॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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ताज़ा

ये सब बातें अगर आपके अंदर हैं तो आप पक्के हरिवंशी हैं //29/03/26

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पूज्य श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का सत्संग — पूरा सुनने के लिए ऊपर वीडियो देखें।

पूरा प्रवचन

जय हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंशंस जय जय श्री हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंश जय जय श्री हरिव [गाना गाने की आवाज़] गुरु हरिवंश प्राण हरिवंश जीवन हरिवंश सर्वस्व हरिवंश गुरु हरिवंश प्राण हरि जीवन हरिवा हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंश जय हरिवंश जय जय श्री हरिवंश जय हरि जय हरि जय जय हरिवंश जय श्री हरिवंश [गाना गाने की आवाज़] श्री हरिवंश सावधान हरिवंश धर्मी अपने धर्म को समझो धर्मी होकर के यदि धर्म को ना समझा तो चलने में कठिनाई होगी। जो धर्म सो प्रीत नहीं सो कहा भयो जो धर्म जुकायो अगर हरिवंश धर्मी से प्रेम नहीं करोगे तो हरिवंश धर्म को समझ नहीं पाओगे और हरिवंश धर्म जहां विराजमान है भगवत धर्मो जीत के निज प्रेमा ठहरंत सबके ऊपर भागवत धर्म भागवत धर्म के ऊपर भी ध्वजा फहरा रही है राधा वल्लभ लाल की निज प्रेमा ठहर इसलिए सार भजन हरिवंश को ध्यान से सुनो कि आप जिस धर्म में दीक्षित हो उस धर्म का क्या स्वरूप है क्या महिमा है श्री हरिवंश सुजस गाय सो रस सब रसिक कनु पाई श्री हरिव सुरसिस सब फल पाो कियो सुकृत सबको फलो कियो सुकृत सबको फल सुित सब को सुित सब को भयो श्री हरिवंश के द्वारा जो वाणी जी का गान किया गया है इसके गान मात्र से इस रस की प्राप्ति हो जाएगी।

श्याम श्यामा प्रगट प्रगट अक्षर निकट प्रगट रस श्रवत अति मधुर वाणी सो जुबानी रसिक नित्य निशिदिन रटत कहत और सुनत रस रीति जानी चतुरासी जी स्पुट वाणी सुधाानिधि गान करना और श्रवण करना बस इसी से सब कुछ प्राप्त हो जाएगा हमें और कोई साधन की जरूरत नहीं है। नाम मंत्र वाणी हरिवंश महाप्रभु के द्वारा दिया हुआ निज मंत्र हरिवंश महाप्रभु के श्री मुख से निकली हुई श्रीमद् चतुलासी जी स्पट वाणी और श्रीमद् सुदान जी इतना ही हमारी दौड़ होनी चाहिए। यही हमारी दौड़ का विषय है।

गुरु प्रताप से इतना ही रह गया है। पड़े हैं तो या तो निज मंत्र चल रहा है या चतुरासी जी का कोई पद चल रहा है। गुरु प्रताप से हमारा इसमें कोई बल नहीं है। वो अपने आप कोई ना कोई पद चल रहा है। या चतुरासी जी चल रही है। चतुरासी जी बड़ी सामर्थ्यशाली है। गाते रहो इच्छा जागृत हो जाएगी देखने की कि जिनका हम यश गान कर रहे हैं वो कैसे है। ये सब बातें अविश्वसनीय है। आप लोग विश्वास करें या ना करें। हित धाम में सोहनी लगा रहे थे। आपने देखा होगा एक ऐसे कुंजाकार गली है और पद चल रहा था।

आवत से वृभानु दुलारी रूप चतुरमन अंग रोमांच चिल्ला चिल्ला के रोने का मन हो रहा था अचानक दृष्टि गई तो दृश्य बदला वो सुंदर कुंज वो जो इधर चंपा के पेड़ खड़े थे बीच में कुंजाकार गली है देखा गल में यहां दिए सोहनी अलग गिरी और घंटो पड़े रहे घंटो उसानंद रात्रि में 11:00 बजे होंगे मदन टेरर और हित धाम के कोने में एक चौकी बनी हुई थी पुराने लोग जानते उसमें एक तमाल का वृक्ष था पद गा रहे थे मंजुल कलकुंज देश राधा हरि विषद राका नव कुमुद बंधु शरद जामिनी सावल कनक तमाल की उस चौकी के नीचे गल भैया देवी प्रिया प्रीतम खड़े और बैठ गए 12 एक बजे रात तक वही पड़े रहे कच्चा मार्ग था परिक्रमा मार्ग कैसे तुम्हें हृदय की बात बतावे ये कृपा और हम जब तुलना करेंगे तो बौना और आकाश फल की तुलना आएगी कि जैसे बौना अपना आकाश फल कभी प्राप्त नहीं कर सकता।

पर आकाश ही झुक कर हाथ में आ जाए। तो कृपा से यह बात हुई है। एक बार माट गांव का एक चरवाहा वो सीख गया था रसिकों की कृषि के गायन से तो बड़े जोर से गा रहा था। बनी श्री राधा मोहन जु की जोरी बनी श्री राधा मोहन जु की जोरी इंद्र नीलमणि श्याम मनोहर सात कुंभ तनु गोरी बनी श्री राधा मोहन झुकी बड़ी मस्ती से चल वहा पीछे से नपुरों की झकार पीछे मुड़ के देखा तो गलैया दी हुई प्रिया प्रीतम तो कहा आप कौन है वो जानते नहीं इतने सुंदर आप कौन है कहा हम हरिवंश जोड़ी है जो आप गा रहे हो ना बनी श्री राधा मोहन जी की जोड़ी वही हम है वो तो मतलब भगवान भागवती आभा में वो तो कांप रहा था प्रभु का सुंदर बोले जाओ मदन टे हरिवंश चंद्र जो उनसे कह दो कि राधा मोहन जी को भूख लगी है कढ़ी चावल खीर फुलका ये तो तुम्हारी गाय हम देखें भागा भागा आया मदन टेर में और हरिवंश महाप्रभु के चरणों में गिरा कहा राधा मोहन जो आए हमारी गाय देख रहे हैं और वो उन्होंने गिनाया है खीर, कढ़ी, फुल्का, चावल ये आज भी भोग लगता है इसका।

