धर्म के बिना “ अर्थ और काम “ कैसे विनाश का कारण बनते हैं? // 30/03/2026
पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।
पूरा प्रवचन
वृंदावननेश्वरी तव पदारविंदम प्रेमा मकरंद रसो पूर्णम हृदय पितम मधुपते स्मरता मुगम निर्वापयत परम शीतल माश्रयाम परम शीत तल माया काहे ते आजू अटपटे से हरी काहे ते आजू अटपटे से हरी लटपटी पाग अटपटे से बंद अटपटी देत आगे शरीर काहे ते आजू अटपटे से हरी अटपटे पाई परत मैं परखे जब आवत है इत ढरी श्री हरिदास के स्वामी श्याम जान हो पाए आज लाल और रे परी श्याम जान हो पाए आज लाल और परी काहे ते आज अटपटे से हरी भगवान की असीम कृपा से इस त्रिगुणमई माया से मुक्त होने का अवसर मिला है।
यह प्रचंड आकर्षणमय माया यह समझने ही नहीं देती कि हमारे जीवन का परम लक्ष्य सुख किस दिशा पर है, किस मार्ग में है, किन आचरणों पर है, किस चिंतन से है, यह समझने ही नहीं देती। जो लौकिक वस्तु व्यक्ति स्थान का ही केवल महत्व रखते हैं। वह कोई भी हो कहीं भी हो चिंता शोक भय डिप्रेशन नाना प्रकार की कल्पनात्मक भयाव वृत्तियों से कभी मुक्त नहीं हो सकते। वह कोई भी हो चाहे जितना ज्ञान बघारते हो चाहे जितना किसी को उत्साहित करने के लिए लौकिक शब्दों का शास्त्री शब्दों का प्रयोग करें पर जब तक आपका चिंतन आपके आचरण तस्मा शास्त्रम प्रमाणम ते शास्त्र प्रमाणित नहीं होंगे तब तक आप चिंता भय शोक से मुक्त नहीं हो सकते चाहे जितनी संपत्ति एकत्रित कर लीजिए।
चाहे जितना नाम यश कीर्ति हो जाए पूर्व पुण्य प्रताप से अध्यात्म को ना मानने वाले ना जानने वाले भगवान को ना मानने वाले ना जानने वाले त्रिकाल में कभी सुखी नहीं हो सकते। अंतत गत्वा बड़ी दुर्गति होती है। पर थोड़ी देर के लिए केवल चांस दिया जाता है। आप चाहे पाप आचरण कर लो, भगवान की निंदा कर लो या आप सत आचरण करके भगवान की उपासना करके मुक्त हो जाओ। यह छूट आपको है। इसलिए आप अपने समय को दिव्यता की तरफ बढ़ाएं। पशुता की तरफ नहीं। दिव्यता केवल मानव देह से ही प्राप्त की जा सकती है।
नाना प्रकार की भोग सामग्रियां पशुओं को भी प्राप्त है। असुरों को भी प्राप्त है। मानव को भी प्राप्त है। पर मानव देह से ही केवल दिव्य भगवत प्राप्ति की जा सकती है। और किसी योनि से नहीं। जिसे भगवत प्राप्ति हो गई उसके लिए दुर्लभ क्या रह गया? आत्यंतिक दुख की निवृत्ति का नाम भगवत प्राप्ति है। जहां किंचिन मात्र दुख की संभावना नहीं परमानंद ही परमानंद है। और यही तो खोज रहा है हर व्यक्ति। पर वो खोज रहा है गलत दिशा में। किसी वस्तु व्यक्ति स्थान में धन संपत्ति पद प्रतिष्ठा में लोकर की वासनाओं की पूर्ति में सुख मानने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता।
विश्वास कीजिए यह कोई प्रोत्साहन देने के लिए केवल भगवान की चर्चा नाम महिमा या शास्त्र बातें नहीं है। यह सत्य है। सत्य पर चलने वाला अपने सत्य स्वरूप को जान के कैवल्य परम पद को प्राप्त होता है। श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज कह रहे हैं हे भाई विदुरे त्रगुण्य दथ विमल विद्यामय परे महानंदे वृंदावन भवि सुकंदे रस तरु अमर्यादा राधा चरण परिच चर्या रस महा महोदवा हदी परम धन्युरत बड़े भाग्यशाली हैं वो जन जो विद्या के प्रभाव से इस अविद्या त्रिगुणमय माया से मुक्त होने की इच्छा करके श्री राधा चरणारविंद की उपासना कर रहे हैं।
विद्या समस्त हितोपदेश विद्या है। हितोपदेश में समस्त शास्त्र पुराण मनीषियों के ऋषियों के ब्रह्म ऋषियों के आचार्यों के गुरुजनों के वचन ये सब हितोपदेश है। यही परम विद्या है। इसी विद्या के बल से हम अविद्या का नाश करके त्रिगुणमय मायास के बंधन से मुक्त होते हैं। श्रीपाद कह रहे हैं विमल विद्या परे लेकिन हम जो तुम्हें प्रेम रस की बात कर रहे हैं यह विद्या और अविद्या दोनों से परे है। त्रिगुणमय अविद्या को विद्या के द्वारा जो जीत चुके हैं उनके लिए भी जो दुर्लभ रस है वह महा आनंद वृंदावन भूमि में जो रस का मूल है सुंदर कंधे सुकंदे जो सुंदर आनंद का मूल है प्रेम रस का मूल है उस श्री धाम वृंदावन जहां अमर्यादा राधा चरण परिचर्या रस महा अमर्यादा जो वेद की मर्यादा है उससे परे प्रेम की मर्यादा प्रेम की एक मर्यादा है जो वो किसी की मर्यादा नहीं रखता अमर्यादों मिलत सूरत रस पीयूष जल देश तरंग रुतंग जहां प्रेम बाढ़ में है प्रेम उच्छलित है प्रेम प्राप्ति के लिए वेदप सनस्त सा केवलम अवन अनुरागम लभते देवर्षि नारद जी कह रहे हैं जो वेदातीत रस है श्री किशोरी जी के चरणारविंद की प्रेममई उपासना किशोरी किशोर श्री लाडली लाल जी की बोले अहो भाग्य है उनके जो विद्या से परम निर्मल विद्या से त्रिगुणमई माया का त्याग करके मोक्ष पदवी को प्राप्त हुए उनसे भी महाभाग्य उनके हैं जो वृंदावन भूमि में वेदातीत रस का मूल श्री प्रियाजु के चरणारविंद हैं।
उन चरणारविंद की परिचर्या जिनको मिल गई है। यह बड़ा गढ़ विषय है। श्री राधा स्वामिनी की परिचर्या मिल गई है। जो अपने प्रियतम प्राणनाथ श्याम सुंदर के साथ नित्य विहार परायण है। वृंदावन में इनकी जिनको सेवा मिल गई है अमर्यादा राधा चरण परिचर्या रस महा ये प्रेम की एक मर्यादा है। जैसे शास्त्री मर्यादा है कि संध्या के समय सूर्य अर्घ दान करते हुए गायत्री जप किया जाए। यह शास्त्रीय मर्यादा है। वैदिक सिद्धांत है। पर वृंदावन भूमि में प्रेम की एक मर्यादा है कि संध्या काल में श्री स्वामिनी जी की संध्या भोग संध्या आरती करते हुए स्तवन वंदना आदि करते हुए श्री राधा किशोरी किशोर की उपासना में मगन हो जाए।
तो अमर्याद वेदातीत राधा चरण परिचर्या रसम यह वेदातीत उपासना है। यहां वेद रसिकन की वाणी श्री वृंदावन धाम इष्ट श्यामा महारानी प्रेम देवता बिना मिले सिद्धि होए न कारज भगवत सब सुखदान प्रकट भए रसिकाचार्यज अलग-अलग सिद्धांतों के रूप में भगवान ही उसके प्रवक्ता आचार्य के रूप में उसकी स्थापना की है। यह प्रिया प्रीतम के प्रेम रस की उपासना की स्थापना सहचर्या निकुंज से आकर आचार्य रूप में वो सिद्धांत वर्णन किए हैं। यहां पौराणिक या वैदिक सिद्धांत लागू नहीं है। धाम श्री वृंदावन है।
प्रेम रस धाम प्रेम परम स्वतंत्र तत्व है। प्रीति न काहू की कान बिचारे। मार्ग अपमार्ग विथित मन को शरत निवारे। यह प्रेम मार्ग और अपमार्ग नहीं देखता है। यह प्रेम केवल अपने प्रीतम को देखता है। बस कौन क्या कह रहा है यह सुनता ही नहीं। श्री सुंदर दास जी महाराज बड़े प्रेम में डूबे हुए महापुरुष हुए हैं। वो कह रहे हैं न लाज तीन लोकन की न वेद को कहो करे न शंख भूत प्रेत की न देव जते डरे सुने न कान और की दृश्य न और इच्छना यह है प्रेम मार्ग कह रहे हैं कि अमर्यादा राधा चरण परिचर्या रस महा बड़े भाग्यशाली हैं वो जो वेदातीत रस श्री राधा किशोरी के चरणारविंद की परिचर्या प्राप्त कर लिए हैं।
