीला विलास का क्या है ये गोपी प्रेम कोई ऐसी रहस्यमय प्रेम वृत्ति है जो बड़े बड़ों को समझ में आने वाली नहीं है इसलिए गायन करें गायन से आप रास पंचाध्याय के फल स्तुति को पढ़िए। उसमें लिखा है यह श्लोक पुराण याद विकीम ब्रजवध भदम च विष्णु इस श्लोक में है कि जो श्री कृष्ण की इस रास लीला का जो गोपी जनों के साथ भगवान अद्भुत सुख वर्षा कर रहे हैं इसका जो गायन करेगा पाठ करेगा वो हृदय रोग से रहित हो जाएगा ये हृदय रोग को निर्मूल करने वाली लीला अर्थात काम का सर्वनाश करके प्रेम प्रकाशित करने वाली श्रीमद् चतुरासी जी की फल स्तुति में लिखा है भवजल निधि को नाव और काम पावक को पानी काम रूपी अग्नि को शांत करने के लिए लीला जल है चतुरासी जी का गायन निष्काम करके प्रेम प्रकट करता है।
यहां प्रार्थना है। अर्थ की तरफ दृष्टि मत ले जाना। अगर अर्थ कभी आप पढ़ भी ले तो उसको चिंतन में मत आओ। उसको छोड़ दो। जब तक आपकी भाव दशा ठीक नहीं है। अभी आपके अंदर काम आता है। आपके अंदर नाना प्रकार की वासनाएं आप नहीं समझ पाएंगे। आप उसे प्राकृतिक भाव से अगर देखेंगे तो बात ठीक नहीं। क्योंकि प्रिया प्रीतम सच्चिदानंद में आपकी बुद्धि प्राकृतिक प्राकृतिक भाव सच्चिदानंद पर आरोपित करना फिर वह बिगड़ जाएगा। इसीलिए यहां प्रार्थना करते हैं नवनि निकुंज के पदों का गायन चिंतन भागवत गीता जी के सिद्धांतों का देह राग को शिथिल करके फिर चिंतन जो प्रकट होता है वो आंसुओं से भीगे हुए कपोल वाला होता है।
गदगद सुर नैना सजल दंपति रस रहे भीन इसलिए उपासक को चाहिए कि जब तक देह भाव शिथिल ना हो जाए तब तक ऐसे ऐसेसे श्लोक रस भरे हैं जिनको आप बिल्कुल नहीं समझ सकते इसलिए भगवान की अवतार लीला भगवान के उपदेश देखो शास्त्रों में हमने पाया कि जब अपने शिष्यों को उपदेश गुरुदेव करते हैं तो उनसे कहते हैं कि देखो भाई मेरे उपदेश से जो मेरा आचरण ना मिलता उसे कभी स्वीकार मत करना। मेरे उपदेश से जो मेरा आचरण या शास्त्र की आज्ञा से जो मेरा आचरण ना मिलता हो उसे कभी अनुकरण मत करना।
क्यों? क्योंकि तुम्हारी स्थिति नहीं है। तुम अनुकरण करोगे परास्त हो जाओगे। मेरा जो तुम्हारे लिए उपदेश है, शास्त्र की जो आज्ञा है, उसके अनुसार चलना। आप सोचो जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण की लीला का कोई अनुकरण कर सके। जैसे रास लीला का नहीं भगवान इतनी गोपियों के साथ नृत्य कर रहे हैं। भगवान के इस दिव्य प्रेम विलास को तुम रास किसको संबोधन कर रहे? बोले रास रचा के आ रहा है। घोर अपराध भरे शब्द बोल रहे हो। भगवान रास जो कर रहे हैं वह आत्म स्वरूप का विलास है। वह किसी व्यक्ति या स्त्री पुरुष का नहीं है।
भगवान ने जो कुछ लीलाएं ऐसी की जिनका अनुकरण स्वाभाविक करके हम प्रेम मगन हो सकते हैं। कुछ लीलाएं हैं जिनका गायन करके प्रेम में मगन हो सकते हैं। कुछ लीलाएं हैं कि पढ़ सुनकर के हम गर्वित हो सकते हैं। मेरे प्रभु ऐसे तो रास लीला के पहले भगवान की जैसे लीला एक आती है गोवर्धन लीला फिर रास लीला चलो रास लीला तुम करने के अनुकरण करने की बात करते हो चलो गोवर्धन लीला करो नहीं भगवान जो लीला करते हैं उनका अनुकरण करो गोवर्धन लीला करो अब भी 21 किलोमीटर के महाराज हैं गिरिराज जी श्री कृष्ण चंद्र गुरु जो लीला कर रहे हैं वो गायन करनी है।