राधा वल्लभ जी में कुछ भी भोग लगे पर कढ़ी खीर फुलका और महाप्रसाद इसका जरूर भोग लगता है। राधा मोहन जुग की जोरी इंद्र नीलम मणि श्याम मनोहर सात कुंभ तन गोरी इतने से भगवत साक्षात्कार हो गया उसको आप चतुरासी जी नाम वाणी जहां श्याम श्यामा आप चतुरासी जी गा रहे हो चतुरासी जी का पद चल रहा है श्यामा श्याम आपके साथ है इच्छा करुणा करेंगे तो हमारे नेत्रों के सामने वो आ जाएंगे हमें चिंता नहीं करनी और देखो अगर हमारा बहुत मलिन हृदय है और वो ना भी सामने आए तो छूट 84 भ्रमते 84 लाख योनियों में तो जाना ही नहीं होगा 8रा जी का पाठ करने वाले को छूट महापुरुषों के आचार्यों के वचनों पर विश्वास करके ही हम भगवत मार्ग पर चलते हैं।

छूट चौरासी भ्रमंते अभी कल था यारस मगन मिटे भव त्रास छूट चौरासी भ्रमंते और निरख जुगल किशोर एक दो बार की बात नहीं सैकड़ों ऐसे अनुभव गुरु प्रताप से गुरु जी की कृपा से ऐसे चतुरासी जी के वो देखो दूसरों को एक आश्चर्य होगा अपना आहार है जब अभ्यास हो जाता है तो जहर भी जहर का काम नहीं करता है। एक महात्मा एक तोला रोज जहर खाते थे। संख्या उड़िया बाबा ने जब सुना तो वहां गए और कहा हम अपने सामने देखेंगे। तो उन्होंने 10 ग्राम तौल के एक तोला 10 ग्राम होता है। संखिया धतूरा जहर डाला और पीसा और पूरा धो के पी गए।

तो उन्होंने कहा महात्मा जी इतने में तो 10 20 आदमी मर जाए। आपको कुछ नहीं होता। बोले नहीं बोले पहले दिन एक बीज लेकर ऐसे घसा था और चाटा था और एक महीना एक बीज को घस के चाटते रहे। फिर दूसरे दिन तो आज हम 10 तोला जहर खा जाते हैं और कोई फर्क नहीं पड़ता। तो समझ रहे हो अभ्यास का इतना बड़ा कृपा प्रसाद चतुरासी जी निज मंत्र इतना मजबूत हृदय को कर देती है कि जहां प्रभु की एक भावनात्मक झांकी मूर्छित कर दे वहां अब अपने लोगों का तो बहुत ही हृदय वैसा कर दिया जाता है कि झांकी की क्या बात है उनको स्नान करवाना है उनके श्री अंगों को पोछना है उनके श्री अंगों में सुंदर उपटन लगाना है सुंदर अंगराग लगाना है सुंदर चंदन लगाना है अब वह मूर्छित हो जाए तो करेगा कौन इतना बड़ा बल महाबल श्रीमद् चतुरासी जी और निज मंत्र

प्रदान करता है बस बार-बार उसको कहत रटत सुनत रस रीत जाने कहत हरिवंश हरिवंश हरिवंश जपत हरिवंश हरिवंश वाणी हरिवंश वाणी का जप होता है चतुरासी जी का अब चल रही जो प्यार करे सोई भावे भावे जो सोई सोई करे अंदर पूरा और लेकर आज देख प्यारी रंग अब दो ढाई घंटे किसी से बोलना नहीं चुप शांत एकदम एकांत में बैठे अब जैसे यमुना किनारे है तो ये सब सेवारत है कहा एक कुर्सी में बैठे रहते हैं चुपचाप शांत बैठे अपना चल रहा है तो श्री हरिवंश सुजस गाइयो पक्का पक्का विश्वास करो सो रस सब रसिकन पायो कियो सुकृत सबको फल अनेक जन्मों का किया हुआ पुण्य फल आपको प्राप्त हो गया यदि आपकी चतुरासी जी में रति हो गई वास्तविक शब्द जब कृपा होगी तो प्राण रम रही हरिवंश वाणी और कुछ नहीं प्राण रम रही हरिवंश वाणी बस श्रीमद् चतुरासी जी निज मंत्र और जुगल सेवा इतने अपनी दौड़ रह गई है।

चतुरासी जी स्पवाणी सुधा दी एक ही बात है। महाप्रभु की वाणी महाप्रभु द्वारा दिया हुआ मंत्र और महाप्रभु द्वारा दी हुई सेवा बस इतना ही हमारा है और कुछ हम नहीं जानते और कुछ नहीं मानते। दोनों बातें हैं। आगे अब देखो यार रस में विधि नहीं निषेध तहां न लगन गहन के वेद तहां कुदिन दिन कछु नहीं इस रस में जो हरिवंश शरणागत है इसमें शास्त्र कहता है यह करो शास्त्र कहता है यह ना करो ये सब हमारे बस की नहीं रह गई नाभा जी ने लिखा है हरिवंश महाप्रभु के लिए विधि निषेध नहीं दास अब जैसे संध्या के समय मौन होकर पश्चिम की तरफ मुख करके और उस समय सूर्य को अर्घ दान करते हुए गाय गायत्री जप करने का विधान शास्त्रोक्त है।

ना स्वाध्याय का है ना पाने का है ना कुछ गाने का है। उस समय चुप मौन धारण करके गायत्री जप का शास्त्रोक्त विधान संध्या के समय अब हमारे यहां शास्त्रोक्त विधान के आगे की बात वेदातीत बात है कि शंख घंटा जो भी अपने वैष्णव जनों की आरतियों में प्रयोग होते हैं खूब ध्यान मंदिरा मृदंग आदि वाद्य बजते हैं और श्री जी का आरती का सौभाग्य अपने लोग प्राप्त करते हैं और उसके पहले संध्या भोग लगता है और भोग को तुरंत पाने के लिए आदेश है। भोग जब मिला सो पा लिए जिस समय सूर्य अस्त होता है उसके आधा घंटे मतलब 48 मिनट दो घड़ी कहीं कुछ खानपान के लिए सब ये निषेध किया गया है।