यह साधारण बात नहीं जिस आप परिचर्या में लगे हैं। यह असाधारण है। कशु राधुरी भरधुरी रांग राधिका प्रेम्लास राधिका निरधती तिया तदाकार बुद्धि से किशोरी मात्म किम सुकुमारी म स्वामिनी की प्रिय सहचरी इस स्वरूप में स्थित होकर जो परिचर्या में लगे हुए हैं वो मोक्ष सुख के भी त्यागी महापुरुष है महोद द्वंदवा ह परम धन्युरत वो परम धन्य है जिनके हृदय में श्री राधा किशोरी के गोरे चरणारविंद स्पुरित हो गए हैं। जागृत स्वप्न सुशुप्त में राधा पदा छटा वैुठे नरकेवा मंगत न्यास्तु राधा मिना तत्व एक ही है सब पर रस का रसास्वादन रस की उपासना बिल्कुल बिलग है पुमथा चत्वारो द विधाया जलपटम स्थिता सेवो सु्या भज चा विभूति भगवत अमंद नंदा प्लुत मधुर वृंदावन बने सदा राधा कृष्ण स्मरति रति सारे सुकृति वो बड़े सुकृतवान है पुण्यवान है उनके बड़े पुण्य हुए जिनको वृंदावन धाम आने को मिला जिनको वृंदावन में बैठकर प्रिया प्रीतम की चर्चा सुनने को मिली जिनको वृ वृंदावन का अखंड वास मिल गया और प्रिया प्रीतम की परिचर्या मिल गई।
निहाल हो गए। अब क्या चाहिए? इसी में आसक्ति चाहिए। एक फूल भी यदि श्रृंगारित करके प्रिया प्रीतम की परिचर्या सेवा में पहुंच जाता है। उसकी बराबरी कोई साधना नहीं कर सकती। पुमथा चत्वारो चार पुरुषार्थ है धर्म अर्थ काम मोक्ष जो चाहिए वो प्राप्त हो जाएगा विश्वास कीजिए प्रियाल के चरणों की उपासना में अद्भुत सामर्थ्य है यदि तुम्हें धर्म अर्थ काम मोक्ष ये चारों चाहिए मिल जाएंगे कैवल्य परम पद बड़ा दुर्लभ है। यह केवल ज्ञान से प्राप्त होता है। जब स्थूल सूक्ष्म कारण तीनों शरीरों का त्याग चिंतन रहित अपने स्वरूप में स्थित महापुरुष जीवन मुक्त कैवल्य परम पद को और यह भक्त को सहज में प्राप्त हो जाता है।
भगवान प्रदान करते हैं। मम दर्शन फल परम मनूपा जीव पाव निज सहज स्वरूपा सहज स्वरूप में कैवल्य परम पद का अधिकारी वो भक्त हो जाता है जिसे भगवत साक्षात्कार हो जाता है। अर्थ और काम ये दो भयानक हैं। नष्ट करने वाले। इन्हीं को सीमा में रख दिया गया। धर्म और मोक्ष की सीमा में। कामना की पूर्ति ऐसी होनी चाहिए जिससे मोक्ष पदवी तक बढ़े। अर्थ धर्म से युक्त होकर कमाया जाए जिससे तुम्हारी पवित्र कामनाएं होंगी। अधर्माचरण के द्वारा यदि अर्थ कमाया जाए तो अपवित्र वासनाएं, अपवित्र कामनाएं और अपवित्रता का परिचय वो शास्त्र और संत और भगवान की निंदा करेगा।
विद्वान माना जाएगा, धनी माना जाएगा, जगत सम्माननीय माना जाएगा। लेकिन वो अपवित्र अंतःकरण का शास्त्र वैदिक सिद्धांतों की और ब्रह्म ऋषियों की महात्माओं की अवहेलना करेगा उपहास करेगा पाखंड बताएगा ये उस अपवित्र हृदय का परिचय होगा जो केवल अर्थ और काम का ही सेवन करने वाला है जो धर्म को नहीं जानता और मोक्ष पद को नहीं जानता है अर्थ और कामना की केवल पूर्ति करने की लालसा वाला वो मलिन अंतःकरण वाला हो जाता है धर्म से अर्थ और अर्थ से कामना की पूर्ति मोक्ष पदवी तक के लिए यह हमारी शास्त्र मर्यादा है।
यह हमारे धर्म की स्थिति है। पहले धर्म फिर अर्थ फिर कामनाओं की पूर्ति और मोक्ष पदवी की प्राप्ति। केवल अर्थ और कामना का ही उत्साह बढ़ाने वाला स्वयं मलिन अंतःकरण का और सामने मन मलिन अंतःकरण कर देने वाली वृत्ति प्रकट कर सकता है। ना कि धर्म और मोक्ष की। धर्म और मोक्ष रहित अर्थ और काम भाव पिशाच भाव को प्राप्त करा देता है। वह मनुष्य रूप में असुर भाव को प्राप्त हुआ दिखाई देगा। और लिख ले कोई भी हो यह शब्द लिख ले चिंता शोक भय डिप्रेशन उससे चलेगा। वो यदि धर्म और मोक्ष पदवी का तिरस्कार करता है अर्थात अध्यात्म ब्रह्म ऋषि और महात्माओं की अवहेलना करता है तो वो अंतिम परिणाम नोट कर ले चिंता शोक भय डिप्रेशन नाना प्रकार की भयावह कल्पना और मृत्यु दुर्गति इनको प्राप्त होगा आज पूर्व पुण्य के प्रताप से तुम्हारी बुद्धि प्रवीण हो गई लेकिन शुद्ध नहीं शुद्ध बुद्धि धर्म आज तक जितने भी महान हुए हैं, कौन ऐसा हुआ है जो ब्रह्म ऋषियों की अवहेलना, शास्त्रों की अवहेलना, धर्म की अवहेलना, संयम की अवहेलना की जाए।
हमारा धर्म शास्त्र कहता है सबसे पहला आश्रम है ब्रह्मचर्य आश्रम। फिर वह नैष्टिक ब्रह्मचर्य से वैराग्य मार्ग को ग्रहण करता है या वह संयमित ब्रह्मचर्य से गृहस्थ आश्रम को जाता है और यहां उपदेश दिया जाता है प्रोत्साहन दिया जाता है धर्म भ्रष्ट होने का क्या है केवल अर्थ और काम की पूर्ति पिशाच वत वृत्ति इसको जीवन नाश कहते हैं मोटिवेशन कहते हैं जो ऐसा उत्साह जो अपनी अनर्थ प्रदान करने वाली कुमार्गगामी इंद्रियों को अपने शासन में लेकर के सत्य मार्ग का अनुगामी बने उसे मोटिवेशन कहते हैं।
उसे उत्साह बढ़ाना कहते हैं। भोगों का उत्साह बढ़ा देना या विषयों की प्रियता का उत्साह बढ़ा देना इसको तो पतन कहते हैं। इसको तो गिराना कहते हैं। पर आज का समाज इसी को उत्साह समझता है। कैसे अर्थ पिशाच बनू? कैसे भोग वासनाओं का कीड़ा बनू? बस इसको समझा जाता है। अगर सत्य विषय शास्त्र सम्मत हो उसकी अवहेलना की जाती है। नहीं ये शास्त्र आपको सुखी निश्चिंत निर्भय बनाने के लिए है। ये आपके ऊपर दबाव नहीं डाल रहे हैं। आपको शासन में लेकर के माया रूपी प्रपंच के दलदल से निकालने की चेष्टा बताते हैं।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इनकी गुलामी से मुक्त होने की बात बताते हैं। कोई भी कहीं भी हो अंतत देख लेना अपने हृदय में चिंता भय शोक डिप्रेशन नाना प्रकार की दुर्वासनाओं की दौड़ भाग भला इनसे तुम्हारा उत्साह संपन्न होगा उत्साह संपन्न होता है भगवत मार्ग से अपने कर्तव्य चाहे विद्यार्थी हो चाहे कृषक किसानी करते हो व्यापारी हो कोई भी उद्योग करते हो अगर आप भगवान का नाम जप करते हैं और धर्म धर्म शास्त्र के अनुसार कर्तव्य का पालन करते हैं तो आप यहां भी सुखी रहेंगे और आपका अंतिम परिणाम भी मंगलमय होगा।
शास्त्रों का उपहास कर देना, संतों का उपहास कर देना ये दो मिनट की बात होती है। लेकिन इसका परिणाम जब आएगा तो पूरे के जन्म के जन्म व्यतीत हो जाते हैं। आज बुद्धि प्रवीण हुई है पवित्र नहीं। जब बुद्धि पवित्र होगी तब आप जान पाओगे शास्त्र क्या है? ऐसे ही जो मनावे सो खाओ। जैसे मनावे वैसे भोगो जैसे मनावे वैसे आचरण करो और आप शास्त्रों का ज्ञान जान जाएंगे। यह शास्त्र अध्यात्म का वो परम आनंद छुपाए हुए बैठे हैं जो गुरु कृपा से चाबी मिलती है और खुलती है तो परमानंद में डूब जाता है।
उसी आनंद की प्राप्ति के लिए आप विषयों में भी जो लगे हुए हैं खोज कर रहे हैं वो इसी आनंद की खोज करें। वो विषयों में नहीं है। वो परमात्म तत्व में है। आज मान लो या अंतिम समय घुटने टेक देना देख लेना। जब तुम हार जाना तब देखना तुम्हारे लिए मार्ग एक दिखाई देगा आनंद का वह है भगवान की शरणागति वह है अध्यात वो है शास्त्र सम्मत मार्ग उमथा चत्वारो द विधंजलि पुटम यदि आप भगवत आराधना करते हैं तो आपकी अंजुली में चारों पुरुषार्थ रखे हुए हाथ में धर्म अर्थ काम मोक्ष ईश्वर सबको देख रहा है भगवान सबकी एक एक वृत्त को जान रहा है।
यह कर्म क्षेत्र जो बोगे वही काटोगे। जब आप धर्म से चलते हो। कष्ट सहकर धर्म का पालन किया जाता है। सुख पूर्वक धर्म का पालन नहीं होता। सुख पूर्वक जो मन कहे वही कहो वह धर्म नहीं है। जो शास्त्र कहे उसके अनुसार मन को चलाओ और मन की जलन को सो उसे धर्म कहते हैं। जो शास्त्र विधान का पालन करता है उसे धर्मात्मा कहा जाता है। जो शास्त्र निषेध को करता है वो अधर्मी होता है। पापाचारी होता है। जो धर्म का पालन करते हैं। शास्त्र आज्ञा में चलते हैं। भगवत आज्ञा का पालन करते हैं।
