परमार्थ में यह शपथ लेना जरूरी / सच्चे साधक में प्रकट होते हैं ये 33 दिव्य लक्षण // 31/03/2026
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
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वृंदावनेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमामृत मकरंद रसोग पूर्णम हदितम मधुपते स्मरता मुग्रम निर्वाय परम शीतल माश्रयाम परम शी शीतल माया डोल झूलत दूलहनी दूल्हा हो उड़त कुमकुम छिर त खेल परस्पर शूल हो डोल झूलत दुलहनी दूलहु [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] बाजत ताल रबा बाप और बहु तरनी तनयाकूल हो श्री हरिदास के स्वामी श्यामा कुंज बिहारी को अन ततब नाह ने फूल हो कुंज बिहारी श्यामा कुंज बिहारी श्री हरिदास [चीखने की आवाज़] के स्वामी श्यामा कुंज कुंज [गाना गाने की आवाज़] बिहारी को अन ततब नाहिने [गाना गाने की आवाज़] फूलहु डोल झूलत दुलहनी दूसना के मार्ग में उपासक को ऐसी दृढ़ भावना बनानी है कि चाहे हमारे शरीर को भयानक पीड़ा मिले, अपमान मिले, तिरस्कार मिले, चाहे हमारा मन हमारे खिलाफ हो जाए, भोगों में आकर्षित कर दे या विश्व हमारी निंदा करने लगे, मुझे किंचिन मात्र भी कोई भय नहीं।
अपने मार्ग में अटल रहूंगा। यह शपथ पूर्वक मार्ग चलना चाहिए। प्रारंभ में ही यह शपथ खा लेनी चाहिए। अब मैं प्रभु के मार्ग को नहीं छोड़ सकता। चाहे जितनी पीड़ा दी जाए या प्रलोभन दिया जाए। हर सुख का प्रलोभन माया देगी। प्रभु को नहीं छोड़ना है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो उपासक सुख का लक्ष्य करके इस मार्ग में चलता है, वह भ्रष्ट हो जाता है। वासनाएं साधना से दब जाती है। मिटती है। भगवत साक्षात्कार या ब्रह्म बोध से। भगवत साक्षात्कार या ब्रह्म बोध तक पहुंचने के लिए उपासक को बहुत ही स्वभाव में गंभीरता सहनशीलता ये लानी ही होगी।
अगर वह गंभीर स्वभाव का नहीं है। अपनी बातें दूसरों से बताएगा तो परमार्थ से वंचित हो जाएगा। अनुभव की बातें या अपनी कमी की बातें दोनों नहीं बतानी। इष्ट देव जान रहे हैं। गुरुदेव जान रहे हैं। दूसरा कोई हमारे हृदय का परिवर्तन नहीं कर सकता। अगर हमारे हृदय का परिवर्तन कर सकता है तो हमारा आराध्य देव कर सकता है। आराध्य देव सर्वज्ञ है। इसलिए मुझे कहने की जरूरत नहीं। जो अनुभव हो रहा है उसे गुप्त रखो क्योंकि वही अनुभव परमात्म साक्षात्कार की मंजिल दृढ़ कर देगा।
अगर अनुभव बताने लगे तो खाली हो जाओगे। परमार्थ में चलने की योग्यता खो दोगे। इस बात को धैर्य पूर्वक समझिए। चाहे जितना कष्ट हमें मिले शारीरिक या मानसिक हम प्रभु के मार्ग को अब छोड़ने वाले नहीं। यह शपथ खानी चाहिए। हम प्रभु के मार्ग में जैसे हैं वैसे ही चलेंगे। जितना सुधार प्रभु कराते जा रहे हैं उतना होता जा रहा है। हम प्रभु के मार्ग को नहीं छोड़ेंगे। चाहे जैसी परिस्थिति आ जाए। हम गिर सकते हैं, फिसल सकते हैं, लड़खड़ा सकते हैं। पर ना तो रुक सकते हैं और ना लौट सकते हैं।
यह शपथ खानी चाहिए। अगर यह निष्ठा नहीं है तो फिर बहुत बड़ा भयाव दृश्य उपस्थित करेगी माया भीतर और बाहर से समय आएगा आप लड़खड़ा जाएंगे आपको प्रलोभन ऐसा मिलेगा कि आप इसे छोड़कर के माया में रमण करें। प्रलोभन में बहुत मिठास नजर आती पर होता बहुत जहर है। सकामता उत्पन्न होते ही जो जलन होती है वह सकामी पुरुष नहीं जानते। वो भगवत मार्ग के पथिक जानते हैं कि कामना कितना बड़ा जहर है और कैसे जलाती है रात दिन। इसलिए उपासक को निष्कामता पर ही अपनी स्थिति स्थापित करनी चाहिए।
सकामता को तत्काल काटना चाहिए। अगर सकामता रही तो 20ों वर्ष साधन करने के बाद भी वह भ्रष्ट हो जाएगा। इस शब्द को बहुत सूक्ष्मता से अनुभव पूर्वक बोल रहे हैं। छोटी सी दबी हुई वासना 20ों वर्ष साधन करने के बाद भी वह अपना प्रबल रूप धारण कर लेगी और साधक को गिरा देगी। ढूंढढूंढकर अंदर की वासनाओं को नाम जप के द्वारा भस्म किया जाता है। भजन के बल से उनका हृदय से पूर्ण अनादर करना होता है। अनादर ही उनका नाश है। आदर करना ही अपना नाश है। बस यह ध्यान रखना है। सकामता ही हमारा पतन है।
निष्कामता ही हमारी स्थिति है। धैर्य पूर्वक सहन करना ही यात्रा है। सहन ना कर पाना टूट गए या प्रलोभन में आ गए तो इस मार्ग से गिर जाएंगे। देखो श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज कैसी निष्ठा का वर्णन करते हैं। धाम की निष्ठा कह रहे हैं कि छिद खडसा इदम यदि में शरीरम घोरा विपतयो यदिवा आहंत हांत न तथाप भया वृंदावना तर तुच्छ पदे पिपासा बहुत उच्च कोटि की वृंदावन की निष्ठा है श्रीपाद प्रबोधनंद जी की बलिहारी है इन महापुरुषों की कि इन्हीं के वचनों की जूठन पाकर अपने हृदय में कुछ निष्ठा आती है।
[खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] नहीं तो यह शरीर राग हमें धाम निष्ठ गुरु निष्ठ नाम निष्ठ भगवत निष्ठ यह नहीं होने देता। इस शरीर संबंध ही भगवत संबंध दृढ़ नहीं होने देता। अनंत जन्मों से हम भटक रहे हैं इनहीं शरीरों के संबंध में। यह पत्नी, यह पुत्र, यह पिता, यह माता, यह रिश्ते, यह नाते, यह सामग्री, यह भोग, यह बैंक बैलेंस इसी का आश्रय लेकर हम भगवान से विमुख हो चुके हैं। कैसी अद्भुत निष्ठा छिदत खसा इदम यदि में शरीरम घोरा विपद वित यदिवा पतती यदि मेरे शरीर को पीड़ा पहुंचाई जाए वृंदावन में अस्त्र शस्त्रों के द्वारा छेदन भेदन किया जाए तो भी मैं कभी वृंदावन को नहीं छोड़ सकता।
यह बात समझनी चाहिए। बहुत बड़ी उपलब्धि है। बहुत बड़ा सौभाग्य है। यदि आपको यहां एक दिन भी वास करने को मिल जाए। फिर जिनको आजीवन वास मिल गया है। तो दुर्भाग्य है कि वो प्रिया प्रीतम का चिंतन नहीं करते हैं। सत्संग नहीं सुनते। श्री जी की लीलाओं का गायन चिंतन नहीं करते। व्यर्थ में समय नष्ट करते हैं। दिव्य कृपा हो गई वृंदावन वास की पर उसका लाभ नहीं ले पा रहे। वृंदावन बस के इतनो बो सयान जुगल चरण के भजन बिन निमिष न दीजे जान। पलक झपकने के समय को निमिष कहते हैं।
इतना भी समय प्रिया प्रीतम के भजन से अगर खाली गया तो हमारा दुर्भाग्य है, हानि है। विपत्ति है। अगर निरंतर हमारा स्मरण वृंदावन में चल रहा है तो वास्तविक तन मन के वन से अब वृंदावन वास हो रहा है। इसीलिए उपासकों से प्रार्थना करते हैं कि उठते बैठते चलते फिरते नाम जप करते रहो। प्रिया प्रीतम को मत भूलो। यह तुम्हारा बैंक बैलेंस तुम्हारे साथ नहीं जाएगा। यह तुम्हारी प्रवीणता संसार के व्यवहार किए नहीं जाएगी। यह तुम्हारा शरीर सुख या संपत्ति सुख यह तुम्हें प्रियालाल से वंचित कर देगा।
इसका भरोसा मत करो। यह मायाकृत है। भरोसा करो प्रभु का। भले सब कुछ बना रहे। उसका भरोसा मत करो। तो ये सब टिकाऊ नहीं है। परिवर्तनशील है। ये शरीर नाशवान है। इसको इतना प्यार मत करो कि प्रभु के प्यार का मार्ग ही छूट जाए। कैसा मंद बुद्धि हो जाती है उपासक की। ऐसा विचार हो जाता है कि वह शरीर पोषण के लिए इंद्रिय भोगों के लिए प्रभु को छोड़ देता है। धाम को छोड़ देता है। ऐसा है वो धाम को छोड़ देता है। प्रभु को छोड़ एक विषय एक इंद्री मन के साथ मिलकर ऐसी ठगाई की कि प्रभु से विमुख कर दिया।
धाम से विमुख कर दिया। गुरु से विमुख कर दिया। तभी कहा शपथ पूर्वक किस मार्ग में चलना चाहिए? हम तो आए नहीं हमें लाया गया है। यदि लाया गया है तो अब समझ में आया कि मेरे ऊपर कृपा हुई तो मैं शपथ खाता हूं कि अपने प्राण त्याग सकता हूं लेकिन अपना मार्ग नहीं पक्का। पर आजकल शपथ भी ऐसे ही खा ली जाती है। उसकी सत्यता उसका निर्वाह करना बहुत कठिन हो जाता है। प्रतिज्ञा शपथ ये सब में खवाई जाती है। अगर किसी भी डिपार्टमेंट में है तो उसको शपथ खवाई जाती है। आप यह गुप्त बात कभी किसी को नहीं बताएंगे।
आप ऐसे चलेंगे। आप राष्ट्र की रक्षा करेंगे। आप शपथ खाइए कि धर्म पूर्वक सत्य पूर्वक अपने राष्ट्र के लिए प्राण समर्पित करेंगे। आप तो परमार्थ के पथिक हैं। अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी के चरणारविंद के समीप परम पद प्राप्त करना है। तो आपको तो शपथ खानी ही होगी। क्यों? यदि शपथ पूर्वक नहीं चलोगे तो आपको माया भ्रष्ट कर देगी। शपथ पूर्वक चलने पर है कि गिरूंगा लड़खड़ा जाऊंगा लेकिन पैर से नहीं चल पाऊंगा तो घसिल के चलूंगा लेकिन चलूंगा प्रभु की तरफ ही अर्थात बिल्कुल योग्यता ना रह जाने पर भी हम प्रभु के ही मार्ग में रहेंगे हमको प्रभु से अब कोई अलग नहीं कर सकता ये निश्चय करो इसमें बहुत बड़ी सामर्थ्य है यदि हम परमार्थ को स्वीकार किया है चाहे गृहस्थ में में हो चाहे विरक्त में हो अब चाहे हमारे शरीर को काट दिया जाए तो भी अंतिम समय हम राधा ही बोलेंगे हमारे जीवन का उद्देश्य प्रभु ही है श्री धाम वृंदावन के वास की निष्ठा का परिचय दे रहे हैं ध्रुवदास जी खंड खंड होए जाए तन अंग अंग सत टूक वृंदावन नहीं छाड़ियो छाड़बो है बड़ी चूक बड़ी बड़ी चूक ये जो बाहर से भक्त जन आते हैं इनके ऊपर श्री जी की कृपा है।