अनुकरण करने की सामर्थ्य किस में है? किस में है? भगवान शंकर ने हलाहल जहर निकला समुद्र मंथन से। यहां रोक लिया। तुम एक कुल्ला पानी रोक के दिखाओ। पानी और हलाहल जहर रोक लिया। तो सामर्थ्यवान महापुरुषों का आचरण वही अनुकरणीय है जो शास्त्र सम्मत है जिनका वो आदेश कर रहे हैं कि आप ऐसा कीजिए हर बात अनुकरणीय नहीं है क्योंकि वो किस दशा में किस स्थिति में है इसीलिए यहां भगवान कह रहे मेरे जन्म कर्म की दिव्यता को कौन जानेगा और जो जानेगा उसका पुनर्जन्म नहीं होगा तो बोले वीत राग जिसका राग नष्ट हो चुका है मेरी प्रियाजु मेरे लाल देखो प्रगट में देखने वाले की दृष्टि में और वर्तमान की स्थिति में बड़ा अंतर हो सकता है।
ऐसा नहीं है कि आप जो दृश्य देख रहे हो वो दृश्य वैसा ही हो। आपकी देखने की क्या शैली है? एक बार यही बात अकबर से जब कहा बीरबल ने कि देखी हुई बात गलत हो सकती है। अपना चिंतन जैसा होता है वैसे ही दृश्य दिखाई देता है। उसको भी समझना चाहिए ना कि जो हमें दिखाई दे रहा है वही सत्य है। ऐसा कैसे हो सकता है? जब हम देख रहे हैं तो सत्य क्यों नहीं होगा? तो कभी ऐसा आपके सामने प्रश्न आवे तो बताना। फिर हम आपको उत्तर देंगे। एक दिन जो बादशाह की सैया लगाता था उसके मन में आया कि जीवन व्यतीत होता जा रहा है फूलों की सैया लगाते हुए बादशाह के लिए तकिया पांच मिनट लेट के देखते हैं बादशाह थोड़ी आ जाएगा इस समय लेटा तो सोचा इनका जो चद्दर है इतना सुगंधित और मुलायम जरा डाल के डाला और आंख मूंद के पांच मिनट आनंद लेते सो गया भैया कहां चारपाई में सोने वाला कहां बादशाह की सया में और दरबार में उनको विलंब था तो जो उनकी पत्नी थी वो वहां गई आज महाराज बिना कुछ खाए पिए बात किए हमें लगता है कोई सीरियस मैटर रहा होगा थकित होकर के सो गए पार्श्व में वो सो गए अब बादशाह आया तो देखा मेरी सैया में कोई पुरुष और हमारी पत्नी तलवार खींची तो कहा उसने कहा था बीरबल ने कि दृश्य झूठा हो सकता है।
उसको बुला के कहते हैं एक दृश्य कहां से झूठा हो सकता है? मैं सत्य देख रहा हूं। बुलाया और कहा कि तुम कहते थे दृश्य झूठा हो सकता है। देखने वाले की क्षमता के अनुसार दृश्य दिखाई दे। मैं देख रहा हूं मेरी पत्नी किसी गैर पुरुष के साथ पड़ी हुई है। झूठा है। बोले महाराज झूठा भी हो सकता है। झूठा ही है। मैं ऐसा नहीं कहता लेकिन झूठा भी हो सकता है। अब कौन पुरुष है हमें तो पता नहीं लेकिन आप दो मिनट खंभे की आड़ में रुकिए। रानी को ऐसे जी बोले आप किसके साथ सो रही? बोले महाराज के साथ बात नहीं की।