भजन करते हैं। उनके हाथ में चारों पुरुषार्थ रहते हैं। धर्म अर्थ काम मोक्ष स्थिता सेवत सुख्या भज विभूति भगवत समस्त भगवान की विभूतियां हाथ जोड़कर चारों ओर उसकी प्रतीक्षा करते हैं। आज्ञा की किसकी जो अमर्यादा राधा चरण परिचर्या रस महा जो वेदातीत रस श्री राधा किशोरी के चरणारविंद की सेवा में लगा है चारों पुरुषार्थ उसकी अंजलि में है और स्थिता सेवोत सुख्या भजत चा विभूति भगवत भगवान की विभूतियां उसकी सेवा के लिए उत्साहित होकर हाथ जोड़े खड़ी रहती है। वास्तविक ईमानदारी से जो भक्ति में अपने चित्त को डुबो रहा है शास्त्र मर्यादा के अनुसार आचरण कर रहा है उसके लिए कुछ दुर्लभ नहीं अमंदाधि प्लुत मधुर वृंदावन बने सदा राधा कृष्ण स्मृति रति सारेन सुकृति धन्य है वो जो महा आनंद प्रदान करने वाले श्यामा श्याम की स्मृति में डूबे हुए समस्त आचरण करते हैं।
शास्त्र सम्मत क्या चला जाएगा? चाहे व्यापार में हो, नौकरी में हो, पढ़ाई में हो, किसी कार्य में हो, एकाग्रता पूर्वक हम अपना कार्य भगवान की पूजा मान के कर रहे हैं। शेष समय में श्यामा श्याम, श्यामा श्याम, राधा वल्लभ, राधा राधा राधेश्याम नाम जप कर रहे हैं। उनके स्मरण में चारों पुरुषार्थ तुम्हारे हाथ में बड़ी-बड़ी विभूतियां तुम्हारी रक्षा करेंगी। जो चाहोगे वो तुम्हें प्राप्त हो जाएगा। पहले साधना करो। पापों का क्षय होने दो। नाम जप करते हैं। अपराध भी करते हैं।
पापाचरण करते। कैसे नाम प्रकाशित हो? अगर हम नाम अपराधों से बचकर के नाम जप करें तो नाम का फल स्वयं प्रकाशित हो जाएगा। स्मरण कांचित सेवा मखिल जन संगम परिहरण सदा राधा राधा तमल सुकृति कोपी जयति वो इस माया पर विजय प्राप्त कर लेगा स्मरण कांचित सेवा दो बात कही स्मरण और सेवा विरक्त निवत्त परक भागवतिक सेवा में हर समय गृहस्थ प्रवृत्ति परक अपने धर्माचरण की सेवा जो जहां तैनात है जिस पदवी पे जिस सेवा पे ईमानदारी से अधर्म का त्याग करते हुए वो सेवा करता है वो पूजा है स्मरण और साथ में स्मरण प्रभु का होना चाहिए।
जैसे अर्जुन जी को युद्ध के लिए आदेश करते हैं। मामन स्मरण युद्ध मेरा स्मरण और युद्ध यहां कहते स्मरण कांचित सेवा दो बात कही यदि यह दो बातें जीवन में है तो उपासना का बहुत ऊंचा पद आपको प्राप्त हो जाएगा। जैसे दो पंखों से पक्षी ऊंचाई पर चढ़ता है। ऐसे सेवा और सुमिरन ये दो पंखे साधक के हैं। जिनसे वो अध्यात्म की ऊंचाई ग्रहण करता है। जन संगम परिहरण बहुत वार्ता करने वाले बहुत विषय पुरुष सांसारिकता का सत्य भाव रखने वालों का संग त्याग देना चाहिए। जन संगम परिहरण अगर जनता जो भगवत विमुख आचरण करने वाली उनके संग का त्याग कर दिया जाए स्मरण और सेवा अपना जीवन बना लिया जाए और सदा राधा राधा त्यमलम अमलम ये निर्विकार कर देगा आपको राधा राधा राधा सुकृति कोपी कोई महा महा पुण्यवान ऐसा होगा जो इस पर विश्वास करेगा परा विद्या राधा राधा हरि के हृदय का प्रेम मूर्तिमान जब स्वरूप धारण किया तब राधा किशोरी राधा किशोरी अद्वितीय प्रेम रस है।
आगे उपासना में जब उपासक की वृत्त डूबती तब पता चलता है। बाहर से तो बड़े-बड़े इस रस से अनविज्ञ हैं। जो सब रस के ज्ञाता है वह इस रस से अनविज्ञ संभाव्य नारद शिव स्वयंभया ब्रह्मा जी से बढ़कर कोई ऋषि है कोई मुनि है कोई चमत्कारिक है उनसे बड़ा कौन चमत्कारिक भगवान शंकर से बढ़कर कोई त्यागी बैरागी ज्ञानी बोध संपन्न महा भागवत कोई दूसरा नहीं अद्वती है ये सब श्री किशोरी जी के चरणारविंद की सेवा उनका का स्मरण राधा राधा राधा बोले अमल सुकृति निर्विकार कोई महान पुण्य आत्मा ऐसा जो इस नाम पर प्रीति कर पाता है तो जयति वो त्रिकाल में कभी राधा राधा बोलने वाला बाधा कोई परास्त नहीं कर सकती जयति कलिकाल के अभद्र और त्रिगुण माया पर वो जय को प्राप्त कर लेता है शुभ अशुभ दुर्ग विध्वंस बल तब जयति जयति जग उच्चरे वो जय को प्राप्त हो जाता है।
श्री राधा श्री राधा अगर वाणी से बोलते हैं तो यह परहेज रखना होगा। ऐसे लोगों का संग त्याग करना होगा जो भगवत विमुख है। महापुरुषों ने कहा कि एक बार सिंह का आलिंगन कर लेना वो ठीक है लेकिन भगवत विमुख पुरुष का नहीं क्योंकि वो एक शरीर नष्ट करेगा वो सैकड़ों जन्मों के लिए वासनाएं हमारे जीवन में जागृत कर देगा। ऐसी वासना जो हमारी दुर्गति करा देंग जन संगम परिहरण राधा राधा सदा अमल सुकृति कोपी जयति जय हो उसकी पुण्यवान की जिसके हृदय में राधा राधा राधा संसर्ग शून्य जीवन एक तो होता है भगवत विमुख और एक दूसरा होता है उपासना का भी अंतर अगर अन्य उपासना वाले सिद्धांत को जानने वाले शास्त्र सम्मत चलने वाले महत जन है पर वो इस उपासना को नहीं जानते हैं।
अलग-अलग उपासना का स्वरूप है। यदि हम उनका संग करेंगे तो उनका पता नहीं है इस रस का वो आपके चित्त से इस रस की बात को हटा देंगे। पक्का। इसीलिए ध्रुवदास जी ने कहा है कि अगर हमें संग करना है तो यह जरूर होना चाहिए। इष्ट मिले और मन मिले मिले भजन रस रीति तहां निशंक है मिलिए तासो कीजे प्रीति। नहीं तो शंका है आप भ्रष्ट हो सकते हैं। अपनी उपासना से गिर सकते हैं। इष्ट मिलना चाहिए। रस रीति उपासना पद्धति मिलनी चाहिए और फिर मन मिलना चाहिए। हमारे भगवान के अनंत अवतार है, अनंत रूप है, अनंत लीलाएं हैं।
तो मार्ग भी अनंत की प्राप्ति के अनंत है। सब सही है। पर हमको जो कृपा से मिला है। अब हम इस मार्ग की पुष्टता के लिए इष्ट मिले और मन मिले मिले भजन रस रीति। जहां तहां अन्न खात सखी कहत आप गात सकल दिवस द्वंद जात रात सर्व सोवह रात भर विषय विलासित आया सोने में गई दिन में नाना प्रकार की भोग सामग्री संग्रह में चला गया और जहां मनाया वहां भोजन पाया जिससे मनाया उससे मिल रहे हैं बात कर रहे हैं बोले जीवन बर्बाद कर रहे हैं अगर हमें जीवन सार्थक करना है तो हमें हमें इष्ट प्रियता रखनी होगी।
हमें श्री जी का प्रसाद पाना होगा। श्री जी के प्रसादी वस्त्र धारण करने होंगे। अर्पित मात्र करने से हमारी भावना पावन होने लगेगी। खानपान तो कीजिए रसिक मंडली मा जिनके और उपासना तहा उचित द्रणाए रसिक मंडली में यातन को नी के ढंग लगाओ दंपति यश गाओ हरसाओ हित्सो रिझ रिझाओ हमारे भगवान निराकार भी हैं साकार भी हैं सगुण साकार निर्गुण निराकार सब कुछ है सब उपासक हमारे भगवान के निराकार के भी हैं साकार के भी सबको प्रणाम है। लेकिन हम जिस उपासना में चल रहे अपने उपास्य देव की उपासना सिद्धि के लिए अपने उपास्य देव के ही सत्संगियों का संग करें।
नहीं तो उसमें बाधा पड़ जाएगी। आपकी उपासना मिश्रित हो जाएगी। व्यभचार दोष उत्पन्न हो जाएगा। उपासना में अव्यभचारणी भक्ति जो प्रेम लक्षणा वह आपके अंदर जागृत नहीं होगी। इसलिए उपासक सावधान है। प्रसंग चल रहा है। हमारे भगवान प्रकृति को अधीन करके अपने जनों को सुख देने के लिए अवतार धारण करते हैं। कल चर्चा हुई थी। इतना सुंदर रूप प्रभु का है। जो देखे सो इनका हो जाए। कल चर्चा हुई थी मथुरा वासनी सखियों ने जब प्रभु के सौंदर्य रूप लावण्य को देखा तो उनको गोपियों का भजन सर्वश्रेष्ठ लगा।
गोप किम चरण यद रूपम लावण सारस मन सिद्धम दग पवन सवाम दुरा मेकांत धाम यस स श्री श्रीरस धन्य है ब्रज की गोपियां पता नहीं कौन सा साधन तप किया जो अपने नेत्रों के दोनों से सदा इनकी रूप माधुरी का पान करती रही। इनकी अजान बाहों में उनका हृदय समर्पित रहा। कैसा सौंदर्य प्रभु का? इनके समान त्रिभुवन में कोई नहीं है। सखी ये कोई सजाने सवारने या गहने कपड़े आभूषणों से नहीं है। ये तो स्वयं सिद्ध रूप है इनका। देखतेदे तृप्ति नहीं होती। ये नित्य नवीन परमानंद की बाढ़ ला रहा है हृदय में रूप।