पर आपका दुर्भाग्य हो जाएगा यदि इनसे आप घनिष्ठ अपनापन कर लिए। घनिष्ठ संबंध श्री जी से और श्री जी के संबंध से इनसे संबंध डायरेक्ट हमारा कोई संबंध नहीं होना चाहिए। श्री जी के नाते से है। श्री जी के संबंध से है। एक बहुत अच्छे ब्रजरज सेवी महात्मा इसी संबंध में चूक हो गए। कुछ लोग बाहर से आए। ऐसा कभी किसी को नहीं करना चाहिए। बाहर से आने वालों को। उनके 500 शुगर थी। बहुत अच्छे ब्रज रज उपसेवी और सरल स्वभाव संतों का हो जाता है क्योंकि हमारी स्वामिनी का स्वभाव है।
अत्यंत दयालु करुणामय सहज सरल किनहीं किन संतों का बाहरी स्वभाव नारियल की तरह होता है। नारियल ऊपर से कठोर होता है। वो अंदर से देखो तो बहुत मिठास वाली गरी होगी। उसमें मीठा जल होगा पर बाहर से कठोर रहता है। नीरस रहता है। यह स्वभाव होना ही चाहिए। निर्विकार परम पद की प्राप्ति के लिए हर साधक का स्वभाव इस नारियल की तरह होना चाहिए। बाहर से नीरस, जटिल, कठोर, अंदर से सुकोमल। अगर बाहर से सुकोमल हो गए तो मारे जाओगे। इस मार्ग में मारे जाओगे। बाहर से रुद्र दृष्टि हृदय ममता शून्य हृदय ममता निर्ममो निरहंकारा सम दुखा सुखा छमी श्री भगवान का आदेश है।
निर्ममो निरहंकारा यदि परम पद की तरफ कदम बढ़ा रहे हो तो सोच लो तुम्हारा मार्ग क्या है? निर्ममो निरहंकारा किसी से कोई ममता नहीं। वह आए और प्रार्थना की कि आपकी 500 शुगर है। यह किडनी फेल कर सकती है। यह दिल फेल कर सकती है। लीवर फेल अच्छा हमारे यहां बहुत डॉक्टर बढ़िया है। ले चलते हैं। 101 दिन सेवा करेंगे। आप स्वस्थ हो जाएंगे। फिर आ जाइए। दवा बन जाएगी। चलती रहेगी। उन्होंने स्वीकृति दे दी। वो नहीं वापस आए। वही शरीर पूरा हो गया। आप लोग बाहर से आते हैं वृंदावन लाभ लेने के लिए।
अगर आपको श्रद्धा है और कोई संत बीमार है तो यही उसकी व्यवस्था कीजिए। उसको मुंबई कोलकाता दिल्ली ले जाने की कोशिश मत कीजिए। उसने अपने जीवन को श्री धाम की रज में दिया है। कष्ट से पीड़ित होने के कारण प्रबल निष्ठा ना होने के कारण हो सकता है वो हामी भर दे तो आपको नहीं ले जाना है। वो कहे भी तो नहीं ले जाना है। नहीं महाराज हम यही व्यवस्था करेंगे आपकी। तब तो आपकी सेवा मानी गई। आप उनको धाम छुड़वा दिए तो कौन सी अमरवती पिला देंगे आप? क्या मृत्यु पर विजय आप दिला सकते हैं?
क्या श्री धाम वृंदावन दिला देगा? हां यह है कि रजोसेवी प्रियाल के चरणारविंद के कहीं भी शरीर छोड़े वो तो प्रिया प्रीतम में स्थित है पर वो लाभ जो हम लोग याचना करते हैं कि जय श्री भट्ट धूल धसर तन यह आशा उधार कुछ विशेषता है पक्का मानिया इस रज में शरीर छोड़ने की कुछ विशेषता है मान लोगे तो जान जाओगे तभी कह रहे खंड खंड होए जाए तन अंग अंग सत टू वृंदावन नहीं छाड़ियो छाड़बो है बड़ी चूक यहां कह रहे हैं छिदत खसा इदम यदि में शरीरम घरा विपद वितयो यदिवा पतती यदि धार वाले अस्त्र से भी मेरा शरीर काटा जाए तो मैं वृंदावन का कभी त्याग नहीं कर सकता कि भाई वृंदावन में तो बहुत दुख मिल रहा है।
अब तो चलते हैं यहां से। शपथ पूर्वक इसीलिए कहा है कि अगर शपथ पूर्वक नहीं रहोगे तो बड़ी विचित्र दशा है। हमारा धाम और धामी श्यामा श्याम बड़े कृपालु हैं। यदि आप जाना चाहते हो रोकेंगे नहीं और नहीं जाना चाहते हो तो कभी जाना नहीं पड़ेगा। किसी भी कार्य के लिए नहीं जाना पड़ेगा। ये अपने अनुभव की बात कह रहा हूं। किसी भी कार्य के लिए नहीं जाना। और आपने निश्चय किया है कि बाहर जाकर ही हमारा काम चलेगा तो पक्का बिना बाहर जाए आपका काम ही नहीं चल सकता और आपने निश्चय किया है कि श्री धाम वृंदावन नहीं छोडूंगा चाहे मर जाऊं तो हर व्यवस्था जो तुम बाहर से नहीं कर सकते घर बैठे हो जाएगी क्योंकि स्वामिनी जी के चरणों में स्वयं अनंत लोकों की सिद्धियां लुटती रहती है।
विश्वास, धैर्य, सहनशीलता यह चाहिए इस मार्ग में। अगर सहनशील नहीं हो, विश्वास नहीं है तो फिर आप टूट जाओगे। कितना कष्ट सो आपको विश्वास दिलाते हैं इस स्थान का विशेष प्रभाव है धाम का कि यहां विशेष कष्ट प्रभावित नहीं कर पाता। कलह कलेश न व्याप ठोर विश्व ते न्यारी यहां कष्ट भी आएगा तो बहुत सीमित रूप रखकर आएगा। वही बाहर जब आपके ऊपर प्रभाव डालेगा तो बड़ा भारी दुख होगा। प्रारब्ध भी आएगा तो शासित होकर आएगा प्रियाजु से वो स्वतंत्र रूप से आक्रमण नहीं कर पाएगा।
बाहर स्वतंत्र रूप से आक्रमण कर देगा। यदि घोर घोर विपत्तियां आकर हमको घेर ले तो भी हम वृंदावन नहीं छोड़ेंगे। यह शपथ पूर्वक रहना चाहिए। घोर विपद वितयो यदिवा पतती घोर विपत्ति आ जाए तो भी मैं अपनी निष्ठा से नहीं गिरूंगा। काट डाला जाऊं तो भी घोर विपत्तियां दुख आ जाए तो भी मैं श्री धाम वृंदावन को नहीं छोड़ने वाला। हा हंत हंत न तथाप भया वृंदावन तर तच्छ पदे विपाशा हाय हाय श्रीपाद कह रहे हाय हाय जो वृंदावन का वास मिला और उसे छोड़ के किसी भी लाभ के लिए बाहर जाते हैं तो हाय हाय हरि राम व्यास जी ने एक पद में लिखा है इतनी बड़ी कृपा हो गई और इसके बाद भी तुम वृंदावन का आश्रय वास का प्रभाव ना जानने के कारण अन्य आश्रय लेते हो अन्य सहारा लेते हो और यहां छोड़कर जाते हो तो मानो अपने सर पर पादुका चला रहे हो अच्छा स्वयं पतित पत्रकाव सुधा भक्षय तशा मिर नंदिनी सुच पयजली भी पिवन कदा मधुर राधिका रमण रास के स्थली बिलोक्य रस मग धीसाम वृंदावनम ये प्राय तैयारी की जाती है।
ध्यान रखना जैसे किसी को आर्मी में जाना है तो दौड़ भाग ये सब पहलवानी करना है तो दंड बैठक खानपान और युद्ध की कलाएं कुश्ती की कलाएं सीखता है। ऐसे ही हम भगवत मार्ग में चल रहे हैं। तो हमें पुष्ट भी होना है और युक्तियां भी सीखनी कि शत्रु को कैसे पराजित करना है। क्योंकि हमारे शत्रु अंतर में बैठे हुए हैं। हमारा एक भी शत्रु बाहर नहीं होना चाहिए। किसी से राग द्वेष नहीं। अंदर की वृत्ति से हमारी दुश्मनी है जो भगवत विमुख करने वाली है उसको पछाड़ना है तो कह रहे स्वयं पतित पत्रकारण्य मृत वत सुधा भक्षयन अगर वृंदावन में हमें भोजन नहीं मिला तो हम सूखे पत्ते खा के यहां अमृत के समान भोजन का भाव रख के प्राण त्याग देंगे लेकिन धाम नहीं छोड़ेंगे।
सूखे पत्ते खा के कि मानो मैं अमृत पा रहा हूं। ऐसी भावना से पर हम वृंदावन नहीं छोड़ सकते। ये अपने लोगों ने अभ्यास किया। जानबूझ के अभ्यास किया है। ऐसी वृत्ति धारण की गई कि अगर हमको भोजन ना मिले तो कई दिन तक हम भूखे रह सकते हैं और हमारे भजन में विक्षेप नहीं पड़ना चाहिए। और उसका अभ्यास पूरे जीवन चलाया गया। जब तक हम साधन पक्ष में हैं तब तक अभ्यास पूरा दृढ़ कर लेना चाहिए कि अगर हमें चार पांच दिन भोजन ना मिले तो हम भजन में विक्षेप ना पड़े ऐसा अभ्यास कर ले।
हम एकांत में बैठकर भजन करें। हम समाज में बैठकर भजन करें। हम बाजार में खड़े होकर भजन करें। हम यमुना के किनारे भजन हमारा भजन का अभ्यास कहीं भी हमें बाधा ना पहुंचा पावे। ऐसा होना चाहिए। कई कई दिन गंगा के तो एकांतिक था ही यही हित धाम में हित धाम तक चला है। जब ये डायलिसिस हो फिर अब हिम्मत नहीं है कि जैसे प्रभु चलावे अब वो तो प्रभु के ऊपर रह गया। डायलिसिस होने के बाद शरीर की दशा बदल जाती है। अब जैसे प्रभु चलावे वैसे हो गया। नहीं तो दरवाजा बंद। छोटी कुटिया में जब तक कोई नहीं जुड़ा था दरवाजा बंद।
अब यह दरवाजा तीन चार दिन के लिए बंद। बाहर से ताला लगवा दिया कि है नहीं जैसे कोई कि जल पान करके चुपचाप शांत चार दिन भगवदाकार वृत्ति करनी है। ये मौन किसी से मिलना नहीं। ब्रजवासी उनसे थोड़ी प्रियता रखते थे कि आप इतने बजे ताला खोल दीजिएगा। चाबी हम दे देंगे। तो शौच स्नान कर लिया। फिर अंदर हो गए। अपनी वृत्ति को भगवदाकार करना है। सब उपस्थित होने पर भोग भी हमको अपनी तैयारी करनी है। ये थोड़ी कि रोज हमें भोजन मिल रहा है। रोज व्यवस्था हो रही है। तो आप देखो आपको वो भजन नहीं हो रहा है।