सूर्य अस्त हो रहे हैं। 48 मिनट इधर 48 मिनट उधर [गला साफ़ करने की आवाज़] ये बीच में बैठकर के जप का विधान किया गया। इतने में तो अपना भोग प्रसाद हो जाता है। तो या रस में विधि नहीं निषेध शास्त्र क्या कहता है? कहो दूसरों से कहो हम हरिवंशी हैं। हमने समझा हम हरिवंशी हैं। इसीलिए इस रस को जल्दी जो कहो हरिवंश रस बिरलो समझनहार आप ये समझे त्रिकाल संध्या करते थे। त्रिकाल संध्या प्रातः मध्यान और सायम मूज की मेखला 108 मूंज मूंज की पवित्री मूंज की पवित्री चोटी पे कुशासन पर बैठकर के त्रिकाल संध्या गायत्री का अनुष्ठान मतलब गुरु कृपा से ऐसा जीवन नहीं रहा बहुत शास्त्री पद्धति से बलवश्य देव की किए बिना भोजन नहीं पाना हवन करके बलवश्य पूरा दिन भर लगे रहते नैष्टिक ब्रह्मचर्य का जीवन और सन्यास का जीवन हम अपने मुख से क्या प्रशंसा करें और अब जो जीवन है वो हमारा जीवन नहीं है हमारी लाडली का जीवन है अब हमसे कहो कि आप क्या हो तो हम कल कह रहे थे कि हम पोस्टर लिखवा सकते हैं हम कुछ नहीं है क्या साधना है कुछ नहीं हम अपने को नहीं कुछ कह सकते क्या कह सकते हैं बस इतना जरूर कह सकते हैं कि हम श्री जी के हैं बस बस इसके आगे कुछ नहीं कह सकते हो।

हमारी जो साधन के अभिमान थे, जो साधना की ठसक थी, जो हम गर्व से बोलते थे, वो सब हमारा कुछ नहीं है। अब हमारे पास कुछ नहीं है। लाडली जु के सिवा कुछ नहीं है। बस हमारी जो कुछ है वो लाडली जो है। कोई साधन नहीं है हमारे पास। ना किसी साधन का बल रह गया है। सब में धूल डाल दी गई है। जहांजहां अभिमान था सबको चूर कर दिया गया है। कुछ नहीं रह गया हमारे पास। जो हम कभी एक ठसक में बोलते थे वो सब ठसके हमारी बह गई श्री जी की कृपा से सब बह गई कोई ठसक नहीं रह गई है कि एक ही ठसक रह गई हमारे माई श्यामाजू को राज्यास में विधि नहीं निषेध बहुत सी विधियां है शास्त्र की हम एक भी विधि का पालन हमारी विधि है श्री जी और सब निषेध है हरि हरिवंशी ध्यान से सुन ले हमारी विधि है केवल श्री जी सुबह से शाम तक पता नहीं है कौन सा दिन है कौन सा यहां चिंतन ही नहीं है कि आज कौन सा दिन है कौन सा वार है कौन सा तिथि कौन सा नक्षत्र है कोई मतलब ही नहीं सुबह से शाम तक अपनी ध्वनि में लगे रहने का मार्ग हरिवंश महाप्रभु ने दे दिया और तहां ना लग्न ग्रहण के वेद भाई यह मेष वृष आदि लगन कि यह लगन है।

यह शुभ लगन है। यह अशुभ लगन है। अपने वो कृतिका और रोहिणी नक्षत्र ये मेष वृष ये सब अरे बड़ा इसमें यहां ग्रह नक्षत्र इनका सब किसी भी तरह का कोई भी महत्व नहीं है। सुबह से शाम जैसे आज तैसे कल तैसे परसों जैसे नरसों हमारे 12 महीना एक ही दिन एक ही तिथि एक ही बार है राधा राधा राधा या रस में विधि नहीं निषेध अरे ऐसा नहीं करना चाहिए देखो यह तो महा प्रेम है कर्माबाई जी के मन में आया प्रेम करती थी ठाकुर जी से कि सब कोई ठाकुर जी को शयन तक तो भोग लगाता है लेकिन शयन से जगने तक इतने में भूख नहीं लग जाती होगी तो सुबह तो बहुत विलंब हो जाता है मंगला भोग लगने में तो वो 3:00 बजे खिचड़ी बिना नहाए धोए बिना कुल्ला मुखारी किए

तीन बजे खिचड़ी बना देती थी और ठाकुर जी को बुलाती और ठाकुर जी कृपा सिंधु है जब उनके भाव को देखा भाव का भूखा हूं मैं भाव ही एक सार है तो वह भाव से प्रेरित होकर आकर गोद में बैठकर खिचड़ी पाते ठाकुर जगन्नाथ जी अब वो सुबह खवा प्या के बर्तन सब मार्जन करके सब ऐसे करके फिर स्नान करने जाती तो एक दिन प्रसिद्ध था कर्माबाई बड़ी भक्त है भगवान का भजन करती है तो एक संत मिले शास्त्री पद्धति से चलने वाले तो उनका सूर्य उदय हो रहा है बड़ी भगत कहलाती हो अब नहाने जा रहे हो तो एक बार तो चुप रही फिर उन्होंने कहा सुना नहीं अरे स्नान का समय तीन चार बजे स्नान करना चाहिए भजन करना चाहिए तो उन्होंने कहा स्वामी जी हम कैसे तीन चार बजे स्नान करें 3 बजे तो ठाकुर जी को हम खिचड़ी का भोग लगाते अपनी भाव की बात बता दी अरे उन्होंने कहा महत अपराध बिना स्नान किए बिना पवित्र हुए ठाकुर जी को महत अपराध इसीलिए कहते दूसरों की सुनो मत महत अपराध कर्माबाई बहुत भोले स्वभाव के भक्त होते हैं डर गई तो महाराज पहले स्नान तिलक शास्त्री पद्धति

अब उन्होंने शुरू किया अब स्नान सब करके जब रसोई बनाई तो पांच सब लगभग बच गए भोग अब बुलाया ठाकुर जी आए तो एक कवल पाया तले वहां मंदिर का पर्दा खुलने का समय आ गया भाग गए गए तो खिचड़ी मुख में लगी हुई थी क्योंकि पवाया अभी पूरा था नहीं आचमन कराया नहीं था तो जो पट खोला तो जगन्नाथ जी के पार्षद ने कहा जय जय भोग तो अब पधराएंगे खिचड़ी कैसे उखने लगी तब उन्होंने कहा कि कर्माबाई के यहां हम रोज प्रसाद भोग आरोगने जाते हैं। वो एक शास्त्री कर्मकांडी आया है बाबा जी उसकी बुद्धि को भ्रम में डाल दिया है।