निरीक्षता उत्तम पूजना मंचस्थिता नागर राष्ट्र का नपु प्रहर्ष वेगोलितेना पप त नयनदनम पव चक्षुरभ्याम लहंत जीया जिंत नाशाभ्यामंत बाहु भी जिस समय प्रभु रंग मंच पर पहुंचे कंस के तो जितने वहां बैठे हुए थे राष्ट्र के जन समुदाय सब प्रभु श्री कृष्ण चंद्र जो बलराम जी को देखकर अखंड प्रसन्नता को प्राप्त हो रही है। ब्रह्म साक्षात्कार के बाद ही प्राप्त होती है। ब्रह्म भूता प्रसन्न आत्मा जितने बैठे थे सब भगवत प्रसन्नता को प्राप्त हो रहे। सबके नेत्रों से अश्व प्रवाह आने लगा।
मुख कमल खिल गया। सबका उत्कंठा से गला अवरुद्ध हो रहा है। सबके रोमांच हो रहे हैं। क्यों? क्योंकि नेत्रों के द्वारा श्री कृष्ण की मुख माधुरी का पान कर रहे हैं। ऐसा दिखाई दे रहा है। श्री सुखदेव जी कह रहे हैं परीक्षित मानो वे उन्हें नेत्रों से पी रहे हैं। जिभ्या से चाट रहे हैं। पिवंत चक्षुरभ्याम लहंत इया जिंत नाशाभ्याम मानो वो नेत्रों से पी रहे हैं। जिभ्या से चाट रहे हैं। नासिका से सूंघ रहे हैं और भुजाओं से आलिंगन कर रहे हैं। ऐसा सबको सुख प्राप्त हो रहा है।
जब जब भगवान अवतार धारण करते हैं वो सच्चिदानंद बपू होता है। भगवान श्री रामचंद्र जी के सौंदर्य को देखकर विदेह राजा जनक विशेष विदेह हो गए। मूर्त मधुर मनोहर देखी भय विदेहु विदेहु विषखी आ ब्रह्मानंद में देहातीत अवस्था को प्राप्त जनक जी महाराज आज विशेष विदेह हो रहे हैं। मूरति मधुर मनोहर देखी भय विदेहु विदेहु बसेखी सहज विराग रूप मनु मोरा थकित होत जिमी चंद चकोरा मेरा मन सहज वैराग्य में है। सहज वैरागी आज राम रूप को देखकर जैसे चंद्रमा को देखकर चकोर चकित होता है।
ऐसी स्थिति हो रही महाराज जनक की यह रूप प्रभु का यह तो परम ज्ञान शिरोमणि जिनको बिल्कुल ज्ञान नहीं वन में रहने वाले कोल भील जब भगवान श्री राम को देखा ऐसा रूप क्या पवाऊं क्या सेवा करूं दोना में जल भरते कोई एक फल रख लेता है जंगल का कोई कंद कोई मूल दौड़ दौड़ के सामने आते हैं प्रभु की तरफ करह जोहारू भेंट धर आगे प्रभु ही बिलोह अति अनुराग चित्र लिखे जनु जहां तहां ठाड़े पुलक शरीर नयन जल बा कोई भक्ति नहीं है कोई ज्ञान नहीं है प्रभु के रूप का प्रभाव आते हैं जोहार करते चरणों में वंदना करते हैं जल फल ऐसे रख देते हैं मानो चित्र से लिखे हुए हो मानो चित्र में बनाए हुए खड़े हो ऐसे भगवान की रूप माधुरी का पान कर रहे हैं।
चित्र लिखे जनु जहां तहां ठाड़े पुलक शरीर नयन जल बा सबके नेत्रों में आंसू बह रहे शरीर में पुलकावली हो रहे यह तो भगवत कृपा पात्र हैं जो भगवान से वर रखते हैं उनके हृदय में रूप का कैसा प्रभाव पड़ता है? सुप्रखा जब नाक कान छेदन हो गया अपने भाइयों के पास गई खरद दूषण के पास और कहा ऐसी ऐसी परिस्थिति में मुझे यह दंड दिया। उनका नाम राम है। वह बहुत गर्व कर रहे हैं। उनके पास एक सुंदरी स्त्री है। इसी कारण मेरे को नाक कान विहीन कर दिया। उन्होंने कहा ऐसा कौन है जो मेरे से भयभीत ना होता हो।
क्योंकि खरदूषण रावण के समान बलशाली है। रावण ने स्वयं जब सुना कि खरदूषण मारे गए तो कहता खर दूषण मोसम बलवंता मार सके को बिनु भगवंता वो तो मेरे समान बलशाली उनको भगवान के सिवा कोई मार ही नहीं सकता। यह जब गए भगवान से युद्ध करने के लिए खर दूषण तो देखा जानकी जी को तो लक्ष्मण जी ने गुप्त स्थान पर कर दिया था। राम जी महाराज विराजमान थे। देखते ही भूल गए कि मैं उनको देख रहा हूं जिन्होंने हमारे बहन के नाक कान काटे हैं। ऐसा लगा ये बहुत सुंदर है। देखने योग्य है।
आपस में बात करते हैं कि भाई देख लो हर नेत्र नाग असुर सुर नर मुनि जेते देखे जीते हते हम के जितना भी संसार में सुंदर देखा गंधर्व नागसुर किन्नर सब कोई ऐसा नहीं जिनको भुजाओं के बल से जीता ना हो मारा ना हो इनका रूप पता नहीं क्या हो रहा है मुझे खरदूषण कह रहे मुझे गुस्सा नहीं आ रही कि इनको मारू हम भरी जन्म सुनहु सब भाई देखी नहीं अ सुंदर ताई हम सच्ची बात कहते हैं भाइयों जन्म भर में ऐसा कोई सुंदर नहीं बड़े सुंदर जो भगवान से वर करने आए वो भगवान के रूप की प्रशंसा कर रहे हैं।
इन सबको परम पद मिला जो मुनियों द्वारा वांछित है। तात्पर्य जब भगवान अवतार लेते हैं तो दिव्य सच्चिदानंद बुता है। वो आत्म स्वरूप बपू होता है। प्रेमी विरक्त ज्ञानी मूर्ख बैरी असुर राक्षस सबका परम उद्धार करने वाला तनु होता है भगवान का। सबको आकृष्ट करके परम पद में आरूढ़ कर देना। संभव माया जो भगवान से विमुख करने वाली माया है वो त्रिगुणात्मिका है। लेकिन भगवान की जो आत्म माया वो योग माया है। परम दिव्य सच्चिदानंदमय भगवान की सच्चिदानंदमय शक्ति है। भगवान इसी योग माया से अपनी महिमा अपने रूप अपने तेज को उतना जितना देख सके उतने दर्शन कराते हैं नहीं भगवान अनंत तेजो कांप रहे हैं अर्जुन जब भगवान ने थोड़ा सा दिव्य दृष्टि दी कांप रहे हैं इसी योग माया का आश्रय लेकर भगवान ब्रज में रास लीला प्रकाशित की भगवान पिता रात्रि शरद फुल मल्लिका विक्षु मनसक्रे योग माया मुश्रित लेकिन नत निकुंज में नहीं ये अवतार लीला की बात कर रहे हैं।
भगवत विमुख मूल पुरुष के आगे दो पर्दे रहते हैं। एक तो रहता है अपनी मूढ़ता का त्रिगुणात्मिका माया का और दूसरा भगवान की योग माया का। अपनी मूढ़ता रहने के कारण वो भगवान को भगवान मानने के लिए तैयार नहीं। एक ने प्रश्न किया एकांतिक में भगवान का अस्तित्व क्या है? बड़ा विचित्र है। कैसे वर्णन करें? जिसका इतना मलिन अंतःकरण है कि भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न कर रहा है उसको कैसे उत्तर दें? क्योंकि यह मार्ग तो प्रारंभ ही होता है। साष्टांग दंडवत प्रणिपातेन और श्रद्धा विश्वास प्रश्नया उसको भगवान के अस्तित्व का भी संशयात्मक भाव है।
कैसे? अब कोई यहां तर्क करने आवे तो तर्क के लिए थोड़ी गुंजाइश है। यहां तर्क के लिए कोई साधु महात्मा थोड़ी अपना समय दे रहा है कि वो दिग्विजय होने के लिए कोई प्रकांड विध्वता का झंडा गाड़ने के लिए बैठा हो। अरे वो अपने आराधक भाव से आराध्य देव में सदैव डूबा हुआ है। कृपा करके तुम्हारे को समाधान देने के लिए अवसर दे रहा है। ना कि किसी वस्तु व्यक्ति यश कीर्ति प्रणाम नमस्कार की चाह है। भगवान के अस्तित्व कैसी मलिनता बढ़ रही नवीन अवस्था के बच्चों में भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न उठ रहा है।
पिता का सही परिचय केवल माता बता सकती है। ना तो कोई पड़ोसी बता सकता है ना कोई रिश्तेदार ना कोई नातेदार ना कोई भी और ना तुम ही जान सकते हो। तुम्हारा पिता असली में कौन है? केवल मां जानती है। भगवान के अस्तित्व का परिचय प्राप्त कराने की सामर्थ्य केवल सद्गुरु देव में है। केवल भगवान में है। सोई जाने जे देव जनाई। तो सदगुरुदेव प्रदत्त नाम मंत्र उपासना में लगो। अस्तित्व का प्रश्न नहीं करना पड़ेगा। अपने आप जागृत हो जाएगा। उपासना नहीं करोगे तो यह समझ में नहीं आएगा कि भगवान है भी कि नहीं है।
यह देखो भगवत विमुख मूढ़ पुरुष को दो पर्दे टंगे हैं जिससे वो नहीं जा एक तो अपनी मूढ़ता जिससे वो ये समझ नहीं पाता कि भगवान है भी कि नहीं। बड़ा विचित्र है। बड़ा विचित्र समय आता चला जा रहा है। भगवान पर संशय है। दूसरे इस त्रिगुणात्मिका माया की चकाचौंध जिससे भगवान तक दृष्टि ही ना जा पाए। भगवान जब प्रकट होते हैं तो इनका शमन करते हुए योग माया के द्वारा ऐसा रूप धारण करते हैं। ऐसी बात करते हैं जिससे हम समझ पावे हम देख पावे। नहीं तो भगवान को देख पाना, उनकी सामर्थ को समझ पाना सामर्थ्य नहीं है।
भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं। कहां देख पा रहे हो? अपार बलशाली है। द्रोपदी ने पुकारा यहां भगवान का चीर अवतार हो गया। कहीं नहीं लिखा था कि भगवान का चीर अवतार होगा। यह लिखा पढ़ी से अलग भी भाव है। भगवान का एक मिनट के लिए भी अवतार होता है। आपने पुकारा तत्काल किसी के अंदर भगवान जागृत हुए। रक्षा की अंतर्ध्य हो गए। फिर वो साधारण व्यक्ति धर्म की स्थापना करने के लिए किसी के भी हृदय में भगवान का अवतार हो जाता है। किसी के भी हृदय में चीरा अवतार हो गया। वस्त्र में भगवान का अवतार हो गया।
यहां से पल्लू नहीं हटा। 10,000 हाथियों का बल रखने वाला दुशासन मूर्छित होकर गिर गया खींचते खींचते। लेकिन यहां से पल्लू नहीं हटा पाया। भगवान अपने ऐश्वर्य को अपने सामर्थ्य को कम करके प्रकट होते हैं। किसी योग माया से ढक कर सामर्थ्य नहीं किसी की भगवान को देख सके। संपूर्णतया इसीलिए आज तक कोई ऋषि मुनि संपूर्णतया जब बात आती है तो ऐसे हाथ उठा देते हैं। वेद भी जिनको नेति नेति कहते हैं तो फिर जो जितना ज्ञान होता है वेद से ही होता है। मूल सबके वेद हैं। मूढ़ता के कारण त्रिगुण माया के प्रभाव से दुशासन, दुर्योधन, कर्ण आदि यह कभी नहीं जान पाए कि श्री कृष्ण स्वयं भगवान हैं।
और यह भी नहीं जान पाए कि जिसके पक्ष में श्री कृष्ण है उनका यहां से पल्लू नहीं हटा पाए तो हम क्या बिगाड़ सकते हैं पर अपनी मूढ़ता से भगवान संधि कराने गए थे तो भी नहीं माना अपनी मूढ़ता का आरोप करके भगवान को नहीं माना भगवान गए थे संधि कराने फिर भी नहीं सर्वनाश हो गया जीव की यही दुर्दशा है यदि जीव किसी भगवत प्रेमी महात्मा का आश्रय ले ले तो यह मूढ़ता नष्ट हो जाए अज्ञान नष्ट हो जाए लेकिन वो मूढ़ता आने नहीं देती वो मूढ़ता शरण में नहीं होने देती क्योंकि पदवी घट जाएगी वो सम्मान घट जाएगा कि अरे ये गए क्योंकि मूढ़ता बैठी हुई है वो स्वयं दूर नहीं कर सकता।
मूढ़ता दूर करने के लिए भगवान के प्रेमी महा भागवत जन विराजमान संसर्ग मात्र से मूढ़ता का नाश दरस परसनाश बास निज संग करो दिन संत दर्शन संत संभाषण मात्र से मूढ़ता का नाश और उनकी आज्ञा पर चल देने पर परमात्म तत्व का बोध भगवान का साक्षात्कार भगवान के दर्शन तभी होते हैं जब भगवान भगवान के प्रेमी जन आप पर रीझ जाए और भगवान अपनी माया का पर्दा हटा दे तब होते हैं। इसीलिए कहा गया भगवत कृपा से भगवत साक्षात्कार होता है। साधना करते करते जब हम रोने लगते हैं रुदम राजन कृष्ण दर्शन लालसा तो रीझ जाते हैं।
पर्दा हटा देते हैं और दर्शन दे देते हैं। अपना अज्ञान मिटाना। अब अज्ञान जैसे हमारे मल भरे हाथ दोनों हैं। अब हम इनको कहां धोएं? कोई निर्मल हाथ वाला निर्मल जल से डाले तो हम धुल जाए। ऐसी हमारी मूढ़ता छा गई। यदि भगवान की कृपा से परम विवेकवान ज्ञानी भगवत प्रेमी महात्मा गुरुजन मिल जाए हमारी श्रद्धा बन जाए तो हमारी मूढ़ता नष्ट हो जाए। जो अपनी मूढ़ता का नाश कर चुके हैं। भगवत प्रेमी महात्माओं का संग करते हैं। भगवान की उन पर विशेष कृपा होती तो वो दर्शन नहीं लीला में प्रवेश पा जाते हैं।
वो लीला को देख सकते हैं। अनुभव कर सकते हैं। बिना भगवान की कृपा के इस माया का पर्दा नहीं हटता और माया का पर्दा नहीं हटता तो फिर भगवान का भाव ही नहीं रह जाता। ऐसी विचित्र माया है। अवतार का अर्थ है नीचे उतरना। भगवान इतने महान अपने जनों को आनंद देने के लिए अवतरित होते हैं। नीचे उतरते हैं। भगवान के समान सिर्फ भगवान हैं। कोई भी साधु महात्मा ऋषि मुनि साधना करके ऊपर उठता है। हमारे भगवान अपनी महिमा से नीचे उतरते हैं। इसीलिए बूंद तब तक बूंद ही रहेगी जब तक समुद्र में लीन नहीं हो गई।
समुद्र में लीन हो गई तो अब बूंद नहीं रहा। सिंध हो गया वो लेकिन अलग रहकर वो बूंद बूंद ही रहेगी। ध्यान रखना सिंधु में समा गई तो वो सिंधु हो गई। बूंद ये बूंद है जब तक ये बूंद सिंधु में नहीं समा जाते तो बूंद ही रहेंगे। साधना से तपस्या से योग से ऊपर उठा जाता है। हमारे भगवान कृपा करके नीचे उतरते हैं। अवतार लेते हैं। सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा अपने अनन्य भक्तों के लिए अवतार लेते हैं। उनको सुख देने के लिए, अत्यधिक कृपा करने के लिए, उनके साथ खेलने के लिए, उनके साथ वार्ता करने के लिए वो छोटे बनकर अपनी महिमा से उतर कर आते हैं।
दूसरे लोगों को प्रभाव या महत्व तो बड़े होने पर होता है। पर हमारे भगवान का प्रभाव और महत्व छोटे होने पर हुआ। भगवान जितना छोटे बन गए उतना ही प्रभाव इतने बड़े भगवान अपने भक्त के चरण चाप रहे हैं। अपने भक्त के रथ को हाक रहे हैं। अपने भक्त के लिए नौकर बने हुए हैं। उतरते हैं। उनकी महिमा यह है और यहां जो जितना बड़ा होता है उसका प्रभाव होता है। अनंत होकर भगवान सीमित रूप धारण कर लेते हैं। नंद नंदन असीम व्याप्त अनंत ब्रह्मांड उसके एक रोम कूप में है। ऐसा महान है वो दिखरावा माते तन अद्भुत रूप प्रचंड रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मांड एक एक रोम में करोड़ करोड़ ब्रह्मांड कैसे इनको पता चलेगा जो मूढ़ आत्मा है कि भगवान क्या है अरे बहुत ही विचित्र है।
पहले तो एक शिशुपाल था। यहां गलीगली शिशुपाल पैदा हो रहे। पर वह केवल भगवान में ही तन्मय था। इसलिए भगवत प्राप्ति हो गई। ये विषयों में तन्मय होकर के भगवान के प्रति अस्तित्व का ही ये बड़ा शोक का विषय है कि आज की समाज भगवान पर अस्तित्व अस्तित्व पर संशय हो रहा है। कितनी बड़ी मलिनता कलयुग ने डाल दी। भगवान अनंत ब्रह्मांडों को अपने एक रोम कूप में धारण ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रतििवेद कहे भगवान की असीम अनंत कृपा होती तब वह अवतार धारण करते जन साधारण को दर्शन देने के लिए जिसके सामने जैसी सामर्थ होती वैसे सामर्थ्य रखकर भगवान प्रकाशित होते हैं जो बिल्कुल भोला भाला होता है उसके साथ बिल्कुल भोली वैसी लीला करते हैं।
जो बहुत प्रवीण होता है उससे परम प्रवीण होकर के ग्वाल बाल है तो कभी वो घोड़ा घोड़ा खेलते तो भगवान उनके ऊपर चढ़ते कभी वो भगवान के ऊपर चढ़ते वो घोड़ा बने हुए हैं। यह देखकर बड़े-बड़े ब्रह्म ऋषियों के दिमाग चकरा जाते हैं कि जो ध्यान में आने वाले नहीं उनके साथ तभी तो ब्रह्मा जी की भी बुद्धि काम नहीं की। जब ऐसे बुलाया सखा ने अपने मुंह की छाछ उनके मुख में डाल दी तब लगा यह ब्रह्म है। तब परीक्षा की भावना आ गई और बछड़ों को सखाओं को अपहरण कर लिया। फिर जब देखा वही स्वयं ब्रह्म सखा और बछड़ा बना हुआ खेल रहा है।
भगवान के प्रभाव को जानने वाले ज्ञानी महात्मा लोग तो अपने उस आत्म स्वरूप प्रभु में मस्त रहते हैं। पर भक्तों के लिए भगवान साधारण से साधारण लीला उनके साथ करने में नहीं सकुचाते। भक्तों पर विशेष कृपा भगवान की होती है। ज्ञानियों के आत्म स्वरूप भगवान है। लेकिन भक्तों के पर्सनल उनके जैसे हैं। बड़े बड़े ऋषि मुनि योगी तपस्वी संत महात्मा भगवान की लीलाओं को जानकर आश्चर्यचकित होते। वही भगवान अपने अंतरंग भक्तों के साथ ऐसे खेलते जनसाधारण की तरह। ऐसी लीला आप त्रिभुवन में कहीं नहीं सुनेंगे।