बोले थके थे सो रहे थे इसलिए जगाया नहीं। पारस में सो गए। ठीक है आप जाइए। हम महाराज को जगा के ला रहे हैं क्योंकि भोजन नहीं पाया इनको पवाना है। हां ठीक है। पर्दा हटाया तो वो फूल बिछा ले। वो तो घबरा रहा था एकदम। तो कहा मालिक जान बचा लो। मुझे ऐसा ऐसा आया इसलिए नहीं तो किसके साथ? बोले हमारे साथ तो कोई नहीं था। बादशाह पर्दे के आड़ में सुन बोले चुपचाप भाग जा अगर बादशाह जान गए तो भला बोले सरकार देखा दोनों निर्दोष थे यदि आप मारते तो दोनों की हत्या आप कर सकते थे लेकिन दोनों निर्दोष थे हमारी दृष्टि प्राकृतिक दृश्यों का फायनल नहीं कर सकते फिर सच्चिदानंद का कैसे तो हमें अपनी दृष्टि सुधारने वीत राग जिनका राग बीत गया है अर्थात परम वैराग्यवान भगवत लीला का रसास्वादन इसलिए परम वैराग्यवान परमहंस शिरोमणि सुखदेव जी को श्रीमद् भागवत कथन का अधिकारी श्री भगवान व्यास देव जी ने जानकर के भागवत दे।
जब कोई प्रभु से विमुख हो जाता है तो नाशवान पदार्थों में और शरीर में यह नाशवान है। इसमें राग हो जाता है। अब यह राग उससे पापचरण कराता रहता है। वह भगवान की लीलाओं को नहीं देख सकता। हमारा सच्चिदानंद प्रभु की प्राप्ति का पहले भूमिका समझ ले। जब कोई तीनों रागों से तीन प्रकृति के गुण, तीन शरीरों की रचना, तीनों लोकों का वैभव तीनों रागों से जो मुक्त हो जाता है वो भगवत प्राप्त होता है। भगवत प्राप्ति में भी बड़ा भेद है कई तरह का। भगवत प्राप्ति में भी जो रस सिद्ध महापुरुष है वह गोपी भाव को जो उनसे भी सहचरी भाव को आपकी दशा कहां है देह भाव में अब देह भाव से देखोगे तो क्या दिखाई देगा जैसा चश्मा है वैसे दिखाई देगा इसलिए लीला का वास्तविक रहस्य कौन जानता है बोले वीतराग कौन वीतराग बोले जो परमात्मा से विमुख है उसका नाशवान प्रकृति के द्वारा रचे हुए वस्तु व्यक्ति स्थान शरीरों में राग हो जाता है।
वह राग जिसका नष्ट हो चुका है उसे कहते हैं वीतराग परमहंस। यह राग कामना पैदा करता रहता है। रजोगुण से राग उत्पन्न होता है और राग से अप्राप्ति की प्राप्ति की चाह का नाम है। मैं यह भोग लूं। जो सुना जो पढ़ा जो देखा वो भोग लूं प्रकृति का कामना कहते हैं। कामना जहां उत्पन्न होती है तो प्रिय पदार्थों का भोग भोगने से लोभ होता है। प्रिय पदार्थों के भोगने में बाधा पड़ने पर क्रोध होता है। भगवान कह रहे हैं कि वीत राग भय क्रोधो मन मया माम उपाशित जिसका राग नष्ट हो चुका है और जिसका क्रोध नष्ट हो चुका है।
क्रोधी नहीं और भय नहीं है। भय जब तक आप पापा आचरण करेंगे तो बिना किसी भय के भी आपको भय लगता रहेगा। ध्यान रखना हृदयों में देख लेना। अगर भय लग रहा है आपको अव्यक्त भय कहीं ऐसा ना हो जाए। कहीं ऐसा आपका मन मलिन है और आपने पापा आचरण किए हैं। वो आपको भयभीत करते रहेंगे। जो भगवत शरणागत निर्मल हृदय वाला होता है उसके अंदर निर्भयता आती है। निर्भय निश्चिंत निशोक भगवान कह रहे हैं जो राग रहित है और भय रहित है। भय एक ही जगह आता है। अज्ञान जनित नाशवान शरीरों में राग भोगों में राग जिससे पापाचरण तो यह शरीर ना नष्ट हो जाए।