जो हाय हाय वाला भजन होता है। भारी व्याकुलता वाला भजन होता है। कैसे भगवत प्राप्ति हो। चिल्ला चिल्ला के रोने का मन हो। वो इसलिए नहीं होता कि आप हर समय जब इंद्रियों के ही पोषण में लगे हुए हैं। तो भगवनंद की वृत्ति का पोषण कैसे होगा? उसके लिए तो थोड़ा तैयारी करनी पड़ती है, अभ्यास करना पड़ता है, जलना पड़ता है, भूखे रहना पड़ता है, कष्ट सहना पड़ता है। सच्ची मानिए अभ्यास में बहुत बड़ी ताकत है। आपका शरीर स्वस्थ है। आप इस समय कस सकते हैं अपने आप को। तीन घंटे विश्राम इसके बाद आप कुछ समय आसनों में हर समय सेवा में नींद को उड़ा दो भोजन की एक सीमा रख लो बातचीत के लिए मौन रह जाओ उचित शरीर पोषण की व्यवस्था बस नाम पर दृष्टि दो नहीं खानपान ते भावे है नहीं कोमल वन सुभावे है सब विषय लगे ते खारा है हरि आसिक का मग न्यारा जब वृत्ति भगवदाकार होती है और ये होता है अब भोजन पाने जाना है तो ऐसा लगता है जिसे सजा दी जा रही हो हमारी वृत्ति डूब रही है अब इसके लिए हमें भागे कभी तो डूबना सीखो अभ्यास करके कभी तो ऐसे आओ कि 10 पांच मिनट के लिए शरीर भूल जाओ 10 पांच मिनट के लिए जगत भूल जाओ केवल प्रिया प्रीतम के चिंतन में वो ऐसे नहीं होता कि टाइम बाय टाइम भोजन साधक की दिनचर्या 12 महीने राइट टाइम से पहले हर चेष्टा आपको दिखाई देगी।
अगर यहां खड़े होना है 6:00 बजे खड़े हो तो पांच मिनट पहले से खड़ा है। उसकी दिनचर्या में चूक नहीं हो सकती। वही साधक वही संयमी और जो अपनी दिनचर्या को संभाल नहीं पाता तो वो अपने आप को संभाल नहीं सकता। कागज में लिख लो चाहे दिमाग में लिख लो। जब तक साधक की दिनचर्या नहीं। हम गृहस्ती में देखें ऐसे ऐसे साधक की त्रिकाल संध्या करते हैं। जब पीछे गुरु आश्रम में थे 20ों सुबह 4:00 बजे तड़के के आकर के स्नान करके संध्या गृहस्ती में रहते हल जोतने वाले लोग अगर हमारी दिनचर्या भगवत मार्ग की है तो उसे कहीं भी की जा सकती है।
कैसे भी की जा सकती है। यह बहुत प्रवचन नहीं यह आप समझ लीजिए। आपको अपने आप को कसना होगा। सैकड़ों बार प्रार्थना की है कि चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त हो व्यायाम अत्यंत आवश्यक है। जैसे भोजन पाना आवश्यक है ऐसे व्यायाम आवश्यक है। भगवत प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है व्यायाम क्योंकि आपका शरीर स्वस्थ रहना अनिवार्य है। प्राणायाम अत्यंत आवश्यक है। 10 मिनट 15 मिनट बैठकर के प्राणायाम दो-तीन प्रकार के सहज प्राणायाम की वृत्तियां बताइए। कौन कर रहा है? सहज बताइए।
कुछ हाथ लगाने की जरूरत नहीं। नाक में यह अनुभव की वो की हुई बात कर रहे हैं। आराम से बैठ गए। धीरे से श्वास खींचते चले गए। दोनों नाक से जितनी जा रहे बंद कर ली। अब मंत्र जप रहे हैं। फिर धीरे से छोड़ दी। कोई पकड़ना नहीं। फिर खींचा फिर बंद कर ली। इसे आंतरिक कुंभक कहते हैं। एकदम खाली कर दिया। रोक दिया। मंत्र जप रहे हैं। [गहरी सांस लेने की आवाज़][नाक से की जाने वाली आवाज़] फिर खाली कर फिर मंत्र इसे वाह कुंभक कहते हैं। हर आंत फेफड़ा हर नस नाड़ी एक्टिव हो जाएगी।
आप क्या समझते हो? यह लोहे की मशीनें थोड़ी लगी है। यहां उनको प्राणायाम के द्वारा एक्टिव किया जाता है। आपका शरीर स्वस्थ, आपके विचार स्वस्थ और ब्रह्मचर्य के लिए 45 मिनट पसीना गिरने वाला व्यायाम अत्यंत आवश्यक है। कोई नहीं करने के लिए तैयार है। कैसे तुम ब्रह्मचर्य रह सकते हो। कैसे तुम बिना प्राणवायु का संशोधन किए एकाग्र रह सकते हो। ऐसा नहीं कि हम प्रेम मार्ग में हैं तो हमें प्राणवायु के संशोधन की आवश्यकता नहीं। नहीं। हमने पूज्य गुरुदेव भगवान को देखा अटारी में जाकर के एकांत में बैठकर वो प्राणवायु का संशोधन कर रहे हैं।
हमने बुजुर्ग संतों को देखा जिनकी 80 वर्ष की अवस्था है। व्यायाम पांच मिनट 10 मिनट हाथ पैर हिला रहे हैं। व्यायाम कर और व्यायाम का एक प्रक्रिया है। आपने पांच दिन व्यायाम किया तो आपके शरीर दर्द होंगे। क्योंकि उनको थकित किया जा रहा है। अब 8 10 दिन में फिर रवा हो जाएंगे। आप करते रहिए। अब दर्द नहीं होगा। पांच दिन किया दर्द शुरू हुआ। बंद कर दिया और दर्द शुरू हुआ। आपका व्यायाम का अनुभव ही नहीं होगा कि वो यही लगेगा कि उससे तो दर्द होता है। नहीं। ऐसे संयमी साधक थोड़ी माना जाता है।
कई मिनट सर के बल खड़े होते थे। हर समय इसको तैयार करके साधन में लगाए रहते हैं। आप लोग देख रहे हैं आप लोगों का शरीर स्वस्थ है। आप कैसे ब्रह्मचारी? कैसे आप संयमी? कैसे आप एकाग्रचित हो पाएंगे? बोले हमारे पास समय नहीं। कई बजे आप जगते हैं। उससे एक घंटा पहले जगिए। आप मध्यान में थोड़ा विश्राम कर लीजिए या जब आपको समय मिले तब आप विश्राम कर लीजिए। थोड़ा अपनी दिनचर्या के अनुसार। लेकिन रात्रि हमारी साधना का समय है। अधिक से अधिक हम जप करके प्राणायाम व्यायाम करके अपने साधन भजन में लगे।
साधन का मतलब होता है एक बार जिद्दी स्वभाव बनाकर हर इंद्र पर विजय प्राप्त करके आगे बढ़े। हां हमको उतना व्यायाम प्राणायाम करना है जो हमारी भक्ति में बाधा ना पहुंचा दे। वह भी आज्ञा के अनुसार जितना कहा जाए उतना ही क्योंकि प्राणवायु का संशोधन करने की यदि प्रक्रिया नहीं पता है और उल्टा सीधा पढ़ के प्राणवायु तो वो आपको रोग पैदा कर देगी। हम इसीलिए प्राणायाम पद्धति नहीं कह रहे केवल बाह्य कुंभक आंतरिक कुंभक या अनुलोम विलोम इससे कोई हानि नहीं होने वाली। लेकिन रेचक कुंभक पूरक उसकी प्रक्रिया है।
वो ऐसा नहीं कि केवल ऐसे खींच करके किया जरूर करना चाहिए। यह शस का संशोधन प्राण का संशोधन शरीर की नस नाड़ियों का व्यायाम के द्वारा तो ब्रह्मचर्य पुष्ट यदि आप ऐसा नहीं करते तो ब्रह्मचर्य रह ही नहीं सकते ब्रह्मचर्य रहने के लिए शरीर को बहुत एक्टिव करना होता बहुत एक्टिव और उसमें खुद इतनी बिजली होती है वो बैठ ही नहीं सकता शांति से कठोर आसनों में बैठना स्वभाव बन जाता है उसका तब जाकर के ब्रह्म प्राप्ति के लिए उधगामी चित्त वृत्ति होती है। मुझे केवल भगवत साक्षात्कार चाहिए।
सिंह स्वभाव साधक का होता है। एक प्रवचन नहीं कर रहे हैं। ये हृदय की बात कह रहे हैं। हर कष्ट को सहकर सिंह यहां क्या सर्दी लगेगी तुम लोगों को कमरे में खुले में गंगा के किनारे जब ऐसी कि शरीर में केवल सर्दी ही सर्दी व्याप्त हो रही है। लग रहा है कि अब नहीं संभलेगा तो गंगा जी में जा खड़े हो गए। गंगा उल्टा उसके खिलाफ गंगा जी का काफी जल जैसे प्रवाहित हो रहा है यह तो रोज का अनुभव था हाथ डेढ़ हाथ जो जल है वो भीषण ठंडा होगा फिर उसके नीचे थोड़ा सा जाग खड़े हो गए मंत्र जाप कर रहे फिर गंगा जी ने पावर दी फिर बाहर निकले फिर चले पूरा जीवन एक युद्ध है आज भी एक युद्ध है ऐसे थोड़ी ये सुख प्राप्ति लौकिक सुख के लिए नहीं ये अध्यात्म सुख के लिए है।
कितनी बड़ी बात कह मेरा शरीर काट दिया जाए, भारी विपत्तियां आ जाए तब भी मैं अपने मार्ग को नहीं छोड़ने वाला। अपनी निष्ठा को नहीं छोड़ने वाला। स्वयं पतित हुआ, गिरा हुआ, पत्ता खाकर के मैं जी लूंगा लेकिन अपनी निष्ठा नहीं छोडूंगा। ये हमारी निष्ठा कितनी है जरा विचार करके देखो कितनी है। त्रिशाहि नंदिनी सुच पयंजली भी पवन अगर प्यास लगेगी तो उसे जल से बुझा देंगे। गंगाजल में बड़ी सामर्थ्य रही है। अब का तो हमें पता नहीं लगभग 25 26 वर्ष हो गए वृंदावन की निष्ठा का जो स्वरूप गुरुदेव और रजरानी की कृपा से आया पालन हो रहा है।
आगे श्री जी जाने गंगाजल के पान करते ही जैसे मां का दूध पान करते बालक को भोजन की आवश्यकता नहीं होती। छोटे बालक को ऐसे ही गंगा जी दुलार करती थी। गंगा जी में कभी हमें नदी भाव नहीं आया। कभी जल भाव नहीं आया। बस यही लगता था मां और मां का अमृत। अंधेरे पर जाकर जब गले से खड़े हो जाते तो कभी-कभी मन कहता मगरमच्छ ना जाए तो कहते उसके ऊपर हमारी मां भी विराजमान होंगी। मगरमच्छ सवारी है गंगा मैया की। तू चिंता क्यों करता है? जब गंगा जी है तो तेरे को क्या चिंता? खड़े हुए मंत्र जप कर रहे निष्ठाएं ऐसे थोड़ी परिपक्व होती है।
हर सुविधा प्राप्त हो गई। कभी अपने को कसने की कोशिश नहीं कर रहे तो मन तुमको कस रहा है। आज ये मिल जाता तो अच्छा। तो कभी एकांत में रो के बोले कि आज श्री जी मिल जाती तो अच्छा। जीवन की यात्रा पूर्ण हो जाती। का आज कहीं श्याम सुंदर मिल जाते। कहीं लाडली लाल मिल जाते। कभी ऐसी आकांक्षा बड़ा दुख होता है हृदय में कि साधक आकांक्षा विषयों की करता है, वस्तुओं की करता है। वो प्रियालाल की क्यों नहीं करता है? क्या प्रियाल को तुमने अपना नहीं माना है? क्या जगत के भोग तुम्हारी सुख सामग्री है?