कर्माबाई से कह दो हम तुमसे वैसे ही प्रसन्न है जैसे तुम बनाती थी बिना नहाए धोए बनाओ और हमें ये या रस में विधि नहीं निषेध यहां भोग लगाने में ये नहीं कहा तस्तु गोविंदमनाभ्यासी कुछ नहीं हमारे लाडली लाल बनाया राधा वल्लभ श्री हरिव राधा वल्लभ श्री कोई मंत्र नहीं यहां अपवित्र अपवित्र केशवाय नम नारायण नम राधा वल्लभ श्री हरिवंश श्री राधा श्री राधा श्री राधा या रस इसीलिए कोई मानेगा थोड़ी देखो इसी प्रसंग में आगे चल के कह रहे हैं स्तुति करहु देहु को गारी हार ना अपनी मानियो चाहे तुम हमारी बात की स्तुति करो या हमें गाली दो हम तुम्हारी बात सुनने वाले नहीं हार मानने वाले नहीं हम चलेंगे हरिवंश धर्म में ही हरिवंश मान लो बड़े किए सुकृत सबको फले अनेक जन्मों के सुकृत फलीभूत हो गए हैं है किसी की हिम्मत कि ग्रहण पड़ रहा हो और भोजन कर ले यहां पंगत लगती है जब ग्रहण पड़ रहा होता है टटिया स्थान में पंगत लगती है कुंज बिहारी श्री हरिदास और चक पाते हैं।

हमको मतलब ही नहीं है तो पढ़ा करो। हमारा जो ग्रहण पड़ रहा है वह तो रात दिन पड़ता रहता है। [गला साफ़ करने की आवाज़] प्रिया रूपी चंद्रमा को श्याम सिद्ध कर रहे हैं। हम तो हर समय इसी चंद्र ग्रहण में ही रहते हैं। इसी सूर्य ग्रहण में रहते हैं। तो यहां रस में विधि नहीं निषेध। कोई भी शास्त्री विधि विधान हमारे रस में नहीं है। सुबह मंगला से ले स्वयं स्वयं से ले मंगला चतुरासी जी निज मंत्र बस हम ना कुछ दिन जाने आगे वर्णन कर रहे हैं। त ना लगन ग्रहण के वेद कोई ये लगन आदि मेष वृष आदि या ग्रहण सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण हमारे यहां नहीं मानने इनका कोई ये तो लोक व्यवहार में मंदिर बंधक रखते हैं।

लोक व्यवहार लोक समाज के कारण ये बंद रखते नहीं ऐसा नहीं है हमारे ठाकुर जी के लिए कोई ग्रहण नहीं क्योंकि हम नित्य वृंदावन उपासक है और भगवान गीता जी में बोले हैं न तस्ते सूर्य न शशांको न पावका यत्वा न निवते तधाम परमम जो तेज जगत में सूर्य और चंद्र और अग्नि से प्रकाशित होता है इन तीनों का प्रवेश इस वृंदावन धाम में नहीं न तसते सूर्यो न शशांक न पावका सूर्य शशांक माने चंद्रमा पावका माने अग्नि ये तीनों तेजों का प्रवेश जहां नहीं है तधा परमम वो धाम स्वयं प्रकाशित है तो हम स्वयं प्रकाशित धाम में श्री प्रिया प्रीतम के आठों पैर उपासना करते हमारे यहां कभी चंद्र ग्रहण सूर्य ग्रहण होता ही नहीं है तो बोले व्यवहार व्यवहार तो तुम्हें करना होगा नहीं व्यवहार की तो धज्जियां उड़ा दी हमने यही इसीलिए तो इस धर्म जो कहो हरिवंश रस बिरलो समझना बिरलो कौन जो शरणागत है अरे बहुत बिल्कुल अपने धर्म में सुदृढ़ कहीं किसी भी तरह की कोई मान्यता नहीं त कुदिन दिन कछु नहीं आज बड़ा कुदिन है आज बड़ा सुदिन है अमुक तिथि है अमुक

तारीख है आज दान हमारे हमारे लिए कुदिन दिन सब बराबर है क्योंकि वही हमारी दिनचर्या हमारे लिए ना कोई सुदिन है और ना कोई कुदिन है सब मंगलमय दिन है ना ग्रहण ना नक्षत्र ना शुभ और ना अशुभ ना दिन ना कुदिन ना विधि ना निषेध नहीं शुभ अशुभ बोले बिल्ली रास्ता काट गई अशुभ हो गया अरे मार डाला बिल्ली को किसी ने सूचना आई थी। बिल्ली रास्ता काट गई तो कार खड़ी की और घेर करके उस बिल्ली को मार डाला। अब अशुभ हो गया। बिल्ली में भगवान नहीं है क्या? बोले खाली बाल्टी देख ली अशुभ हो गया।

बोले चल दिया से छींक आ गई। बड़ा अशुभ हो गया। बिल्ली का रास्ता काट गई। श्री हरिवंश मंगल है। ये इनको दिखाया कि देखो ये बिल्ली रास्ता काट रही है। और आगे जब आए ना तो पुष्पों से स्वागत हो रहा था। ढोल नगाड़े बज रहे थे और पूरा मंगल में हम कहा बोलो बिल्ली रास्ता काट गई। क्या हुआ? कुछ चले श्री हरिव नहीं शुभ अशुभ मान अपमान। नहीं शुभ अशुभ। आज बड़ा शुभ दिन है तो हमको क्या दे देगा? क्योंकि हम तो रात दिन प्रिया प्रीतम में लगे हैं। आज बड़ा अशुभ दिन है तो हमारा क्या ले लेगा?