इस बात का भय बना रहता है। कहीं भोग सामग्री ना छूट जाए। इस बात का भय बना रहता है और एक मन में अव्यक्त भय बना रहता है वो पापाचरण का फल वो एक कल्पनात्मक भय बना रहता है भयावा जिसे आजकल भाषा में डिप्रेशन कहते हैं। वो बेमतलब की बातें सोच सोच कर डरता रहेगा। लेकिन भजन भगवत आश्रय ये निर्भय करता है। भय नहीं रहता। जब हमारी कामनाओं की आपूर्ति होती है तो क्रोध आता है। लेकिन भक्त की अगर कहीं वह कामना वाला भी अभी है आपूर्ति होती तो कृपा मिलता। बड़ी कृपा हुई। भले नहीं दिया नहीं मेरा मन फंसा देता।
पूर्ति हो गई तो बहुत दुलार है। बड़ी प्रभु की दुलार वृत्ति है। वो प्रभु की तरफ ही देखता है। पूर्ति में भी अपूर्ति में। इसलिए ना वो तो लोभ से बंध पाता है ना क्रोध से। वह तो महान पुरुष होते हैं जिनमें कोई कामना नहीं होती लेकिन प्राय कामना से ही भक्ति प्रारंभ होती है। जो हमारा अनिष्ट होने की आशंका बनी रहती है यह अविद्या अज्ञान नाशवान पदार्थ नाशवान शरीर की प्रियता के कारण तो भय क्रोध लोभ ममता ये सबका मूल जो है कामना है काम है इसी से दोषों की उत्पत्ति होती है जब तक ये काम है तब तक भगवान की लीलाओं को तुम कैसे जान सकते हो कैसे जान सकते हो जब तक तुम्हारे शरीर से काम क्रीड़ा होती है।
तुम्हारे अंदर मन में कामनाएं प्रकट होती है। तब तक तुम भगवान के चरित्रों का रहस्य नहीं जान सकते। क्योंकि भगवान कह रहे हैं मेरे जो चरित्रों को मेरे कर्म को जन्म को दिव्य जान जाता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता। तो कौन जान जाता है? तो बोले वीतराग भय क्रोधा जिनका राग नष्ट हो चुका है जो निर्भय हो चुके हैं जिनके हृदय में क्रोध नहीं है और भगवान कह रहे मन मया माम उपाशता मन मयाहा जो मुझ में तल्लीन है रात दिन नाम जप कर रहे भगवत ध्यान में माम उपाश्रिता मेरे ही आश्रित है मेरा ही चिंतन मेरा ही आश अंदर से किसी से कोई राग नहीं है।
किसी भी भोग की भोगने की इच्छा नहीं है। उस इच्छा की जब वृत्त नहीं तो क्रोध और लोभ की संभावना ही नहीं। और जब इच्छा ही नहीं तो पापाचरण नहीं तो भय नहीं। भय केवल पापाचरण से होता है। निर्विकार हृदय कूटस्थ स्वामी थे। हिमालय में भ्रमण कर रहे थे। एक शेर की गर्जना हुई। घुर्राता हुआ सामने आया तो छड़ी लिए थे पूज्य पादुड़िया बाबा का ऐसे छड़ी लगा खड़े हो गए बोले यार सुन तेरा आहार अगर ये निश्चित हो चुका है तो तू गुर्रा मत इसे खा ले अगर आहार नहीं निश्चित हुआ है तो तू जा व कुछ अलग है कितने निर्भय कि सिंह के सामने भी एकदम ऐसे क्यों क्योंकि वीतराग है शरीर से राग नष्ट हो चुका है श्री भगवान कह रहे कि माम पाशता देखो बहुत सुंदर बात कह रहे ध्यान देना अपने लोगों का स्वभाव है बिना आश्रय के जी नहीं सकते किसी न किसी का आश्रय शरीर का आश्रय रुपए का आश्रय विपरीत शरीर का आश्रय पद का आश्रय विविध भोगों का आश्रय नशा आदि का आश्रय बिना आश्रय के जी नहीं सकता आप ये समझ लो ऐसी मान्यता हो चुकी की है और आश्रय अगर यह सब छोड़ दे तो अमर हो जाए।