कैसे तुम साधक हो? कैसे तुम भगवत मार्ग के पथिक हो? कदा मधुर राधिका रमण रास केल स्थली विलोक्य रस मग धी रधिवसाम वृंदावनम मेरी ऐसी वृत्ति कब होगी कि मैं वृंदावन को देख देख कर रोऊंगा कि यह वही स्थान है जहां हमारे प्रिया प्रीतम रह रहे हैं और खेल रहे हैं और मेरे नेत्र देख नहीं पा रहे हैं कब ऐसा वृंदावन कृपा करेगा कि मैं देख के मगन हूं कि मेरे प्रिया प्रीतम कैसे रास कर रहे मेरे प्रिया प्रीतम कैसे वन विहार कर रहे मेरे प्रिया प्रीतम कैसे झूला झूल रहे मेरे प्रिया प्रीतम कैसे जल विहार कर रहे नौका विहार कर रहे साक्षात पुर श्री पुरुषोत्तमा सेवा रसाद को शखा संदे वृंदा विपिने दृष्ट राधा राधा प्रियव साक्षी पुरुषोत्तम भगवान वासुदेव देवकी नंदन का निरंतर सानिध्य प्राप्त करके भी जिनको प्रेम का परिचय प्राप्त नहीं हो पाया और वह जब वृंदावन की रज में आए तो बिना किसी साधन के प्रेम प्राप्त हो गया।
इसके साक्षी उद्धव जी हैं। श्रीपाद कह रहे हैं कोई उनको साधन नहीं करना पड़ा। गोपी जनों के दर्शन संभाषण चरण धूल इसका स्पर्श होते ही प्रेम का प्रादुर्भाव हो गया। क्योंकि तैयार भूमि थी। भूमि तैयार थी। बीज के अंकुरण में देर नहीं लगी। अपने लोगों के ऊपर कृपा है। उसी रज में बैठे हैं। उसी रज में वास करते हैं। पर भूमि तैयार नहीं है। रोज सत्संग हो रहा है तो मानो किसान जैसे अपनी खेती को जोत करके उसे तैयार करता है ऐसे मानो सत्संग आपके हृदय की भूमि को तैयार ये जो शपथ पूर्वक चलिए ये भूमि तैयार की जा रही है लेकिन आप देखिए कहां साधक भूमि तैयार कर पाता है अपने हृदय की जहां थोड़ी सी प्रतिकूलता की छाया भी आई कि भाग खड़ा हुआ प्रतिकूलता ता नहीं आई अभी प्रतिकूलता तो जानते नहीं प्रतिकूलता की छाया आई कि भाग खड़ा हुआ जो राधा प्रिय इस वृंदावन में वास स्वीकार करके रहने से रहता है तो बिना किसी अन्य साधन के उसके हृदय में प्रेम प्रवाहित हो जाता है।
इस बात के साक्षी हैं उद्धव जी कोई साधन नहीं हुआ जब वृंदावन आए तो इस रज की कृपा से ऐसे महा प्रेमी हुए भगवान की कृपा से आज भी गिरिराज जी की तलहटी में वह अव्यक्त रूप से विराजमान रहते हैं। कभी तलहटी नहीं छोड़ते। प्रकट में बद्री बन गए। लेकिन अप्रकट में यही रहते हैं गिरिराज जी की दलहटी में उद्धव कुंड परिक्रमा मार्ग में मिलता है। उसी क्षेत्र में श्री उद्धव जी महाराज विराजमान रहते हैं। हमारे हृदय में यह अनुभव होना चाहिए कि हमारे ऊपर प्रभु की विशेष कृपा है।
बस उस कृपा का अवगन कभी दिव्यता की तरफ सोचिए। अपनी इंद्रियां और मन ये पार्थिव भोगों की तरफ ही सोचता रहता है। कोई पार्थिव व्यक्ति अनुकूल हो जाए तो हम नाच पड़ते हैं। प्रियाल तुम्हें प्यार कर रहे हैं। तुम्हें नहीं दिखाई दे रहा। तुम्हारी समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हें श्यामा से हम प्यार कर रहे हैं। इतना प्यार कर रहे हैं। हम मांग कर रहे हैं पार्थिव व्यक्ति के प्यार की। कोई प्रगट में मनुष्य हमें प्यार करें। हम मांग कर रहे हैं इंद्रियों के भोगों की। सच्चिदानंद सुख देने के लिए हरि गुरु तैयार है।
हमें वो नहीं चाहिए। यही दुर्भाग्य है हमारा। उपासक सावधान बहुत जन्म भोग भोग चुके हो। बहुत जन्म तुम किसी ना किसी के होते रहे हो। इस बार केवल श्री जी के इस शरीर को धरोहर की तरह हरि गुरु को समर्पित कर दो। यह आपकी वस्तु है। इस पर अब मेरा कोई अधिकार नहीं। तो हरि गुरु आपको समर्पित कर देंगे। लो हमारा संपूर्ण वैभव आपका है। आप करके तो देखो बड़ा सस्ता सौदा है। शरीर तो तुम माया में कितनी बार समर्पित कर चुके हो। एक बार मायाधीश प्रभु श्री जुगल सरकार को अपना जीवन समर्पित करके तो देखो।
पूज्यपाद श्री उड़िया बाबा जी महाराज भगवत प्राप्ति का मार्ग अनुगमन का मार्ग है। बड़े महापुरुष के शब्द हैं। एक एक शब्द पर ध्यान दीजिए। भगवत प्राप्ति का मार्ग अनुगमन का मार्ग है। अनुगमन किसी आदर्श महापुरुष को अपना स्वामी बनाकर उनका अनुगमन करना। तभी आप भगवत प्राप्ति कर सकते हैं जब किसी भगवत प्राप्त महात्मा को अपना आदर्श मानकर आगे बढ़ा जाए। यह वाणी हमारा जीवन रही है। पूज्यपाद उड़िया बाबा जी के उपदेश यह बाल्यावस्था से हमारी गुरु रही है। बाबा आदर्श रहे हैं।
आज भी जो बाबा का स्थान था है। है रहेगा आजीवन। ऐसा नहीं होता है कि छूट जाए। जागृत में, स्वप्न में, सुशुप्त में कई बार पूज्य बाबा की कृपा हुई है। जब तन्मयता होती, पिता की तरह उड़िया बाबा ने दुलार किया है। यह हमारे केवल लिखा पढ़ी का विषय नहीं है। जब हम अपना मान लेते हैं तो ये अव्यक्त महापुरुष अव्यक्त नहीं रहते। ये अनुभव कराते हैं क्योंकि ब्रह्म स्वरूप व्याप्त है। जैसे कोई कण ऐसा नहीं जहां ब्रह्म ना हो। अर्थात वो कण भी ब्रह्म ही है। सर्वम खलमिदम ब्रह्म ने नानास्त किंचन ऐसे ही पूज्य बाबा हर कण में विराजमान क्योंकि ब्रह्म स्वरूप हुए।
जब हम किसी महापुरुष को आदर्श मानते हैं व्यक्त या व्यक्त तब उसकी महिमा हमारे हृदय में प्रकाशित होती है। अभी तो हमारा आदर्श विषय है। धन है। परिवार है तो वही तुम्हारे सामने अनुभव में आएगा। तुम्हारे जागृत में, स्वप्न में, सुशुप्त में जब कोई दिव्य महापुरुष होता है तो दिव्य अनुभव आएंगे। यह मार्ग अनुगमन का है। किसी महापुरुष का अनुगमन किया जाता है। अनुगमन का तात्पर्य होता है उनकी आज्ञा के अनुसार चलना। अपने जीवन को किसी महापुरुष की आज्ञा पर दे दो। आप जैसा कहेंगे।
सेवक जी महाराज कह रहे हैं। अब जो कहें करें हम सोई आयस लिए चले निज दासी। बिना आज्ञा के एक कदम भी नहीं चाहे वो परमार्थ का हो चाहे व्यवहार का हो वो प्रेम रस को प्राप्त कर लेता है। भगवान की माया बड़ी प्रबल है। यदि किसी महापुरुष का अनुगमन नहीं किया तो आप इस मार्ग पर चल नहीं पाएंगे। सत्संग सुना गया। सत्संग में ऐसा समझ लो बाजार है। बाजार या मेडिकल स्टोल है। दोनों बातें समझ सकते हो। बाजार है ये सांख्य मार्ग भक्ति मार्ग कर्म योग हरि योग की चर्चा होगी। यहां आपको हरि योग की बातें सुननी है।
केवल आपको अपने हृदय महापुरुष के हृदय की बात समझनी है। महापुरुष ने सब रस गायो देखनो यो है कि उनको ह का ठहरानो ताको गहनो उसको पकड़ो। अब उस जैसे किसी ने भगवत आश्रय तत्व में गुरु कृपा से अपनी निष्ठा प्राप्त की कि हम तो भगवत आश्रित हैं। तो चाहे जितनी बड़ी-बड़ी बात हो सुन लीजिए। आपको अंदर से यही होना चाहिए। हमारे माई श्यामा और राज वो आपके अंदर सवाल नहीं पैदा होना चाहिए। क्योंकि सत्संग है। इसमें हर योग का वर्णन होगा। हर सिद्धांत का वर्णन होगा। भगवान मायापति हैं।
इनकी माया बड़ी विचित्र है। सब मायादास हैं। हरिदास तो कोई बिरला ही बनता है। जो हरिदास होता है उसके पीछे माया चलती है। और जो मायादास होता है उसके आगे माया होती है। कभी पकड़ में ही नहीं आती। किसी एक ने लिखा था कि संसार में अगर कोई सुखी है विनोद जो कटाक्ष का तो संत जन सुखी है। वास्तविक धन्य है तेरी बात। अगर सुखी है तो संत सुखी हैं। जिनके हृदय में भगवान का आश्रय है उनके पीछे माया चलती है। बाबा वर्णन कर रहे हैं। भगवान मायापति है। लगभग सब मायादास है। कोई हरिदास होता है।