हम थ प्रिया प्रीतम में लगे हुए हैं। यहां ना शुभ है और ना अशुभ है। बराबर बड़ी कृपा है। कैलेंडर रखते नहीं। जो कैलेंडर रखते हैं वो सिलेंडर होते नहीं। सरेंडर सरेंडर शरणागत और जो सरेंडर होते हैं वो कैलेंडर नहीं रखते। अब हमें पता ही नहीं कि दिन कौन सा है, वार कौन सा है, नक्षत्र कौन से सच्ची कहता हूं। मुझे नहीं पता एकादशी का पता वृंदावन की भीड़ से लगता है। परिक्रमा मार्ग से और कोई कितनी तारीख कोई ऐसे बता दे कि आज ये तिथि है। आज ये तारीख है तो पता नहीं बृहस्पतिवार का जरूर पता लगाए रखते कि कब है बृहस्पतिवार क्योंकि गुरु जी के यहां जाना है।

नहीं शुभ अशुभ और मान अपमान जो बहुमान करे को मेरो के बहुमानत ना ही बाई जो अपमान करे को केू के अपमान नहीं लगता बोले ऐसा क्या पा गए कौन सा जादू पा गए कि तुम्हारे ऊपर मान अपमान का कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता बोले श्री हरिवंश गिरा रस सागर माज मगन सब निधि पाई चतुरासी जी रूपी समुद्र में अब हमारी जो मन रूपी मीन है कलोले करता रहता है मान अपमान का कोई प्रभाव नहीं जो बहुमान करे को मेरो किए बहुमानत ना बढ़ाई और जो अपमान करे को केू की अपमान नहीं लगताई नहीं शुभ अशुभ मान अपमान और नहीं अनत भ्रम कपट सया यहां झूठ की बात नहीं यहां झूठ नहीं चलता झूठ मत बोलो इस रस में झूठ मिथ्यावाद नहीं झूठ नहीं जैसे है वैसे श्री जी के है अनंत माने झूठ और भ्रम और अनंत का शब्द झूठ भी होता है और अनंत का शब्द और भी उपासना होता है।

जैसे जय श्री हरिवंश अनत सच नाही अन तो अगर हम उसे अनित लेते हैं तो झूठ आता है और अनंत लेते हैं तो अन्य आता है तो हमें ना अन्य का आश्रय लेना और ना झूठ बोलना है और भ्रमित होना नहीं अपनी उपासना में पूर्ण विश्वास करके रखना है नहीं तो और लोग मिलेंगे तो भ्रमित कर देंगे इसीलिए हमारी संगोष्ठी किसी से नहीं हो सकती तो भ्रम अपने उपासना में भ्रम नहीं होना चाहिए। भ्रम नहीं रहना चाहिए। संशय मिटा देना चाहिए। जिस मार्ग में गुरु चलते हैं उसी मार्ग में हमें चलना चाहिए।

अच्छा आप लोग आए हो क्या? हमारी उपासना समझ कर। आपको श्री जी लाई है तो चुपचाप चले चलो ना। काहे को बीच में पूछते हो कि कहां ले जा रहे हो? अरे रुको हमें बताओ। जब शुरुआत में नहीं पूछा तो बीच में काहे पूछे चुपचाप चले चलो साथ में चले चलो हम निकुल जाएंगे तो तुमको भी निकुज ले जाएंगे तुम्हें चिंता काहे की सोचना तो पहले चाहिए था ब्याह होने के बाद देखा कि दूल्हा तो काला है तो क्या अब तो जिंदगी पार करनी पड़ेगी अब ये थोड़ी कि दूल्हा काला है तो छोड़कर दूसरे गोरे को वरण कर दोगे नहीं अब तो हरिवंश पतिव्रत है जिनके सुख संपत्ति दंपत्ति जो हम हरिवंश पतिव्रत वाले हैं तो नहीं शुभ अशुभ मान अपमान नहीं अनत भ्रम कपट सयान और

स्नान क्रिया स्नान किया हरि ओम मा मंत्रों का यहां कुछ नहीं स्नान करते समय अगर यमनाष्टक याद है तो गाओ नहीं तो राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ श्री स्नान क्रिया में जो शास्त्री पद्धतियां है हमारे यहां स्वीकार है जल लिया और शुरू हो गया ब्रजाधराज नंदना बुदागात चंद्रना लेप गंधवा या राधा वल्लभ श्री हरिवंश राधा वल्लभ से स्नान क्रिया और जप अनुष्ठान बोले हम अनुष्ठान कर रहे हमारे यहां जप का अनुष्ठान प्रारंभिक दशा में हम भी सम्मान करते हैं इस बात का कि माला लेकर के जप करना चाहिए।

लेकिन जब मंत्र में रुचि हो जाएगी तो आपको हम सच्ची बात कहते हैं। माला भार रूप जान पड़ता है। और अब कई कई महीने हो जाते हैं माला प्रभु का स्पर्श नहीं होता। यद्यपि प्रियता इतनी है कि माधव से कहते हैं माला मत भूलना। हर समय माला झोली अपनी बैग में रखना। हम कभी भी मांग सकते हैं। पर कई कई महीने हो जाते हैं नहीं मांगते हैं। समय नहीं माला घुमाने के लिए गणना करना उसको घुमाना चूमना इतने सब समय नहीं है ये सब समय नहीं है चलो क्या गणना करना यहां कोई गणना नहीं है यहां सुमिरन प्रिया जी का निरंतर का है इतने लाख में इतने करोड़ में मिल जाएंगी यह कोई बात नहीं है यहां तो एक बार जिन नाम ली हित सो है अति दिन ताको संग न छाड़ ध्रुव अपनो कर माला हाथ में नहीं है लेकिन आपको विश्वास करो या ना करो कोई मिनट कोई सेकंड खाली चला जाए श्री जी से प्रार्थना करते हैं ऐसा वो दुर्भाग्य कभी ना हो

प्रयास इतना है अंदर का कि एक सेकंड या एक मिनट खाली चला जाए ऐसा दुर्भाग्य कभी ना हो या चतुरासी जी या निज मंत्र या नाम तीन में से कोई ना कोई चल रहा है हम भले चुपचाप बैठे तो भ्रम नहीं करना अपने में अपने उपासना में भ्रमित नहीं होना भ्रमित करने वाले बहुत मिल सकते हैं ऐसा नहीं है ऐसा है ऐसा है ऐसा नहीं शुद्ध जो हमारी वाणी जी है जैसे तस्मात शास्त्रम प्रमाणम से तो यहां वेद रसिक की वाणी रसिकों की वाणी के अनुसार चलो [नाक से की जाने वाली आवाज़] कपट अंदर कुछ