उसको लगता है मैं मर जाऊंगा बिना इसके। वो अमर हो जाए। यही माया का भ्रम है। किसी ना किसी का आश्रय लिए रहता है। कभी भी वह आश्रय टिकाऊ नहीं है। ध्यान देकर देखिए क्या टिकाऊ है। मनुष्य शरीर टिकाऊ है। नहीं बैंक बैलेंस नहीं। कोई पदार्थ पदवी नहीं। बहुत ध्यान देने योग्य बात है। परमात्मा के अंश तुम्हारे अंदर जो एक आश्रय लेने की वृत्ति प्रकट हुई है प्रकृति से यही बंधन है। और इस बंधन को तुम तभी छुड़ा सकते हो जब प्रकृति को जिसने रचा उसका आश्रय ले लो। परमात्मा का प्रभु का।
भगवान का अंश जब तक प्रकृति के कुछ भी आश्रय रखेगा तब तक वह भय, क्रोध, लोभ, राग इनसे पिटता रहेगा। चिंता, शोक नाना प्रकार की। बात को पकड़ो। गंभीरता से पकड़ो। तुम प्रभु के अंश हो। प्रकृति के आश्रय से तुम्हें चैन नहीं मिल सकता। शांति नहीं मिल सकती। अमर पद नहीं मिल सकता। तुम भटकते रहोगे, क्लेषित होते रहोगे, भयभीत होते रहोगे। भटकना जन्म मरण भगवान के एकमात्र आश्चर्य से तुम्हें विश्राम मिलेगा और कहीं नहीं। जैसे गोस्वामी जी कहते पायो परम विश्राम राम समान प्रभु नाही कहूं।
लेकिन कोई भगवान का आश्रय लेना नहीं चाहता। रुपया का आश्रय लेना चाहता है। वस्तु का बल, पद का बल, परिवार का बल, देह का बल, समाज का बल। तब तक भगवान के दर्शन हो जाए। लोग बातें बनाते समझते नहीं। अरे द्रोपदी जी अवतार हैं। द्रोपदी जी कोई जन्म नहीं लिए। अवतार हैं। शक्ति का अवतार हैं। यज्ञ कुंड से प्रकट हुई। लेकिन आश्रय दृढ़ तब हुआ इस घटना के बाद। चीरहरण घटना के बाद नहीं पांडवों का आश्रय था, सभा का आश्रय था, अपना बल का आश्रय था, दांत का आश्रय लिया। जब सब छूट गया तो गोविंद द्वारिका वासिन ये चीज समझने कल कुछ संत भगवान आए थे।
उनसे यही चर्चा हो रही थी कि आश्रय तत्व पर दृष्टि रखो। कहां आश्रय है तुम्हारा? अंदर से देखो। अभी भगवत प्राप्त हो जाओगे। बिगड़ी जन्म मने की अब सुधरे आज अभी हो राम को आश्रय राम का आश्रय हरि का आश्रय प्रभु का किसका आश्रय सूरदास जी महाराज कह रहे हैं अपबल तप बल और बाहुबल चौथो बल है दाम किसका आश्रय है इनमें से अपना बल तपस्या का बल दाम का बल विद्या का बल किसका बल है बोले सब बल कहां जागृत होता है बोले हारे को हरि जो भगवान के आश्रित हो गया, नाम के आश्रित हो गया।
ये जितने आश्रय टिकाऊ नहीं है। प्रत्युत ये तुम्हें भ्रमित करके तुम्हारे समय को नष्ट करने वाले हैं। जिसने धन का आश्रय ले लिया पतन है। शास्त्र कह रहा है। क्यों पतन है? खूब बल आ जाता है अंदर। क्योंकि गलत आश्रय लिया ना धन का। अब वो मत वाला हो जाता है। शराब पीना, मांस खाना, व्यभचार करना ये उदंडता ही उदंडता आने लगती है। अब भगवत आश्रित और धन आ गया तो उसका धन दूसरी जगह जाता है। क्योंकि आश्रय सही है। अस्पताल खुलवा दिया, गौशाला, संत सेवा, गौशाला, नाना प्रकार की धार्मिक वृत्तियों के द्वारा दूसरों को सुख पहुंचाना।