जो हरिदास होता है उसके पीछे माया चलती है। और जो मायादास होता है उसके आगे माया चलती है। क्योंकि स्वामी आगे चलेगा ना तो पकड़ में नहीं आती कभी। हरिदास के आगे हरि होते हैं। पीछे माया होती है। मंगल ही मंगल है। हर व्यवस्था माया करती जाती है। और संकट निवत्त करके परम मंगल हरि आगे चल रहे हैं। भगवान की शरण लिए बिना माया को ना कोई पकड़ सका है ना इससे बच सका है। मायापति कोई नहीं बन पाया आज तक। इसलिए माया की शरण नहीं हरि की शरण लो। और किसी हरिदास का अनुकरण करो।
जो हरि की शरण में है उसका उनके आचरण उनके उपदेश वो अनुगमन आपको हरि के प्रेम में पहुंचा देगा। जब उपासक पूज्य बाबा रास्ते में आए हुए भय और प्रलोभन को स्वीकार नहीं करता। कदम नहीं लड़खड़ाता। तब उसके अंदर यह 33 गुण प्रकाशित हो जाते हैं। यह जिसके अंदर है वो भगवान अजीत को अपने अधीन कर लेता है। जब किसी का सही मार्ग तय होने लगता है तो दो बातें उसको गिराती है। भय या प्रलोभन जो भय से भी नहीं लड़खड़ाता प्रलोभन से भी नहीं रुकता। उसमें 33 भागवतिक सद्गुण प्रकाशित हो जाते हैं।
पहला अहिंसा मन वचन कर्म से भी कभी वो किसी की हिंसा नहीं करेगा ना मन से ना वचन से ना कर्म से धर्म का अलग-अलग उपदेश है। स्थान व्यक्ति योग्यता अधिकार के अनुसार अहिंसा हमारे लिए है। हम निवृत्ति मार्ग के हैं। आप एक वीर योद्धा हैं राष्ट्र रक्षा के लिए तो आपके लिए कठोरता चाहिए हृदय में। यदि आप दयालुता धारण करेंगे तो हमारा राष्ट्र संकट में पड़ जाएगा। आपके लिए माला चलाना नहीं आपके लिए गोली चलाना भजन है। आप अपने धर्म से युक्त रहिए। अर्जुन जी कह रहे मैं सन्यास लेकर भिक्षा मांग कर खा लूंगा।
युद्ध नहीं करूंगा। भगवान कह रहे गलत पर धर्म भयाभा स्वधर्म का पालन कर इस समय नहीं भय को प्राप्त हो जाएगा। यह परमार्थ के पथ पर जो भगवत प्राप्ति के मार्ग में चला है जिसको भगवान ने यह मार्ग दिया है उसके लिए पहला सद्गुण अहिंसा मन से वचन से कर्म से किसी की हिंसा नहीं करना हिंसा और अहिंसा का निर्णय स्थान अवसर धर्म की स्थिति के अनुसार दिया जाता है ना कि सार्वभौम सार्वभौम अहिंसा का सिद्धांत नहीं चलेगा हमारे धर्म का नाश करने आ रहे हो। हम अहिंसा व्रत लेकर बैठे।
हमारी मर्यादा हमारे राष्ट्र हमारे धर्म का नाश करने जा रहा है। तो इस समय हिंसा ही अहिंसा से बढ़कर के भी है। ये समझना होगा। इसलिए बहुत विवेक परमार्थ में चाहिए। जो निवृत्ति परक साधक हैं उनके हृदय में अहिंसा धर्म का प्रादुर्भाव होता है और अहिंसा धर्म भी अपना रूप अलग धारण करता है। जैसे वेन राजा ने भगवान के विरुद्ध आचरणों की स्थापना करनी चाही तो संतों ने जो अहिंसा व्रत के परम पुजारी उन्होंने उसकी हिंसा कर दी क्योंकि उस समय हिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है और उसके शरीर से फिर मत कर भगवान प्रथु को प्रकट किया ये बड़ा सूक्ष्म विषय धर्म बड़ा सूक्ष्म विषय है दूसरा सत्य मन से जो सोचा गया वाणी से वही बोला गया आचरण में वही किया गया उसे सत्यवादी कहते हैं।
सत्य वचन में जरूर होना चाहिए। तीसरा अस्तेह चोरी ना करना। कभी भी किसी की चोरी ना करना यह भगवान के भक्त में आ जाता है। चौथा ब्रह्मचर्य अगर गृहस्थ है तो संयम के अनुसार ब्रह्मचर्य एक नियत समय के अनुसार ब्रह्मचर्य विरक्त है तो आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य ये लक्षण प्रकट हो जाता है। पांचवा अपशु कभी किसी की चुगली ना करना। यह साधक ध्यान दे कभी किसी की चुगली ना करना कैसे तुम सुना उसने ऐसा ऐसा ऐसा आग लगा दी फिर उसकी बात तुम्हें सुना जिसकी बात थी वो तो ऐसा कह रहा है दोनों को भिड़ा दिया मुस्कुरा के चल दिया तो तुमको ऐसी जगह भिड़ाया जाएगा जहां मुस्कुरा ही नहीं पाओगे क्योंकि वो देख रहा है तीसरा कोई देख रहा है वो ऐसी जगह भिड़ाएगा कि तुम्हारी महीनों की मुस्कुराहट गायब हो जाएगी होश में।
नहीं किसी की भी चर्चा नहीं करनी। इनकी बात उनसे कहना, उनकी बात उनसे कहना इसे चुगली कहते हैं। शास्त्री भाषा में अपशु नहीं करना। ये हृदय को मलिन कर देता है। किसी की वार्ता नहीं। कभी श्री जी की वार्ता चार खड़े होकर करो। बोध हंता परस्पर लाडली जी का ऐसा स्वभाव ऐसी सुंदर ऐसी तो छाती ठंडी हो जाए कभी श्री जी की चर्चा नहीं सुनते आपस में जब दो मिलेंगे तो चर्चा होगी तो प्रपंच की होगी वो साधक नहीं प्रपंच ही कहा जाता है अरे जैसे हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल को खायो यह ज श्याम श्यामा पद कमल संग सिरनायो छठवा है लज्जा लज्जा कहते हैं पाप कर्म करने में बहुत संकुचित हो जाना।
नहीं मन से ही घृणा हो जाना। नहीं नहीं नहीं हमें नहीं चाहिए। हम प्रभु के मार्ग के प्रतीक हैं। सातवा अमान्यता ये लक्षण उदय होते हैं। मान की बिल्कुल चाह ना रह जाना। और यह बहुत खतरनाक है। बहुत खतरनाक। सबसे पहला लक्षण है ब्रह्म बोध महापुरुष का मान रहित होना। निर्माण अमोहा जित संग दोष मान सब मान प्रद आपमानी मान कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए महापुरुषों को देखो आज भी गुरुदेव भगवान आरती करके सबको पंचांग प्रणाम करते हैं। सबको पंचांग प्रणाम करते हैं। अपने लोग गुरु जी आचार्य चरण सर् वस्तु तक्ष परम स्वराध्य बुद्ध मम क्वाह तच्छा परम अधमा आचार्य चरण क्या कह रहे तच्छा परम अधमा सबको प्रणाम कर रहे हैं गुरुदेव सबको प्रणाम कर रहे तो हमको शिक्षा लेनी चाहिए अमानी ना मान देन सब मान प्रद आप अमानी ये अमानता ये सातवा लक्षण उपासक के अंदर अंदर जागृत होता है।
आठवा पवित्रता, शरीर पवित्र, वस्त्र पवित्र, चिंतन पवित्र, व्यवहार पवित्र, छल कपट से व्यवहार दूषित हो जाता है। अरे बहुत बहुत अगर आप भगवत मार्ग में तो कभी ऐसा मत करना क्योंकि जिससे कर रहे हो और आप उसके बीच में ईश्वर विराजमान है। उसी की आराधना के मार्ग में तो चले हो। पवित्रता शरीर पवित्र हो और वस्त्र पवित्र हो। ये आपका लोग शंका मल त्याग आदि बहुत सावधानी से पवित्रता का निर्वाह करोगे तो शरीर राग का नाश हो जाएगा। ध्यान रखना जितना पवित्र रहोगे उतना ही शरीर राग का नाश होगा।
ये उल्टा लक्षण है। शरीर को पवित्र रखना शरीर राग का नाश। शरीर को अपवित्र रखना अत्यंत ममता आसक्ति शरीर से हो जाएगी। देखो इसीलिए अत्यंत ममता आसक्ति शरीर से है। नवा संतोष जैसी परिस्थिति प्रभु ने दी उसमें राजी रहना। जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे। कोई चाह ना रखना। ये संतोष धन है। इसी से सारी कामनाएं नष्ट हो जाती है। बिन संतोष न काम न साही और अछत काम सुख सपनो ना। बिना संतोष के कामनाओं का नाश नहीं होता। तो उपासक के हृदय में संतोष आ जाता है। जैसा प्रभु ने दिया।
आज सब्जी भी नहीं है। प्रभु की बड़ी कृपा है। रोटी अकेले पा ली। आज रोटी भी नहीं है। जल से काम चला लिया। किसी संत से किसी ने पूछा कि प्रसाद पाया तो उन्होंने कहा नहीं माधुकरी नहीं मिली। फिर क्या पाया? बोले पा लिया है। क्या पाया? बोले भूख को पा लिया है। आज प्रभु की इच्छा है ऐसे भूख को पा लिया है। संतोष काहु सो कछु ना चाहो संतोष दसवा ततीक्षा महान सहनशील दूसरे के कट वचन शरीर की पीड़ा ऋतुओं का प्रभाव अंदर की जलन संतुष्ट केनवा तितक्षा ये महान लक्षण है भगवत प्राप्ति के मार्ग के पथिक का जरा सी बात में विक्षिप्त हो जाना चिड़चिड़ा स्वभाव कर लेना नाना प्रकार की असत वृत्तियों में दौड़ जाना यह साधक का स्वभाव नहीं होता।