एक ब्रजवासिनी नौ वधू को गोपी ने कहा वयो वृद्धा गोपी ने कि 11 छरिया यहां गोबर डालना है उपला बनाना है और ज्यादा पढ़े लिखे तो थे नहीं एक भरा सोचा भूल जाऊंगी तो उधर आ रहे थे लालजू महाराज तो बुलाया कान्हा खड़ा किया एक टिक्की दो टिक्की जब 11 टिक्की हो गई बोले हां 11 छ जाओ ये परम ब्रह्म परमात्मा है ब्रज का 11 छिया गिरने के लिए चेहरे पर गाय के गोबर की 11 ते टिक्की लगा दी। कैसे बड़े-बड़े ब्रह्म ज्ञानी गाय चराते समय ग्वाल बाल खेलते समय ऐसे ऐसी बातें कर रहे कि बड़े-बड़े जो इनके प्रभाव को जानने वाले बुद्धि काम नहीं करती।
भगवान महान बलशाली राक्षसों को चुटकी में एक क्षण में मिट्टी में मिला देते हैं। नष्ट कर देते हैं। और छोटे-छोटे बालकों से डरते हैं। कन्हैया तू दांव नहीं देगा। चल आज से तुम्हें खेल में सम्मिलित नहीं करेंगे। बाहर निकल कान पकड़ते हैं। रोते हैं। कहते हैं नहीं खेल में सम वही और उन्हीं के बीच में अगासुर बकासुर बड़े-बड़े बलशालियों को चुटकी में मीस के फेंक देते हैं। सखाओं को थोड़ी लगता है ऐसा कुछ। उन्होंने मेरा कन्हैया है। भगवान ऐसी लीला करते हैं जैसे कोई विद्वान पिता है और जब बालक उसका लड़खड़ाती वाणी में बोलता है तो वो वैसे ही बोलता है।
तो तुतला के बालक की जैसी बोलता है तो ततला वो बड़ा विद्वान है। पर बालक को प्रसन्न करने के लिए ऐसे ही मेरे श्री भगवान अपने भक्त की क्षमता के अनुसार वैसे रूप वैसे लीला वैसे संभाषण वैसे ही खेलते हैं। श्री भगवान कहते हैं हे अर्जुन यदा यदा ही धर्मस्य गिर भवती भारत अभानम धर्मस्य तदात्म शजाम्य हे भरतवंशी अर्जुन जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तब मैं अपने आप को साकार रूप में प्रकाशित करता हूं। वैसे मैं सर्वत्र व्याप्त हूं। यदा यदा ही धर्मस्य धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि जब होती है तो भगवान को बेचैनी होने लगती है।
भगवत प्रेमी धर्मात्मा सदाचारी निरपराध निर्बल इन पर जब नास्तिक पापी दुराचारी बलवान मनुष्य अत्याचार करते हैं। सद्गुण सदाचारों की एकदम धज्जियां उड़ जाती है। दुर्गुण दुराचार अत्यधिक सफल दिखाई देते हैं। वृद्धि को प्राप्त होते हैं। तब तब भगवान जब देखते हैं किसी संत महात्मा योगी मुनि से अब कुछ नहीं संभलेगा। तब आप पधारते हैं। जब जब आवश्यकता पड़ती तबत भगवान अवतार लेते हैं। एक युग में जितनी बार आवश्यकता और अवसर प्राप्त होता है उतनी बार अवतार लेते हैं। जैसे समुद्र मंथन में भगवान ने कई अवतार धारण किए।
उसी समय अजित रूप से देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन कर रहे हैं। कक्षप रूप से मंद्राचल को नीचे धारण किए हुए शास्त्रा हजारों भुजाएं से ऊपर पकड़े हुए हैं। अमृत लेकर के धनवंतरी रूप में प्रकट होते हैं। दैत्य लोग अमृत ले जाते हैं तो मोहिनी रूप धारण करके अमृत देवताओं को पिलाते हैं। एक ही लीला में कई अवतार धारण कर लिए। अधर्म की वृद्धि और धर्म का ह्रास होने का मुख्य कारण है नाशवान पदार्थों की ओर आकर्षण। जैसे केवल माता पुत्र पैदा नहीं कर सकती। पिता का संयोग अत्यंत आवश्यक है।
ऐसे ही यह प्रकृति स्वयं रचना नहीं कर सकती। इसमें पिता परमात्मा की आवश्यकता उसी के संयोग से ये संपूर्ण ब्रह्मांडों की रचना हुई है। प्रकृति और परमात्मा यही असली माता-पिता है सबकी सृष्टि के। ये जो शरीर देख रहे हैं जितनी रचना देख रहे हैं ये दो से बना हुआ है। परमात्मा तत्व और प्रकृति के द्वारा। हर जगह आपको दो मिलेंगे। कोई ऐसा कण नहीं जहां दोनों हो। सब जगह परमात्म तत्व व्याप्त है। कोई जगह ऐसे मुर्दे में भी व्याप्त है। मुर्दे में वेन के शरीर को मथा तो भगवान निकल आए।
प्रथु भगवान का अवतार हो गया। खंबे से भगवान नरसिंह रूप में निकल आए। धन जाट को भांग का सिलबट्टा दिया था। उससे भगवान प्रकट हो गए। कुत्ते से नाम दे भूत से भगवान को कोई ऐसी जगह नहीं जो भगवान ना हो और प्रकृति ये जितना हमारे नेत्रों से दिखाई दे रहा मन से सोचा जा रहा है सब प्रकृति के अंतर्गत है। गोचर जहां लगु मनुजाई सो सब माया जानो भाई दो से ही बना हुआ है। बिना परमात्म तत्व के प्रकृति कुछ नहीं कर सकती। जैसे हैलोजन है बिजली से ही चमकेगा इसमें चाहिए बिजली पावर चाहिए बिजली गई अंधेरा छा जाएगा ऐसे प्रकृति एक यंत्र है करण है पर इसका कारण परमात्मा है जितना जड़ चैतन्य सुंदर दिखाई दे रहा है इसकी सुंदरता में श्री कृष्ण ही विराजमान है परमात्मा और प्रकृति दोनों से बना हुआ है वो अविनाशी निर्लेप और ये विनाशी परिवर्तनशील प्रकृति का जितनी रचना है वह क्षण क्षण नाश को प्राप्त होता रहता है।
बदलता रहता है। वो एक रूप कभी नहीं रह सकता प्रकृति का और परमात्मा कभी परिवर्तनशील नहीं होता। सदैव एक रूप रहता है। ऐसे ही भगवान का अंश जो वो एक रूप अविनाशी चैतन्य घन और यह शरीर सब परिवर्तनशील पहले नहीं था। बाद में नहीं रहेगा। अब भी नहीं है। यह बदल रहा है। एक एक क्षण किंचिन मात्र भी अपने स्वरूप में परिवर्तन नहीं हो परमात्मा जिसका परिवर्तन वो प्रकृति किंचिन मात्र एक रस नहीं रह सकती परिवर्तन ही परिवर्तन जब कोई अनित्य उत्पत्ति विनाशील प्राकृत पदार्थों से सुख भोग की इच्छा करता है तो उससे पाप बनने लगते हैं।
पतन होता है। और ऐसे जिनका हृदय पतन हो जाता है। वह भगवान और भगवान के वाक्यों को स्वीकार नहीं करते। पापत्मा पुरुष जो पे दुष्ट हृदय सोई होई मोरे सन्मुख आओ कि सोई पापवंत कर सहज सुभाव भजन मूर्त भाव न काऊ जहां अधर्माचरण बढ़ने लगा पापाचरण बढ़ने लगा कलह विद्रोह दोष विभचार नाना प्रकार के बढ़ने लगे तो फिर भगवान उसको रोकने के लिए अगर किसी ऋषि मुनि के अंदर बैठकर काम चल जाता है तो भगवान ऐसा भी करते हैं। ऋषि मुनि के अंदर बैठकर काम चलने का मतलब कोई भी ऋषि मुनि पाप को नष्ट करके उसको सौहार्द भाव सत्य भाव में स्थित करता है।
कभी वो पापी को नष्ट नहीं करता। ध्यान रखना। यह है काम चलना। अगर परिवर्तन हुआ तो हुआ और नहीं हुआ तो अब वहां भगवान परिवर्तन करने के लिए नहीं आते। फिर परित्राणाय साधु नाम विनाशाय दुष्कता साधु दुष्कृति का विनाश करके उसके अंदर साधुता भरता है। जब तक भगवान की महिमा कृपा अंदर रही तो ऐसा विस्तार करता है। जब भगवान देखते हैं अब यहां भी काम नहीं चलेगा। ना मंत्र से ना उपदेश से अब काम नहीं चलता। हमारे साधु महात्माओं का इनकी तपस्या बड़ी है। इनका रुद्र रूप बड़ा है।
तो फिर भगवान स्वयं अवतरित होते हैं। उनको साधुता देने के लिए नहीं विनाशाय दुष्कृताम दुष्कृत करने वालों का विनाश करने के लिए प्रकट होते हैं। सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग, कलयुग इन चारों युगों में देखा जाए तो धर्म का क्रमश ह्रास होता चला जाता है। जब धर्म का संपूर्ण हस होने लगता है किसी भी भगवान अवतरित हो जाते हैं। तदात्मानम सजाम्यम जब जब धर्म हानि और अधर्म वृद्धि को प्राप्त होता है तो भगवान अवतार धारण करते हैं। कई अवतारों के स्वरूप हैं। कारक महापुरुषों के रूपों में जीवन मुक्त महापुरुषों को भेज देते।