है बाहर कुछ है ये सब अपने बहुत निर्मल होते हैं हरिवंशी बहुत निर्मल ये कपट शान चतुरता चतुराई ये सब ये सब नहीं बिल्कुल सरल स्वभाव नमन कुटिलाई हमसे गलत हो रहा है हम कर पा रहे नहीं गलत कर पा रहे हैं हमारी श्री जी ऐसा अभी कृपा नहीं किए। जिस दिन वह ब्रेक लगा देंगे उस दिन आंख उठाकर के भी हम गलत की तरफ नहीं देखेंगे। अब क्या करें? हम विवश है। हमसे गलती हो रही है। ये नहीं नहीं नहीं हम कसम खाते हैं। हम ऐसा नहीं ऐसा नहीं। हम गलत हैं। हमसे गलती हो रही है या गलती हो गई है या आगे भी हो सकती है।

अब ये केवल स्वामिनी जी संभाल सकती हैं। आप चाहो क्षमा करो। आप चाहो दंड दे दो। हम ऐसे हैं। हम कुछ कह नहीं सकते। हमारे में कोई बल नहीं है। और जब बल था तब गरजते थे इस बात के लिए कि ऐसा नहीं अब नहीं कह सकता। ऐसा नहीं हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है। ऐसा भी हो सकता है। क्योंकि अब जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भाव है। मेरे में सामर्थ्य नहीं है कि मैं कुछ कर सकूं। कुछ कर सकूं। अब मेरे में सामर्थ्य नहीं है। मेरे से जो कराया जाएगा जैसे होगा जो कुछ होगा। बस हम देख रहे हैं।

अगर गाली दिलवानी है तो हमसे बुरा करवा दिया जाएगा। आप हमें गाली दोगे। अगर सम्मान दिलाना है तो ऐसा कुछ करवा दिया जाएगा कि आप हमें सम्मान करोगे। ये सब बाहरी बातें हैं। लेकिन कपट और चतुराई ये हमारे रसिकों में नहीं होती। सीधे सरल स्वभाव मन कुटिलाई और कह रहे हैं स्नान क्रिया जप तप नहीं जो जप है वो अनुष्ठान रूप में हमारे यहां नहीं होता और निरंतर प्रिया प्रीतम को पुकार होती है जो मंत्र है मानो हम पुकार रहे हैं प्रिया प्रीतम को हमारे यहां संख्या का वैसे प्राय आप देखना हमारे रसिकों को आप यहां देखना हमारे गुरु जी के गले गले के नीचे वो हिलता नजर आएगा ऐसे जब देखो तब वो मतलब निरंतर निरंतर मंत्राकार माला नहीं और गुरु कृपा से ऐसा ही प्रसाद उनके चरणों का मिला कि शुरुआत में हम बहुत कोशिश की लेकिन जहां मंत्र में रुचि हुई तो माला अपने आप बीच से छोड़ के रख दिया वो माला नहीं चल पाया।

आप लोग ऐसा मत कीजिएगा। होड़ नहीं करनी चाहिए। नहीं जो हो रहा है वह भी बंद हो जाएगा। भजन जो हो रहा है वो भी छूट जाएगा। आप लोगों को देखो कक्षा एक और पीएचडी तो आप मतलब अब आज आप अभ्यास कर रहे हो और वो अभ्यास हम 11 वर्ष से कर रहे हैं। 11 वर्ष की अवस्था से और जब तप बाहरी तप नहीं हमारे यहां। आंतरिक तप है बाहरी तप जैसे इत्र नहीं लगाना सुगंधित द्रव्य नहीं लगाना तपस्या के अंतर्गत आता है हमारे यहां सुगंधित द्रव्य ना लगाए तो अपराध है प्रसादी करो अगर ना हो तो प्रसादी करके लगाओ क्योंकि सेवा में जाओगे ना तो श्री जी का प्रसादी करके इत्र रखो और पहले ऐसे लगाओ और लगा के फिर सेवा में जाओ दूसरा माला ना पहनना ये तपस्या के अंतर्गत आता है।

सुगंधित द्रव्य ना लगाना और माला ना पहनना। हमारे यहां है प्रसादी माला मिलते ही तुरंत कंठ में डालो और गर्व से पहन के चलो छाती फुला के हमारी श्री जी का प्रसादी माला। तीसरा चंदन सुगंधित द्रव्य माला चंदन ये तपस्वी के लिए निषेध है हमारे यहां गर्व से लगाओ श्री जी का प्रसादी चंदन है और प्रसादी जो आभूषण है प्रसादी वस्त्र है तो अब पान तपस्वी तपस्या में पान निषेध है यहां गर्व से पाव श्री जी ने पाया है ना खूब आनंद से चबा चबा के पाव मंत्र जपते हुए क्योंकि पान और प्रसादी कभी झूठन नहीं मानी जाती जैसे राधा वल्लभ जी का अपने श्री जी का भोग मिला मुंह में डाल लिया तो अब यह नहीं कि झूठा है मुंह मंत्र नहीं चलेगा खूब चकाचक

चलेगा झूठा वो होता है जो श्री जी का झूठा नहीं होता जो श्री जी के द्वारा उष्ट होता है वो अमृत होता है झूठा नहीं माना जाता है चरणामृत पा के भी मंत्र जप सकते हो और प्रसाद पा के भी मंत्र जप सकते हो प्रसादी बोले तपस्या भी अब जरा यहां और सेवक वाणी के पीछे आगे प्रकरण में आएगा श्री हरिवंश अलप तप न समझे क्या है प्रसिद्ध तप श्री हरिवंश प्रसिद्ध धर्म समझे ना अलप तप छोटी तपस्या वाला हरिवंश धर्म को नहीं समझ सकता और यहां कहा गया स्नान क्रिया जप तप नहीं अब उसका

और इसका जोड़ करो वहां कह रहे हैं बिना कठिन तपस्या के इस रस को प्राप्त नहीं किया जा सकता। और यहां कह रहे स्नान क्रिया जप तप नहीं। वहां कह रहे सेवक जी कह रहे हैं श्री हरिवंश प्रसिद्ध धर्म समझे ना अलप तप समझो श्री हरिवंश कृपा सेव धर्मिन और जप और यहां स्नान किया जप तप नहीं धर्मी का जप करो। धर्मी का सेवन करो। यही सबसे बड़ा तप है यार एक बार जीवन में ऐसे हो जाए क्यों क्या मे ये सब सब हटा एक बार ऐसे हो जाए शरणागत श्री जी का और श्री जी के जनों को एक बार ऐसे कोई क्यों मे नहीं देखो झटके में पार हो जाओ और क्यों किया तो दलदल में फंस गए निकलना मुश्किल है निकालने की अलग-अलग प्रक्रियाएं प्रभु कैसे क्या प्रेरित करते हैं क्या बस तुम क्यों ना करो तो इस माया प्रपंच से पक्का पक्का निकल जाओगे और क्यों में किया तो चाहे जितने अच्छे से चलो दलदल में फंस जाओगे पक्का दलदल में फंस जाओगे तो से सेवहु धर्मिन और जप धर्मिन जो धर्मिन शब्द है वो सेव और जप दोनों के बीच में लगा हुआ है।