बड़े से बड़े कष्ट को हंसकर सहना। बड़े से बड़ी विपरीत परिस्थिति को मुस्कुरा के सहना। ये भगवान के पार्षद का लक्षण होता है। आप भगवान के पार्षद हैं। भगवत मार्ग के पथिक चाहे गृहस्ती हो चाहे विरक्ति 11वा निष्कपटता संत सरल चित जगत हित जान स्वभाव सने संतों का स्वभाव उनका स्नेह उनके चित्त की स्थिति सरल होती है। कपट नहीं निष्कपटता उनके हृदय में जागृत हो जाती है। 12वा संत संग में अत्यंत गाढ़ प्रेम आसक्ति यह पैदा हो भगवत कृपा पात्र के अंदर बारवा संत संग सत्संग भागम भाग मच जाएगा कैसे मैं सत्संग में आगे बैठूं जिससे मैं वक्ता के मुखारविंद पर चातक की तरह दृष्टि रख के उनके वाक्यों का पान स्वाति की बूंद की तरह करूं।
सच्चे सुरता का लक्षण मैं भाग कर जाऊं और उनको देखता रहूं और उनके वाक्य जो निकल रहे हैं उनका पान करूं श्रवण इंद्री के द्वारा तेवा संत सेवा की भूख ये प्रकट हो जाती है पक्का मैं साधु हूं ऐसा नहीं रहता यही रहता है भगवान कब ऐसी कृपा करेंगे कि संत सेवा हो जाए एक साधक कह रहे थे कि जब संत सेवा होती है उनके दर्शन सेवा को अवसर मिलता है तो ऐसा लगता है कि ये कभी बंद ना हो और जीवन भर मुझे साधु सेवा मिलती रहे। बहुत अच्छा लगा कि हम लोग जब उनकी सेवा में खड़े होते हैं तो एक अलौकिक आनंद मिलता है।
संत संत सेवा की भूख जग जाना। बड़े भावुक जन होते हैं। बड़े भावुक जन होते हैं। इससे बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है। बहुत बड़ा हृदय में प्रभाव पड़ता है। एक संत थे जिन जो कभी सेवा स्वीकार नहीं करते थे तो बाहर उस समय सोच जाने को होता था। तो जहां वो बाहर सोच जाते थे थे। एक भगत थे वो कभी शिष्य नहीं बनाते थे। संत तो कैसे सेवा करें? कहीं कुटिया में सेवा को तो अवसर ही नहीं था। तो जब शौच हो जाते तो शौच को गड्ढा खोद करके ऊपर से रथ से फाड़ देते तो पहले जिस एरिया में सोच जाते थे तो उनको दिखाई देती थी पड़ी साफसाफ एकदम ऐसे महीनों हो गया तो एक दिन छुप करके देखा तो नजदीक गए कहा भाई ऐसी ये वृत्ति आप करते हो मुझे पसंद नहीं आप क्यों करते हो कहा भगवान मुझे लगा था कि संत सेवा करना चाहिए आप प्रगट में कोई वही उनहीं को शिष्य बनाया और अपनी सारी आंतरिक धरोहर उनको सेवा से बहुत पर सेवा ऐसी छुप कर या कोई जान ना पावे या उसको जलाने की चेष्टा ना हो उससे मान सम्मान प्रियता प्राप्त करने की इच्छा ना हो यह सेवा का भाव बड़ी कृपा से प्राप्त होता है।
संदीपनी जी अपने गुरु जी की सेवा के प्रताप से ही जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण के गुरु बनने का पद प्राप्त किया। सेवा में बड़ी सामर्थ है। स्वयं रघुनाथ जी गुरु सेवा संत सेवा के इतने इच्छुक कि विश्वामित्र जी की आज्ञा में रहे। उनके साथ साथ रहे। उनके चरण दबाए। उनके जिनकी आज्ञा का पालन समस्त वैदिक ब्रह्म ऋषि सिद्धांत पूर्वक करते हैं। वह प्रभु आज्ञा पालन कर रहे हैं। विश्वामित्र जी की हर कदम पर आज्ञा लेकर जा रहे हैं। 14वा तप तप कहते हैं मन में आए हुए विकारों को सह जाना उसके अनुसार भोग क्रिया ना करना वह जो ताप होता है उसे सह जाना तप कहते हैं।
अपने परमार्थ मार्ग में चलने में जो कष्ट मिलता है उसको हंस के सह जाना उसे तप कहते हैं। जैसे किसी को भी नींद ना आती हो तो इस समय आराम से आ जाएगी। घर में आराम से लेकिन आप नींद का त्याग करके तो प्रणाम करते हैं। कहते हैं कलयुग चल रहा है। प्रणाम करते हैं। 10 10 20 हजार लोग मार्ग में अगर हम वहां से सवा दो बजे निकलते हैं तो वो कई बजे से लगे होंगे। कई बजे खड़े रहे होंगे। कहां से आए होंगे? और किसी के चेहरे में कोई निराशा नहीं। नाचते हुए उत्साहित होते हैं। मुझे तो सतयुग दिखाई दे रहा है।
साहब राधा राधा राधा राधा राधा कहां उनकी नींद है? कहां उनकी सुविधाएं छोटे-छोटे गोद में बच्चे लिए धक्का खाते हुए खड़े हुए। बलियारी उनको प्रणाम है। क्या देखने के लिए खड़े हैं? क्या मिल जाता है उनको? ना एक चाय मिलती है, ना एक लड्डू मिलता है। ना उनको ऐसे ऐसे भी तो नहीं होता कि ऐसे है ही भी क्या? आया क्या कुछ तुम्हारे पास? ए ऐसे कुछ आया क्या कुछ नहीं कुछ नहीं तो हम कर तो रहे हैं नहीं लोग ऐसे नहीं अगर कुछ आया हो तो बताओ कुछ नहीं आया राधा राधा राधा आया बोलो या ना बोलो राधा राधा राधा कान में आया श्रवण में सुना तुम्हारा मंगल हो गया कैसे भगवान के कृपा पात्र जन है अपने तो संत नहीं है संतों के चरण धूल के आश्रित हैं।
वो केवल संत दर्शन मात्र के लिए दूर-दूर से गाड़ियों से आकर के रोड में खड़े आप सच्ची मानिए जब दृश्य देखिए वहां पार्क उधर जब मुड़ते हैं तो दोना पत्तल कीचड़ जहां कूड़ा है वहां वो खड़े हैं। तो उनके चरणों में मन प्रणाम करता है कि उनको यह नहीं कि मैं कीचड़ में घुसा खड़ा हूं या यह अशुद्ध दोने पत्तल उनके ऊपर खड़ा हूं और कहीं से भी दर्शन हो जाए मैं खड़ा हूं। प्रणाम है तप अपने धर्म के पालन में जो कष्ट मिलता है उसको सहना अपने धर्म के पालन में जो कष्ट है उससे जैसे आप संयम से चल रहे हैं तो काम वेदना जागृत हो रही कोई आपको कट वचन कह रहा तो क्रोध वेदना आ रही आप अपने परिवार के मोह का पोषण नहीं कर रहे तो मोह जला रहा है आपके पास अर्थव्यवस्था नहीं तो लोभ आपको सता रहा कई तरह की ऐसी वेदनाएं ताप है पर साधक उधर ध्यान ना देते हुए वो भगवान की तरफ बढ़ता उसे ही तपस्वी कहते हैं।
भारी तपस्या इसे कहते हैं। 15वा स्वाध्याय अपनी वाणी जी का गायन और शास्त्र सिद्धांतों का स्वाध्याय यह अगर आप नहीं भी करते हैं तो सुनने को मिल रहा है आप सबको। स्वाध्याय करने की रुचि बढ़ जाती है। देखो जिनका हृदय अपवित्र है जब वाणी जी होगी यहां बैठेंगे नहीं यहां नहीं बैठेंगे आपको बाहर मिलेंगे क्योंकि मन बर्दाश्त नहीं कर पा रहा वाणी जी के श्रवण में और जिनका मन निर्मल है शांत वाणी जी में दृष्टि उधर गायन हो रहा है कान में पड़ रही है अहो भाग्य बैठे रहो यह बंद करो जो उदंडता है मन की बंद करो सम दम सम इंद्रियों को बहिर्मुख होने से बचाओ और अंतर्मुख रखो।
दम मन का निग्रह करो। मन जो भोगों की तरफ जा रहा है उसे प्रभु की तरफ लगाओ। बार-बार हटाकर भोगों से प्रभु की तरफ लगाना मनोनिग्रह। और इंद्रियों को विषयों से हटाकर के बार-बार प्रभु की तरफ लगाना इंद्रिय निग्रह। सम दम दान विनय यह 17वा दान अगर आपके पास ₹1 हैं किसी को बीमार देख रहे हो कष्ट में देख रहे हो या साधु सेवा या गौ सेवा जो हमारे धर्म के स्तंभ है अगर एक रुपए भी दे देते हो धर्म की कमाई का तो बहुत बड़ा उदान है बेईमानी करके आप एक लाख देते हो उसका कोई महत्व नहीं है क्योंकि वो वो बेईमानी करने जिसके पास जाएगा उसकी बुद्धि को भ्रष्ट करेगा।