जाओ संभालो। जैसे एक समय बड़े-बड़े महापुरुष एक साथ पैर प्रकट हुए अलग-अलग प्रांतों में प्रकट हुए संभाल रहे हैं। हर जगह अपने अपने सीमा में भक्ति का प्रकाश करके अधर्मियों की वृत्तियों का परिवर्तन कर रहे हैं। जब ऐसा भी होता है कि कारक पुरुषों से काम नहीं चलेगा। भगवान फिर स्वयं अवित होते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है किसी संत महापुरुष के हृदय में प्रकाशित होकर के धर्म की स्थापना अधर्म वृत्तियों का नाश करते हैं। व्यक्तियों का नहीं अधर्म वृत्तियों का कभी कारक पुरुषों के रूप में जब किसी से कार्य नहीं चलता जैसे कंस का उपद्रव जरासंध भौमासुर जब कृष्णा अवतार कितने बड़े-बड़े समरासुर बड़े-बड़े ये किसी मंत्र औषधि योग बल तपस्या के द्वारा काबू में नहीं किए जा सकते थे।
चपाल दंतवत बड़े-बड़े कृष्णा अवतार रामावतार में भी तब सब ऋषि मुनि देवता भगवान ब्रह्मा पृथ्वी गौ का रूप धारण करके प्रभु को पुकारते हैं कि अब मेरे बस की बात नहीं रह गई तब भगवान तदात्मानम सजाम्यहम प्राणी मात्र का परम मंगल करने के लिए धर्म की स्थापना के लिए भगवान अपने को प्रकाशित करते हैं। है सर्वत्र भय प्रकट कृपाला दीन दया वो प्रकट हो गए परित्रााय साधु नाम विनाशाय च दुष्कता धर्म संस्थापन्थाय संभवा युगे युगे साधुओं की रक्षा भक्तों की रक्षा करने के लिए पाप कर्म करने वालों का अधर्म आचरण करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की भलीभांति स्थापना करने के लिए मैं युग युग में प्रकट हुआ करता हूं।
अर्जुन जी से कहते हैं परित्राणाय साधु नाम साधु मनुष्यों के द्वारा अधर्म का नाश और धर्म का प्रचार होता है। इसलिए भगवान साधुओं की रक्षा के लिए अवतार धारण करते हैं। साधु किसे कहते हैं? जो सदैव दूसरों का हित करने का स्वभाव रखता है। जो स्वयं बड़े से बड़े कष्ट को सहकर दूसरों का मंगल करता है। जो सदैव भगवान के नाम रूप गुण प्रभाव लीला में निरंतर डूबा रहता है। और दूसरों को प्रेम पूर्वक नाम स्मरण नाम कीर्तन भगवत लीला आदि में लगाता है। ऐसे भगवान के भाव में डूबे हुए आश्रित जनों को साधु नाम पद कहा गया है।
जिसका एकमात्र परमात्मा ही है उसे साधु कहते हैं। जिसका एकमात्र परमात्म प्राप्ति उद्देश्य है उसे भी साधु कहते हैं। जिसका नाशवान संसार के भोगों का उद्देश्य है उसे ही असाधु कहते हैं। असत परिवर्तनशील वस्तुओं में जिसकी कामनाएं बढ़ चुकी हैं। ज्योंज्यों कामनाएं भोगी जाती त्यों त्यों असाधुता बढ़ती चली जाती है और साधुता क्षीण होती जाती है। साधुता लुप्त हो जाने पर अधर्माचरण बुरा नहीं लगता। ध्यान रखना जिसका पवित्र हृदय थोड़ी भी गलती करेगा तो जलेगा। और वही जब गलती पर गलती गलती पर गलती करता जाएगा तो फिर उसकी जलन खत्म हो जाएगी।
साधक को महसूस होता है मेरे से गलती हो गई। वो जलता है रोता है और जब भयंकर पापाचरण होने लगता है तो उसे गर्व होने लगता है कि मैं ऐसा भोगता करता हूं। उसको कोई ग्लानी नहीं होती। जैसे कोई कहते हैं कि हमको तो कोई ग्लानी नहीं हुई। हमारा तो कोई क्योंकि तुम्हारा मलिन अंतःकरण हो गया। इसलिए देखो जोज भोगों में वृत्ति बढ़ती चली जाती है तो पापाचरण बढ़ता है। पापाचरण बढ़ने से साधुता लुप्त होती है। असाधुता का मूल वो मूढ़ता वो कामना बढ़ती चली जाती है। हृदय मलिन हो जाता है।
उसको ग्लान भी नहीं होती। पश्चाताप भी नहीं होता। साधु पुरुष पशु पक्षी वृक्ष मनुष्य देवता पितर सबका हित सबका आनंद सबका सुख चाहते हैं। वही साधु होते हैं। यदि सच्ची बात तुम संतों के मन के भाव को जान जाओगे तो उनके चरणों को पकड़ लोगे। यह विपरीत दुष्ट लोग बाहर से केवल मृदु बोलते हैं। इनके अंदर केवल दूसरों को दुख देने की बात रहती है। सुख लूटने की बात रहती है। यहां कहते हैं कि यदि भगवान साधु पुरुषों की रक्षा किया करते हैं तो फिर संसार में साधु पुरुष दुख क्यों पाते हुए देखे जाते हैं?
इसका समाधान है कि साधु वही है जो शरीर धन संपत्ति मान बढ़ाई आदि की रक्षा नहीं चाहता। अपने भाव की धर्म की रक्षा चाहता उसे साधु कहते हैं। और भगवान की भी दृष्टि में शरीर और मान बढ़ाई धन संपत्ति की कोई महत्व नहीं है। मायाकृत है। भक्त भी नहीं चाहता और भगवान भी इसको जानते हैं। इसलिए भगवान उसके भाव को दृढ़ करते हैं। परिस्थिति को नहीं। एक कमजोर हृदय वाले परिस्थिति का सुधार चाहते हैं। भक्तों में सांसारिक पदार्थों का महत्व उद्देश्य पहले ही प्रारंभ में नष्ट हो गया था।
शरीर का भोगों का सम्मान का इनका प्रतिकूलता दुख परिस्थिति जैसे जैसे आती है भक्त में अखंड प्रसन्नता बढ़ती चली जाती है। ये अंदर की बात अंदर की बात समझो। जैसे जैसे दुख प्रतिकूलता होती है वैसे वैसे आध्यात्मिक अनुभूतियों की तरफ आगे बढ़ता है भक्त दूसरे लोग देखते हैं कि उसे बड़ा संकट है विपत्ति है दुख है लेकिन उसकी अनुभूतियों को नहीं वो भगवान प्रदत्त है वास्तव में प्रतिकूलता वही है जो भगवान से विमुख कर दे वो प्रतिकूलता वो दुख विपत्ति नहीं जो भगवान के अनुभव में डुबो दे सांसारिक राग आसक्ति से पतन होता है।
इसलिए भगवान अपने भक्त की प्रतिकूलता, विपत्ति, दुख आदि पर ध्यान नहीं देते। उसके भाव को दृढ़ करते हैं। अध्यात्म की ऊंचाई बढ़ाते हैं। इसलिए भगवान भक्त के पास आई हुई प्रतिकूलता सुरक्षित रखते हैं। कहीं फस ना जाए। अनुराग में अनुकूलता में संसार के राग अनुराग में आगे बढ़े। इसलिए पग पग पर भक्तों के जीवन में प्रतिकूलता देखी गई और उनको कभी निराश उदास थोड़ी देखा गया। विनाशाय दुष्कृतम दुष्ट मनुष्य अधर्म का प्रचार करता है। धर्म का नाश करता है। दुष्ट की पहचान जो शास्त्र विरुद्ध आचरणों को स्थापित करता है।
शास्त्र विधान का खंडन करता है उसे दुष्ट कहते हैं। कोई भी हो जो शास्त्र विधान का सम्मान करता है और शास्त्र निषेध का त्याग करता है उसे धर्मात्मा साधु कहते हैं। महात्मा कहते हैं। भगवान उनका विनाश करते हैं। जो शास्त्र विधान का उपहास करते हैं और निषेध की स्थापना करते हैं। यह नहीं करना चाहिए तो कहते करो। कोई भी हो परिणाम देख लेना। परिणाम देख लेना। विवेकवान परिणाम का इंतजार करते हैं। तुम क्या बो रहे हो यह नहीं देखते। जब काटोगे तब तुम्हें बताएंगे क्या काटा तुमने।
जो मनुष्य कामना के अत्यधिक बढ़ने के कारण झूठ, कपट, छल, बेईमानी, दुर्गुण, दुराचारों में लगे होते हैं। उनका स्वभाव बन जाता है शास्त्र की निंदा करना, साधु की निंदा करना। सद्गुण, सदाचारियों पर अत्याचार करना, उनको दुख देना। भगवान कहते हैं ऐसों का विनाश मैं स्वयं करता हूं। तकर काल रूप में भ्राता उनके लिए मैं काल दंड बन जाता हूं। दुष्कर्ताम दुष्कृति करने वालों का विनाशाय दुष्कर्ताम विनाश करता हूं। महाराज भगवान तो सब प्राणियों में सम है। उनका ना तो कोई मित्र है ना बैरी है।
फिर वह तो बोले समोहम सर्वभूते नमे द्वष्य न में प्रिय फिर ये क्या लीला है अरे उनके लिए जैसे महात्मा तैसे दुरात्मा वो तो सब में विराजमान है। उनके लिए ना तो कोई द्वेष का पात्र ना कोई राग का पात्र है। समाधान उत्तर संपूर्ण प्राणियों के परम श्रृद्ध होने पर भगवान किसी से भी बैर नहीं करते। पर ध्यान रखो भगवान का एक वचन है। वह अपने शरणागत का पक्षपात करते हैं। हम भक्त पराधीनो असतंत्र जो भगवान के भक्त से वर कर लेता है। भगवान उससे वर कर लेते हैं। सुनो सुरेश रघुनाथ सुभा निज अपराध रिसा न का जो अपराध भगत कर कर राम रोष पावक सो जई भक्त भक्तिमान भगवान का अपराध कर दोगे तो क्षमा कर देंगे लेकिन भक्त का अपराध कर दोगे तो पक्की दुश्मनी ठान लेंगे दुखिया को ना सताइए दुखिया देगा रोए जब दुखिया के मुखिया सुने तो तेरी गति क्या होए एक काल के थप्पड़ में सब फैल जाता है ये तो अभी जवानी है और बुद्धि चल रही है तो जो चाहो बोल लो समय आएगा बोलने लायक नहीं रहोगे प्रार्थना करने लायक नहीं रहोगे भगवान का स्वभाव है।