हरिवंश उपासक की सेवा करो और हरिवंश उपासक का जप करो। मतलब बहुत बड़ी बात है जो अपने गुरुदेव का चिंतन करते हो, गुरुदेव का जप करते हो। धर्मन जप बहुत बड़ी बात है। जो कम से कम थोड़ी देर ही बैठकर अपने गुरुदेव का ध्यान, गुरुदेव का चिंतन, गुरुदेव और जिनकी गुरुदेव में आसक्ति है। उनको क्या कहना है? उठते बैठते चलते फिरते अपने गुरु का ध्यान बना रहता है। सबसे बड़ी तपस्या है हरिवंश धर्मी की सेवा और हरिवंश धर्मी का जप उनका सुमिरन करना। जप का तात्पर्य सुमिरन करने से है।

उनका ध्यान करते ही उनका सुमिरन करना बार-बार। वैसे शास्त्री आज्ञा भी ध्यान मूलम गुरु मूर्ति पूजा मूलम गुरु पदम मंत्र मूलम गुरु वाक्यम मोक्ष मूलम गुरु कृपा बलिहारी है जो अपने गुरु सेवा में थोड़ी भी सेवा बन जाए थोड़ा भी गुरु के काम आ जाए हमारा जीवन तो बलिहार हो जाए धन्य हो जाए जीवन कि उनकी आज्ञा में आ जाए उनकी आज्ञा पर चल दे ज्ञान ध्यान तहा सकल प्रयास सुनो रसिक हरिवंश विलास श्री हरिवंश ही गाय हो कह रहे ज्ञान सांख्य योग का जो ज्ञान है सर्वम खिदम ब्रह्मने नानास्त कििंचन वो अपने आप आपको प्राप्त

हो जाएगा प्रयास करने की जरूरत नहीं है ये क्रूरा पापिनो नसता संभास दश सर्त्या परम स्वरा बुद्धिम इससे बढ़कर कोई ज्ञान है क्या कि चाहे क्रूर हो पापी हो दुष्ट हो संभाषण योग्य भी ना हो लेकिन साक्षात श्री राधा वल्लभ लाल जी है ये मेरी दृढ़ मति है इसमें विराजमान है ऐसा नहीं कहा साक्षात राधा वल्लभ लाल है ये मेरी दृढ़ मति है ये क्रूरा अप पापिनो नसता संभास दृश्य ये सर् वस्तुतया निरीक्ष वस्तुतया निरीक्ष परम स्वरा म परम स्वराध्य बुद्धि मम मेरी दृढ़ मति है कि साक्षात श्री राधा वल्लभ लाल है निरीक्ष ऐसा तुम भी देखो ऐसी आज्ञा हरिवंश महाप्रभु की इससे बड़ा ब्रह्म ज्ञान क्या हो सकता है सबको अपने इष्ट के रूप में देखना लेकिन सांख्य योगाद ज्ञान यहां प्रयास है यहां उसका कोई मतलब नहीं है यहां कोई मतलब नहीं है यहां राधा नाम ध्यान करो वही राधा रूप जागृत हो जाएगा यहां जो ध्यान है वो प्रिया प्रीतम के चरणारविंद का प्रिया प्रीतम के नाम का ध्यान है और कोई ध्यान नहीं।

हमें ज्ञान क्या है? हमारे प्रिया प्रीतम। हमारा ध्यान क्या है? प्रिया प्रीतम। विधि क्या है? प्रिया प्रीतम। निषेध क्या है? सब कुछ। प्रिया प्रीतम के सिवा सब कुछ निषेध। तो ज्ञान ध्यान तहा सकल प्रयास। सुनो रसिक हरिवंश विलास। हे रसिक जनों सुनो मैं ऐसे हरिवंश के प्रताप का विलास का वर्णन करता हूं और श्री हरिवंश ही गाई हो श्री हरिवंश का ही गान करूंगा। अब सेवक जी महाराज कह रहे हैं जहां हरिवंश प्रेम उन्माद तहां कहां स्वार्थ निस्वाद वाद विवाद तहां नहीं जहां हरिवंश शरणागति है और हरिवंश नाम का राधा वल्लभ श्री हरिवंश नाम का शरणागत मंत्र का निज मंत्र का जप है वहां एक प्रेम प्रकट होता है।

जब कोई विधि की बात कही जाए और ना माने तो बोले बड़े उन्मादी हो तुम। बात नहीं मान रहे तो यहां आगे वर्णन कर रहे हां है हम उन्मादी है जहां हरिवंश प्रेम उन्माद तहां कहां स्वार्थ निस्व्वाद ये निस्वारद स्वार्थ की कामना हमारे हरिवंश धर्मी में नहीं होती जहां हरिवंश नाम जनित हरिवंश शरणागत मंत्र जनित निज मंत्र जनित चतुरासी जी जनित युगल सेवा जनित रति उत्पन्न होती है वहां स्वार्थ नहीं होता एक टमाटर अगर पकता है ना यमुना किनारे तो उसे यमुना जी में धो के दौड़ से उल्लसित होते हुए जब राधा पीजू को भोग लगाते हैं तो यहां एक करोड़