धर्म के द्वारा कमाया हुआ यदि एक रोटी भी दे देते हो तो वो दान माना जाता है। और अगर कहीं यह मानकर दे देते हो कि आपकी वस्तु आपको समर्पित तो सेवा बन जाती है। विनय आपका व्यवहार विनय पूर्वक होना चाहिए। सब मान प्रद आपमानी विनय इसी में आएगा। हस बोले बहुमान दे तरु सम सहनशीलता होए। परम उदार कहे सब कोई सोच नमन कबहु करे कब जब वृत्ति भगवदाकार हो जाए तब नहीं पहले प्रवचन में कहा है कि नारियल जैसा स्वभाव होना चाहिए ऊपर से जटिल और कठोर और अंदर से मृदु अगर ऊपर से मृदु रखोगे तो घायल हो जाओगे तुम्हारी सामर्थ्य नहीं कि माया के आक्रमण को सह पाओ एक बार जो तुम्हारी तरफ देखे दोबारा प्रियता भरी नजर से ना तुम देखो ना वो देखे जब तक भगवत साक्षात्कार इसीलिए के उत्तम साधकों को देखा गया गंभीर मुद्रा हिम्मत ही नहीं पड़ेगी कि तुम उनसे संभाषण कर लो पक्का तुम्हारी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि बात कर लो अगर तुम्हें श्री हरिवंश भी कहना है तो एक बार सोचना पड़ेगा वही जाकर सिद्धावस्था को प्राप्त होते हैं पहले ही व्यवहार में विनम्रता और हंस बोले बहुमान दे तो तुम्हारी सामर्थ्य नहीं कि तुम व्यवहार के प्रेम को पचा पाओ विनय 18वा आरव आरव कहते कहते हैं सरलता को।
अंदर की सरलता बहुत उत्तम है। बाहर की कठोरता अति आवश्यक है। साधक के लिए बहुत जरूरी। बहुत जरूरी है। अगर बाहर से सरल हुए तो धोखा हो जाएगा। ये इसीलिए शास्त्र अनुभवी जिज्ञासु तभी ले पाएगा जब अनुभवी मिलेंगे। नहीं तो शास्त्र को सरल होना चाहिए। तो कैसा सरल होना चाहिए? बहुत सावधान हृदय सरल होना चाहिए। बाहर बहुत विवेक पूर्वक बिल्कुल कोई ऐसा सरल नहीं है कि साधक से आप संभाषण कर ले। ऐसा स्वभाव बनाना चाहिए। सरल हृदय संत सरल चित जरा शब्द पर देखिए। सरल चित्त में सरलता हो व्यवहार आपका निष्कपट निश्चल और व्यवहार थोड़ा शुष्क हो कब तक जब तक भगवत प्राप्ति ना हो जाए।
नहीं तो अगर शुष्क नहीं तो फिर रस में मक्खियां बननाने लगेंग। आंतरिक रस बढ़ाओ बाहर शुष्क रहो। जब बाहर ठाकुर जी श्री जी आदेश करें कि अब बहने दो रस की धारा तो वो फिर संभाल लेंगे। 19वा दया दया बिना साधु कसाई दया करी तो आफत आई ये उड़िया बाबा के वचन है दया बिना साधु कसाई दया होनी चाहिए लेकिन वही दया तुम्हें मुक्त करेगी वही दया तुम्हारे अंदर होनी चाहिए दया का उल्टा क्या है याद भगवान की याद भुला दे ऐसी दया कभी मत करना जैसा भरत जी ने किया भरत जी ने दया किया ममता साथ में जोड़ दी।
भगवान का भजन छूट गया। अगला जन्म हिरन का बने तब भजन शुरू हुआ। दया करनी है। पर दयालु भगवान का स्मरण करते हुए जो दया हो जाए। ऐसी दया नहीं करनी कि भगवान का स्मरण छूट जाए और हम फंस जाए। उस दया में। बहुत ऐसी जगह है जहां दया में फंसा जाता है। फिर निकलना बहुत कठिन होता है। भगवान ही निकालते हैं। दया और 20वा है प्रबल श्रद्धा। एक होती है श्रद्धा। हमें आप पर बहुत श्रद्धा प्रबल श्रद्धा। किसी के कुछ भी कहने पर भी हमारी श्रद्धा में कोई फर्क नहीं है। कुछ भी जैसे श्री बलि जी की प्रबल श्रद्धा श्री भगवान पर।
गुरुदेव कह रहे हैं कि इनको तीन पग देने को कहा है। तुम्हारी सारी संपत्ति नष्ट हो जाएगी। यह तुम्हें एक इंच जगह नहीं छोड़ेंगे। यह त्रिभुवन पति भगवान हरि है। वापस ले ले संकल्प। मैं कह रहा हूं। प्रबल श्रद्धा गुरुदेव की बात नहीं मानी। और प्रबल श्रद्धा श्राप दे दिया जा ईश्वर भ्रष्ट हो जा। फिर भी कोई भय नहीं। संकल्प किया प्रभु ने अपना विस्तार किया नाप लिया सब कुछ और फिर डांट लगाई देखो प्रबल श्रद्धा बोल तीन पद पृथ्वी दान के लिए कह रहा था आप कहां गुरु ने मना किया था नहीं माना ना बड़ा दानी बनता था वरुण पास से बांध दिया जो प्रतिपल महान कष्ट देता है अब बोल तीसरा प कहां पूरा करेगा बलि जी की प्रबल श्रद्धा में कोई फर्क नहीं पड़ा प्रहलाद जी के नाती हैं महा भागवत प्रह्लाद जी के नाती विोचन पुत्र महाराज बलि उन्होंने कहा प्रभु अभी तो आपको प्रणाम भी नहीं किया हाथ बंधे नहीं आपको प्रणाम करता प्रभु हम अपने वचन से पीछे नहीं हटने वाले तीन पग कहा था दो पग में सब नाप लिया उतने ही बड़े बनो जितने बड़े में मांगा था और तीसरा पग मेरे सर पर रखो और मुझे नाप लो दो पग में संपत्ति और तीसरे पग में संपत्तिवान को भगवान बिक गए।
इसे कहते हैं प्रबल श्रद्धा। गुरु ने श्राप दे दिया। गुरु ने मना किया। भगवान ने बांध दिया, कटाक्ष किया पर श्रद्धा पे कोई फर्क नहीं पड़ा। इसे कहते हैं प्रबल श्रद्धा। 21वा विवेक। यह विवेक बहुत बड़ा साधक का बल होता है। यह कहीं फंसने नहीं देता। हर जगह से विवेक बचा लेता है। बहुत सुंदर अस्त्र है विवेक जो हर समय काटता रहता है। मोह, ममता, राग, काम, क्रोध, लोभ, मद सबको काट के भगवान की प्राप्ति कराने में बहुत बड़ा हाथ है विवेक का। और यह विवेक किसी बाजार में नहीं मिलता है।
यह केवल साधु समागम में मिलता है। बिन सत्संग विवेक ना होई। और राम कृपा बिन सुलभ न सोई बिना सत्संग के विवेक नहीं होता। बिना राम कृपा के सत्संग नहीं प्राप्त होता। 22वा दृढ़ वैराग्य दृढ़ वैराग्य त्याग कहते हैं। भोग सामग्री की भोगने की इच्छा है पर भोगूंगा नहीं क्योंकि भगवत प्राप्ति करनी है। इसे त्याग कहते हैं। भोग सामग्री की भोगने की इच्छा का ही नाश हो गया है। भोग सामग्री आसपास है लेकिन नहीं। इच्छा ही नहीं है। उसका नाम वैराग्य है। दृढ़ वैराग्य। यहां से लेकर ब्रह्मलोक तक के किसी भी भोग की सामर्थ नहीं कि उस उपासक के मन को ललचा दे।
चलायमान कर दे। उसे दृढ़ वैराग्य कहते हैं। ये जागृत हो जाता है। 23वा एकांत सेवन की रुचि। अंतर्मुख एकांत सेवन की रुचि अंतर्मुख। बाहर के लिए कमरे की बात नहीं है। यहां कमरे में भी बैठकर आप एकांत नहीं रहेंगे। यदि अंतर्मुख नहीं है। विषय चिंतन कर रहे हैं तो आप बाहर ही हैं। एकांत नहीं। एकांत अपने इष्ट के चिंतन में निरंतर लगे रहना। 24वा किसी भी तरह का कोई भी परिग्रह ना रखना। अपने लिए कोई भी परिग्रह अपने लिए नहीं रखना। जिसने आज दिया है वही कल देगा। जो पूरे विश्व का भरण पोषण करता है वह इस शरीर का भी भरण पोषण करेगा।
चिंता क्या करनी है? हम अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। चिंता नहीं। हम प्रभु की आज्ञा में अपने जीवन को समर्पित करते हैं। भोगों की संग्रह में नहीं। अपरिग्रह अपरिग्रह दो प्रकार का होता है। एक बाहर से लिया हुआ दान और एक अंदर चिंतन ना हमें भोगों के अगर आज जो है यह खाने को मिल जाता अगर ऐसा वस्त्र मिल जाता ऐसा ऐसा ना अंदर से चिंतन और बाहर से प्राप्त होने पर जितना हमारे शरीर का भरण पोषण इसके अलावा नहीं है। हमें नहीं चाहिए। अगर वह उस पर महात बुद्धि है तो परिग्रह परिग्रह है तो भगवान के अनुराग में बाधक है।
अपरिग्रह बाहर और आंतरिक दोनों जगह से आशा शून्य हो जाना। आशा ही परम दुखम नराश्य परमम सुखम अपरिग्रही का लक्षण है। बिना आशा के जो भोग प्राप्त हुआ है उसमें भी पहले विवेक के द्वारा देखना है कि धर्म युक्त है कि नहीं। फिर विवेक के द्वारा निर्णय करना है। साधना में सहयोगी है कि नहीं। फिर कितनी आवश्यकता है उतना उपभोग करना। 25वा समाधान। कई बार कहा है सत्संग में कि साध्य और साधन के विषय में साधक का समाधान हो जाना चाहिए। आपको पता है आपका साधन क्या है? आपको पता है आपके साध्य कौन है?