क्यों? क्योंकि आश्रय बढ़िया है। केवल धन का आश्रय है तो सब दोष आ जाते हैं। इतना ही नहीं शुभ कर्मों का आश्रय बन जाता है। साधना का आश्रय बन जाता है। अपनी साधना रोज परिक्रमा लगाता हूं, रोज ये करता हूं, ये करता हूं। देखो दिखाई दे रहा है भक्त। भगवान भक्त का मतलब होता है भगवान का आश्रय। अब वो यह जो सत साधनाएं हैं असत नहीं है पर इनका जो आश्रय हो गया वो डायरेक्ट भगवान के आश्रय से अब हमारी टांगे मजबूत है तो हम परिक्रमा लगा रहे हैं कल टांग टूट गई तो तो आश्रय भगवान का उनके आश्रय से भगवत प्राप्ति होगी कोई इनके आश्रय से थोड़ी लेकिन अगर वो आश्रय लिया है तो फिर लगेगा हमसे से कोई साधना ही नहीं हो रही आप असंतुष्ट हो जाएंगे।
एकमात्र भगवान का आश्रय तभी कह रहे बिगड़ी जन्म अनेक अब सुधरे आज अभी इसी क्षण सुधार हो जाएगा। अभी इसी क्षण बात बन जाएगी। अनेक जन्मों की बिगड़ी क्या आश्रय केवल प्रभु का माम पासता भगवत प्राप्ति की साधना का भी आश्रय नहीं। ध्यान दे यह बड़ा सूक्ष्म आश्रय केवल प्रियाल का साधना बन रही बढ़िया कल साधना ना बने ऐसे रोग हो जाए ऐसी शरीर की स्थिति हो जाए ऐसी मना स्थिति हो जाए तो हमें भगवत प्राप्ति नहीं होगी क्या होगी बोले क्यों होगी तुमसे कोई साधन तो बनता नहीं बोले हमने साधन का आश्रय नहीं लिया हमने तो प्रियाजु का आश्रय लिया सर्वे साधन वरेशु चिरम निराशा बात समझना ये आंतरिक है आध्यात्मिक भरोसा केवल वल प्रभु का आश्रय केवल प्रभु का इसी से भगवत प्राप्ति होती है।
पूर्व में जब प्रथम प्रथम बोलना शुरू हुआ था मुरारी से उनसे यही आश्रय तत्व पर केवल चर्चा होती थी। आश्रय को समझिए। अगर आश्रय साधन का तो भोग साधन का होता है। साधन सुख का भोग होता है। इसीलिए यह गुण साधन ते नहीं बड़ा सूक्ष्म। अब जैसे अल्पज्ञ साधक है तो सोचता है कि फिर तो साधना ही नहीं करनी चाहिए तो अभी तक आप कर रहे थे क्या आपसे करवा रहे थे जिनके आश्रित हो ऐसे भाव में आओ साधन हो रहा है प्रभु को समर्पित हो रहा है नहीं हो रहा है तो हम तो प्रभु को समर्पित ही है हमारी भगवत प्राप्ति तो पक्की है भाई यह समझ आनी बहुत कठिन हो जाती है हम परिक्रमा लगाया है तो कह सकते हैं कि हम भगवत प्राप्ति कर सकते हैं क्योंकि साधन का भरोसा है और अगर नहीं लगा पाए तो हमारे भरोसा में कमी हो जाएगी।
आप आखरी बात समझ लीजिए। यदि आपने अंदर से आश्रय हमारे प्रियाल का ले लिया और कुछ नहीं बन रहा तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी। हमारी बात समझ लेना। ये हम बहुत समझी सोची हुई बात कर रहे हैं। आश्रय आपका कहां है? एक क्षण के आश्रय को प्रभु बहुत बड़ा मान लेते हैं। ध्यान रखना जब बाली जी का भगवान ने प्रहार करके वध किया तो आखिरी स्वासे बाली जी की भगवदाकार थी। पर भगवान से बड़ा छुपा के वचन बोले। हृदय प्रीति मुख वचन कठोरा। और भगवान की तरफ देखकर कहा मैं बैरी सुग्रीव प्यारा कारण कौन नाथ मोहे मारा हम दोनों भाई हैं हमें अपने भाई की हर चेष्टा को पता है जैसा मैं वैसा मेरा भाई बहुत बड़ा भजनानंदी नहीं हम जानते हैं बचपन से साथी है और मैंने कभी आपका विरोध नहीं किया आपने मारा क्यों मुझे जो सूक्ष्म बात भगवान तुम ये जानते थे कि सुग्रीव मेरे आश्रित हो गया है।