के टमाटर का भोग लगाने पर वो सुख नहीं प्राप्त होगा क्योंकि पसीना चुबाते हुए उसे सींचा गया है और उससे जब एक फल होता है तो दौड़ के एक फूल होता है ना गुलाब का फूल को राधा मोहन जी को ले जाना राधा पीजी को ले जाना और वो जब श्रृंगार करके धारण करते हो जब देखते हैं ना तो क्या है हरिवंश उपासक को राधा पीजू राधा मोहनज प्रिया प्रीतम के लिए हम जो कुछ कर रहे हैं प्रिया प्रीतम के लिए अपनी बात तो खत्म हो चुकी है हम स्नान कर रहे हैं तो प्रिया प्रीतम के लिए पवित्र वस्त्र धारण कर रहे हैं तो प्रिया प्रीतम के लिए हम चंदन तिलक लगा रहे हैं तो प्रिया प्रीतम के लिए दर्पण देख रहे हैं तो प्रिया प्रीतम के लिए अब जाके सेवा में लगे सब कुछ प्रिया प्रीतम के लिए हो रहा है कहां कहां स्वार्थ निस्वाद ये बेसवाद स्वार्थ की बातें हरिवंश धर्मी में नहीं होती जहां हरिवंश के प्रेम का अनुवाद होता है वहां नीरस स्वार्थ की चर्चा स्वार्थ का कार्य ये सब नहीं होता है और हरिवंश धर्म नहीं तो स्वार्थ रहेगा नहीं स्वार्थ नहीं रहता और अब ये

धर्म ऐसा है कि इसमें वाद विवाद की जगह नहीं है। जैसे कोई आकर वाद विवाद करने लगे। अरे बड़ी विचित्र विचित्र दशाएं होती है। बड़ी विचित्र दशाएं होती है। अब जो लोग नहीं जानते वो लोग निंदा करने लगते हैं। तुम हमारे घर की बात क्या जानो यार? तुम जो कुछ करके सब पाना चाहते हो उससे हम खेल रहे हैं। तुम जो सब कुछ करके पाना चाहते हो उससे हम खेल रहे हैं। यार तुम क्या जान रहे हो? तुम क्या समझ पा रहे हो? बोले सिद्धों की बात अलग है। तुम कोई सिद्ध हो क्या? तो पंक्ति में किसकी खड़े हैं हम?

पंक्ति में किसकी खड़े हैं? हमारे आगे जो हमारे गुरुजन है उनके आगे जो गुरुजन है वही तो सब सिद्ध है तो हम उनकी पंक्ति में खड़े हैं सिद्धों की पंक्ति में हम सिद्ध नहीं है लेकिन हम सिद्धों की पंक्ति में खड़े हैं और सिद्धों के आदेश से चल रहे हैं और हमारी वही सिद्धि होगी जो सेवक जी की है जो ध्रुवदास जी की है। पक्का मान लो विश्वास हम पहुंचेंगे तो थोड़ा छोटा कद करके नहीं श्री जी बुलाएंगे कि छोटी सखी छोटा कद करो ध्रुवदास जी का बड़ा कद करो इनका छोटा कद नहीं वही रूप वही ठसक वही सेवा वही गुमान यहां कह रहे हैं वाद विवाद ताज आप अपने धर्म की स्थापना करो तो गुरु जी ने बताया कि राजा मानसिंह बड़े सनातन धर्मावलंबी थे।

तो उन्होंने हमारे पूज्य श्री रूप गोस्वामी से कहा कि आप एकादशी नहीं मानते। आप सनातन धर्म की विधियों को नहीं मानते। तिथि त्योहारों को नहीं मानते। जो विधि निषेध है वो आप नहीं मानते। आप प्रमाणित कीजिए आपका धर्म क्या है? तो रूप गोस्वामी जी मुस्कुरा दिए। तो उसने कहा आप प्रमाणित कीजिए नहीं आपको हम बंदी बना के बुलाएंगे। तो यहां क्या प्रमाण दे? छाती के विषय का क्या प्रमाण दे? यहां रसिकों की वाणी का उसको पता नहीं है। वो वेद और गीता से प्रमाण मानेगा। और हमारा धर्म जो प्रारंभ होता है वो सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणम ब्रज यहां से प्रारंभ होता है।

अब कैसे कोई समझे सर्व धर्मान परित्यज मामेकम शरणम ब्रज तो वाद विवाद ताने अगर कोई वाद विवाद करने लगे तो मौन होकर हार मानकर चल देना चाहिए। अपने मत की स्थापना करने के लिए झगड़ा नहीं करना चाहिए। किसी को दुख देना, किसी को कष्ट देना नहीं। हम हार मानते हैं। हमारे हृदय का विषय है ये। हम तुमसे वाद विवाद नहीं करते हैं। लेकिन हम जिस धर्म में चलते हैं। हम उसी धर्म में चलेंगे। हम वाद विवाद नहीं करेंगे। सेवक जी का आदेश है। वाद विवाद तहान। किसी से अपने मत की स्थापना के लिए हमें वाद विवाद करने की जरूरत नहीं है।

हमें अपने धर्म में ना भ्रम रखना है ना संशय रखना है। खूब दृढ़ विश्वास करके चलना है। इसीलिए हरिवंश धर्मावलंबी किसी और की बातें सुनेगा तो उसमें संस्कार और बन जाएंगे। यह जो आप बात सुनोगे तो यह संस्कार बनेंगे और और बातें सुनोगे तो हम जो सुनते हैं उसका मनन होता है और वही हमारा संस्कार बनता है। तो हमारे कोई और संस्कार ना बने। देखो हमें हमारा जो धर्म है पातीत धर्म है। हमको अपने पति को रिझाना है। दूसरा का पति बड़ा सुंदर है, बड़ा चतुर है, बड़ा विद्वान है, बड़ा ज्ञानी है, बड़ा हमें उसे क्या हमारा पति जैसा हमारे लिए हमारा परमेश्वर है।

है मेरा पति मेरे लिए परमेश्वर है। तो हमारा जो धर्म है अब हम तो इस धर्म के ज्ञाता नहीं कि ज्ञान करके आए हो। हमको उसी परब्रह्म परमात्मा तत्व ने इस धर्म में घसीटा है। तो जब हमें प्रभु ने ये धर्म दिया है तो अब इस धर्म का पालन करेंगे। इसी के अनुसार चलेंगे और बचा लिया यार बड़े प्रपंच से बचा लिया। महाप्रभु ने कभी-कभी हम यमुना किनारे सोचते हैं बड़े-बड़े जाल से बचा लिया। शास्त्र जाल से बचा लिया और सीधे आठों पहर प्रिया प्रीतम के दुलार में लगे रहना शेष चर्चा आगे श्रीहारी

यह पाठ वीडियो के स्वचालित (auto-generated) उपशीर्षकों से लिया गया है — इसमें शब्दों की त्रुटियाँ हो सकती हैं। प्रामाणिक वचन के लिए वीडियो अवश्य सुनें।

मूल वीडियो: Shri Hit Radha Kripa (YouTube)

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