बस साध्य निश्चित किए श्यामा श्याम साधन उनके गुरुदेव के द्वारा जो दिया हुआ उपासना का मार्ग है बस उसी पर। अब साध्य साधन के विषय में कोई प्रश्न नहीं, कोई संशय नहीं। ित चित्त का भगवदाकार हो जाना अपने आराध्य देव में समर्पित हो जाना ही वास्तविक समाधान कहा जाता है। अब इस इष्ट के विषय में या साधन के विषय में कोई शंका नहीं उसे समाधान कहते हैं। 26वा उपरति वैराग्य के ऊपर का हिस्सा है। वैराग्य में तो भोग सामग्री है पर भोगने की इच्छा नहीं है। उपरति में भोग सामग्री है ऐसा बोध भी नहीं रहता।
एकमात्र केवल परमात्म बुद्धि यह उपरति जागृत हो जाती है। 27वा भगवत तेज जिससे सभ्यभीत रहते हैं उसे भगवत तेज कहते हैं। कोई भी त्रुटि गलती करोगे कोई भी धर्म विरुद्ध आचरण करोगे तुम्हारा मन सामने आने के लिए नहीं कह पाएगा। तुम कटोगे सामने नहीं आओगे। तुम्हारा अगर ज्यादा अपराध बन गया तो निंदा करने लगोगे, द्वेष करने लगोगे गुरुजनों से क्योंकि तुम्हारे नाश का कारण बनेगा। भागवतिक थे जैसे श्री कपिल जी महाराज से स के जो 60 हजार पुत्र थे वहां आश्रम में घोड़ा बंधा हुआ था।
उनको तो पता ही नहीं था। ध्यान में थे। किसी ने बांध दिया। उनको लगा कि इन्होंने तो उपद्रोह मचा दिया। तो केवल देखा था, सोचा नहीं था। इतने में सब के सब भस्म हो गए। इसे भगवत तेज कहते हैं। दूसरा भगवत तेज का स्वरूप घोर विषय पामर नीच आचरण करने वाले की चित्तवृत्ति का परिवर्तन करके परमार्थ पर खड़ा कर देना। भगवत मार्ग में चला देना। इसको भागवतिक तेज कहते हैं। ये तेज महापुरुषों में अपराधियों के अपराध को रोक देना। मलिन वृत्ति को उठाकर भगवदाकार कर देना। यह जो तेज है यह भक्त में जागृत होता है।
संतों में जागृत होता है। इसी से जगत मंगल होता है। इसी तेज से जैसे किसी एक वैज्ञानिक ने कल डॉक्टर कैंसर के और विज्ञान संपन्न थे। उन्होंने कहा मेरा विज्ञान आपकी इस प्रवचन में एक बात जो आई उसको स्वीकार नहीं करता कि किसी संत ने थूक दिया तो कैंसर ठीक हो गया। मैं उसका बहुत बड़ा मर्मज्ञ हूं। कैंसर का उसका ऑपरेशन किया जाता है। फिर वह बढ़ता ही रहता है। वह मार के ही छोड़ता है। चाहे एक दो वर्ष चार वर्ष उसे मरना पड़ता है। पर आपने कहा कि कैंसर का उन्होंने थूक दिया तो कैंसर ठीक हो गया।
तो तुम्हें आश्चर्य लगा तुम्हारा ज्ञान विज्ञान काम नहीं करता। तो एक साथ में और बात सुनी होगी कल कि उन्होंने फिर अपने पैर पर उसके लिया और उस पैर में वो कैंसर इतना बढ़ा कि उसको अपना चरण जो है वो कटवाना पड़ा। पूरी बात सुनोगे तो प्रश्न उत्तर नहीं होगा। अब तुम्हारे अंदर यह सामर्थ्य नहीं कि तुम दूसरे के प्रारब्ध को ट्रांसफर कर लो अपने ऊपर। लेकिन उन महापुरुषों में सामर्थ्य है। इसे भगवत तेज कहते हैं। तुम विज्ञान पढ़ लिखकर बुद्धि की धरा से प्राकृतिक वस्तु के केवल जानकार हो सकते हो।
लेकिन जिसने बुद्धि सच्चिदानंद में लगा दी है। वह प्राकृत दिव्य चिदानंद भाव को तुम प्राकृतिक बुद्धि से कैसे तोल सकते हो? तुमको क्या पता? अगर हम यह घटना बता दी तो तुम्हें समझ में आ रहा है हजारों के दोषों और पापों को स्वयं संत लेकर कुछ संकल्प से कुछ भजन से कुछ भोग कर नष्ट करते हैं कर रहे थे और करते रहेंगे तुम्हें क्या पता है इसको तुम्हें पता है जो भगवान के भजन में लगे हुए हैं उनके प्रारब्ध की धज्जियां तो भजन से उड़ जाती है वो जो क्षण क्षण कष्ट भोगते रहते हैं ये शरणागति का प्रभाव है आपको स्वीकार करके आपके सारे पापों को भस्म करते तभी आप कदम आगे बढ़ा पाते हो परमार्थ में इस राशि को
बताया नहीं जाता ये जितने बड़े बड़े महापुरुष हैं जिनकी शरण में अपने लोग होते हैं वो पहले हमारे प्रारब्ध को भोगते हैं उसको काटते हैं भजन के द्वारा तप के द्वारा जो प्रबल होते हैं उनको शरीर में भोग करके यह विज्ञान क्या जान पाएगा इस विषय को आज भी करह में पत्थर पूजराज जिसमें बाबा रामदास जी बैठकर भजन करते थे कैसे तुम संतो विज्ञान जान पाएगा संतों की महिमा क्योंकि जितनी तुम बुद्धि लगा रहे हो वो सब प्राकृतिक ब्रह्मा के द्वारा रची हुई है और जहां ब्रह्मा की भी बुद्धि काम नहीं करती है जैसे भगवान बाल रूप जो जब थे तो सखा भी बने और बछड़ा भी बने उन भगवान में जिनकी बुद्धि लगी उनको कैसे जाना जा सकता है कोई आश्चर्य नहीं है संत जन भगवान के विधान में अपने मन को रखते हैं नहीं तो हम आपको सच्ची बताएं विश्व में उनके जो हृदय की बात है तो ना कोई रोगी हो ना कोई माया में फंसे।
भाई जी हनुमान प्रसाद पोदार जी से कहा आप भगवत साक्षात्कार करा सकते हैं। उन्होंने कहा पक्का लेकिन प्रभु का ऐसा विधान नहीं हम सच्ची कहते हैं। किसी से नहीं कहते कि भजन करो। हम सबको राधा कृष्ण के दर्शन करा देते हैं। पर मालिक का विधान नहीं है। क्योंकि मालिक जैसा खेलना चाहता है जमुरा वैसे ही उसके साथ खेलेगा। हम उनके दास हैं। प्रह्लाद जी ने स्पष्ट देख लो। नरसिंह भगवान से कहा मुझे आपकी कृपा है पर्याप्त मुझे नहीं चाहिए अब कोई वरदान। आपके चरणामृत और नाम जप आपकी कथा से हमारा सब हो जाएगा।
हम इनके लिए रो रहे हैं जो माया में फंसे इनको तो भगवान ने बुला के लाओ किसी को जो बैकुंठ चलना चाहता हो। ये कोई नहीं तैयार हुआ। बैकुंठ में कोई नहीं तैयार हुआ। सच्ची मानो संत जो भगवत प्राप्त महापुरुष है अभी भगवत साक्षात्कार करा दे पर आपके अंदर चाह रही नहीं है आप माया में आ एक सुकरी मिली सुकरी से कहा कि तू यहां कितना कष्ट सह रही चल बैकुंठ बोले चल तो तू बैकुंठ लेकिन यहां जो विष्ठा मिलता है बैकुंठ में मिलेगा बोले नहीं वहां नहीं मिलेगा बोले नहीं जाना बैकुंठ हमारी आसक्ति विष्ठा कुल भोगों में इतनी हो चुकी कि हम बैकुंठ को भी तिरस्कृत कर रहे हैं।
हां कर रहे हैं। देख लो ये जीवन भगवान की प्राप्ति के लिए मिला है। संतो की सामर्थ्य में संशय नहीं है। हम उनके सामर्थ्य का सदुपयोग करना नहीं जानते। अगर करुणा में संतो की आज्ञा पर केवल चल दो तो परम पद प्राप्त हो जाए। प्रिय प्रीतम प्राप्त हो जाए। ये उनमें तेज जागृत होता है। 28वा क्षमा बड़े से बड़े अपराधी को क्षमा कर देना। ये संत स्वभाव में 29वा महान धैर्यशाली 30वा अद्रोह किसी से कभी भी कहीं भी दुश्मनी नहीं उनकी होती कहीं भी द्रोह नहीं होता। बड़े-बड़े संतों से द्रोह की लीलाएं इस जगत ने की है।
वह अपने आप को कष्ट लेकर के सह गए लेकिन किसी को कष्ट नहीं दिया। पक्का भारी से भारी जीवन में देखा गया संतों के द्रोह करने वाले भी भगवान के बल से बलवान हो जाते हैं और द्रोह करते। अरे यहां तक कि अंतिम लीला तक प्रहार की लीलाएं हुई। जैसे पूज्य पाहाड़िया अंतिम लीला करके दिखा दिया। जिस सर पर सैकड़ों बार अभिषेक हुआ चंदन, तुलसी पत्र आदि चढ़ते रहे उन्हीं पर गड़ासा चला तो भी ओम और भगवत प्राप्ति। अद्रोह और 31वा अभय भक्त में कभी भय नहीं रहता। जब तक पापा आचरण करोगे तब तक निर्भय नहीं हो सकते।
कोई भी हो, कहीं भी हो, कैसा भी हो। भक्त में अभय स्थिति जागृत हो जाती है। और 32 वहां है। किंचित मात्र अहंकार नहीं रह जाता। अहंकार भगवत स्वरूप हो जाता है और 33वा परम शांति को प्राप्त हो जाता है। यह सही ढंग से मार्ग में चलने वाले उपासक के अंदर 33 सद्गुण जागृत हो जाते हैं जो साक्षात भगवान से अंश मात्र में उतरते हैं। भक्त पर अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपशुन लज्जा अमानिता सोच संतोष ततीक्षा निष्कपटता सत्संग साधु प्रेम साधु सेवा और तपस्या स्वाध्याय सम दम विनय आर दया श्रद्धा विवेक वैराग्य एकांत सेवन अपरिग्रह समाधान उपति तेज क्षमा धैर्य अद्रोह अभय निरहंकारता और शांति यह सद्गुण जो भगवान में विराजते हैं वह अंश रूप से भक्त में आ जाते हैं।
हमें चाहिए मन वचन कर्म से इस बार हम निकले इस माया दलदल से अपनी दैन्यता जो भोगों की बनाए हुए हैं जो अपने में हीन भाव हम गृहस्थ हैं। हम विषय हैं हम पापी हैं। अरे कुछ नहीं। हम भगवान के हैं। 100 बार हार करके भी अगली छलांग भगवान की तरफ मारेंगे और हम निकलेंगे इस प्रपंच से। कोई भी घबराने की जरूरत नहीं। गलतियां सबसे होती जो इस भूमि में पैदा होता है। भूमि पर ढावर पानी तिम जी माया लपटानी नहीं पीछे नहीं हटना निराश नहीं होना उदास नहीं होना। हर कदम राधा राधा राधा आगे बढ़ाना है और हमें इसी जन्म में भगवत प्राप्ति करनी है।
विशेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल
यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।
मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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