उनका अपराध कर दोगे क्षमा कर देंगे। भक्त का अपराध करोगे सीधे वर भगवान ले लेंगे। कौन निपट सकता है हमसे? भक्तों को कष्ट देने वाले, निंदा करने वाले, अपराध करने वाले, दुष्टों को स्वयं भगवान अपना दुश्मन मानते हैं। पाप का विनाश भक्त करते हैं और पापी का विनाश भगवान करते हैं। यह पाप का विनाश भक्त करते हैं। पापी का नहीं पापी का विनाश भगवान करते हैं। अगर भक्त की शरण में आ जाए तो पापी रहेगा ही नहीं। क्योंकि पाप नष्ट हुआ तभी तो वो साधु हृदय का संग कर पाएगा। साधु संग मात्र से संत दरस जिम पातक टरे साधुओं का परित्राण भगवान जिस कृपा से करते हैं उसी कृपा से युक्त होकर दुष्टों का विनाश करते हैं।
क्योंकि साधुओं के परित्राण में भगवान का जितना प्यार है उतना दुष्टों से भी प्यार है। क्या दुष्टों को मारकर परम पद देते हैं। साधुओं को प्यार करके परम पद देते हैं। क्योंकि वह वर करते हैं इसलिए उनको ऐसे भगवान उद्धार करते हैं। भगवान किसी के प्रति भी तनिक भी अमंगल भावना नहीं पर भक्त के द्रोह करने के कारण जहां किसी भक्त को कष्ट दिया जाएगा फिर भगवान उसे चैन से नहीं रहने देंगे समय पर होता है ये तत्काल थोड़ी होता है कि तत्काल तुम्हें दे गंगा किनारे एक परम महामहिम स्थान है पूज्य स्वामी श्री आत्मा प्रकाश जी महाराज बहुत ही महान तपस्वी भजनानंदी अखंड ब्रह्मचारी ढणी घाट उन लोगों ने दर्शन किए अस्थि मात्र होए रहे शरीरा और तेजोमय ऐसा लगता भुवन भास्कर रामबाग से निकल रहे इतना देखो तो तेजोमय नीचे का देखो तो अस्थि मात्र होए रहे शरीरा लंगोटी जरा साचला ऐसा हनुमान जी महाराज विराजमान है जब वह रामायण की चौपाई बोलते थे तो ऐसा लगता था ब्रह्मलोक से आवाज निकल रही परम पवित्र तो रात्रि में कुछ चोर आए क्योंकि सोने का छत्र ये सब हनुमान जी महाराज का बहुत सी ऐसी आभूषण सामग्रियां थी स्वामी जी को पीटा दंडों से अष्ट मात्र हृदय का बड़े-बड़े कानपुर के अधिकारी जन प्राण समर्पित करने वाले थे।
बहुत उनका प्रभाव था। जैसे उस उनका व्यवहार गांव की भाषा थी। उरे कलेक्टर ऐसे बात उरे कलेक्टर रोड बन जाएगा ये वाला बन जाएगा। हां सरकार हा सरकार ये बनवा दे ऐसे गांव के बाद बिल्कुल सरल स्वभाव नमन को टिलाई परमहंस सुबह जे पता चला स्वामी जी को मैं पूरा का पूरा अलग-अलग बड़े-बड़े सब ऑफिसर लोग स्वामी जी बस आप इशारा भर कर दो स्वामी जी जानते थे त्रिका लग गए थे उन्होंने कहा नहीं किसी ने नहीं मारा नहीं महाराज ये देखो आपको इतनी चोट लगी बोले हमारे कर्म का फल हनुमान जी ने दिया कोई कर्म बोले स्वामी जी ये सब बातें बाद में हम सुनेंगे आप थोड़ा बोले हम जानते ही नहीं तो जानते हो कुछ महीने बाद उन लोगों की जो दुर्दशा हुई कि चिल्ला चिल्ला के कह रहे थे कि हमने स्वामी जी को मारा हमने ये सामग्री लूटी हमने अमुक जगह बेचा स्वामी जी से कह दो मुझे क्षमा कह दे चिल्ला चिल्ला के वो विध्वंस लीला हनुमान जी ने शुरू की चिल्ला चिल्ला के अपने आप बोलने लगे अगर साधु मौन हो जाए तो भगवान के हृदय में आग पैदा हो जाएगी और वो उसको यह कृपा मनाओ कि साधु सभा में गाली दे दे, दंड दे दे तो बच जाओगे।
नहीं मालिक अगर स्वयं में दुश्मनी ले ले तो निर्वाह करना मुश्किल हो जाएगा। भगवान का बहुत करुणामय स्वभाव है। पर जब उनके लाडले भक्त को कोई सताता है तो फिर राम रोष पावक सूझ रही। धर्म संस्थापनार्थाय संभवाम युगे युगे भगवान धर्म की स्थापना भगवान धर्म को साक्षात धर्म स्वरूप है इसीलिए अगर चैन से रहना शांति प्राप्त करना है मंगल मोद सुख प्राप्त करना धर्म का मार्ग खोजो धर्म किसे कहते हैं उसके अनुसार चलो परम धर्म का मार्ग स्वीकार करो धर्म का आश्रय लेना ही भगवान का उद्देश्य है संस्थापना करने के लिए भगवान आचार्य गुरुदेव के रूप में प्रकाशित करते हैं।
जब उसकी हानि होती है तब पुनः प्रकट होते हैं। विनाश लीला करते हैं। फिर धर्म स्थापना करते हैं। संभवाम युगे युगे आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक युग में कई बार अवतार ले लेते हैं। एक युग में जितनी बार जरूरत पड़ती है उतनी बार कभी कारक पुरुषों के रूप में कभी संत महात्माओं के हृदय के रूप में किसी भी संत के हृदय में बैठ गए भारी प्रकाश भारी प्रचार वो भगवान कर रहे हैं। भगवान कभी नैमितिक अवतार कभी अंशा अवतार कभी कला अवतार विविध अवतारों के रूप में लेकिन संत महात्माओं का यह नित्य अवतार है।
भगवान तो सर्व समर्थ है। फिर संतों की रक्षा करना, दुष्टों का विनाश करना, धर्म की स्थापना करना इसके लिए अवतार लेने की क्या जरूरत है? एक संकल्प से अनंत ब्रह्मांड प्रकट हुए। तुम दुष्टों का विनाश संकल्प से ही कर देते ना। समाधान भगवान अवतार के बिना सब कुछ एक क्षण में पलक झपकते कर सकते हैं। लेकिन जिन भक्तों ने आकांक्षा की कि यार बनकर हमारे साथ खेले, कांत बनकर हमारे साथ खेले, लाला बनकर हमारे आंगन में घुटनों के बल चले। इसकी पूर्ति संकल्प से नहीं होगी। इसके लिए तो अवतार लेना पड़ेगा।
विशेष कृपा करने के लिए अपने भक्तों को सुख पहुंचाने के लिए भावनुसार भगवान अवतार धारण करते हैं। अवतार काल में भगवान का दर्शन होता है, स्पर्श होता है, वार्तालाप होती है और जो भगवान लीलाएं करते हैं, उनको जो गाता है, श्रवण करता है, चिंतन करता है, उपदेश करता है, आचरण में लाता है, वह सब भगवान को प्राप्त हो जाते हैं। सदा सबका उद्धार करने के लिए भगवान का अवतार होता है। भक्तों को सुख पहुंचाने के लिए उद्धार होता है। दुष्टों को परम पद प्रदान करने के लिए भगवान का अवतार होता है।
भगवान के लिए कोई कर्तव्य नहीं है। उन्हें कुछ पाना नहीं है। वो केवल अपने भक्तों के आवाहन पर अवतरित होते हैं। इसलिए सबको चाहिए कि धर्म के द्वारा अपने जीवन के कर्तव्यों का पालन करते हुए भगवान का स्मरण करें। इसी से परम सुख परम शांति की प्राप्ति होगी। जो भगवान के नाम जप को निषेध करें। जो भगवान की महिमा की अवहेलना करे शास्त्रों को झूठा बताए। कान में अंगुली डालो उठकर चल दो। उस सभा में मत बैठना नहीं तो पाप लगेगा। और उस पुरुष की दुर्गति जो होगी अगर तुम जीवित रहोगे तो देख लेना पक्की बात है शारीरिक दुर्गति मानसिक दुर्गति और अंतत गत्वा परिणाम दुर्गति इसलिए बहुत सावधान होकर के चला जाए निरंतर भगवान का नाम गुण रूप लीला धाम का आश्रय और आचरण हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार होना चाहिए तभी जीवन मंगलमय हो जाएगा अभी अवसर है निकल चलो आगे आपको अवसर भी नहीं मिलेगा।
बुद्धि ही इतनी पवित्र हो जाएगी कि भगवत प्राप्ति की चाह ही नहीं रह जाएगी। सत्संग मिलना दुर्लभ हो जाएगा। इसलिए अभी अवसर है। खूब नाम जप करो। अपने को बचाओ कुसंग से और भगवान की प्राप्ति कर लो। इस जन्म मरण के चक्र से छूटकर अत्यंतिक महा सुख को प्राप्त हो जाओ। शेष चर्चा आगे श्री राधा वल्लभ लाल की
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मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)
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