अरे अभिमानी मेरे आश्रित का वैरी मेरा वैरी होता है। तो कितने दिनों के आश्रित हुए थे सुग्रीव जी। कोई माला चलाई थी, ध्यान किया था, तपस्या की थी और निष्काम आश्रय नहीं था। सकाम आश्रय था। बाल मारा जाएगा। मैं किष्किंधा का राजा बनूंगा और आजा राजा बन गए हो। महाराज जी राम जी प्रवरण पर्वत पर रहे एक दिन भी दंडवत करने ना दिन में गए ना शाम के गए चार महीना नहीं गए फिर वहां से भयभीत वाले वचन जब भगवान लक्ष्मण जी को कि जाकर बोल दो कि जो बाली को वही बाण तू उड़ीर में है उसमें तब आके दंडव नाथ विषय हरि लेने से ज्ञान हम आपको बात बता रहे हैं प्रमाण सहित भगवान ने जो वचन कहे वो बहुत मानने और समझने वाली की बात तुम जानते थे कि सुग्रीव मेरे आश्रित हो गया।
अरे अभिमानी तू मारना चाहता है। मेरे आश्रित मेरे आश्रित का वैरी मेरा वैरी मेरे आश्रित का मित्र मेरा मित्र इसलिए मैंने तुम्हें मारा। फिर वो आगे की जो बात अनुज वधू भगिनी सुत नारियों व्यवहारिक की बात कही। आंतरिक बात जो कही मेरा शरणागत मेरे आश्रित अन्य आश्रय टिकाऊ नहीं है पहले दिमाग में रख लो यहां तक कि साधना का आश्रय भी इसीलिए सर्वे साधन वर चिरम निराशा साधना का आश्रय साधन का भोग करवाने लगता है। साधन का भोग क्या होता है? एक अहम में सुख दिन में तीन परिक्रमा लगाता हूं वृंदावन की वो अहम में जो आश्रय बैठ गया साधना का ये अहम भोग कर रहा है उसका तीन लग गई तो कोई बात नहीं तीन दिन नहीं लगी तो कोई बात नहीं उनहीं के तो आश्रित मान लो कोई ऐसी शरीर की अव्यवस्था प्रमाद नहीं होती प्रमाद नहीं होता भक्तों में आश्रय हमारा प्रभु का जैसी उनकी रुचि हो वैसा चलावे।
बहुत बढ़िया साधन बन गया तो हमें कोई हर्ष नहीं है और कोई साधन नहीं हुआ तो हमें कोई शोक नहीं है। यह स्थिति समझना बड़ा कठिन है। जब तक उपासक भगवान के आश्रित नहीं होता तब तक वो किसी न किसी पराधीनता को स्वीकार करता रहता है। और इसीलिए उसका दुख नहीं मिटता। अन्य आश्रय परिणाम दुख ध्यान रखना प्रभु के सिवा अन्य आश्रय बराबर दुख प्रभु का आश्रय बराबर सुख दुख की निशानी नहीं संसार में प्रगट आश्रय भोगों का शरीरों का पदों का धन का बड़ा आकर्षण है स्त्री का आश्रय पुत्र का आश्रय मकान का आश्रय बड़े-बड़े आश्रय हैं अंदर जब तक यह आकर्षण रहेगा तब तक भगवान में आकर्षण नहीं होता और अंदर सब आकर्षण में वही कृष्ण का है।
भगवान का आश्रय होते ही त्रिभुवन की प्रिय से प्रिय वस्तु से राग खत्म हो जाएगा। यह पहचान है। कोई प्रिय नहीं लगेगा। वही प्रिय लग रहे हैं। उनके सिवा वास्तविक आज भी किसी को कोई प्रिय नहीं लगता। अगर वह अंतर्ध्य हो जाए तो उस शरीर को फूंक दिया जाता है, जला दिया जाता है, गाड़ दिया जाता है। क्या यह प्रियता रही? प्रियता तो प्रभु से ही थी। भाव ज्ञान तपसा पूता मद भाव मागता इसकी व्याख्या श्री राधा वल्लभ लाल की जय
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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